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वैष्णव खण्ड · अध्याय 26

तुम्बुरु (घोण) तीर्थ माहात्म्य

अध्याय 25अध्याय-सूचीअध्याय 27

श्लोक 1 (skanda.2.26.1)

श्रीसूत उवाच । अत्राहं संप्रवक्ष्यामि शौनकाद्या महौजसः । घोणतीर्थस्य माहात्म्यं सर्वपातकनाशनम् ।

śrīsūta uvāca atrāhaṁ saṁpravakṣyāmi śaunakādyā mahaujasaḥ ghoṇatīrthasya māhātmyaṁ sarvapātakanāśanam

श्री सूत जी ने कहा — हे परम तेजस्वी शौनक आदि मुनियो! अब मैं समस्त पापों का नाश करने वाले घोणतीर्थ का माहात्म्य कहता हूँ।

श्लोक 2 (skanda.2.26.2)

तत्र स्नानं जनानां तु जन्मान्तरतपःफलम् । उत्तराफल्गुनीयुक्तशुक्लपक्षीयपर्वणि ।

tatra snānaṁ janānāṁ tu janmāntaratapaḥphalam uttarāphalgunīyuktaśuklapakṣīyaparvaṇi

वहाँ स्नान करना मनुष्यों के लिए दूसरे जन्म के तप के फल के समान है, विशेषतः उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र से युक्त शुक्ल पक्ष के पर्व पर।

श्लोक 3 (skanda.2.26.3)

तुम्बोस्तीर्थं मीनसंस्थे रवौ तीर्थानि सर्वशः । अपराह्ने समायान्ति गंगादीनि जगत्त्रये ।

tumbostīrthaṁ mīnasaṁsthe ravau tīrthāni sarvaśaḥ aparāhne samāyānti gaṁgādīni jagattraye

जब सूर्य मीन राशि में होते हैं, तब गंगा आदि तीनों लोकों के समस्त तीर्थ अपराह्न के समय तुम्बु तीर्थ में एकत्र होते हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.26.4)

ऋषय ऊचुः । भगवन्सूत सर्वज्ञ सर्वशास्त्रार्थपारग । गंगायाः सरितः सर्वा घोणतीर्थेऽतिपावने ।

ṛṣaya ūcuḥ bhagavansūta sarvajña sarvaśāstrārthapāraga gaṁgāyāḥ saritaḥ sarvā ghoṇatīrthe'tipāvane

ऋषियों ने कहा — हे भगवन् सूत, सर्वज्ञ, समस्त शास्त्रों के अर्थ में पारंगत! गंगा आदि समस्त नदियाँ अत्यंत पवित्र घोणतीर्थ में,

श्लोक 5 (skanda.2.26.5)

किमर्थं स्नांति वै तत्र मीनसंस्थे प्रभाकरे ।

kimarthaṁ snāṁti vai tatra mīnasaṁsthe prabhākare

सूर्य के मीन राशि में होने पर वहाँ क्यों स्नान करती हैं?

श्लोक 6 (skanda.2.26.6)

श्रीसूत उवाच । पापिनो मनुजाः सर्वे ह्यस्मासु स्नान्ति यत्नतः । विसृज्य पापजालानि कृतार्था यांति वै जनाः ।

śrīsūta uvāca pāpino manujāḥ sarve hyasmāsu snānti yatnataḥ visṛjya pāpajālāni kṛtārthā yāṁti vai janāḥ

श्री सूत जी ने कहा — सभी पापी मनुष्य वहाँ प्रयत्नपूर्वक स्नान करते हैं और अपने पाप-जाल को त्यागकर कृतार्थ होकर जाते हैं।

श्लोक 7 (skanda.2.26.7)

अस्माकं पापजालं तत्कथं नश्यति सर्वतः । एवमालोच्य तीर्थानि गंगादीनि प्रयत्नतः ।

asmākaṁ pāpajālaṁ tatkathaṁ naśyati sarvataḥ evamālocya tīrthāni gaṁgādīni prayatnataḥ

"हमारा पाप-जाल सब ओर से किस प्रकार नष्ट हो?" ऐसा विचार कर गंगा आदि तीर्थों ने बड़े प्रयत्न से,

श्लोक 8 (skanda.2.26.8)

संस्मृत्य ब्रह्मपुत्रस्य नारदस्य महात्मनः । वाक्यं मनोहरं दिव्यं सर्वपापनिषूदनम् ।

saṁsmṛtya brahmaputrasya nāradasya mahātmanaḥ vākyaṁ manoharaṁ divyaṁ sarvapāpaniṣūdanam

ब्रह्मा के पुत्र महात्मा नारद के मनोहर, दिव्य और समस्त पापों का नाश करने वाले वचन का स्मरण करते हुए,

श्लोक 9 (skanda.2.26.9)

गत्वा श्रीवेंकटं शैलं ब्रह्महत्यादिशोषकम् । तत्र स्नात्वा तीर्थवर्ये स्वामिपुष्करिणीजले ।

gatvā śrīveṁkaṭaṁ śailaṁ brahmahatyādiśoṣakam tatra snātvā tīrthavarye svāmipuṣkariṇījale

श्री वेंकट पर्वत पर जाकर, जो ब्रह्महत्या आदि पापों को सुखा देने वाला है, वहाँ श्रेष्ठ स्वामिपुष्करिणी तीर्थ के जल में स्नान करके,

श्लोक 10 (skanda.2.26.10)

अनन्तरं ततो विप्रा घोणतीर्थेऽतिपावने । उत्तराफल्गुनीयुक्तशुक्लपक्षीयपर्वणि ।

anantaraṁ tato viprā ghoṇatīrthe'tipāvane uttarāphalgunīyuktaśuklapakṣīyaparvaṇi

हे विप्रो! उसके पश्चात् वे उत्तराफाल्गुनी युक्त शुक्ल पक्ष के पर्व पर अत्यंत पवित्र घोणतीर्थ में जाती हैं।

श्लोक 11 (skanda.2.26.11)

स्नांति तीर्थानि सर्वाणि मीनसंस्थे प्रभाकरे । तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं को वेत्ति भुवनत्रये ।

snāṁti tīrthāni sarvāṇi mīnasaṁsthe prabhākare tasya tīrthasya māhātmyaṁ ko vetti bhuvanatraye

सूर्य के मीन राशि में होने पर वहाँ समस्त तीर्थ स्नान करते हैं। उस तीर्थ के माहात्म्य को तीनों लोकों में कौन जान सकता है?

श्लोक 12 (skanda.2.26.12)

तस्मात्पुण्यतमं तीर्थं घोणतीर्थं द्विजोत्तमाः ।

tasmātpuṇyatamaṁ tīrthaṁ ghoṇatīrthaṁ dvijottamāḥ

इसलिए, हे श्रेष्ठ द्विजो, घोणतीर्थ सबसे पुण्यतम तीर्थ है।

श्लोक 13 (skanda.2.26.13)

आरामोच्छेदकं क्रूरं कन्यातुरगविक्रयम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तमाहुर्ब्रह्मघातुकम् ।

ārāmocchedakaṁ krūraṁ kanyāturagavikrayam ghoṇasnānaparityaktaṁ tamāhurbrahmaghātukam

जो उद्यानों का विनाश करने वाला, क्रूर, कन्या और घोड़ों का व्यापार करने वाला हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं।

श्लोक 14 (skanda.2.26.14)

देवद्रव्यापहन्तारं तथा दत्तापहारकम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तमाहुर्ब्रह्मघातुकम् ।

devadravyāpahantāraṁ tathā dattāpahārakam ghoṇasnānaparityaktaṁ tamāhurbrahmaghātukam

जो देव-द्रव्य का अपहरण करने वाला और दिया हुआ दान वापस लेने वाला हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसे भी ब्रह्महत्यारा कहते हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.26.15)

तटाकसेतुभेत्तारं परस्त्रीसंगलोलुपम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तमाहुः स्तेयिनं बुधाः ।

taṭākasetubhettāraṁ parastrīsaṁgalolupam ghoṇasnānaparityaktaṁ tamāhuḥ steyinaṁ budhāḥ

जो तालाबों और बाँधों को तोड़ने वाला, पराई स्त्री में लोलुप हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसे विद्वान चोर कहते हैं।

श्लोक 16 (skanda.2.26.16)

ददामीति द्विजायोक्त्वा पश्चाद्यो नास्तिकोऽधमः । घोणस्नानपरित्यक्तं सुरापं तं विदुर्बुधाः ।

dadāmīti dvijāyoktvā paścādyo nāstiko'dhamaḥ ghoṇasnānaparityaktaṁ surāpaṁ taṁ vidurbudhāḥ

जो द्विज से "मैं दूँगा" कहकर बाद में नास्तिक और अधम बन जाए, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसे विद्वान सुरापी के समान पापी मानते हैं।

श्लोक 17 (skanda.2.26.17)

गुरुविप्रजनद्वेष्यमात्मस्तुतिपरायणम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तमाहुः स्तेयिनं बुधाः ।

guruviprajanadveṣyamātmastutiparāyaṇam ghoṇasnānaparityaktaṁ tamāhuḥ steyinaṁ budhāḥ

जो गुरु और ब्राह्मणों से द्वेष रखने वाला, केवल आत्म-प्रशंसा में लीन हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसे विद्वान चोर कहते हैं।

श्लोक 18 (skanda.2.26.18)

असंस्कृतान्नभोक्तारं पितृशेषान्नभोजिनम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तमाहुः स्तेयिनं द्विजाः ।

asaṁskṛtānnabhoktāraṁ pitṛśeṣānnabhojinam ghoṇasnānaparityaktaṁ tamāhuḥ steyinaṁ dvijāḥ

जो असंस्कृत अन्न खाने वाला, पितरों के श्राद्ध का बचा अन्न खाने वाला हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसे द्विज चोर कहते हैं।

श्लोक 19 (skanda.2.26.19)

पितृशेषान्नदातारं मातापितृविरोधिनम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तमाहुः स्तेयिनं बुधाः ।

pitṛśeṣānnadātāraṁ mātāpitṛvirodhinam ghoṇasnānaparityaktaṁ tamāhuḥ steyinaṁ budhāḥ

जो पितरों के श्राद्ध का बचा अन्न अपात्र को देने वाला, माता-पिता का विरोधी हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसे विद्वान चोर कहते हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.26.20)

परस्त्रीसंगनिरतं भ्रातृभार्यारतिप्रियम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तमाहुर्गुरुतल्पगम् ।

parastrīsaṁganirataṁ bhrātṛbhāryāratipriyam ghoṇasnānaparityaktaṁ tamāhurgurutalpagam

जो पराई स्त्री के संग में रत, भाई की पत्नी के साथ रमण में प्रिय हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसे गुरु-शय्या-भ्रष्ट कहते हैं।

श्लोक 21 (skanda.2.26.21)

चण्डालभाषिणं विप्रं सदैवादर्भपाणिकम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तत्संसर्गं तु पञ्चमम् ।

caṇḍālabhāṣiṇaṁ vipraṁ sadaivādarbhapāṇikam ghoṇasnānaparityaktaṁ tatsaṁsargaṁ tu pañcamam

जो चांडाल जैसी भाषा बोलने वाला ब्राह्मण हो, सदैव अपवित्र वस्तु हाथ में रखता हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसका संसर्ग पंचम अंत्यज के समान है।

श्लोक 22 (skanda.2.26.22)

रजस्वलाश्वचण्डालध्वनि श्रुत्वान्नभोजिनम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तत्संसर्गं तु पञ्चमम् ।

rajasvalāśvacaṇḍāladhvani śrutvānnabhojinam ghoṇasnānaparityaktaṁ tatsaṁsargaṁ tu pañcamam

जो रजस्वला, गधे या चांडाल की ध्वनि सुनकर अन्न खाता हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसका संसर्ग भी पंचम के समान है।

श्लोक 23 (skanda.2.26.23)

पुराणोद्वाहमौंज्यादिधर्माणां विघ्नकारकम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तमाहुः पशुघातुकम् ।

purāṇodvāhamauṁjyādidharmāṇāṁ vighnakārakam ghoṇasnānaparityaktaṁ tamāhuḥ paśughātukam

जो विवाह, यज्ञोपवीत आदि प्राचीन धर्मों में विघ्न डालने वाला हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसे पशु-घातक कहते हैं।

श्लोक 24 (skanda.2.26.24)

शरणागतहन्तारं सर्वतीर्थपराङ्मुखम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तमाहुर्भ्रूणहं बुधाः ।

śaraṇāgatahantāraṁ sarvatīrthaparāṅmukham ghoṇasnānaparityaktaṁ tamāhurbhrūṇahaṁ budhāḥ

जो शरण में आए हुए का वध करने वाला, समस्त तीर्थों से मुँह मोड़ने वाला हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसे विद्वान भ्रूण-हत्यारा कहते हैं।

श्लोक 25 (skanda.2.26.25)

पितृयज्ञं परित्यक्तं त्यक्तभार्यं कुलाधमम् । घोणस्नानपरित्यक्तं तमाहुर्गोविघातुकम् ।

pitṛyajñaṁ parityaktaṁ tyaktabhāryaṁ kulādhamam ghoṇasnānaparityaktaṁ tamāhurgovighātukam

जो पितृ-यज्ञ त्यागने वाला, पत्नी को त्यागने वाला, कुल का अधम हो, और घोण-स्नान से विमुख हो, उसे गौ-हत्यारा कहते हैं।

श्लोक 26 (skanda.2.26.26)

महापापसमानानि क्षुद्रपापानि यानि च । घोणस्नानपरित्यक्तमाश्रयन्ति द्विजोत्तमाः ।

mahāpāpasamānāni kṣudrapāpāni yāni ca ghoṇasnānaparityaktamāśrayanti dvijottamāḥ

जितने भी महापापों के समान क्षुद्र पाप हैं, वे सब, हे श्रेष्ठ द्विजो, घोण-स्नान से विमुख व्यक्ति का ही आश्रय लेते हैं।

श्लोक 27 (skanda.2.26.27)

महापापरतं विप्राः श्वपचं वा कुलाधमम् । क्रूरं कुलान्तकं कष्टमदत्तं कर्मवर्जितम् ।

mahāpāparataṁ viprāḥ śvapacaṁ vā kulādhamam krūraṁ kulāntakaṁ kaṣṭamadattaṁ karmavarjitam

हे विप्रो! महापाप में रत, चांडाल के समान अधम कुल वाले, क्रूर, कुल का नाश करने वाले, दुःखी, अदत्त कर्म से रहित,

श्लोक 28 (skanda.2.26.28)

पशुघ्नं च परद्रोहमाश्रितं पिशुनं तथा । असत्यभाषिणं दम्भपरदाररतं तथा ।

paśughnaṁ ca paradrohamāśritaṁ piśunaṁ tathā asatyabhāṣiṇaṁ dambhaparadārarataṁ tathā

पशु-हिंसक, दूसरों से द्रोह करने वाले, दुष्ट के आश्रित, चुगलखोर, असत्यभाषी, कपटी और परस्त्री में रत,

श्लोक 29 (skanda.2.26.29)

मित्रद्रोहं कृतघ्नं च भ्रूणहं चातिपातकम् । परदाररतं पापं पराणामर्थसूचकम् ।

mitradrohaṁ kṛtaghnaṁ ca bhrūṇahaṁ cātipātakam paradārarataṁ pāpaṁ parāṇāmarthasūcakam

मित्र-द्रोही, कृतघ्न, भ्रूण-हत्यारे और अतिपातकी, परस्त्री-रत, दूसरों के धन का सूचक बताने वाले,

श्लोक 30 (skanda.2.26.30)

अनृतं कृषिकर्माणं स्वामिद्रोहं च वञ्चकम् । सलोभं पितृहन्तारं सर्वदेवपराङ्मुखम् ।

anṛtaṁ kṛṣikarmāṇaṁ svāmidrohaṁ ca vañcakam salobhaṁ pitṛhantāraṁ sarvadevaparāṅmukham

झूठे कृषि-व्यवहार करने वाले, स्वामी से द्रोह करने वाले ठग, लोभी, पिता के हत्यारे, समस्त देवताओं से विमुख,

श्लोक 31 (skanda.2.26.31)

आत्मप्रशंसां कुर्वाणं धर्मविघ्नकरं शठम् । अपात्रव्ययकर्तारं सानुकूल्यविभेदकम् ।

ātmapraśaṁsāṁ kurvāṇaṁ dharmavighnakaraṁ śaṭham apātravyayakartāraṁ sānukūlyavibhedakam

आत्म-प्रशंसा करने वाले, धर्म में विघ्न डालने वाले शठ, अपात्र में व्यय करने वाले, मेल को तोड़ने वाले,

श्लोक 32 (skanda.2.26.32)

सुपल्लवफलोपेतवृक्षविच्छेदकारकम् । विश्वासघातुकं चैव वीरहत्यापरायणम् ।

supallavaphalopetavṛkṣavicchedakārakam viśvāsaghātukaṁ caiva vīrahatyāparāyaṇam

नए पल्लव और फल वाले वृक्षों को काटने वाले, विश्वासघाती, वीर-हत्या में लीन,

श्लोक 33 (skanda.2.26.33)

अनग्निकमपुत्रं च विषकर्मप्रयोगिणम् । गुरुद्वेषकरं पापं दम्पत्योर्विरसावहम् ।

anagnikamaputraṁ ca viṣakarmaprayogiṇam gurudveṣakaraṁ pāpaṁ dampatyorvirasāvaham

अग्निहोत्र रहित, पुत्रहीन, विष का प्रयोग करने वाले, गुरु से द्वेष रखने वाले, पति-पत्नी में कटुता लाने वाले,

श्लोक 34 (skanda.2.26.34)

ग्रामाधिपत्यं कुर्वाणं तथा देवालयस्य च । भृतकख्यापकं विप्रं क्रूरकर्मपरायणम् ।

grāmādhipatyaṁ kurvāṇaṁ tathā devālayasya ca bhṛtakakhyāpakaṁ vipraṁ krūrakarmaparāyaṇam

गाँव या मंदिर पर स्वार्थवश आधिपत्य जमाने वाले, स्वयं को नौकर बताने वाले ब्राह्मण, क्रूर कर्मों में लीन,

श्लोक 35 (skanda.2.26.35)

प्रकृतीकृतपापौघं गुह्याघौघपरायणम् । अज्ञानादघकर्तारं ज्ञानाद्दुष्कर्मकारकम् ।

prakṛtīkṛtapāpaughaṁ guhyāghaughaparāyaṇam ajñānādaghakartāraṁ jñānādduṣkarmakārakam

पाप की बाढ़ में डूबे, गुप्त पापों की बाढ़ में लीन, अज्ञान से पाप करने वाले और जानबूझकर दुष्कर्म करने वाले,

श्लोक 36 (skanda.2.26.36)

एतान्सर्वांश्च विप्रेंद्रा घोणतीर्थं मनोहरम् । पुनाति स्नानपानाद्यैरहो तीर्थस्य वैभवम् ।

etānsarvāṁśca vipreṁdrā ghoṇatīrthaṁ manoharam punāti snānapānādyairaho tīrthasya vaibhavam

हे श्रेष्ठ विप्रो! इन सबको यह मनोहर घोणतीर्थ स्नान और जल-पान आदि से पवित्र कर देता है — अहो, इस तीर्थ की यह महिमा है!

श्लोक 37 (skanda.2.26.37)

श्रीसूत उवाच । अत्रेतिहासं वक्ष्यामि पुराणं पापनाशनम् । सर्वपापप्रशमनमपवर्गफलप्रदम् ।

śrīsūta uvāca atretihāsaṁ vakṣyāmi purāṇaṁ pāpanāśanam sarvapāpapraśamanamapavargaphalapradam

श्री सूत जी ने कहा — यहाँ मैं एक पापनाशक पुरातन इतिहास कहूँगा, जो समस्त पापों को शांत करने वाला और मोक्ष-फल देने वाला है।

श्लोक 38 (skanda.2.26.38)

पुरा गार्ग्यो महातेजाः सर्वविद्याविशारदः । सर्वज्ञो नीतिमान्विप्रः प्राह चेत्थं जितेन्द्रियः ।

purā gārgyo mahātejāḥ sarvavidyāviśāradaḥ sarvajño nītimānvipraḥ prāha cetthaṁ jitendriyaḥ

प्राचीन काल में महातेजस्वी, समस्त विद्याओं में निपुण, सर्वज्ञ, नीतिमान और जितेन्द्रिय ब्राह्मण गार्ग्य ने ऐसा कहा।

श्लोक 39 (skanda.2.26.39)

देवलं च महात्मानं नमस्कृत्य प्रसन्नधीः । कथयस्व महाभाग मयि कारुणिको भव । घोणतीर्थस्य माहात्म्यं सर्वपापहरं शुभम् ।

devalaṁ ca mahātmānaṁ namaskṛtya prasannadhīḥ kathayasva mahābhāga mayi kāruṇiko bhava ghoṇatīrthasya māhātmyaṁ sarvapāpaharaṁ śubham

महात्मा देवल को प्रसन्न मन से नमस्कार करके उन्होंने कहा — "हे महाभाग! मुझ पर कृपा करके घोणतीर्थ का समस्त पापों को हरने वाला शुभ माहात्म्य कहिए।"

श्लोक 40 (skanda.2.26.40)

देवल उवाच । तुम्बुरुर्नाम गन्धर्वो भार्यां शप्त्वा पतिव्रताम् । अत्र स्नात्वा समभ्यर्च्य वेंकटेशं दयानिधिम् ।

devala uvāca tumbururnāma gandharvo bhāryāṁ śaptvā pativratām atra snātvā samabhyarcya veṁkaṭeśaṁ dayānidhim

देवल ने कहा — तुम्बुरु नामक गंधर्व ने अपनी पतिव्रता पत्नी को शाप देकर, यहाँ स्नान कर दयानिधि वेंकटेश की पूजा की,

श्लोक 41 (skanda.2.26.41)

प्राप्तवान्विष्णुलोकं वै पुनरावृत्तिवर्जितम् ।

prāptavānviṣṇulokaṁ vai punarāvṛttivarjitam

और पुनरावृत्ति-रहित विष्णुलोक को प्राप्त किया।

श्लोक 42 (skanda.2.26.42)

गार्ग्य उवाच । किमर्थं देवल ऋषे भार्यां रूपवतीं स्त्रियम् । तुम्बुरुर्नाम गन्धर्वः सर्वविद्याविशारदः ।

gārgya uvāca kimarthaṁ devala ṛṣe bhāryāṁ rūpavatīṁ striyam tumbururnāma gandharvaḥ sarvavidyāviśāradaḥ

गार्ग्य ने कहा — हे देवल ऋषि! समस्त विद्याओं में निपुण गंधर्व तुम्बुरु ने अपनी रूपवती पत्नी को

श्लोक 43 (skanda.2.26.43)

शप्तवान्केन दोषेण भार्यां सर्वगुणान्विताम् । तद्वदस्व महाभाग श्रोतुं कौतूहलं हि मे ।

śaptavānkena doṣeṇa bhāryāṁ sarvaguṇānvitām tadvadasva mahābhāga śrotuṁ kautūhalaṁ hi me

किस दोष से शाप दिया? हे महाभाग, यह बताइए, मुझे सुनने की उत्सुकता है।

श्लोक 44 (skanda.2.26.44)

तुम्बुरुर्नाम गन्धर्वो भार्यां प्रीत्या ह्युवाच ह । माघत्रये मया साकं स्नानं कुरु मलापहम् ।

tumbururnāma gandharvo bhāryāṁ prītyā hyuvāca ha māghatraye mayā sākaṁ snānaṁ kuru malāpaham

तुम्बुरु नामक गंधर्व ने प्रेमपूर्वक अपनी पत्नी से कहा — "माघ के तीन दिनों में मेरे साथ मल को दूर करने वाला स्नान करो।

श्लोक 45 (skanda.2.26.45)

माघमास्युदिते सूर्ये सर्वकल्मषनाशने । तीरेऽस्मिन्विष्णुपूजार्थं गोमयालेपनं कुरु ।

māghamāsyudite sūrye sarvakalmaṣanāśane tīre'sminviṣṇupūjārthaṁ gomayālepanaṁ kuru

माघ मास में, समस्त पापों का नाश करने वाले सूर्योदय के समय, इस तट पर विष्णु-पूजा हेतु गोबर का लेप करो।

श्लोक 46 (skanda.2.26.46)

रंगवल्ल्यादिभिः शुभ्रपद्मस्वस्तिकधातुभिः । शुश्रूषां कुरु मे विष्णोर्मासेऽस्मिन्मंगलप्रदे ।

raṁgavallyādibhiḥ śubhrapadmasvastikadhātubhiḥ śuśrūṣāṁ kuru me viṣṇormāse'sminmaṁgalaprade

रंगोली आदि से, श्वेत कमल और स्वस्तिक की आकृतियों से, इस मंगलकारी मास में मेरे लिए विष्णु की सेवा करो।

श्लोक 47 (skanda.2.26.47)

माघेऽस्मिन्माधवस्यास्य कुरु त्वं दीपवर्तिकाम् । सधूपं पावकं भक्त्या समर्पय हरेः पुरः ।

māghe'sminmādhavasyāsya kuru tvaṁ dīpavartikām sadhūpaṁ pāvakaṁ bhaktyā samarpaya hareḥ puraḥ

इस माघ में माधव के लिए दीपक की बत्ती बनाओ, और भक्तिपूर्वक धूप-दीप हरि के सम्मुख अर्पित करो।

श्लोक 48 (skanda.2.26.48)

कुरु पाकं शुचिर्भूत्वा माधवाय महात्मने । प्रदक्षिणानमस्कारैर्भक्त्या माघे मया सह ।

kuru pākaṁ śucirbhūtvā mādhavāya mahātmane pradakṣiṇānamaskārairbhaktyā māghe mayā saha

शुद्ध होकर महात्मा माधव के लिए भोजन बनाओ, और माघ में मेरे साथ प्रदक्षिणा-नमस्कार सहित भक्तिपूर्वक पूजा करो।

श्लोक 49 (skanda.2.26.49)

कुरुष्व देवदेवस्य सपर्यां विष्णवेऽन्वहम् । पुराणश्रवणं विष्णोः कुरु नित्यमतंद्रिता ।

kuruṣva devadevasya saparyāṁ viṣṇave'nvaham purāṇaśravaṇaṁ viṣṇoḥ kuru nityamataṁdritā

प्रतिदिन देवाधिदेव विष्णु की पूजा करो, और नित्य अकुंठित भाव से विष्णु-पुराण का श्रवण करो।

श्लोक 50 (skanda.2.26.50)

नित्यं स्नात्वा प्रयत्नेन पिब पादोदकं हरेः । कृष्ण विष्णो मुकुन्देति नारायण जनार्दन ।

nityaṁ snātvā prayatnena piba pādodakaṁ hareḥ kṛṣṇa viṣṇo mukundeti nārāyaṇa janārdana

प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक स्नान करके हरि का चरणोदक पीओ, और निरंतर कीर्तन करो — 'कृष्ण, विष्णु, मुकुन्द, नारायण, जनार्दन,

श्लोक 51 (skanda.2.26.51)

अच्युतानन्त विश्वात्मन्निति कीर्तय सन्ततम् । क्रोधमात्सर्यलोभादींस्त्यक्त्वा त्वं व्रतमाचर । तेन ते जायते मुक्तिर्विष्णुलोकश्च शाश्वतः ।

acyutānanta viśvātmanniti kīrtaya santatam krodhamātsaryalobhādīṁstyaktvā tvaṁ vratamācara tena te jāyate muktirviṣṇulokaśca śāśvataḥ

अच्युत, अनंत, विश्वात्मन्' — और क्रोध, ईर्ष्या, लोभ त्यागकर व्रत का पालन करो; इससे तुम्हें मुक्ति और सनातन विष्णुलोक प्राप्त होगा।

श्लोक 52 (skanda.2.26.52)

इत्थं सा भर्तृगदितं श्रुत्वा गंधर्ववल्लभा । भर्तारमब्रवीत्कोपादसह्यं दुर्गतिप्रदम् ।

itthaṁ sā bhartṛgaditaṁ śrutvā gaṁdharvavallabhā bhartāramabravītkopādasahyaṁ durgatipradam

पति के इन वचनों को सुनकर गंधर्व-पत्नी ने क्रोधवश असह्य और दुर्गति देने वाले वचन अपने पति से कहे।

श्लोक 53 (skanda.2.26.53)

माघे चोद्भूतशीते तु प्रातर्मन्दोदिते रवौ । कथं निमज्जयेदस्मिन्माघे शीतार्तिकेऽनघ ।

māghe codbhūtaśīte tu prātarmandodite ravau kathaṁ nimajjayedasminmāghe śītārtike'nagha

"माघ में जब अत्यंत शीत हो और सूर्य मंद उदय हो रहा हो, तो हे निष्पाप! इस शीत-पीड़ादायक माघ में मैं जल में कैसे डूबूँ?

श्लोक 54 (skanda.2.26.54)

यत्त्वयोक्तानि कर्माणि न शक्यानि मयाऽसकृत् । न करोमि पते स्नानं प्रातःकाले त्वया सह ।

yattvayoktāni karmāṇi na śakyāni mayā'sakṛt na karomi pate snānaṁ prātaḥkāle tvayā saha

जो कर्म आपने बताए हैं, वे मुझसे बार-बार नहीं हो सकते; मैं प्रातःकाल आपके साथ स्नान नहीं करूँगी, हे स्वामी।

श्लोक 55 (skanda.2.26.55)

मृतौ शीतातिपातेन न च मे रक्षको भवान् । इत्येवमुदितं श्रुत्वा पतिर्गन्धर्ववल्लभः ।

mṛtau śītātipātena na ca me rakṣako bhavān ityevamuditaṁ śrutvā patirgandharvavallabhaḥ

अत्यधिक शीत से मर जाने पर भी आप मेरी रक्षा करने वाले नहीं हैं!" यह सुनकर गंधर्व-पति,

श्लोक 56 (skanda.2.26.56)

सशान्तोऽपि शशापाथ भार्यां चाप्रियवादिनीम् । पुत्रं च धर्मविमुखं भार्यां चाप्रियभाषिणीम् ।

saśānto'pi śaśāpātha bhāryāṁ cāpriyavādinīm putraṁ ca dharmavimukhaṁ bhāryāṁ cāpriyabhāṣiṇīm

यद्यपि शांत स्वभाव के थे, फिर भी अप्रिय बोलने वाली अपनी पत्नी को शाप दे बैठे — क्योंकि धर्म-विमुख पुत्र और अप्रिय बोलने वाली पत्नी,

श्लोक 57 (skanda.2.26.57)

अब्रह्मण्यं च राजानं सद्यः शापेन दण्डयेत् । इति न्यायं विचिंत्यासौ शशापेत्थं सतीं तदा ।

abrahmaṇyaṁ ca rājānaṁ sadyaḥ śāpena daṇḍayet iti nyāyaṁ viciṁtyāsau śaśāpetthaṁ satīṁ tadā

तथा अधर्मी राजा को तुरंत शाप से दंडित करना चाहिए — ऐसा न्याय विचारकर उन्होंने उस सती को इस प्रकार शाप दिया,

श्लोक 58 (skanda.2.26.58)

वेंकटाद्रौ महापुण्ये सर्वपातकनाशने । घोणतीर्थसमीपे च पिप्पलद्रुमकोटरे ।

veṁkaṭādrau mahāpuṇye sarvapātakanāśane ghoṇatīrthasamīpe ca pippaladrumakoṭare

"समस्त पापों का नाश करने वाले महापुण्य वेंकटाद्रि पर्वत पर, घोणतीर्थ के समीप, पीपल के वृक्ष की खोह में,

श्लोक 59 (skanda.2.26.59)

तत्राम्बुरहिते मूढे मण्डूका भव केवलम् । इत्येवं भर्तृवाक्यं तच्छ्रुत्वा गंधर्ववल्लभा ।

tatrāmburahite mūḍhe maṇḍūkā bhava kevalam ityevaṁ bhartṛvākyaṁ tacchrutvā gaṁdharvavallabhā

वहाँ जल-रहित होकर, हे मूढ़े, केवल मेंढकी बन जाओ!" पति के ये वचन सुनकर गंधर्व-पत्नी,

श्लोक 60 (skanda.2.26.60)

पतित्वा पादयोस्तस्य तुम्बुरुं प्रार्थयत्सती । विशापमवदत्पश्चाद्भर्ता वै तुम्बुरुस्तदा ।

patitvā pādayostasya tumburuṁ prārthayatsatī viśāpamavadatpaścādbhartā vai tumburustadā

उनके चरणों में गिरकर सती ने तुम्बुरु से प्रार्थना की; तब तुम्बुरु ने शाप से मुक्ति का उपाय बताया,

श्लोक 61 (skanda.2.26.61)

अगस्त्यो वै महाभागस्तपस्वी विजितेन्द्रियः । घोणतीर्थवरे स्नात्वा पौर्णमास्यां महातिथौ ।

agastyo vai mahābhāgastapasvī vijitendriyaḥ ghoṇatīrthavare snātvā paurṇamāsyāṁ mahātithau

"महाभाग अगस्त्य, जितेन्द्रिय तपस्वी, पूर्णिमा के महान् दिन श्रेष्ठ घोणतीर्थ में स्नान करके,

श्लोक 62 (skanda.2.26.62)

शिष्येभ्यो वै यदा तस्मिन्नश्वत्थद्रुमसंनिधौ । घोणतीर्थस्य माहात्म्यं वक्ति वै ब्राह्मणोत्तमः ।

śiṣyebhyo vai yadā tasminnaśvatthadrumasaṁnidhau ghoṇatīrthasya māhātmyaṁ vakti vai brāhmaṇottamaḥ

जब वे उस अश्वत्थ वृक्ष के समीप अपने शिष्यों को घोणतीर्थ का माहात्म्य कहेंगे, ब्राह्मणों में श्रेष्ठ होकर,

श्लोक 63 (skanda.2.26.63)

तदा पिप्पलवृक्षस्य कोटरे त्वं समाहिता । श्रुत्वा वै घोणतीर्थस्य माहात्म्यं मोक्षदायकम् ।

tadā pippalavṛkṣasya koṭare tvaṁ samāhitā śrutvā vai ghoṇatīrthasya māhātmyaṁ mokṣadāyakam

तब तुम पीपल वृक्ष की खोह में छिपी हुई, मोक्ष देने वाले घोणतीर्थ के माहात्म्य को सुनकर,

श्लोक 64 (skanda.2.26.64)

विधूय सर्वपापानि मया साकं रमिष्यसि । इत्युक्ता विररामाथ धर्मपत्नी पतिव्रता ।

vidhūya sarvapāpāni mayā sākaṁ ramiṣyasi ityuktā virarāmātha dharmapatnī pativratā

समस्त पापों को त्यागकर पुनः मेरे साथ आनंदपूर्वक रहोगी।" यह सुनकर वह पतिव्रता धर्मपत्नी मौन हो गई,

श्लोक 65 (skanda.2.26.65)

भर्तृशापान्महाघोरां मंडूकतनुमाश्रिता । शेषाद्रिशिखरे तस्मिन्घोणतीर्थस्य दक्षिणे ।

bhartṛśāpānmahāghorāṁ maṁḍūkatanumāśritā śeṣādriśikhare tasminghoṇatīrthasya dakṣiṇe

पति के भयंकर शाप से मेंढकी का शरीर धारण कर, शेषाद्रि के उस शिखर पर, घोणतीर्थ के दक्षिण में,

श्लोक 66 (skanda.2.26.66)

शनैःशनैर्गता नारी पिप्पलद्रुमकोटरम् । अब्दायुतं गतं तस्या अश्वत्थद्रुमकोटरे ।

śanaiḥśanairgatā nārī pippaladrumakoṭaram abdāyutaṁ gataṁ tasyā aśvatthadrumakoṭare

वह स्त्री धीरे-धीरे पीपल वृक्ष की खोह में गई; उस अश्वत्थ वृक्ष की खोह में उसके दस हजार वर्ष बीत गए।

श्लोक 67 (skanda.2.26.67)

ततः कालांतरेऽगस्त्यो वेंकटाद्रिं मनोहरम् । गत्वा श्रीस्वामितीर्थे च स्नात्वा नियमपूर्वकम् ।

tataḥ kālāṁtare'gastyo veṁkaṭādriṁ manoharam gatvā śrīsvāmitīrthe ca snātvā niyamapūrvakam

फिर कुछ काल बाद अगस्त्य मुनि मनोहर वेंकटाद्रि पर्वत पर जाकर, श्री स्वामितीर्थ में नियमपूर्वक स्नान करके,

श्लोक 68 (skanda.2.26.68)

वराहस्वामिनं देवं नत्वा तीर्थस्य दक्षिणे । वेंकटेशालयं गत्वा श्रीनिवासं कृपानिधिम् ।

varāhasvāminaṁ devaṁ natvā tīrthasya dakṣiṇe veṁkaṭeśālayaṁ gatvā śrīnivāsaṁ kṛpānidhim

उस तीर्थ के दक्षिण में भगवान वराहस्वामी को नमन कर, वेंकटेश के मंदिर जाकर, दयानिधि श्रीनिवास को,

श्लोक 69 (skanda.2.26.69)

वेदवेद्यं विशालाक्षं देवदेवं सनातनम् । नत्वाऽगस्त्यो महाभागो घोणतीर्थं ततो ययौ ।

vedavedyaṁ viśālākṣaṁ devadevaṁ sanātanam natvā'gastyo mahābhāgo ghoṇatīrthaṁ tato yayau

जो वेदों से जानने योग्य, विशाल नेत्रों वाले, देवाधिदेव और सनातन हैं, नमन कर, महाभाग अगस्त्य फिर घोणतीर्थ गए।

श्लोक 70 (skanda.2.26.70)

तत्र स्नात्वा तीर्थवर्ये स्वशिष्यै योगिनां वरः । पिप्पलद्रुमच्छायायां शिष्येभ्यो भक्तिपूर्वकम् ।

tatra snātvā tīrthavarye svaśiṣyai yogināṁ varaḥ pippaladrumacchāyāyāṁ śiṣyebhyo bhaktipūrvakam

वहाँ श्रेष्ठ तीर्थ में स्नान कर, योगियों में श्रेष्ठ उन्होंने अपने शिष्यों को पीपल वृक्ष की छाया में भक्तिपूर्वक,

श्लोक 71 (skanda.2.26.71)

घोणतीर्थस्य माहात्म्यं ब्रह्महत्याविनाशकम् । सर्वमंगलदं पुण्यं सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।

ghoṇatīrthasya māhātmyaṁ brahmahatyāvināśakam sarvamaṁgaladaṁ puṇyaṁ sarvasampatpradāyakam

ब्रह्महत्या का भी नाश करने वाला, सर्व-मंगलदायक, पुण्यदायक और सर्व-संपत्तिदायक घोणतीर्थ का माहात्म्य,

श्लोक 72 (skanda.2.26.72)

उक्तवान्योगिनां श्रेष्ठो ह्यगस्त्यो भगवानृषिः ।

uktavānyogināṁ śreṣṭho hyagastyo bhagavānṛṣiḥ

योगियों में श्रेष्ठ भगवान ऋषि अगस्त्य ने सुनाया।

श्लोक 73 (skanda.2.26.73)

तदा श्रुत्वा तु वर्षाभूः पादयोस्तस्य योगिनः । पतित्वा ज्ञानदीपेन विदित्वा वैभवं मुनेः ।

tadā śrutvā tu varṣābhūḥ pādayostasya yoginaḥ patitvā jñānadīpena viditvā vaibhavaṁ muneḥ

तब यह सुनकर वर्षाभू मेंढकी उस योगी के चरणों में गिरी, और ज्ञान के दीपक से मुनि की महिमा को जानकर,

श्लोक 74 (skanda.2.26.74)

पूर्वरूपं समासाद्य नारी रूपं मनोहरम् । अगस्त्य योगिनां श्रेष्ठ रक्षरक्ष दयानिधे ।

pūrvarūpaṁ samāsādya nārī rūpaṁ manoharam agastya yogināṁ śreṣṭha rakṣarakṣa dayānidhe

अपना पूर्व मनोहर स्त्री-रूप पाकर बोली — "हे योगियों में श्रेष्ठ अगस्त्य! रक्षा करो, रक्षा करो, हे दयानिधे!

श्लोक 75 (skanda.2.26.75)

मां रक्ष दयया ब्रह्मन्पतिवाक्यविरोधिनीम् । इत्युक्त्वा तं विशालाक्षी विरराम ततः परम् ।

māṁ rakṣa dayayā brahmanpativākyavirodhinīm ityuktvā taṁ viśālākṣī virarāma tataḥ param

हे ब्रह्मन्! अपनी दया से मेरी रक्षा करो, जो पति की आज्ञा का उल्लंघन करने वाली हूँ।" यह कहकर वह विशाल-नेत्रा स्त्री मौन हो गई।

श्लोक 76 (skanda.2.26.76)

अगस्त्य उवाच । का त्वं सुश्रोणि भद्रं ते भेकजन्मप्रदायकम् । पापं पूर्वभवे चासीत्तद्वदस्व च मा चिरम् ।

agastya uvāca kā tvaṁ suśroṇi bhadraṁ te bhekajanmapradāyakam pāpaṁ pūrvabhave cāsīttadvadasva ca mā ciram

अगस्त्य ने कहा — "हे सुंदरी, तुम्हारा कल्याण हो! तुम कौन हो, जिसे मेंढकी का जन्म मिला? पूर्वजन्म में क्या पाप था? यह शीघ्र बताओ।"

श्लोक 77 (skanda.2.26.77)

नार्युवाच । तुम्बुरुर्नाम गन्धर्वः सर्वविद्याविशारदः । तस्य भार्यास्म्यहं विप्र ह्यगस्त्य मुनिसेवित ।

nāryuvāca tumbururnāma gandharvaḥ sarvavidyāviśāradaḥ tasya bhāryāsmyahaṁ vipra hyagastya munisevita

स्त्री ने कहा — "तुम्बुरु नामक एक गंधर्व है, समस्त विद्याओं में निपुण; हे मुनिसेवित अगस्त्य, मैं उसकी पत्नी हूँ।

श्लोक 78 (skanda.2.26.78)

भर्ता मे सर्वधर्मज्ञस्तुम्बुरुर्मुनिसत्तमः । सर्वधर्मान्मनोज्ञा त्वं कुरु नित्यं मया सह ।

bhartā me sarvadharmajñastumbururmunisattamaḥ sarvadharmānmanojñā tvaṁ kuru nityaṁ mayā saha

मेरे पति तुम्बुरु, मुनियों में श्रेष्ठ, सब धर्मों को जानने वाले हैं। उन्होंने कहा — 'तुम सदा मेरे साथ प्रसन्नतापूर्वक सब धर्मों का पालन करो।'

श्लोक 79 (skanda.2.26.79)

पतिवाक्यं तदा श्रुत्वा परलोकोपकारकम् । असह्यं वाक्यमत्युग्रं दुर्गतिप्रदमेव हि ।

pativākyaṁ tadā śrutvā paralokopakārakam asahyaṁ vākyamatyugraṁ durgatipradameva hi

तब परलोक-हितकारी पति के वचन सुनकर, मैंने असह्य, अत्यंत कठोर और दुर्गतिदायक वचन कहे,

श्लोक 80 (skanda.2.26.80)

मया चोक्तं हि दुर्बुद्ध्या हे तात मुनिसत्तम ।

mayā coktaṁ hi durbuddhyā he tāta munisattama

यह मैंने, हे तात, मुनिसत्तम, अपनी दुर्बुद्धि से कहा था।"

श्लोक 81 (skanda.2.26.81)

अगस्त्य उवाच । कुशाग्रबुद्धिस्ते भर्ता शशाप त्वां रुषान्वितः । एवं शापो युक्त एव पतिवाक्यविरोधिनीम् ।

agastya uvāca kuśāgrabuddhiste bhartā śaśāpa tvāṁ ruṣānvitaḥ evaṁ śāpo yukta eva pativākyavirodhinīm

अगस्त्य ने कहा — "तुम्हारे कुशाग्रबुद्धि पति ने क्रोधित होकर तुम्हें शाप दिया; पति की आज्ञा का उल्लंघन करने वाली स्त्री के लिए ऐसा शाप उचित ही है।

श्लोक 82 (skanda.2.26.82)

पतिवाक्यमनादृत्य स्वेच्छया वर्तते तु या । सा नारी निरये घोरे पतत्याचन्द्रतारकम् ।

pativākyamanādṛtya svecchayā vartate tu yā sā nārī niraye ghore patatyācandratārakam

जो स्त्री पति के वचन का अनादर कर अपनी इच्छा से चलती है, वह चंद्र-तारों के रहने तक घोर नरक में गिरती है।

श्लोक 83 (skanda.2.26.83)

न स्वातन्त्र्यं तु नारीणां नोल्लंघ्यं पतिभाषणम् । पातिव्रत्येन पुण्येन पतिशुश्रूषणेन च ।

na svātantryaṁ tu nārīṇāṁ nollaṁghyaṁ patibhāṣaṇam pātivratyena puṇyena patiśuśrūṣaṇena ca

स्त्रियों को स्वतंत्रता नहीं है, और पति के वचन का उल्लंघन नहीं करना चाहिए; पातिव्रत्य-पुण्य और पति-सेवा से ही

श्लोक 84 (skanda.2.26.84)

स्त्रियो विष्णुपदं यान्ति न चान्यैरपि सुव्रतैः । पतिर्माता पतिर्विष्णुः पतिर्ब्रह्मा पतिः शिवः ।

striyo viṣṇupadaṁ yānti na cānyairapi suvrataiḥ patirmātā patirviṣṇuḥ patirbrahmā patiḥ śivaḥ

स्त्रियाँ विष्णु-पद को प्राप्त होती हैं, अन्य किसी उत्तम व्रत से नहीं। पति ही माता है, पति ही विष्णु है, पति ही ब्रह्मा है, पति ही शिव है,

श्लोक 85 (skanda.2.26.85)

पतिर्गुरुः पतिस्तीर्थमिति स्त्रीणां विदुर्बुधाः । पतिवाक्यमपाकृत्य या नारी सुकृतैः परैः ।

patirguruḥ patistīrthamiti strīṇāṁ vidurbudhāḥ pativākyamapākṛtya yā nārī sukṛtaiḥ paraiḥ

पति ही गुरु है, पति ही तीर्थ है — ऐसा विद्वान स्त्रियों के विषय में जानते हैं। जो स्त्री पति के वचन को त्यागकर अन्य पुण्य कर्मों में लगी रहे,

श्लोक 86 (skanda.2.26.86)

सदैव युज्यते सापि नैव शुद्धा भवेत्सकृत् । पतिहीना तु या नारी गुरुभिर्धर्मवित्तमैः ।

sadaiva yujyate sāpi naiva śuddhā bhavetsakṛt patihīnā tu yā nārī gurubhirdharmavittamaiḥ

वह कभी भी शुद्ध नहीं होती। परंतु जो स्त्री पति-हीन हो, वह धर्मज्ञ गुरुजनों की प्रेरणा से,

श्लोक 87 (skanda.2.26.87)

सा कृतज्ञा विदध्यात्तु व्रतं धर्मफलप्रदम् । पतिना प्रेरिता सैव पतिबुद्धिपरायणा ।

sā kṛtajñā vidadhyāttu vrataṁ dharmaphalapradam patinā preritā saiva patibuddhiparāyaṇā

कृतज्ञ होकर धर्म-फल देने वाला व्रत करे, पति की इच्छा और बुद्धि के अनुसार चलती हुई।

श्लोक 88 (skanda.2.26.88)

पतिपादाब्जतीर्थेन या स्नाता सा हरिप्रिया । सा स्नाता सर्वतीर्थेषु गङ्गादिषु न संशयः ।

patipādābjatīrthena yā snātā sā haripriyā sā snātā sarvatīrtheṣu gaṅgādiṣu na saṁśayaḥ

जो पति के चरण-कमल के तीर्थ-जल से स्नान करती है, वह हरि को प्रिय होती है; वह निःसंदेह गंगा आदि समस्त तीर्थों में स्नान कर चुकी मानी जाती है।

श्लोक 89 (skanda.2.26.89)

तस्मात्त्वत्कृतदोषस्तु त्वामायातीति तत्फलम् । भुञ्जन्त्यास्तेऽत्र शृण्वन्त्या घोणतीर्थस्य वैभवम् । मुक्तिरासीच्छुभांगं तन्नारीरूपं पुनर्यथा ।

tasmāttvatkṛtadoṣastu tvāmāyātīti tatphalam bhuñjantyāste'tra śṛṇvantyā ghoṇatīrthasya vaibhavam muktirāsīcchubhāṁgaṁ tannārīrūpaṁ punaryathā

इसलिए तुम्हारे किए हुए दोष का यही फल तुम्हें प्राप्त हुआ — यहाँ रहकर घोणतीर्थ की महिमा सुनना; अब तुम्हें मुक्ति मिल गई है, और तुम्हारा सुंदर स्त्री-रूप पूर्ववत् लौट आया है।"

श्लोक 90 (skanda.2.26.90)

तस्माद्घोणस्य तीर्थस्य तुम्बुतीर्थमितीह वै ।

tasmādghoṇasya tīrthasya tumbutīrthamitīha vai

इसीलिए इस घोणतीर्थ का नाम तुम्बु-तीर्थ पड़ गया,

श्लोक 91 (skanda.2.26.91)

लोके प्रसिद्धिरभवदहो तीर्थस्य वैभवम् ।

loke prasiddhirabhavadaho tīrthasya vaibhavam

अहो, इस तीर्थ की यह महिमा है!

श्लोक 92 (skanda.2.26.92)

श्रीसूत उवाच । घोणतीर्थे महापुण्ये सर्वपापविनाशिनि । स्नान्ति ये पौर्णमास्यां वै शौनकाद्या महौजसः ।

śrīsūta uvāca ghoṇatīrthe mahāpuṇye sarvapāpavināśini snānti ye paurṇamāsyāṁ vai śaunakādyā mahaujasaḥ

श्री सूत जी ने कहा — हे परम तेजस्वी शौनक आदि मुनियो! जो पूर्णिमा के दिन समस्त पापों का नाश करने वाले महापुण्य घोणतीर्थ में स्नान करते हैं,

श्लोक 93 (skanda.2.26.93)

तेषां क्रतुफलं पुण्यं तीर्थायुतफलं भवेत् । कपिलागोसहस्रं तु यो ददाति दिनेदिने ।

teṣāṁ kratuphalaṁ puṇyaṁ tīrthāyutaphalaṁ bhavet kapilāgosahasraṁ tu yo dadāti dinedine

उन्हें यज्ञ के फल के समान पुण्य प्राप्त होता है, जो साधारण तीर्थों के फल से दस हजार गुना है। जो प्रतिदिन सहस्र कपिला गौएँ दान करता है,

श्लोक 94 (skanda.2.26.94)

तत्फलं समवाप्नोति स्नानात्तुम्बुरुतीर्थके । रत्नकोटिसहस्राणि यो ददाति दिनेदिने ।

tatphalaṁ samavāpnoti snānāttumburutīrthake ratnakoṭisahasrāṇi yo dadāti dinedine

उसे वही फल तुम्बुरु-तीर्थ में स्नान से प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन सहस्र करोड़ रत्न दान करता है,

श्लोक 95 (skanda.2.26.95)

मत्तेभानां सहस्राणि तथैवाश्वायुतान्यपि । तत्फलं समवाप्नोति घोणतीर्थावगाहनात् ।

mattebhānāṁ sahasrāṇi tathaivāśvāyutānyapi tatphalaṁ samavāpnoti ghoṇatīrthāvagāhanāt

और साथ ही सहस्र मदमत्त हाथी तथा दस हजार घोड़े दान करता है — वह फल घोणतीर्थ में स्नान से प्राप्त होता है।

श्लोक 96 (skanda.2.26.96)

कन्याकोटिप्रदानेन यत्फलं चर्षिभिः स्मृतम् । तत्फलं समवाप्नोति घोणतीर्थाच्च पावनात् ।

kanyākoṭipradānena yatphalaṁ carṣibhiḥ smṛtam tatphalaṁ samavāpnoti ghoṇatīrthācca pāvanāt

करोड़ों कन्याओं के दान का जो फल ऋषियों ने बताया है — वही फल पवित्र घोणतीर्थ से प्राप्त होता है।

श्लोक 97 (skanda.2.26.97)

हेमांबरसहस्रं यः कुरुक्षेत्रे प्रयच्छति । तत्फलं समवाप्नोति घोणतीर्थस्य वैभवात् ।

hemāṁbarasahasraṁ yaḥ kurukṣetre prayacchati tatphalaṁ samavāpnoti ghoṇatīrthasya vaibhavāt

जो कुरुक्षेत्र में सहस्र स्वर्ण-वस्त्र दान करता है — वह फल घोणतीर्थ की महिमा से प्राप्त होता है।

श्लोक 98 (skanda.2.26.98)

गुर्वर्थे ब्राह्मणार्थे च स्वाम्यर्थे यस्त्यजेत्तनुम् । तत्फलं समवाप्नोति घोणतीर्थस्य वैभवात् ।

gurvarthe brāhmaṇārthe ca svāmyarthe yastyajettanum tatphalaṁ samavāpnoti ghoṇatīrthasya vaibhavāt

जो गुरु, ब्राह्मण या स्वामी के लिए अपना शरीर त्याग देता है — वह फल घोणतीर्थ की महिमा से प्राप्त होता है।

श्लोक 99 (skanda.2.26.99)

आपन्नार्तिहराणां च तीर्थसेवापरात्मनाम् । सत्यव्रतानां यत्पुण्यं घोणतीर्थाच्च तद्भवेत् ।

āpannārtiharāṇāṁ ca tīrthasevāparātmanām satyavratānāṁ yatpuṇyaṁ ghoṇatīrthācca tadbhavet

संकट में पड़े लोगों की पीड़ा हरने वालों और तीर्थ-सेवा में लीन सत्यव्रतियों को जो पुण्य प्राप्त होता है — वही घोणतीर्थ से प्राप्त होता है।

श्लोक 100 (skanda.2.26.100)

यत्फलं श्राद्धकर्तॄणां पितॄणामिन्दुसंक्षये । तत्फलं समवाप्नोति घोणतीर्थाद्धि पावनात् ।

yatphalaṁ śrāddhakartṝṇāṁ pitṝṇāmindusaṁkṣaye tatphalaṁ samavāpnoti ghoṇatīrthāddhi pāvanāt

अमावस्या पर पितरों का श्राद्ध करने वालों को जो फल मिलता है — वह फल पवित्र घोणतीर्थ से प्राप्त होता है।

श्लोक 101 (skanda.2.26.101)

गङ्गायां नर्मदायां च सरयूचन्द्रभागयोः । सर्वेषु पुण्यतीर्थेषु यः स्नानं कुरुते नरः । तत्फलं समवाप्नोति घोणतीर्थाद्धि पावनात् ।

gaṅgāyāṁ narmadāyāṁ ca sarayūcandrabhāgayoḥ sarveṣu puṇyatīrtheṣu yaḥ snānaṁ kurute naraḥ tatphalaṁ samavāpnoti ghoṇatīrthāddhi pāvanāt

गंगा, नर्मदा, सरयू और चंद्रभागा में तथा समस्त पुण्य-तीर्थों में स्नान करने से मनुष्य को जो फल मिलता है — वही फल पवित्र घोणतीर्थ से प्राप्त होता है।

श्लोक 102 (skanda.2.26.102)

तस्मात्पुण्यतमं तीर्थं घोणतीर्थं विदुर्बुधाः ।

tasmātpuṇyatamaṁ tīrthaṁ ghoṇatīrthaṁ vidurbudhāḥ

इसलिए विद्वान घोणतीर्थ को सबसे पुण्यतम तीर्थ मानते हैं।

श्लोक 103 (skanda.2.26.103)

य इमं शृणुतेऽध्यायं सर्वपापनिबर्हणम् । वाजपेयफलं तस्य विष्णुलोकश्च शाश्वतः ।

ya imaṁ śṛṇute'dhyāyaṁ sarvapāpanibarhaṇam vājapeyaphalaṁ tasya viṣṇulokaśca śāśvataḥ

जो इस अध्याय को सुनता है, जो समस्त पापों का नाश करने वाला है, उसे वाजपेय यज्ञ का फल और सनातन विष्णुलोक प्राप्त होता है।

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