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वैष्णव खण्ड · अध्याय 27

सर्वतीर्थमहिमा एवं पुराणश्रवणविधि वर्णन

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (skanda.2.27.1)

ऋषय ऊचुः । वेंकटाद्रौ महापुण्ये सर्वसंकटनाशने । सन्ति वै कति तीर्थानि सूत पौराणिकोत्तम ।

ṛṣaya ūcuḥ veṁkaṭādrau mahāpuṇye sarvasaṁkaṭanāśane santi vai kati tīrthāni sūta paurāṇikottama

ऋषियों ने कहा — हे सूत, पुराणकारों में श्रेष्ठ! समस्त संकटों का नाश करने वाले महापुण्य वेंकटाद्रि पर्वत पर कितने तीर्थ हैं?

श्लोक 2 (skanda.2.27.2)

तेषां संख्यां च मे ब्रूहि कति मुख्यानि तत्र वै । तत्राप्यत्यन्तमुख्यानि वद मे मुनिसत्तम ।

teṣāṁ saṁkhyāṁ ca me brūhi kati mukhyāni tatra vai tatrāpyatyantamukhyāni vada me munisattama

उनकी संख्या बताइए, और उनमें से कितने मुख्य हैं; हे मुनिश्रेष्ठ, उनमें भी सर्वाधिक मुख्य कौन-से हैं, यह भी बताइए।

श्लोक 3 (skanda.2.27.3)

सद्धर्मरतिदान्यत्र कति मुख्यानि तानि च । कानि ज्ञानप्रदान्यत्र भक्तिवैराग्यदानि च ।

saddharmaratidānyatra kati mukhyāni tāni ca kāni jñānapradānyatra bhaktivairāgyadāni ca

वहाँ सद्धर्म में रति देने वाले कितने तीर्थ हैं, और कौन-से ज्ञान देने वाले तथा भक्ति-वैराग्य देने वाले हैं?

श्लोक 4 (skanda.2.27.4)

मुक्तिप्रदानि कान्यत्र तानि मे वद सुव्रत ।

muktipradāni kānyatra tāni me vada suvrata

और कौन-से मुक्ति देने वाले हैं? हे सुव्रत, यह सब मुझे बताइए।

श्लोक 5 (skanda.2.27.5)

श्रीसूत उवाच । षट्षष्टिकोटितीर्थानि पुण्यान्यत्र नगोत्तमे । अष्टोत्तरसहस्राणि तेषु मुख्यानि सुव्रत ।

śrīsūta uvāca ṣaṭṣaṣṭikoṭitīrthāni puṇyānyatra nagottame aṣṭottarasahasrāṇi teṣu mukhyāni suvrata

श्री सूत जी ने कहा — हे सुव्रत! इस श्रेष्ठ पर्वत पर छियासठ करोड़ पुण्य तीर्थ हैं; उनमें एक हजार आठ मुख्य हैं।

श्लोक 6 (skanda.2.27.6)

सद्धर्मरतिदान्यत्र सन्ति चाष्टोत्तरं शतम् । सहस्रेभ्यश्च मुख्यानि पृथक्तेभ्यश्च तानि च ।

saddharmaratidānyatra santi cāṣṭottaraṁ śatam sahasrebhyaśca mukhyāni pṛthaktebhyaśca tāni ca

उनमें सद्धर्म में रति देने वाले एक सौ आठ हैं; और उन हजारों में से अलग-अलग जो मुख्य हैं,

श्लोक 7 (skanda.2.27.7)

भक्तिवैराग्यदान्यत्र षष्टिरष्टोत्तरे शते ।

bhaktivairāgyadānyatra ṣaṣṭiraṣṭottare śate

उन एक सौ आठ में से साठ भक्ति-वैराग्य देने वाले हैं।

श्लोक 8 (skanda.2.27.8)

मुक्तिदान्यत्र षट् चैव वेंकटाचलमूर्धनि । स्वामिपुष्करिणी चैव वियद्गङ्गा ततः परम् ।

muktidānyatra ṣaṭ caiva veṁkaṭācalamūrdhani svāmipuṣkariṇī caiva viyadgaṅgā tataḥ param

इनमें से छह वेंकटाचल के शिखर पर ही मुक्ति देने वाले हैं — स्वामिपुष्करिणी, फिर आकाशगंगा,

श्लोक 9 (skanda.2.27.9)

पश्चात्पापविनाशं च पाण्डुतीर्थमतःपरम् । कुमारधारिकातीर्थं तुम्बोस्तीर्थमतः परम् ।

paścātpāpavināśaṁ ca pāṇḍutīrthamataḥparam kumāradhārikātīrthaṁ tumbostīrthamataḥ param

फिर पापविनाशतीर्थ, फिर पांडुतीर्थ, फिर कुमारधारिका तीर्थ, और फिर तुम्बुतीर्थ।

श्लोक 10 (skanda.2.27.10)

कुम्भमासे पौर्णमास्यां मघायोगो यदा भवेत् । कुमारधारिकां यान्ति सर्वतीर्थानि हे द्विजाः ।

kumbhamāse paurṇamāsyāṁ maghāyogo yadā bhavet kumāradhārikāṁ yānti sarvatīrthāni he dvijāḥ

कुम्भ मास में, पूर्णिमा के दिन, जब मघा योग हो, तब हे द्विजो, समस्त तीर्थ कुमारधारिका में आते हैं।

श्लोक 11 (skanda.2.27.11)

तत्र यः स्नाति विप्रेन्द्रा राजसूयफलं लभेत् । मुक्तिश्च भविता तत्र नात्र कार्या विचारणा ।

tatra yaḥ snāti viprendrā rājasūyaphalaṁ labhet muktiśca bhavitā tatra nātra kāryā vicāraṇā

हे श्रेष्ठ विप्रो! वहाँ स्नान करने वाला राजसूय यज्ञ का फल पाता है, और उसे वहीं मुक्ति मिलती है — इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 12 (skanda.2.27.12)

अन्नदानविधिस्तत्र सार्धं दक्षिणयाद्विजाः । उत्तराफल्गुनीयुक्तशुक्लपक्षीयपर्वणि ।

annadānavidhistatra sārdhaṁ dakṣiṇayādvijāḥ uttarāphalgunīyuktaśuklapakṣīyaparvaṇi

वहाँ दक्षिणा सहित अन्नदान का विधान उत्तराफाल्गुनी युक्त शुक्ल पक्ष के पर्व पर होता है,

श्लोक 13 (skanda.2.27.13)

तुम्बोस्तीर्थं मीनसंस्थे रवौ तीर्थानि सर्वशः । अपराह्णे समायान्ति तत्र स्नातो न जायते ।

tumbostīrthaṁ mīnasaṁsthe ravau tīrthāni sarvaśaḥ aparāhṇe samāyānti tatra snāto na jāyate

जब सूर्य मीन राशि में हो और सभी तीर्थ अपराह्न में तुम्बुतीर्थ में एकत्र हों — वहाँ स्नान करने वाला पुनर्जन्म नहीं लेता।

श्लोक 14 (skanda.2.27.14)

मौञ्जीबन्धं विवाहं च कारयेद्द्रव्यदानतः । मेषसंक्रमणे भानौ चित्रानक्षत्रसंयुते ।

mauñjībandhaṁ vivāhaṁ ca kārayeddravyadānataḥ meṣasaṁkramaṇe bhānau citrānakṣatrasaṁyute

चित्रा नक्षत्र से युक्त सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने पर, वहाँ धन-दान सहित यज्ञोपवीत और विवाह संस्कार करना चाहिए,

श्लोक 15 (skanda.2.27.15)

पौर्णमास्यां समायान्ति वियद्गङ्गां तथैव च । तत्र स्नात्वा नरः सद्यः शतक्रतुफलं लभेत् ।

paurṇamāsyāṁ samāyānti viyadgaṅgāṁ tathaiva ca tatra snātvā naraḥ sadyaḥ śatakratuphalaṁ labhet

पूर्णिमा के दिन, जब तीर्थ आकाशगंगा में भी एकत्र होते हैं; वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य तुरंत सौ यज्ञों का फल पाता है।

श्लोक 16 (skanda.2.27.16)

सुवर्णं तत्र दातव्यं कन्यादानं विशेषतः । वृषभस्थे रवौ विप्रा द्वादश्यां हरिवासरे ।

suvarṇaṁ tatra dātavyaṁ kanyādānaṁ viśeṣataḥ vṛṣabhasthe ravau viprā dvādaśyāṁ harivāsare

वहाँ स्वर्ण दान करना चाहिए, और विशेष रूप से कन्यादान, जब सूर्य वृषभ राशि में हो, द्वादशी को, हरिवासर पर,

श्लोक 17 (skanda.2.27.17)

शुक्ले वाप्यथ कृष्णे वा भौमेनापि समन्विते । पाण्डुतीर्थं समायान्ति गङ्गादीनि जगत्त्रये ।

śukle vāpyatha kṛṣṇe vā bhaumenāpi samanvite pāṇḍutīrthaṁ samāyānti gaṅgādīni jagattraye

चाहे शुक्ल हो या कृष्ण पक्ष, मंगलवार से युक्त हो — तब गंगा आदि नदियाँ तीनों लोकों में पांडुतीर्थ में आती हैं।

श्लोक 18 (skanda.2.27.18)

तत्र स्नात्वा च गां दत्त्वा मुच्यते प्रतिबन्धकात् । आश्वयुक्छुक्लपक्षे च सप्तम्यां भानुवासरे ।

tatra snātvā ca gāṁ dattvā mucyate pratibandhakāt āśvayukchuklapakṣe ca saptamyāṁ bhānuvāsare

वहाँ स्नान कर और गौ-दान देकर मनुष्य समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है; आश्विन शुक्ल पक्ष की सप्तमी को, रविवार को,

श्लोक 19 (skanda.2.27.19)

उत्तराषाढयुक्तायां तथा पापविनाशनम् । उत्तराभाद्रयुक्तायां द्वादश्यां वा समागतः ।

uttarāṣāḍhayuktāyāṁ tathā pāpavināśanam uttarābhādrayuktāyāṁ dvādaśyāṁ vā samāgataḥ

उत्तराषाढ़ा नक्षत्र से युक्त होने पर भी वह पाप का नाश करने वाला है; अथवा उत्तराभाद्रपद से युक्त द्वादशी को,

श्लोक 20 (skanda.2.27.20)

शालग्रामशिलां दत्त्वा स्नात्वा च विधिपूर्वकम् । मुच्यते सर्वपापैश्च जन्म कोटिशतोद्भवैः ।

śālagrāmaśilāṁ dattvā snātvā ca vidhipūrvakam mucyate sarvapāpaiśca janma koṭiśatodbhavaiḥ

जो शालग्राम शिला देकर विधिपूर्वक स्नान करता है, वह करोड़ों जन्मों के संचित समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 21 (skanda.2.27.21)

धनुर्मासे सिते पक्षे द्वादश्यामरुणोदये । आयान्ति सर्वतीर्थानि स्वामिपुष्करिणीजले ।

dhanurmāse site pakṣe dvādaśyāmaruṇodaye āyānti sarvatīrthāni svāmipuṣkariṇījale

धनुर्मास में, शुक्ल पक्ष की द्वादशी को, अरुणोदय के समय, समस्त तीर्थ स्वामिपुष्करिणी के जल में आते हैं।

श्लोक 22 (skanda.2.27.22)

तत्र स्नात्वा नरः सद्यो मुक्तिमेति न संशयः । यस्य जन्मसहस्रेषु पुण्यमेवार्जितं पुरा ।

tatra snātvā naraḥ sadyo muktimeti na saṁśayaḥ yasya janmasahasreṣu puṇyamevārjitaṁ purā

वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य तुरंत मुक्ति पाता है, इसमें संदेह नहीं — परंतु यह स्नान उसी को फलदायी होता है

श्लोक 23 (skanda.2.27.23)

तस्य स्नानं भवेद्विप्रा नान्यस्य त्वकृतात्मनः । विभवानुगुणं दानं कार्यं तत्र यथाविधि ।

tasya snānaṁ bhavedviprā nānyasya tvakṛtātmanaḥ vibhavānuguṇaṁ dānaṁ kāryaṁ tatra yathāvidhi

जिसने हजारों पूर्वजन्मों में पुण्य अर्जित किया हो, हे विप्रो, अशुद्ध आचरण वाले को नहीं; वहाँ अपनी सामर्थ्य के अनुसार विधिपूर्वक दान करना चाहिए,

श्लोक 24 (skanda.2.27.24)

शालिग्रामशिलादानं गां दद्याच्च विशेषतः ।

śāligrāmaśilādānaṁ gāṁ dadyācca viśeṣataḥ

विशेषतः शालग्राम शिला का दान, और गौ-दान भी करना चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.2.27.25)

ये शृण्वंति कथां विष्णोः सदा भुवनपावनीम् । ते वै मनुष्यलोकेऽस्मिन्विष्णुभक्ता भवन्ति हि ।

ye śṛṇvaṁti kathāṁ viṣṇoḥ sadā bhuvanapāvanīm te vai manuṣyaloke'sminviṣṇubhaktā bhavanti hi

जो सदा विष्णु की, संसार को पवित्र करने वाली कथा सुनते हैं, वे इस मनुष्य-लोक में सच्चे विष्णु-भक्त बनते हैं।

श्लोक 26 (skanda.2.27.26)

यद्यशक्तः सदा श्रोतुं कथां भुवनपावनीम् । मुहूर्तं वा तदर्धं वा क्षणं वा विष्णुसत्कथाम् । यः शृणोति नरो भक्त्या दुर्गतिर्नास्ति तस्य हि ।

yadyaśaktaḥ sadā śrotuṁ kathāṁ bhuvanapāvanīm muhūrtaṁ vā tadardhaṁ vā kṣaṇaṁ vā viṣṇusatkathām yaḥ śṛṇoti naro bhaktyā durgatirnāsti tasya hi

यदि कोई सदा वह लोक-पावन कथा सुनने में असमर्थ हो, तो एक मुहूर्त, या उसका आधा, या क्षण मात्र भी विष्णु की सत्कथा जो भक्तिपूर्वक सुनता है, उसकी दुर्गति कभी नहीं होती।

श्लोक 27 (skanda.2.27.27)

यत्फलं सर्वयज्ञेषु सर्वदानेषु यत्फलम् । सकृत्पुराणश्रवणात्तत्फलं विन्दते नरः ।

yatphalaṁ sarvayajñeṣu sarvadāneṣu yatphalam sakṛtpurāṇaśravaṇāttatphalaṁ vindate naraḥ

समस्त यज्ञों और समस्त दानों का जो फल है, वह फल मनुष्य को केवल एक बार पुराण-श्रवण से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 28 (skanda.2.27.28)

कलौ युगे विशेषेण पुराणश्रवणादृते । नास्ति धर्मः परः पुंसां नास्ति मुक्तिप्रदं परम् ।

kalau yuge viśeṣeṇa purāṇaśravaṇādṛte nāsti dharmaḥ paraḥ puṁsāṁ nāsti muktipradaṁ param

कलियुग में विशेष रूप से पुराण-श्रवण के अतिरिक्त मनुष्यों के लिए न कोई श्रेष्ठ धर्म है, न मुक्ति देने वाला कोई अन्य साधन।

श्लोक 29 (skanda.2.27.29)

पुराणश्रवणं विष्णोर्नामसंकीर्तनं परम् । उभे एव मनुष्याणां पुण्यद्रुममहाफले ।

purāṇaśravaṇaṁ viṣṇornāmasaṁkīrtanaṁ param ubhe eva manuṣyāṇāṁ puṇyadrumamahāphale

पुराण-श्रवण और विष्णु के नाम का संकीर्तन — ये दोनों ही मनुष्यों के लिए महाफल देने वाले पुण्य-वृक्ष हैं।

श्लोक 30 (skanda.2.27.30)

पिबन्नेवामृतं यत्नादेकः स्यादजरामरः । विष्णोः कथामृतं कुर्यात्कुलमेवाजरामरम् ।

pibannevāmṛtaṁ yatnādekaḥ syādajarāmaraḥ viṣṇoḥ kathāmṛtaṁ kuryātkulamevājarāmaram

प्रयत्नपूर्वक अमृत पीने से एक व्यक्ति ही अजर-अमर होता है, परंतु विष्णु की कथा-रूपी अमृत का पान करने से पूरा कुल अजर-अमर हो जाता है।

श्लोक 31 (skanda.2.27.31)

बालो युवाथ वृद्धो वा दरिद्रो दुर्भगोऽपि वा । पुराणज्ञः सदा वन्द्यः स पूज्यः सुकृतात्मभिः ।

bālo yuvātha vṛddho vā daridro durbhago'pi vā purāṇajñaḥ sadā vandyaḥ sa pūjyaḥ sukṛtātmabhiḥ

चाहे बालक हो, युवा हो, वृद्ध हो, दरिद्र हो या अभागा हो, पुराण को जानने वाला सदा वंदनीय है, सत्पुरुषों द्वारा पूज्य है।

श्लोक 32 (skanda.2.27.32)

नीचबुद्धिं न कुर्वीत पुराणज्ञे कदाचन । यस्य वक्त्रोद्गता वाणी कामधेनुः शरीरिणाम् ।

nīcabuddhiṁ na kurvīta purāṇajñe kadācana yasya vaktrodgatā vāṇī kāmadhenuḥ śarīriṇām

पुराणज्ञ के प्रति कभी नीच बुद्धि नहीं रखनी चाहिए, जिनके मुख से निकली वाणी सभी प्राणियों के लिए कामधेनु के समान है।

श्लोक 33 (skanda.2.27.33)

भवकोटिसहस्रेषु भूत्वा भूत्वावसीदताम् । यो ददात्यपुनर्वृत्तिं कोऽन्यस्तस्मात्परो गुरुः ।

bhavakoṭisahasreṣu bhūtvā bhūtvāvasīdatām yo dadātyapunarvṛttiṁ ko'nyastasmātparo guruḥ

करोड़ों-अरबों जन्मों में बार-बार जन्म लेकर डूबते हुए प्राणियों को जो पुनर्जन्म से मुक्ति देता है, उससे बड़ा गुरु और कौन है?

श्लोक 34 (skanda.2.27.34)

व्यासासनसमारूढो यदा पौराणिको द्विजः । आ समाप्तेः प्रसंगस्य नमस्कुर्यान्न कस्यचित् ।

vyāsāsanasamārūḍho yadā paurāṇiko dvijaḥ ā samāpteḥ prasaṁgasya namaskuryānna kasyacit

जब पुराणज्ञ द्विज व्यास-आसन पर विराजमान हो, तब कथा-प्रसंग समाप्त होने तक उसे किसी को भी नमस्कार नहीं करना चाहिए।

श्लोक 35 (skanda.2.27.35)

न दुर्जनसमाकीर्णे न शूद्रश्वापदावृते । देशे न द्यूतसदने वदेत्पुण्यकथां सुधीः ।

na durjanasamākīrṇe na śūdraśvāpadāvṛte deśe na dyūtasadane vadetpuṇyakathāṁ sudhīḥ

बुद्धिमान पुरुष को दुर्जनों से भरे स्थान में, शूद्रों और कुत्तों से भरे स्थान में, अथवा जुआघर में पुण्य-कथा नहीं कहनी चाहिए।

श्लोक 36 (skanda.2.27.36)

सुग्रामे सुजनाकीर्णे सुक्षेत्रे देवतालये । पुण्ये वाथ नदीतीरे वदेत्पुण्यकथां सुधीः ।

sugrāme sujanākīrṇe sukṣetre devatālaye puṇye vātha nadītīre vadetpuṇyakathāṁ sudhīḥ

बुद्धिमान पुरुष को अच्छे गाँव में, सज्जनों से भरे स्थान में, अच्छे खेत में, देवालय में, या पवित्र नदी-तट पर ही पुण्य-कथा कहनी चाहिए,

श्लोक 37 (skanda.2.27.37)

श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसा । वाग्यताः शुचयोऽव्यग्राः श्रोतारः पुण्यभागिनः ।

śraddhābhaktisamāyuktā nānyakāryeṣu lālasā vāgyatāḥ śucayo'vyagrāḥ śrotāraḥ puṇyabhāginaḥ

श्रद्धा-भक्ति से युक्त, अन्य कार्यों की लालसा से रहित, वाणी को संयमित रखने वाले, पवित्र और अव्यग्र श्रोता ही पुण्य के भागी होते हैं।

श्लोक 38 (skanda.2.27.38)

अभक्त्या ये कथां पुण्यां शृण्वंति मनुजाधमाः । तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखं जन्मनि जन्मनि ।

abhaktyā ye kathāṁ puṇyāṁ śṛṇvaṁti manujādhamāḥ teṣāṁ puṇyaphalaṁ nāsti duḥkhaṁ janmani janmani

जो अधम मनुष्य अभक्तिपूर्वक पुण्य-कथा सुनते हैं, उन्हें उसका पुण्य-फल नहीं मिलता, और वे जन्म-जन्म में दुःख भोगते हैं।

श्लोक 39 (skanda.2.27.39)

पुराणं ये तु संपूज्य ताम्बूलाद्यैरुपायनैः । शृण्वंति च कथां भक्त्या न दरिद्रा न पापिनः ।

purāṇaṁ ye tu saṁpūjya tāmbūlādyairupāyanaiḥ śṛṇvaṁti ca kathāṁ bhaktyā na daridrā na pāpinaḥ

परंतु जो पान-सुपारी आदि उपहारों से पुराण की पूजा कर, भक्तिपूर्वक कथा सुनते हैं, वे न दरिद्र होते हैं, न पापी।

श्लोक 40 (skanda.2.27.40)

कथायां कथ्यमानायां ये गच्छन्त्यन्यतो नराः । भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च संपदः ।

kathāyāṁ kathyamānāyāṁ ye gacchantyanyato narāḥ bhogāntare praṇaśyanti teṣāṁ dārāśca saṁpadaḥ

जो मनुष्य कथा कहे जाने के समय अन्यत्र चले जाते हैं, वे अगले जन्म में अपनी पत्नियों और संपत्ति को खो देते हैं।

श्लोक 41 (skanda.2.27.41)

सोष्णीषमस्तका ये च कथां शृण्वंति पावनीम् । ते बालकाः प्रजायन्ते पापिनो मनुजाधमाः ।

soṣṇīṣamastakā ye ca kathāṁ śṛṇvaṁti pāvanīm te bālakāḥ prajāyante pāpino manujādhamāḥ

जो सिर पर पगड़ी बाँधकर पवित्र कथा सुनते हैं, वे बालक के रूप में पुनर्जन्म लेते हैं, पापी और अधम मनुष्य बनकर।

श्लोक 42 (skanda.2.27.42)

तांबूलं भक्षयन्तो ये कथां शृण्वंति पावनीम् । श्वविष्ठां भक्षयन्त्येते नरके च पतंति हि ।

tāṁbūlaṁ bhakṣayanto ye kathāṁ śṛṇvaṁti pāvanīm śvaviṣṭhāṁ bhakṣayantyete narake ca pataṁti hi

जो पान चबाते हुए पवित्र कथा सुनते हैं, वे कुत्ते का मल खाते हैं और नरक में गिरते हैं।

श्लोक 43 (skanda.2.27.43)

ये च तुंगासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दांभिकाः । अक्षय्यान्नरकान्भुक्त्वा ते भवन्त्येव वायसाः ।

ye ca tuṁgāsanārūḍhāḥ kathāṁ śṛṇvanti dāṁbhikāḥ akṣayyānnarakānbhuktvā te bhavantyeva vāyasāḥ

जो पाखंडी ऊँचे आसन पर बैठकर कथा सुनते हैं, वे अक्षय नरकों को भोगकर अंततः कौआ बनते हैं।

श्लोक 44 (skanda.2.27.44)

ये च वीरासनारूढा ये च सिंहासनस्थिताः । शृण्वन्ति सत्कथां ते वै भवन्त्यर्जुनपादपाः ।

ye ca vīrāsanārūḍhā ye ca siṁhāsanasthitāḥ śṛṇvanti satkathāṁ te vai bhavantyarjunapādapāḥ

जो वीरासन या सिंहासन पर बैठकर सत्कथा सुनते हैं, वे अर्जुन वृक्ष (गूलर के समान मूक वृक्ष) बन जाते हैं।

श्लोक 45 (skanda.2.27.45)

असंप्रणम्य शृण्वन्तो विषवृक्षा भवन्ति हि । तथा शयानाः शृण्वन्तो भवन्त्यजगरा हि ते ।

asaṁpraṇamya śṛṇvanto viṣavṛkṣā bhavanti hi tathā śayānāḥ śṛṇvanto bhavantyajagarā hi te

जो बिना प्रणाम किए कथा सुनते हैं, वे विषवृक्ष बनते हैं; और जो लेटकर सुनते हैं, वे अजगर बनते हैं।

श्लोक 46 (skanda.2.27.46)

यः शृणोति कथां वक्तुः समानासनसंस्थितः । गुरुतल्पसमं पापं संप्राप्य नरकं व्रजेत् ।

yaḥ śṛṇoti kathāṁ vaktuḥ samānāsanasaṁsthitaḥ gurutalpasamaṁ pāpaṁ saṁprāpya narakaṁ vrajet

जो कथावाचक के समान ऊँचाई के आसन पर बैठकर कथा सुनता है, वह गुरु-शय्या-दोष के समान पाप पाकर नरक जाता है।

श्लोक 47 (skanda.2.27.47)

ये निन्दंति पुराणज्ञं सत्कथां पापहारिणीम् । ते वै जन्मशतं मर्त्याः शुनकाश्च भवंति हि ।

ye nindaṁti purāṇajñaṁ satkathāṁ pāpahāriṇīm te vai janmaśataṁ martyāḥ śunakāśca bhavaṁti hi

जो पुराणज्ञ की और पाप-हारिणी सत्कथा की निंदा करते हैं, वे सौ जन्मों तक मनुष्य से कुत्ते बनते हैं।

श्लोक 48 (skanda.2.27.48)

कथायां कीर्त्यमानायां ये वदंति दुरुत्तरम् । ते गर्दभाः प्रजायन्ते कृकलासास्ततःपरम् ।

kathāyāṁ kīrtyamānāyāṁ ye vadaṁti duruttaram te gardabhāḥ prajāyante kṛkalāsāstataḥparam

जो कथा कहे जाने के समय कठोर उत्तर देते हैं, वे गधे बनते हैं, और उसके बाद गिरगिट बनते हैं।

श्लोक 49 (skanda.2.27.49)

कदाचिदपि ये पुण्यां न शृण्वंति कथां नराः । ते भुक्त्वा नरकान्घोरान्भवन्ति वनसूकराः ।

kadācidapi ye puṇyāṁ na śṛṇvaṁti kathāṁ narāḥ te bhuktvā narakānghorānbhavanti vanasūkarāḥ

जो मनुष्य कभी भी यह पुण्य-कथा नहीं सुनते, वे घोर नरकों को भोगकर वन-सूअर बनते हैं।

श्लोक 50 (skanda.2.27.50)

कथायां कीर्त्यमानायां विघ्नं कुर्वंति ये नराः । कोट्यब्दं नरकान्भुक्त्वा भवंति ग्रामसूकराः ।

kathāyāṁ kīrtyamānāyāṁ vighnaṁ kurvaṁti ye narāḥ koṭyabdaṁ narakānbhuktvā bhavaṁti grāmasūkarāḥ

जो कथा कहे जाने के समय विघ्न डालते हैं, वे करोड़ों वर्षों तक नरक भोगकर ग्राम-सूअर बनते हैं।

श्लोक 51 (skanda.2.27.51)

ये कथामनुमोदन्ते कीर्त्यमानां नरोत्तमाः । अशृण्वन्तोऽपि ते यान्ति शाश्वतं पदमव्ययम् ।

ye kathāmanumodante kīrtyamānāṁ narottamāḥ aśṛṇvanto'pi te yānti śāśvataṁ padamavyayam

परंतु जो श्रेष्ठ पुरुष कथा-कीर्तन का अनुमोदन करते हैं, वे बिना सुने भी शाश्वत अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 52 (skanda.2.27.52)

ये श्रावयन्ति मनुजाः पुण्यां पौराणिकीं कथाम् । कल्पकोटिशतं साग्रं तिष्ठन्ति ब्रह्मणः पदे ।

ye śrāvayanti manujāḥ puṇyāṁ paurāṇikīṁ kathām kalpakoṭiśataṁ sāgraṁ tiṣṭhanti brahmaṇaḥ pade

जो मनुष्य इस पुण्य पौराणिक कथा को दूसरों को सुनाते हैं, वे सौ करोड़ से अधिक कल्पों तक ब्रह्मलोक में निवास करते हैं।

श्लोक 53 (skanda.2.27.53)

आसनार्थं प्रयच्छन्ति पुराणज्ञस्य ये नराः । कम्बलाजिनवासांसि तथा मंचकमेव वा ।

āsanārthaṁ prayacchanti purāṇajñasya ye narāḥ kambalājinavāsāṁsi tathā maṁcakameva vā

जो मनुष्य पुराणज्ञ को आसन के लिए कंबल, मृगचर्म, वस्त्र या खाट प्रदान करते हैं,

श्लोक 54 (skanda.2.27.54)

स्वर्गलोकं समासाद्य भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान् । स्थित्वा ब्रह्मादिलोकेषु पदं यांति निरामयम् ।

svargalokaṁ samāsādya bhuktvā bhogānyathepsitān sthitvā brahmādilokeṣu padaṁ yāṁti nirāmayam

वे स्वर्गलोक प्राप्त कर, इच्छित भोगों को भोगकर, फिर ब्रह्मादि लोकों में रहकर, निरामय पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 55 (skanda.2.27.55)

पुराणस्य प्रयच्छन्ति ये च सूत्रं नवं वरम् । भोगिनो ज्ञानसंपन्नास्ते भवंति भवे भवे ।

purāṇasya prayacchanti ye ca sūtraṁ navaṁ varam bhogino jñānasaṁpannāste bhavaṁti bhave bhave

जो पुराण की नई और उत्तम प्रति भेंट करते हैं, वे जन्म-जन्म में भोग और ज्ञान से संपन्न होते हैं।

श्लोक 56 (skanda.2.27.56)

ये महापातकैर्युक्ता ह्युपपातकिनश्च ये । पुराणश्रवणादेव ते यांति परमं पदम् ।

ye mahāpātakairyuktā hyupapātakinaśca ye purāṇaśravaṇādeva te yāṁti paramaṁ padam

महापातकों और उपपातकों से युक्त लोग भी केवल पुराण-श्रवण से परम पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 57 (skanda.2.27.57)

वेंकटाद्रेस्तु माहात्म्यं श्रुत्वा त ऋषयस्ततः । व्यासप्रसादसंपन्नं सूतं पौराणिकोत्तमम् । पूजयित्वा यथान्यायं प्रहर्षमतुलं गताः ।

veṁkaṭādrestu māhātmyaṁ śrutvā ta ṛṣayastataḥ vyāsaprasādasaṁpannaṁ sūtaṁ paurāṇikottamam pūjayitvā yathānyāyaṁ praharṣamatulaṁ gatāḥ

वेंकटाद्रि का माहात्म्य सुनकर वे ऋषि, व्यास जी की कृपा से संपन्न पुराणकार श्रेष्ठ सूत जी की विधिपूर्वक पूजा कर, अतुल हर्ष को प्राप्त होकर वहाँ से चले गए।

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