वैष्णव खण्ड · अध्याय 28
कटाहतीर्थ माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.2.28.1)
ऋषय ऊचुः । सूत सर्वार्थतत्त्वज्ञ वेदवेदान्तपारग । श्रीवेंकटाचले तीर्थं कटाहाख्यं सुपावनम् ।
ṛṣaya ūcuḥ sūta sarvārthatattvajña vedavedāntapāraga śrīveṁkaṭācale tīrthaṁ kaṭāhākhyaṁ supāvanam
ऋषियों ने कहा — हे सूत, समस्त तत्त्वों के ज्ञाता, वेद-वेदांत में पारंगत! श्री वेंकटाचल पर्वत पर कटाह नामक अत्यंत पवित्र तीर्थ है।
श्लोक 2 (skanda.2.28.2)
श्रूयते तस्य माहात्म्यं घुष्यते च जगत्त्रये । अस्माकमेतद्ब्रूहि त्वं कृपया व्यासशासित ।
śrūyate tasya māhātmyaṁ ghuṣyate ca jagattraye asmākametadbrūhi tvaṁ kṛpayā vyāsaśāsita
उसका माहात्म्य सुना जाता है और तीनों लोकों में प्रसिद्ध है; हे व्यास-शिष्य, कृपा करके यह हमें बताइए।
श्लोक 3 (skanda.2.28.3)
पुरा वै नारदः श्रीमान्ब्रह्मपुत्रो महानृषिः । दृष्ट्वा वै नैमिषारण्यं संप्राप्तो द्विजसत्तमः ।
purā vai nāradaḥ śrīmānbrahmaputro mahānṛṣiḥ dṛṣṭvā vai naimiṣāraṇyaṁ saṁprāpto dvijasattamaḥ
प्राचीन काल में श्रीमान् नारद, ब्रह्मा के पुत्र, महर्षि, द्विजश्रेष्ठ, नैमिषारण्य को देखकर वहाँ पधारे।
श्लोक 4 (skanda.2.28.4)
तदानीं ब्रह्मपुत्रं तमर्घ्यपाद्यादिभिः शुभैः । पूजयित्वा यथान्यायं पवित्रे च कुशासने ।
tadānīṁ brahmaputraṁ tamarghyapādyādibhiḥ śubhaiḥ pūjayitvā yathānyāyaṁ pavitre ca kuśāsane
तब उस ब्रह्मपुत्र की अर्घ्य-पाद्य आदि शुभ उपचारों से विधिपूर्वक पूजा कर, पवित्र कुशासन पर बिठाकर —
श्लोक 5 (skanda.2.28.5)
सन्निवेश्य महाभक्त्या विनयानतकन्धराः । प्रणम्य प्रार्थयामासुरिमे सर्वे महर्षयः ।
sanniveśya mahābhaktyā vinayānatakandharāḥ praṇamya prārthayāmāsurime sarve maharṣayaḥ
अत्यंत भक्तिपूर्वक बिठाकर, विनम्रता से झुकी गर्दन वाले इन सभी महर्षियों ने प्रणाम कर प्रार्थना की —
श्लोक 6 (skanda.2.28.6)
त्वां विना नारद श्रीमन्नस्माकं भुवनत्रये । धर्मोपदेशकः कश्चिन्नास्ति नास्ति महर्षिषु ।
tvāṁ vinā nārada śrīmannasmākaṁ bhuvanatraye dharmopadeśakaḥ kaścinnāsti nāsti maharṣiṣu
"हे श्रीमान् नारद! आपके अतिरिक्त तीनों लोकों में हमारे लिए कोई धर्मोपदेशक नहीं है, महर्षियों में भी कोई नहीं।
श्लोक 7 (skanda.2.28.7)
वेंकटाद्रौ महापुण्ये सर्वदेवनिषेविते । वैकुण्ठादागते दिव्ये सिद्धगन्धर्वसेविते ।
veṁkaṭādrau mahāpuṇye sarvadevaniṣevite vaikuṇṭhādāgate divye siddhagandharvasevite
समस्त देवताओं द्वारा सेवित, वैकुंठ से आए हुए, सिद्धों और गंधर्वों द्वारा सेवित, महापुण्य वेंकटाद्रि पर्वत पर —
श्लोक 8 (skanda.2.28.8)
कटाहतीर्थमाहात्म्यं वर्णयाद्य वनौकसाम् ।
kaṭāhatīrthamāhātmyaṁ varṇayādya vanaukasām
आज हम वनवासियों को कटाहतीर्थ का माहात्म्य बताइए।"
श्लोक 9 (skanda.2.28.9)
श्रीनारद उवाच । शृणुध्वमृषयः सर्वे शौनकाद्या महौजसः । कटाहतीर्थमाहात्म्यं को वेत्ति भुवनत्रये ।
śrīnārada uvāca śṛṇudhvamṛṣayaḥ sarve śaunakādyā mahaujasaḥ kaṭāhatīrthamāhātmyaṁ ko vetti bhuvanatraye
श्री नारद जी ने कहा — हे परम तेजस्वी शौनक आदि ऋषियो, सुनो! तीनों लोकों में कटाहतीर्थ के माहात्म्य को कौन जान सकता है?
श्लोक 10 (skanda.2.28.10)
महादेवो विजानाति तस्य तीर्थस्य वैभवम् । यानि कानि च पुण्यानि ब्रह्माण्डान्तर्गतानि वै ।
mahādevo vijānāti tasya tīrthasya vaibhavam yāni kāni ca puṇyāni brahmāṇḍāntargatāni vai
केवल महादेव ही उस तीर्थ की महिमा जानते हैं। इस ब्रह्मांड में जो भी पुण्य हैं,
श्लोक 11 (skanda.2.28.11)
तानि गंगादितीर्थानि स्वपापपरिशुद्धये । कटाहतीर्थसेवां च कुर्वन्ति द्विजसत्तमाः ।
tāni gaṁgāditīrthāni svapāpapariśuddhaye kaṭāhatīrthasevāṁ ca kurvanti dvijasattamāḥ
वे गंगा आदि तीर्थ भी अपने पापों की शुद्धि के लिए, हे द्विजश्रेष्ठो, कटाहतीर्थ की सेवा करते हैं।
श्लोक 12 (skanda.2.28.12)
ब्राह्मणाः क्षत्त्रिया वैश्याः शूद्राश्चेतरजातयः । स्पृशन्ति तज्जलमिति न पिबेद्यो विमूढधीः ।
brāhmaṇāḥ kṣattriyā vaiśyāḥ śūdrāścetarajātayaḥ spṛśanti tajjalamiti na pibedyo vimūḍhadhīḥ
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य जातियाँ उसके जल का स्पर्श करती हैं; जो मूढ़बुद्धि उसे नहीं पीता,
श्लोक 13 (skanda.2.28.13)
स हि चण्डालतां प्राप्य कुम्भीपाके पतिष्यति । ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतीश्वरः ।
sa hi caṇḍālatāṁ prāpya kumbhīpāke patiṣyati brahmacārī gṛhastho vā vānaprastho yatīśvaraḥ
वह चांडालत्व पाकर कुंभीपाक नरक में गिरता है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ या यतीश्वर —
श्लोक 14 (skanda.2.28.14)
सेवया तस्य तीर्थस्य प्राप्नोति परमं पदम् । श्रुतिस्मृतिपुराणेषु तत्तीर्थस्य प्रशंसनम् ।
sevayā tasya tīrthasya prāpnoti paramaṁ padam śrutismṛtipurāṇeṣu tattīrthasya praśaṁsanam
उस तीर्थ की सेवा से परम पद प्राप्त करता है। श्रुति, स्मृति और पुराणों में उस तीर्थ की प्रशंसा —
श्लोक 15 (skanda.2.28.15)
बहुधा वर्ण्यते पंचमहापातकनाशनम् । अत्यद्भुततरं विप्राः सर्वलोकैकपावनम् ।
bahudhā varṇyate paṁcamahāpātakanāśanam atyadbhutataraṁ viprāḥ sarvalokaikapāvanam
अनेक प्रकार से की गई है, पंच महापातकों का नाश करने वाली — हे विप्रो, यह अत्यंत अद्भुत, समस्त लोकों को पवित्र करने वाली है।
श्लोक 16 (skanda.2.28.16)
ब्रह्महत्यायुतं चापि सुरापानायुतं तथा । अयुतं गुरुदाराणां गमनं पापकारणम् ।
brahmahatyāyutaṁ cāpi surāpānāyutaṁ tathā ayutaṁ gurudārāṇāṁ gamanaṁ pāpakāraṇam
दस हजार ब्रह्महत्याएँ, और इसी प्रकार दस हजार मद्यपान, तथा गुरु-पत्नी-गमन जैसे पाप के दस हजार कारण —
श्लोक 17 (skanda.2.28.17)
स्तेयायुतं सुवर्णानां तत्संसर्गाश्च कोटयः । शीघ्रं विलयमायांति तस्य तीर्थस्य सेवया ।
steyāyutaṁ suvarṇānāṁ tatsaṁsargāśca koṭayaḥ śīghraṁ vilayamāyāṁti tasya tīrthasya sevayā
दस हजार स्वर्ण-चोरियाँ, और उनके करोड़ों संसर्ग भी — उस तीर्थ की सेवा से शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 18 (skanda.2.28.18)
यानि निष्कृतिहीनानि पापानि विविधानि च । तानि सर्वाणि नश्यंति तीर्थस्यास्य निषेवणात् ।
yāni niṣkṛtihīnāni pāpāni vividhāni ca tāni sarvāṇi naśyaṁti tīrthasyāsya niṣevaṇāt
जिन पापों का कोई प्रायश्चित्त नहीं है, वे सभी विविध पाप इस तीर्थ के सेवन से नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 19 (skanda.2.28.19)
इदं तीर्थं महापुण्यं भगवत्पादनिस्सृतम् । कुष्ठादिरोगयुक्तो यः प्रत्यहं च पिबेदिदम् ।
idaṁ tīrthaṁ mahāpuṇyaṁ bhagavatpādanissṛtam kuṣṭhādirogayukto yaḥ pratyahaṁ ca pibedidam
यह महापुण्य तीर्थ भगवान के चरणों से प्रवाहित हुआ है। जो कुष्ठ आदि रोगों से युक्त व्यक्ति प्रतिदिन इसे पीता है —
श्लोक 20 (skanda.2.28.20)
सोऽपि रोगविहीनः सन्विष्णुलोकं च गच्छति । भगवाञ्छंकरो देवो रहस्यानुभवे पुरा ।
so'pi rogavihīnaḥ sanviṣṇulokaṁ ca gacchati bhagavāñchaṁkaro devo rahasyānubhave purā
वह भी रोग-रहित होकर विष्णुलोक जाता है। भगवान शंकर ने एक रहस्यमय अनुभव में प्राचीन काल में —
श्लोक 21 (skanda.2.28.21)
पार्वत्यै कथयामास तस्य तीर्थस्य वैभवम् । उक्तेष्वेतेषु सन्देहो न कर्तव्यः कदाचन ।
pārvatyai kathayāmāsa tasya tīrthasya vaibhavam ukteṣveteṣu sandeho na kartavyaḥ kadācana
पार्वती जी को उस तीर्थ की महिमा बताई थी। इसमें कही गई बातों पर कभी संदेह नहीं करना चाहिए,
श्लोक 22 (skanda.2.28.22)
अर्थवादोऽयमिति च न वक्तव्यं कदाचन । येऽर्थवादमिदं ब्रूयुस्तेषां वै नास्तिकात्मनाम् ।
arthavādo'yamiti ca na vaktavyaṁ kadācana ye'rthavādamidaṁ brūyusteṣāṁ vai nāstikātmanām
और न ही कभी इसे केवल अर्थवाद कहना चाहिए। जो नास्तिक बुद्धि वाले इसे मात्र अर्थवाद कहते हैं,
श्लोक 23 (skanda.2.28.23)
जिह्वाग्रे परशुं तप्तं प्रक्षिपन्ति च किंकराः । तस्मात्कटाहतीर्थं तु सेवनीयं प्रयत्नतः ।
jihvāgre paraśuṁ taptaṁ prakṣipanti ca kiṁkarāḥ tasmātkaṭāhatīrthaṁ tu sevanīyaṁ prayatnataḥ
उनकी जिह्वा के अग्रभाग पर यमदूत तपा हुआ फरसा रखते हैं। इसलिए कटाहतीर्थ का प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिए;
श्लोक 24 (skanda.2.28.24)
सर्वदुःखप्रशमनमपवर्गफलप्रदम् । यत्र पीत्वा नरो भक्त्या सर्वान्कामानवाप्नुयात् ।
sarvaduḥkhapraśamanamapavargaphalapradam yatra pītvā naro bhaktyā sarvānkāmānavāpnuyāt
यह समस्त दुःखों को शांत करने वाला और मोक्ष-फल देने वाला है; जो पुरुष भक्तिपूर्वक वहाँ पीता है, वह अपनी सभी इच्छाएँ प्राप्त करता है।
श्लोक 25 (skanda.2.28.25)
एवमुक्त्वा महाभागः काशीं त्रैलोक्यपावनीम् । संप्राप्तो नारदः श्रीमान्सूत पौराणिकोत्तम ।
evamuktvā mahābhāgaḥ kāśīṁ trailokyapāvanīm saṁprāpto nāradaḥ śrīmānsūta paurāṇikottama
ऐसा कहकर महाभाग श्रीमान् नारद तीनों लोकों को पवित्र करने वाली काशी को गए, हे सूत, पुराणकारों में श्रेष्ठ।
श्लोक 26 (skanda.2.28.26)
संक्षेपतश्च भगवान्नैमिषे ह्युक्तवान्खलु । इदानीं श्रोतुमिच्छामः कटाहस्य च वैभवम् ।
saṁkṣepataśca bhagavānnaimiṣe hyuktavānkhalu idānīṁ śrotumicchāmaḥ kaṭāhasya ca vaibhavam
भगवान ने संक्षेप में यह नैमिष में भी कहा था; अब हम कटाह की महिमा को —
श्लोक 27 (skanda.2.28.27)
सुविस्तरेण चास्माकं वद सूत कृपावशात् ।
suvistareṇa cāsmākaṁ vada sūta kṛpāvaśāt
विस्तार से सुनना चाहते हैं, हे सूत, आपकी कृपा से।
श्लोक 28 (skanda.2.28.28)
श्रीसूत उवाच । भोभोस्तपोधनाः सर्वे नैमिषारण्यवासिनः । कटाहतीर्थमाहात्म्यं शृणुध्वं द्विजसत्तमाः ।
śrīsūta uvāca bhobhostapodhanāḥ sarve naimiṣāraṇyavāsinaḥ kaṭāhatīrthamāhātmyaṁ śṛṇudhvaṁ dvijasattamāḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे तपोधनो, नैमिषारण्यवासियो, द्विजश्रेष्ठो! सुनो, कटाहतीर्थ का माहात्म्य।
श्लोक 29 (skanda.2.28.29)
कटाहतीर्थं भो विप्राः सर्वलोकेषु विश्रुतम् । सर्वसम्पत्करं शुद्धं सर्वपापप्रणाशनम् ।
kaṭāhatīrthaṁ bho viprāḥ sarvalokeṣu viśrutam sarvasampatkaraṁ śuddhaṁ sarvapāpapraṇāśanam
हे विप्रो! कटाहतीर्थ समस्त लोकों में विख्यात, सर्व-संपत्तिदायक, शुद्ध और समस्त पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 30 (skanda.2.28.30)
दुःस्वप्ननाशनं ह्येतन्महापातकनाशनम् । महाविघ्नप्रशमनं महाशान्तिकरं नृणाम् ।
duḥsvapnanāśanaṁ hyetanmahāpātakanāśanam mahāvighnapraśamanaṁ mahāśāntikaraṁ nṛṇām
यह दुःस्वप्न का नाश करने वाला, पंच महापातकों का नाश करने वाला, महाविघ्नों को शांत करने वाला और मनुष्यों के लिए महाशांतिकारक है।
श्लोक 31 (skanda.2.28.31)
स्मृतिमात्रेण यत्पुंसां सर्वपापनिषूदनम् । मन्त्रेणाष्टाक्षरेणैव पिबेत्तीर्थं मनोहरम् ।
smṛtimātreṇa yatpuṁsāṁ sarvapāpaniṣūdanam mantreṇāṣṭākṣareṇaiva pibettīrthaṁ manoharam
केवल स्मरण मात्र से यह मनुष्यों के समस्त पापों को शांत करता है; अष्टाक्षर मंत्र से इस मनोहर तीर्थ को पीना चाहिए,
श्लोक 32 (skanda.2.28.32)
अथवा केशवाद्यैश्च नामभिर्वा पिबेज्जलम् । यद्वा नामत्रयेणापि पिबेत्तीर्थं शुभप्रदम् ।
athavā keśavādyaiśca nāmabhirvā pibejjalam yadvā nāmatrayeṇāpi pibettīrthaṁ śubhapradam
अथवा केशव आदि नामों से जल पीना चाहिए, या केवल तीन नामों से भी इस शुभप्रद तीर्थ को पीना चाहिए,
श्लोक 33 (skanda.2.28.33)
आहोस्विद्वेंकटेशस्य मन्त्रेणाष्टाक्षरेण वै । पिबेत्कटाहतीर्थं तद्भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।
āhosvidveṁkaṭeśasya mantreṇāṣṭākṣareṇa vai pibetkaṭāhatīrthaṁ tadbhuktimuktipradāyakam
अथवा वेंकटेश के अष्टाक्षर मंत्र से कटाहतीर्थ को पीना चाहिए, जो भोग और मोक्ष दोनों देने वाला है।
श्लोक 34 (skanda.2.28.34)
विना मंत्रेण यो विप्रः संपिबेत्तीर्थमुत्तमम् । पापं मे नाशय क्षिप्रं जन्मान्तरकृतं महत् ।
vinā maṁtreṇa yo vipraḥ saṁpibettīrthamuttamam pāpaṁ me nāśaya kṣipraṁ janmāntarakṛtaṁ mahat
जो विप्र बिना मंत्र के इस उत्तम तीर्थ को पीना चाहे, वह कहे — 'मेरे पूर्वजन्मों के महापाप को शीघ्र नष्ट करो' —
श्लोक 35 (skanda.2.28.35)
इत्युक्त्वा स पिबेन्नित्यं मोक्षमार्गैकसाधनम् । स्वामिपुष्करिणीस्नानं वराहश्रीशदर्शनम् ।
ityuktvā sa pibennityaṁ mokṣamārgaikasādhanam svāmipuṣkariṇīsnānaṁ varāhaśrīśadarśanam
ऐसा कहकर वह प्रतिदिन पीए, क्योंकि यही मोक्षमार्ग का एकमात्र साधन है। स्वामिपुष्करिणी में स्नान, वराह और श्रीनिवास का दर्शन,
श्लोक 36 (skanda.2.28.36)
कटाहतीर्थपानं च त्रयं त्रैलोक्यदुर्लभम् । बहुना किमिहोक्तेन ब्रह्महत्यादिनाशनम् ।
kaṭāhatīrthapānaṁ ca trayaṁ trailokyadurlabham bahunā kimihoktena brahmahatyādināśanam
और कटाहतीर्थ का पान — ये तीनों तीनों लोकों में दुर्लभ हैं। अधिक क्या कहें — यह ब्रह्महत्या तक का नाश कर देता है।
श्लोक 37 (skanda.2.28.37)
पुरा कश्चिद्द्विजो मोहात्केशवाख्यो बहुश्रुतम् । हत्वा खड्गेन दुर्बुद्ध्या ब्रह्महत्यामवाप्तवान् ।
purā kaściddvijo mohātkeśavākhyo bahuśrutam hatvā khaḍgena durbuddhyā brahmahatyāmavāptavān
प्राचीन काल में केशव नामक कोई बहुश्रुत ब्राह्मण, मोहवश दुर्बुद्धि से तलवार से किसी की हत्या कर ब्रह्महत्या का पाप पा बैठा।
श्लोक 38 (skanda.2.28.38)
सोऽपि तस्मिन्महातीर्थे पीत्वा जलमनुत्तमम् । केशवाख्यो महापापी विमुक्तो ब्रह्महत्यया ।
so'pi tasminmahātīrthe pītvā jalamanuttamam keśavākhyo mahāpāpī vimukto brahmahatyayā
वह भी उस महातीर्थ में अनुपम जल पीकर — वह महापापी केशव ब्रह्महत्या से मुक्त हो गया।
श्लोक 39 (skanda.2.28.39)
ऋषय ऊचुः । कस्य पुत्रः केशवाख्यः कथं प्राप्तो भयंकरीम् । ब्रह्महत्यामतिक्रूरामस्माकं वक्तुमर्हसि ।
ṛṣaya ūcuḥ kasya putraḥ keśavākhyaḥ kathaṁ prāpto bhayaṁkarīm brahmahatyāmatikrūrāmasmākaṁ vaktumarhasi
ऋषियों ने कहा — यह केशव किसका पुत्र था, और उसे यह भयंकर, अत्यंत क्रूर ब्रह्महत्या कैसे प्राप्त हुई? यह हमें बताइए।
श्लोक 40 (skanda.2.28.40)
श्रीसूत उवाच । तुङ्गभद्रातटे रम्ये गन्धर्वैरुपसेविते । अग्रहारो महानासीद्वेदाढ्य इति नामतः ।
śrīsūta uvāca tuṅgabhadrātaṭe ramye gandharvairupasevite agrahāro mahānāsīdvedāḍhya iti nāmataḥ
श्री सूत जी ने कहा — तुंगभद्रा नदी के रमणीय, गंधर्वों से सेवित तट पर वेदाढ्य नामक एक बड़ा अग्रहार था।
श्लोक 41 (skanda.2.28.41)
तस्मिन्वेदपुरे रम्ये ब्राह्मणा वेदपारगाः । शब्दशास्त्रपराः सर्वे ज्योतिःशास्त्रप्रवर्तकाः ।
tasminvedapure ramye brāhmaṇā vedapāragāḥ śabdaśāstraparāḥ sarve jyotiḥśāstrapravartakāḥ
उस रमणीय वेदपुर में सभी ब्राह्मण वेद में पारंगत, व्याकरण-शास्त्र में निपुण और ज्योतिष-शास्त्र के प्रवर्तक थे,
श्लोक 42 (skanda.2.28.42)
मीमांसातर्कशास्त्रज्ञाः सर्वे वेदान्तवादिनः । धर्मशास्त्रेषु निरता अन्नदानपराः सदा ।
mīmāṁsātarkaśāstrajñāḥ sarve vedāntavādinaḥ dharmaśāstreṣu niratā annadānaparāḥ sadā
सभी मीमांसा और तर्कशास्त्र के ज्ञाता, वेदांतवादी, धर्मशास्त्रों में लीन और सदा अन्नदान में तत्पर थे।
श्लोक 43 (skanda.2.28.43)
पुत्रवन्तश्च ते सर्वे ह्यग्रहारे महाजनाः । वेदाढ्येऽप्यग्रहारे वै पद्मनाभ इति श्रुतः ।
putravantaśca te sarve hyagrahāre mahājanāḥ vedāḍhye'pyagrahāre vai padmanābha iti śrutaḥ
उस अग्रहार के सभी महाजन पुत्रवान थे; उसी वेदाढ्य अग्रहार में पद्मनाभ नामक एक व्यक्ति प्रसिद्ध था।
श्लोक 44 (skanda.2.28.44)
तस्य पुत्रः केशवाख्यः सर्वकर्मबहिष्कृतः । मातरं पितरं त्यक्त्वा भार्यामपि पतिव्रताम् ।
tasya putraḥ keśavākhyaḥ sarvakarmabahiṣkṛtaḥ mātaraṁ pitaraṁ tyaktvā bhāryāmapi pativratām
उसका पुत्र केशव नामक सभी कर्मों से बहिष्कृत था; अपनी माता-पिता को, और अपनी पतिव्रता पत्नी को भी त्यागकर,
श्लोक 45 (skanda.2.28.45)
सर्वदा गणिकासक्तो वेश्यागारं विवेश ह । दिनद्वये च तां वेश्यामनुभूय द्विजस्ततः ।
sarvadā gaṇikāsakto veśyāgāraṁ viveśa ha dinadvaye ca tāṁ veśyāmanubhūya dvijastataḥ
सदा वेश्या में आसक्त रहकर वह वेश्यागार में प्रवेश कर गया। उस वेश्या के साथ दो दिन रहकर वह ब्राह्मण —
श्लोक 46 (skanda.2.28.46)
निष्कद्वयं प्रदातव्यं हस्ते दत्त्वा गतः सुखम् । वेश्यया चाधनस्त्यक्तस्तत्संयोगैकतत्परः ।
niṣkadvayaṁ pradātavyaṁ haste dattvā gataḥ sukham veśyayā cādhanastyaktastatsaṁyogaikatatparaḥ
उसके हाथ में दो स्वर्ण-मुद्राएँ देकर सुखपूर्वक चला जाता; परंतु निर्धन होने पर उस वेश्या ने उसे त्याग दिया, फिर भी वह उसी के संग में लीन रहा।
श्लोक 47 (skanda.2.28.47)
इतस्ततश्चोरयित्वा बहुद्रव्याणि सन्ततम् । दत्त्वा तया चिरं रेमे तद्गृहे बुभुजे च सः ।
itastataścorayitvā bahudravyāṇi santatam dattvā tayā ciraṁ reme tadgṛhe bubhuje ca saḥ
इधर-उधर से निरंतर बहुत सा धन चुराकर, उसे देकर वह उस वेश्या के घर में दीर्घकाल तक रमण करता और भोजन करता रहा।
श्लोक 48 (skanda.2.28.48)
एकेन चषकेणासौ तया सह सुरां पपौ । स कदाचित्किरातैस्तु द्रव्यं हर्तुं ययौ द्विजः ।
ekena caṣakeṇāsau tayā saha surāṁ papau sa kadācitkirātaistu dravyaṁ hartuṁ yayau dvijaḥ
वह उसके साथ एक ही प्याले से मदिरा पीता था; एक बार यह ब्राह्मण किरातों के साथ धन चुराने गया।
श्लोक 49 (skanda.2.28.49)
विप्रस्य कस्यचिद्गेहे सोऽपि कैरातवेषधृक् । केशवो विप्रबन्धुर्वै साहसी खङ्गहस्तवान् ।
viprasya kasyacidgehe so'pi kairātaveṣadhṛk keśavo viprabandhurvai sāhasī khaṅgahastavān
किसी ब्राह्मण के घर में, किरात का वेश धारण किए हुए वह — केशव, ब्राह्मण-बंधु, साहसी, हाथ में तलवार लिए —
श्लोक 50 (skanda.2.28.50)
तद्गृहस्वामिनं विप्रं हत्वा खड्गेन साहसात् । समादाय बहु द्रव्यं वेश्यागारं विवेश ह ।
tadgṛhasvāminaṁ vipraṁ hatvā khaḍgena sāhasāt samādāya bahu dravyaṁ veśyāgāraṁ viveśa ha
साहसपूर्वक तलवार से उस घर के स्वामी ब्राह्मण की हत्या कर, बहुत सा धन लेकर वेश्यागार में प्रवेश कर गया।
श्लोक 51 (skanda.2.28.51)
तं यान्तमनुयाति स्म ब्रह्महत्या भयंकरी । नीलवस्त्रधरा भीमा भृशं रक्तशिरोरुहा ।
taṁ yāntamanuyāti sma brahmahatyā bhayaṁkarī nīlavastradharā bhīmā bhṛśaṁ raktaśiroruhā
जाते हुए उसके पीछे भयंकर ब्रह्महत्या चल पड़ी — नीले वस्त्र पहने, भयानक, अत्यंत लाल केशों वाली,
श्लोक 52 (skanda.2.28.52)
गर्जन्ती साट्टहासं सा कम्पयन्ती च रोदसी । अनुद्रुतस्तया विप्रो बभ्राम जगतीतले ।
garjantī sāṭṭahāsaṁ sā kampayantī ca rodasī anudrutastayā vipro babhrāma jagatītale
अट्टहास सहित गरजती हुई, पृथ्वी और आकाश को कंपाती हुई; उससे पीछा किए जाने पर वह ब्राह्मण पृथ्वी पर भटकने लगा।
श्लोक 53 (skanda.2.28.53)
एवं भ्रमन्धरां सर्वां विप्रबन्धुर्दुरात्मवान् । स्वग्रामं प्रययौ भीत्या शौनकाद्या महौजसः ।
evaṁ bhramandharāṁ sarvāṁ viprabandhurdurātmavān svagrāmaṁ prayayau bhītyā śaunakādyā mahaujasaḥ
इस प्रकार सारी पृथ्वी पर भटकते हुए वह दुरात्मा ब्राह्मण-बंधु भय से अपने गाँव गया, हे परम तेजस्वी शौनक आदि मुनियो।
श्लोक 54 (skanda.2.28.54)
अनुद्रुतस्तया भीतः प्रययौ स्वनिकेतनम् । ब्रह्महत्याप्यनुद्रुत्य तेन साकं गृहं ययौ ।
anudrutastayā bhītaḥ prayayau svaniketanam brahmahatyāpyanudrutya tena sākaṁ gṛhaṁ yayau
उससे पीछा किए जाने से भयभीत होकर वह अपने घर गया; ब्रह्महत्या भी उसका पीछा करते हुए उसके साथ घर में प्रवेश कर गई।
श्लोक 55 (skanda.2.28.55)
जनकं रक्ष रक्षेति केशवः शरणं ययौ । मा भैषीरिति स प्रोच्य पिता रक्षितुमुद्यतः ।
janakaṁ rakṣa rakṣeti keśavaḥ śaraṇaṁ yayau mā bhaiṣīriti sa procya pitā rakṣitumudyataḥ
"पिताजी, रक्षा करो, रक्षा करो" — ऐसा कहकर केशव शरण में गया; "डरो मत" ऐसा कहकर पिता उसकी रक्षा के लिए तत्पर हुए।
श्लोक 56 (skanda.2.28.56)
क्रूरैनं ब्रह्महत्या सा जनकं प्रत्यभाषत ।
krūrainaṁ brahmahatyā sā janakaṁ pratyabhāṣata
परंतु वह क्रूर ब्रह्महत्या उस पिता से इस प्रकार बोली —
श्लोक 57 (skanda.2.28.57)
ब्रह्महत्योवाच । मैनं त्वं प्रतिगृह्णीष्व पद्मनाभ द्विजोत्तम । अयं सुरापी स्तेयी च ब्रह्महा चातिपातकी ।
brahmahatyovāca mainaṁ tvaṁ pratigṛhṇīṣva padmanābha dvijottama ayaṁ surāpī steyī ca brahmahā cātipātakī
ब्रह्महत्या ने कहा — "हे पद्मनाभ, द्विजोत्तम! इसे वापस मत लो; यह मद्यपायी, चोर, ब्रह्महत्यारा और महापापी है।
श्लोक 58 (skanda.2.28.58)
मातृद्रोही पितृद्रोही भार्यात्यागी च दुष्टधीः । गणिकासक्तचित्तश्च ह्येनं मुञ्च दुरात्मकम् ।
mātṛdrohī pitṛdrohī bhāryātyāgī ca duṣṭadhīḥ gaṇikāsaktacittaśca hyenaṁ muñca durātmakam
माता का द्रोही, पिता का द्रोही, पत्नी को त्यागने वाला, दुष्ट-बुद्धि, वेश्या में आसक्त-चित्त — इस दुरात्मा को छोड़ दो!
श्लोक 59 (skanda.2.28.59)
गृह्णासि चेत्सुतं विप्र महापातकिनं वृथा । त्वद्भार्यामस्य भार्यां च त्वां च पुत्रमिमं द्विज ।
gṛhṇāsi cetsutaṁ vipra mahāpātakinaṁ vṛthā tvadbhāryāmasya bhāryāṁ ca tvāṁ ca putramimaṁ dvija
हे ब्राह्मण! यदि तुम इस महापापी पुत्र को व्यर्थ ही वापस लोगे, तो तुम्हारी पत्नी, इसकी पत्नी, तुम स्वयं, और यह पुत्र —
श्लोक 60 (skanda.2.28.60)
भक्षयिष्यामि वंशं च तस्मान्मुञ्च दुरात्मकम् । इमं त्यजसि चेत्पुत्रं युष्मान्मुञ्चामि सांप्रतम् ।
bhakṣayiṣyāmi vaṁśaṁ ca tasmānmuñca durātmakam imaṁ tyajasi cetputraṁ yuṣmānmuñcāmi sāṁpratam
तथा तुम्हारे समस्त वंश को मैं निगल जाऊँगी; इसलिए इस दुरात्मा को छोड़ दो। यदि तुम इस पुत्र को त्याग दो, तो मैं अभी तुम सबको छोड़ दूँगी —
श्लोक 61 (skanda.2.28.61)
नैकस्यार्थे कुलं हन्तुमर्हसि त्वं महामते । इत्युक्तः स तया तत्र पद्मनाभोऽब्रवीच्च ताम् ।
naikasyārthe kulaṁ hantumarhasi tvaṁ mahāmate ityuktaḥ sa tayā tatra padmanābho'bravīcca tām
हे महाबुद्धिमान! एक के लिए अपने पूरे कुल का नाश करना उचित नहीं है।" इस प्रकार उससे कहे जाने पर पद्मनाभ ने उससे कहा —
श्लोक 62 (skanda.2.28.62)
पद्मनाभ उवाच । बाधते मां सुतस्नेहः कथं पुत्रं परित्यजे । ब्रह्महत्या तदाकर्ण्य पद्मनाभं तमब्रवीत् ।
padmanābha uvāca bādhate māṁ sutasnehaḥ kathaṁ putraṁ parityaje brahmahatyā tadākarṇya padmanābhaṁ tamabravīt
पद्मनाभ ने कहा — "पुत्र-स्नेह मुझे बाधित करता है — मैं पुत्र को कैसे त्याग दूँ?" यह सुनकर ब्रह्महत्या ने पद्मनाभ से कहा —
श्लोक 63 (skanda.2.28.63)
ब्रह्महत्योवाच । पुत्रोऽयं पतितोऽभूत्ते वर्णाश्रमबहिष्कृतः । पुत्रेऽस्मिन्मा कुरु स्नेहं निंदितं तस्य दर्शनम् ।
brahmahatyovāca putro'yaṁ patito'bhūtte varṇāśramabahiṣkṛtaḥ putre'sminmā kuru snehaṁ niṁditaṁ tasya darśanam
ब्रह्महत्या ने कहा — "यह तुम्हारा पुत्र पतित हो चुका है, वर्णाश्रम से बहिष्कृत है; इस पुत्र पर स्नेह मत करो, इसका दर्शन भी निंदनीय है।"
श्लोक 64 (skanda.2.28.64)
इत्युक्त्वा ब्रह्महत्या सा पद्मनाभस्य पश्यतः । हस्तेन प्रजहारास्य सुतं केशवनामकम् ।
ityuktvā brahmahatyā sā padmanābhasya paśyataḥ hastena prajahārāsya sutaṁ keśavanāmakam
ऐसा कहकर वह ब्रह्महत्या पद्मनाभ के देखते-देखते, अपने हाथ से केशव नामक उसके पुत्र पर प्रहार करने लगी।
श्लोक 65 (skanda.2.28.65)
रुरोद ताततातेति जनकं प्रब्रुवन्मुहुः । रुरुदुर्जनको माता भार्या तस्य दुरात्मनः ।
ruroda tātatāteti janakaṁ prabruvanmuhuḥ rurudurjanako mātā bhāryā tasya durātmanaḥ
वह बार-बार "पिताजी, पिताजी" कहकर पिता को पुकारते हुए रोया; उस दुरात्मा के पिता, माता और पत्नी भी रो पड़े।
श्लोक 66 (skanda.2.28.66)
तस्मिन्काले महाभागो भरद्वाजो महामुनिः । दिष्ट्या समाययौ योगी शौनकाद्या महौजसः ।
tasminkāle mahābhāgo bharadvājo mahāmuniḥ diṣṭyā samāyayau yogī śaunakādyā mahaujasaḥ
उसी समय महाभाग भरद्वाज महामुनि सौभाग्यवश वहाँ आ पहुँचे, हे परम तेजस्वी शौनक आदि मुनियो।
श्लोक 67 (skanda.2.28.67)
पद्मनाभोऽथ तं दृष्ट्वा भरद्वाजं महामुनिम् । स्तुत्वा प्रणम्य शरणं ययाचे पुत्रकारणात् ।
padmanābho'tha taṁ dṛṣṭvā bharadvājaṁ mahāmunim stutvā praṇamya śaraṇaṁ yayāce putrakāraṇāt
पद्मनाभ ने उस महामुनि भरद्वाज को देखकर, उनकी स्तुति कर, प्रणाम कर, अपने पुत्र के लिए शरण माँगी —
श्लोक 68 (skanda.2.28.68)
भरद्वाज महाभाग साक्षाद्विष्ण्वंशको भवान् । त्वद्दर्शनमपुण्यानां भविता न कदाचन ।
bharadvāja mahābhāga sākṣādviṣṇvaṁśako bhavān tvaddarśanamapuṇyānāṁ bhavitā na kadācana
"हे महाभाग भरद्वाज! आप साक्षात् विष्णु के अंश हैं; आपका दर्शन कभी भी पुण्यहीनों को नहीं मिलता।
श्लोक 69 (skanda.2.28.69)
ब्रह्महा च सुरापी च स्तेयी चाभूत्सुतो मम । पुत्रं प्रहर्तुमा याता ब्रह्महत्या भयंकरी ।
brahmahā ca surāpī ca steyī cābhūtsuto mama putraṁ prahartumā yātā brahmahatyā bhayaṁkarī
मेरा पुत्र ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी और चोर बन गया है; भयंकर ब्रह्महत्या मेरे पुत्र पर प्रहार करने आई है।
श्लोक 70 (skanda.2.28.70)
भूयाद्यथा मे पुत्रोयं महापातकमोचितः । घोरेयं ब्रह्महत्या च यथा शीघ्रं लयं व्रजेत् ।
bhūyādyathā me putroyaṁ mahāpātakamocitaḥ ghoreyaṁ brahmahatyā ca yathā śīghraṁ layaṁ vrajet
ऐसा हो कि मेरा यह पुत्र इस महापाप से मुक्त हो जाए, और यह घोर ब्रह्महत्या शीघ्र नष्ट हो जाए।
श्लोक 71 (skanda.2.28.71)
तमुपायं वदस्वाद्य मम पुत्रे दयां कुरु । एक एव हि पुत्रो मे नान्योऽस्ति तनयो मुने ।
tamupāyaṁ vadasvādya mama putre dayāṁ kuru eka eva hi putro me nānyo'sti tanayo mune
आज मुझे वह उपाय बताइए, मेरे पुत्र पर दया कीजिए; हे मुने, मेरा एक ही पुत्र है, दूसरा कोई नहीं है।
श्लोक 72 (skanda.2.28.72)
सुते मृते तु वंशो मे समुच्छिद्येत मूलतः । ततः पितृभ्यः पिण्डानां दाताऽपि न भवेद्ध्रुवम् ।
sute mṛte tu vaṁśo me samucchidyeta mūlataḥ tataḥ pitṛbhyaḥ piṇḍānāṁ dātā'pi na bhaveddhruvam
पुत्र के मरने पर मेरा वंश मूल से ही उच्छिन्न हो जाएगा, और फिर पितरों को पिंड देने वाला कोई नहीं रहेगा।
श्लोक 73 (skanda.2.28.73)
ततः कृपां कुरुष्व त्वमस्मासु भगवन्मुने । इत्युक्तः स भरद्वाजः साक्षान्नारायणांशकः ।
tataḥ kṛpāṁ kuruṣva tvamasmāsu bhagavanmune ityuktaḥ sa bharadvājaḥ sākṣānnārāyaṇāṁśakaḥ
इसलिए, हे भगवन् मुने, हम पर कृपा कीजिए।" ऐसा कहे जाने पर वे भरद्वाज, जो साक्षात् नारायण के अंश थे,
श्लोक 74 (skanda.2.28.74)
ध्यात्वा तु सुचिरं कालं पद्मनाभं वचोऽब्रवीत् ।
dhyātvā tu suciraṁ kālaṁ padmanābhaṁ vaco'bravīt
बहुत देर तक ध्यान करके पद्मनाभ से यह वचन बोले —
श्लोक 75 (skanda.2.28.75)
भरद्वाज उवाच । पद्मनाभ कृतं पापमतिक्रूरं सुतेन ते । नास्य पापस्य शान्तिः स्यात्प्रायश्चित्तायुतैरपि ।
bharadvāja uvāca padmanābha kṛtaṁ pāpamatikrūraṁ sutena te nāsya pāpasya śāntiḥ syātprāyaścittāyutairapi
भरद्वाज ने कहा — "हे पद्मनाभ! तुम्हारे पुत्र ने अत्यंत क्रूर पाप किया है; इस पाप की शांति दस हजार प्रायश्चित्तों से भी नहीं हो सकती।
श्लोक 76 (skanda.2.28.76)
तथाऽपि ते सुतस्याहमस्य पापस्य शान्तये । प्रायश्चित्तं वदिष्यामि पद्मनाभ शृणु द्विज ।
tathā'pi te sutasyāhamasya pāpasya śāntaye prāyaścittaṁ vadiṣyāmi padmanābha śṛṇu dvija
फिर भी तुम्हारे पुत्र के इस पाप की शांति के लिए मैं प्रायश्चित्त बताऊँगा — सुनो, हे पद्मनाभ द्विज।
श्लोक 77 (skanda.2.28.77)
गङ्गाया दक्षिणे भागे द्विशतीयोजने द्विज । पूर्वाम्भोधेः पश्चिमे तु पञ्चभिर्योजनैर्मिते ।
gaṅgāyā dakṣiṇe bhāge dviśatīyojane dvija pūrvāmbhodheḥ paścime tu pañcabhiryojanairmite
गंगा के दक्षिण भाग में दो सौ योजन दूर, हे द्विज, और पूर्व समुद्र के पश्चिम में पाँच योजन की दूरी पर —
श्लोक 78 (skanda.2.28.78)
सुवर्णमुखरीतीरे चोत्तरे क्रोशमात्रके । वेंकटाद्रिति ख्यातः सर्वलोकनमस्कृतः ।
suvarṇamukharītīre cottare krośamātrake veṁkaṭādriti khyātaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ
स्वर्णमुखरी नदी के तट पर, उत्तर में केवल एक क्रोश की दूरी पर, वेंकटाद्रि नामक प्रसिद्ध पर्वत है, जिसे समस्त लोक नमस्कार करते हैं —
श्लोक 79 (skanda.2.28.79)
मेरुपुत्रो महापुण्यः सर्वदेवाभिवन्दितः । वैकुण्ठलोकादानीतो विष्णोः क्रीडाचलो महान् ।
meruputro mahāpuṇyaḥ sarvadevābhivanditaḥ vaikuṇṭhalokādānīto viṣṇoḥ krīḍācalo mahān
मेरु का पुत्र, महापुण्य, समस्त देवताओं द्वारा वंदित, वैकुंठलोक से लाया गया विष्णु का महान क्रीडा-पर्वत,
श्लोक 80 (skanda.2.28.80)
गरुत्मता वेगवता स्वर्णमुख्यास्तटे शुभे । वर्तते देवसंघैश्च ऋषिसंघैश्च पूजितः ।
garutmatā vegavatā svarṇamukhyāstaṭe śubhe vartate devasaṁghaiśca ṛṣisaṁghaiśca pūjitaḥ
वेगवान गरुड़ द्वारा वहाँ लाया गया, स्वर्णमुखी के शुभ तट पर स्थित है; वह देव-समूहों और ऋषि-समूहों द्वारा पूजित है।
श्लोक 81 (skanda.2.28.81)
तस्मिन्वेंकटशैलेन्द्रे साक्षान्नारायणः स्वयम् । लक्ष्मीदेव्या च भूदेव्या नीलादेव्या समागतः ।
tasminveṁkaṭaśailendre sākṣānnārāyaṇaḥ svayam lakṣmīdevyā ca bhūdevyā nīlādevyā samāgataḥ
उस वेंकटशैलेन्द्र पर साक्षात् नारायण स्वयं, लक्ष्मी देवी, भूदेवी और नीला देवी के साथ विराजमान हैं —
श्लोक 82 (skanda.2.28.82)
वर्तते वेंकटेशः स साक्षान्मोक्षप्रदायकः । तस्य वेंकटनाथस्य ह्यालयस्य तथोत्तरे ।
vartate veṁkaṭeśaḥ sa sākṣānmokṣapradāyakaḥ tasya veṁkaṭanāthasya hyālayasya tathottare
वे साक्षात् मोक्षदायक वेंकटेश हैं। उस वेंकटनाथ के मंदिर के उत्तर में —
श्लोक 83 (skanda.2.28.83)
कटाहतीर्थं विप्रेन्द्र वर्तते मङ्गलप्रदम् । ब्रह्महत्यादिपापघ्नं वाञ्छितार्थप्रदायकम् ।
kaṭāhatīrthaṁ viprendra vartate maṅgalapradam brahmahatyādipāpaghnaṁ vāñchitārthapradāyakam
हे विप्रेंद्र, मंगलदायक कटाहतीर्थ है, जो ब्रह्महत्या आदि पापों का नाश करने वाला और इच्छित वस्तुएँ देने वाला है।
श्लोक 84 (skanda.2.28.84)
सुतेन साकं विप्रेंद्र पिब तीर्थं मनोहरम् । भरद्वाजस्य वाक्यं तच्छ्रुत्वा वै वेदसंमितम् ।
sutena sākaṁ vipreṁdra piba tīrthaṁ manoharam bharadvājasya vākyaṁ tacchrutvā vai vedasaṁmitam
हे विप्रेंद्र! अपने पुत्र के साथ उस मनोहर तीर्थ को पीओ।" भरद्वाज के इस वेद-सम्मत वचन को सुनकर,
श्लोक 85 (skanda.2.28.85)
शिरसा तं प्रणम्याथ ययौ वेंकटपर्वतम् ।
śirasā taṁ praṇamyātha yayau veṁkaṭaparvatam
पद्मनाभ ने उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया और वेंकट पर्वत की ओर चल पड़े।
श्लोक 86 (skanda.2.28.86)
तं गत्वा वेंकटं शैलं स्वामिपुष्करिणीजले । सुतेन साकं विप्रेंद्रः सस्नौ नियमपूर्वकम् ।
taṁ gatvā veṁkaṭaṁ śailaṁ svāmipuṣkariṇījale sutena sākaṁ vipreṁdraḥ sasnau niyamapūrvakam
वहाँ वेंकट पर्वत पर जाकर, स्वामिपुष्करिणी के जल में, अपने पुत्र के साथ उस द्विजश्रेष्ठ ने नियमपूर्वक स्नान किया।
श्लोक 87 (skanda.2.28.87)
वराहस्वामिनं नत्वा श्रीनिवासालयं गतः । प्रदक्षिणं ततः कृत्वा विमानं संप्रणम्य च ।
varāhasvāminaṁ natvā śrīnivāsālayaṁ gataḥ pradakṣiṇaṁ tataḥ kṛtvā vimānaṁ saṁpraṇamya ca
वराहस्वामी को नमन कर वे श्रीनिवास के मंदिर गए; वहाँ प्रदक्षिणा कर और विमान को प्रणाम कर,
श्लोक 88 (skanda.2.28.88)
पद्मनाभोऽथ पुत्रेण केशवेन दुरात्मना । पपौ कटाहतीर्थं तद्ब्रह्महत्याविनाशकम् ।
padmanābho'tha putreṇa keśavena durātmanā papau kaṭāhatīrthaṁ tadbrahmahatyāvināśakam
पद्मनाभ ने अपने दुरात्मा पुत्र केशव के साथ ब्रह्महत्या का नाश करने वाले उस कटाहतीर्थ को पिया।
श्लोक 89 (skanda.2.28.89)
तदानीं ब्रह्महत्या सा शीघ्रमेव लयं गता । अनन्तरं ततो गत्वा वेंकटेशं कृपानिधिम् ।
tadānīṁ brahmahatyā sā śīghrameva layaṁ gatā anantaraṁ tato gatvā veṁkaṭeśaṁ kṛpānidhim
उसी क्षण वह ब्रह्महत्या शीघ्र ही नष्ट हो गई। इसके बाद वहाँ जाकर दयानिधि वेंकटेश को —
श्लोक 90 (skanda.2.28.90)
पुत्रेण सह विप्रेन्द्रः पद्मनाभो ददर्श सः । तदा प्रादुरभूद्देवो वेङ्कटेशो दयानिधिः ।
putreṇa saha viprendraḥ padmanābho dadarśa saḥ tadā prādurabhūddevo veṅkaṭeśo dayānidhiḥ
अपने पुत्र के साथ उस द्विजश्रेष्ठ पद्मनाभ ने देखा। तब दयानिधि देव वेंकटेश प्रकट हुए,
श्लोक 91 (skanda.2.28.91)
कटाहतीर्थपानेन तोषितो वाक्यमब्रवीत् ।
kaṭāhatīrthapānena toṣito vākyamabravīt
और कटाहतीर्थ के पान से प्रसन्न होकर यह वचन बोले।
श्लोक 92 (skanda.2.28.92)
श्रीभगवानुवाच । पद्मनाभ महाबुद्धे वेदवेदान्तपारग । भरद्वाजस्य वाक्येन प्राप्य वेंकटपर्वतम् ।
śrībhagavānuvāca padmanābha mahābuddhe vedavedāntapāraga bharadvājasya vākyena prāpya veṁkaṭaparvatam
श्री भगवान ने कहा — "हे महाबुद्धिमान पद्मनाभ, वेद-वेदांत में पारंगत! भरद्वाज के वचन से वेंकट पर्वत पर पहुँचकर,
श्लोक 93 (skanda.2.28.93)
कटाहतीर्थं त्वं पीत्वा कृतार्थोऽसि न संशयः । तव पुत्रः केशवाख्यो विमुक्तो ब्रह्महत्यया ।
kaṭāhatīrthaṁ tvaṁ pītvā kṛtārtho'si na saṁśayaḥ tava putraḥ keśavākhyo vimukto brahmahatyayā
तुमने कटाहतीर्थ पीकर निःसंदेह अपना कार्य सिद्ध किया है; तुम्हारा पुत्र केशव ब्रह्महत्या से मुक्त हो गया है।
श्लोक 94 (skanda.2.28.94)
तस्मात्कटाहतीर्थं तु सेवनीयं प्रयत्नतः । तस्मिंस्तीर्थे महाभाग पीत्वा जलमनुत्तमम् ।
tasmātkaṭāhatīrthaṁ tu sevanīyaṁ prayatnataḥ tasmiṁstīrthe mahābhāga pītvā jalamanuttamam
इसलिए कटाहतीर्थ का प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिए; उस तीर्थ में, हे महाभाग, अनुपम जल पीकर,
श्लोक 95 (skanda.2.28.95)
पापिनोऽपि कृतार्थाः स्युः सत्यं सत्यं न संशयः । मामकं लोकमागत्य सुखी भव महामते ।
pāpino'pi kṛtārthāḥ syuḥ satyaṁ satyaṁ na saṁśayaḥ māmakaṁ lokamāgatya sukhī bhava mahāmate
पापी भी कृतार्थ हो जाते हैं — यह सत्य है, सत्य है, इसमें संदेह नहीं। मेरे लोक में आकर सुखी रहो, हे महाबुद्धिमान।"
श्लोक 96 (skanda.2.28.96)
इत्युक्त्वा वेंकटेशोऽसावन्तर्धानं गतस्ततः ।
ityuktvā veṁkaṭeśo'sāvantardhānaṁ gatastataḥ
ऐसा कहकर वेंकटेश वहाँ से अंतर्धान हो गए।
श्लोक 97 (skanda.2.28.97)
श्रीसूत उवाच । तस्मात्तपोधनाः सर्वे शौनकाद्या महौजसः । कटाहतीर्थमाहात्म्यमितिहाससमन्वितम् ।
śrīsūta uvāca tasmāttapodhanāḥ sarve śaunakādyā mahaujasaḥ kaṭāhatīrthamāhātmyamitihāsasamanvitam
श्री सूत जी ने कहा — इसलिए, हे तपोधनो, परम तेजस्वी शौनक आदि मुनियो, मैंने तुम्हें यह इतिहास-सहित कटाहतीर्थ का माहात्म्य,
श्लोक 98 (skanda.2.28.98)
यथाश्रुतं मया सम्यक्तथोक्तं भवतां द्विजाः ।
yathāśrutaṁ mayā samyaktathoktaṁ bhavatāṁ dvijāḥ
जैसा मैंने सुना था, हे विप्रो, वैसा ही यथार्थ रूप से आपसे कहा है।