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वैष्णव खण्ड · अध्याय 29

अर्जुन तीर्थयात्रा प्रारंभ माहात्म्य

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (skanda.2.29.1)

ऋषय ऊचुः । तीर्थानामिह सर्वेषां प्रभावः कथितस्त्वया । नदीनां पर्वतानां च क्षेत्राणां सरसामपि ।

ṛṣaya ūcuḥ tīrthānāmiha sarveṣāṁ prabhāvaḥ kathitastvayā nadīnāṁ parvatānāṁ ca kṣetrāṇāṁ sarasāmapi

ऋषियों ने कहा — आपने यहाँ समस्त तीर्थों, नदियों, पर्वतों, क्षेत्रों और सरोवरों का प्रभाव बताया है।

श्लोक 2 (skanda.2.29.2)

निदेशात्पद्मगर्भस्य सुवर्णमुखरी नदी । नीता भुवमगस्त्येन व्याख्याता भवतानघ ।

nideśātpadmagarbhasya suvarṇamukharī nadī nītā bhuvamagastyena vyākhyātā bhavatānagha

पद्मगर्भ (ब्रह्मा) के आदेश से स्वर्णमुखरी नदी को अगस्त्य मुनि द्वारा पृथ्वी पर लाया जाना — यह हे निष्पाप! आपने हमें बताया है।

श्लोक 3 (skanda.2.29.3)

तदुत्पत्तिप्रभावं च तीर्थौघांस्तत्समाश्रयान् । श्रोतुं संप्रीतिरुत्पन्ना तन्नो वक्तुं त्वमर्हसि ।

tadutpattiprabhāvaṁ ca tīrthaughāṁstatsamāśrayān śrotuṁ saṁprītirutpannā tanno vaktuṁ tvamarhasi

परंतु उसकी उत्पत्ति का प्रभाव और उस पर आश्रित तीर्थ-समूहों को सुनने की हमें बड़ी उत्कंठा हुई है; यह हमें बताइए।

श्लोक 4 (skanda.2.29.4)

प्रणम्य शम्भुं नन्दीशं षडास्यं व्यासमेव च । मुनिभिः प्रार्थितः सूतस्तदा वक्तुं प्रचक्रमे ।

praṇamya śambhuṁ nandīśaṁ ṣaḍāsyaṁ vyāsameva ca munibhiḥ prārthitaḥ sūtastadā vaktuṁ pracakrame

शंभु, नंदीश, षडानन (कार्तिकेय) और व्यास जी को प्रणाम कर, मुनियों द्वारा प्रार्थना किए जाने पर सूत जी ने कहना आरंभ किया।

श्लोक 5 (skanda.2.29.5)

श्रीसूत उवाच । साधु पृष्टं महाभाग भवद्भिर्मंगलावहम् । आख्यानमेतदाम्नाय श्रवणोद्भूतसिद्धिदम् ।

śrīsūta uvāca sādhu pṛṣṭaṁ mahābhāga bhavadbhirmaṁgalāvaham ākhyānametadāmnāya śravaṇodbhūtasiddhidam

श्री सूत जी ने कहा — हे महाभागो! आपने मंगलकारी प्रश्न भली-भाँति पूछा है; यह परंपरागत आख्यान श्रवण-मात्र से सिद्धि देने वाला है।

श्लोक 6 (skanda.2.29.6)

शृणुतावहिता दिव्यां कथां कल्मषनाशिनीम् । भरद्वाजेन कथितां पार्थाय कथयामि वः ।

śṛṇutāvahitā divyāṁ kathāṁ kalmaṣanāśinīm bharadvājena kathitāṁ pārthāya kathayāmi vaḥ

अवधानपूर्वक सुनो इस दिव्य, पाप-नाशक कथा को, जो भरद्वाज मुनि ने पार्थ (अर्जुन) को सुनाई थी; वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ।

श्लोक 7 (skanda.2.29.7)

अवाप्य द्रुपदात्प्राज्ञाद्याज्ञसेनीं पृथासुताः । धृतराष्ट्रनिदेशेन जग्मुः करिपुरं शुभम् ।

avāpya drupadātprājñādyājñasenīṁ pṛthāsutāḥ dhṛtarāṣṭranideśena jagmuḥ karipuraṁ śubham

बुद्धिमान द्रुपद से याज्ञसेनी (द्रौपदी) को प्राप्त कर, पृथा के पुत्र धृतराष्ट्र के आदेश से शुभ करिपुर (हस्तिनापुर) गए।

श्लोक 8 (skanda.2.29.8)

भीष्मेण चांबिकेयेन तत्र संमानितास्तदा । दुर्योधनादिभिः सार्द्धं न्यवसन्पञ्चवत्सरान् ।

bhīṣmeṇa cāṁbikeyena tatra saṁmānitāstadā duryodhanādibhiḥ sārddhaṁ nyavasanpañcavatsarān

वहाँ भीष्म और अंबिकापुत्र (धृतराष्ट्र) द्वारा सम्मानित होकर, वे दुर्योधन आदि के साथ पाँच वर्षों तक रहे।

श्लोक 9 (skanda.2.29.9)

ततोऽनुशिष्टो भीष्माद्यैर्धृतराष्ट्रो महायशाः । सर्वेषां कुलवृद्धानां वासुदेवस्य चाग्रतः ।

tato'nuśiṣṭo bhīṣmādyairdhṛtarāṣṭro mahāyaśāḥ sarveṣāṁ kulavṛddhānāṁ vāsudevasya cāgrataḥ

फिर भीष्म आदि द्वारा अनुशासित महायशस्वी धृतराष्ट्र ने, समस्त कुल-वृद्धों और वासुदेव के समक्ष,

श्लोक 10 (skanda.2.29.10)

प्रददौ पांडुपुत्रेभ्यस्तत्सेवाहृष्टमानसः । सार्धराज्यं पुरवरं खाण्डवप्रस्थसंज्ञिकम् ।

pradadau pāṁḍuputrebhyastatsevāhṛṣṭamānasaḥ sārdharājyaṁ puravaraṁ khāṇḍavaprasthasaṁjñikam

उनकी सेवा से प्रसन्न होकर पांडु-पुत्रों को आधा राज्य, खांडवप्रस्थ नामक श्रेष्ठ नगर, प्रदान किया।

श्लोक 11 (skanda.2.29.11)

आमंत्र्य पाण्डुतनया धृतराष्ट्रादिकान्कुरून् । जग्मुस्तत्खाण्डवप्रस्थं पुरं कृष्णसमन्विताः ।

āmaṁtrya pāṇḍutanayā dhṛtarāṣṭrādikānkurūn jagmustatkhāṇḍavaprasthaṁ puraṁ kṛṣṇasamanvitāḥ

धृतराष्ट्र आदि कुरुओं से विदा लेकर, पांडु-पुत्र कृष्ण सहित उस खांडवप्रस्थ नगर में गए।

श्लोक 12 (skanda.2.29.12)

इन्द्रप्रस्थाह्वये तत्र रक्षिते विश्वकर्मणा । वसन्पुरेऽशिषत्पृथ्वीं सानुजो धर्मनंदनः ।

indraprasthāhvaye tatra rakṣite viśvakarmaṇā vasanpure'śiṣatpṛthvīṁ sānujo dharmanaṁdanaḥ

वहाँ विश्वकर्मा द्वारा रक्षित इंद्रप्रस्थ नामक नगर में, अनुज सहित धर्मनंदन (युधिष्ठिर) ने पृथ्वी का शासन किया।

श्लोक 13 (skanda.2.29.13)

गते कृष्णे निजपुरं नारदस्यानुशासनात् । प्रतिज्ञां चक्रिरे पार्था धर्मज्ञा द्रौपदीं प्रति ।

gate kṛṣṇe nijapuraṁ nāradasyānuśāsanāt pratijñāṁ cakrire pārthā dharmajñā draupadīṁ prati

कृष्ण के अपने नगर लौट जाने पर, नारद जी के अनुशासन से, धर्मज्ञ पार्थों ने द्रौपदी के विषय में एक प्रतिज्ञा की —

श्लोक 14 (skanda.2.29.14)

यथाक्रमेण सा कृष्णा वर्षमेकैकमादरात् । एकैकस्य गृहे तिष्ठेत्प्रतिनिर्णयपूर्वकम् ।

yathākrameṇa sā kṛṣṇā varṣamekaikamādarāt ekaikasya gṛhe tiṣṭhetpratinirṇayapūrvakam

कि क्रमानुसार वह कृष्णा (द्रौपदी) आदरपूर्वक एक-एक वर्ष निश्चित रूप से एक-एक के घर में रहेगी,

श्लोक 15 (skanda.2.29.15)

यः पश्येत्तां परगृहे स्थितां पांचालनंदिनीम् । तेनैकहायनमितं विधेयं तीर्थसेवनम् ।

yaḥ paśyettāṁ paragṛhe sthitāṁ pāṁcālanaṁdinīm tenaikahāyanamitaṁ vidheyaṁ tīrthasevanam

और जो कोई उसे किसी अन्य के घर में स्थित, पांचालनंदिनी को देख लेगा, उसे एक वर्ष तक तीर्थ-सेवन करना होगा।

श्लोक 16 (skanda.2.29.16)

एवं कृतप्रतिज्ञास्ते पाण्डुभूपालनंदनाः । व्यापारैर्लोंकसामान्यैर्निन्युः कालमतंद्रिताः ।

evaṁ kṛtapratijñāste pāṇḍubhūpālanaṁdanāḥ vyāpārairloṁkasāmānyairninyuḥ kālamataṁdritāḥ

इस प्रकार प्रतिज्ञा करके वे पांडु-नरेश के पुत्र लोक-सामान्य कार्यों में अथक भाव से समय बिताते रहे।

श्लोक 17 (skanda.2.29.17)

अथ जानपदो विप्रो राजगेहांगणे स्थितः । चुक्रोश बहुधा धेनुर्हृता मे तस्करैरिति ।

atha jānapado vipro rājagehāṁgaṇe sthitaḥ cukrośa bahudhā dhenurhṛtā me taskarairiti

तभी राजभवन के आँगन में खड़े एक ग्रामीण ब्राह्मण ने बार-बार पुकार लगाई — "मेरी गाय चोरों ने हर ली है!"

श्लोक 18 (skanda.2.29.18)

समाश्वास्य च तं विप्रं प्रविवेश धनंजयः । आयुधानि समानेतुं त्वरया शस्त्रमंदिरम् ।

samāśvāsya ca taṁ vipraṁ praviveśa dhanaṁjayaḥ āyudhāni samānetuṁ tvarayā śastramaṁdiram

उस ब्राह्मण को आश्वासन देकर धनंजय (अर्जुन) शीघ्रता से अस्त्र लाने के लिए शस्त्रागार में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 19 (skanda.2.29.19)

तत्रापश्यत्समासीनौ पांचालीधर्मनन्दनौ । जानन्नपि प्रतिज्ञां स धनुर्जग्राह सेषुधि ।

tatrāpaśyatsamāsīnau pāṁcālīdharmanandanau jānannapi pratijñāṁ sa dhanurjagrāha seṣudhi

वहाँ उन्होंने पांचाली और धर्मनंदन को साथ बैठे देखा; प्रतिज्ञा जानते हुए भी उन्होंने धनुष और तरकश उठा लिया।

श्लोक 20 (skanda.2.29.20)

स गत्वा तस्करानाजौ निहत्य नृपनन्दनः । निवर्त्य धेनुं तां तस्मै ददौ विप्राय सादरम् ।

sa gatvā taskarānājau nihatya nṛpanandanaḥ nivartya dhenuṁ tāṁ tasmai dadau viprāya sādaram

वह राजकुमार जाकर युद्ध में चोरों को मारकर, गाय को वापस लाकर, आदरपूर्वक उस ब्राह्मण को दे दी।

श्लोक 21 (skanda.2.29.21)

अथ विज्ञापयामास फाल्गुनो धर्मनन्दनम् । तीर्थयात्रा मया कार्या समयोल्लंघनादिति ।

atha vijñāpayāmāsa phālguno dharmanandanam tīrthayātrā mayā kāryā samayollaṁghanāditi

तब फाल्गुन (अर्जुन) ने धर्मनंदन को सूचित किया कि प्रतिज्ञा के उल्लंघन के कारण उन्हें तीर्थयात्रा करनी होगी।

श्लोक 22 (skanda.2.29.22)

अनुजस्य वचः श्रुत्वा सर्वधर्मविदां वरः । उवाच वचनं धीरः सादरं धर्मनंदनः ।

anujasya vacaḥ śrutvā sarvadharmavidāṁ varaḥ uvāca vacanaṁ dhīraḥ sādaraṁ dharmanaṁdanaḥ

अनुज के वचन सुनकर, समस्त धर्मज्ञों में श्रेष्ठ धीर धर्मनंदन ने आदरपूर्वक यह वचन कहा —

श्लोक 23 (skanda.2.29.23)

युधिष्ठिर उवाच । गवार्थं ब्राह्मणार्थं च यद्वदेदनृतं वचः । यदाचरेदसत्कर्म तत्सत्यं तत्समंजसम् ।

yudhiṣṭhira uvāca gavārthaṁ brāhmaṇārthaṁ ca yadvadedanṛtaṁ vacaḥ yadācaredasatkarma tatsatyaṁ tatsamaṁjasam

युधिष्ठिर ने कहा — "गाय और ब्राह्मण के लिए जो असत्य वचन कहा जाए, और जो अनुचित कर्म किया जाए, वही सत्य है, वही उचित है।

श्लोक 24 (skanda.2.29.24)

ब्राह्मणार्थं गवार्थं च त्वया कर्मेदृशं कृतम् । तदसद्भावमाप्नोति कथं कथय सुव्रत ।

brāhmaṇārthaṁ gavārthaṁ ca tvayā karmedṛśaṁ kṛtam tadasadbhāvamāpnoti kathaṁ kathaya suvrata

तुमने ब्राह्मण और गाय के लिए ऐसा कर्म किया है — वह असत्यता को कैसे प्राप्त हो सकता है, यह बताओ, हे सुव्रत।

श्लोक 25 (skanda.2.29.25)

प्रजापालनकृत्यस्य चोरोपेक्षणशिक्षणैः । नूनं फलं भवेद्राज्ञो ब्रह्महत्याश्वमेधजम् ।

prajāpālanakṛtyasya coropekṣaṇaśikṣaṇaiḥ nūnaṁ phalaṁ bhavedrājño brahmahatyāśvamedhajam

प्रजा-पालन के कर्तव्य में चोरों की उपेक्षा और उन्हें दंडित न करने से, राजा को निश्चय ही अश्वमेध यज्ञ करने पर भी ब्रह्महत्या का फल मिलता है।

श्लोक 26 (skanda.2.29.26)

असाध्यान्वैरिणो ज्ञात्वाऽप्यवनीशो न भद्रभाक् । स्वदेशोपप्लवकरास्तस्करा यद्यशिक्षिताः ।

asādhyānvairiṇo jñātvā'pyavanīśo na bhadrabhāk svadeśopaplavakarāstaskarā yadyaśikṣitāḥ

जो राजा असाध्य शत्रुओं को जानते हुए भी कल्याण नहीं पाता, और यदि अपने देश को उपद्रवित करने वाले चोर अदंडित रह जाएँ —

श्लोक 27 (skanda.2.29.27)

अस्माकं भूभुजां लोकजालस्य च हितं हि यत् । त्वयेदृशं कृतं कर्म नास्ति दोषो ह्यतस्तव ।

asmākaṁ bhūbhujāṁ lokajālasya ca hitaṁ hi yat tvayedṛśaṁ kṛtaṁ karma nāsti doṣo hyatastava

हम राजाओं और समस्त प्रजा-समूह के हित में ही तुमने ऐसा कर्म किया है; इसलिए इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है।"

श्लोक 28 (skanda.2.29.28)

श्रीसूत उवाच । धर्मपुत्रस्य वचनमाकर्ण्य रचितांजलिः । पुनर्विज्ञापयामास धर्मनित्यो धनंजयः ।

śrīsūta uvāca dharmaputrasya vacanamākarṇya racitāṁjaliḥ punarvijñāpayāmāsa dharmanityo dhanaṁjayaḥ

श्री सूत जी ने कहा — धर्मपुत्र के वचन सुनकर, हाथ जोड़े हुए, धर्मनिष्ठ धनंजय ने पुनः निवेदन किया —

श्लोक 29 (skanda.2.29.29)

अर्जुन उवाच । मैवं भूपाल वादीस्त्वं स्वप्रतिज्ञातिलंघनम् । जानता धर्मसर्वस्वमुल्लसद्धर्ममूर्तिना ।

arjuna uvāca maivaṁ bhūpāla vādīstvaṁ svapratijñātilaṁghanam jānatā dharmasarvasvamullasaddharmamūrtinā

अर्जुन ने कहा — "हे राजन्! ऐसा मत कहिए कि अपनी प्रतिज्ञा का उल्लंघन नहीं हुआ, जबकि आप स्वयं धर्म का संपूर्ण सार जानने वाले, प्रकाशमान धर्म की साक्षात् मूर्ति हैं,

श्लोक 30 (skanda.2.29.30)

कृत्याकृत्यविदा दक्षेणात्मना प्राक्समीरिता । नोल्लंघनीया सततं प्रतिज्ञा पुरुषेण हि ।

kṛtyākṛtyavidā dakṣeṇātmanā prāksamīritā nollaṁghanīyā satataṁ pratijñā puruṣeṇa hi

कर्तव्य-अकर्तव्य को जानने वाले, दक्ष स्वयं ने पहले ही कहा था कि पुरुष को अपनी घोषित प्रतिज्ञा का कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिए।

श्लोक 31 (skanda.2.29.31)

अशक्तानां गतिः सेयं यद्बंधुगुरुवाक्यतः । धर्मं त्यजंति समयं त्यक्ताः प्राक्स्वं समीरितम् ।

aśaktānāṁ gatiḥ seyaṁ yadbaṁdhuguruvākyataḥ dharmaṁ tyajaṁti samayaṁ tyaktāḥ prāksvaṁ samīritam

यह तो असमर्थों की गति है कि बंधु-गुरुजनों के वचन से वे धर्म को त्याग देते हैं, जबकि पहले स्वयं घोषित प्रतिज्ञा को त्याग चुके होते हैं।

श्लोक 32 (skanda.2.29.32)

कृपया तीर्थगमनादार्यो यदि निवर्तयेत् । हतप्रतिज्ञं मां लोकाञ्जल्पतः को निवारयेत् ।

kṛpayā tīrthagamanādāryo yadi nivartayet hatapratijñaṁ māṁ lokāñjalpataḥ ko nivārayet

यदि आप उदारतावश दया करके मुझे तीर्थ-गमन से रोक दें, तो लोगों को यह कहने से कौन रोक सकेगा कि मेरी प्रतिज्ञा भंग हो गई?

श्लोक 33 (skanda.2.29.33)

ममापि तीर्थयात्रायां कौतुकोत्तरलं मनः । कर्तव्यं च स्मृतं राजन्नारदादिष्टशासनम् ।

mamāpi tīrthayātrāyāṁ kautukottaralaṁ manaḥ kartavyaṁ ca smṛtaṁ rājannāradādiṣṭaśāsanam

मेरा मन भी तीर्थयात्रा के लिए उत्सुकता से भरा है; और हे राजन्, स्मरण कीजिए कि यह नारद जी द्वारा निर्देशित नियम भी है।

श्लोक 34 (skanda.2.29.34)

तत्प्रसीद महाराज यत्तीर्थगमनोद्यमे । संमाननीयः प्रभुभिः समयो ह्यनुजीविनाम् ।

tatprasīda mahārāja yattīrthagamanodyame saṁmānanīyaḥ prabhubhiḥ samayo hyanujīvinām

इसलिए, हे महाराज, प्रसन्न होइए इस तीर्थ-गमन के प्रयास में — क्योंकि सेवकों की प्रतिज्ञा को स्वामियों द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए।"

श्लोक 35 (skanda.2.29.35)

तथेति भ्रातृभिः सार्द्धं कृतानुमतिरर्जुनः । अग्रजं तोषयामास प्रणामप्रश्रयादिभिः ।

tatheti bhrātṛbhiḥ sārddhaṁ kṛtānumatirarjunaḥ agrajaṁ toṣayāmāsa praṇāmapraśrayādibhiḥ

"ऐसा ही हो" कहकर, भाइयों की अनुमति प्राप्त कर अर्जुन ने प्रणाम और विनय आदि से अपने अग्रज को प्रसन्न किया।

श्लोक 36 (skanda.2.29.36)

यथार्हं भीमसेनादीन्भ्रातॄनामन्त्र्य पाण्डवः । कृतस्वस्त्ययनो भव्यैर्निर्ययौ धरणीसुरैः ।

yathārhaṁ bhīmasenādīnbhrātṝnāmantrya pāṇḍavaḥ kṛtasvastyayano bhavyairniryayau dharaṇīsuraiḥ

यथोचित रूप से भीमसेन आदि भाइयों से विदा लेकर, श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा स्वस्तिवाचन कराकर पांडव-पुत्र चल पड़े।

श्लोक 37 (skanda.2.29.37)

पौराणिका ज्यौतिषिका भिषजो धरणीसुराः । अनुजग्मुर्भृत्यगणाः शिल्पिनः सूतमागधाः ।

paurāṇikā jyautiṣikā bhiṣajo dharaṇīsurāḥ anujagmurbhṛtyagaṇāḥ śilpinaḥ sūtamāgadhāḥ

पुराणकार, ज्योतिषी, वैद्य और ब्राह्मण उनके पीछे-पीछे चले, साथ ही सेवक-समूह, शिल्पी, सूत और मागध भी।

श्लोक 38 (skanda.2.29.38)

युधिष्ठिराज्ञया तस्य भोगत्यागक्षमं धनम् । गृहीत्वानुययुः स्निग्धाः सभ्याः कोशाधिकारिणः ।

yudhiṣṭhirājñayā tasya bhogatyāgakṣamaṁ dhanam gṛhītvānuyayuḥ snigdhāḥ sabhyāḥ kośādhikāriṇaḥ

युधिष्ठिर की आज्ञा से, स्नेही सभासद और कोषाधिकारी, भोग और दान दोनों के लिए पर्याप्त धन लेकर उनके साथ गए।

श्लोक 39 (skanda.2.29.39)

स राजपुत्रः प्रथमं प्राप्य भागीरथीं नदीम् । गंगाद्वारं प्रयागं च सिषेवे काशिकामपि ।

sa rājaputraḥ prathamaṁ prāpya bhāgīrathīṁ nadīm gaṁgādvāraṁ prayāgaṁ ca siṣeve kāśikāmapi

वह राजकुमार पहले भागीरथी (गंगा) नदी को प्राप्त कर, गंगाद्वार, प्रयाग और काशी की भी सेवा करते हुए,

श्लोक 40 (skanda.2.29.40)

पश्यंस्तीर्थानि जाह्नव्यास्तत्तीरोपान्तवर्त्मना । आससाद समुत्तुङ्गकल्लोलं दक्षिणोदधिम् ।

paśyaṁstīrthāni jāhnavyāstattīropāntavartmanā āsasāda samuttuṅgakallolaṁ dakṣiṇodadhim

जाह्नवी के तट के निकटवर्ती मार्ग से तीर्थों को देखते हुए, ऊँची लहरों वाले दक्षिण समुद्र तक पहुँचे,

श्लोक 41 (skanda.2.29.41)

महानदीं महापुण्यां प्रसिद्धं पुरुषोत्तमम् । सिंहाचलं च संवीक्ष्य प्राप्तवान्कृतकृत्यताम् ।

mahānadīṁ mahāpuṇyāṁ prasiddhaṁ puruṣottamam siṁhācalaṁ ca saṁvīkṣya prāptavānkṛtakṛtyatām

और महान, अत्यंत पवित्र नदी, प्रसिद्ध पुरुषोत्तम क्षेत्र तथा सिंहाचल को देखकर कृतार्थता प्राप्त की।

श्लोक 42 (skanda.2.29.42)

ततो ददर्श कौन्तेयः पुण्यां गोदावरीं नदीम् । समस्तदुरितव्रातशातनोत्तीर्णगौरवाम् ।

tato dadarśa kaunteyaḥ puṇyāṁ godāvarīṁ nadīm samastaduritavrātaśātanottīrṇagauravām

फिर कुंतीपुत्र ने पुण्य गोदावरी नदी को देखा, जो समस्त पाप-समूहों के नाश से गौरव प्राप्त करने वाली है।

श्लोक 43 (skanda.2.29.43)

कृताभिषेकस्तत्तोयैर्विधिवत्पाण्डुनन्दनः । प्रमोदं विविधैर्दानैरकरोद्भूसुवर्णकैः ।

kṛtābhiṣekastattoyairvidhivatpāṇḍunandanaḥ pramodaṁ vividhairdānairakarodbhūsuvarṇakaiḥ

उस जल से विधिपूर्वक स्नान कर, पांडु-नंदन ने भूमि और स्वर्ण के विविध दानों से आनंद प्राप्त किया।

श्लोक 44 (skanda.2.29.44)

नदीं मलापहाख्यां च दृष्ट्वा मोदं ययौ शुभम् । ततः समाससादासौ कृष्णवेणीं सरिद्वराम् ।

nadīṁ malāpahākhyāṁ ca dṛṣṭvā modaṁ yayau śubham tataḥ samāsasādāsau kṛṣṇaveṇīṁ saridvarām

मलापहा नामक नदी को देखकर शुभ आनंद को प्राप्त हुए; फिर वे श्रेष्ठ कृष्णवेणी नदी पर पहुँचे,

श्लोक 45 (skanda.2.29.45)

शिवस्य नियतावासं चतुर्द्वारसमन्वितम् । नानातीर्थगणाकीर्णं श्रीपर्वतमवैक्षत ।

śivasya niyatāvāsaṁ caturdvārasamanvitam nānātīrthagaṇākīrṇaṁ śrīparvatamavaikṣata

और चार द्वारों से युक्त, नाना तीर्थ-समूहों से भरा हुआ, शिव का नित्य निवास श्रीपर्वत देखा।

श्लोक 46 (skanda.2.29.46)

नदीं पिनाकिनीं तीर्त्वा गत्वा देवर्षिसेवितम् । नारायणप्रियावासमपश्यद्वेंकटाचलम् ।

nadīṁ pinākinīṁ tīrtvā gatvā devarṣisevitam nārāyaṇapriyāvāsamapaśyadveṁkaṭācalam

पिनाकिनी नदी को पार कर, देवर्षियों से सेवित नारायण-प्रिय वेंकटाचल पर्वत को उन्होंने देखा।

श्लोक 47 (skanda.2.29.47)

शृङ्गेऽस्य भूभृतस्तुंगे स्थितं लोकैकनायकम् । अपूजयद्धरिं भक्त्या प्रसिद्धं शुभसिद्धये ।

śṛṅge'sya bhūbhṛtastuṁge sthitaṁ lokaikanāyakam apūjayaddhariṁ bhaktyā prasiddhaṁ śubhasiddhaye

इस पर्वत के ऊँचे शिखर पर स्थित, लोकैकनायक, प्रसिद्ध हरि की भक्तिपूर्वक शुभ-सिद्धि के लिए पूजा की।

श्लोक 48 (skanda.2.29.48)

अवरुह्य वेंकटमहाद्रिशृङ्गतः स ददर्श सिद्धमुनिसंघसेविताम् । कलशोद्भवेन मुनिना समाहृतां तटिनीं सुवर्णमुखरीसमाह्वयाम् ।

avaruhya veṁkaṭamahādriśṛṅgataḥ sa dadarśa siddhamunisaṁghasevitām kalaśodbhavena muninā samāhṛtāṁ taṭinīṁ suvarṇamukharīsamāhvayām

वेंकट महापर्वत के शिखर से उतरकर, उन्होंने सिद्धों और मुनि-समूहों से सेवित, कलशोद्भव मुनि (अगस्त्य) द्वारा लाई गई, स्वर्णमुखरी नामक नदी को देखा।

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30