Skip to main content

वैष्णव खण्ड · अध्याय 100

कार्तिकवैभववर्णनम्

अध्याय 99अध्याय-सूचीअध्याय 101

श्लोक 1 (skanda.2.100.1)

ब्रह्मोवाच । भूयः शृणुष्व विप्रेंद्र कार्तिकस्य च वैभवम् । दशमीदिनमारभ्य दशम्यां तु समापयेत्

brahmovāca bhūyaḥ śṛṇuṣva vipreṁdra kārtikasya ca vaibhavam daśamīdinamārabhya daśamyāṁ tu samāpayet

ब्रह्माजी ने कहा — हे विप्रेन्द्र, कार्तिक के वैभव को और सुनो। आश्विन की दशमी तिथि से आरम्भ करके कार्तिक की दशमी को समाप्त करना चाहिए,

श्लोक 2 (skanda.2.100.2)

पौर्णमासीं समारभ्य पौर्णमास्यां समापयेत् । आश्विनस्य हरिदिनीं समारभ्य तु भक्तिमान्

paurṇamāsīṁ samārabhya paurṇamāsyāṁ samāpayet āśvinasya haridinīṁ samārabhya tu bhaktimān

अथवा पूर्णिमा से आरम्भ करके पूर्णिमा को ही समाप्त करना चाहिए; अथवा भक्तिमान् पुरुष आश्विन की हरि-दिनी (एकादशी) से आरम्भ करे।

श्लोक 3 (skanda.2.100.3)

दामोदरं नमस्कृत्य कुर्यात्संकल्पमादितः । दामोदर नमस्तेऽस्तु सर्वपापविनाशन

dāmodaraṁ namaskṛtya kuryātsaṁkalpamāditaḥ dāmodara namaste'stu sarvapāpavināśana

दामोदर को नमस्कार करके सबसे पहले संकल्प करना चाहिए — "हे दामोदर, हे सर्वपापविनाशक, आपको नमस्कार हो;

श्लोक 4 (skanda.2.100.4)

कार्तिकस्य व्रतं कर्तुमनुज्ञां दातुमर्हसि । निर्विघ्नं कुरु देवेश आमासं पुरुषोत्तम

kārtikasya vrataṁ kartumanujñāṁ dātumarhasi nirvighnaṁ kuru deveśa āmāsaṁ puruṣottama

मुझे कार्तिक-व्रत करने की अनुज्ञा दीजिए। हे देवेश, हे पुरुषोत्तम, इस पूरे मास को निर्विघ्न कीजिए।"

श्लोक 5 (skanda.2.100.5)

इति संप्रार्थ्य विधिना कार्तिकव्रतमाचरेत् । अनूरुं वदता प्रोक्तं भास्करेण श्रुतं मया । कलौ च स्वर्गगमनकारणं श्रूयतां हि तत्

iti saṁprārthya vidhinā kārtikavratamācaret anūruṁ vadatā proktaṁ bhāskareṇa śrutaṁ mayā kalau ca svargagamanakāraṇaṁ śrūyatāṁ hi tat

इस प्रकार विधिपूर्वक प्रार्थना करके कार्तिक-व्रत करना चाहिए। यह अरुण से कहते हुए भास्कर (सूर्य) द्वारा कहा गया था, जो मैंने सुना है। कलियुग में स्वर्ग-प्राप्ति के इस कारण को भी सुनो।

श्लोक 6 (skanda.2.100.6)

सूर्य उवाच । द्वादशानां तु मासानां मार्गशीर्षोऽतिपुण्यदः

sūrya uvāca dvādaśānāṁ tu māsānāṁ mārgaśīrṣo'tipuṇyadaḥ

सूर्य ने कहा — बारह महीनों में मार्गशीर्ष अत्यन्त पुण्यदायक है;

श्लोक 7 (skanda.2.100.7)

तस्मात्पुण्यफलः प्रोक्तो वैशाखो नर्मदातटे । ततो लक्षगुणः प्रोक्तः प्रयागे माघमासकः

tasmātpuṇyaphalaḥ prokto vaiśākho narmadātaṭe tato lakṣaguṇaḥ proktaḥ prayāge māghamāsakaḥ

उससे भी अधिक पुण्यफल नर्मदा-तट पर वैशाख मास का कहा गया है; उससे भी लाख गुना अधिक प्रयाग में माघ मास का बताया गया है;

श्लोक 8 (skanda.2.100.8)

तस्मान्महाफलः प्रोक्तः कार्तिको जलमात्रके । एकतः सर्वदानानि व्रतानि नियमास्तथा

tasmānmahāphalaḥ proktaḥ kārtiko jalamātrake ekataḥ sarvadānāni vratāni niyamāstathā

उससे भी महाफलदायक केवल जल से स्नान करने पर भी कार्तिक मास कहा गया है। एक ओर सभी दान, व्रत तथा नियम,

श्लोक 9 (skanda.2.100.9)

एकतः कार्तिकस्नानं ब्रह्मणा तुलया धृतम् । संततिश्चैव संपत्तिः कलौ येषां प्रजायते

ekataḥ kārtikasnānaṁ brahmaṇā tulayā dhṛtam saṁtatiścaiva saṁpattiḥ kalau yeṣāṁ prajāyate

दूसरी ओर कार्तिक-स्नान — इन्हें स्वयं ब्रह्माजी ने तराजू पर तौलकर समान पाया है। जिनके यहाँ कलियुग में संतान और सम्पत्ति उत्पन्न होती है,

श्लोक 10 (skanda.2.100.10)

अवश्यं तैः कृतं विद्धि कार्तिकस्नानमादरात् । स्नानं च दीपदानं च तुलसीवनपालनम्

avaśyaṁ taiḥ kṛtaṁ viddhi kārtikasnānamādarāt snānaṁ ca dīpadānaṁ ca tulasīvanapālanam

जानो कि उन्होंने निश्चय ही आदरपूर्वक कार्तिक-स्नान किया है। स्नान, दीपदान तथा तुलसी-वन का पालन,

श्लोक 11 (skanda.2.100.11)

भूमिशय्या ब्रह्मचर्य्यं तथा द्विदलवर्जनम् । विष्णुसंकीर्तनं सत्यं पुराणश्रवणं तथा

bhūmiśayyā brahmacaryyaṁ tathā dvidalavarjanam viṣṇusaṁkīrtanaṁ satyaṁ purāṇaśravaṇaṁ tathā

भूमि पर शयन, ब्रह्मचर्य, दो दालों वाले अन्न का त्याग, विष्णु-संकीर्तन, सत्य-भाषण तथा पुराण-श्रवण —

श्लोक 12 (skanda.2.100.12)

कार्तिके मासि कुर्वंति जीवन्मुक्तास्त एव हि । न कार्तिकसमं धर्म्यमर्थ्यं नो कार्तिकात्परम्

kārtike māsi kurvaṁti jīvanmuktāsta eva hi na kārtikasamaṁ dharmyamarthyaṁ no kārtikātparam

जो लोग कार्तिक मास में यह सब करते हैं, वे निश्चय ही जीवनमुक्त हैं। कार्तिक के समान कोई धर्मकारक अथवा अर्थकारक साधन नहीं है, न ही कार्तिक से बढ़कर कुछ है;

श्लोक 13 (skanda.2.100.13)

न कार्तिकसमं काम्यं मोक्षदानं न कार्तिकात् । युधिष्ठिरेण धर्मार्थमर्थार्थं च ध्रुवेण च

na kārtikasamaṁ kāmyaṁ mokṣadānaṁ na kārtikāt yudhiṣṭhireṇa dharmārthamarthārthaṁ ca dhruveṇa ca

न कार्तिक के समान कोई कामप्रद है, न कार्तिक से बढ़कर कोई मोक्षदाता है। युधिष्ठिर ने धर्म के लिए, ध्रुव ने ऐश्वर्य के लिए,

श्लोक 14 (skanda.2.100.14)

श्रीकृष्णेन तु कामार्थं मोक्षार्थं नारदेन च । कृतमेतद्व्रतं तस्माच्छ्रेष्ठं कृष्णप्रियं च हि

śrīkṛṣṇena tu kāmārthaṁ mokṣārthaṁ nāradena ca kṛtametadvrataṁ tasmācchreṣṭhaṁ kṛṣṇapriyaṁ ca hi

श्रीकृष्ण ने काम के लिए तथा नारद ने मोक्ष के लिए यह व्रत किया था; इसलिए यह व्रत श्रेष्ठ तथा कृष्ण को अत्यन्त प्रिय है।

श्लोक 15 (skanda.2.100.15)

अरुण उवाच । ब्रूहि भास्कर सर्वात्मन्कदाऽऽरभ्य व्रतं कृतम् । सफलं जायते सम्यक्का च पूज्याऽत्र देवता

aruṇa uvāca brūhi bhāskara sarvātmankadā''rabhya vrataṁ kṛtam saphalaṁ jāyate samyakkā ca pūjyā'tra devatā

अरुण ने कहा — हे भास्कर, हे सर्वात्मन्, बताइए कि यह व्रत कब से आरम्भ करने पर पूर्ण रूप से सफल होता है, और यहाँ कौन-सी देवता पूजनीय है?

श्लोक 16 (skanda.2.100.16)

भास्कर उवाच । अहं विष्णुश्च शर्वश्च देवी विघ्नेश्वरस्तथा । एकोऽहं पंचधा जातो नाट्ये सूत्रधरो यथा

bhāskara uvāca ahaṁ viṣṇuśca śarvaśca devī vighneśvarastathā eko'haṁ paṁcadhā jāto nāṭye sūtradharo yathā

भास्कर ने कहा — मैं, विष्णु, शिव, देवी तथा विघ्नेश्वर — मैं ही एक होते हुए भी नाटक के सूत्रधार के समान पाँच रूपों में प्रकट हुआ हूँ।

श्लोक 17 (skanda.2.100.17)

अस्माकं सर्व एवैते भेदा विद्धि खगेश्वर । तस्मात्सौरैश्च गाणेशैः शाक्तैः शैवैश्च वैष्णवैः

asmākaṁ sarva evaite bhedā viddhi khageśvara tasmātsauraiśca gāṇeśaiḥ śāktaiḥ śaivaiśca vaiṣṇavaiḥ

हे खगेश्वर, जानो कि ये सब हमारे ही भेद हैं। इसलिए सौर, गाणपत्य, शाक्त, शैव तथा वैष्णव — सभी संप्रदायों वालों को

श्लोक 18 (skanda.2.100.18)

कर्तव्यं कार्तिकस्नानं सर्वपापापनुत्तये । सूर्यस्य प्रीतये कार्यं तुलासंस्थे दिवाकरे

kartavyaṁ kārtikasnānaṁ sarvapāpāpanuttaye sūryasya prītaye kāryaṁ tulāsaṁsthe divākare

सम्पूर्ण पापों की निवृत्ति के लिए कार्तिक-स्नान करना चाहिए। यह सूर्य के तुला राशि में रहते हुए, सूर्य की प्रसन्नता के लिए किया जाना चाहिए।

श्लोक 19 (skanda.2.100.19)

इषपूर्णां समारभ्य यावत्कार्तिकपूर्णिमा । तावत्स्नानं विधातव्यं शिवसंतुष्टये नरैः

iṣapūrṇāṁ samārabhya yāvatkārtikapūrṇimā tāvatsnānaṁ vidhātavyaṁ śivasaṁtuṣṭaye naraiḥ

आश्विन की पूर्णिमा से आरम्भ करके कार्तिक की पूर्णिमा तक, मनुष्यों को शिव की संतुष्टि के लिए स्नान करना चाहिए।

श्लोक 20 (skanda.2.100.20)

देवीपक्षं समारभ्य महारात्रिचतुर्दशी । तावत्स्नानं विधातव्यं देवी संप्रीयतामिति

devīpakṣaṁ samārabhya mahārātricaturdaśī tāvatsnānaṁ vidhātavyaṁ devī saṁprīyatāmiti

देवी-पक्ष से आरम्भ करके महारात्रि (नवरात्रि) की चतुर्दशी तक, "देवी प्रसन्न हों" ऐसा सोचकर स्नान करना चाहिए।

श्लोक 21 (skanda.2.100.21)

गणपक्षं समारभ्य कृष्णा या कार्तिके भवेत् । चतुर्थी तावदेव स्यात्स्नानं गणपतुष्टये

gaṇapakṣaṁ samārabhya kṛṣṇā yā kārtike bhavet caturthī tāvadeva syātsnānaṁ gaṇapatuṣṭaye

गणपति-पक्ष से आरम्भ करके कार्तिक की जो कृष्ण चतुर्थी हो, वहाँ तक गणपति की संतुष्टि के लिए स्नान करना चाहिए।

श्लोक 22 (skanda.2.100.22)

एकादशीं समारभ्य आश्विनस्याऽसितेतराम् । एकादश्यां कार्तिकस्य शुक्लायां परिपूर्यते । कृतं येन तु तस्य स्यात्परितुष्टो जनार्दनः

ekādaśīṁ samārabhya āśvinasyā'sitetarām ekādaśyāṁ kārtikasya śuklāyāṁ paripūryate kṛtaṁ yena tu tasya syātparituṣṭo janārdanaḥ

आश्विन की शुक्ल एकादशी से आरम्भ करके कार्तिक की शुक्ल एकादशी को यह पूर्ण होता है; जो ऐसा करता है, उससे भगवान् जनार्दन अत्यन्त संतुष्ट होते हैं।

श्लोक 23 (skanda.2.100.23)

न कार्तिकसमो मासो न काशीसदृशी पुरी । न प्रयागसमं तीर्थं न देवः केशवात्परः

na kārtikasamo māso na kāśīsadṛśī purī na prayāgasamaṁ tīrthaṁ na devaḥ keśavātparaḥ

कार्तिक के समान कोई मास नहीं, काशी के समान कोई नगरी नहीं, प्रयाग के समान कोई तीर्थ नहीं, तथा केशव से बढ़कर कोई देवता नहीं है।

श्लोक 24 (skanda.2.100.24)

प्रसंगाद्वा बलात्कारैर्ज्ञात्वाज्ञात्वा कृतं भवेत् । स्नानं कार्तिकमासस्य न पश्येद्यमयातनाम्

prasaṁgādvā balātkārairjñātvājñātvā kṛtaṁ bhavet snānaṁ kārtikamāsasya na paśyedyamayātanām

चाहे आकस्मिक रूप से हो, चाहे विवशता से, चाहे जानते हुए या अनजाने में किया गया हो, कार्तिक मास का स्नान मनुष्य को यम की यातना नहीं देखने देता।

श्लोक 25 (skanda.2.100.25)

स्नानार्थं चेन्न सामर्थ्यं दत्वान्यस्मै धनादिकम् । स्नातस्य तस्य हस्तस्य ग्रहणा पुण्यभाग्भवेत्

snānārthaṁ cenna sāmarthyaṁ datvānyasmai dhanādikam snātasya tasya hastasya grahaṇā puṇyabhāgbhavet

यदि स्वयं स्नान करने की सामर्थ्य न हो, तो किसी अन्य को धन आदि देकर, स्नान कर चुके उस व्यक्ति का हाथ पकड़ लेने मात्र से भी पुण्य का भागी हो सकता है।

श्लोक 26 (skanda.2.100.26)

अथवा कार्तिकस्नानं ये कुर्वंति द्विजातयः । तेषां प्रावरणं दत्त्वा स्नानजं फलमाप्नुयात्

athavā kārtikasnānaṁ ye kurvaṁti dvijātayaḥ teṣāṁ prāvaraṇaṁ dattvā snānajaṁ phalamāpnuyāt

अथवा जो द्विजाति कार्तिक-स्नान करते हैं, उन्हें ओढ़ने का वस्त्र देकर भी स्नान से उत्पन्न फल प्राप्त किया जा सकता है।

श्लोक 27 (skanda.2.100.27)

राधादामोदरः पूज्यः कार्तिके तु विशेषतः । स्वर्णस्य वाथ रौप्यस्याऽप्यभावे शुल्बजामपि । मृज्जां वा चित्रजातां वाऽथ वा पिष्टविचित्रिताम्

rādhādāmodaraḥ pūjyaḥ kārtike tu viśeṣataḥ svarṇasya vātha raupyasyā'pyabhāve śulbajāmapi mṛjjāṁ vā citrajātāṁ vā'tha vā piṣṭavicitritām

कार्तिक में विशेषतः राधा-दामोदर की पूजा करनी चाहिए — सोने की, अथवा उसके अभाव में चाँदी की, अथवा ताँबे की, अथवा मिट्टी की, चित्रित की हुई, अथवा आटे से बनाई हुई सुंदर मूर्ति की भी।

श्लोक 28 (skanda.2.100.28)

दामोदरस्य राधायास्तुलस्यधोऽर्चयंति ये । मूर्तिं ते तु नरा ज्ञेया जीवन्मुक्ता न संशयः

dāmodarasya rādhāyāstulasyadho'rcayaṁti ye mūrtiṁ te tu narā jñeyā jīvanmuktā na saṁśayaḥ

जो लोग तुलसी के नीचे दामोदर और राधा की मूर्ति का पूजन करते हैं, उन मनुष्यों को जीवनमुक्त ही समझना चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 29 (skanda.2.100.29)

अपि पापसहस्राढ्यः कार्तिकस्नानतो नरः । मुक्तोऽवश्यं स भवति नाऽत्र कार्या विचारणा

api pāpasahasrāḍhyaḥ kārtikasnānato naraḥ mukto'vaśyaṁ sa bhavati nā'tra kāryā vicāraṇā

सहस्र पापों से युक्त मनुष्य भी कार्तिक-स्नान से निश्चय ही मुक्त हो जाता है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

श्लोक 30 (skanda.2.100.30)

तुलस्यभावे कर्तव्या पूजा धात्रीतले खग । मुख्यपूजाविधानं तु कर्तव्यं सूर्यमंडले

tulasyabhāve kartavyā pūjā dhātrītale khaga mukhyapūjāvidhānaṁ tu kartavyaṁ sūryamaṁḍale

हे खगेश्वर, तुलसी के अभाव में धात्री वृक्ष के नीचे पूजा करनी चाहिए; परन्तु मुख्य पूजा-विधान सूर्य-मंडल का ही करना चाहिए।

श्लोक 31 (skanda.2.100.31)

अप्रत्यक्षाः सर्वदेवाः प्रत्यक्षो भगवानयम् । सर्वे देवाः कालवशाः कालकालो दिवाकरः

apratyakṣāḥ sarvadevāḥ pratyakṣo bhagavānayam sarve devāḥ kālavaśāḥ kālakālo divākaraḥ

सम्पूर्ण देवता अप्रत्यक्ष हैं, केवल यह भगवान् (सूर्य) ही प्रत्यक्ष हैं। सभी देवता काल के अधीन हैं, परन्तु सूर्य स्वयं काल के भी काल हैं।

श्लोक 32 (skanda.2.100.32)

एतदाराधनेऽशक्तः प्रतिमां पूजयेन्नरः । प्रतिमातोऽधिकं पुण्यं ब्राह्मणस्य तु पूजने

etadārādhane'śaktaḥ pratimāṁ pūjayennaraḥ pratimāto'dhikaṁ puṇyaṁ brāhmaṇasya tu pūjane

इस प्रकार आराधना करने में असमर्थ मनुष्य को प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए; परन्तु प्रतिमा-पूजन से भी अधिक पुण्य ब्राह्मण के पूजन में है।

श्लोक 33 (skanda.2.100.33)

दरिद्रो दानपात्रं स्याद्विद्यावांस्तु विशेषतः । विप्राभावे पूजनीया गावः कृष्णा मनोहराः

daridro dānapātraṁ syādvidyāvāṁstu viśeṣataḥ viprābhāve pūjanīyā gāvaḥ kṛṣṇā manoharāḥ

निर्धन ब्राह्मण भी दान-पात्र है, विशेषतः विद्वान् ब्राह्मण; और ब्राह्मण के अभाव में सुंदर काली गायों की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 34 (skanda.2.100.34)

विष्णोर्मूर्तिर्जंगमतः स्थावरा तु प्रशस्यते । शूद्रस्थापितमूर्तीनां नमस्कारं करोति यः । पितृभिर्निरयं याति दशपूर्वैर्दशापरैः

viṣṇormūrtirjaṁgamataḥ sthāvarā tu praśasyate śūdrasthāpitamūrtīnāṁ namaskāraṁ karoti yaḥ pitṛbhirnirayaṁ yāti daśapūrvairdaśāparaiḥ

विष्णु की चल मूर्ति से भी स्थिर (स्थापित) मूर्ति श्रेष्ठ मानी गई है। जो व्यक्ति शूद्र द्वारा स्थापित मूर्तियों को नमस्कार करता है, वह अपने दस पूर्व और दस उत्तर पीढ़ियों के पितरों सहित नरक को जाता है।

श्लोक 35 (skanda.2.100.35)

शूद्रार्चितस्य संस्पर्शाद्दहेदासप्तमं कुलम् । तस्माद्विचार्य्य विप्रैर्या स्थापिता तां समर्चयेत् । ततोऽपि या देवताभिः कृता सा भुक्तिमुक्तिदा

śūdrārcitasya saṁsparśāddahedāsaptamaṁ kulam tasmādvicāryya viprairyā sthāpitā tāṁ samarcayet tato'pi yā devatābhiḥ kṛtā sā bhuktimuktidā

शूद्र द्वारा पूजित मूर्ति के स्पर्श मात्र से सात पीढ़ियों तक का कुल जल जाता है। इसलिए विचारपूर्वक जो मूर्ति ब्राह्मणों द्वारा स्थापित हो, उसी की पूजा करनी चाहिए; और उससे भी अधिक फलदायी वह मूर्ति है जो स्वयं देवताओं द्वारा स्थापित हो, जो भोग और मोक्ष दोनों देने वाली है।

श्लोक 36 (skanda.2.100.36)

मूर्त्यभावे पूजनीयोऽश्वत्थो वाऽथ वटोऽथ वा । अश्वत्थरूपी विष्णुः स्याद्वटरूपी शिवो यतः

mūrtyabhāve pūjanīyo'śvattho vā'tha vaṭo'tha vā aśvattharūpī viṣṇuḥ syādvaṭarūpī śivo yataḥ

मूर्ति के अभाव में अश्वत्थ अथवा वट वृक्ष की पूजा करनी चाहिए; क्योंकि अश्वत्थ विष्णु का ही रूप है और वट शिव का रूप है।

श्लोक 37 (skanda.2.100.37)

कार्तिके तुलसीशाकं तांबूलं वा नराधमः । अज्ञानाज्ज्ञानतो वाऽपि भुञ्जानो निरयं व्रजेत्

kārtike tulasīśākaṁ tāṁbūlaṁ vā narādhamaḥ ajñānājjñānato vā'pi bhuñjāno nirayaṁ vrajet

नराधम मनुष्य जो कार्तिक में तुलसी को शाक के रूप में अथवा पान खाता है, चाहे जानकर या अनजाने में, वह नरक को जाता है।

श्लोक 38 (skanda.2.100.38)

शालिग्रामशिलाचक्रे नित्यं सन्निहितो हरिः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शालिग्रामं प्रपूजयेत्

śāligrāmaśilācakre nityaṁ sannihito hariḥ tasmātsarvaprayatnena śāligrāmaṁ prapūjayet

शालिग्राम शिला के चक्र में स्वयं हरि सदा विराजमान रहते हैं; इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से शालिग्राम की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 39 (skanda.2.100.39)

रुद्रशापवशाद्गावो विष्ठाभक्षणतत्पराः । तथाऽपि ताः पूजनीया लोकद्वयफलप्रदाः

rudraśāpavaśādgāvo viṣṭhābhakṣaṇatatparāḥ tathā'pi tāḥ pūjanīyā lokadvayaphalapradāḥ

रुद्र के शाप के कारण गायें विष्ठा खाने में तत्पर हो गई हैं, फिर भी वे पूजनीय हैं, क्योंकि वे दोनों लोकों का फल देने वाली हैं।

श्लोक 40 (skanda.2.100.40)

ब्रह्मांऽशकसमुद्भूते पालाशे यस्तु भोजनम् । कुर्यात्कार्तिकमासेऽसौ विष्णुलोकं प्रयास्यति

brahmāṁ'śakasamudbhūte pālāśe yastu bhojanam kuryātkārtikamāse'sau viṣṇulokaṁ prayāsyati

जो कार्तिक मास में ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न पलाश के पत्ते पर भोजन करता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 41 (skanda.2.100.41)

अश्वत्थरूपी भगवान्वटरूपी सदाशिवः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कार्तिकेऽश्वत्थमर्चयेत्

aśvattharūpī bhagavānvaṭarūpī sadāśivaḥ tasmātsarvaprayatnena kārtike'śvatthamarcayet

भगवान् अश्वत्थ के रूप में तथा सदाशिव वट के रूप में विराजते हैं; इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से कार्तिक में अश्वत्थ की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 42 (skanda.2.100.42)

या नारी कार्तिके मासि लक्षं कुर्यात्प्रदक्षिणाः । राधादामोदरं पूज्य मन्दवारे च तत्तले

yā nārī kārtike māsi lakṣaṁ kuryātpradakṣiṇāḥ rādhādāmodaraṁ pūjya mandavāre ca tattale

जो स्त्री कार्तिक मास में राधा-दामोदर की पूजा करके शनिवार को उनके तले (वृक्ष की जड़ में) एक लाख प्रदक्षिणाएँ करती है,

श्लोक 43 (skanda.2.100.43)

दम्पती भोजयेद्राधादामोदरस्वरूपिणौ । भोजयित्वा सपत्नीकान्पश्चाद्भुंजीत वाग्यतः

dampatī bhojayedrādhādāmodarasvarūpiṇau bhojayitvā sapatnīkānpaścādbhuṁjīta vāgyataḥ

उसे राधा-दामोदर के स्वरूप माने गए दम्पति को भोजन कराना चाहिए; उन्हें उनकी पत्नियों सहित भोजन कराकर, तत्पश्चात् मौन होकर स्वयं भोजन करे।

श्लोक 44 (skanda.2.100.44)

वन्ध्याऽपि लभते पुत्रमितरासां तु का कथा । सदा सन्निहितो विष्णुर्द्विपत्सु ब्राह्मणे यथा

vandhyā'pi labhate putramitarāsāṁ tu kā kathā sadā sannihito viṣṇurdvipatsu brāhmaṇe yathā

वंध्या स्त्री भी इससे पुत्र प्राप्त करती है, फिर अन्य स्त्रियों की तो बात ही क्या! क्योंकि विष्णु सदा दो पैरों वाले प्राणियों में — जैसे ब्राह्मण में —,

श्लोक 45 (skanda.2.100.45)

बोधिद्रुमे पादपेषु शालिग्रामे शिलासु च । तस्मादश्वत्थमूले वै कर्तव्यं विष्णुपूजनम्

bodhidrume pādapeṣu śāligrāme śilāsu ca tasmādaśvatthamūle vai kartavyaṁ viṣṇupūjanam

बोधि-वृक्ष में तथा शालिग्राम की शिलाओं में विराजमान रहते हैं; इसलिए अश्वत्थ वृक्ष के मूल में ही विष्णु-पूजन करना चाहिए।

श्लोक 46 (skanda.2.100.46)

अश्वत्थपूजा स्पर्शेन कर्त्तव्या शनिवासरे । अन्यवारेऽश्वत्थसंगाद्दरिद्रो जायते नरः

aśvatthapūjā sparśena karttavyā śanivāsare anyavāre'śvatthasaṁgāddaridro jāyate naraḥ

अश्वत्थ की स्पर्श-पूजा शनिवार को ही करनी चाहिए; अन्य दिनों में अश्वत्थ का स्पर्श करने से मनुष्य निर्धन हो जाता है।

श्लोक 47 (skanda.2.100.47)

स्नानं जागरणं दीपं तुलसीवनपालनम् । कार्तिके मासि कुर्वंति ते नरा विष्णुमूर्तयः

snānaṁ jāgaraṇaṁ dīpaṁ tulasīvanapālanam kārtike māsi kurvaṁti te narā viṣṇumūrtayaḥ

स्नान, जागरण, दीप तथा तुलसी-वन का पालन — जो मनुष्य कार्तिक मास में यह सब करते हैं, वे स्वयं विष्णु के ही स्वरूप हो जाते हैं।

श्लोक 48 (skanda.2.100.48)

संमार्जनं विष्णुगृहे स्वस्तिकादिनिवेदनम् । विष्णोः पूजां च ये कुर्युर्जीवन्मुक्तास्तु ते नराः

saṁmārjanaṁ viṣṇugṛhe svastikādinivedanam viṣṇoḥ pūjāṁ ca ye kuryurjīvanmuktāstu te narāḥ

विष्णु-मन्दिर में झाड़ू-बुहारी करना, स्वस्तिक आदि अंकित करना, तथा विष्णु का पूजन करना — जो लोग यह करते हैं, वे मनुष्य जीवनमुक्त हैं।

श्लोक 49 (skanda.2.100.49)

स्नानकालं प्रवक्ष्यामि तीर्थादिषु च यत्फलम् । स्नानधर्माश्च ये केचित्तान्सर्वान्मे निबोधत

snānakālaṁ pravakṣyāmi tīrthādiṣu ca yatphalam snānadharmāśca ye kecittānsarvānme nibodhata

अब मैं स्नान का उचित समय तथा तीर्थादि में स्नान से प्राप्त होने वाला फल बताऊँगा; स्नान से सम्बन्धित जो भी नियम हैं, वे सब मुझसे सुनो।

अध्याय 99अध्याय-सूचीअध्याय 101