वैष्णव खण्ड · अध्याय 101
कार्तिकस्नानविधिनिरूपणम्
श्लोक 1 (skanda.2.101.1)
ब्रह्मोवाच । नाडीद्वयावशिष्टायां रात्र्यां गच्छेज्जलाशयम् । तुलसीमृत्तिकायुक्तः सवस्त्रकलशो मुने
brahmovāca nāḍīdvayāvaśiṣṭāyāṁ rātryāṁ gacchejjalāśayam tulasīmṛttikāyuktaḥ savastrakalaśo mune
ब्रह्माजी ने कहा — जब रात्रि में दो घड़ी शेष रहे, तब हे मुने, तुलसी, मिट्टी, वस्त्र तथा कलश लेकर जलाशय की ओर जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.2.101.2)
आगत्य तोयनिकटे तीरे संस्थाप्य पात्रकम् । पादप्रक्षालनं कृत्वा देशकालादि चोच्चरेत्
āgatya toyanikaṭe tīre saṁsthāpya pātrakam pādaprakṣālanaṁ kṛtvā deśakālādi coccaret
जल के निकट तट पर आकर पात्र को स्थापित करके, पैर धोकर देश-काल आदि का उच्चारण करना चाहिए।
श्लोक 3 (skanda.2.101.3)
स्मरेद्गंगादिका नद्यो विष्णुशर्वादिदेवताः । नाभिमात्रे जले स्थित्वा मंत्रमेतमुदीरयेत्
smaredgaṁgādikā nadyo viṣṇuśarvādidevatāḥ nābhimātre jale sthitvā maṁtrametamudīrayet
गंगा आदि नदियों तथा विष्णु, शिव आदि देवताओं का स्मरण करना चाहिए; नाभि तक जल में खड़े होकर यह मंत्र बोलना चाहिए —
श्लोक 4 (skanda.2.101.4)
कार्तिकेऽहं करिष्यामि प्रातःस्नानं जनार्दन । प्रीत्यर्थं तव देवेश दामोदर मया सह
kārtike'haṁ kariṣyāmi prātaḥsnānaṁ janārdana prītyarthaṁ tava deveśa dāmodara mayā saha
"हे जनार्दन, मैं कार्तिक में प्रातःस्नान करूँगा; हे देवेश दामोदर, आपकी प्रसन्नता के लिए, आपके साथ ही —
श्लोक 5 (skanda.2.101.5)
नित्ये नैमित्तिके कृत्वा कार्तिके पापनाशन । स्नानं चार्घं प्रदास्यामि निर्विघ्नं कुरु केशव
nitye naimittike kṛtvā kārtike pāpanāśana snānaṁ cārghaṁ pradāsyāmi nirvighnaṁ kuru keśava
— नित्य और नैमित्तिक कर्म करके, हे पापनाशन, कार्तिक में स्नान और अर्घ्य प्रदान करूँगा; हे केशव, इसे निर्विघ्न कीजिए।"
श्लोक 6 (skanda.2.101.6)
तीर्थादिदेवताभ्यश्च क्रमादर्घ्यादि दापयेत् । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं राधया सहितो हरे
tīrthādidevatābhyaśca kramādarghyādi dāpayet gṛhāṇārghyaṁ mayā dattaṁ rādhayā sahito hare
तत्पश्चात् तीर्थों तथा अन्य देवताओं को क्रमशः अर्घ्य आदि अर्पित करना चाहिए — "हे हरि, राधा सहित मेरे द्वारा दिया गया यह अर्घ्य ग्रहण कीजिए;
श्लोक 7 (skanda.2.101.7)
नमः कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते
namaḥ kamalanābhāya namaste jalaśāyine namaste'stu hṛṣīkeśa gṛhāṇārghyaṁ namo'stu te
कमलनाभ को नमस्कार, जलशायी को नमस्कार; हे हृषीकेश, आपको नमस्कार हो, अर्घ्य ग्रहण कीजिए, आपको नमस्कार हो।"
श्लोक 8 (skanda.2.101.8)
व्रतिनः कार्तिके मासि स्नातस्य विधिवन्मम । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं दनुजेंद्रनिषूदन
vratinaḥ kārtike māsi snātasya vidhivanmama gṛhāṇārghyaṁ mayā dattaṁ danujeṁdraniṣūdana
"हे दनुजेंद्रनिषूदन, कार्तिक मास में विधिपूर्वक स्नान करने वाले, इस व्रती द्वारा दिया गया अर्घ्य ग्रहण कीजिए।"
श्लोक 9 (skanda.2.101.9)
किरणा धूतपापा च पुण्यतोया सरस्वती । गंगा च यमुना चैव पंचनद्यः पुनंतु माम्
kiraṇā dhūtapāpā ca puṇyatoyā sarasvatī gaṁgā ca yamunā caiva paṁcanadyaḥ punaṁtu mām
"किरणा, धूतपापा, पुण्यजला सरस्वती, गंगा तथा यमुना — ये पाँच नदियाँ मुझे पवित्र करें।"
श्लोक 10 (skanda.2.101.10)
अन्यासां च नदीनां च दद्यादर्घ्यं यथाविधि । जाह्नवीस्मरणं कुर्यात्सर्वतीर्थेषु मानवः
anyāsāṁ ca nadīnāṁ ca dadyādarghyaṁ yathāvidhi jāhnavīsmaraṇaṁ kuryātsarvatīrtheṣu mānavaḥ
अन्य नदियों को भी विधिपूर्वक अर्घ्य देना चाहिए; मनुष्य को सम्पूर्ण तीर्थों में गंगा (जाह्नवी) का ही स्मरण करना चाहिए —
श्लोक 11 (skanda.2.101.11)
नान्यत्तीर्थं तु जाह्नव्यां स्मरणीयं कदाचन । एतान्मंत्रान्समुच्चार्य मलस्नानं समाचरेत्
nānyattīrthaṁ tu jāhnavyāṁ smaraṇīyaṁ kadācana etānmaṁtrānsamuccārya malasnānaṁ samācaret
— गंगा में स्नान करते समय कभी भी किसी अन्य तीर्थ का स्मरण नहीं करना चाहिए। इन मंत्रों का उच्चारण करके मलशुद्धि-स्नान करना चाहिए,
श्लोक 12 (skanda.2.101.12)
मृत्स्नानं च पितृस्नानं गुरुस्नानं ततः परम् । ततस्तु पावमानीभिरभिषिंचेत्स्वमस्तकम्
mṛtsnānaṁ ca pitṛsnānaṁ gurusnānaṁ tataḥ param tatastu pāvamānībhirabhiṣiṁcetsvamastakam
फिर मिट्टी से स्नान, पितरों के लिए स्नान, तत्पश्चात् गुरु के लिए स्नान; फिर पावमानी मंत्रों से अपने सिर पर जल छिड़कना चाहिए।
श्लोक 13 (skanda.2.101.13)
अघमर्षणकं कृत्वा स्नानांगं तर्पणं तथा । ततः पुरुषसूक्तेन जलं शिरसि सिंचयेत्
aghamarṣaṇakaṁ kṛtvā snānāṁgaṁ tarpaṇaṁ tathā tataḥ puruṣasūktena jalaṁ śirasi siṁcayet
अघमर्षण-मंत्र का पाठ करके, स्नान का अंग-रूप तर्पण करके, तत्पश्चात् पुरुषसूक्त से सिर पर जल सींचना चाहिए।
श्लोक 14 (skanda.2.101.14)
ततस्तु बहिरागत्य तीर्थं शिरसि निक्षिपेत् । तीर्थं पीत्वा त्रिवारं तु तुलसीं गृह्य पाणिना
tatastu bahirāgatya tīrthaṁ śirasi nikṣipet tīrthaṁ pītvā trivāraṁ tu tulasīṁ gṛhya pāṇinā
तत्पश्चात् बाहर आकर सिर पर तीर्थ-जल रखना चाहिए; तीन बार तीर्थ-जल पीकर तथा हाथ में तुलसी लेकर,
श्लोक 15 (skanda.2.101.15)
ततो जलाद्विनिष्क्रम्य चांचलं पीडयेद्बहिः । यन्मया दूषितं तोयं शारीरमलसंचयैः
tato jalādviniṣkramya cāṁcalaṁ pīḍayedbahiḥ yanmayā dūṣitaṁ toyaṁ śārīramalasaṁcayaiḥ
जल से बाहर निकलकर वस्त्र के छोर को बाहर निचोड़ना चाहिए — "जो जल मेरे शरीर के मल-संचय से दूषित हुआ है,
श्लोक 16 (skanda.2.101.16)
तद्दोषपरिहारार्थं यक्ष्मणं तर्पयाम्यहम् । वस्त्रनिष्पीडनं कृत्वा कुर्याच्च तिलकादिकम्
taddoṣaparihārārthaṁ yakṣmaṇaṁ tarpayāmyaham vastraniṣpīḍanaṁ kṛtvā kuryācca tilakādikam
— उस दोष के निवारण के लिए मैं यक्ष्म को यह तर्पण देता हूँ।" वस्त्र निचोड़कर तिलक आदि करना चाहिए।
श्लोक 17 (skanda.2.101.17)
सूत उवाच । शृणुध्वमृषयः सर्वे कार्तिकस्नानजं फलम् । अरुणं प्रति सूर्येण यदुक्तं च सविस्तरम्
sūta uvāca śṛṇudhvamṛṣayaḥ sarve kārtikasnānajaṁ phalam aruṇaṁ prati sūryeṇa yaduktaṁ ca savistaram
सूत ने कहा — हे सभी ऋषियो, सुनिए कार्तिक-स्नान से उत्पन्न फल, जो सूर्य ने अरुण से विस्तारपूर्वक कहा था।
श्लोक 18 (skanda.2.101.18)
अरुण उवाच । कस्मिंस्तीर्थे विशेषेण फलं कार्तिकसंभवम् । क्षेत्रे वा एतदाऽऽख्याहि भगवन्स्नानयोगतः
aruṇa uvāca kasmiṁstīrthe viśeṣeṇa phalaṁ kārtikasaṁbhavam kṣetre vā etadā''khyāhi bhagavansnānayogataḥ
अरुण ने कहा — हे भगवन्, किस तीर्थ में अथवा किस क्षेत्र में कार्तिक-स्नान से उत्पन्न फल विशेष रूप से प्राप्त होता है, यह बताइए।
श्लोक 19 (skanda.2.101.19)
सूर्य उवाच । यत्र कुत्राऽपि कर्तव्यं जले स्नानं तु कार्तिकं । उष्णोदकेन कर्तव्यं स्नानं कुत्राऽपि कार्तिके
sūrya uvāca yatra kutrā'pi kartavyaṁ jale snānaṁ tu kārtikaṁ uṣṇodakena kartavyaṁ snānaṁ kutrā'pi kārtike
सूर्य ने कहा — कार्तिक में जल-स्नान कहीं भी करना चाहिए; परन्तु कार्तिक में गरम जल से स्नान कहीं भी नहीं करना चाहिए।
श्लोक 20 (skanda.2.101.20)
ततो दशगुणं पुण्यं शीततोयनिमज्जनात् । ततः शतगुणं पुण्यं बहिः कूपोदके कृतम्
tato daśaguṇaṁ puṇyaṁ śītatoyanimajjanāt tataḥ śataguṇaṁ puṇyaṁ bahiḥ kūpodake kṛtam
ठंडे जल में डुबकी लगाने से दस गुना पुण्य होता है; घर से बाहर के कुएँ के जल में स्नान करने से सौ गुना पुण्य होता है।
श्लोक 21 (skanda.2.101.21)
कूपात्सहस्रगुणितं फलं वापीनिषेकतः । ततोऽयुतगुणं पुण्यं तडागस्नानतो भवेत्
kūpātsahasraguṇitaṁ phalaṁ vāpīniṣekataḥ tato'yutaguṇaṁ puṇyaṁ taḍāgasnānato bhavet
कुएँ से सहस्र गुना अधिक फल बावड़ी के जल-सिंचन से मिलता है; उससे भी दस हज़ार गुना पुण्य तालाब में स्नान से होता है।
श्लोक 22 (skanda.2.101.22)
ततो दशगुणं पुण्यं निर्झरेषु निमज्जनात् । ततोऽधिकतरं पुण्यं नदीस्नानस्य कार्तिके
tato daśaguṇaṁ puṇyaṁ nirjhareṣu nimajjanāt tato'dhikataraṁ puṇyaṁ nadīsnānasya kārtike
उससे दस गुना पुण्य पहाड़ी झरनों में डुबकी लगाने से होता है; उससे भी अधिक पुण्य कार्तिक में नदी-स्नान का है।
श्लोक 23 (skanda.2.101.23)
नद्या दशगुणं प्रोक्तं तीर्थस्नानं खगोत्तम । ततो दशगुणं पुण्यं नद्योर्यत्र च संगमः
nadyā daśaguṇaṁ proktaṁ tīrthasnānaṁ khagottama tato daśaguṇaṁ puṇyaṁ nadyoryatra ca saṁgamaḥ
हे खगोत्तम, नदी के तीर्थ-स्नान को दस गुना कहा गया है; उससे भी दस गुना पुण्य वहाँ है जहाँ दो नदियों का संगम हो,
श्लोक 24 (skanda.2.101.24)
नदीत्रयस्य संयोगे पुण्यस्यांऽतो न विद्यते । सिंधुः कृष्णा च वेणी च यमुना च सरस्वती
nadītrayasya saṁyoge puṇyasyāṁ'to na vidyate siṁdhuḥ kṛṣṇā ca veṇī ca yamunā ca sarasvatī
तथा तीन नदियों के संगम में पुण्य की कोई सीमा नहीं है। सिंधु, कृष्णा, वेणी, यमुना, सरस्वती,
श्लोक 25 (skanda.2.101.25)
गोदावरी विपाशा च नर्मदा तमसा मही । कावेरी शरयूः शिप्रा तथा चर्मण्वती नदी
godāvarī vipāśā ca narmadā tamasā mahī kāverī śarayūḥ śiprā tathā carmaṇvatī nadī
गोदावरी, विपाशा, नर्मदा, तमसा, मही, कावेरी, सरयू, शिप्रा तथा चर्मण्वती नदी,
श्लोक 26 (skanda.2.101.26)
वितस्ता वेदिका शोणो वेत्रवत्यपराजिता । गंडकी गोमती पूर्णा ब्रह्मपुत्रा सरोवरम्
vitastā vedikā śoṇo vetravatyaparājitā gaṁḍakī gomatī pūrṇā brahmaputrā sarovaram
वितस्ता, वेदिका, शोण, वेत्रवती, अपराजिता, गंडकी, गोमती, पूर्णा, ब्रह्मपुत्रा तथा मानसरोवर,
श्लोक 27 (skanda.2.101.27)
वाग्मती च शतद्रुश्च तथा बदरिकाश्रमः । दुर्लभाः कार्तिके त्वेते तीर्थान्यथ निबोध मे
vāgmatī ca śatadruśca tathā badarikāśramaḥ durlabhāḥ kārtike tvete tīrthānyatha nibodha me
वाग्मती, शतद्रु तथा बदरिकाश्रम — ये तीर्थ कार्तिक में दुर्लभ हैं। अब अन्य तीर्थों को भी मुझसे जानो।
श्लोक 28 (skanda.2.101.28)
सर्वेभ्यश्च स्थलेभ्यश्च आर्यावर्तं तु पुण्यदम् । कोल्हापुरी ततः श्रेष्ठा ततः कांचीद्वयं स्मृतम्
sarvebhyaśca sthalebhyaśca āryāvartaṁ tu puṇyadam kolhāpurī tataḥ śreṣṭhā tataḥ kāṁcīdvayaṁ smṛtam
सम्पूर्ण स्थलों में आर्यावर्त पुण्यदायक है; उससे कोल्हापुरी श्रेष्ठ है; उससे भी दोनों काँची (नगरियाँ) श्रेष्ठ मानी गई हैं;
श्लोक 29 (skanda.2.101.29)
अनंतसेनवसतिर्वराहक्षेत्रमेव च । चक्रक्षेत्रं ततः पुण्यं मुक्तिक्षेत्रं ततोऽधिकम्
anaṁtasenavasatirvarāhakṣetrameva ca cakrakṣetraṁ tataḥ puṇyaṁ muktikṣetraṁ tato'dhikam
फिर अनंतसेन का निवास-स्थान, वराह-क्षेत्र; उससे चक्र-क्षेत्र अधिक पुण्यदायक है, उससे भी मुक्ति-क्षेत्र अधिक;
श्लोक 30 (skanda.2.101.30)
अवंतिका ततः श्रेष्ठा ततो बदरिकाश्रमः । अयोध्या च ततः श्रेष्ठा गंगाद्वारं ततोऽधिकम्
avaṁtikā tataḥ śreṣṭhā tato badarikāśramaḥ ayodhyā ca tataḥ śreṣṭhā gaṁgādvāraṁ tato'dhikam
उससे अवंतिका श्रेष्ठ है, उससे बदरिकाश्रम; उससे अयोध्या श्रेष्ठ है, उससे भी गंगाद्वार (हरिद्वार) अधिक श्रेष्ठ;
श्लोक 31 (skanda.2.101.31)
ततः कनखलं तीर्थं ततो मधुपुरी वरा । एकोऽपि कार्तिको मासो मथुरायमुनाजले
tataḥ kanakhalaṁ tīrthaṁ tato madhupurī varā eko'pi kārtiko māso mathurāyamunājale
उससे कनखल तीर्थ, उससे उत्तम मधुपुरी (मथुरा)। मथुरा की यमुना के जल में बिताया गया एक भी कार्तिक मास —
श्लोक 32 (skanda.2.101.32)
यैः स्नातस्ते तु वैकुंठे बहुकालं वसंति हि । राधादामोदरस्तत्र स्वयं स्नातस्तु कार्तिके
yaiḥ snātaste tu vaikuṁṭhe bahukālaṁ vasaṁti hi rādhādāmodarastatra svayaṁ snātastu kārtike
जिन्होंने वहाँ स्नान किया, वे बहुत काल तक वैकुण्ठ में निवास करते हैं; क्योंकि वहाँ राधा-दामोदर स्वयं कार्तिक में स्नान करते हैं।
श्लोक 33 (skanda.2.101.33)
अतो मधुपुरी श्रेष्ठा यमुना च विशेषतः । द्वारावती ततः श्रेष्ठा प्रत्यहं स्नाति केशवः । षोडशस्त्रीसहस्रेण सार्द्धं यादवसंयुतः
ato madhupurī śreṣṭhā yamunā ca viśeṣataḥ dvārāvatī tataḥ śreṣṭhā pratyahaṁ snāti keśavaḥ ṣoḍaśastrīsahasreṇa sārddhaṁ yādavasaṁyutaḥ
इसलिए मधुपुरी श्रेष्ठ है, विशेषतः यमुना; उससे भी द्वारावती श्रेष्ठ है, जहाँ केशव प्रतिदिन सोलह हज़ार रानियों और यादवों सहित स्नान करते हैं।
श्लोक 34 (skanda.2.101.34)
द्वारकायां मृत्तिकायास्तिलको येन मस्तके । धार्यतेऽसौ नरो ज्ञेयो जीवन्मुक्तो न संशयः । द्वारकास्नानमाहात्म्यं न वक्तुं शक्यते मया
dvārakāyāṁ mṛttikāyāstilako yena mastake dhāryate'sau naro jñeyo jīvanmukto na saṁśayaḥ dvārakāsnānamāhātmyaṁ na vaktuṁ śakyate mayā
द्वारका की मिट्टी का तिलक जो मस्तक पर धारण करता है, वह मनुष्य जीवनमुक्त ही जानना चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं; द्वारका-स्नान के माहात्म्य को मैं भी कहने में समर्थ नहीं हूँ।
श्लोक 35 (skanda.2.101.35)
गोविंदार्पितचित्तानां जायते पुण्यभास्करा । ततो भागीरथी श्रेष्ठा यत्र विंध्येन संगता
goviṁdārpitacittānāṁ jāyate puṇyabhāskarā tato bhāgīrathī śreṣṭhā yatra viṁdhyena saṁgatā
गोविंद को मन अर्पित करने वालों के लिए पुण्य का सूर्य उदित होता है। उससे भागीरथी श्रेष्ठ है, जहाँ वह विंध्य से मिलती है,
श्लोक 36 (skanda.2.101.36)
तस्माद्दशगुणं पुण्यं तीर्थराजेऽत्र जायते । कलौ दशसहस्रांऽते विष्णुस्त्यक्ष्यति मेदिनीम् । तदर्द्धं जाह्नवीतोयं तदर्धं देवतागणाः
tasmāddaśaguṇaṁ puṇyaṁ tīrtharāje'tra jāyate kalau daśasahasrāṁ'te viṣṇustyakṣyati medinīm tadarddhaṁ jāhnavītoyaṁ tadardhaṁ devatāgaṇāḥ
उससे दस गुना पुण्य इस तीर्थराज (प्रयाग) में उत्पन्न होता है। कलियुग के दस हज़ार वर्षों के अंत में विष्णु पृथ्वी को त्याग देंगे; उसका आधा गंगा-जल में तथा आधा देवगणों में रहेगा।
श्लोक 37 (skanda.2.101.37)
यावत्तिष्ठति गंगाऽत्र तावत्तीर्थानि संति च । स्वस्वस्थाने नृणां पापं तावदेव हरंति च
yāvattiṣṭhati gaṁgā'tra tāvattīrthāni saṁti ca svasvasthāne nṛṇāṁ pāpaṁ tāvadeva haraṁti ca
जब तक यहाँ गंगा रहेगी, तब तक ही तीर्थ रहेंगे; अपने-अपने स्थान पर वे तभी तक मनुष्यों के पाप हरते रहेंगे।
श्लोक 38 (skanda.2.101.38)
यदैव गंगा नष्टा स्यात्को वा तत्पापमाहरेत् । विचार्यैवं सुतीर्थानि गमिष्यंति धरातले
yadaiva gaṁgā naṣṭā syātko vā tatpāpamāharet vicāryaivaṁ sutīrthāni gamiṣyaṁti dharātale
जब गंगा नष्ट हो जाएगी, तब वह पाप कौन हरेगा? ऐसा विचार करके ही अन्य तीर्थ भी पृथ्वी-तल से चले जाएँगे।
श्लोक 39 (skanda.2.101.39)
तस्मान्मुनीश्वराः सर्वे यावत्तिष्ठति जाह्नवी । तावच्च क्रियतां धर्मस्ततो भूमौ निलीयताम्
tasmānmunīśvarāḥ sarve yāvattiṣṭhati jāhnavī tāvacca kriyatāṁ dharmastato bhūmau nilīyatām
इसलिए हे सभी मुनीश्वरो, जब तक गंगा है, तब तक ही धर्म का आचरण करना चाहिए, तत्पश्चात् वह पृथ्वी में विलीन हो जाएगा।
श्लोक 40 (skanda.2.101.40)
समाधिं गृह्य सुदृढां यावत्कृतयुगं भवेत् । अन्यथा कलिकालेन भ्रंशनीयो भवेत्सुधीः
samādhiṁ gṛhya sudṛḍhāṁ yāvatkṛtayugaṁ bhavet anyathā kalikālena bhraṁśanīyo bhavetsudhīḥ
कृतयुग के समान दृढ़ समाधि लेकर उसे धारण करना चाहिए; अन्यथा कलिकाल के प्रभाव से बुद्धिमान् पुरुष भी भ्रष्ट हो सकता है।
श्लोक 41 (skanda.2.101.41)
ततः श्रेष्ठतरा काशी यस्या नाशो न जायते । यदाश्रयेण गंगापि सर्वपापं व्यपोहति
tataḥ śreṣṭhatarā kāśī yasyā nāśo na jāyate yadāśrayeṇa gaṁgāpi sarvapāpaṁ vyapohati
उससे भी अधिक श्रेष्ठ काशी है, जिसका कभी नाश नहीं होता; जिसके आश्रय से गंगा भी समस्त पाप का हरण करती है।
श्लोक 42 (skanda.2.101.42)
काशिकाया नैव नाशो ब्रह्मण्यपि मृते सति । यद्दर्शनार्थं गंगाऽपि जाता चोत्तरवाहिनी । तस्यां पंचनदं तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्
kāśikāyā naiva nāśo brahmaṇyapi mṛte sati yaddarśanārthaṁ gaṁgā'pi jātā cottaravāhinī tasyāṁ paṁcanadaṁ tīrthaṁ triṣu lokeṣu viśrutam
काशी का नाश कभी नहीं होता, चाहे स्वयं ब्रह्मा का ही मृत्यु क्यों न हो जाए। उसके दर्शन के लिए गंगा भी उत्तरवाहिनी हो गई; उसमें पंचनद तीर्थ तीनों लोकों में विख्यात है।
श्लोक 43 (skanda.2.101.43)
आगते कार्तिके मासि रौरवं नरकं गताः । आक्रोशंते तु पितरो वंशेऽस्माकं भविष्यति
āgate kārtike māsi rauravaṁ narakaṁ gatāḥ ākrośaṁte tu pitaro vaṁśe'smākaṁ bhaviṣyati
कार्तिक मास आने पर रौरव नरक में पड़े पितर विलाप करते हैं — "हमारे वंश में अवश्य कोई —
श्लोक 44 (skanda.2.101.44)
कश्चिद्भाग्यवतां श्रेष्ठो गत्वा पंचनदे शुभे । अस्माकं तर्पणं कुर्यान्नरकार्णवतारकम्
kaścidbhāgyavatāṁ śreṣṭho gatvā paṁcanade śubhe asmākaṁ tarpaṇaṁ kuryānnarakārṇavatārakam
— कोई भाग्यशाली श्रेष्ठ पुरुष उस शुभ पंचनद में जाकर हमारा तर्पण करेगा, जो हमें नरक-सागर से पार करेगा।"
श्लोक 45 (skanda.2.101.45)
तीर्थराजादितीर्थानि प्राप्ते कार्तिकमासके । स्नानार्थं पञ्चगंगं तु समायांति न संशयः
tīrtharājāditīrthāni prāpte kārtikamāsake snānārthaṁ pañcagaṁgaṁ tu samāyāṁti na saṁśayaḥ
कार्तिक मास आने पर तीर्थराज आदि सभी तीर्थ स्वयं ही स्नान के लिए पंचगंगा में आ जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 46 (skanda.2.101.46)
कृत्वा तु लक्षपापानि स्नात्वा पंचनदे शुभे । बिंदुमाधवमभ्यर्च्य विलयं यांति तत्क्षणात्
kṛtvā tu lakṣapāpāni snātvā paṁcanade śubhe biṁdumādhavamabhyarcya vilayaṁ yāṁti tatkṣaṇāt
लाखों पाप करने के बाद भी, शुभ पंचनद में स्नान करके और बिन्दुमाधव की पूजा करके, वे उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 47 (skanda.2.101.47)
यैः स्नातं कार्तिके मासि सकृत्पंचनदे शुभे । सर्वतीर्थकृतास्नानात्फलं कोटिगुणं भवेत्
yaiḥ snātaṁ kārtike māsi sakṛtpaṁcanade śubhe sarvatīrthakṛtāsnānātphalaṁ koṭiguṇaṁ bhavet
जिन्होंने कार्तिक मास में एक बार भी शुभ पंचनद में स्नान किया, उन्हें सम्पूर्ण तीर्थों में किए गए स्नान से करोड़ गुना अधिक फल प्राप्त होता है।
श्लोक 48 (skanda.2.101.48)
ब्रह्मोवाच । कार्तिके मासि कावेर्य्यां यः स्नानं कर्तुमिच्छति । तावता वै विमुक्ताऽघो विष्णुसायुज्यमाप्नुयात्
brahmovāca kārtike māsi kāveryyāṁ yaḥ snānaṁ kartumicchati tāvatā vai vimuktā'gho viṣṇusāyujyamāpnuyāt
ब्रह्माजी ने कहा — जो कार्तिक मास में कावेरी में स्नान करना चाहता है, वह उतने मात्र से ही पापमुक्त होकर विष्णु के साथ सायुज्य को प्राप्त करता है।
श्लोक 49 (skanda.2.101.49)
कावेर्य्याश्चैव माहात्म्यं को वदेत्परमुत्तमम् । अत्र ते वर्णयिष्यामि इतिहासं पुरातनम्
kāveryyāścaiva māhātmyaṁ ko vadetparamuttamam atra te varṇayiṣyāmi itihāsaṁ purātanam
कावेरी के उस परम उत्तम माहात्म्य को कौन कह सकता है? यहाँ मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ।
श्लोक 50 (skanda.2.101.50)
कावेर्या विषये ब्रह्मन्सावधानमनाः शृणु । गौतम्या उत्तरे तीरे विष्णुपादाब्जसंभवा
kāveryā viṣaye brahmansāvadhānamanāḥ śṛṇu gautamyā uttare tīre viṣṇupādābjasaṁbhavā
हे ब्रह्मन्, कावेरी के विषय में सावधान मन से सुनो। गौतमी (गोदावरी) के उत्तर तट पर, विष्णु के चरण-कमल से उत्पन्न,
श्लोक 51 (skanda.2.101.51)
गंगा त्रैलोक्यपापघ्नी वर्तते लोकपूजिता । सा गंगा चिंतयामास कदाचित्पापशंकिता
gaṁgā trailokyapāpaghnī vartate lokapūjitā sā gaṁgā ciṁtayāmāsa kadācitpāpaśaṁkitā
त्रैलोक्य के पापों को नष्ट करने वाली, संसार द्वारा पूजित गंगा विराजमान हैं। एक बार वह गंगा पाप से आशंकित होकर सोचने लगीं —
श्लोक 52 (skanda.2.101.52)
सर्वलोकाः समागत्य मयि पापं त्यजंति हि । तत्पापं तु कथं गच्छेदिति चिन्तापरा तदा
sarvalokāḥ samāgatya mayi pāpaṁ tyajaṁti hi tatpāpaṁ tu kathaṁ gacchediti cintāparā tadā
"सभी लोग आकर मुझमें अपना पाप त्याग देते हैं; वह पाप कहाँ जाए?" — इस प्रकार चिंतित होकर वे
श्लोक 53 (skanda.2.101.53)
प्रष्टुं जगाम कैलासं गिरिजावल्लभं भवम् । तत्र दृष्ट्वा महारुद्रं प्रोवाच हरिपादजा
praṣṭuṁ jagāma kailāsaṁ girijāvallabhaṁ bhavam tatra dṛṣṭvā mahārudraṁ provāca haripādajā
कैलास पर गिरिजा के प्रिय भगवान् शिव से पूछने गईं। वहाँ महारुद्र को देखकर हरि के चरण से उत्पन्न वह गंगा बोलीं —
श्लोक 54 (skanda.2.101.54)
गङ्गोवाच । महारुद्र नमस्तेऽस्तु त्वां प्रष्टुमहमागता । सर्वे लोकाः समागत्य मयि पापं त्यजंति हि
gaṅgovāca mahārudra namaste'stu tvāṁ praṣṭumahamāgatā sarve lokāḥ samāgatya mayi pāpaṁ tyajaṁti hi
गंगा ने कहा — हे महारुद्र, आपको नमस्कार है; मैं आपसे पूछने आई हूँ। सभी लोग आकर मुझमें अपना पाप त्याग देते हैं —
श्लोक 55 (skanda.2.101.55)
तत्पापं तु मया सोढुं न शक्यं पार्वतीपते । येनोपायेन तत्पापं नाऽऽगच्छेन्मम तद्वद
tatpāpaṁ tu mayā soḍhuṁ na śakyaṁ pārvatīpate yenopāyena tatpāpaṁ nā''gacchenmama tadvada
— हे पार्वतीपते, वह पाप मुझसे सहन नहीं होता। जिस उपाय से मुझ पर वह पाप न आए, वह मुझे बताइए।
श्लोक 56 (skanda.2.101.56)
एवं गंगावचः श्रुत्वा प्रत्याह परमेश्वरः । रुद्र उवाच । पापनिर्हरणायादौ पद्मनाभांघ्रिपंकजात्
evaṁ gaṁgāvacaḥ śrutvā pratyāha parameśvaraḥ rudra uvāca pāpanirharaṇāyādau padmanābhāṁghripaṁkajāt
गंगा के इस प्रकार वचन सुनकर परमेश्वर ने उत्तर दिया। रुद्र ने कहा — पापों के निवारण के लिए, सर्वप्रथम पद्मनाभ के चरण-कमल से —
श्लोक 57 (skanda.2.101.57)
प्रादुर्भूताऽसि त्वं देवि किमर्थं तप्यते त्वया । पापप्रहाराऽऽधिपत्यं कल्पितं तव विष्णुना
prādurbhūtā'si tvaṁ devi kimarthaṁ tapyate tvayā pāpaprahārā''dhipatyaṁ kalpitaṁ tava viṣṇunā
— हे देवी, तुम प्रकट हुई हो; तुम क्यों संतप्त हो रही हो? पापों का नाश करने का अधिकार तो स्वयं विष्णु ने तुम्हें दिया है।
श्लोक 58 (skanda.2.101.58)
तथाऽपि पापनिर्हार उपायं ते ब्रवीम्यहम् । कवेश्च तनया देवी कावेरी सरितां वरा
tathā'pi pāpanirhāra upāyaṁ te bravīmyaham kaveśca tanayā devī kāverī saritāṁ varā
फिर भी मैं तुम्हें पाप-निवारण का उपाय बताता हूँ। कवि ऋषि की पुत्री देवी कावेरी नदियों में श्रेष्ठ है;
श्लोक 59 (skanda.2.101.59)
सर्वोत्कृष्टा च सर्वेषां हरेर्बलवशात्तु सा । सर्वपापप्रहरणे सामर्थ्यं तत्र वर्तते
sarvotkṛṣṭā ca sarveṣāṁ harerbalavaśāttu sā sarvapāpapraharaṇe sāmarthyaṁ tatra vartate
हरि के ही बल से वह सबसे उत्कृष्ट है; सम्पूर्ण पापों के नाश करने का सामर्थ्य उसमें विद्यमान है।
श्लोक 60 (skanda.2.101.60)
कार्तिके मासि कावेर्यां यः स्नानं कुरुते नरः । स तु पापविनिर्मुक्तो याति विष्णोः परं पदम्
kārtike māsi kāveryāṁ yaḥ snānaṁ kurute naraḥ sa tu pāpavinirmukto yāti viṣṇoḥ paraṁ padam
जो मनुष्य कार्तिक मास में कावेरी में स्नान करता है, वह पाप से मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 61 (skanda.2.101.61)
तस्मात्तां गच्छ देवि त्वं ततः पापाद्विमोक्ष्यसे । इत्युक्ता सा तदागच्छत्कावेरीं पापहारिणीम्
tasmāttāṁ gaccha devi tvaṁ tataḥ pāpādvimokṣyase ityuktā sā tadāgacchatkāverīṁ pāpahāriṇīm
इसलिए, हे देवी, तुम उसके पास जाओ, तभी तुम पाप से मुक्त होगी — ऐसा कहे जाने पर वह पाप-हारिणी कावेरी के पास गईं।
श्लोक 62 (skanda.2.101.62)
तज्जलस्पर्शमात्रेण कार्तिके विष्णुपादजा । निर्धूतपातका गंगा जगाम स्वनिकेतनम्
tajjalasparśamātreṇa kārtike viṣṇupādajā nirdhūtapātakā gaṁgā jagāma svaniketanam
उस जल के स्पर्श मात्र से ही, कार्तिक में, विष्णु-पदजा गंगा अपने पापों से मुक्त होकर अपने ही धाम को लौट गईं।
श्लोक 63 (skanda.2.101.63)
कार्तिके प्रतिवर्षं तु गंगा त्रैलोक्यपावनीम् । स्नातुं भक्त्या समायाति कावेरीं पापहारिणीम्
kārtike prativarṣaṁ tu gaṁgā trailokyapāvanīm snātuṁ bhaktyā samāyāti kāverīṁ pāpahāriṇīm
इसलिए प्रतिवर्ष कार्तिक में त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली गंगा भी भक्तिपूर्वक पाप-हारिणी कावेरी में स्नान करने आती हैं।
श्लोक 64 (skanda.2.101.64)
तज्जलस्पर्शमात्रेण कार्तिके विष्णुपादजा । निर्धूतपातका गंगा जगाम स्वनिकेतनम्
tajjalasparśamātreṇa kārtike viṣṇupādajā nirdhūtapātakā gaṁgā jagāma svaniketanam
उस जल के स्पर्श मात्र से ही, कार्तिक में, विष्णु-पदजा गंगा अपने पापों से मुक्त होकर अपने ही धाम को लौट गईं।
श्लोक 65 (skanda.2.101.65)
तस्माच्छस्तं तुलास्नानं कावेर्य्यां शस्यते बुधैः । यः कावेर्यां तुलास्नानं भक्त्या तु कुरुते मुने
tasmācchastaṁ tulāsnānaṁ kāveryyāṁ śasyate budhaiḥ yaḥ kāveryāṁ tulāsnānaṁ bhaktyā tu kurute mune
इसीलिए विद्वानों ने कावेरी में तुला-स्नान को उत्तम बताया है। हे मुने, जो भक्तिपूर्वक कावेरी में तुला-स्नान करता है,
श्लोक 66 (skanda.2.101.66)
विमुक्तदुरितः सद्यस्ततो याति परां गतिम् । तस्मात्स्नानं तु कावेर्यां कार्तिके मासि शस्यते
vimuktaduritaḥ sadyastato yāti parāṁ gatim tasmātsnānaṁ tu kāveryāṁ kārtike māsi śasyate
वह तत्काल पापमुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है; इसलिए कार्तिक मास में कावेरी-स्नान की विशेष प्रशंसा की गई है।
श्लोक 67 (skanda.2.101.67)
इतिहासमिमं श्रुत्वा कार्तिकव्रततत्परः । स कावेरी स्नानफलं प्राप्नोति च परां गतिम्
itihāsamimaṁ śrutvā kārtikavratatatparaḥ sa kāverī snānaphalaṁ prāpnoti ca parāṁ gatim
कार्तिक-व्रत में तत्पर होकर जो यह इतिहास सुनता है, वह भी कावेरी-स्नान का फल तथा परम गति प्राप्त करता है।
श्लोक 68 (skanda.2.101.68)
रात्रिशेषे भवेत्स्नानमुत्तमं विष्णुतुष्टिकृत् । सूर्योदये मध्यमं स्याद्यावन्नाऽऽस्ता तु कृत्तिका
rātriśeṣe bhavetsnānamuttamaṁ viṣṇutuṣṭikṛt sūryodaye madhyamaṁ syādyāvannā''stā tu kṛttikā
रात्रि के शेष भाग में किया गया स्नान उत्तम है, जो विष्णु को संतुष्ट करने वाला है; सूर्योदय के समय किया गया स्नान मध्यम है, जब तक कि कृत्तिका अस्त न हो,
श्लोक 69 (skanda.2.101.69)
तावदेव भवेत्स्नानमन्यथा तन्न कार्तिकम् । स्नानं स्त्रीभिर्विधातव्यं गृहीत्वाऽऽज्ञां धवस्य च
tāvadeva bhavetsnānamanyathā tanna kārtikam snānaṁ strībhirvidhātavyaṁ gṛhītvā''jñāṁ dhavasya ca
तब तक ही उसे स्नान माना जाता है, अन्यथा वह कार्तिक-स्नान नहीं है। स्त्रियों को पति की आज्ञा लेकर ही स्नान करना चाहिए;
श्लोक 70 (skanda.2.101.70)
अपृष्ट्वा यत्कृतं धर्म्यं भर्तारं तत्क्षयं नयेत् । स्त्रीणां नास्त्यपरो धर्मो भर्तारं प्रोज्झ्य कश्चन
apṛṣṭvā yatkṛtaṁ dharmyaṁ bhartāraṁ tatkṣayaṁ nayet strīṇāṁ nāstyaparo dharmo bhartāraṁ projjhya kaścana
पति से बिना पूछे किया गया धर्म-कार्य पति का ही नाश करता है। स्त्रियों के लिए पति को छोड़कर कोई अन्य धर्म नहीं है।
श्लोक 71 (skanda.2.101.71)
कुर्यात्सहस्रपापानि भर्त्राऽऽज्ञां या समाचरेत् । सैषा धर्मवती लोके न जायेत व्रतादिना
kuryātsahasrapāpāni bhartrā''jñāṁ yā samācaret saiṣā dharmavatī loke na jāyeta vratādinā
जो स्त्री पति की आज्ञा का पालन करती है, वह सहस्र पाप करने पर भी लोक में धर्मशील ही है; व्रत आदि करने मात्र से ऐसी स्त्री नहीं बनी जाती।
श्लोक 72 (skanda.2.101.72)
दरिद्रः पतितो मूर्खो दीनोऽपि यदि चेत्पतिः । तादृशः शरणं स्त्रीणां तत्त्यागान्निरयं व्रजेत्
daridraḥ patito mūrkho dīno'pi yadi cetpatiḥ tādṛśaḥ śaraṇaṁ strīṇāṁ tattyāgānnirayaṁ vrajet
चाहे पति निर्धन हो, पतित हो, मूर्ख हो अथवा दीन हो, फिर भी वही स्त्रियों का आश्रय है; उसे त्यागने से वे नरक को जाती हैं।
श्लोक 73 (skanda.2.101.73)
कलौ वत्स मनुष्याणां शैथिल्यं स्नानकर्मणि । तथापि कथयिष्यामि स्नानं कार्तिकमाघयोः
kalau vatsa manuṣyāṇāṁ śaithilyaṁ snānakarmaṇi tathāpi kathayiṣyāmi snānaṁ kārtikamāghayoḥ
हे वत्स, कलियुग में मनुष्यों में स्नान-कर्म के प्रति शिथिलता आ गई है; फिर भी मैं कार्तिक और माघ के स्नान को बताऊँगा।
श्लोक 74 (skanda.2.101.74)
यस्य हस्तौ च पादौ च वाङ्मनश्च सुसंयतम् । विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलभाङ्नरः
yasya hastau ca pādau ca vāṅmanaśca susaṁyatam vidyā tapaśca kīrtiśca sa tīrthaphalabhāṅnaraḥ
जिसके हाथ, पैर, वाणी और मन भलीभाँति संयमित हों, तथा विद्या, तप और कीर्ति हो — वही मनुष्य तीर्थ के फल का भागी है।
श्लोक 75 (skanda.2.101.75)
अश्रद्दधानः पापात्मा नास्तिकश्छिन्नमानसः । हेतुवादी च पंचैते न तीर्थफलभागिनः
aśraddadhānaḥ pāpātmā nāstikaśchinnamānasaḥ hetuvādī ca paṁcaite na tīrthaphalabhāginaḥ
श्रद्धाहीन, पापात्मा, नास्तिक, चंचल-मन वाला तथा केवल तर्क करने वाला — ये पाँच लोग तीर्थ के फल के भागी नहीं होते।
श्लोक 76 (skanda.2.101.76)
प्रातरुत्थाय यो विप्रस्तीर्थस्नायी सदा भवेत् । सर्वपापविनिर्मुक्तः परं ब्रह्माऽधिगच्छति
prātarutthāya yo viprastīrthasnāyī sadā bhavet sarvapāpavinirmuktaḥ paraṁ brahmā'dhigacchati
जो ब्राह्मण प्रातःकाल उठकर सदा तीर्थ में स्नान करने वाला होता है, वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त करता है।
श्लोक 77 (skanda.2.101.77)
स्नानं चतुर्विधं प्रोक्तं स्नानविद्भिर्मनीषिभिः । वायव्यं वारुणं दिव्यं ब्राह्मं चेति तथा स्मृतम्
snānaṁ caturvidhaṁ proktaṁ snānavidbhirmanīṣibhiḥ vāyavyaṁ vāruṇaṁ divyaṁ brāhmaṁ ceti tathā smṛtam
स्नान-विद्या के ज्ञाता बुद्धिमानों ने स्नान को चार प्रकार का बताया है — वायव्य, वारुण, दिव्य तथा ब्राह्म।
श्लोक 78 (skanda.2.101.78)
वायव्यं गोरजःस्नानं वारुणं सागरादिषु । ब्राह्मं ब्राह्मणमंत्रोक्तं दिव्यं मेघांऽबु भास्करम्
vāyavyaṁ gorajaḥsnānaṁ vāruṇaṁ sāgarādiṣu brāhmaṁ brāhmaṇamaṁtroktaṁ divyaṁ meghāṁ'bu bhāskaram
वायव्य गोरज (गायों की धूल) से किया जाने वाला स्नान है, वारुण समुद्र आदि में किया जाने वाला है, ब्राह्म ब्राह्मण-मंत्रों से कहा गया है, तथा दिव्य सूर्य के प्रकाश में मेघ-जल से किया जाने वाला है।
श्लोक 79 (skanda.2.101.79)
स्नानानां चैव सर्वेषां विशिष्टं तत्र वारुणम् । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यो मंत्रवत्स्नानमाचरेत्
snānānāṁ caiva sarveṣāṁ viśiṣṭaṁ tatra vāruṇam brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyo maṁtravatsnānamācaret
सम्पूर्ण स्नानों में वारुण स्नान विशिष्ट है। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य को मंत्रपूर्वक स्नान करना चाहिए;
श्लोक 80 (skanda.2.101.80)
तूष्णीमेव हि शूद्रस्य स्त्रीणां चैव तथा स्मृतम् । बाला च तरुणी वृद्धा नरनारीनपुंसकाः
tūṣṇīmeva hi śūdrasya strīṇāṁ caiva tathā smṛtam bālā ca taruṇī vṛddhā naranārīnapuṁsakāḥ
शूद्र तथा स्त्रियों के लिए मौन रहकर ही स्नान करना कहा गया है। बालिका, युवती, वृद्धा, पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक —
श्लोक 81 (skanda.2.101.81)
पापैः सर्वैः प्रमुच्यंते स्नानात्कार्तिकमाघयोः । स्नाता वै कार्तिके लोकाः प्राप्नुवंतीप्सितं फलम्
pāpaiḥ sarvaiḥ pramucyaṁte snānātkārtikamāghayoḥ snātā vai kārtike lokāḥ prāpnuvaṁtīpsitaṁ phalam
सभी कार्तिक और माघ के स्नान से समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। कार्तिक में स्नान करने वाले लोग निश्चय ही अभीष्ट फल प्राप्त करते हैं।
श्लोक 82 (skanda.2.101.82)
पुष्करे तीर्थवर्ये तु नंदायाः संगमे पुरा । प्रभंजनश्च मुक्तोभूत्तदैव व्याघ्रजन्मतः
puṣkare tīrthavarye tu naṁdāyāḥ saṁgame purā prabhaṁjanaśca muktobhūttadaiva vyāghrajanmataḥ
पूर्वकाल में श्रेष्ठ तीर्थ पुष्कर में नंदा नदी के संगम पर प्रभंजन उसी क्षण व्याघ्र-योनि से मुक्त हो गया था,
श्लोक 83 (skanda.2.101.83)
नंदाया वचनेनैव कार्तिके सा परं ययौ । एवं स्नानविधिः प्रोक्तः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि
naṁdāyā vacanenaiva kārtike sā paraṁ yayau evaṁ snānavidhiḥ proktaḥ kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi
नंदा के ही वचन से कार्तिक में उसने परम गति प्राप्त की। इस प्रकार स्नान-विधि बताई गई; अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?