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वैष्णव खण्ड · अध्याय 102

नित्यकर्मकथनम्

अध्याय 101अध्याय-सूचीअध्याय 103

श्लोक 1 (skanda.2.102.1)

नारद उवाच । कदा स्नानं प्रकर्तव्यं कथं स्थेयं दिनावधि । आह्निकं तत्समाचक्ष्व विशेषेण पितामह

nārada uvāca kadā snānaṁ prakartavyaṁ kathaṁ stheyaṁ dināvadhi āhnikaṁ tatsamācakṣva viśeṣeṇa pitāmaha

नारद ने कहा — स्नान कब करना चाहिए, तथा दिनभर कैसे रहना चाहिए? हे पितामह, यह दैनिक कर्तव्य (आह्निक) मुझे विशेष रूप से बताइए।

श्लोक 2 (skanda.2.102.2)

ब्रह्मोवाच । रात्र्यां तुर्यांशशेषायामुत्तिष्ठेत्सर्वदा व्रती । विष्णुं स्तुत्वा बहुस्तोत्रैर्दिनकार्यं विचारयेत्

brahmovāca rātryāṁ turyāṁśaśeṣāyāmuttiṣṭhetsarvadā vratī viṣṇuṁ stutvā bahustotrairdinakāryaṁ vicārayet

ब्रह्माजी ने कहा — रात्रि का चौथा भाग शेष रहने पर व्रती को सदा उठना चाहिए; विष्णु की अनेक स्तोत्रों से स्तुति करके दिनभर के कार्य का विचार करना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.2.102.3)

ग्रामनैर्ऋत्यदिग्भागे मलोत्सर्गं यथाविधि । ब्रह्मसूत्रं दक्षकर्णे स्थाप्य तत्र उदङ्मुखः

grāmanairṛtyadigbhāge malotsargaṁ yathāvidhi brahmasūtraṁ dakṣakarṇe sthāpya tatra udaṅmukhaḥ

गाँव की नैऋत्य दिशा में विधिपूर्वक मल-त्याग करना चाहिए, यज्ञोपवीत को दाहिने कान पर रखकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके,

श्लोक 4 (skanda.2.102.4)

अंतर्धाय तृणं भूमौ शिरः प्रावृत्य वाससा । वक्त्रं नियम्य वस्त्रेणाऽसंगः सोदकभाजनः

aṁtardhāya tṛṇaṁ bhūmau śiraḥ prāvṛtya vāsasā vaktraṁ niyamya vastreṇā'saṁgaḥ sodakabhājanaḥ

घास से अपने को ढककर, सिर को वस्त्र से ढककर, मुख को वस्त्र से बाँधकर, किसी के संपर्क के बिना, जल का पात्र साथ रखकर,

श्लोक 5 (skanda.2.102.5)

कुर्यान्मूत्रपुरीषं तु रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः । तत उत्थाय चाऽऽगच्छेत्समीपं कलशस्य हि

kuryānmūtrapurīṣaṁ tu rātrau ceddakṣiṇāmukhaḥ tata utthāya cā''gacchetsamīpaṁ kalaśasya hi

यदि रात्रि हो तो दक्षिण दिशा की ओर मुख करके मल-मूत्र त्याग करना चाहिए। तत्पश्चात् उठकर कलश के समीप आना चाहिए।

श्लोक 6 (skanda.2.102.6)

गंधलेपक्षयकरं मृत्तिकाशौचमाचरेत् । एका लिंगे करे तिस्र उभयोर्मृद्द्वयं स्मृतम्

gaṁdhalepakṣayakaraṁ mṛttikāśaucamācaret ekā liṁge kare tisra ubhayormṛddvayaṁ smṛtam

गंध और चिकनाई को दूर करने वाली मिट्टी से शुद्धि करनी चाहिए — लिंग के लिए एक, हाथ के लिए तीन, तथा दोनों के लिए दो मिट्टी के पिंड कहे गए हैं।

श्लोक 7 (skanda.2.102.7)

मूत्रशौचे त्विदं ज्ञेयं विष्ठाशौचमतः शृणु । पंचापानेऽथवा सप्त दश वामकरे तथा

mūtraśauce tvidaṁ jñeyaṁ viṣṭhāśaucamataḥ śṛṇu paṁcāpāne'thavā sapta daśa vāmakare tathā

यह मूत्र-शुद्धि के लिए जानना चाहिए; अब विष्ठा-शुद्धि सुनो — गुदा के लिए पाँच अथवा सात, बाएँ हाथ के लिए दस,

श्लोक 8 (skanda.2.102.8)

उभयोः सप्त दातव्याः पादयोर्मृत्तिकात्रयम् । एतच्छौचं गृहस्थस्य द्विगुणं ब्रह्मचारिणः

ubhayoḥ sapta dātavyāḥ pādayormṛttikātrayam etacchaucaṁ gṛhasthasya dviguṇaṁ brahmacāriṇaḥ

दोनों हाथों के लिए सात देने चाहिए, तथा पैरों के लिए तीन मिट्टी के पिंड। यह शुद्धि गृहस्थ के लिए है, ब्रह्मचारी के लिए दोगुनी,

श्लोक 9 (skanda.2.102.9)

वानप्रस्थस्य त्रिगुणं यतीनां च चतुर्गुणम् । एतच्छौचं दिवा प्रोक्तं रात्रावर्द्धं समाचरेत्

vānaprasthasya triguṇaṁ yatīnāṁ ca caturguṇam etacchaucaṁ divā proktaṁ rātrāvarddhaṁ samācaret

वानप्रस्थ के लिए तिगुनी तथा संन्यासियों के लिए चौगुनी है। यह शुद्धि दिन के लिए कही गई है; रात्रि में इसका आधा करना चाहिए।

श्लोक 10 (skanda.2.102.10)

मार्गस्थस्य तदर्धं स्यात्स्त्रीशूद्राणां तदर्धकम् । शौचकर्मविहीनस्य समस्ता निष्फलाः क्रियाः

mārgasthasya tadardhaṁ syātstrīśūdrāṇāṁ tadardhakam śaucakarmavihīnasya samastā niṣphalāḥ kriyāḥ

मार्ग में रहने वाले के लिए वह आधी होती है, तथा स्त्रियों और शूद्रों के लिए उससे भी आधी। शुद्धि-कर्म से रहित व्यक्ति की सम्पूर्ण क्रियाएँ निष्फल होती हैं।

श्लोक 11 (skanda.2.102.11)

दंतजिह्वाविशुद्धिं च ततः कुर्यादतंद्रितः । आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च

daṁtajihvāviśuddhiṁ ca tataḥ kuryādataṁdritaḥ āyurbalaṁ yaśo varcaḥ prajāḥ paśuvasūni ca

तत्पश्चात् बिना आलस्य के दाँत और जीभ की शुद्धि करनी चाहिए — "आयु, बल, यश, तेज, संतान, पशु, धन,

श्लोक 12 (skanda.2.102.12)

ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते । दंतकाष्ठं तु गृह्णीयाद्द्वादशांगुलसंमितम्

brahma prajñāṁ ca medhāṁ ca tvaṁ no dehi vanaspate daṁtakāṣṭhaṁ tu gṛhṇīyāddvādaśāṁgulasaṁmitam

ब्रह्म, प्रज्ञा तथा मेधा — हे वृक्षपति, यह सब हमें दीजिए।" बारह अंगुल लंबी दातुन ग्रहण करनी चाहिए।

श्लोक 13 (skanda.2.102.13)

क्षीरवृक्षस्य न ग्राह्यं कार्पासस्य तथैव च । कंटकस्य च वृक्षस्य दग्धवृक्षस्य चैव हि

kṣīravṛkṣasya na grāhyaṁ kārpāsasya tathaiva ca kaṁṭakasya ca vṛkṣasya dagdhavṛkṣasya caiva hi

दूध वाले वृक्ष की दातुन ग्रहण नहीं करनी चाहिए, न ही कपास के वृक्ष की, न काँटेदार वृक्ष की, तथा न ही जले हुए वृक्ष की।

श्लोक 14 (skanda.2.102.14)

सद्वासनं मृदुतरं दंतधावनमादितः । उपवासे नवम्यां च षष्ठ्यां श्राद्धदिने रवौ । ग्रहणे प्रतिपद्दर्शे न कुर्याद्दंतधावनम् । कुर्याद्द्वादशगंडूषाननुक्ते दंतधावने

sadvāsanaṁ mṛdutaraṁ daṁtadhāvanamāditaḥ upavāse navamyāṁ ca ṣaṣṭhyāṁ śrāddhadine ravau grahaṇe pratipaddarśe na kuryāddaṁtadhāvanam kuryāddvādaśagaṁḍūṣānanukte daṁtadhāvane

दातुन सुगंधित और अत्यंत कोमल होनी चाहिए — यह दंतधावन का प्रारंभिक नियम है। उपवास के दिन, नवमी, षष्ठी, श्राद्ध-दिवस, रविवार, ग्रहण, प्रतिपदा तथा अमावस्या को दातुन नहीं करनी चाहिए; जब दातुन का विधान न हो, तब बारह बार कुल्ला करना चाहिए।

श्लोक 15 (skanda.2.102.15)

दंतान्विशोध्य विधिवन्मुखं संमार्ज्य वारिणा । ललाटे चोर्ध्वपुंड्रं तु धृत्वा चाचम्य वारिणा

daṁtānviśodhya vidhivanmukhaṁ saṁmārjya vāriṇā lalāṭe cordhvapuṁḍraṁ tu dhṛtvā cācamya vāriṇā

दाँतों को विधिपूर्वक शुद्ध करके, जल से मुख धोकर, ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र (तिलक) धारण करके तथा जल से आचमन करके,

श्लोक 16 (skanda.2.102.16)

देवालये नदीतीरे राजमार्गे विशेषतः । दत्त्वा चाकाशदीपं तु तुलसीसन्निधावथ

devālaye nadītīre rājamārge viśeṣataḥ dattvā cākāśadīpaṁ tu tulasīsannidhāvatha

विशेष रूप से मंदिर में, नदी-तट पर अथवा राजमार्ग पर, आकाश-दीप अर्पित करके तथा तुलसी के समीप जाकर,

श्लोक 17 (skanda.2.102.17)

गृहीत्वार्चनसामग्रीमिष्टदेवगृहं व्रजेत् । ततो गायेत नृत्येत पूजां कृत्वा तु बुद्धिमान्

gṛhītvārcanasāmagrīmiṣṭadevagṛhaṁ vrajet tato gāyeta nṛtyeta pūjāṁ kṛtvā tu buddhimān

पूजा-सामग्री लेकर अपने इष्टदेव के मंदिर जाना चाहिए। तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष पूजा करके गान और नृत्य करे,

श्लोक 18 (skanda.2.102.18)

पठित्वा विष्णुनामानि कुर्य्यान्नीराजनं हरेः । नाडीद्वयावशिष्टायां रात्र्यां गच्छेज्जलाशयम्

paṭhitvā viṣṇunāmāni kuryyānnīrājanaṁ hareḥ nāḍīdvayāvaśiṣṭāyāṁ rātryāṁ gacchejjalāśayam

विष्णु के नामों का पाठ करके हरि की आरती (नीराजन) करनी चाहिए। जैसा पहले कहा गया है, रात्रि में दो घड़ी शेष रहने पर जलाशय की ओर जाना चाहिए,

श्लोक 19 (skanda.2.102.19)

तत्रोक्तविधिना स्नानं कुर्याद्वै कार्तिकव्रती । वस्त्रनिष्पीडनं कृत्वा कुर्याच्च तिलकं तथा

tatroktavidhinā snānaṁ kuryādvai kārtikavratī vastraniṣpīḍanaṁ kṛtvā kuryācca tilakaṁ tathā

और वहाँ कार्तिक-व्रती को पहले कही गई विधि से स्नान करना चाहिए; वस्त्र निचोड़कर तिलक भी करना चाहिए।

श्लोक 20 (skanda.2.102.20)

ततः संध्यामुपासीत स्वसूत्रोक्तेन वर्त्मना । ततः कार्यो जपो देव्या यावदकोंदयो भवेत्

tataḥ saṁdhyāmupāsīta svasūtroktena vartmanā tataḥ kāryo japo devyā yāvadakoṁdayo bhavet

तत्पश्चात् अपनी शाखा में कहे गए मार्ग से संध्या-वंदन करना चाहिए; फिर सूर्योदय होने तक देवी (गायत्री) का जप करना चाहिए।

श्लोक 21 (skanda.2.102.21)

एतत्प्रोक्तं रात्रिशेषकृत्यं दैनमथोच्यते । यस्मिन्कृते कार्तिकोऽयं सकलः सफलो भवेत्

etatproktaṁ rātriśeṣakṛtyaṁ dainamathocyate yasminkṛte kārtiko'yaṁ sakalaḥ saphalo bhavet

यह रात्रि के शेष भाग का कर्तव्य बताया गया; अब दिन का कर्तव्य कहा जाता है, जिसे करने से यह सम्पूर्ण कार्तिक-मास सफल होता है।

श्लोक 22 (skanda.2.102.22)

विष्णोः सहस्रनामाऽऽद्यं संध्यांते च पठेत्ततः । देवालये समागत्य पुनः पूजनमारभेत्

viṣṇoḥ sahasranāmā''dyaṁ saṁdhyāṁte ca paṭhettataḥ devālaye samāgatya punaḥ pūjanamārabhet

संध्या के अंत में विष्णु के सहस्रनाम आदि का पाठ करना चाहिए; फिर मंदिर में पुनः आकर पूजन आरंभ करना चाहिए।

श्लोक 23 (skanda.2.102.23)

नृत्यगानादिकार्येषु प्रहरं दिवसं नयेत् । ततः पुराणश्रवणं यामार्धं सम्यगाचरेत्

nṛtyagānādikāryeṣu praharaṁ divasaṁ nayet tataḥ purāṇaśravaṇaṁ yāmārdhaṁ samyagācaret

नृत्य-गान आदि कार्यों में दिन का एक प्रहर व्यतीत करना चाहिए; तत्पश्चात् आधे प्रहर तक भलीभाँति पुराण-श्रवण करना चाहिए।

श्लोक 24 (skanda.2.102.24)

पौराणिकस्य पूजां तु तुलसीपूजनं तथा । कृत्वा माध्याह्निकं कर्म भुंजीत द्विदलोज्झितम्

paurāṇikasya pūjāṁ tu tulasīpūjanaṁ tathā kṛtvā mādhyāhnikaṁ karma bhuṁjīta dvidalojjhitam

पुराण-पाठक की पूजा तथा तुलसी-पूजन करके, माध्याह्निक कर्म करके, द्विदल-रहित भोजन करना चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.2.102.25)

बलिदानं वैश्वदेवमतिथीनां समर्पणम् । कृत्वा भुंक्ते तु यो मर्त्यः केवलं चाऽमृतं हि तत्

balidānaṁ vaiśvadevamatithīnāṁ samarpaṇam kṛtvā bhuṁkte tu yo martyaḥ kevalaṁ cā'mṛtaṁ hi tat

बलिदान, वैश्वदेव तथा अतिथियों का सम्मान करके जो मनुष्य भोजन करता है, उसके लिए वह भोजन केवल अमृत ही है।

श्लोक 26 (skanda.2.102.26)

यथाशक्ति द्विजा भोज्याः प्रत्यहं वाऽथ पर्वणि । हविष्यभोजनं कुर्यादामिषं परिवर्जयेत्

yathāśakti dvijā bhojyāḥ pratyahaṁ vā'tha parvaṇi haviṣyabhojanaṁ kuryādāmiṣaṁ parivarjayet

अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को प्रतिदिन अथवा पर्व के दिन भोजन कराना चाहिए; केवल हविष्य भोजन करना चाहिए, मांस का पूर्णतः त्याग करना चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.2.102.27)

भक्षयेत्तुलसीं वक्त्रशुद्ध्यर्थं तीर्थवारिणा । संसारव्यवहारेण दिनशेषं समापयेत्

bhakṣayettulasīṁ vaktraśuddhyarthaṁ tīrthavāriṇā saṁsāravyavahāreṇa dinaśeṣaṁ samāpayet

मुख की शुद्धि के लिए तीर्थ-जल के साथ तुलसी का सेवन करना चाहिए; दिन का शेष भाग सांसारिक व्यवहार में बिताना चाहिए।

श्लोक 28 (skanda.2.102.28)

सायंकाले पुनर्गच्छेद्विष्णोर्देवालयं प्रति । संध्यां कृत्वा प्रयुंजीत तत्र दीपन्यथाबलम्

sāyaṁkāle punargacchedviṣṇordevālayaṁ prati saṁdhyāṁ kṛtvā prayuṁjīta tatra dīpanyathābalam

सायंकाल पुनः विष्णु के मंदिर जाना चाहिए; संध्या करके वहाँ अपनी सामर्थ्य के अनुसार दीपक जलाना चाहिए।

श्लोक 29 (skanda.2.102.29)

विष्णुं प्रणम्य हरये कृत्वा नीराजनं शुभम् । स्तोत्रपाठादिकं कुर्वन्नाद्ययामे तु जागरम्

viṣṇuṁ praṇamya haraye kṛtvā nīrājanaṁ śubham stotrapāṭhādikaṁ kurvannādyayāme tu jāgaram

विष्णु को प्रणाम करके हरि की शुभ आरती करके, स्तोत्र-पाठ आदि करते हुए रात्रि के प्रथम प्रहर में जागरण करना चाहिए।

श्लोक 30 (skanda.2.102.30)

यामे तु प्रथमेऽतीते निद्रां कुर्याद्विचक्षणः । ब्रह्मचर्यव्रतं कुर्याद्भार्यामीयादृतौ तथा

yāme tu prathame'tīte nidrāṁ kuryādvicakṣaṇaḥ brahmacaryavrataṁ kuryādbhāryāmīyādṛtau tathā

प्रथम प्रहर बीत जाने पर विवेकशील पुरुष को शयन करना चाहिए। उसे ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना चाहिए; अपनी पत्नी के पास केवल ऋतुकाल में ही जाना चाहिए,

श्लोक 31 (skanda.2.102.31)

तया कामयमानो वा भार्यां गच्छेन्न दोषभाक् । एवं प्रतिदिनं कुर्यादामासं तु यथाविधि

tayā kāmayamāno vā bhāryāṁ gacchenna doṣabhāk evaṁ pratidinaṁ kuryādāmāsaṁ tu yathāvidhi

और यदि वह उसकी कामना से पत्नी के पास जाए, तो उसे दोष नहीं लगता। इस प्रकार प्रतिदिन पूरे मास तक विधिपूर्वक करना चाहिए।

श्लोक 32 (skanda.2.102.32)

एवं तु कार्तिके मासि यः कुर्यात्परमं व्रतम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो याति विष्णोः सलोकताम्

evaṁ tu kārtike māsi yaḥ kuryātparamaṁ vratam sarvapāpavinirmukto yāti viṣṇoḥ salokatām

इस प्रकार जो कार्तिक मास में यह परम व्रत करता है, वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर विष्णु के लोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 33 (skanda.2.102.33)

रोगापहं पातकनाशकृत्परं सद्बुद्धिदं पुत्रधनादिसाधकम् । मुक्तेर्निदानं नहि कार्तिकव्रताद्विष्णुप्रियादन्यदिहाऽस्ति भूतले

rogāpahaṁ pātakanāśakṛtparaṁ sadbuddhidaṁ putradhanādisādhakam mukternidānaṁ nahi kārtikavratādviṣṇupriyādanyadihā'sti bhūtale

रोगनाशक, पापों का परम नाशक, उत्तम बुद्धि देने वाला, पुत्र-धन आदि का साधक — विष्णु को प्रिय कार्तिक-व्रत के समान मुक्ति का कारण इस पृथ्वी पर अन्य कुछ भी नहीं है।

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