Skip to main content

वैष्णव खण्ड · अध्याय 103

कार्तिकव्रतनिरूपणम्

अध्याय 102अध्याय-सूचीअध्याय 104

श्लोक 1 (skanda.2.103.1)

ब्रह्मोवाच । शृणु नारद वक्ष्यामि कार्तिकस्य व्रतं महत् । यच्छुत्वा सर्वपापेभ्यो मुक्तो मोक्षमवाप्स्यसि

brahmovāca śṛṇu nārada vakṣyāmi kārtikasya vrataṁ mahat yacchutvā sarvapāpebhyo mukto mokṣamavāpsyasi

ब्रह्माजी ने कहा — हे नारद, सुनो, मैं कार्तिक के महान् व्रत का वर्णन करता हूँ, जिसे सुनकर तुम सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करोगे।

श्लोक 2 (skanda.2.103.2)

कार्तिके मासि संप्राप्ते निषिद्धानि च वर्जयेत् । तैलाभ्यंगं परान्नं च तथा वै तैलभोजनम्

kārtike māsi saṁprāpte niṣiddhāni ca varjayet tailābhyaṁgaṁ parānnaṁ ca tathā vai tailabhojanam

कार्तिक मास आने पर निषिद्ध वस्तुओं का त्याग करना चाहिए — तेल की मालिश, पराया अन्न, तथा तेल में बना भोजन,

श्लोक 3 (skanda.2.103.3)

फलानि बहुबीजानि धान्यानि द्विदलान्यपि । वर्जयेत्कार्तिके मासि नाऽत्र कार्या विचारणा

phalāni bahubījāni dhānyāni dvidalānyapi varjayetkārtike māsi nā'tra kāryā vicāraṇā

बहुबीज वाले फल तथा दाल वाले अन्न — इन सबका कार्तिक मास में त्याग करना चाहिए, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 4 (skanda.2.103.4)

अलाबुं गृंजरं चैव वृंताकं बृहतीफलम् । अन्नं पर्युषितं वाऽपि भिस्सटं च मसूरिकम्

alābuṁ gṛṁjaraṁ caiva vṛṁtākaṁ bṛhatīphalam annaṁ paryuṣitaṁ vā'pi bhissaṭaṁ ca masūrikam

लौकी, गाजर, बैंगन, बड़ा बैंगन, बासी अन्न, मूली के अंकुर तथा मसूर की दाल,

श्लोक 5 (skanda.2.103.5)

पुनर्भोजनं माध्वं च परान्नं कांस्यभोजनम् । नखं चर्म च छत्राकं कांजि दुर्गंधमेव च

punarbhojanaṁ mādhvaṁ ca parānnaṁ kāṁsyabhojanam nakhaṁ carma ca chatrākaṁ kāṁji durgaṁdhameva ca

दुबारा भोजन करना, मधु-मदिरा, पराया अन्न, काँसे के पात्र में भोजन, नाखून और चमड़े का स्पर्श, कुकुरमुत्ता, कांजी तथा दुर्गंधयुक्त वस्तुएँ,

श्लोक 6 (skanda.2.103.6)

गणान्नं गणिकान्नं च तथा वै ग्रामयाजिनः । शूद्रान्नं शद्रसंपर्कं सूतकान्नं तथैव च

gaṇānnaṁ gaṇikānnaṁ ca tathā vai grāmayājinaḥ śūdrānnaṁ śadrasaṁparkaṁ sūtakānnaṁ tathaiva ca

सामूहिक भोज का अन्न, वेश्या का अन्न, ग्रामयाजक का अन्न, शूद्र का अन्न, शूद्र का संपर्क तथा सूतक से युक्त अन्न,

श्लोक 7 (skanda.2.103.7)

श्राद्धान्नमृतुशांत्याश्च जातकं नामकं तथा । श्लेष्मातकफलं चैव वर्जयेत्कार्तिकव्रती

śrāddhānnamṛtuśāṁtyāśca jātakaṁ nāmakaṁ tathā śleṣmātakaphalaṁ caiva varjayetkārtikavratī

श्राद्ध का अन्न, ऋतुशांति का अन्न, जातकर्म तथा नामकरण का अन्न, और श्लेष्मातक वृक्ष का फल — इन सबका कार्तिक-व्रती को त्याग करना चाहिए।

श्लोक 8 (skanda.2.103.8)

निषिद्धेषु च पत्रेषु भोजनं नैव कारयेत् । मधुपालाशकदलीजंबूप्लक्षमकूटिकाः । एतत्पत्रेषु भोक्तव्यं पुष्करे न कदाचन

niṣiddheṣu ca patreṣu bhojanaṁ naiva kārayet madhupālāśakadalījaṁbūplakṣamakūṭikāḥ etatpatreṣu bhoktavyaṁ puṣkare na kadācana

निषिद्ध पत्तों पर कभी भोजन नहीं करना चाहिए। मधुक, पलाश, केले, जामुन, प्लक्ष तथा मकूटिका के पत्तों पर भोजन करना चाहिए; कमल के पत्ते पर कभी नहीं।

श्लोक 9 (skanda.2.103.9)

कार्तिके मासि संप्राप्ते यः कुर्याद्वनभोजनम् । स याति परमं लोकं विष्णोर्देवस्य चक्रिणः

kārtike māsi saṁprāpte yaḥ kuryādvanabhojanam sa yāti paramaṁ lokaṁ viṣṇordevasya cakriṇaḥ

कार्तिक मास आने पर जो वन में भोजन करता है, वह चक्रधारी भगवान् विष्णु के परम लोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 10 (skanda.2.103.10)

प्रातःस्नानं तु कर्तव्यं तथैव हरिपूजनम् । कथायाः श्रवणं चैव कार्तिके शस्यते मुने

prātaḥsnānaṁ tu kartavyaṁ tathaiva haripūjanam kathāyāḥ śravaṇaṁ caiva kārtike śasyate mune

प्रातःस्नान तथा हरि-पूजन करना चाहिए; हे मुने, कार्तिक में कथा-श्रवण को भी अत्यंत प्रशंसनीय माना गया है।

श्लोक 11 (skanda.2.103.11)

गोपीचंदनदानं तु गोदानं श्रोत्रियाय च । कर्तव्यं कार्तिके मासि तेन मोक्षमवाप्नुयात्

gopīcaṁdanadānaṁ tu godānaṁ śrotriyāya ca kartavyaṁ kārtike māsi tena mokṣamavāpnuyāt

गोपीचन्दन का दान तथा वेदज्ञ ब्राह्मण को गोदान — यह कार्तिक मास में करना चाहिए, इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्लोक 12 (skanda.2.103.12)

कदलीफलदानं तु दानं धात्रीफलस्य च । वस्त्रदानं तथा कुर्याच्छीतार्ताय द्विजन्मने

kadalīphaladānaṁ tu dānaṁ dhātrīphalasya ca vastradānaṁ tathā kuryācchītārtāya dvijanmane

केले का फल तथा आँवले का दान करना चाहिए, तथा शीत से पीड़ित ब्राह्मण को वस्त्र-दान भी करना चाहिए।

श्लोक 13 (skanda.2.103.13)

शाकादिदानं कुर्वीत चान्नदानं विशेषतः । शालिग्रामस्य दानं च कर्तव्यं तु द्विजन्मने

śākādidānaṁ kurvīta cānnadānaṁ viśeṣataḥ śāligrāmasya dānaṁ ca kartavyaṁ tu dvijanmane

शाक आदि का दान करना चाहिए, विशेषतः अन्न-दान; तथा किसी ब्राह्मण को शालिग्राम का दान भी करना चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.2.103.14)

पौराणिकाय यो दद्यादामान्नं घृतपायसम् । स चैश्वर्यमवाप्नोति शतब्राह्मणभोजनात्

paurāṇikāya yo dadyādāmānnaṁ ghṛtapāyasam sa caiśvaryamavāpnoti śatabrāhmaṇabhojanāt

जो पुराण-पाठक को कच्चा अन्न या घी युक्त खीर देता है, वह सौ ब्राह्मणों को भोजन कराने से भी अधिक ऐश्वर्य प्राप्त करता है।

श्लोक 15 (skanda.2.103.15)

कमलैः पूजयेद्यस्तु कार्तिके कमलाप्रियम् । स तु पुण्यमवाप्नोति नाऽत्र कार्या विचारणा

kamalaiḥ pūjayedyastu kārtike kamalāpriyam sa tu puṇyamavāpnoti nā'tra kāryā vicāraṇā

जो कार्तिक में कमल के फूलों से लक्ष्मीपति की पूजा करता है, वह पुण्य प्राप्त करता है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 16 (skanda.2.103.16)

कार्तिके तुलसीपत्रं यो भक्त्या विष्णवेऽर्पयेत् । संसाराच्च विनिर्मुक्तो याति विष्णोः परं पदम्

kārtike tulasīpatraṁ yo bhaktyā viṣṇave'rpayet saṁsārācca vinirmukto yāti viṣṇoḥ paraṁ padam

जो कार्तिक में भक्तिपूर्वक विष्णु को तुलसी-पत्र अर्पित करता है, वह संसार-चक्र से मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 17 (skanda.2.103.17)

कार्तिके केतकीपुष्पैरर्चयेद्गरुडध्वजम् । पूजितो जन्मसाहस्रं नाऽत्र कार्या विचारणा

kārtike ketakīpuṣpairarcayedgaruḍadhvajam pūjito janmasāhasraṁ nā'tra kāryā vicāraṇā

जो कार्तिक में केतकी के पुष्पों से गरुड़ध्वज विष्णु की पूजा करता है, उसने मानो सहस्र जन्मों तक पूजा की, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 18 (skanda.2.103.18)

शंखदानं तु यः कुर्यात्तथा चक्रांकितस्य च । तस्य पापानि नश्यंति दानमात्रान्न संशयः

śaṁkhadānaṁ tu yaḥ kuryāttathā cakrāṁkitasya ca tasya pāpāni naśyaṁti dānamātrānna saṁśayaḥ

जो शंख का तथा चक्रधारी वैष्णव का दान करता है, उसके पाप केवल उस दान मात्र से नष्ट हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 19 (skanda.2.103.19)

गीतापाठं तु यः कुर्यात्कार्तिके विष्णुवल्लभे । तस्य पुण्यफलं वक्तुं नाऽलं वर्षशतैरपि

gītāpāṭhaṁ tu yaḥ kuryātkārtike viṣṇuvallabhe tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ nā'laṁ varṣaśatairapi

जो कार्तिक में, जो विष्णु को अत्यंत प्रिय है, गीता का पाठ करता है, उसके पुण्य-फल को बताने में सौ वर्ष भी पर्याप्त नहीं हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.103.20)

श्रीमद्रागवतस्याऽपि श्रवणं यः समाचरेत् । सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छति

śrīmadrāgavatasyā'pi śravaṇaṁ yaḥ samācaret sarvapāpavinirmuktaḥ paraṁ nirvāṇamṛcchati

जो श्रीमद्भागवत का भी श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर परम निर्वाण को प्राप्त करता है।

श्लोक 21 (skanda.2.103.21)

एकादश्यां निराहारमुपवासं करोति यः । पूर्वजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नाऽत्र संशयः

ekādaśyāṁ nirāhāramupavāsaṁ karoti yaḥ pūrvajanmakṛtātpāpānmucyate nā'tra saṁśayaḥ

जो एकादशी को निराहार उपवास करता है, वह पूर्वजन्मों के किए हुए पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 22 (skanda.2.103.22)

शालिग्रामस्य नैवेद्यं कोटियज्ञफलं लभेत् । अन्यदेवस्य नैवेद्यं भुक्त्वा चांद्रायणं चरेत्

śāligrāmasya naivedyaṁ koṭiyajñaphalaṁ labhet anyadevasya naivedyaṁ bhuktvā cāṁdrāyaṇaṁ caret

शालिग्राम का नैवेद्य करोड़ यज्ञों का फल देता है; अन्य देवता के नैवेद्य को भोगकर चांद्रायण व्रत करना चाहिए।

श्लोक 23 (skanda.2.103.23)

पूजाकाले तु देवस्य घण्टानादं करोति यः । हरेस्तृप्तिं परां याति मनुजो नाऽत्र संशयः

pūjākāle tu devasya ghaṇṭānādaṁ karoti yaḥ harestṛptiṁ parāṁ yāti manujo nā'tra saṁśayaḥ

जो पूजा के समय देवता के सामने घंटा बजाता है, वह मनुष्य निश्चय ही हरि की परम तृप्ति प्राप्त कराता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 24 (skanda.2.103.24)

परान्नं वर्जयेद्यस्तु कार्तिके विष्णुतुष्टये । दामोदरस्य प्रीतिं स सम्यक्प्राप्नोति मानवः

parānnaṁ varjayedyastu kārtike viṣṇutuṣṭaye dāmodarasya prītiṁ sa samyakprāpnoti mānavaḥ

जो कार्तिक में विष्णु की प्रसन्नता के लिए पराया अन्न त्यागता है, वह मनुष्य दामोदर का प्रेम पूर्ण रूप से प्राप्त करता है।

श्लोक 25 (skanda.2.103.25)

अध्वगं तु परिश्रांतं काले च गृहमागतम् । योऽतिथिं पूजयेद्भक्त्या जन्मसाहस्रनाशनम्

adhvagaṁ tu pariśrāṁtaṁ kāle ca gṛhamāgatam yo'tithiṁ pūjayedbhaktyā janmasāhasranāśanam

जो थके हुए पथिक अतिथि का, उचित समय पर घर आने पर, भक्तिपूर्वक सत्कार करता है, वह सहस्र जन्मों के पापों का नाश करता है।

श्लोक 26 (skanda.2.103.26)

निंदां कुर्वंति ये मूढा वैष्णवानां महात्मनाम् । पतंति पितृभिः सार्द्धं महारौरव संज्ञके

niṁdāṁ kurvaṁti ye mūḍhā vaiṣṇavānāṁ mahātmanām pataṁti pitṛbhiḥ sārddhaṁ mahāraurava saṁjñake

जो मूढ़ लोग महात्मा वैष्णवों की निंदा करते हैं, वे अपने पितरों सहित महारौरव नामक नरक में गिरते हैं।

श्लोक 27 (skanda.2.103.27)

दृष्ट्वा भागवतान्विप्रान्सन्मुखो न च याति हि । न गृह्णाति हरिस्तस्य पूजां द्वादशवार्षिकीम्

dṛṣṭvā bhāgavatānviprānsanmukho na ca yāti hi na gṛhṇāti haristasya pūjāṁ dvādaśavārṣikīm

जो भागवत ब्राह्मणों को देखकर उनके सम्मुख नहीं जाता, उसकी बारह वर्षों तक की पूजा को भी हरि स्वीकार नहीं करते।

श्लोक 28 (skanda.2.103.28)

निंदां भगवतः शृण्वंस्तत्परस्य जनस्य च । ततो नाऽपैति यः सोऽपि हरेः प्रियतमो नहि

niṁdāṁ bhagavataḥ śṛṇvaṁstatparasya janasya ca tato nā'paiti yaḥ so'pi hareḥ priyatamo nahi

जो भगवान् की या उनके परायण भक्त की निंदा सुनकर भी वहाँ से नहीं हटता, वह भी हरि को प्रिय नहीं है।

श्लोक 29 (skanda.2.103.29)

प्रदक्षिणां तु यः कुर्यात्कार्तिके केशवस्य हि । पदेपदेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयः

pradakṣiṇāṁ tu yaḥ kuryātkārtike keśavasya hi padepade'śvamedhasya phalaṁ prāpnotyasaṁśayaḥ

जो कार्तिक में केशव की प्रदक्षिणा करता है, वह प्रत्येक पग पर अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 30 (skanda.2.103.30)

दंडप्रणामं यः कुर्यात्कार्तिके केशवाऽग्रतः । राजसूयाऽश्वमेधानां फलं प्राप्नोत्यसंशयः

daṁḍapraṇāmaṁ yaḥ kuryātkārtike keśavā'grataḥ rājasūyā'śvamedhānāṁ phalaṁ prāpnotyasaṁśayaḥ

जो कार्तिक में केशव के सामने दंडवत् प्रणाम करता है, वह राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 31 (skanda.2.103.31)

कुटुम्बभोजनं चैव कार्तिके भक्तिसंयुतः । कारयेद्विप्रशार्दूल तस्य पुण्यमनंतकम्

kuṭumbabhojanaṁ caiva kārtike bhaktisaṁyutaḥ kārayedvipraśārdūla tasya puṇyamanaṁtakam

हे विप्रशार्दूल, जो भक्तिसहित कार्तिक में कुटुम्ब को भोजन कराता है, उसका पुण्य अनंत होता है।

श्लोक 32 (skanda.2.103.32)

परस्त्रीसंगमं यस्तु कार्तिके कुरुते नरः । तस्य पापस्य विश्रांतिर्यावद्वक्तुं न शक्यते

parastrīsaṁgamaṁ yastu kārtike kurute naraḥ tasya pāpasya viśrāṁtiryāvadvaktuṁ na śakyate

जो मनुष्य कार्तिक में परस्त्री-गमन करता है, उसके पाप की सीमा बताई ही नहीं जा सकती।

श्लोक 33 (skanda.2.103.33)

तुलसीमृत्तिकापुंड्रं ललाटे यस्य दृश्यते । यमस्तं नेक्षितुं शक्तः किमु दूता भयंकराः

tulasīmṛttikāpuṁḍraṁ lalāṭe yasya dṛśyate yamastaṁ nekṣituṁ śaktaḥ kimu dūtā bhayaṁkarāḥ

जिसके ललाट पर तुलसी-मिट्टी का तिलक दिखाई देता है, उसे यम भी देख नहीं सकते, फिर भयंकर यमदूतों की तो बात ही क्या!

श्लोक 34 (skanda.2.103.34)

शाकं वा लवणं वाऽपि यत्किंचिद्वा भविष्यति । तद्देयं कार्तिके मासि प्रीत्यर्थं शार्ङ्गधन्वनः

śākaṁ vā lavaṇaṁ vā'pi yatkiṁcidvā bhaviṣyati taddeyaṁ kārtike māsi prītyarthaṁ śārṅgadhanvanaḥ

चाहे शाक हो, नमक हो अथवा जो कुछ भी हो, उसे कार्तिक मास में शार्ङ्गधन्वा (विष्णु) की प्रसन्नता के लिए दान करना चाहिए।

श्लोक 35 (skanda.2.103.35)

इत्याद्या बहवो धर्माः कार्तिके विष्णुवल्लभाः । यथाशक्त्या प्रकुर्वीत धर्मं देवस्य तुष्टिदम्

ityādyā bahavo dharmāḥ kārtike viṣṇuvallabhāḥ yathāśaktyā prakurvīta dharmaṁ devasya tuṣṭidam

इस प्रकार कार्तिक में विष्णु को प्रिय अनेक धर्म हैं; अपनी शक्ति के अनुसार भगवान् को संतुष्ट करने वाले धर्म का पालन करना चाहिए।

श्लोक 36 (skanda.2.103.36)

हरिसंतुष्टये कार्यस्त्यागो वा स्वेष्टवस्तुनः । मासांते द्विजवर्याय दद्यात्तद्व्रतपूर्तये

harisaṁtuṣṭaye kāryastyāgo vā sveṣṭavastunaḥ māsāṁte dvijavaryāya dadyāttadvratapūrtaye

हरि की संतुष्टि के लिए अपनी किसी प्रिय वस्तु का त्याग करना चाहिए; मास के अंत में उस वस्तु को व्रत की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दे देना चाहिए।

श्लोक 37 (skanda.2.103.37)

सर्वव्रतानि चैकत्र सत्यव्रतमथैकतः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सत्यं भाषेत सर्वदा

sarvavratāni caikatra satyavratamathaikataḥ tasmātsarvaprayatnena satyaṁ bhāṣeta sarvadā

एक ओर सभी व्रत, दूसरी ओर अकेला सत्य-व्रत — इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से सदा सत्य ही बोलना चाहिए।

श्लोक 38 (skanda.2.103.38)

अन्यधर्मेष्वधिकृतिः कुलजातिविभागतः । अधिकारी कार्तिके तु सर्व एव जनो भवेत्

anyadharmeṣvadhikṛtiḥ kulajātivibhāgataḥ adhikārī kārtike tu sarva eva jano bhavet

अन्य धर्मों में अधिकार कुल और जाति के विभाजन से निर्धारित होता है; परन्तु कार्तिक के धर्म में सभी मनुष्य अधिकारी हैं।

श्लोक 39 (skanda.2.103.39)

गोग्रासः कार्तिके मासि विशेषाद्यैस्तु दीयते । तेषां पुण्यफलं वक्तुं न शक्नोति पितामहः

gogrāsaḥ kārtike māsi viśeṣādyaistu dīyate teṣāṁ puṇyaphalaṁ vaktuṁ na śaknoti pitāmahaḥ

जो लोग कार्तिक मास में विशेष रूप से गाय को कौर देते हैं, उनके पुण्य-फल को स्वयं पितामह ब्रह्मा भी बताने में समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 40 (skanda.2.103.40)

विष्णुदेवालयं प्रातः संमार्जयति कार्तिके । तस्य वैकुंठभवने जायते सुदृढं गृहम्

viṣṇudevālayaṁ prātaḥ saṁmārjayati kārtike tasya vaikuṁṭhabhavane jāyate sudṛḍhaṁ gṛham

जो कार्तिक में प्रातःकाल विष्णु-मंदिर को साफ करता है, उसके लिए वैकुण्ठ-धाम में एक सुदृढ़ भवन उत्पन्न होता है।

श्लोक 41 (skanda.2.103.41)

दद्यात्कार्तिकमासे तु धर्मकाष्ठानि भूरिशः । न तत्पुण्यस्य नाशोस्ति कल्पकोटिशतैरपि

dadyātkārtikamāse tu dharmakāṣṭhāni bhūriśaḥ na tatpuṇyasya nāśosti kalpakoṭiśatairapi

जो कार्तिक मास में प्रचुर मात्रा में धर्म-काष्ठ (यज्ञ अथवा आश्रय हेतु लकड़ी) देता है, उसका पुण्य सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी नष्ट नहीं होता।

श्लोक 42 (skanda.2.103.42)

सुधादि लेपयेद्यस्तु कार्तिके विष्णुमंदिरे । चित्रादिकं लिखेद्वाऽपि मोदते विष्णुसन्निधौ

sudhādi lepayedyastu kārtike viṣṇumaṁdire citrādikaṁ likhedvā'pi modate viṣṇusannidhau

जो कार्तिक में विष्णु-मंदिर में चूना आदि लगवाता है, अथवा चित्रादि बनवाता है, वह विष्णु के समीप ही आनंदित होता है।

श्लोक 43 (skanda.2.103.43)

देवालये वा तीर्थे वा कृतो दुष्टैर्नृपैः करः । तं मोचयंति ये लोकास्तेषां धर्मः सनातनः

devālaye vā tīrthe vā kṛto duṣṭairnṛpaiḥ karaḥ taṁ mocayaṁti ye lokāsteṣāṁ dharmaḥ sanātanaḥ

मंदिर या तीर्थ पर दुष्ट राजाओं द्वारा लगाए गए कर को जो लोग हटवाते हैं, उनका धर्म सनातन है।

श्लोक 44 (skanda.2.103.44)

कार्तिके मासि यो विप्रो गभस्तीश्वरसन्निधौ । शतरुद्रीजपं कुर्यान्मंत्रसिद्धिः प्रजायते

kārtike māsi yo vipro gabhastīśvarasannidhau śatarudrījapaṁ kuryānmaṁtrasiddhiḥ prajāyate

कार्तिक मास में जो ब्राह्मण गभस्तीश्वर के समीप शतरुद्रीय का जप करता है, उसे मंत्र-सिद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 45 (skanda.2.103.45)

वाराणस्यां तु यैः स्थित्वा त्रिवर्षं कार्तिकव्रतम् । सोपांगं सांगं यैर्मर्त्यैः कृतं भक्त्यैकतत्परैः

vārāṇasyāṁ tu yaiḥ sthitvā trivarṣaṁ kārtikavratam sopāṁgaṁ sāṁgaṁ yairmartyaiḥ kṛtaṁ bhaktyaikatatparaiḥ

जो मनुष्य वाराणसी में रहकर तीन वर्ष तक, एकाग्र भक्ति से युक्त होकर, सांगोपांग कार्तिक-व्रत करते हैं,

श्लोक 46 (skanda.2.103.46)

इह लोके फलं तेषां प्रत्यक्षं जायते किल । संपत्त्या चैव संतत्या यशोभिर्धर्मबुद्धिभिः

iha loke phalaṁ teṣāṁ pratyakṣaṁ jāyate kila saṁpattyā caiva saṁtatyā yaśobhirdharmabuddhibhiḥ

उनका फल इसी लोक में प्रत्यक्ष रूप से सामने आता है — सम्पत्ति, संतान, यश तथा धर्मयुक्त बुद्धि के द्वारा।

श्लोक 47 (skanda.2.103.47)

पलांडुं शृंगं मांसं च शय्यां सौवीरकं तथा । राजिकोन्मादिकं चाऽपि चिपिटान्नं च वर्जयेत्

palāṁḍuṁ śṛṁgaṁ māṁsaṁ ca śayyāṁ sauvīrakaṁ tathā rājikonmādikaṁ cā'pi cipiṭānnaṁ ca varjayet

प्याज, सींग-संबंधी वस्तु, मांस, सुखद शय्या, सौवीरक, राई से बना मादक पदार्थ तथा चिवड़ा — इनका त्याग करना चाहिए।

श्लोक 48 (skanda.2.103.48)

धात्रीफलं भानुवारे परदेशागमं तथा । तीर्थं विना सदैवेह वर्जयेत्कार्तिकव्रती

dhātrīphalaṁ bhānuvāre paradeśāgamaṁ tathā tīrthaṁ vinā sadaiveha varjayetkārtikavratī

रविवार को आँवला तथा परदेश-गमन — तीर्थयात्रा के अतिरिक्त कार्तिक-व्रती को सदा इनका त्याग करना चाहिए।

श्लोक 49 (skanda.2.103.49)

देववेदद्विजातीनां गुरुगोव्रतिनां तथा । स्त्रीराजमहतां निंदां वर्जयेत्कार्तिकव्रती

devavedadvijātīnāṁ gurugovratināṁ tathā strīrājamahatāṁ niṁdāṁ varjayetkārtikavratī

देवता, वेद, ब्राह्मण, गुरु, गाय तथा सहव्रतियों की निंदा, तथा स्त्री, राजा और महात्माओं की निंदा — कार्तिक-व्रती को इनका त्याग करना चाहिए।

श्लोक 50 (skanda.2.103.50)

नरकस्य चतुर्दश्यां तैलाभ्यंगं च कारयेत् । अन्यत्र कार्तिके मासि तैलस्नानं विवर्जयेत् । नालिकां मूलकं चैव कूष्मांडं च कपित्थकम्

narakasya caturdaśyāṁ tailābhyaṁgaṁ ca kārayet anyatra kārtike māsi tailasnānaṁ vivarjayet nālikāṁ mūlakaṁ caiva kūṣmāṁḍaṁ ca kapitthakam

नरक-चतुर्दशी को तेल की मालिश करानी चाहिए; कार्तिक मास के अन्य दिनों में तेल-स्नान का त्याग करना चाहिए। कमलनाल, मूली, कद्दू तथा कैथ का फल भी वर्जित हैं,

श्लोक 51 (skanda.2.103.51)

रजस्वलांत्यज म्लेच्छ पतितऽव्रतिकैस्तथा । द्विजद्विड्वेदबाह्यैश्च न वदेत्सर्वदा व्रती

rajasvalāṁtyaja mleccha patita'vratikaistathā dvijadviḍvedabāhyaiśca na vadetsarvadā vratī

रजस्वला स्त्री, अंत्यज, म्लेच्छ, पतित तथा अव्रती के साथ, और ब्राह्मणद्रोही, वेदबाह्य पुरुषों के साथ व्रती को सदा वार्तालाप नहीं करना चाहिए।

श्लोक 52 (skanda.2.103.52)

एभिर्दृष्टं च काकैश्च सूतिकान्नं च यद्भवेत् । द्विःपाचितं च दग्धान्नं नैवाद्याद्वैष्णवव्रती

ebhirdṛṣṭaṁ ca kākaiśca sūtikānnaṁ ca yadbhavet dviḥpācitaṁ ca dagdhānnaṁ naivādyādvaiṣṇavavratī

इनके द्वारा तथा कौओं द्वारा देखा गया अन्न, सूतक-गृह का अन्न, दुबारा पकाया गया अन्न तथा जला हुआ अन्न — वैष्णव व्रती को कभी नहीं खाना चाहिए।

श्लोक 53 (skanda.2.103.53)

क्रमात्कूष्मांडबृहतीतरुणीमूलकं तथा । श्रीफलं च कलिंगं च फलं धात्रीभवं तथा

kramātkūṣmāṁḍabṛhatītaruṇīmūlakaṁ tathā śrīphalaṁ ca kaliṁgaṁ ca phalaṁ dhātrībhavaṁ tathā

क्रमशः कद्दू, बैंगन, तरुणी-मूली, श्रीफल (बेल), तरबूज तथा आँवले का फल —

श्लोक 54 (skanda.2.103.54)

नारिकेलमलाबुं च पटोलं बृहतीफलम् । चर्मवृंताकचवलीशाकं तुलसिजं तथा

nārikelamalābuṁ ca paṭolaṁ bṛhatīphalam carmavṛṁtākacavalīśākaṁ tulasijaṁ tathā

नारियल, लौकी, परवल, बड़ा बैंगन, बैंगन का छिलका, लोबिया-शाक तथा तुलसी से उत्पन्न कोई भी वस्तु —

श्लोक 55 (skanda.2.103.55)

शाकान्येतानि वर्ज्यानि क्रमात्प्रतिपदादिषु । एवमेव हि माघेऽपि कुर्य्याच्च नियमान्व्रती

śākānyetāni varjyāni kramātpratipadādiṣu evameva hi māghe'pi kuryyācca niyamānvratī

ये शाक क्रमशः प्रतिपदा आदि तिथियों में वर्जित हैं; इसी प्रकार व्रती को माघ मास में भी ये नियम पालन करने चाहिए।

श्लोक 56 (skanda.2.103.56)

कार्तिकव्रतिनः पुण्यं यथोक्तव्रतकारिणः । न समर्थो भवेद्वक्तुं ब्रह्माऽपीह चतुर्मुखः

kārtikavratinaḥ puṇyaṁ yathoktavratakāriṇaḥ na samartho bhavedvaktuṁ brahmā'pīha caturmukhaḥ

जैसा कहा गया, उस विधि से व्रत करने वाले कार्तिक-व्रती के पुण्य को बताने में स्वयं चार मुख वाले ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हैं।

अध्याय 102अध्याय-सूचीअध्याय 104