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वैष्णव खण्ड · अध्याय 104

दीपदानमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 103अध्याय-सूचीअध्याय 105

श्लोक 1 (skanda.2.104.1)

नारद उवाच । भगवन्कृतकृत्योऽस्मि तव पादसमाश्रयात् । श्रोतव्यं नेह भूयो मे विद्यते देवसत्तम

nārada uvāca bhagavankṛtakṛtyo'smi tava pādasamāśrayāt śrotavyaṁ neha bhūyo me vidyate devasattama

नारद ने कहा — हे भगवन्, आपके चरणों की शरण से मैं कृतकृत्य हो गया हूँ; हे देवसत्तम, अब मुझे और कुछ सुनना शेष नहीं है।

श्लोक 2 (skanda.2.104.2)

तथापि भगवन्किंचित्प्रष्टव्यं मे हृदि स्थितम् । त्वद्वाक्यामृतपीतस्य न मे तृप्तिर्हि जायते

tathāpi bhagavankiṁcitpraṣṭavyaṁ me hṛdi sthitam tvadvākyāmṛtapītasya na me tṛptirhi jāyate

फिर भी, हे भगवन्, मेरे हृदय में कुछ पूछना शेष है; आपके वचन-रूपी अमृत का पान करते हुए मुझे तृप्ति ही नहीं होती।

श्लोक 3 (skanda.2.104.3)

दीपदानस्य माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि ते प्रभो । येन चाऽपि पुरा दत्तस्तद्वदस्व चतुर्मुख

dīpadānasya māhātmyaṁ śrotumicchāmi te prabho yena cā'pi purā dattastadvadasva caturmukha

हे प्रभो, मैं दीपदान का माहात्म्य सुनना चाहता हूँ; तथा यह भी बताइए कि इसे पहले किसने दिया था, हे चतुर्मुख।

श्लोक 4 (skanda.2.104.4)

ब्रह्मोवाच । प्रातः स्नात्वा शुचिर्भूत्वा दीपं दद्यात्प्रयत्नतः । तेन पापानि नश्येयुस्तमांसीव भगोदये

brahmovāca prātaḥ snātvā śucirbhūtvā dīpaṁ dadyātprayatnataḥ tena pāpāni naśyeyustamāṁsīva bhagodaye

ब्रह्माजी ने कहा — प्रातःकाल स्नान करके, शुद्ध होकर, यत्नपूर्वक दीप देना चाहिए; इससे पाप उसी प्रकार नष्ट होते हैं जैसे सूर्योदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है।

श्लोक 5 (skanda.2.104.5)

आजन्म यत्कृतं पापं स्त्रिया वा पुरुषेण च । तत्सर्वं नाशमायाति कार्तिके दीपदानतः

ājanma yatkṛtaṁ pāpaṁ striyā vā puruṣeṇa ca tatsarvaṁ nāśamāyāti kārtike dīpadānataḥ

जन्म से लेकर स्त्री अथवा पुरुष द्वारा किया गया जो भी पाप हो, वह सब कार्तिक में दीपदान से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 6 (skanda.2.104.6)

अत्र ते वर्णयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् । श्रवणात्सर्वपापघ्नं दीपदानफलप्रदम्

atra te varṇayiṣyāmi itihāsaṁ purātanam śravaṇātsarvapāpaghnaṁ dīpadānaphalapradam

यहाँ मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ, जो सुनने मात्र से ही सम्पूर्ण पापों का नाश करता है और दीपदान का फल प्रदान करता है।

श्लोक 7 (skanda.2.104.7)

पुरा द्रविडदेशे तु ब्राह्मणो बुद्धनामकः । तस्य भार्याऽभवद्दुष्टा अनाचाररता मुने

purā draviḍadeśe tu brāhmaṇo buddhanāmakaḥ tasya bhāryā'bhavadduṣṭā anācāraratā mune

पूर्वकाल में द्रविड़ देश में बुद्ध नामक एक ब्राह्मण था; हे मुने, उसकी पत्नी दुष्ट और दुराचार में लिप्त थी।

श्लोक 8 (skanda.2.104.8)

तस्याः संसर्गदोषेण क्षीणाऽऽयुर्मृतिमाप्तवान् । पत्यौ मृतेऽपि सा पत्नी अनाचारे विशेषतः

tasyāḥ saṁsargadoṣeṇa kṣīṇā''yurmṛtimāptavān patyau mṛte'pi sā patnī anācāre viśeṣataḥ

उसके संसर्ग-दोष से उसकी आयु क्षीण होकर वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। पति की मृत्यु के बाद भी वह पत्नी दुराचार में और भी अधिक,

श्लोक 9 (skanda.2.104.9)

रताभून्न हि तस्यास्तु लज्जा लोकापवादतः । सुतबंधुविहीना सा सदाभिक्षान्नभोजना

ratābhūnna hi tasyāstu lajjā lokāpavādataḥ sutabaṁdhuvihīnā sā sadābhikṣānnabhojanā

लिप्त रही; लोक-निंदा से उसे तनिक भी लज्जा नहीं होती थी। पुत्र-बंधुओं से रहित वह सदा भिक्षा का अन्न खाती,

श्लोक 10 (skanda.2.104.10)

न संस्कारान्नमल्पं वा भुक्त्वा पर्युषिताशिनी । परपाकरता नित्यं तीर्थयात्रादिवर्जिता

na saṁskārānnamalpaṁ vā bhuktvā paryuṣitāśinī parapākaratā nityaṁ tīrthayātrādivarjitā

संस्कारयुक्त अन्न कभी थोड़ा भी न खाकर बासी अन्न खाती थी; वह सदा दूसरों के बनाए भोजन में रत रहती, तीर्थयात्रा आदि से रहित थी,

श्लोक 11 (skanda.2.104.11)

कथायाः श्रवणं चैव न श्रुतं तु तया द्विज । एकदा ब्राह्मणः कश्चित्तीर्थयात्रापरायणः

kathāyāḥ śravaṇaṁ caiva na śrutaṁ tu tayā dvija ekadā brāhmaṇaḥ kaścittīrthayātrāparāyaṇaḥ

तथा, हे द्विज, उसने कभी कथा-श्रवण भी नहीं किया था। एक बार कोई तीर्थयात्रा में तत्पर ब्राह्मण,

श्लोक 12 (skanda.2.104.12)

तस्या गृहं समागच्छद्विद्वान्वै कुत्सनामकः । अनाचाररतां तां तु दृष्ट्वा ब्रह्मर्षिसत्तमः । कोपेन रक्तचक्षुः संस्तामुवाचाऽसतीं स्त्रियम्

tasyā gṛhaṁ samāgacchadvidvānvai kutsanāmakaḥ anācāraratāṁ tāṁ tu dṛṣṭvā brahmarṣisattamaḥ kopena raktacakṣuḥ saṁstāmuvācā'satīṁ striyam

कुत्स नामक विद्वान् उसके घर आया। उस ब्रह्मर्षिश्रेष्ठ ने उसे दुराचार में लीन देखकर, क्रोध से लाल आँखों से उस असती स्त्री से कहा —

श्लोक 13 (skanda.2.104.13)

कुत्स उवाच । वक्ष्यामि सांप्रतं मूढे मद्वाक्यमवधारय

kutsa uvāca vakṣyāmi sāṁprataṁ mūḍhe madvākyamavadhāraya

कुत्स ने कहा — हे मूढ़े, अब मैं कहता हूँ, मेरे वचन को ध्यान से सुनो।

श्लोक 14 (skanda.2.104.14)

दुःखहेतुमिमं देहं पूयशोणितपूरितम् । पंचभूतात्मकं चैव किं च पुष्णासि दूतिके

duḥkhahetumimaṁ dehaṁ pūyaśoṇitapūritam paṁcabhūtātmakaṁ caiva kiṁ ca puṣṇāsi dūtike

पीब और रक्त से भरे, पाँच तत्त्वों से बने, दुःख के कारण-स्वरूप इस शरीर का तू क्यों इतना पोषण करती है, हे दूती!

श्लोक 15 (skanda.2.104.15)

जलबुद्बुदवद्देहो नाशमायाति निश्चितम् । अनित्यं देहमाश्रित्य नित्यं त्वं मन्यसे हृदि

jalabudbudavaddeho nāśamāyāti niścitam anityaṁ dehamāśritya nityaṁ tvaṁ manyase hṛdi

यह शरीर जल के बुलबुले के समान है, निश्चय ही नष्ट हो जाएगा; इस अनित्य शरीर के आश्रय में रहते हुए तू इसे हृदय में नित्य मानती है।

श्लोक 16 (skanda.2.104.16)

तस्मादंतःस्थितं मोहं त्यज मूढे विचारतः । स्मर सर्वोत्तमं देवं कुरु श्रवणमादरात्

tasmādaṁtaḥsthitaṁ mohaṁ tyaja mūḍhe vicārataḥ smara sarvottamaṁ devaṁ kuru śravaṇamādarāt

इसलिए, हे मूढ़े, विचारपूर्वक अपने भीतर स्थित इस मोह को त्याग दे; सर्वोत्तम भगवान् का स्मरण कर, आदरपूर्वक उनकी कथा सुन।

श्लोक 17 (skanda.2.104.17)

कार्तिके मासि संप्राप्ते स्नानदानादिकं कुरु । दामोदरस्य प्रीत्यर्थं दीपदानं तथा कुरु

kārtike māsi saṁprāpte snānadānādikaṁ kuru dāmodarasya prītyarthaṁ dīpadānaṁ tathā kuru

कार्तिक मास आने पर स्नान-दान आदि कर, तथा दामोदर की प्रसन्नता के लिए दीपदान भी कर।

श्लोक 18 (skanda.2.104.18)

लक्षवर्त्यादिकं चैव लक्षपद्मादिकं तथा । प्रदक्षिणां तु देवस्य नमस्कारं तथैव च

lakṣavartyādikaṁ caiva lakṣapadmādikaṁ tathā pradakṣiṇāṁ tu devasya namaskāraṁ tathaiva ca

लाख बत्तियाँ और लाख कमल आदि अर्पित कर, देवता की प्रदक्षिणा तथा नमस्कार भी कर,

श्लोक 19 (skanda.2.104.19)

धारणं पारणं चैव कुरु भक्त्या हि कार्तिके । विधवानां व्रतमिदं सधवानां तथैव च

dhāraṇaṁ pāraṇaṁ caiva kuru bhaktyā hi kārtike vidhavānāṁ vratamidaṁ sadhavānāṁ tathaiva ca

तथा कार्तिक में भक्तिपूर्वक व्रत-धारण और पारण कर। यह व्रत विधवाओं के लिए तथा सुहागिन स्त्रियों के लिए भी समान रूप से है।

श्लोक 20 (skanda.2.104.20)

सर्वपापप्रशमनं सर्वोपद्रवनाशनम् । तत्राऽपि कार्तिके मासि दीयतां दीप उत्तमः

sarvapāpapraśamanaṁ sarvopadravanāśanam tatrā'pi kārtike māsi dīyatāṁ dīpa uttamaḥ

यह सम्पूर्ण पापों को शांत करने वाला तथा सभी उपद्रवों का नाश करने वाला है; इसलिए कार्तिक मास में उत्तम दीप अवश्य देना चाहिए।

श्लोक 21 (skanda.2.104.21)

दीपो हरेः प्रियकरः कार्तिके मासि निश्चितम् । महापातककृद्वापि दीपदानात्प्रमुच्यते

dīpo hareḥ priyakaraḥ kārtike māsi niścitam mahāpātakakṛdvāpi dīpadānātpramucyate

कार्तिक मास में दीप हरि को निश्चय ही अत्यंत प्रिय है; महापातकी भी दीपदान से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 22 (skanda.2.104.22)

पुरा कश्चिद्द्विजवरो नाम्ना हरिकरो ह्यभूत् । अधर्मविषयासक्तः शश्वद्वेश्यारतो द्विजः

purā kaściddvijavaro nāmnā harikaro hyabhūt adharmaviṣayāsaktaḥ śaśvadveśyārato dvijaḥ

पूर्वकाल में हरिकर नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था, जो अधर्म में आसक्त तथा सदा वेश्या में रत रहता था,

श्लोक 23 (skanda.2.104.23)

पितृवित्तक्षयकरो वंशच्छेदे कुठारकः । कदाचित्तेन विधवे द्यूते पितृधनं महत्

pitṛvittakṣayakaro vaṁśacchede kuṭhārakaḥ kadācittena vidhave dyūte pitṛdhanaṁ mahat

वह अपने पिता के धन का नाश करने वाला तथा अपने वंश को काटने वाली कुल्हाड़ी के समान था। एक बार उसने द्यूत में पिता का विशाल धन,

श्लोक 24 (skanda.2.104.24)

हारितं दुष्टसंसर्गात्ततो दुःखी स चाऽभवत् । कदाचित्साधुसंसर्गात्तीर्थयात्राप्रसंगतः

hāritaṁ duṣṭasaṁsargāttato duḥkhī sa cā'bhavat kadācitsādhusaṁsargāttīrthayātrāprasaṁgataḥ

दुष्ट संगति के कारण हार दिया, और तब वह अत्यंत दुःखी हो गया। एक बार किसी साधु के संसर्ग से, तीर्थयात्रा के प्रसंग में,

श्लोक 25 (skanda.2.104.25)

अयोध्यामागतो वत्से महापापकरो द्विजः । कार्तिके मासि संप्राप्तः श्रीमद्द्विजगृहे सदा

ayodhyāmāgato vatse mahāpāpakaro dvijaḥ kārtike māsi saṁprāptaḥ śrīmaddvijagṛhe sadā

वह महापापी ब्राह्मण, हे वत्स, अयोध्या आया। कार्तिक मास में वहाँ पहुँचकर वह सदा एक धनी ब्राह्मण के घर रहा।

श्लोक 26 (skanda.2.104.26)

द्यूतव्याजेन तेनाऽऽशु दीपो दत्तो हरेः पुरः । ततः कालांतरे विप्रो मृतो मोक्षमवाप्तवान्

dyūtavyājena tenā''śu dīpo datto hareḥ puraḥ tataḥ kālāṁtare vipro mṛto mokṣamavāptavān

जुए के बहाने से ही उसने तुरंत हरि के सामने एक दीप जला दिया। तत्पश्चात् कुछ समय बाद वह ब्राह्मण मरकर मोक्ष को प्राप्त हुआ।

श्लोक 27 (skanda.2.104.27)

महापातककृद्वाऽपि गतवानभयं हरिम् । तस्मात्त्वं कार्तिके मासि दीपदानं तथा कुरु

mahāpātakakṛdvā'pi gatavānabhayaṁ harim tasmāttvaṁ kārtike māsi dīpadānaṁ tathā kuru

महापातकी भी हरि की शरण में जाकर निर्भय हो जाता है; इसलिए तू भी कार्तिक मास में इसी प्रकार दीपदान कर,

श्लोक 28 (skanda.2.104.28)

तथाऽन्यान्यपि दानानि कुरु भक्तिसमन्विता । इत्यादिश्याथ तां कुत्सो जगामाऽन्यगृहं द्विजः

tathā'nyānyapi dānāni kuru bhaktisamanvitā ityādiśyātha tāṁ kutso jagāmā'nyagṛhaṁ dvijaḥ

तथा भक्तिसहित अन्य दान भी कर।" ऐसा उपदेश देकर वह ब्राह्मण कुत्स दूसरे घर चला गया।

श्लोक 29 (skanda.2.104.29)

साऽपि कुत्सवचः श्रुत्वा पश्चात्तापेन संयुता । व्रतं तु कार्तिके मासि करिष्यामीति निश्चिता

sā'pi kutsavacaḥ śrutvā paścāttāpena saṁyutā vrataṁ tu kārtike māsi kariṣyāmīti niścitā

वह स्त्री भी कुत्स के वचन सुनकर पश्चाताप से भर गई; उसने निश्चय किया कि वह कार्तिक मास में व्रत करेगी।

श्लोक 30 (skanda.2.104.30)

पतंगोदयवेलायां कार्तिके स्नानमंभसि । दीपदानं व्रतम् चैव मासमेकं चकार सा

pataṁgodayavelāyāṁ kārtike snānamaṁbhasi dīpadānaṁ vratam caiva māsamekaṁ cakāra sā

सूर्योदय के समय कार्तिक में जल में स्नान करके, उसने एक मास तक दीपदान और व्रत किया।

श्लोक 31 (skanda.2.104.31)

ततः कालांतरे चैव गतायुर्मृतिमागता । दीपदानस्य माहात्म्यान्महापापकृदप्यसौ

tataḥ kālāṁtare caiva gatāyurmṛtimāgatā dīpadānasya māhātmyānmahāpāpakṛdapyasau

तत्पश्चात् कुछ समय बाद उसकी आयु समाप्त होकर वह मृत्यु को प्राप्त हुई; दीपदान के माहात्म्य से, महापातकी होते हुए भी वह,

श्लोक 32 (skanda.2.104.32)

स्वर्गमार्गं गता सा स्त्री काले मोक्षमवाप ह । तस्मान्नारद माहात्म्यं दीपदानस्य को वदेत्

svargamārgaṁ gatā sā strī kāle mokṣamavāpa ha tasmānnārada māhātmyaṁ dīpadānasya ko vadet

स्वर्ग-मार्ग को प्राप्त हुई और समय आने पर मोक्ष भी पाया। इसलिए, हे नारद, दीपदान के माहात्म्य को कौन कह सकता है?

श्लोक 33 (skanda.2.104.33)

कार्तिके दीपदानं तु महापुण्यफलप्रदम् । कार्तिकव्रतनिष्ठो यो दीपदानादिकृन्नरः

kārtike dīpadānaṁ tu mahāpuṇyaphalapradam kārtikavrataniṣṭho yo dīpadānādikṛnnaraḥ

कार्तिक में दीपदान महान् पुण्य-फल देने वाला है; जो मनुष्य कार्तिक-व्रत में तत्पर होकर दीपदान आदि करता है,

श्लोक 34 (skanda.2.104.34)

दीपदानस्येतिहासं शृण्वन्वै मोक्षमाप्नुयात् । दीपदानस्य माहात्म्यं वक्तुं केनेह शक्यते । परदीपप्रबोधस्य माहात्म्यं शृणु नारद

dīpadānasyetihāsaṁ śṛṇvanvai mokṣamāpnuyāt dīpadānasya māhātmyaṁ vaktuṁ keneha śakyate paradīpaprabodhasya māhātmyaṁ śṛṇu nārada

और दीपदान का यह इतिहास सुनता है, वह निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करता है। दीपदान के माहात्म्य को यहाँ कौन कह सकता है? हे नारद, अब परदीप-प्रबोधन (दूसरे के दीये को जलाए रखने) का माहात्म्य सुनो।

श्लोक 35 (skanda.2.104.35)

स्वस्याऽपि शक्तिराहित्ये परस्याऽपि प्रबोधनम् । यः कुर्याल्लभते सोऽपि नाऽत्र कार्या विचारणा

svasyā'pi śaktirāhitye parasyā'pi prabodhanam yaḥ kuryāllabhate so'pi nā'tra kāryā vicāraṇā

जो अपनी सामर्थ्य के अभाव में भी दूसरे के दीये को जलाए रखता है, उसे भी वही फल मिलता है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 36 (skanda.2.104.36)

दीपार्थं वर्तिकां तैलं पात्रं वा यो ददाति हि । सहायं वाऽथ कुरुते ददतां दीपमुत्तमम्

dīpārthaṁ vartikāṁ tailaṁ pātraṁ vā yo dadāti hi sahāyaṁ vā'tha kurute dadatāṁ dīpamuttamam

जो दीप के लिए बत्ती, तेल अथवा पात्र देता है, अथवा दीप देने वालों की सहायता करता है,

श्लोक 37 (skanda.2.104.37)

स तु मोक्षमवाप्नोति नाऽत्र कार्या विचारणा । कार्तिके दीपदानस्य माहात्म्यं को नु वर्णयेत्

sa tu mokṣamavāpnoti nā'tra kāryā vicāraṇā kārtike dīpadānasya māhātmyaṁ ko nu varṇayet

वह भी मोक्ष प्राप्त करता है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं। कार्तिक में दीपदान के माहात्म्य का वर्णन भला कौन कर सकता है?

श्लोक 38 (skanda.2.104.38)

स्वस्यापि शक्तिराहित्ये परदीपं प्रबोधयेत् । सोऽपि तत्फलमाप्नोति नाऽत्र कार्या विचारणा

svasyāpi śaktirāhitye paradīpaṁ prabodhayet so'pi tatphalamāpnoti nā'tra kāryā vicāraṇā

अपनी सामर्थ्य के अभाव में भी जो दूसरे के दीये को जलाए रखता है, वह भी वही फल प्राप्त करता है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 39 (skanda.2.104.39)

वेश्या चेन्दुमतीनाम तस्या गेहेऽथ मूषिका । परदीपप्रबोधेन मोक्षं प्राप सुदुर्लभम्

veśyā cendumatīnāma tasyā gehe'tha mūṣikā paradīpaprabodhena mokṣaṁ prāpa sudurlabham

इन्दुमती नामक एक वेश्या थी; उसके घर में एक चूहा था, जिसने केवल दूसरे के दीये को जलाए रखने मात्र से अत्यंत दुर्लभ मोक्ष प्राप्त किया।

श्लोक 40 (skanda.2.104.40)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन परदीपं प्रबोधयेत् । तेन मोक्षमवाप्नोति मूषिकावन्न संशयः

tasmātsarvaprayatnena paradīpaṁ prabodhayet tena mokṣamavāpnoti mūṣikāvanna saṁśayaḥ

इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से दूसरे के दीये को जलाए रखना चाहिए; इससे उस चूहे के समान ही मोक्ष प्राप्त होता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 41 (skanda.2.104.41)

परदीपप्रबबोधस्य फलमीदृग्विधं मुने । साक्षाद्दीपप्रदानस्य माहात्म्यं केन वर्ण्यते

paradīpaprababodhasya phalamīdṛgvidhaṁ mune sākṣāddīpapradānasya māhātmyaṁ kena varṇyate

हे मुने, दूसरे के दीये को जलाए रखने का फल जब ऐसा है, तो साक्षात् दीपदान के माहात्म्य का वर्णन भला कौन कर सकता है?

श्लोक 42 (skanda.2.104.42)

नारद उवाच । कार्तिके दीपदानस्य माहात्म्यं च मया श्रुतम् । परदीप प्रबोधस्य माहात्म्यमपि वै श्रुतम् । इदानीं श्रोतुमिच्छामि व्योमदीपस्य वैभवम्

nārada uvāca kārtike dīpadānasya māhātmyaṁ ca mayā śrutam paradīpa prabodhasya māhātmyamapi vai śrutam idānīṁ śrotumicchāmi vyomadīpasya vaibhavam

नारद ने कहा — मैंने कार्तिक में दीपदान का माहात्म्य सुना, तथा परदीप-प्रबोधन का माहात्म्य भी सुना; अब मैं आकाश-दीप के वैभव को सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 43 (skanda.2.104.43)

ब्रह्मोवाच । आकाशदीप माहात्म्यं शृणु पुत्र समाहितः । यस्य श्रवणमात्रेण दीपदाने मतिर्भवेत्

brahmovāca ākāśadīpa māhātmyaṁ śṛṇu putra samāhitaḥ yasya śravaṇamātreṇa dīpadāne matirbhavet

ब्रह्माजी ने कहा — हे पुत्र, एकाग्र होकर आकाश-दीप के माहात्म्य को सुनो, जिसे सुनने मात्र से ही दीपदान में मन आसक्त हो जाता है।

श्लोक 44 (skanda.2.104.44)

संप्राप्ते कार्तिके मासि प्रातःस्नानपरायणः । आकाशदीपं यो दद्यात्तस्य पुण्यं वदाम्यहम्

saṁprāpte kārtike māsi prātaḥsnānaparāyaṇaḥ ākāśadīpaṁ yo dadyāttasya puṇyaṁ vadāmyaham

कार्तिक मास आने पर जो प्रातःस्नान में तत्पर होकर आकाश-दीप देता है, उसका पुण्य मैं बताता हूँ।

श्लोक 45 (skanda.2.104.45)

सर्वलोकाधिपो भूत्वा सर्वसंपत्समन्वितः । इह लोके सुखं भुक्त्वा चांते मोक्षमवाप्नुयात्

sarvalokādhipo bhūtvā sarvasaṁpatsamanvitaḥ iha loke sukhaṁ bhuktvā cāṁte mokṣamavāpnuyāt

वह सम्पूर्ण लोकों का स्वामी बनकर, सभी सम्पदाओं से युक्त होकर, इस लोक में सुख भोगकर अंत में मोक्ष प्राप्त करता है।

श्लोक 46 (skanda.2.104.46)

स्नानदानक्रियापूर्वं हरिमंदिरमस्तके । आकाशदीपो दातव्यो मासमेकं तु कार्तिके । कार्तिके शुद्धपूर्णायां विधिनोत्सर्जयेच्च तम्

snānadānakriyāpūrvaṁ harimaṁdiramastake ākāśadīpo dātavyo māsamekaṁ tu kārtike kārtike śuddhapūrṇāyāṁ vidhinotsarjayecca tam

स्नान-दान की क्रिया के साथ, हरि-मंदिर के शिखर पर एक मास तक कार्तिक में आकाश-दीप देना चाहिए; कार्तिक की शुद्ध पूर्णिमा को विधिपूर्वक उसे उतारना चाहिए।

श्लोक 47 (skanda.2.104.47)

यः करोति विधानेन कार्तिके व्योम्नि दीपकम् । न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि

yaḥ karoti vidhānena kārtike vyomni dīpakam na tasya punarāvṛttiḥ kalpakoṭiśatairapi

जो कार्तिक में विधिपूर्वक आकाश में दीपक जलाता है, उसका सैकड़ों करोड़ कल्पों तक भी पुनर्जन्म नहीं होता।

श्लोक 48 (skanda.2.104.48)

अत्र ते वर्णयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् । यस्य श्रवणमात्रेण व्योमदीपफलं लभेत्

atra te varṇayiṣyāmi itihāsaṁ purātanam yasya śravaṇamātreṇa vyomadīpaphalaṁ labhet

यहाँ मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ, जिसे सुनने मात्र से ही आकाश-दीप का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 49 (skanda.2.104.49)

पुरा तु निष्ठुरोनाम लुब्धको लोककंटकः । यमुनातीरवासी च कालमृत्युरिवाऽपरः

purā tu niṣṭhuronāma lubdhako lokakaṁṭakaḥ yamunātīravāsī ca kālamṛtyurivā'paraḥ

पूर्वकाल में निष्ठुर नामक एक शिकारी था, जो जगत् का कंटक तथा साक्षात् काल-मृत्यु के समान था, और यमुना-तट पर रहता था।

श्लोक 50 (skanda.2.104.50)

वने चरन्मृगान्सर्वान्हत्वा वृत्तिमकल्पयत् । पथिकान्बाधते नित्यं चोरवृत्त्या धनुर्धरः

vane caranmṛgānsarvānhatvā vṛttimakalpayat pathikānbādhate nityaṁ coravṛttyā dhanurdharaḥ

वह वन में विचरण करता हुआ सभी मृगों को मारकर अपनी जीविका चलाता था; धनुर्धारी वह चोर-वृत्ति से पथिकों को सदा सताता था।

श्लोक 51 (skanda.2.104.51)

कंचिद्ग्रामं जगामाशु चौर्यार्थं कार्तिके मुने । तस्मिन्विदर्भनगरे राजा सुकृतिनामकः

kaṁcidgrāmaṁ jagāmāśu cauryārthaṁ kārtike mune tasminvidarbhanagare rājā sukṛtināmakaḥ

हे मुने, वह चोरी करने के लिए कार्तिक में किसी गाँव को गया। उस विदर्भ नगर में सुकृति नामक राजा था,

श्लोक 52 (skanda.2.104.52)

चन्द्रशर्माख्यविप्रस्य वचनात्कार्तिके सुधीः । चकार व्योमदीपं तु हरिमंदिरमस्तके

candraśarmākhyaviprasya vacanātkārtike sudhīḥ cakāra vyomadīpaṁ tu harimaṁdiramastake

जिसने चंद्रशर्मा नामक ब्राह्मण के वचन से, बुद्धिमान होकर, कार्तिक में हरि-मंदिर के शिखर पर आकाश-दीप बनाया,

श्लोक 53 (skanda.2.104.53)

दीपं दत्त्वा महाभक्त्या अशृणोच्च कथां निशि । एतस्मिन्नेव काले तु चौर्यार्थं समुपागतः

dīpaṁ dattvā mahābhaktyā aśṛṇocca kathāṁ niśi etasminneva kāle tu cauryārthaṁ samupāgataḥ

तथा महाभक्ति से दीप देकर रात्रि में कथा सुनी। उसी समय चोरी के लिए आया हुआ वह शिकारी,

श्लोक 54 (skanda.2.104.54)

राज्ञा दत्तं व्योमदीपं पश्यन्क्षणमतिष्ठत । तदानीं दैवयोगेन गृध्रो जवसमन्वितः

rājñā dattaṁ vyomadīpaṁ paśyankṣaṇamatiṣṭhata tadānīṁ daivayogena gṛdhro javasamanvitaḥ

राजा द्वारा दिए गए आकाश-दीप को देखता हुआ क्षणभर खड़ा रहा। तभी दैवयोग से, वेगयुक्त एक गिद्ध,

श्लोक 55 (skanda.2.104.55)

शीघ्रमागत्य जग्राह तैलपात्रं सदीपकम् । स्वमुखेनैव संगृह्य वृक्षाग्रं च समाश्रयत्

śīghramāgatya jagrāha tailapātraṁ sadīpakam svamukhenaiva saṁgṛhya vṛkṣāgraṁ ca samāśrayat

तुरंत आकर दीप सहित तेल का पात्र उठा ले गया; अपनी चोंच से ही उसे लेकर वह वृक्ष के शिखर पर जा बैठा।

श्लोक 56 (skanda.2.104.56)

तत्र पीत्वा तु तैलं च दीपं स्थाप्य स पक्षिराट् । वृक्षाग्रं तु समास्थाय क्षणमात्रमतिष्ठत

tatra pītvā tu tailaṁ ca dīpaṁ sthāpya sa pakṣirāṭ vṛkṣāgraṁ tu samāsthāya kṣaṇamātramatiṣṭhata

वहाँ तेल पीकर, दीप को रखकर, वह पक्षिराज वृक्ष के शिखर पर बैठा हुआ क्षणभर के लिए ठहर गया।

श्लोक 57 (skanda.2.104.57)

तदानीं दैवयोगेन ग्रहीतुं पक्षिसत्तमम् । मार्जारोऽप्यारुहद्वृक्षं पक्षिणाऽधिष्ठितं तु तम्

tadānīṁ daivayogena grahītuṁ pakṣisattamam mārjāro'pyāruhadvṛkṣaṁ pakṣiṇā'dhiṣṭhitaṁ tu tam

तभी दैवयोग से, उस श्रेष्ठ पक्षी को पकड़ने के लिए एक बिल्ली भी उसी वृक्ष पर चढ़ आई, जिस पर वह पक्षी बैठा था।

श्लोक 58 (skanda.2.104.58)

तदग्रे मुखदीपं च पश्यन्क्षणमतिष्ठत । आकाशदीपमाहात्म्यं कथितं चन्द्रशर्मणा

tadagre mukhadīpaṁ ca paśyankṣaṇamatiṣṭhata ākāśadīpamāhātmyaṁ kathitaṁ candraśarmaṇā

वह उसके सामने मुख पर पड़ती दीप की रोशनी देखती हुई क्षणभर ठहर गई। उधर चंद्रशर्मा राजा सुकृति को आकाश-दीप का माहात्म्य सुना रहे थे,

श्लोक 59 (skanda.2.104.59)

राज्ञे सुकृतिनाम्ने च तौ वै शुश्रुवतुः क्षणम् । खगमार्जारकौ तत्र स्वस्वचामचल्यदोषतः

rājñe sukṛtināmne ca tau vai śuśruvatuḥ kṣaṇam khagamārjārakau tatra svasvacāmacalyadoṣataḥ

और वे पक्षी और बिल्ली दोनों भी क्षणभर उसे सुनते रहे, अपनी-अपनी चंचलता के दोष के कारण।

श्लोक 60 (skanda.2.104.60)

मार्जारो जगृहे तत्र शाखामतरगतं खगम् । दैवेन चोदितौ वृक्षाच्छिलायां पतितौ तदा

mārjāro jagṛhe tatra śākhāmataragataṁ khagam daivena coditau vṛkṣācchilāyāṁ patitau tadā

वहीं बिल्ली ने दूसरी शाखा पर गए पक्षी को पकड़ लिया; दैव से प्रेरित होकर दोनों वृक्ष से गिरकर एक शिला पर आ गिरे।

श्लोक 61 (skanda.2.104.61)

भग्नगात्रौ मृतौ तत्र पक्षिमार्जारकौ भुवि । दिव्यदेहसमायुक्तौ यानारूढौ दिवं गतौ

bhagnagātrau mṛtau tatra pakṣimārjārakau bhuvi divyadehasamāyuktau yānārūḍhau divaṁ gatau

वे पक्षी और बिल्ली दोनों वहाँ भूमि पर टूटे हुए शरीर के साथ मर गए, और दिव्य देह धारण करके विमान पर बैठकर स्वर्ग को चले गए।

श्लोक 62 (skanda.2.104.62)

तत्सर्वं लुब्धको दृष्ट्वा चौर्यार्थं समुपागतः । निवृत्तो दुष्टभावेन कथयंतं कथां मुनिम्

tatsarvaṁ lubdhako dṛṣṭvā cauryārthaṁ samupāgataḥ nivṛtto duṣṭabhāvena kathayaṁtaṁ kathāṁ munim

यह सब देखकर, चोरी के लिए आया वह शिकारी, दुष्ट भावना से हटकर, कथा सुनाने वाले उस मुनि के पास गया,

श्लोक 63 (skanda.2.104.63)

चंद्रशर्माणमाभाष्य इदं वचनमब्रवीत् । चंद्रशर्मन्मया दृष्टं चौर्यार्थं ह्यागतेन च

caṁdraśarmāṇamābhāṣya idaṁ vacanamabravīt caṁdraśarmanmayā dṛṣṭaṁ cauryārthaṁ hyāgatena ca

और चंद्रशर्मा को संबोधित करके यह वचन कहा — "हे चंद्रशर्मन्, मैंने चोरी के लिए आकर देखा है

श्लोक 64 (skanda.2.104.64)

राज्ञा सुकृतिना दत्तं व्योमदीपं मनोहरम् । तदानीं दैवयोगेन खगः पात्रं प्रगृह्य च

rājñā sukṛtinā dattaṁ vyomadīpaṁ manoharam tadānīṁ daivayogena khagaḥ pātraṁ pragṛhya ca

राजा सुकृति द्वारा दिया गया वह मनोहर आकाश-दीप। तभी दैवयोग से एक पक्षी उस पात्र को लेकर,

श्लोक 65 (skanda.2.104.65)

तैलं पीत्वा तु तत्पात्रं सदीपं तु मनोहरम् । वृक्षाग्रे स्थापयित्वा च तत्र क्षणमतिष्ठत

tailaṁ pītvā tu tatpātraṁ sadīpaṁ tu manoharam vṛkṣāgre sthāpayitvā ca tatra kṣaṇamatiṣṭhata

तेल पीकर वह पात्र, दीप सहित, वृक्ष के शिखर पर रखकर वहाँ क्षणभर ठहरा।

श्लोक 66 (skanda.2.104.66)

मार्जारोऽप्यागतस्तत्र ग्रहीतुं पक्षिपुंगवम् । दैवेन प्रेरितौ तौ च उभे शाखे समाश्रितौ

mārjāro'pyāgatastatra grahītuṁ pakṣipuṁgavam daivena preritau tau ca ubhe śākhe samāśritau

उस श्रेष्ठ पक्षी को पकड़ने के लिए एक बिल्ली भी वहाँ आई; दैव से प्रेरित होकर दोनों उसी शाखा पर आ बैठे,

श्लोक 67 (skanda.2.104.67)

त्वन्मुखात्कथ्यमानां हि कथां शुश्रुवतुः क्षणम् । पश्चाच्चांचल्यदोषेण मार्जारो ह्यग्रहीत्खगम्

tvanmukhātkathyamānāṁ hi kathāṁ śuśruvatuḥ kṣaṇam paścāccāṁcalyadoṣeṇa mārjāro hyagrahītkhagam

और आपके ही मुख से कही जा रही कथा को क्षणभर सुनते रहे। परन्तु बाद में चंचलता के दोष से बिल्ली ने पक्षी को पकड़ लिया,

श्लोक 68 (skanda.2.104.68)

तौ वृक्षात्पतितौ मृत्युं प्राप्तौ च क्षणमात्रतः । उभौ तौ दिव्यरूपौ च यानारूढौ दिवं गतौ

tau vṛkṣātpatitau mṛtyuṁ prāptau ca kṣaṇamātrataḥ ubhau tau divyarūpau ca yānārūḍhau divaṁ gatau

और वे दोनों वृक्ष से गिरकर एक ही क्षण में मृत्यु को प्राप्त हो गए; और दोनों ही दिव्य रूप धारण कर विमान पर चढ़कर स्वर्ग को चले गए।

श्लोक 69 (skanda.2.104.69)

तदाश्चर्यमहं दृष्ट्वा त्वां प्रष्टुं समुपागतः । तौ कौ पुरा च मार्जारखगौ तद्वद भो द्विज

tadāścaryamahaṁ dṛṣṭvā tvāṁ praṣṭuṁ samupāgataḥ tau kau purā ca mārjārakhagau tadvada bho dvija

यह आश्चर्य देखकर मैं आपसे पूछने आया हूँ — हे द्विज, बताइए, वे बिल्ली और पक्षी पहले कौन थे,

श्लोक 70 (skanda.2.104.70)

तिर्यग्योनिसमापन्नौ मुक्तौ केन च कर्मणा । इति लुब्धवचः श्रुत्वा चंद्रशर्माऽब्रवीत्तदा

tiryagyonisamāpannau muktau kena ca karmaṇā iti lubdhavacaḥ śrutvā caṁdraśarmā'bravīttadā

और किस कर्म के फलस्वरूप पशु-योनि में पड़कर भी मुक्त हुए?" शिकारी के इन वचनों को सुनकर चंद्रशर्मा ने तब कहा —

श्लोक 71 (skanda.2.104.71)

शृणु लुब्ध प्रवक्ष्यामि तयोर्वृत्तांतमंजसा । मार्जारोऽपि पुरा पापी तथा श्रीवत्सगोत्रजः

śṛṇu lubdha pravakṣyāmi tayorvṛttāṁtamaṁjasā mārjāro'pi purā pāpī tathā śrīvatsagotrajaḥ

"हे शिकारी, सुनो, मैं तुम्हें उन दोनों का सच्चा वृत्तांत बताता हूँ। वह बिल्ली भी पहले पापी था, श्रीवत्स गोत्र में उत्पन्न,

श्लोक 72 (skanda.2.104.72)

देवशर्मा इति प्रोक्तो देवद्रव्याऽपहारकः । अहोबलनृसिंहस्य पूजाकर्तृत्वमाप सः

devaśarmā iti prokto devadravyā'pahārakaḥ ahobalanṛsiṁhasya pūjākartṛtvamāpa saḥ

देवशर्मा नामक एक व्यक्ति, जो मंदिर की संपत्ति का अपहरण करने वाला था। उसने अहोबल-नृसिंह की पूजा करने का अधिकार प्राप्त किया था।

श्लोक 73 (skanda.2.104.73)

तस्मिन्देवालये प्राप्तं तैलं द्रव्यादिकं तथा । अपहृत्य च तेनैव कुटुंबं पोषयत्यसौ

tasmindevālaye prāptaṁ tailaṁ dravyādikaṁ tathā apahṛtya ca tenaiva kuṭuṁbaṁ poṣayatyasau

उस मंदिर में प्राप्त तेल, धन आदि को वह चुराकर अपने परिवार का पालन करता था।

श्लोक 74 (skanda.2.104.74)

आयुर्नीत्वैवमेवाऽसौ ततः पंचत्वमागतः । तस्मात्पापात्कालसूत्रं महारौरवरौरवम्

āyurnītvaivamevā'sau tataḥ paṁcatvamāgataḥ tasmātpāpātkālasūtraṁ mahārauravarauravam

इस प्रकार आयु बिताकर वह मृत्यु को प्राप्त हुआ; उस पाप के कारण उसे कालसूत्र, महारौरव तथा रौरव नरक,

श्लोक 75 (skanda.2.104.75)

निरुच्छ्वासं तथा प्राप्य असिपत्रवनं क्रमात् । छिद्यमानो महाकायैर्यमदूतैर्भयंकरैः

nirucchvāsaṁ tathā prāpya asipatravanaṁ kramāt chidyamāno mahākāyairyamadūtairbhayaṁkaraiḥ

तथा निरुच्छ्वास नरक और क्रमशः असिपत्रवन (तलवार-पत्तों का वन) प्राप्त हुआ, जहाँ भयंकर यमदूतों द्वारा उसके विशाल शरीर को काटा गया।

श्लोक 76 (skanda.2.104.76)

अनुभूय च तान्सर्वान्ब्रह्मराक्षसतां गतः । ततस्तु श्वानयोनौ च चंडालोऽभूत्कुकर्मतः

anubhūya ca tānsarvānbrahmarākṣasatāṁ gataḥ tatastu śvānayonau ca caṁḍālo'bhūtkukarmataḥ

इन सबका अनुभव करके वह ब्रह्मराक्षस बना; फिर श्वान-योनि में तथा दुष्कर्म के कारण चाण्डाल बना,

श्लोक 77 (skanda.2.104.77)

एवं जन्मशतं प्राप्य भूमौ मार्जारतां गतः । आकाशदीपमाहात्म्यं श्रुत्वेदानीं तु दैवतः । निर्मुक्ताऽखिलपापस्तु अगमद्धरिमंदिरम्

evaṁ janmaśataṁ prāpya bhūmau mārjāratāṁ gataḥ ākāśadīpamāhātmyaṁ śrutvedānīṁ tu daivataḥ nirmuktā'khilapāpastu agamaddharimaṁdiram

इस प्रकार सौ जन्म पाकर वह पृथ्वी पर बिल्ली बना। अब दैव से आकाश-दीप का माहात्म्य सुनकर, सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वह हरि-मंदिर को चला गया।

श्लोक 78 (skanda.2.104.78)

गृध्रोऽयं तु पुरा विप्रो मिथिले वेदपारगः । शर्यातिरिति विख्यातौ नाम्ना लोके महाप्रभुः

gṛdhro'yaṁ tu purā vipro mithile vedapāragaḥ śaryātiriti vikhyātau nāmnā loke mahāprabhuḥ

और यह गिद्ध पहले मिथिला का एक वेदज्ञ ब्राह्मण था, जो लोक में शर्याति नाम से विख्यात एक महान् प्रभु था।

श्लोक 79 (skanda.2.104.79)

दासीसंगं चकारासौ वेश्यासंगं तथैव च । तेन दोषेण महता पंचत्वमगमत्तदा

dāsīsaṁgaṁ cakārāsau veśyāsaṁgaṁ tathaiva ca tena doṣeṇa mahatā paṁcatvamagamattadā

उसने एक दासी से तथा एक वेश्या से भी संबंध रखा; उस बड़े दोष के कारण वह मृत्यु को प्राप्त हुआ,

श्लोक 80 (skanda.2.104.80)

कुंभीपाके महाघोरे स्थित्वा युगचतुष्टयम् । कर्मशेषेण भूमौ च गृध्रत्वमगमत्तदा

kuṁbhīpāke mahāghore sthitvā yugacatuṣṭayam karmaśeṣeṇa bhūmau ca gṛdhratvamagamattadā

और घोर कुम्भीपाक नरक में चार युगों तक रहकर, शेष कर्म के कारण पृथ्वी पर गिद्ध बना।

श्लोक 81 (skanda.2.104.81)

दैवेन चोदितो गृध्रस्तैलपानार्थमागतः । दत्त्वा चाकाशदीपं च श्रुत्वा चैव हरेः कथाम् । विध्वस्ताऽखिलपापस्तु जगाम हरिमंदिरम्

daivena codito gṛdhrastailapānārthamāgataḥ dattvā cākāśadīpaṁ ca śrutvā caiva hareḥ kathām vidhvastā'khilapāpastu jagāma harimaṁdiram

दैव से प्रेरित होकर वह गिद्ध तेल पीने आया; इस प्रकार आकाश-दीप का दान होने में निमित्त बनकर, हरि की कथा सुनकर, सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वह हरि-मंदिर को चला गया।"

श्लोक 82 (skanda.2.104.82)

इत्येतत्सर्वमाख्यातं लुब्ध गच्छ यथासुखम् । व्याधोऽप्यस्य वचः श्रुत्वा गत्वा चैव स्वमंदिरम्

ityetatsarvamākhyātaṁ lubdha gaccha yathāsukham vyādho'pyasya vacaḥ śrutvā gatvā caiva svamaṁdiram

"यह सब कहा गया; हे शिकारी, अब तुम प्रसन्नतापूर्वक जाओ।" वह शिकारी भी उनके वचन सुनकर अपने घर जाकर,

श्लोक 83 (skanda.2.104.83)

व्रतं चाकाशदीपस्य चकार विधिवन्मुने । आयुःशेषं तदा नीत्वा जगाम हरिमंदिरम्

vrataṁ cākāśadīpasya cakāra vidhivanmune āyuḥśeṣaṁ tadā nītvā jagāma harimaṁdiram

हे मुने, विधिपूर्वक आकाश-दीप का व्रत करने लगा; और शेष आयु बिताकर वह भी हरि-मंदिर को चला गया।

श्लोक 84 (skanda.2.104.84)

सुनंदोपि महाराज आश्चर्यं समुपागतः । चकार विधिना मासं चंद्रशर्मोक्तमार्गतः

sunaṁdopi mahārāja āścaryaṁ samupāgataḥ cakāra vidhinā māsaṁ caṁdraśarmoktamārgataḥ

हे महाराज, राजा सुनन्द ने भी यह आश्चर्य देखकर, चंद्रशर्मा द्वारा बताए गए मार्ग से एक मास तक विधिपूर्वक व्रत किया।

श्लोक 85 (skanda.2.104.85)

प्रातः स्नात्वा शुचिर्भूत्वा कार्तिके मासि वै नृपः । कोमलैस्तुलसीपत्रैः समभ्यर्च्य जनार्दनम्

prātaḥ snātvā śucirbhūtvā kārtike māsi vai nṛpaḥ komalaistulasīpatraiḥ samabhyarcya janārdanam

प्रातःकाल स्नान करके शुद्ध होकर, वह राजा कार्तिक मास में कोमल तुलसी-पत्रों से जनार्दन का भलीभाँति पूजन करके,

श्लोक 86 (skanda.2.104.86)

रात्रौ दद्याद्व्योमदीपं मंत्रेणानेन वै नृपः । दामोदराय विश्वाय विश्वरूपधराय च । नमस्कृत्वा प्रदास्यामि व्योमदीपं हरिप्रियम् । निर्विघ्नं कुरु देवेश यावन्मासः समाप्यते

rātrau dadyādvyomadīpaṁ maṁtreṇānena vai nṛpaḥ dāmodarāya viśvāya viśvarūpadharāya ca namaskṛtvā pradāsyāmi vyomadīpaṁ haripriyam nirvighnaṁ kuru deveśa yāvanmāsaḥ samāpyate

रात्रि में इस मंत्र से आकाश-दीप देता था — "विश्वरूपधारी विश्वमय दामोदर को नमस्कार करके मैं यह हरि-प्रिय आकाश-दीप अर्पित करता हूँ; हे देवेश, जब तक यह मास पूर्ण न हो, इसे निर्विघ्न रखिए।

श्लोक 87 (skanda.2.104.87)

व्रतेनाऽनेन देवेश त्वयि भक्तिः प्रवर्द्धताम् । इति मंत्रेण राजाऽसौ दीपदानं चकार ह

vratenā'nena deveśa tvayi bhaktiḥ pravarddhatām iti maṁtreṇa rājā'sau dīpadānaṁ cakāra ha

इस व्रत के द्वारा, हे देवेश, आपमें मेरी भक्ति बढ़ती रहे।" इस मंत्र से उस राजा ने दीपदान किया।

श्लोक 88 (skanda.2.104.88)

ब्राह्मे मुहूर्ते च पुनर्व्योमदीपं ददाति हि । विष्णोः पूजा कृता प्रातः प्रातःस्नानं चकार ह

brāhme muhūrte ca punarvyomadīpaṁ dadāti hi viṣṇoḥ pūjā kṛtā prātaḥ prātaḥsnānaṁ cakāra ha

ब्राह्म मुहूर्त में वह फिर से आकाश-दीप देता था; प्रातःकाल विष्णु की पूजा तथा प्रातःस्नान भी करता था।

श्लोक 89 (skanda.2.104.89)

उत्सर्गस्य विधिं कृत्वा व्योम्नि दीपं समाप्य च । ब्राह्मणान्भोजयित्वा च व्रतं विष्णोः समार्पयत्

utsargasya vidhiṁ kṛtvā vyomni dīpaṁ samāpya ca brāhmaṇānbhojayitvā ca vrataṁ viṣṇoḥ samārpayat

उत्सर्ग-विधि करके आकाश-दीप को पूर्ण करके, ब्राह्मणों को भोजन कराकर उसने व्रत विष्णु को समर्पित किया।

श्लोक 90 (skanda.2.104.90)

तेन पुण्यप्रभावेन स राजा मुनिसत्तम । शरदां शतसाहस्रमिह भोगान्मनोहरान्

tena puṇyaprabhāvena sa rājā munisattama śaradāṁ śatasāhasramiha bhogānmanoharān

हे मुनिसत्तम, उस पुण्य के प्रभाव से वह राजा एक लाख शरद ऋतुओं तक इस लोक में मनोहर भोगों को,

श्लोक 91 (skanda.2.104.91)

सुपुत्रपौत्रस्वजनैर्बुभुजे सह भार्यया । ततश्चांऽते द्विजवर विमानं सुमनोहरम्

suputrapautrasvajanairbubhuje saha bhāryayā tataścāṁ'te dvijavara vimānaṁ sumanoharam

सुपुत्र-पौत्रों और स्वजनों के साथ, पत्नी सहित भोगता रहा। तत्पश्चात्, हे द्विजवर, अंत में सुंदर विमान पर,

श्लोक 92 (skanda.2.104.92)

स्त्रीभिः सह समारुह्य मोक्षमार्गं गतो मुने । चतुर्भुजः पीतवासाः शंखचक्रगदाधरः

strībhiḥ saha samāruhya mokṣamārgaṁ gato mune caturbhujaḥ pītavāsāḥ śaṁkhacakragadādharaḥ

अपनी पत्नियों सहित चढ़कर, हे मुने, वह मोक्ष-मार्ग को गया; चार भुजाओं वाला, पीत वस्त्र धारण किए, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाला,

श्लोक 93 (skanda.2.104.93)

विष्णुलोके विष्णुरिव प्रोच्यमानः सदाऽमरैः । क्रीडयामास राजाऽसौ यथाकामं महामनाः

viṣṇuloke viṣṇuriva procyamānaḥ sadā'maraiḥ krīḍayāmāsa rājā'sau yathākāmaṁ mahāmanāḥ

विष्णुलोक में देवताओं द्वारा सदा विष्णु के समान कहलाते हुए, वह महामना राजा अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करने लगा।

श्लोक 94 (skanda.2.104.94)

तस्मात्तु कार्तिके मासि मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् । आकाशदीपो दातव्यो विधानेन हरेः प्रियः

tasmāttu kārtike māsi mānuṣyaṁ prāpya durlabham ākāśadīpo dātavyo vidhānena hareḥ priyaḥ

इसलिए यह दुर्लभ मानव-जन्म पाकर, कार्तिक मास में विधिपूर्वक हरि को प्रिय आकाश-दीप अवश्य देना चाहिए।

श्लोक 95 (skanda.2.104.95)

दास्यंति ये कार्तिकमासि मर्त्या व्योमप्रदीपं हरितुष्टयेऽत्र । पश्यंति ते नैव कदाऽपि देवं यमं महाक्रूरमुखं मुनींद्र

dāsyaṁti ye kārtikamāsi martyā vyomapradīpaṁ harituṣṭaye'tra paśyaṁti te naiva kadā'pi devaṁ yamaṁ mahākrūramukhaṁ munīṁdra

हे मुनींद्र, जो मनुष्य कार्तिक मास में हरि की प्रसन्नता के लिए आकाश-दीप देते हैं, वे कभी भी भयंकर मुख वाले यम देवता को नहीं देखते।

श्लोक 96 (skanda.2.104.96)

अथाऽन्यच्च प्रवक्ष्यामि व्योमदीपस्य वैभवम् । वालखिल्यैः पुरा प्रोक्तं तच्छृणुष्व द्विजोत्तम

athā'nyacca pravakṣyāmi vyomadīpasya vaibhavam vālakhilyaiḥ purā proktaṁ tacchṛṇuṣva dvijottama

अब मैं आकाश-दीप का एक अन्य वैभव बताता हूँ, जो पूर्वकाल में वालखिल्यों ने कहा था; हे द्विजोत्तम, उसे सुनो।

श्लोक 97 (skanda.2.104.97)

वालखिल्या ऊचुः । कृष्णादिमासक्रमतः कार्तिकस्यादिमासतः । आकाशादीपदानं तु कुर्वंतु ऋषिसत्तमाः

vālakhilyā ūcuḥ kṛṣṇādimāsakramataḥ kārtikasyādimāsataḥ ākāśādīpadānaṁ tu kurvaṁtu ṛṣisattamāḥ

वालखिल्यों ने कहा — कृष्ण पक्ष के क्रम से, कार्तिक के प्रथम मास से, हे ऋषिसत्तमो, आकाश-दीप का दान करना चाहिए।

श्लोक 98 (skanda.2.104.98)

तुलायां तिलतैलेन सायं संध्यासमागमे । आकाशदीपं यो दयान्मासमेकं निरंतरम्

tulāyāṁ tilatailena sāyaṁ saṁdhyāsamāgame ākāśadīpaṁ yo dayānmāsamekaṁ niraṁtaram

सूर्य के तुला राशि में रहते समय सायं-संध्या के समय तिल के तेल से जो निरंतर एक मास तक आकाश-दीप देता है,

श्लोक 99 (skanda.2.104.99)

सश्रीकाय श्रीपतये श्रिया न स वियुज्यते । आकाशदीपवंशस्तु विंशद्धस्तोत्तमो भवेत्

saśrīkāya śrīpataye śriyā na sa viyujyate ākāśadīpavaṁśastu viṁśaddhastottamo bhavet

वह लक्ष्मी सहित श्रीपति (विष्णु) से, लक्ष्मी के साथ, कभी अलग नहीं होता। आकाश-दीप के बाँस का श्रेष्ठ माप बीस हाथ है,

श्लोक 100 (skanda.2.104.100)

मध्यमो नवहस्तः स्यात्कनिष्ठः पंचहस्तकः । यथा दूरस्थितैर्लोकैर्दृश्यते तत्तथाऽऽचरेत्

madhyamo navahastaḥ syātkaniṣṭhaḥ paṁcahastakaḥ yathā dūrasthitairlokairdṛśyate tattathā''caret

मध्यम नौ हाथ, तथा कनिष्ठ पाँच हाथ; उसे इस प्रकार लगाना चाहिए कि वह दूर से भी लोगों को दिखाई दे।

श्लोक 101 (skanda.2.104.101)

तथाऽभ्रादिकरंडेषु दीपदानं विशिष्यते । वंशस्य नवमांशेन लंबा कार्या पताकिका

tathā'bhrādikaraṁḍeṣu dīpadānaṁ viśiṣyate vaṁśasya navamāṁśena laṁbā kāryā patākikā

अभ्रक आदि के करण्डक में रखा गया दीपदान विशेष रूप से श्रेष्ठ है; बाँस के नवें अंश के बराबर लंबी एक छोटी पताका बनानी चाहिए,

श्लोक 102 (skanda.2.104.102)

मयूरपिच्छमुष्टिं वा कलशं चोपरि न्यसेत् । विष्णुप्रीतिकरो दीपः पित्रुद्धारस्य कारकः

mayūrapicchamuṣṭiṁ vā kalaśaṁ copari nyaset viṣṇuprītikaro dīpaḥ pitruddhārasya kārakaḥ

और ऊपर मयूर-पंखों की मुट्ठी अथवा एक छोटा कलश रखना चाहिए। यह दीप विष्णु को प्रसन्न करने वाला तथा पितरों का उद्धार करने वाला है।

श्लोक 103 (skanda.2.104.103)

एकादश्यास्तुलार्काद्वा दीपदानमतोऽपि वा । दामोदराय नभसि तुलायां लोलया सह

ekādaśyāstulārkādvā dīpadānamato'pi vā dāmodarāya nabhasi tulāyāṁ lolayā saha

एकादशी से अथवा सूर्य के तुला में प्रवेश से दीपदान आरंभ करना चाहिए — "हे दामोदर, आकाश में, तुला राशि में, लक्ष्मी के साथ,

श्लोक 104 (skanda.2.104.104)

प्रदीपं ते प्रयच्छामि नमोऽनंताय वेधसे । आकाशदीपसदृशं पितुरुद्धारकं नहि

pradīpaṁ te prayacchāmi namo'naṁtāya vedhase ākāśadīpasadṛśaṁ pituruddhārakaṁ nahi

मैं आपको यह दीप अर्पित करता हूँ; अनंत सृष्टिकर्ता को नमस्कार है।" पिता के उद्धार के लिए आकाश-दीप के समान कुछ भी नहीं है।

श्लोक 105 (skanda.2.104.105)

हेलिकस्य च द्वौ पुत्रौ तत्रैकस्तु पिशाचकः । व्योमदीपपुण्यदानान्मोक्षं प्राप सुदुर्लभम्

helikasya ca dvau putrau tatraikastu piśācakaḥ vyomadīpapuṇyadānānmokṣaṁ prāpa sudurlabham

हेलिक के दो पुत्र थे, जिनमें से एक पिशाच था; आकाश-दीप के पुण्यदान से वह अत्यंत दुर्लभ मोक्ष प्राप्त हुआ।

श्लोक 106 (skanda.2.104.106)

नमः पितृभ्यः प्रेतेभ्यो नमो धर्माय विष्णवे । नमो यमाय रुद्राय कांतारपतये नमः

namaḥ pitṛbhyaḥ pretebhyo namo dharmāya viṣṇave namo yamāya rudrāya kāṁtārapataye namaḥ

"पितरों को नमस्कार, प्रेतों को नमस्कार, धर्म को नमस्कार, विष्णु को नमस्कार; यम को नमस्कार, रुद्र को नमस्कार, वन के स्वामी को नमस्कार।"

श्लोक 107 (skanda.2.104.107)

मन्त्रेणाऽनेन ये मर्त्याः पितृभ्यः खे तु दीपकम् । प्रयच्छंति गता ये स्युर्नरके यांति तेऽपि वै । उत्तमां गतिमित्थं ते दीपदानं मयेरितम्

mantreṇā'nena ye martyāḥ pitṛbhyaḥ khe tu dīpakam prayacchaṁti gatā ye syurnarake yāṁti te'pi vai uttamāṁ gatimitthaṁ te dīpadānaṁ mayeritam

इस मंत्र से जो मनुष्य आकाश में पितरों के लिए दीप देते हैं, यहाँ तक कि नरक में गए हुए पितर भी उत्तम गति को प्राप्त होते हैं; इस प्रकार मैंने यह दीपदान बताया।

श्लोक 108 (skanda.2.104.108)

लक्ष्मीसंततिसिद्ध्यर्थमारोग्याय प्रदीपयेत्

lakṣmīsaṁtatisiddhyarthamārogyāya pradīpayet

लक्ष्मी, संतान की सिद्धि तथा आरोग्य की प्राप्ति के लिए भी दीप जलाना चाहिए।

श्लोक 109 (skanda.2.104.109)

कार्तिके कृष्णपक्षे तु द्वादश्यादिषु पंचसु । तिथीषूक्तः पूर्वरात्रे नृणां नीराजनाविधिः

kārtike kṛṣṇapakṣe tu dvādaśyādiṣu paṁcasu tithīṣūktaḥ pūrvarātre nṛṇāṁ nīrājanāvidhiḥ

कार्तिक के कृष्ण पक्ष में द्वादशी आदि पाँच तिथियों में, रात्रि के पूर्व भाग में मनुष्यों के लिए आरती-विधि कही गई है,

श्लोक 110 (skanda.2.104.110)

ब्रह्मविष्णुशिवादीनां भवनेषु विशेषतः । कूटागारेषु चैत्येषु सभासु च नदीषु च

brahmaviṣṇuśivādīnāṁ bhavaneṣu viśeṣataḥ kūṭāgāreṣu caityeṣu sabhāsu ca nadīṣu ca

विशेष रूप से ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि के मंदिरों में; गोपुरों, चैत्यों, सभाओं तथा नदियों में,

श्लोक 111 (skanda.2.104.111)

प्राकारोद्यानवापीषु प्रतोलीनिष्कुटेषु च । मन्दुरासु विविक्तासु हस्तिशालासु चैव हि

prākārodyānavāpīṣu pratolīniṣkuṭeṣu ca mandurāsu viviktāsu hastiśālāsu caiva hi

परकोटों, उद्यानों तथा बावड़ियों में, मार्गों और निजी उद्यानों में, तथा एकांत में स्थित अस्तबलों और हाथी-शालाओं में भी,

श्लोक 112 (skanda.2.104.112)

प्रदोषसमये दीपान्दद्यादेवं मनोहरान् । कृतं यैः कार्तिके मासि दीपदानं विधानतः

pradoṣasamaye dīpāndadyādevaṁ manoharān kṛtaṁ yaiḥ kārtike māsi dīpadānaṁ vidhānataḥ

प्रदोष-काल में इस प्रकार मनोहर दीप जलाने चाहिए। जिन्होंने कार्तिक मास में विधिपूर्वक दीपदान किया है,

श्लोक 113 (skanda.2.104.113)

दृश्यंते ये रत्नभाजस्तेऽत एव प्रकीर्तिताः । दीपदानासमर्थश्चेत्परदीपं तु रक्षयेत्

dṛśyaṁte ye ratnabhājaste'ta eva prakīrtitāḥ dīpadānāsamarthaścetparadīpaṁ tu rakṣayet

वे अगले जन्म में रत्नों के स्वामी दिखाई देते हैं, इसीलिए उन्हें ऐसा माना गया है। जो दीपदान करने में असमर्थ हो, वह दूसरे के दीये की रक्षा करे।

श्लोक 114 (skanda.2.104.114)

यो वेदाभ्यासिने दद्याद्दीपार्थं तैलमादरात् । को वा तस्य फलं वक्तुं भुवि तिष्ठति मानवः

yo vedābhyāsine dadyāddīpārthaṁ tailamādarāt ko vā tasya phalaṁ vaktuṁ bhuvi tiṣṭhati mānavaḥ

जो वेदाभ्यासी को आदरपूर्वक दीप के लिए तेल देता है, उसके फल को बताने में समर्थ पृथ्वी पर कौन-सा मनुष्य है?

श्लोक 115 (skanda.2.104.115)

दीपान्दद्याद्बहुविधान्कार्तिके विष्णुसंनिधौ । कार्तिके मासि संप्राप्ते गगने स्वच्छताके

dīpāndadyādbahuvidhānkārtike viṣṇusaṁnidhau kārtike māsi saṁprāpte gagane svacchatāke

कार्तिक में विष्णु के समीप अनेक प्रकार के दीप देने चाहिए। कार्तिक मास आने पर, स्वच्छ आकाश में,

श्लोक 116 (skanda.2.104.116)

रात्रौ लक्ष्मीः समायाति द्रष्टुं भुवनकौतुकम् । यत्रयत्र च दीपान्सा पश्यत्यब्धिसमुद्भवा

rātrau lakṣmīḥ samāyāti draṣṭuṁ bhuvanakautukam yatrayatra ca dīpānsā paśyatyabdhisamudbhavā

रात्रि में लक्ष्मी संसार का कौतुक देखने आती हैं; और समुद्र से उत्पन्न वह देवी जहाँ-जहाँ दीप देखती हैं,

श्लोक 117 (skanda.2.104.117)

तत्रतत्र रतिं कुर्यान्नांधकारे कदाचन । तस्माद्दीपः स्थापनीयः कार्तिके मासि वै सदा

tatratatra ratiṁ kuryānnāṁdhakāre kadācana tasmāddīpaḥ sthāpanīyaḥ kārtike māsi vai sadā

वहीं-वहीं वे प्रसन्न होती हैं, अंधकार में कभी नहीं; इसलिए कार्तिक मास में सदा दीप स्थापित करना चाहिए।

श्लोक 118 (skanda.2.104.118)

लक्ष्मीरूपार्थिनां प्रोक्तं दीपदानं विशेषतः । देवाऽऽलये नदीतीरे राजमार्गे विशेषतः

lakṣmīrūpārthināṁ proktaṁ dīpadānaṁ viśeṣataḥ devā''laye nadītīre rājamārge viśeṣataḥ

लक्ष्मी और सौंदर्य के इच्छुक व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से दीपदान कहा गया है, विशेषतः मंदिर में, नदी-तट पर तथा राजमार्ग पर।

श्लोक 119 (skanda.2.104.119)

निद्रास्थले दीपदाता तस्य श्रीः सर्वतोमुखी । दुर्बलस्याऽऽलयं वीक्ष्य दीपशून्यं तु यो ददेत्

nidrāsthale dīpadātā tasya śrīḥ sarvatomukhī durbalasyā''layaṁ vīkṣya dīpaśūnyaṁ tu yo dadet

जो सोने के स्थान पर दीप देता है, उसके पास लक्ष्मी हर ओर से आती हैं। जो किसी निर्धन के दीपरहित घर को देखकर वहाँ दीप देता है —

श्लोक 120 (skanda.2.104.120)

विप्रस्य वाऽन्यवर्णस्य विष्णुलोके महीयते । कीटकंटकसंकीर्णे दुर्गमे विषमस्थले

viprasya vā'nyavarṇasya viṣṇuloke mahīyate kīṭakaṁṭakasaṁkīrṇe durgame viṣamasthale

चाहे वह ब्राह्मण हो या अन्य वर्ण का — वह विष्णुलोक में सम्मानित होता है। कीड़ों और काँटों से भरे, दुर्गम तथा विषम स्थान में,

श्लोक 121 (skanda.2.104.121)

कुर्याद्यो दीपदानानि नरकं स न गच्छति । दद्याद्रात्रौ पंचनदे दीपं यो विधिपूर्वकम्

kuryādyo dīpadānāni narakaṁ sa na gacchati dadyādrātrau paṁcanade dīpaṁ yo vidhipūrvakam

जो दीपदान करता है, वह नरक को नहीं जाता। जो रात्रि में पंचनद में विधिपूर्वक दीप देता है,

श्लोक 122 (skanda.2.104.122)

तस्य वंशे प्रजायन्ते बालकाः कुलदीपकाः । पितृपक्षेऽन्नदानेन ज्येष्ठाऽऽषाढे च वारिणा

tasya vaṁśe prajāyante bālakāḥ kuladīpakāḥ pitṛpakṣe'nnadānena jyeṣṭhā''ṣāḍhe ca vāriṇā

उसके वंश में कुल के दीपक-सदृश बालक उत्पन्न होते हैं। जैसे पितृ-पक्ष में अन्नदान से, तथा ज्येष्ठ-आषाढ़ में जल-दान से पुण्य होता है,

श्लोक 123 (skanda.2.104.123)

कार्तिके तत्फलं तेषां परदीपप्रबोधनात् । बोधनात्परदीपस्य वैष्णवानां च सेवनात्

kārtike tatphalaṁ teṣāṁ paradīpaprabodhanāt bodhanātparadīpasya vaiṣṇavānāṁ ca sevanāt

वही फल कार्तिक में परदीप-प्रबोधन से प्राप्त होता है; दूसरे के दीये को जलाए रखने और वैष्णवों की सेवा से,

श्लोक 124 (skanda.2.104.124)

कार्तिके फलमाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः । पुरा हरिकरोनाम द्विजः पापरतः सदा

kārtike phalamāpnoti rājasūyāśvamedhayoḥ purā harikaronāma dvijaḥ pāparataḥ sadā

कार्तिक में राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है। पूर्वकाल में हरिकर नामक एक ब्राह्मण था, जो सदा पाप में रत रहता था,

श्लोक 125 (skanda.2.104.125)

कृतं द्यूतप्रसंगेन दीपदानं हि कार्तिके । तेन पुण्यप्रभावेन स्वर्गं प्राप द्विजोत्तमः

kṛtaṁ dyūtaprasaṁgena dīpadānaṁ hi kārtike tena puṇyaprabhāvena svargaṁ prāpa dvijottamaḥ

जिसने द्यूत-प्रसंग में कार्तिक में दीपदान किया; उस पुण्य के प्रभाव से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण स्वर्ग को प्राप्त हुआ।

श्लोक 126 (skanda.2.104.126)

आकाशदीपदानेन पुरा वै धर्मनन्दनः । विमानवरमारुह्य विष्णुलोकं ययौ नृपः

ākāśadīpadānena purā vai dharmanandanaḥ vimānavaramāruhya viṣṇulokaṁ yayau nṛpaḥ

पूर्वकाल में राजा धर्मनन्दन ने आकाश-दीप के दान से श्रेष्ठ विमान पर चढ़कर विष्णुलोक को प्राप्त किया।

श्लोक 127 (skanda.2.104.127)

यः कुर्यात्कार्तिके विष्णोः पुरः कर्पूरदीपकम् । प्रबोधिन्यां विशेषेण तस्य पुण्यं वदाम्यहम्

yaḥ kuryātkārtike viṣṇoḥ puraḥ karpūradīpakam prabodhinyāṁ viśeṣeṇa tasya puṇyaṁ vadāmyaham

जो कार्तिक में, विशेषतः प्रबोधिनी एकादशी को, विष्णु के सामने कर्पूर का दीप जलाता है, उसका पुण्य मैं बताता हूँ।

श्लोक 128 (skanda.2.104.128)

कुले तस्य प्रसूता ये पुरुषास्ते हरिप्रियाः । क्रीडित्वा सुचिरं कालमन्ते मुक्तिं व्रजंति च

kule tasya prasūtā ye puruṣāste haripriyāḥ krīḍitvā suciraṁ kālamante muktiṁ vrajaṁti ca

उसके कुल में उत्पन्न पुरुष हरि को प्रिय होते हैं; वे दीर्घकाल तक क्रीड़ा करके अंत में मुक्ति को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 129 (skanda.2.104.129)

दीपको ज्वलते यस्य दिवा रात्रौ हरेर्गृहे । एकादश्यां विशेषेण स याति हरिमन्दिरम्

dīpako jvalate yasya divā rātrau harergṛhe ekādaśyāṁ viśeṣeṇa sa yāti harimandiram

जिसके घर में हरि के मंदिर में दिन-रात दीपक जलता रहता है, विशेषतः एकादशी को, वह हरि के मंदिर को जाता है।

श्लोक 130 (skanda.2.104.130)

लुब्धकोऽपि चतुर्दश्यां दीपं दत्त्वा शिवालये । भक्त्या विना परे लिंगे शिवलोकं जगाम सः

lubdhako'pi caturdaśyāṁ dīpaṁ dattvā śivālaye bhaktyā vinā pare liṁge śivalokaṁ jagāma saḥ

एक शिकारी ने भी चतुर्दशी को शिवालय में दीप देकर, बिना भक्ति के भी, केवल महान् शिवलिंग के समक्ष होने से, शिवलोक को प्राप्त किया।

श्लोक 131 (skanda.2.104.131)

गोपः कश्चिदमावास्यां दीपं प्रज्वाल्य शार्ङ्गिणः । मुहुर्जयजयेत्युक्त्वा स च राजेश्वरोऽभवत्

gopaḥ kaścidamāvāsyāṁ dīpaṁ prajvālya śārṅgiṇaḥ muhurjayajayetyuktvā sa ca rājeśvaro'bhavat

किसी ग्वाले ने अमावस्या को शार्ङ्गधारी विष्णु के लिए दीप जलाकर बार-बार "जय-जय" कहा, और वह राजाओं का स्वामी बन गया।

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