वैष्णव खण्ड · अध्याय 105
तुलसीमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.2.105.1)
नारद उवाच । भूयः कथय तृप्तिर्हि नास्ति मे कमलासन । त्वद्वागमृतपानेन तृषा भूयः प्रवर्धते
nārada uvāca bhūyaḥ kathaya tṛptirhi nāsti me kamalāsana tvadvāgamṛtapānena tṛṣā bhūyaḥ pravardhate
नारद ने कहा — हे कमलासन, और कहिए, मुझे तृप्ति ही नहीं होती; आपके वचन-रूपी अमृत का पान करके मेरी प्यास और बढ़ती जाती है।
श्लोक 2 (skanda.2.105.2)
ब्रह्मोवाच । प्रातः स्नात्वा शुचिर्भूत्वा कार्तिके विष्णुतत्परः । देवं दामोदरं पूज्य कोमलैस्तुलसीदलैः । स तु मोक्षमवाप्नोति नाऽत्र कार्या विचारणा
brahmovāca prātaḥ snātvā śucirbhūtvā kārtike viṣṇutatparaḥ devaṁ dāmodaraṁ pūjya komalaistulasīdalaiḥ sa tu mokṣamavāpnoti nā'tra kāryā vicāraṇā
ब्रह्माजी ने कहा — प्रातःकाल स्नान करके, शुद्ध होकर, कार्तिक में विष्णु-भक्ति में तत्पर होकर जो कोमल तुलसी-दलों से भगवान् दामोदर का पूजन करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 3 (skanda.2.105.3)
भक्त्या विरहितो यस्तु सुवर्णादिभिरर्चयेत् । तस्य पूजां न गृह्णाति नाऽत्र कार्या विचारणा
bhaktyā virahito yastu suvarṇādibhirarcayet tasya pūjāṁ na gṛhṇāti nā'tra kāryā vicāraṇā
परन्तु जो भक्ति से रहित होकर स्वर्ण आदि से पूजा करता है, उसकी पूजा भगवान् स्वीकार नहीं करते, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 4 (skanda.2.105.4)
सर्वेषामपि वर्णानां भक्तिरेषा परा स्मृता । भक्त्या विरहितं कर्म न विष्णोः प्रियकारणम्
sarveṣāmapi varṇānāṁ bhaktireṣā parā smṛtā bhaktyā virahitaṁ karma na viṣṇoḥ priyakāraṇam
सभी वर्णों के लिए यही भक्ति सर्वश्रेष्ठ मानी गई है; भक्तिरहित कर्म कभी विष्णु की प्रसन्नता का कारण नहीं बनता।
श्लोक 5 (skanda.2.105.5)
भक्त्या संपूजितो नित्यं तुलस्यास्तु दलार्धतः । स्वयं प्रत्यक्षमायाति भगवान्हरिरीश्वरः
bhaktyā saṁpūjito nityaṁ tulasyāstu dalārdhataḥ svayaṁ pratyakṣamāyāti bhagavānharirīśvaraḥ
आधे तुलसी-पत्र से भी भक्तिपूर्वक नित्य पूजित होने पर, भगवान् हरि ईश्वर स्वयं साक्षात् प्रकट हो जाते हैं।
श्लोक 6 (skanda.2.105.6)
विष्णुदासः पुरा भक्त्या तुलसीपूजनेन च । विष्णुलोकं गतः शीघ्रं चोलो गौणत्वमागतः
viṣṇudāsaḥ purā bhaktyā tulasīpūjanena ca viṣṇulokaṁ gataḥ śīghraṁ colo gauṇatvamāgataḥ
पूर्वकाल में विष्णुदास भक्ति और तुलसी-पूजन के प्रभाव से शीघ्र ही विष्णुलोक को गया, जबकि चोल राजा गौण अवस्था को प्राप्त हुआ।
श्लोक 7 (skanda.2.105.7)
तुलस्याः शृणु माहात्म्यं पापघ्नं पुण्यवर्द्धनम् । यत्पुरा विष्णुना प्रोक्तं रमायै तद्वदाम्यहम्
tulasyāḥ śṛṇu māhātmyaṁ pāpaghnaṁ puṇyavarddhanam yatpurā viṣṇunā proktaṁ ramāyai tadvadāmyaham
तुलसी का माहात्म्य सुनो, जो पापों का नाश करने वाला तथा पुण्य को बढ़ाने वाला है, जो पूर्वकाल में स्वयं विष्णु ने रमा (लक्ष्मी) से कहा था — वही मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 8 (skanda.2.105.8)
संप्राप्ते कार्तिके मासि तुलस्याः पूजनं हरेः । ये कुर्वंति नरा भक्त्या ते यांति परमं पदम्
saṁprāpte kārtike māsi tulasyāḥ pūjanaṁ hareḥ ye kurvaṁti narā bhaktyā te yāṁti paramaṁ padam
कार्तिक मास आने पर जो मनुष्य भक्तिपूर्वक तुलसी तथा हरि की पूजा करते हैं, वे परम पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 9 (skanda.2.105.9)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तुलस्याः कोमलैर्दलैः । पूजनीयो महाभक्त्या सर्वक्लेशविनाशनः
tasmātsarvaprayatnena tulasyāḥ komalairdalaiḥ pūjanīyo mahābhaktyā sarvakleśavināśanaḥ
इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से, समस्त क्लेशों का नाश करने वाले भगवान् की कोमल तुलसी-दलों से महाभक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 10 (skanda.2.105.10)
रोपिता तुलसी यावत्कुरुते मूलविस्तरम् । तावद्युगसहस्राणि ब्रह्मलोके महीयते
ropitā tulasī yāvatkurute mūlavistaram tāvadyugasahasrāṇi brahmaloke mahīyate
रोपित तुलसी जब तक अपनी जड़ों को फैलाती रहती है, तब तक उतने ही हज़ार युगों तक (रोपने वाला) ब्रह्मलोक में सम्मानित रहता है।
श्लोक 11 (skanda.2.105.11)
तुलसीपत्रसंयुक्तजले स्नानं चरेद्यदि । सर्वपापविनिर्मुक्तो मोदते विष्णुमंदिरे
tulasīpatrasaṁyuktajale snānaṁ caredyadi sarvapāpavinirmukto modate viṣṇumaṁdire
यदि तुलसी-पत्र मिले हुए जल से स्नान किया जाए, तो मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर विष्णु-मंदिर में आनंदित होता है।
श्लोक 12 (skanda.2.105.12)
वृन्दावनं च कुरुते रोपणार्थं महामुने । तावतैव विमुक्ताऽघो ब्रह्मभूयाय कल्पते
vṛndāvanaṁ ca kurute ropaṇārthaṁ mahāmune tāvataiva vimuktā'gho brahmabhūyāya kalpate
हे महामुने, जो तुलसी लगाने के लिए वृंदावन (तुलसी-वाटिका) बनवाता है, वह उतने ही से पापमुक्त होकर ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है।
श्लोक 13 (skanda.2.105.13)
तुलसीकाननं ब्रह्मन्गृहे यस्याऽवतिष्ठते । तद्गृहं तीर्थभूतं तु न यांति यमकिंकराः
tulasīkānanaṁ brahmangṛhe yasyā'vatiṣṭhate tadgṛhaṁ tīrthabhūtaṁ tu na yāṁti yamakiṁkarāḥ
हे ब्रह्मन्, जिसके घर में तुलसी-वन विराजमान रहता है, वह घर तीर्थ के समान हो जाता है; वहाँ यमदूत नहीं जाते।
श्लोक 14 (skanda.2.105.14)
सर्वपापहरं पुण्यं कामदं तुलसीवनम् । रोपयंति नराः श्रेष्ठास्ते न पश्यंति भास्करिम्
sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ kāmadaṁ tulasīvanam ropayaṁti narāḥ śreṣṭhāste na paśyaṁti bhāskarim
तुलसी-वन सम्पूर्ण पापों का हरण करने वाला, पुण्यदायक तथा कामनाओं को पूर्ण करने वाला है; जो श्रेष्ठ पुरुष इसे लगाते हैं, वे यम को कभी नहीं देखते।
श्लोक 15 (skanda.2.105.15)
तुलसीकाष्ठसंयुक्तं गन्धं यो धारयेन्नरः । तद्देहं न स्पृशेत्पापं क्रियमाणं तथैव च
tulasīkāṣṭhasaṁyuktaṁ gandhaṁ yo dhārayennaraḥ taddehaṁ na spṛśetpāpaṁ kriyamāṇaṁ tathaiva ca
जो मनुष्य तुलसी की लकड़ी से बना सुगंधित द्रव्य धारण करता है, उसके शरीर को पाप, चाहे वह किया भी जा रहा हो, स्पर्श नहीं कर सकता।
श्लोक 16 (skanda.2.105.16)
तुलसीविपिनच्छाया यत्र चैव भवेद्द्विज । तत्र श्राद्धं प्रकर्तव्यं पितॄणां तृप्तिहेतवे
tulasīvipinacchāyā yatra caiva bhaveddvija tatra śrāddhaṁ prakartavyaṁ pitṝṇāṁ tṛptihetave
हे द्विज, जहाँ भी तुलसी-वन की छाया हो, वहाँ पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करना चाहिए।
श्लोक 17 (skanda.2.105.17)
यत्कृते तुलसीपत्रं कर्णे शिरसि दृश्यते । यमस्तं नेक्षितुं शक्तः किमु दूता भयंकराः
yatkṛte tulasīpatraṁ karṇe śirasi dṛśyate yamastaṁ nekṣituṁ śaktaḥ kimu dūtā bhayaṁkarāḥ
जिसके कान अथवा सिर पर तुलसी-पत्र दिखाई देता है, उसे यम भी देख नहीं सकते, फिर भयंकर यमदूतों की तो बात ही क्या!
श्लोक 18 (skanda.2.105.18)
तुलस्या महिमां यस्तु शृणुयान्नित्यमादृतः । सर्व पापविमुक्तात्मा ब्रह्मलोकं स गच्छति
tulasyā mahimāṁ yastu śṛṇuyānnityamādṛtaḥ sarva pāpavimuktātmā brahmalokaṁ sa gacchati
जो नित्य आदरपूर्वक तुलसी की महिमा सुनता है, वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है।
श्लोक 19 (skanda.2.105.19)
अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । तुलस्या विषये ब्रह्मञ्च्छ्रवणात्पापनाशनम्
atraivodāharaṁtīmamitihāsaṁ purātanam tulasyā viṣaye brahmañcchravaṇātpāpanāśanam
इस विषय में एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है; हे ब्रह्मन्, तुलसी के विषय में यह कथा सुनने मात्र से पापों का नाश करती है।
श्लोक 20 (skanda.2.105.20)
पुरा काश्मीरदेशे तु ब्राह्मणौ संबभूवतुः । हरिमेधःसुमेधाख्यौ विष्णुभक्तिपरायणौ
purā kāśmīradeśe tu brāhmaṇau saṁbabhūvatuḥ harimedhaḥsumedhākhyau viṣṇubhaktiparāyaṇau
पूर्वकाल में काश्मीर देश में हरिमेधा और सुमेधा नामक दो ब्राह्मण थे, जो विष्णु-भक्ति में परायण थे,
श्लोक 21 (skanda.2.105.21)
सर्वभूतदयायुक्तौ सर्वतत्त्वार्थवेदिनौ । कदाचित्तौ द्विजवरौ तीर्थयात्रापरायणौ
sarvabhūtadayāyuktau sarvatattvārthavedinau kadācittau dvijavarau tīrthayātrāparāyaṇau
सभी प्राणियों पर दयालु तथा समस्त तत्त्वों के ज्ञाता थे। एक बार वे दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मण तीर्थयात्रा में तत्पर होकर,
श्लोक 22 (skanda.2.105.22)
गच्छतावेकतो विप्रौ कांतारे श्रमविह्वलौ । तुलसीकाननं तत्र ददर्शतुररिंदमौ
gacchatāvekato viprau kāṁtāre śramavihvalau tulasīkānanaṁ tatra dadarśaturariṁdamau
साथ-साथ चलते हुए, वन में थकान से व्याकुल हो गए। तभी उन दोनों शत्रुदमन ब्राह्मणों ने वहाँ एक तुलसी-वन देखा।
श्लोक 23 (skanda.2.105.23)
तयोः सुमेधास्तद्दृष्ट्वा तुलसीकाननं महत् । प्रदक्षिणीकृत्य तदा ववंदे भक्तिसंयुतः
tayoḥ sumedhāstaddṛṣṭvā tulasīkānanaṁ mahat pradakṣiṇīkṛtya tadā vavaṁde bhaktisaṁyutaḥ
उन दोनों में से सुमेधा ने उस विशाल तुलसी-वन को देखकर उसकी प्रदक्षिणा करके भक्तिपूर्वक वंदना की।
श्लोक 24 (skanda.2.105.24)
दृष्ट्वैतद्धरिमेधास्तु उवाच परया मुदा । ज्ञातुं तुलस्या माहात्म्यं तत्फलं च पुनःपुनः
dṛṣṭvaitaddharimedhāstu uvāca parayā mudā jñātuṁ tulasyā māhātmyaṁ tatphalaṁ ca punaḥpunaḥ
यह देखकर हरिमेधा ने अत्यंत प्रसन्नता से तुलसी के माहात्म्य और उसके फल को जानने के लिए बार-बार पूछा —
श्लोक 25 (skanda.2.105.25)
हरिमेधा उवाच । किमर्थं विप्र देवेषु तीर्थेषु च व्रतेषु च । स्थितेषु विप्रमुख्येषु प्रणामं कृतवानसि
harimedhā uvāca kimarthaṁ vipra deveṣu tīrtheṣu ca vrateṣu ca sthiteṣu vipramukhyeṣu praṇāmaṁ kṛtavānasi
हरिमेधा ने कहा — हे विप्र, देवताओं, तीर्थों, व्रतों तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणों के होते हुए, आपने किसलिए इसे प्रणाम किया है?
श्लोक 26 (skanda.2.105.26)
सुमेधा उवाच । शृणु विप्र महाभाग साधु वाक्यमुदीरितम् । आतपो बाधते ह्यावां गत्वैतद्वटसन्निधौ
sumedhā uvāca śṛṇu vipra mahābhāga sādhu vākyamudīritam ātapo bādhate hyāvāṁ gatvaitadvaṭasannidhau
सुमेधा ने कहा — हे विप्र, हे महाभाग, सुनिए इसका उचित कारण; हमें धूप सता रही है, चलिए इस वट वृक्ष के समीप,
श्लोक 27 (skanda.2.105.27)
तस्यच्छायां समाश्रित्य वक्ष्यामि ते यथार्थतः । एवमुक्तः सुमेधास्तु हरिमेधेन संयुतः
tasyacchāyāṁ samāśritya vakṣyāmi te yathārthataḥ evamuktaḥ sumedhāstu harimedhena saṁyutaḥ
उसकी छाया में जाकर मैं आपको यथार्थ रूप से बताता हूँ। ऐसा कहकर सुमेधा, हरिमेधा के साथ,
श्लोक 28 (skanda.2.105.28)
वटं जगाम धर्मज्ञो महत्कोटरसंयुतम् । तत्र विश्राम्य विप्रोसौ हरिमेधमुवाच ह
vaṭaṁ jagāma dharmajño mahatkoṭarasaṁyutam tatra viśrāmya viprosau harimedhamuvāca ha
उस विशाल कोटर वाले वट वृक्ष के पास गया, जो धर्म का ज्ञाता था। वहाँ विश्राम करके उस ब्राह्मण ने हरिमेधा से कहा —
श्लोक 29 (skanda.2.105.29)
श्रूयतां विप्रशार्दूल तुलस्यास्तूत्तमां कथाम् । परमेशप्रसादेन संजाता या पयोनिधौ
śrūyatāṁ vipraśārdūla tulasyāstūttamāṁ kathām parameśaprasādena saṁjātā yā payonidhau
"हे विप्रशार्दूल, तुलसी की उत्तम कथा सुनिए, जो परमेश्वर की कृपा से क्षीरसागर में उत्पन्न हुई थी।
श्लोक 30 (skanda.2.105.30)
पुरा दुर्वाससः शापाद्गतैश्वर्ये पुरंदरे । ममंथुः क्षीरजलधिं ब्रह्माद्याः ससुराऽसुराः
purā durvāsasaḥ śāpādgataiśvarye puraṁdare mamaṁthuḥ kṣīrajaladhiṁ brahmādyāḥ sasurā'surāḥ
पूर्वकाल में दुर्वासा के शाप से इन्द्र का ऐश्वर्य नष्ट हो जाने पर, ब्रह्मा आदि देवों और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया था।
श्लोक 31 (skanda.2.105.31)
ऐरावतः कल्पतरुश्चन्द्रमाः कमला तथा । उच्चैःश्रवा कौस्तुभश्च तथा धन्वन्तरिर्हरिः
airāvataḥ kalpataruścandramāḥ kamalā tathā uccaiḥśravā kaustubhaśca tathā dhanvantarirhariḥ
ऐरावत, कल्पवृक्ष, चन्द्रमा तथा कमला (लक्ष्मी), उच्चैःश्रवा, कौस्तुभमणि तथा धन्वंतरि रूप में हरि,
श्लोक 32 (skanda.2.105.32)
हरीतक्यादयश्चाऽपि दिव्या ओषधयस्तथा । अजायन्त द्विजश्रेष्ठ लोकश्रेयोविधायकाः
harītakyādayaścā'pi divyā oṣadhayastathā ajāyanta dvijaśreṣṭha lokaśreyovidhāyakāḥ
तथा हरीतकी आदि दिव्य औषधियाँ भी, हे द्विजश्रेष्ठ, लोक-कल्याण करने वाली उत्पन्न हुईं।
श्लोक 33 (skanda.2.105.33)
ततः पीयूषकलशमजरामरदायकम् । कराभ्यां कलशं विष्णुर्धारयन्सुतलं परम् । अवेक्ष्य मनसा सद्यः परां निर्वृतिमाप ह
tataḥ pīyūṣakalaśamajarāmaradāyakam karābhyāṁ kalaśaṁ viṣṇurdhārayansutalaṁ param avekṣya manasā sadyaḥ parāṁ nirvṛtimāpa ha
तत्पश्चात् अजर-अमरता प्रदान करने वाले अमृत-कलश को दोनों हाथों से धारण करते हुए विष्णु ने उसे परम सुतल में देखकर मन से ही तत्काल परम आनंद प्राप्त किया।
श्लोक 34 (skanda.2.105.34)
तस्मिन्पीयूषकलश आनन्दास्रोदबिन्दवः । व्यपतंस्तुलसी सद्यः समजायत मण्डला
tasminpīyūṣakalaśa ānandāsrodabindavaḥ vyapataṁstulasī sadyaḥ samajāyata maṇḍalā
उस अमृत-कलश में आनंद के आँसुओं की बूँदें गिरीं, और तत्काल तुलसी पूर्ण रूप से उत्पन्न हुई।
श्लोक 35 (skanda.2.105.35)
सर्व लक्षणसंपन्ना सर्वाभरणभूषिता । तत्रोत्पन्नां तथा लक्ष्मीं तुलसीं च ददुर्हरेः । देवा ब्रह्मादयस्ते हि जगृहे भगवान्हरिः
sarva lakṣaṇasaṁpannā sarvābharaṇabhūṣitā tatrotpannāṁ tathā lakṣmīṁ tulasīṁ ca dadurhareḥ devā brahmādayaste hi jagṛhe bhagavānhariḥ
सभी शुभ लक्षणों से युक्त, सम्पूर्ण आभूषणों से सुशोभित — वहाँ उत्पन्न लक्ष्मी और तुलसी दोनों को ब्रह्मा आदि देवों ने हरि को अर्पित किया, और भगवान् हरि ने उन्हें ग्रहण किया।
श्लोक 36 (skanda.2.105.36)
ततोऽतीव प्रियकरा तुलसी जगतां पतेः । सा तु देवगणैः सर्वैर्विष्णुवत्पूज्यते प्रिया । नारायणो जगत्त्राता तुलसी तस्य वल्लभा
tato'tīva priyakarā tulasī jagatāṁ pateḥ sā tu devagaṇaiḥ sarvairviṣṇuvatpūjyate priyā nārāyaṇo jagattrātā tulasī tasya vallabhā
तब से तुलसी जगत्पति को अत्यंत प्रिय हो गई; वह प्रिया समस्त देवगणों द्वारा विष्णु के समान ही पूजित होती है; नारायण जगत् के त्राता हैं, और तुलसी उनकी प्रियतमा है।
श्लोक 37 (skanda.2.105.37)
तस्मात्तस्या नमस्कारो मया विप्र कृतस्ततः । इत्येवं वदतस्तस्य सुमेधस्य महात्मनः
tasmāttasyā namaskāro mayā vipra kṛtastataḥ ityevaṁ vadatastasya sumedhasya mahātmanaḥ
इसीलिए, हे विप्र, मैंने उसे नमस्कार किया।" इस प्रकार जब महात्मा सुमेधा यह कह रहे थे,
श्लोक 38 (skanda.2.105.38)
आराददृश्यत महद्विमानं सूर्यवर्चसम् । तदानीं वटवृक्षस्तु पपात पुरतो मुने
ārādadṛśyata mahadvimānaṁ sūryavarcasam tadānīṁ vaṭavṛkṣastu papāta purato mune
तभी समीप में सूर्य के समान तेजस्वी एक विशाल विमान दिखाई दिया, और उसी क्षण, हे मुने, वह वट वृक्ष उनके सामने गिर पड़ा।
श्लोक 39 (skanda.2.105.39)
तथैव तस्माद्वृक्षाच्च पुरुषौ द्वौ विनिर्गतौ । द्योतयंतौ दिशः सर्वास्तेजसा सूर्यसन्निभौ
tathaiva tasmādvṛkṣācca puruṣau dvau vinirgatau dyotayaṁtau diśaḥ sarvāstejasā sūryasannibhau
और उसी वृक्ष से दो पुरुष निकले, जो सूर्य के समान तेज से सभी दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे,
श्लोक 40 (skanda.2.105.40)
प्रणामं चक्रतुस्तौ हि हरिमेधसुमेधयोः । हरिमेधसुमेधौ तौ तौ दृष्ट्वा भयविह्वलौ
praṇāmaṁ cakratustau hi harimedhasumedhayoḥ harimedhasumedhau tau tau dṛṣṭvā bhayavihvalau
और उन्होंने हरिमेधा तथा सुमेधा को प्रणाम किया। हरिमेधा और सुमेधा उन दोनों को देखकर भयभीत हो उठे,
श्लोक 41 (skanda.2.105.41)
ऊचतुर्विस्मयाविष्टौ तावुभौ देवसन्निभौ । हरिमेधसुमेधसावूचतुः । युवां कौ देवसंकाशौ भवंतौ सर्वमंगलौ । मंदारमालां तरुणां धारयंतौ तथाऽमरौ । नमस्कार्यौ तथाऽऽवाभ्यां पूज्यौ च सुररूपिणौ
ūcaturvismayāviṣṭau tāvubhau devasannibhau harimedhasumedhasāvūcatuḥ yuvāṁ kau devasaṁkāśau bhavaṁtau sarvamaṁgalau maṁdāramālāṁ taruṇāṁ dhārayaṁtau tathā'marau namaskāryau tathā''vābhyāṁ pūjyau ca surarūpiṇau
और आश्चर्यचकित होकर देवतुल्य उन दोनों से बोले — हरिमेधा और सुमेधा ने कहा — "आप दोनों कौन हैं, जो देवताओं के समान, सर्वमंगल-रूप हैं, ताज़े मंदार-पुष्पों की माला धारण किए हुए देवताओं के समान हैं? आप देव-रूप हमारे लिए नमस्कार्य और पूज्य हैं।"
श्लोक 42 (skanda.2.105.42)
इत्युक्तौ ब्राह्मणाभ्यां तावूचतुर्वृक्षनिर्गतौ । युवामेव पिता माता आवयोश्च तथा गुरुः
ityuktau brāhmaṇābhyāṁ tāvūcaturvṛkṣanirgatau yuvāmeva pitā mātā āvayośca tathā guruḥ
इस प्रकार दोनों ब्राह्मणों द्वारा कहे जाने पर, वृक्ष से निकले वे दोनों बोले — "आप दोनों ही हमारे माता-पिता हैं, तथा हमारे गुरु भी हैं,
श्लोक 43 (skanda.2.105.43)
बंध्वादयस्तथा चैव युवामेव न संशयः । ज्येष्ठ उवाच । अहं तु देवलोकस्य आस्तीकोनाम नामतः
baṁdhvādayastathā caiva yuvāmeva na saṁśayaḥ jyeṣṭha uvāca ahaṁ tu devalokasya āstīkonāma nāmataḥ
और बंधु-बांधव भी आप ही हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।" ज्येष्ठ ने कहा — "मैं देवलोक का आस्तीक नामक निवासी हूँ,
श्लोक 44 (skanda.2.105.44)
अप्सरोगणसंवीतः कदाचिन्नंदन वनम् । क्रीडार्थमगमं चाद्रौ विषयासक्त चेतनः
apsarogaṇasaṁvītaḥ kadācinnaṁdana vanam krīḍārthamagamaṁ cādrau viṣayāsakta cetanaḥ
अप्सराओं के समूह से घिरा हुआ, एक बार विषयासक्त मन से मैं पर्वत पर नंदनवन में क्रीड़ा के लिए गया था,
श्लोक 45 (skanda.2.105.45)
रेमिरे देववनिता यथाकामं मया सह । मुक्तामल्लिकमाल्यानि निपेतुस्तानि योषिताम्
remire devavanitā yathākāmaṁ mayā saha muktāmallikamālyāni nipetustāni yoṣitām
और देवांगनाओं ने मेरे साथ इच्छानुसार क्रीड़ा की; उन स्त्रियों की मोतियों और चमेली की मालाएँ गिर पड़ीं,
श्लोक 46 (skanda.2.105.46)
तपतो रोमशस्यैव तद्दृष्ट्वा कुपितो मुनिः । योषितां नाऽपराधोयं यासां वै परतंत्रता
tapato romaśasyaiva taddṛṣṭvā kupito muniḥ yoṣitāṁ nā'parādhoyaṁ yāsāṁ vai parataṁtratā
तप में लीन रोमश मुनि पर; यह देखकर मुनि क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा — "इसमें स्त्रियों का कोई दोष नहीं, जो परतंत्र हैं;
श्लोक 47 (skanda.2.105.47)
अयमेव दुराचारः शापार्ह इति चाऽब्रवीत् । त्वं ब्रह्मराक्षसो भूत्वा वटवृक्षे चरेति माम्
ayameva durācāraḥ śāpārha iti cā'bravīt tvaṁ brahmarākṣaso bhūtvā vaṭavṛkṣe careti mām
यही (आस्तीक) दुराचारी और शाप के योग्य है" — ऐसा कहकर उन्होंने मुझे शाप दिया — "तुम ब्रह्मराक्षस बनकर वट वृक्ष में निवास करो।"
श्लोक 48 (skanda.2.105.48)
प्रसादितो मया सोऽथ विशापमपि दत्तवान् । तुलसीपत्रमाहात्म्यं विष्णोर्नाम तथा द्विजात्
prasādito mayā so'tha viśāpamapi dattavān tulasīpatramāhātmyaṁ viṣṇornāma tathā dvijāt
मेरे द्वारा प्रसन्न किए जाने पर उन्होंने शाप से मुक्ति का भी उपाय बताया — "जब तुम किसी ब्राह्मण से तुलसी-पत्र के माहात्म्य और विष्णु के नाम की महिमा,
श्लोक 49 (skanda.2.105.49)
यदा शृणोषि सद्यस्त्वं विमुक्तिं यास्यसे पराम् । इति शप्तस्तु मुनिना चिरकालं सुदुःखितः
yadā śṛṇoṣi sadyastvaṁ vimuktiṁ yāsyase parām iti śaptastu muninā cirakālaṁ suduḥkhitaḥ
सुनोगे, तभी तुम तुरंत परम मुक्ति को प्राप्त होगे।" इस प्रकार मुनि द्वारा शापित होकर मैं दीर्घकाल तक अत्यंत दुःखी होकर,
श्लोक 50 (skanda.2.105.50)
वसाम्यत्र वटे दैवाद्भवद्दर्शनतो ध्रुवम् । मुक्तिर्जाता विप्रशापाद्द्वितीयस्य कथां शृणु
vasāmyatra vaṭe daivādbhavaddarśanato dhruvam muktirjātā vipraśāpāddvitīyasya kathāṁ śṛṇu
इस वट वृक्ष में निवास करता रहा; और अब दैवयोग से आपके दर्शन से निश्चय ही मेरी मुक्ति हो गई है। अब दूसरे की कथा सुनिए —
श्लोक 51 (skanda.2.105.51)
अयं मुनिवरः पूर्वं गुरुशुश्रूषणे रतः । गुरोराज्ञामनादृत्य ब्रह्मराक्षसतां गतः
ayaṁ munivaraḥ pūrvaṁ guruśuśrūṣaṇe rataḥ gurorājñāmanādṛtya brahmarākṣasatāṁ gataḥ
यह श्रेष्ठ मुनि पहले गुरु-सेवा में तत्पर था; परन्तु गुरु की आज्ञा का अनादर करके यह ब्रह्मराक्षस बन गया था।
श्लोक 52 (skanda.2.105.52)
युष्मत्प्रसादादधुना ब्रह्मशापाद्विमोचितः । तीर्थयात्राफलं चैव युवाभ्यामिह साधितम्
yuṣmatprasādādadhunā brahmaśāpādvimocitaḥ tīrthayātrāphalaṁ caiva yuvābhyāmiha sādhitam
आप दोनों की कृपा से अब यह ब्रह्म-शाप से मुक्त हो गया है; और तीर्थयात्रा का फल आप दोनों ने यहाँ सिद्ध कर लिया है।
श्लोक 53 (skanda.2.105.53)
उत्तरोत्तरपुण्यानि वर्धंते च दिनेदिने । इत्युक्त्वा तौ मुनिवरौ प्रणम्य च पुनःपुनः
uttarottarapuṇyāni vardhaṁte ca dinedine ityuktvā tau munivarau praṇamya ca punaḥpunaḥ
पुण्य दिन-प्रतिदिन उत्तरोत्तर बढ़ते जाते हैं।" ऐसा कहकर उन दोनों श्रेष्ठ मुनियों ने बार-बार प्रणाम करके,
श्लोक 54 (skanda.2.105.54)
तावनुज्ञाप्य तौ धाम जग्मतुः परया मुदा । ततस्तौ तीर्थयात्रार्थं परमौ मुनिपुंगवौ
tāvanujñāpya tau dhāma jagmatuḥ parayā mudā tatastau tīrthayātrārthaṁ paramau munipuṁgavau
उनसे अनुमति लेकर वे दोनों अत्यंत प्रसन्नता से अपने धाम को चले गए। तत्पश्चात् वे दोनों श्रेष्ठ मुनि तीर्थयात्रा के लिए,
श्लोक 55 (skanda.2.105.55)
शंसंतौ तुलसीं पुण्यां जग्मतुर्मुनिपुंगव । एवं नारद माहात्म्यं तुलस्याः को नु वर्णयेत्
śaṁsaṁtau tulasīṁ puṇyāṁ jagmaturmunipuṁgava evaṁ nārada māhātmyaṁ tulasyāḥ ko nu varṇayet
पुण्यमयी तुलसी की प्रशंसा करते हुए आगे बढ़ गए, हे मुनिपुंगव। इस प्रकार, हे नारद, तुलसी के माहात्म्य का वर्णन भला कौन कर सकता है?
श्लोक 56 (skanda.2.105.56)
तस्मान्नारद मासेऽस्मिन्कार्तिके हरितुष्टिदे । कर्तव्या तुलसीपूजा नाऽत्र कार्या विचारणा
tasmānnārada māse'sminkārtike harituṣṭide kartavyā tulasīpūjā nā'tra kāryā vicāraṇā
इसलिए, हे नारद, हरि को संतुष्ट करने वाले इस कार्तिक मास में तुलसी-पूजा अवश्य करनी चाहिए, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 57 (skanda.2.105.57)
एवमंग व्रतान्येव प्रोक्तानि मुनिसत्तम । उपांगानि प्रवक्ष्यामि वालखिल्योदितानि च
evamaṁga vratānyeva proktāni munisattama upāṁgāni pravakṣyāmi vālakhilyoditāni ca
हे मुनिसत्तम, इस प्रकार मुख्य व्रत (अंग) कहे गए हैं; अब मैं वालखिल्यों द्वारा कहे गए उपांगों का वर्णन करूँगा।