वैष्णव खण्ड · अध्याय 106
वत्सद्वादशीयमत्रयोदशीनरकचतुर्दशीदीपावलीकृत्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.2.106.1)
वालखिल्या ऊचुः । कृष्णः प्रोवाच धर्माय द्वादशीं वत्ससंज्ञिताम् । गोधूलिकालसंयुक्ता द्वादशी वत्सपूजने
vālakhilyā ūcuḥ kṛṣṇaḥ provāca dharmāya dvādaśīṁ vatsasaṁjñitām godhūlikālasaṁyuktā dvādaśī vatsapūjane
वालखिल्यों ने कहा — कृष्ण ने धर्मराज (युधिष्ठिर) से वत्स नामक द्वादशी तिथि का वर्णन किया। गोधूलि-काल से युक्त द्वादशी वत्स-पूजन के लिए है।
श्लोक 2 (skanda.2.106.2)
वत्सपूजा वटे चैव कर्तव्या प्रथमेऽहनि । सवत्सां तुल्यवर्णां च शीलिनीं गां पयस्विनीम् । चंदनादिभिरालिप्य पुष्पमालाभिरर्चयेत्
vatsapūjā vaṭe caiva kartavyā prathame'hani savatsāṁ tulyavarṇāṁ ca śīlinīṁ gāṁ payasvinīm caṁdanādibhirālipya puṣpamālābhirarcayet
पहले दिन वट वृक्ष के समीप वत्स-पूजा करनी चाहिए। बछड़े सहित, उसी वर्ण की, सुशील और दुधारू गाय को चंदन आदि से लेपकर पुष्पमालाओं से पूजना चाहिए।
श्लोक 3 (skanda.2.106.3)
तद्दिने तैलपक्वं च स्थालीपक्वं युधिष्ठिर । गोक्षीरं गोघृतं चैव दधिक्षीरं च वर्जयेत्
taddine tailapakvaṁ ca sthālīpakvaṁ yudhiṣṭhira gokṣīraṁ goghṛtaṁ caiva dadhikṣīraṁ ca varjayet
हे युधिष्ठिर, उस दिन तेल में तला हुआ भोजन तथा बर्तन में पकाया भोजन, गाय का दूध, गाय का घी तथा दही-दूध का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.2.106.4)
दिनांते सूर्यबिंबार्धादुभयत्र घटीदलम् । ततो नीराजनं कार्य्यं निरीक्षेच्च शुभाऽशुभम्
dināṁte sūryabiṁbārdhādubhayatra ghaṭīdalam tato nīrājanaṁ kāryyaṁ nirīkṣecca śubhā'śubham
दिन के अंत में, सूर्य के आधे बिम्ब के दिखते समय से दोनों ओर आधी घड़ी तक, आरती करनी चाहिए तथा शुभ-अशुभ लक्षणों को देखना चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.2.106.5)
नानादीपान्प्रकल्प्याऽऽदौ स्वर्णपात्रादि संस्थितान् । नीराजयेद्दीपपूर्वं निरीक्षेत शुभाऽशुभम्
nānādīpānprakalpyā''dau svarṇapātrādi saṁsthitān nīrājayeddīpapūrvaṁ nirīkṣeta śubhā'śubham
सबसे पहले सोने के पात्र आदि में रखे विभिन्न दीप तैयार करके आरती करनी चाहिए, तथा शुभ-अशुभ लक्षणों को देखना चाहिए।
श्लोक 6 (skanda.2.106.6)
लापयित्वा सर्वदीपानुत्तराभिमुखान्न्यसेत् । मुख्या दीपा नव प्रोक्ता अन्यानपि च कल्पयेत्
lāpayitvā sarvadīpānuttarābhimukhānnyaset mukhyā dīpā nava proktā anyānapi ca kalpayet
सभी दीपों को प्रज्वलित करके उत्तर दिशा की ओर मुख करके रखना चाहिए। मुख्य दीप नौ कहे गए हैं; अन्य दीप भी सजाए जा सकते हैं।
श्लोक 7 (skanda.2.106.7)
ज्वाला चेद्दक्षिणासंस्था सतेजस्का शिखान्विता । स्थिरा चेत्सौख्यदा प्रोक्ता विपरीता तु दुःखदा
jvālā ceddakṣiṇāsaṁsthā satejaskā śikhānvitā sthirā cetsaukhyadā proktā viparītā tu duḥkhadā
यदि ज्वाला दक्षिण की ओर झुकी हो, तेजस्वी हो और उसकी नोक सुव्यवस्थित हो, तथा स्थिर हो, तो वह सुखदायक कही गई है; इसके विपरीत होने पर वह दुःखदायक है।
श्लोक 8 (skanda.2.106.8)
कार्तिके कृष्णपत्रे तु द्वादश्यादिषु पंचसु । तिथिषूक्तः पूर्वरात्रे नृणां नीराजनाविधिः
kārtike kṛṣṇapatre tu dvādaśyādiṣu paṁcasu tithiṣūktaḥ pūrvarātre nṛṇāṁ nīrājanāvidhiḥ
कार्तिक के कृष्ण पक्ष में द्वादशी आदि पाँच तिथियों में, रात्रि के पूर्व भाग में मनुष्यों के लिए आरती-विधि कही गई है।
श्लोक 9 (skanda.2.106.9)
पक्षं संसूचयत्यादिर्द्वितीयो मासमेव च । तृतीय ऋतुमेवेह चतुर्थस्त्वयनं तथा । वर्षं तु पंचमो दीपः शुभाशुभं विनिर्णयेत्
pakṣaṁ saṁsūcayatyādirdvitīyo māsameva ca tṛtīya ṛtumeveha caturthastvayanaṁ tathā varṣaṁ tu paṁcamo dīpaḥ śubhāśubhaṁ vinirṇayet
पहला दीप पक्ष को, दूसरा मास को, तीसरा यहाँ ऋतु को, चौथा अयन को, तथा पाँचवाँ दीप वर्ष के शुभ-अशुभ का निर्णय करता है।
श्लोक 10 (skanda.2.106.10)
सूर्यांशसंभवा दीपा अंधकारविनाशकाः । त्रिकाले मां दीपयंतु दिशंतु च शुभाऽशुभम्
sūryāṁśasaṁbhavā dīpā aṁdhakāravināśakāḥ trikāle māṁ dīpayaṁtu diśaṁtu ca śubhā'śubham
"सूर्य के अंश से उत्पन्न, अंधकार का नाश करने वाले हे दीपो, तीनों कालों में मुझे प्रकाशित करो और शुभ-अशुभ का संकेत दो।"
श्लोक 11 (skanda.2.106.11)
अभिमंत्र्य च मंत्रेण ततो नीराजयेत्क्रमात् । आदौ देवांस्ततो विप्रान्हस्तिनश्च तुरंगमान् । ज्येष्ठाञ्च्छ्रेष्ठाञ्जघन्यांश्च मातृमुख्याश्च योषितः
abhimaṁtrya ca maṁtreṇa tato nīrājayetkramāt ādau devāṁstato viprānhastinaśca turaṁgamān jyeṣṭhāñcchreṣṭhāñjaghanyāṁśca mātṛmukhyāśca yoṣitaḥ
मंत्र से अभिमंत्रित करके तत्पश्चात् क्रमशः आरती करनी चाहिए — पहले देवताओं की, फिर ब्राह्मणों, हाथियों और घोड़ों की; बड़ों की, श्रेष्ठजनों की, छोटों की तथा माता से आरंभ करके स्त्रियों की।
श्लोक 12 (skanda.2.106.12)
ततो नीराजितान्दीपान्स्वस्वस्थानेषु विन्यसेत् । रूक्षैर्लक्ष्मीविनाशः स्याच्छ्वेतैरन्नक्षयो भवेत् । अतिरक्तेषु युद्धानि मृत्युः कृष्णशिखेषु च
tato nīrājitāndīpānsvasvasthāneṣu vinyaset rūkṣairlakṣmīvināśaḥ syācchvetairannakṣayo bhavet atirakteṣu yuddhāni mṛtyuḥ kṛṣṇaśikheṣu ca
तत्पश्चात् आरती किए गए दीपों को अपने-अपने स्थान पर रखना चाहिए। खुरदुरी लौ से लक्ष्मी का नाश होता है, सफेद लौ से अन्न का क्षय होता है, अत्यंत लाल लौ से युद्ध होते हैं, तथा काली नोक वाली लौ से मृत्यु होती है।
श्लोक 13 (skanda.2.106.13)
एकांगीनाम गोपाला तयैतच्च व्रतं कृतम् । धनधान्यसमायुक्ता जाता वर्षत्रयेण सा
ekāṁgīnāma gopālā tayaitacca vrataṁ kṛtam dhanadhānyasamāyuktā jātā varṣatrayeṇa sā
एकांगी नामक एक गोपिका ने यह व्रत किया; तीन वर्षों में ही वह धन-धान्य से युक्त हो गई।
श्लोक 14 (skanda.2.106.14)
तस्माद्गोपूजनं कार्यं द्वादश्यां कार्तिकस्य तु । एतद्गोव्रतमाहात्म्यं श्रुत्वा कुर्वंति ये नराः
tasmādgopūjanaṁ kāryaṁ dvādaśyāṁ kārtikasya tu etadgovratamāhātmyaṁ śrutvā kurvaṁti ye narāḥ
इसलिए कार्तिक की द्वादशी को गो-पूजन करना चाहिए। जो मनुष्य इस गो-व्रत के माहात्म्य को सुनकर इसे करते हैं,
श्लोक 15 (skanda.2.106.15)
ते गोव्रतप्रभावेन न गोभिर्विच्युता भुवि । गोऽपराधः कृतो यः स्यात्स व्रताद्विलयं व्रजेत्
te govrataprabhāvena na gobhirvicyutā bhuvi go'parādhaḥ kṛto yaḥ syātsa vratādvilayaṁ vrajet
वे गो-व्रत के प्रभाव से इस पृथ्वी पर गायों से कभी वियुक्त नहीं होते। यदि गाय के प्रति कोई अपराध किया गया हो, तो वह इस व्रत से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 16 (skanda.2.106.16)
वालखिल्या ऊचुः । कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां मासि चाऽऽश्वयुजे तथा । दीपोत्सव समीपे तु व्रतमेतत्समाचरेत्
vālakhilyā ūcuḥ kṛṣṇapakṣe caturdaśyāṁ māsi cā''śvayuje tathā dīpotsava samīpe tu vratametatsamācaret
वालखिल्यों ने कहा — आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को, दीपोत्सव के समीप, यह व्रत करना चाहिए।
श्लोक 17 (skanda.2.106.17)
प्रातः स्नात्वा त्रयोदश्यां कृत्वा वै दंतधावनम् । त्रिरात्रनियमं कृत्वा गोविंदे भक्तितत्परः
prātaḥ snātvā trayodaśyāṁ kṛtvā vai daṁtadhāvanam trirātraniyamaṁ kṛtvā goviṁde bhaktitatparaḥ
त्रयोदशी को प्रातःकाल स्नान करके, दंतधावन करके, तीन रात्रि के नियम का पालन करते हुए, गोविंद की भक्ति में तत्पर होकर,
श्लोक 18 (skanda.2.106.18)
कार्य एतद्व्रतस्यांते तथा गोवर्द्धनोत्सवः । त्रिमुहूर्ताऽधिका ग्राह्या परवेधो न दोषभाक्
kārya etadvratasyāṁte tathā govarddhanotsavaḥ trimuhūrtā'dhikā grāhyā paravedho na doṣabhāk
इस व्रत के अंत में गोवर्धन-उत्सव भी करना चाहिए। तिथि तीन मुहूर्त से अधिक बढ़ी हुई ही ग्राह्य है; अगले दिन में प्रवेश करने से कोई दोष नहीं लगता।
श्लोक 19 (skanda.2.106.19)
आश्विनस्याऽसिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे । यमदीपं बलिं दद्यादपमृत्युर्विनश्यति
āśvinasyā'site pakṣe trayodaśyāṁ niśāmukhe yamadīpaṁ baliṁ dadyādapamṛtyurvinaśyati
आश्विन के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को, रात्रि के आरंभ में, यमदीप की भेंट देनी चाहिए, इससे अकाल मृत्यु का नाश होता है।
श्लोक 20 (skanda.2.106.20)
पुरा हेमनकस्यैव बालकश्चाऽपमृत्युतः । मुक्तोभूदाश्विने कृष्णत्रयोदश्यां दयावशात्
purā hemanakasyaiva bālakaścā'pamṛtyutaḥ muktobhūdāśvine kṛṣṇatrayodaśyāṁ dayāvaśāt
पूर्वकाल में हेमनक का पुत्र आश्विन की कृष्ण त्रयोदशी को यम की दया से अकाल मृत्यु से मुक्त हुआ था।
श्लोक 21 (skanda.2.106.21)
दूता ऊचुः । यथा न जीविताद्भ्रश्येदीदृशे तु महोत्सवे । तथोपायं ब्रूहि यम कृपां कृत्वाऽस्मदग्रतः
dūtā ūcuḥ yathā na jīvitādbhraśyedīdṛśe tu mahotsave tathopāyaṁ brūhi yama kṛpāṁ kṛtvā'smadagrataḥ
यमदूतों ने कहा — हे यम, ऐसे महोत्सव में कोई अपने जीवन से वंचित न हो, इसके लिए हमारे सामने कृपापूर्वक उपाय बताइए।
श्लोक 22 (skanda.2.106.22)
यम उवाच । आश्विनस्याऽसिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे । प्रतिवर्षं तु यो दद्याद्गृहद्वारे सुदीपकम्
yama uvāca āśvinasyā'site pakṣe trayodaśyāṁ niśāmukhe prativarṣaṁ tu yo dadyādgṛhadvāre sudīpakam
यम ने कहा — आश्विन के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को, रात्रि के आरंभ में, जो प्रतिवर्ष अपने घर के द्वार पर एक सुंदर दीप देता है,
श्लोक 23 (skanda.2.106.23)
मन्त्रेणाऽनेन भो दूताः समानेयः स नोत्सवे । प्राप्तेऽपमृत्यावपि च शासनं क्रियतां मम
mantreṇā'nena bho dūtāḥ samāneyaḥ sa notsave prāpte'pamṛtyāvapi ca śāsanaṁ kriyatāṁ mama
हे दूतो, इस मंत्र के साथ, उसे हमारे उत्सव में मत लाना; अकाल मृत्यु आने पर भी मेरी यही आज्ञा है।
श्लोक 24 (skanda.2.106.24)
मृत्युना पाशदंडाभ्यां कालेन च मया सह । त्रयोदश्यां दीपदानात्सूर्यजः प्रीयतामिति
mṛtyunā pāśadaṁḍābhyāṁ kālena ca mayā saha trayodaśyāṁ dīpadānātsūryajaḥ prīyatāmiti
"मृत्यु, पाश और दंड सहित, काल के साथ तथा मेरे साथ — त्रयोदशी को दीपदान से सूर्यपुत्र यम प्रसन्न हों।"
श्लोक 25 (skanda.2.106.25)
मन्त्रेणानेन यो दीपं द्वारदेशे प्रयच्छति । उत्सवे चाऽपमृत्योश्च भयं तस्य न जायते
mantreṇānena yo dīpaṁ dvāradeśe prayacchati utsave cā'pamṛtyośca bhayaṁ tasya na jāyate
इस मंत्र के साथ जो द्वार-देश में दीप देता है, उसे उत्सव में तथा अन्यत्र भी अकाल मृत्यु का भय नहीं होता।
श्लोक 26 (skanda.2.106.26)
वालखिल्या ऊचुः । पूर्वविद्धचतुर्दश्यामाश्विनस्य सितेतरे । पक्षे प्रत्यूषसमये स्नानं कुर्यात्प्रयत्नतः
vālakhilyā ūcuḥ pūrvaviddhacaturdaśyāmāśvinasya sitetare pakṣe pratyūṣasamaye snānaṁ kuryātprayatnataḥ
वालखिल्यों ने कहा — आश्विन के कृष्ण पक्ष की, पिछले दिन से युक्त चतुर्दशी को, प्रातःकाल यत्नपूर्वक स्नान करना चाहिए।
श्लोक 27 (skanda.2.106.27)
अरुणोदयतोऽन्यत्र रिक्तायां स्नाति यो नरः । तस्याऽब्दिकभवो धर्मो नश्यत्येव न संशयः
aruṇodayato'nyatra riktāyāṁ snāti yo naraḥ tasyā'bdikabhavo dharmo naśyatyeva na saṁśayaḥ
जो मनुष्य अरुणोदय के अतिरिक्त किसी अन्य समय पर, रिक्ता तिथि में स्नान करता है, उसका वार्षिक पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है।
श्लोक 28 (skanda.2.106.28)
तथा कृष्णचतुर्दश्यामाश्विनेऽर्कोदये सुराः । यामिन्याः पश्चिमे यामे तैलाभ्यंगो विशिष्यते
tathā kṛṣṇacaturdaśyāmāśvine'rkodaye surāḥ yāminyāḥ paścime yāme tailābhyaṁgo viśiṣyate
इसी प्रकार आश्विन की कृष्ण चतुर्दशी को, सूर्योदय के समय, हे देवगण, रात्रि के अंतिम प्रहर में तेल-मालिश विशेष रूप से प्रशंसनीय है।
श्लोक 29 (skanda.2.106.29)
यदा चतुर्दशी न स्याद्द्विदिने चेद्विधूदये । दिनद्वये भवेच्चाऽपि तदा पूर्वैव गृह्यते
yadā caturdaśī na syāddvidine cedvidhūdaye dinadvaye bhaveccā'pi tadā pūrvaiva gṛhyate
जब चतुर्दशी सूर्योदय पर न हो, अथवा दो दिनों में फैली हो, अथवा दोनों दिनों में हो, तब पहला दिन ही ग्राह्य होता है।
श्लोक 30 (skanda.2.106.30)
बलात्काराद्धठाद्वाऽपि शिष्टत्वान्न करोति चेत् । तैलाभ्यंगं चतुर्दश्यां रौरवं नरकं व्रजेत्
balātkārāddhaṭhādvā'pi śiṣṭatvānna karoti cet tailābhyaṁgaṁ caturdaśyāṁ rauravaṁ narakaṁ vrajet
यदि कोई विवशता से, हठ से, अथवा अपने को शिष्ट मानकर चतुर्दशी को तेल-मालिश नहीं करता, तो वह रौरव नरक को जाता है।
श्लोक 31 (skanda.2.106.31)
तैले लक्ष्मीर्जले गंगा दीपावल्याश्चतुर्दशीम् । प्रातःस्नानं हि यः कुर्याद्यमलोकं न पश्यति
taile lakṣmīrjale gaṁgā dīpāvalyāścaturdaśīm prātaḥsnānaṁ hi yaḥ kuryādyamalokaṁ na paśyati
तेल में लक्ष्मी और जल में गंगा निवास करती हैं; जो दीपोत्सव की चतुर्दशी को प्रातःस्नान करता है, वह यमलोक नहीं देखता।
श्लोक 32 (skanda.2.106.32)
अपामार्गमथो तुंबीं प्रपुन्नाडमथाऽपरम् । भ्रामयेत्स्नानमध्ये तु नरकस्य क्षयाय वै
apāmārgamatho tuṁbīṁ prapunnāḍamathā'param bhrāmayetsnānamadhye tu narakasya kṣayāya vai
अपामार्ग, तुम्बी तथा प्रपुन्नाड को स्नान के बीच शरीर पर घुमाना चाहिए, जिससे नरक का नाश हो।
श्लोक 33 (skanda.2.106.33)
वारत्रयं त्रिवारं च पठित्वा मन्त्रमुत्तमम् । सीतालोष्टसमायुक्त सकंटकदलान्वित । हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणः पुनः पुनः । अपामार्गं प्रपुन्नाडं भ्रामयेच्छिरसोपरि
vāratrayaṁ trivāraṁ ca paṭhitvā mantramuttamam sītāloṣṭasamāyukta sakaṁṭakadalānvita hara pāpamapāmārga bhrāmyamāṇaḥ punaḥ punaḥ apāmārgaṁ prapunnāḍaṁ bhrāmayecchirasopari
इस उत्तम मंत्र को तीन-तीन बार पढ़कर — "हे अपामार्ग, सफेद मिट्टी के ढेले सहित, काँटेदार पत्तों वाले, बार-बार घुमाए जाते हुए, मेरे पाप का हरण करो" — अपामार्ग और प्रपुन्नाड को सिर के ऊपर घुमाना चाहिए।
श्लोक 34 (skanda.2.106.34)
स्नात्वार्द्रवाससा दद्याद्दीपकं मृत्युपुत्रयोः । शुनकौ श्यामशबलौ भ्रातरौ यमसेवकौ । तुष्टौ स्यातां चतुर्दश्यां दीपदानेन मृत्युजौ
snātvārdravāsasā dadyāddīpakaṁ mṛtyuputrayoḥ śunakau śyāmaśabalau bhrātarau yamasevakau tuṣṭau syātāṁ caturdaśyāṁ dīpadānena mṛtyujau
स्नान करके, गीले वस्त्र में, मृत्यु के दोनों पुत्रों को दीप देना चाहिए — श्याम और शबल नामक दो कुत्ते, दोनों भाई, यमराज के सेवक, जो चतुर्दशी को दीपदान से संतुष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 35 (skanda.2.106.35)
इष्टवंधुजनैः सार्द्धमेतत्स्नानं समाचरेत् । स्नानांगतर्पणं कृत्वा यमं संतर्पयेत्ततः
iṣṭavaṁdhujanaiḥ sārddhametatsnānaṁ samācaret snānāṁgatarpaṇaṁ kṛtvā yamaṁ saṁtarpayettataḥ
यह स्नान प्रिय बंधुजनों के साथ करना चाहिए। स्नान के अंग-रूप तर्पण करके, तत्पश्चात् यम को तर्पण देना चाहिए,
श्लोक 36 (skanda.2.106.36)
यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चाऽन्तकाय च । वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च
yamāya dharmarājāya mṛtyave cā'ntakāya ca vaivasvatāya kālāya sarvabhūtakṣayāya ca
"यम को, धर्मराज को, मृत्यु को, अंतक को, वैवस्वत को, काल को तथा सर्वभूतक्षय को,
श्लोक 37 (skanda.2.106.37)
औदुंबराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने । वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय ते नमः
auduṁbarāya dadhnāya nīlāya parameṣṭhine vṛkodarāya citrāya citraguptāya te namaḥ
औदुम्बर को, दध्न को, नील को, परमेष्ठी को, वृकोदर को, चित्र को तथा चित्रगुप्त को — आपको नमस्कार है।"
श्लोक 38 (skanda.2.106.38)
चतुर्दशैते मन्त्राः स्युः प्रत्येकं च नमोऽन्विताः । एकैकेन तिलैर्मिश्रान्दद्यात्त्रीनुदकाञ्जलीन्
caturdaśaite mantrāḥ syuḥ pratyekaṁ ca namo'nvitāḥ ekaikena tilairmiśrāndadyāttrīnudakāñjalīn
ये चौदह मंत्र प्रत्येक "नमः" शब्द के साथ जोड़ने चाहिए; प्रत्येक के साथ तिल मिला हुआ जल की तीन-तीन अंजलि अर्पित करनी चाहिए।
श्लोक 39 (skanda.2.106.39)
यज्ञोपवीतिना कार्यं प्राचीनावीतिनाऽथवा । देवत्वं च पितृत्वं च यमस्याऽस्ति द्विरूपता
yajñopavītinā kāryaṁ prācīnāvītinā'thavā devatvaṁ ca pitṛtvaṁ ca yamasyā'sti dvirūpatā
यह यज्ञोपवीत को सामान्य विधि से अथवा उलटे ढंग से धारण करके करना चाहिए; यम में देवत्व और पितृत्व — दोनों रूप विद्यमान हैं।
श्लोक 40 (skanda.2.106.40)
जीवत्पिताऽपि कुर्वीत तर्पणं यमभीष्मयोः । नरकाय प्रदातव्यो दीपः संपूज्य देवताः
jīvatpitā'pi kurvīta tarpaṇaṁ yamabhīṣmayoḥ narakāya pradātavyo dīpaḥ saṁpūjya devatāḥ
जिसका पिता जीवित हो, उसे भी यम और भीष्म का तर्पण करना चाहिए। देवताओं की पूजा करके नरक-निवारण के लिए दीप अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 41 (skanda.2.106.41)
अत्रैव लक्ष्मीकामस्य विधिः स्नाने मयोच्यते । इषे भूते च दर्शे च कार्तिके प्रथमे दिने
atraiva lakṣmīkāmasya vidhiḥ snāne mayocyate iṣe bhūte ca darśe ca kārtike prathame dine
यहीं मैं लक्ष्मी की इच्छा रखने वाले के लिए स्नान की विधि बताता हूँ। आश्विन की पूर्णिमा, चतुर्दशी तथा अमावस्या को, कार्तिक के पहले दिन,
श्लोक 42 (skanda.2.106.42)
यदा स्नाति तदाऽभ्यंगस्नानं कुर्याद्विधूदये। ऊर्ज्जशुक्लद्वितीयायां तिथौ च स्वातियुग्मगे
yadā snāti tadā'bhyaṁgasnānaṁ kuryādvidhūdaye ūrjjaśukladvitīyāyāṁ tithau ca svātiyugmage
जब भी स्नान करे, चंद्रोदय के समय तेल-मालिश युक्त स्नान करना चाहिए। कार्तिक की शुक्ल द्वितीया को, दोनों बार स्वाति नक्षत्र से युक्त तिथि पर,
श्लोक 43 (skanda.2.106.43)
मानवो मंगलस्नायी नैव लक्ष्म्या वियुज्यते । दीपैर्नीराजनादत्र सैषा दीपावलिः स्मृता
mānavo maṁgalasnāyī naiva lakṣmyā viyujyate dīpairnīrājanādatra saiṣā dīpāvaliḥ smṛtā
मंगल-स्नान करने वाला मनुष्य कभी भी लक्ष्मी से वियुक्त नहीं होता। दीपों की इस आरती से ही इसे दीपावली माना गया है।
श्लोक 44 (skanda.2.106.44)
इंदुक्षयेऽपि संक्रातौ रवौ पाते दिनक्षये । अत्राऽभ्यंगो न दोषाय प्रातः पापाऽपनुत्तये
iṁdukṣaye'pi saṁkrātau ravau pāte dinakṣaye atrā'bhyaṁgo na doṣāya prātaḥ pāpā'panuttaye
चंद्र-क्षय हो, संक्रांति हो, अथवा सूर्योदय के समय तिथि समाप्त हो रही हो, तब भी तेल-मालिश में दोष नहीं है; प्रातःकाल यह पाप-निवारण करता है।
श्लोक 45 (skanda.2.106.45)
माषपत्रस्य शाकं वै भुक्त्वा तस्मिन्दिने नरः । प्रेताख्यायां चतुर्दश्यां सर्वपापैः प्रमुच्यते
māṣapatrasya śākaṁ vai bhuktvā tasmindine naraḥ pretākhyāyāṁ caturdaśyāṁ sarvapāpaiḥ pramucyate
उस दिन उड़द के पत्तों का शाक खाकर मनुष्य प्रेत-चतुर्दशी को सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 46 (skanda.2.106.46)
इषासितचतुर्दश्यामिन्दुक्षयतिथावपि । दर्शादौ स्वातिसंयुक्ते तदा दीपावलिर्भवेत्
iṣāsitacaturdaśyāmindukṣayatithāvapi darśādau svātisaṁyukte tadā dīpāvalirbhavet
आश्विन की कृष्ण चतुर्दशी को, चंद्र-क्षय की तिथि में भी, अमावस्या के आरंभ में स्वाति से युक्त होने पर, दीपावली होती है।
श्लोक 47 (skanda.2.106.47)
कुर्यात्संलग्नमेतच्च दीपोत्सवदिनत्रयम् । महाराजो बलिः प्रोक्तस्तुष्टेन हरिणा तथा
kuryātsaṁlagnametacca dīpotsavadinatrayam mahārājo baliḥ proktastuṣṭena hariṇā tathā
इन तीन लगातार दीपोत्सव के दिनों को मनाना चाहिए। कहा जाता है कि प्रसन्न हुए भगवान् हरि ने महाराज बलि से,
श्लोक 48 (skanda.2.106.48)
वरं याचस्व भद्रं ते यद्यन्मनसि वर्तते । इति विष्णुवचः श्रुत्वा बलिर्वचनमब्रवीत्
varaṁ yācasva bhadraṁ te yadyanmanasi vartate iti viṣṇuvacaḥ śrutvā balirvacanamabravīt
"तुम्हारे मन में जो हो, वह वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो।" विष्णु के इन वचनों को सुनकर बलि ने कहा —
श्लोक 49 (skanda.2.106.49)
आत्मार्थं किं याचनीयं सर्वं दत्तं मया तथा । लोकार्थं याचयिष्यामि शक्तश्चेद्देहि तच्च मे
ātmārthaṁ kiṁ yācanīyaṁ sarvaṁ dattaṁ mayā tathā lokārthaṁ yācayiṣyāmi śaktaśceddehi tacca me
"अपने लिए क्या माँगूँ? सब कुछ तो मैंने पहले ही दे दिया है। मैं लोक-कल्याण के लिए माँगूँगा; यदि आप समर्थ हों, तो वह मुझे दीजिए।
श्लोक 50 (skanda.2.106.50)
मयाऽद्य ते धरा दत्ता वामनच्छद्मरूपिणे । त्रिभिः पदैस्त्रिदिवसैः सा चाऽऽक्रांता यतस्त्वया
mayā'dya te dharā dattā vāmanacchadmarūpiṇe tribhiḥ padaistridivasaiḥ sā cā''krāṁtā yatastvayā
आज मैंने आपको, वामन का वेष धारण करने वाले को, यह पृथ्वी दी; और आपने उसे तीन पगों में तीनों लोकों में नाप लिया,
श्लोक 51 (skanda.2.106.51)
तस्माद्भूमितले राज्यमस्तु घस्रत्रये हरे । मद्राज्ये ये दीपदानं भुवि कुर्वंति मानवाः । तेषां गृहे तव स्त्रीयं सदा तिष्ठतु सुस्थिरा
tasmādbhūmitale rājyamastu ghasratraye hare madrājye ye dīpadānaṁ bhuvi kurvaṁti mānavāḥ teṣāṁ gṛhe tava strīyaṁ sadā tiṣṭhatu susthirā
इसलिए, हे हरि, तीन दिनों के लिए इस पृथ्वी पर मेरा राज्य रहे। मेरे राज्य में जो मनुष्य इस पृथ्वी पर दीपदान करें, उनके घर में आपकी वह पत्नी (लक्ष्मी) सदा स्थिरतापूर्वक निवास करें।
श्लोक 52 (skanda.2.106.52)
मम राज्ये गृहे यैषामंधकारः पतिष्यति । लक्ष्मीसंतानांधकारः सदा पततु तद्गृहे
mama rājye gṛhe yaiṣāmaṁdhakāraḥ patiṣyati lakṣmīsaṁtānāṁdhakāraḥ sadā patatu tadgṛhe
मेरे राज्य में जिस घर में अंधकार पड़ेगा, उस घर में सदा लक्ष्मी और संतान का अंधकार (अभाव) पड़े।"
श्लोक 53 (skanda.2.106.53)
चतुर्दश्यां च ये दीपान्नरकाय ददंति च । तेषां पितृगणाः सर्वे नरके न वसंति च
caturdaśyāṁ ca ye dīpānnarakāya dadaṁti ca teṣāṁ pitṛgaṇāḥ sarve narake na vasaṁti ca
जो चतुर्दशी को नरक-निवारण के लिए दीप देते हैं, उनके सम्पूर्ण पितृगण नरक में नहीं रहते।
श्लोक 54 (skanda.2.106.54)
बलिराज्यं समासाद्य यैर्न दीपावलिः कृता । तेषां गृहे कथं दीपाः प्रज्वलिष्यंति केशव
balirājyaṁ samāsādya yairna dīpāvaliḥ kṛtā teṣāṁ gṛhe kathaṁ dīpāḥ prajvaliṣyaṁti keśava
हे केशव, बलि के राज्य में भी जिन्होंने दीपावली नहीं मनाई, उनके घर में दीप (सुख) भला कैसे प्रज्वलित होंगे?
श्लोक 55 (skanda.2.106.55)
बलिराज्ये तु ये लोकाः शोकाऽनुत्साहकारिणः । तेषां गृहे सदा शोकः पतेदिति न संशयः
balirājye tu ye lokāḥ śokā'nutsāhakāriṇaḥ teṣāṁ gṛhe sadā śokaḥ patediti na saṁśayaḥ
बलि के राज्य में जो लोग शोक और उत्साहहीनता से रहते हैं, उनके घर में सदा शोक पड़ेगा, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 56 (skanda.2.106.56)
चतुर्दशीत्रये राज्यं बलेरस्त्विति याचयेत् । पुरा वामनरूपेण प्रार्थयित्वा धरामिमाम् । ददावतिथयेंद्राय बलिं पातालवासिनम्
caturdaśītraye rājyaṁ balerastviti yācayet purā vāmanarūpeṇa prārthayitvā dharāmimām dadāvatithayeṁdrāya baliṁ pātālavāsinam
बलि ने माँगा कि इन तीन चतुर्दशी-दिनों के लिए राज्य उसका ही हो। पूर्वकाल में वामन-रूप धारण करके इस पृथ्वी की याचना करके, अतिथि के रूप में इंद्र को, पाताल-निवासी बलि को दे दिया।
श्लोक 57 (skanda.2.106.57)
दत्तं दैत्यपतेरित्थं हरिणा तद्दिनत्रयम् । तस्मान्महोत्सवं चात्र सर्वथैव हि कारयेत्
dattaṁ daityapateritthaṁ hariṇā taddinatrayam tasmānmahotsavaṁ cātra sarvathaiva hi kārayet
इस प्रकार दैत्यराज को हरि ने वे तीन दिन दे दिए; इसलिए इस अवसर पर सर्वथा महोत्सव मनाना चाहिए।
श्लोक 58 (skanda.2.106.58)
महारात्रिः समुत्पन्ना चतुर्दश्यां मुनीश्वराः । अतस्तदुत्सवः कार्यः शक्तिपूजापरायणैः
mahārātriḥ samutpannā caturdaśyāṁ munīśvarāḥ atastadutsavaḥ kāryaḥ śaktipūjāparāyaṇaiḥ
हे मुनीश्वरो, चतुर्दशी को महारात्रि उत्पन्न हुई थी; इसलिए शक्ति-पूजा में तत्पर लोगों को उसका उत्सव मनाना चाहिए।
श्लोक 59 (skanda.2.106.59)
बलिराज्यं समासाद्य यक्षगंधर्वकिन्नराः । औषध्यश्च पिशाचाश्च मंत्राश्च मणयस्तथा
balirājyaṁ samāsādya yakṣagaṁdharvakinnarāḥ auṣadhyaśca piśācāśca maṁtrāśca maṇayastathā
बलि के राज्य में यक्ष, गंधर्व, किन्नर, औषधियाँ, पिशाच, मंत्र तथा मणियाँ,
श्लोक 60 (skanda.2.106.60)
सर्व एव प्रहृष्यंति नृत्यंति च निशामुखे । तत्तन्मंत्राश्च सिद्ध्यंति बलिराज्ये न संशयः
sarva eva prahṛṣyaṁti nṛtyaṁti ca niśāmukhe tattanmaṁtrāśca siddhyaṁti balirājye na saṁśayaḥ
सभी हर्षित होकर रात्रि के आरंभ में नृत्य करते हैं; बलि के राज्य में सभी मंत्र सिद्ध हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 61 (skanda.2.106.61)
बलिराज्यं समासाद्य यथा लोकाः सुहर्षिताः । तथा तद्दिनमध्ये तु लोकाः स्युर्हर्षिता भृशम्
balirājyaṁ samāsādya yathā lokāḥ suharṣitāḥ tathā taddinamadhye tu lokāḥ syurharṣitā bhṛśam
जिस प्रकार बलि के राज्य में लोग अत्यंत हर्षित होते थे, उसी प्रकार उन दिनों में लोगों को अत्यंत हर्षित रहना चाहिए।
श्लोक 62 (skanda.2.106.62)
तुलासंस्थे सहस्रांशौ प्रदोषे भूतदर्शयोः । उल्काहस्ता नराः कुर्युः पितॄणां मार्गदर्शनम्
tulāsaṁsthe sahasrāṁśau pradoṣe bhūtadarśayoḥ ulkāhastā narāḥ kuryuḥ pitṝṇāṁ mārgadarśanam
सूर्य के तुला राशि में रहते हुए, संध्या के समय, भूत (चतुर्दशी) और दर्श (अमावस्या) को, हाथ में मशाल लेकर पितरों को मार्ग दिखाना चाहिए।
श्लोक 63 (skanda.2.106.63)
नरकस्थास्तु ये प्रेतास्ते मार्गं तु व्रतात्सदा । पश्यंत्येव न संदेहः कार्योऽत्र मुनिपुंगवैः
narakasthāstu ye pretāste mārgaṁ tu vratātsadā paśyaṁtyeva na saṁdehaḥ kāryo'tra munipuṁgavaiḥ
नरक में स्थित जो प्रेत हैं, वे इस व्रत से सदा अपना मार्ग देखते ही हैं, इसमें कोई संदेह नहीं; यह श्रेष्ठ मुनियों को अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 64 (skanda.2.106.64)
आश्विने मासि भूतादितिथयः कीर्तितास्त्रयः । दीपदानादिकार्येषु ग्राह्या मध्याह्नकालिकाः
āśvine māsi bhūtāditithayaḥ kīrtitāstrayaḥ dīpadānādikāryeṣu grāhyā madhyāhnakālikāḥ
आश्विन मास में चतुर्दशी आदि तीन तिथियाँ कही गई हैं; दीपदान आदि कार्यों में उन्हें मध्याह्न-कालिक (दोपहर में प्रचलित तिथि के अनुसार) ग्रहण करना चाहिए।
श्लोक 65 (skanda.2.106.65)
यदि स्युः संगवादर्वागेताश्च तिथयस्त्रयः । दीपदानादिकार्येषु कर्तव्याः पूर्वसंयुताः
yadi syuḥ saṁgavādarvāgetāśca tithayastrayaḥ dīpadānādikāryeṣu kartavyāḥ pūrvasaṁyutāḥ
यदि ये तीनों तिथियाँ सुबह के पूर्वार्ध से पहले ही समाप्त हो जाएँ, तो दीपदान आदि कार्यों में पिछले दिन से युक्त तिथि लेनी चाहिए।
श्लोक 66 (skanda.2.106.66)
ऋषय ऊचुः । कौमोदिन्यास्तु माहात्म्यं प्रष्टुमिच्छामहे द्विजाः । तस्मिन्दिने तु किं भोज्यं कस्य पूजां तु कारयेत्
ṛṣaya ūcuḥ kaumodinyāstu māhātmyaṁ praṣṭumicchāmahe dvijāḥ tasmindine tu kiṁ bhojyaṁ kasya pūjāṁ tu kārayet
ऋषियों ने कहा — हे द्विजो, हम कौमुदी (दीपावली-रात्रि) का माहात्म्य पूछना चाहते हैं; उस दिन क्या भोजन करना चाहिए तथा किसकी पूजा करनी चाहिए?
श्लोक 67 (skanda.2.106.67)
किमर्थं क्रियते सा तु तस्याः का देवता भवेत् । किं च तत्र भवेद्देयं किं न देयं विशेषतः
kimarthaṁ kriyate sā tu tasyāḥ kā devatā bhavet kiṁ ca tatra bhaveddeyaṁ kiṁ na deyaṁ viśeṣataḥ
वह किसलिए मनाई जाती है, और उसकी देवता कौन हैं? वहाँ क्या देना चाहिए, और विशेष रूप से क्या नहीं देना चाहिए?
श्लोक 68 (skanda.2.106.68)
प्रहर्षः कोऽत्र निर्दिष्टः क्रीडा काऽत्र प्रकीर्तिता । दीपावल्याः फलं सर्वं वदन्तु ऋषिसत्तमाः
praharṣaḥ ko'tra nirdiṣṭaḥ krīḍā kā'tra prakīrtitā dīpāvalyāḥ phalaṁ sarvaṁ vadantu ṛṣisattamāḥ
यहाँ किस हर्ष का विधान है, और कौन-सी क्रीड़ा प्रसिद्ध है? हे ऋषिसत्तमो, दीपावली का सम्पूर्ण फल बताइए।
श्लोक 69 (skanda.2.106.69)
वालखिल्या ऊचुः । ततः प्रभात समये त्वमायां तु मुनीश्वराः । स्नात्वा देवान्पितॄन्भक्त्या संपूज्याऽथ प्रणम्य च
vālakhilyā ūcuḥ tataḥ prabhāta samaye tvamāyāṁ tu munīśvarāḥ snātvā devānpitṝnbhaktyā saṁpūjyā'tha praṇamya ca
वालखिल्यों ने कहा — हे मुनीश्वरो, तत्पश्चात् अमावस्या के प्रातःकाल में, स्नान करके, भक्तिपूर्वक देवताओं और पितरों का पूजन तथा प्रणाम करके,
श्लोक 70 (skanda.2.106.70)
कृत्वा तु पार्वणश्राद्धं दधिक्षीरघृतादिभिः । दिवा तत्र न भोक्तव्यमृते बालातुराज्जनात्
kṛtvā tu pārvaṇaśrāddhaṁ dadhikṣīraghṛtādibhiḥ divā tatra na bhoktavyamṛte bālāturājjanāt
दही, दूध, घी आदि से पार्वण-श्राद्ध करके, दिन में बालकों और रोगियों को छोड़कर किसी को भोजन नहीं करना चाहिए।
श्लोक 71 (skanda.2.106.71)
ततः प्रदोषसमये पूजयेदिंदिरां शुभाम् । कुर्यान्नानाविधैर्वस्त्रैः स्वच्छं लक्ष्म्याश्च मण्डपम्
tataḥ pradoṣasamaye pūjayediṁdirāṁ śubhām kuryānnānāvidhairvastraiḥ svacchaṁ lakṣmyāśca maṇḍapam
फिर संध्या के समय शुभ इंदिरा (लक्ष्मी) की पूजा करनी चाहिए। विभिन्न वस्त्रों से लक्ष्मी के लिए एक स्वच्छ मंडप बनाना चाहिए,
श्लोक 72 (skanda.2.106.72)
नानापुष्पैः पल्लवैश्च चित्रैश्चाऽपि विचित्रितम् । तत्र संपूजयेल्लक्ष्मीं देवांश्चाऽपि प्रपूजयेत्
nānāpuṣpaiḥ pallavaiśca citraiścā'pi vicitritam tatra saṁpūjayellakṣmīṁ devāṁścā'pi prapūjayet
विभिन्न फूलों, कोंपलों तथा चित्रों से सुसज्जित। वहाँ लक्ष्मी की तथा देवताओं की भी भलीभाँति पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 73 (skanda.2.106.73)
संपूज्या देवनार्योऽपि वहुभिश्चोपचारकैः । पादसंवाहनं कुर्याल्लक्ष्म्यादीनां तु भक्तितः
saṁpūjyā devanāryo'pi vahubhiścopacārakaiḥ pādasaṁvāhanaṁ kuryāllakṣmyādīnāṁ tu bhaktitaḥ
देव-स्त्रियों की भी अनेक उपचारों से पूजा करनी चाहिए; भक्तिपूर्वक लक्ष्मी आदि के चरण दबाने चाहिए।
श्लोक 74 (skanda.2.106.74)
अस्मिन्नहनि सर्वेऽपि विष्णुना मोचिताः पुरा । बलिकारागृहाद्देवा लक्ष्मीश्चाऽपि विमोचिता
asminnahani sarve'pi viṣṇunā mocitāḥ purā balikārāgṛhāddevā lakṣmīścā'pi vimocitā
इसी दिन पूर्वकाल में विष्णु ने सभी देवताओं को बलि की कारागार से मुक्त किया था, तथा लक्ष्मी को भी मुक्त किया था।
श्लोक 75 (skanda.2.106.75)
लक्ष्म्या सार्द्धं ततो देवा जग्मुः क्षीरोदधौ पुनः । प्रसुप्ता बहुकालं ते सुखं तस्मान्मुनीश्वराः
lakṣmyā sārddhaṁ tato devā jagmuḥ kṣīrodadhau punaḥ prasuptā bahukālaṁ te sukhaṁ tasmānmunīśvarāḥ
तत्पश्चात् लक्ष्मी सहित देवता पुनः क्षीरसागर को गए; हे मुनीश्वरो, वे वहाँ दीर्घकाल तक सुखपूर्वक सो गए।
श्लोक 76 (skanda.2.106.76)
रचनीयाः सूत्रगर्भाः पर्यंकाश्च सुतूलिकाः । दुग्धफेनोपमैर्वस्त्रैरास्तृताश्च यथादिशम्
racanīyāḥ sūtragarbhāḥ paryaṁkāśca sutūlikāḥ dugdhaphenopamairvastrairāstṛtāśca yathādiśam
इसलिए डोरी से बुनी हुई शय्याएँ और मुलायम गद्दे बनाने चाहिए, दिशानुसार दूध के झाग जैसे वस्त्रों से बिछाए हुए,
श्लोक 77 (skanda.2.106.77)
स्थापयेत्तान्सुराँल्लक्ष्मीं वेदघोषसमन्वितः । लक्ष्मीर्दैत्यभयान्मुक्ता सुखं सुप्तांबुजोदरे
sthāpayettānsurām̐llakṣmīṁ vedaghoṣasamanvitaḥ lakṣmīrdaityabhayānmuktā sukhaṁ suptāṁbujodare
और वहाँ वेद-घोष के साथ देवताओं और लक्ष्मी को स्थापित करना चाहिए; क्योंकि लक्ष्मी दैत्यों के भय से मुक्त होकर कमल के भीतर सुखपूर्वक सोती हैं।
श्लोक 78 (skanda.2.106.78)
अतोऽत्र विधिवत्कार्या तुष्ट्यै तु सुखसुप्तिका । तदह्नि पद्मशय्यां यः पद्मासौख्यविवृद्धये
ato'tra vidhivatkāryā tuṣṭyai tu sukhasuptikā tadahni padmaśayyāṁ yaḥ padmāsaukhyavivṛddhaye
इसलिए इस दिन लक्ष्मी की संतुष्टि के लिए विधिपूर्वक "सुख-शय्या" का विधान करना चाहिए। जो उस दिन कमल-शय्या को कमला (लक्ष्मी) के सुख की वृद्धि के लिए,
श्लोक 79 (skanda.2.106.79)
कुर्यात्तस्य गृहं मुक्त्वा तत्पद्मा क्वाऽपि न व्रजेत् । न कुर्वंति नरा इत्थं लक्ष्म्या ये सुखसुप्तिकाम्
kuryāttasya gṛhaṁ muktvā tatpadmā kvā'pi na vrajet na kurvaṁti narā itthaṁ lakṣmyā ye sukhasuptikām
तैयार करता है, उसका घर छोड़कर वह कमला कहीं और नहीं जातीं। जो मनुष्य इस प्रकार लक्ष्मी के लिए सुख-शय्या नहीं करते,
श्लोक 80 (skanda.2.106.80)
धनचिन्ता विहीनास्ते कथं रात्रौ स्वपंति हि । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन लक्ष्मीं संपूजयेन्नरः
dhanacintā vihīnāste kathaṁ rātrau svapaṁti hi tasmātsarvaprayatnena lakṣmīṁ saṁpūjayennaraḥ
वे धन की चिंता से रहित होकर रात्रि में भला कैसे सोते हैं? इसलिए मनुष्य को सम्पूर्ण प्रयत्न से लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए;
श्लोक 81 (skanda.2.106.81)
स तु दारिद्र्यनिर्मुक्तः स्वजातौ स्यात्प्रतिष्ठितः । जातिपत्रलंवगैलात्वक्कर्पूरसमन्वितम्
sa tu dāridryanirmuktaḥ svajātau syātpratiṣṭhitaḥ jātipatralaṁvagailātvakkarpūrasamanvitam
वह दरिद्रता से मुक्त होकर अपनी जाति में प्रतिष्ठित होता है। जायफल, लौंग, इलायची, दालचीनी तथा कर्पूर सहित,
श्लोक 82 (skanda.2.106.82)
पाचयित्वा गव्यदुग्धं सितां दत्त्वा यथोचिताम् । लड्डुकांस्तस्य कुर्वीत तांश्च लक्ष्म्यै समर्पयेत्
pācayitvā gavyadugdhaṁ sitāṁ dattvā yathocitām laḍḍukāṁstasya kurvīta tāṁśca lakṣmyai samarpayet
गाय के दूध को पकाकर, उचित मात्रा में शक्कर मिलाकर, उससे लड्डू बनाने चाहिए तथा उन्हें लक्ष्मी को अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 83 (skanda.2.106.83)
अन्यच्चतुर्विधं भक्ष्यं दद्याच्छ्रीः प्रीयतामिति । अप्रबुद्धे हरौ पूर्वं स्त्रीभिर्लक्ष्मीं प्रबोधयेत्
anyaccaturvidhaṁ bhakṣyaṁ dadyācchrīḥ prīyatāmiti aprabuddhe harau pūrvaṁ strībhirlakṣmīṁ prabodhayet
चार प्रकार के अन्य भक्ष्य पदार्थ भी अर्पित करने चाहिए — "श्री प्रसन्न हों" ऐसा कहते हुए। हरि के जागने से पहले स्त्रियों को लक्ष्मी को जगाना चाहिए।
श्लोक 84 (skanda.2.106.84)
प्रबोधसमये लक्ष्मीं बोधयित्वा भुनक्ति या । पुमान्वा वत्सरं यावल्लक्ष्मीस्तं नैव मुञ्चति
prabodhasamaye lakṣmīṁ bodhayitvā bhunakti yā pumānvā vatsaraṁ yāvallakṣmīstaṁ naiva muñcati
जो स्त्री या पुरुष जागरण के समय लक्ष्मी को जगाकर उस प्रसाद को खाता है, उसे लक्ष्मी पूरे एक वर्ष तक कभी नहीं छोड़तीं।
श्लोक 85 (skanda.2.106.85)
अभयं प्राप्य विप्रेभ्यो विष्णुभीताः सुरद्विषः । क्षीराब्धौ तुष्टुवुर्ज्ञात्वा सुप्तां पद्माश्रितां श्रियम्
abhayaṁ prāpya viprebhyo viṣṇubhītāḥ suradviṣaḥ kṣīrābdhau tuṣṭuvurjñātvā suptāṁ padmāśritāṁ śriyam
ब्राह्मणों से अभयदान पाकर, विष्णु से भयभीत देवताओं के शत्रुओं ने क्षीरसागर में कमल-आश्रित सोई हुई लक्ष्मी को जानकर उनकी स्तुति की —
श्लोक 86 (skanda.2.106.86)
त्वं ज्योतिः श्रीरवीन्द्वग्निविद्युत्सौवर्णतारकाः । सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपज्योतिःस्थिते नमः
tvaṁ jyotiḥ śrīravīndvagnividyutsauvarṇatārakāḥ sarveṣāṁ jyotiṣāṁ jyotirdīpajyotiḥsthite namaḥ
"आप ही ज्योति हैं — सूर्य, चंद्र, अग्नि, बिजली तथा स्वर्णिम तारे; आप सम्पूर्ण ज्योतियों की ज्योति हैं; दीप-ज्योति में स्थित आपको नमस्कार है।"
श्लोक 87 (skanda.2.106.87)
या लक्ष्मीर्दिवसे पुण्ये दीपावल्यां च भूतले । गवां गोष्ठे तु कार्तिक्यां सा लक्ष्मीर्वरदा मम
yā lakṣmīrdivase puṇye dīpāvalyāṁ ca bhūtale gavāṁ goṣṭhe tu kārtikyāṁ sā lakṣmīrvaradā mama
"जो लक्ष्मी इस पुण्य दिन दीपावली को इस पृथ्वी पर, तथा कार्तिक में गौशाला में विराजमान हैं, वही लक्ष्मी मुझे वरदान दें।"
श्लोक 88 (skanda.2.106.88)
दीपदानं ततः कुर्यात्प्रदोषे च तथोल्मुकम् । भ्रामयेत्स्वस्य शिरसि सर्वाऽरिष्टनिवारणम्
dīpadānaṁ tataḥ kuryātpradoṣe ca tatholmukam bhrāmayetsvasya śirasi sarvā'riṣṭanivāraṇam
तत्पश्चात् संध्या के समय दीपदान करना चाहिए, तथा सभी विपत्तियों के निवारण के लिए मशाल को अपने सिर पर घुमाना चाहिए।
श्लोक 89 (skanda.2.106.89)
दीपवृक्षास्तथा कार्याः शक्त्या देवगृहादिषु । चतुष्पथे श्मशाने च नदीपर्वतवेश्मसु
dīpavṛkṣāstathā kāryāḥ śaktyā devagṛhādiṣu catuṣpathe śmaśāne ca nadīparvataveśmasu
मंदिर आदि स्थानों में, अपनी सामर्थ्य के अनुसार दीप-वृक्ष भी बनाने चाहिए — चौराहों पर, श्मशान में, तथा नदी-पर्वत के घरों में भी,
श्लोक 90 (skanda.2.106.90)
वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु चत्वरेषु गृहेषु च । वस्त्रैः पुष्पैः शोभितव्या राजमार्गस्य भूमयः
vṛkṣamūleṣu goṣṭheṣu catvareṣu gṛheṣu ca vastraiḥ puṣpaiḥ śobhitavyā rājamārgasya bhūmayaḥ
वृक्षों की जड़ों में, गौशालाओं में, चौकों में तथा घरों में भी। राजमार्ग की भूमि को वस्त्रों और फूलों से सजाना चाहिए।
श्लोक 91 (skanda.2.106.91)
सर्वं पुरमलंकृत्य प्रदोषे तदनन्तरम् । ब्राह्मणान्भोजयित्वाऽऽदौ संभोज्य च बुभुक्षितान्
sarvaṁ puramalaṁkṛtya pradoṣe tadanantaram brāhmaṇānbhojayitvā''dau saṁbhojya ca bubhukṣitān
सम्पूर्ण नगर को सजाकर, फिर संध्या के समय, पहले ब्राह्मणों को भोजन कराकर तथा भूखों को भोजन कराकर,
श्लोक 92 (skanda.2.106.92)
अलंकृतेन भोक्तव्यं नववस्त्रोपशोभिना । ततोऽपराह्नसमये घोषयेन्नगरं नृपः
alaṁkṛtena bhoktavyaṁ navavastropaśobhinā tato'parāhnasamaye ghoṣayennagaraṁ nṛpaḥ
सुसज्जित होकर, नए वस्त्रों से सुशोभित होकर भोजन करना चाहिए। तत्पश्चात् अपराह्न के समय राजा को नगर में घोषणा करानी चाहिए —
श्लोक 93 (skanda.2.106.93)
अद्य राज्यं बलेर्लोका यथेच्छं क्रीड्यतामिति । यथेच्छं क्रीडतां बाला इत्याज्ञाप्य नृपेण तु
adya rājyaṁ balerlokā yathecchaṁ krīḍyatāmiti yathecchaṁ krīḍatāṁ bālā ityājñāpya nṛpeṇa tu
"आज बलि का राज्य है, प्रजा इच्छानुसार क्रीड़ा करे।" बालकों को भी इच्छानुसार खेलने की आज्ञा देकर, राजा द्वारा
श्लोक 94 (skanda.2.106.94)
तेभ्यो दद्यात्क्रीडनकं ततः पश्येच्छुभाशुभ्य । बलिराज्ये प्रकर्तव्यं यद्यन्मनसि वर्तते
tebhyo dadyātkrīḍanakaṁ tataḥ paśyecchubhāśubhya balirājye prakartavyaṁ yadyanmanasi vartate
उन्हें खिलौने देने चाहिए; तत्पश्चात् शुभ-अशुभ लक्षण देखने चाहिए। बलि के राज्य में जो भी मन में हो, वह किया जा सकता है —
श्लोक 95 (skanda.2.106.95)
जीवहिंसा सुरापानमगम्यागमनं तथा । चौर्यं विश्वासघातश्च पंचैतानि मुनीश्वराः । बलिराज्ये तु नरकद्वाराण्युक्तानि संत्यजेत्
jīvahiṁsā surāpānamagamyāgamanaṁ tathā cauryaṁ viśvāsaghātaśca paṁcaitāni munīśvarāḥ balirājye tu narakadvārāṇyuktāni saṁtyajet
जीव-हिंसा, मदिरापान, अगम्यागमन, चोरी तथा विश्वासघात — हे मुनीश्वरो, बलि के राज्य में भी इन पाँच नरक के द्वारों को अवश्य त्यागना चाहिए।
श्लोक 96 (skanda.2.106.96)
ततोऽर्द्धरात्रसमये स्वयं राजा व्रजेत्पुरम् । अवलोकयितुं रम्यं पद्भ्यामेव शनैःशनैः । बलिराज्यप्रमोदं च दृष्ट्वा स्वगृहमाव्रजेत्
tato'rddharātrasamaye svayaṁ rājā vrajetpuram avalokayituṁ ramyaṁ padbhyāmeva śanaiḥśanaiḥ balirājyapramodaṁ ca dṛṣṭvā svagṛhamāvrajet
तत्पश्चात् आधी रात के समय राजा स्वयं धीरे-धीरे पैदल ही सुंदर नगर देखने के लिए निकले, और बलि के राज्य का आनंद देखकर अपने घर लौट आए।
श्लोक 97 (skanda.2.106.97)
एवं गते निशीथे च जने निद्रार्द्धलोचने । एवं नगरनारीभिः शूर्पडिंडिमवादनैः । निष्कास्यते प्रदृष्टाभिरलक्ष्मीः स्वगृहांऽगणात्
evaṁ gate niśīthe ca jane nidrārddhalocane evaṁ nagaranārībhiḥ śūrpaḍiṁḍimavādanaiḥ niṣkāsyate pradṛṣṭābhiralakṣmīḥ svagṛhāṁ'gaṇāt
इस प्रकार आधी रात बीत जाने पर, जब लोगों की आँखें नींद से आधी बंद हो जाती हैं, नगर की स्त्रियाँ सूप और डिंडिम बजाकर, दिखाई देते हुए, अलक्ष्मी को अपने-अपने घर के आँगन से बाहर निकाल देती हैं।
श्लोक 98 (skanda.2.106.98)
दंडैकरजनीयोगे दर्शः स्यात्तु परेऽहनि । तदा विहाय पूर्वेद्युः परेऽह्नि सुखरात्रिका
daṁḍaikarajanīyoge darśaḥ syāttu pare'hani tadā vihāya pūrvedyuḥ pare'hni sukharātrikā
यदि अमावस्या रात्रि के एक दंड योग तक ही रहकर अगले दिन दर्श हो, तो पिछला दिन छोड़कर अगले दिन ही सुख-रात्रि (लक्ष्मी-पूजा) मनानी चाहिए।
श्लोक 99 (skanda.2.106.99)
ये वैष्णवाऽवैष्णवाश्च बलिराज्योत्सवं नराः । न कुर्वंति वृथा तेषां धर्माः स्युर्नात्र संशयः
ye vaiṣṇavā'vaiṣṇavāśca balirājyotsavaṁ narāḥ na kurvaṁti vṛthā teṣāṁ dharmāḥ syurnātra saṁśayaḥ
जो वैष्णव अथवा अवैष्णव मनुष्य बलि के राज्य का यह उत्सव नहीं मनाते, उनके अन्य धर्म-कर्म व्यर्थ हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 100 (skanda.2.106.100)
रात्रौ जागरणं कुर्यात्पुराणपठनादिभिः । द्यूतेन वा हरेरग्रे गीतया वा तथैव च
rātrau jāgaraṇaṁ kuryātpurāṇapaṭhanādibhiḥ dyūtena vā hareragre gītayā vā tathaiva ca
रात्रि में पुराण-पाठ आदि से जागरण करना चाहिए, अथवा हरि के सामने द्यूत से, अथवा गीता-पाठ से भी इसी प्रकार जागरण करना चाहिए।