वैष्णव खण्ड · अध्याय 107
कार्तिकशुक्लप्रतिपन्माहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.2.107.1)
ब्रह्मोवाच । प्रतिपद्यथ चाऽभ्यंगं कृत्वा नीराजनं ततः । सुवेषः सत्कथागीतैर्दानैश्च दिवसं नयेत्
brahmovāca pratipadyatha cā'bhyaṁgaṁ kṛtvā nīrājanaṁ tataḥ suveṣaḥ satkathāgītairdānaiśca divasaṁ nayet
ब्रह्माजी ने कहा — प्रतिपदा को तेल-मालिश करके तत्पश्चात् आरती करके, सुसज्जित होकर, सत्कथा, गीत तथा दान से दिन बिताना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.2.107.2)
शंकरस्तु पुरा द्यूतं ससर्ज सुमनोहरम् । कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रथमेऽहनि सत्यवत्
śaṁkarastu purā dyūtaṁ sasarja sumanoharam kārtike śuklapakṣe tu prathame'hani satyavat
पूर्वकाल में शंकर ने सत्य ही कार्तिक के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि को एक अत्यंत मनोहर द्यूत-क्रीड़ा की रचना की थी।
श्लोक 3 (skanda.2.107.3)
बलिराज्यदिनस्याऽपि माहात्म्यं शृणु तत्त्वतः । स्नातव्यं तिलतैलेन नरैर्नारीभिरेव च
balirājyadinasyā'pi māhātmyaṁ śṛṇu tattvataḥ snātavyaṁ tilatailena narairnārībhireva ca
बलि-राज्य के इस दिन का माहात्म्य भी यथार्थ रूप से सुनो। इस दिन पुरुषों और स्त्रियों दोनों को तिल के तेल से स्नान करना चाहिए,
श्लोक 4 (skanda.2.107.4)
यदि मोहान्न कुर्वीत स याति यमसादनम् । पुरा कृतयुगस्यादौ दानवेंद्रो बलिर्महान्
yadi mohānna kurvīta sa yāti yamasādanam purā kṛtayugasyādau dānaveṁdro balirmahān
और जो मोहवश ऐसा नहीं करता, वह यमलोक को जाता है। पूर्वकाल में, कृतयुग के आरंभ में, दानवों के महान् स्वामी बलि ने,
श्लोक 5 (skanda.2.107.5)
तेन दत्ता वामनाय भूमिः स्वमस्तकान्विता । तदानीं भगवान्साक्षात्तुष्टो बलिमुवाच ह
tena dattā vāmanāya bhūmiḥ svamastakānvitā tadānīṁ bhagavānsākṣāttuṣṭo balimuvāca ha
वामन को अपने सिर सहित पृथ्वी अर्पित कर दी; तभी स्वयं भगवान् ने प्रसन्न होकर बलि से कहा —
श्लोक 6 (skanda.2.107.6)
कार्तिके मासि शुक्लायां प्रतिपद्यां यतो भवान् । भूमिं मे दत्तवान्भक्त्या तेन तुष्टोऽस्मि तेऽनघ
kārtike māsi śuklāyāṁ pratipadyāṁ yato bhavān bhūmiṁ me dattavānbhaktyā tena tuṣṭo'smi te'nagha
"कार्तिक की शुक्ल प्रतिपदा को तुमने भक्तिपूर्वक मुझे यह पृथ्वी दी, इसलिए, हे निष्पाप, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।
श्लोक 7 (skanda.2.107.7)
वरं ददामि ते राजन्नित्युक्त्वाऽदाद्वरं तदा । त्वन्नाम्नैव भवेद्राजन्कार्तिकी प्रतिपत्तिथिः
varaṁ dadāmi te rājannityuktvā'dādvaraṁ tadā tvannāmnaiva bhavedrājankārtikī pratipattithiḥ
हे राजन्, मैं तुम्हें वर देता हूँ" — ऐसा कहकर उन्होंने तब वर दिया — "हे राजन्, यह कार्तिक की प्रतिपदा तिथि तुम्हारे ही नाम से जानी जाएगी।
श्लोक 8 (skanda.2.107.8)
एतस्यां ये करिष्यंति तैलस्नानादिकार्चनम् । तदक्षयं भवेद्राजन्नात्र कार्या विचारणा
etasyāṁ ye kariṣyaṁti tailasnānādikārcanam tadakṣayaṁ bhavedrājannātra kāryā vicāraṇā
जो लोग इस दिन तेल-स्नान आदि पूजा करेंगे, हे राजन्, वह अक्षय होगी, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।"
श्लोक 9 (skanda.2.107.9)
तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन्प्रसिद्धा प्रतिपत्तिथिः । प्रतिपत्पूर्वविद्धा नो कर्तव्या तु कथंचन
tadāprabhṛti loke'sminprasiddhā pratipattithiḥ pratipatpūrvaviddhā no kartavyā tu kathaṁcana
तभी से यह प्रतिपदा तिथि इस लोक में प्रसिद्ध हो गई। पूर्वदिन से युक्त प्रतिपदा को यह व्रत कभी नहीं करना चाहिए।
श्लोक 10 (skanda.2.107.10)
तत्राभ्यंगं न कुर्वीत अन्यथा मृतिमाप्नुयात् । प्रतिपद्यां यदा दर्शो मुहूर्तप्रमितो भवेत् । मांगल्यं तद्दिने चेत्स्याद्वित्तादिस्तस्य नश्यति । बलेश्च प्रतिपद्दर्शाद्यदि विद्धं भविष्यति
tatrābhyaṁgaṁ na kurvīta anyathā mṛtimāpnuyāt pratipadyāṁ yadā darśo muhūrtapramito bhavet māṁgalyaṁ taddine cetsyādvittādistasya naśyati baleśca pratipaddarśādyadi viddhaṁ bhaviṣyati
उस पर तेल-मालिश नहीं करनी चाहिए, अन्यथा मृत्यु प्राप्त होती है। जब प्रतिपदा पर अमावस्या केवल एक मुहूर्त-मात्र ही रहे, और उस दिन मांगलिक कार्य किया जाए, तो उसका धन आदि नष्ट हो जाता है; तथा यदि बलि की प्रतिपदा अमावस्या से मिली हो,
श्लोक 11 (skanda.2.107.11)
तस्यां यद्यथ चाऽऽर्तिक्यं नारी मोहात्करिष्यति । नारीणां तत्र वैधव्यं प्रजानां मरणं ध्रुवम्
tasyāṁ yadyatha cā''rtikyaṁ nārī mohātkariṣyati nārīṇāṁ tatra vaidhavyaṁ prajānāṁ maraṇaṁ dhruvam
और उस पर कोई स्त्री मोहवश आर्तिक्य (कार्तिकी-पूजा) करे, तो वहाँ स्त्रियों को वैधव्य तथा संतान की मृत्यु निश्चित होती है।
श्लोक 12 (skanda.2.107.12)
अविद्धा प्रतिपच्चेत्स्यान्मुहूर्तमपरेऽहनि । उत्सवादिककृत्येषु सैव प्रोक्ता मनीषिभिः
aviddhā pratipaccetsyānmuhūrtamapare'hani utsavādikakṛtyeṣu saiva proktā manīṣibhiḥ
यदि प्रतिपदा अगले दिन में एक मुहूर्त भी बिना किसी मिश्रण के प्राप्त हो, तो बुद्धिमानों ने उत्सव आदि कार्यों के लिए उसी दिन को कहा है।
श्लोक 13 (skanda.2.107.13)
प्रतिपत्स्वल्पमात्राऽपि यदि न स्यात्परेऽहनि । पूर्वविद्धा तदा कार्या कृता नो दोषभाग्भवेत्
pratipatsvalpamātrā'pi yadi na syātpare'hani pūrvaviddhā tadā kāryā kṛtā no doṣabhāgbhavet
यदि प्रतिपदा अगले दिन थोड़ी भी न हो, तो पिछले दिन से युक्त तिथि ही करनी चाहिए; ऐसा करने में कोई दोष नहीं लगता।
श्लोक 14 (skanda.2.107.14)
तद्दिने गृहमध्ये तु कुर्यान्मूर्तिं तदांगणे । गोमयेन च तत्राऽपि दधि तत्पुरतः क्षिपेत्
taddine gṛhamadhye tu kuryānmūrtiṁ tadāṁgaṇe gomayena ca tatrā'pi dadhi tatpurataḥ kṣipet
उस दिन घर के भीतर आँगन में एक मूर्ति बनानी चाहिए, तथा वहाँ गोबर के साथ उसके सामने दही भी रखना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.2.107.15)
आर्तिक्यं तत्र संस्थाप्य एवं कुर्याद्विधानतः । अभ्यंगं ये न कुर्वंति तस्यां तु मुनिपुंगव
ārtikyaṁ tatra saṁsthāpya evaṁ kuryādvidhānataḥ abhyaṁgaṁ ye na kurvaṁti tasyāṁ tu munipuṁgava
वहाँ आर्तिक्य की स्थापना करके, इस प्रकार विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। हे मुनिपुंगव, जो लोग उस दिन तेल-मालिश नहीं करते,
श्लोक 16 (skanda.2.107.16)
न मांगल्यं भवेत्तेषां यावत्स्याद्वत्सरं ध्रुवम् । यो यादृशेन रूपेण तस्यां तिष्ठेच्छुभे दिने
na māṁgalyaṁ bhavetteṣāṁ yāvatsyādvatsaraṁ dhruvam yo yādṛśena rūpeṇa tasyāṁ tiṣṭhecchubhe dine
उनके लिए पूरे वर्ष तक निश्चय ही मंगल नहीं होता। जो व्यक्ति जैसे भाव में उस शुभ दिन रहता है,
श्लोक 17 (skanda.2.107.17)
आवर्षं तद्भवेत्तस्य तस्मान्मंगलमाचरेत् । यदीच्छेत्स्वशुभान्भोगान्भोक्तुं दिव्यान्मनोहरान्
āvarṣaṁ tadbhavettasya tasmānmaṁgalamācaret yadīcchetsvaśubhānbhogānbhoktuṁ divyānmanoharān
वैसा ही उसका पूरा वर्ष होता है, इसलिए मंगलमय आचरण करना चाहिए। यदि कोई अपने लिए दिव्य और मनोहर मंगलमय भोगों को भोगने की इच्छा रखता है,
श्लोक 18 (skanda.2.107.18)
कुरु दीपोत्सवं रम्यं त्रयोदश्यादिकेषु च । शंकरश्च भवानी च क्रीडया द्यूतमास्थिते
kuru dīpotsavaṁ ramyaṁ trayodaśyādikeṣu ca śaṁkaraśca bhavānī ca krīḍayā dyūtamāsthite
तो त्रयोदशी से आरंभ करके सुंदर दीपोत्सव मनाना चाहिए। शंकर और भवानी ने क्रीड़ावश द्यूत-क्रीड़ा की थी;
श्लोक 19 (skanda.2.107.19)
गौर्या जित्वा पुरा शंभुर्नग्नो द्यूते विसर्जितः । अतोऽर्थं शंकरो दुःखी गौरी नित्यं सुखस्थिता
gauryā jitvā purā śaṁbhurnagno dyūte visarjitaḥ ato'rthaṁ śaṁkaro duḥkhī gaurī nityaṁ sukhasthitā
गौरी से हारकर पूर्वकाल में शंभु नग्न होकर द्यूत में पराजित हो गए; इसीलिए शंकर दुःखी रहते हैं, जबकि गौरी सदा सुखपूर्वक रहती हैं।
श्लोक 20 (skanda.2.107.20)
द्यूतं निषिद्धं सर्वत्र हित्वा प्रतिपदं बुधाः । प्रथमं विजयो यस्य तस्य संवत्सरं सुखम्
dyūtaṁ niṣiddhaṁ sarvatra hitvā pratipadaṁ budhāḥ prathamaṁ vijayo yasya tasya saṁvatsaraṁ sukham
द्यूत सर्वत्र निषिद्ध होते हुए भी, बुद्धिमान लोग प्रतिपदा को इसका त्याग नहीं करते। जो पहले जीतता है, उसका पूरा वर्ष सुखमय होता है।
श्लोक 21 (skanda.2.107.21)
भवान्याऽभ्यर्थिता लक्ष्मीर्धेनुरूपेण संस्थिता । प्रातर्गोवर्द्धनः पूज्यो द्यूतं रात्रौ समाचरेत्
bhavānyā'bhyarthitā lakṣmīrdhenurūpeṇa saṁsthitā prātargovarddhanaḥ pūjyo dyūtaṁ rātrau samācaret
भवानी द्वारा प्रार्थित लक्ष्मी गाय के रूप में विराजमान हैं। प्रातःकाल गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए, तथा द्यूत रात्रि में करना चाहिए।
श्लोक 22 (skanda.2.107.22)
भूषणीयास्तदा गावो वर्ज्या वहनदोहनात् । गोवर्द्धन धराऽऽधार गोकुलत्राणकारक । विष्णुबाहुकृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव
bhūṣaṇīyāstadā gāvo varjyā vahanadohanāt govarddhana dharā''dhāra gokulatrāṇakāraka viṣṇubāhukṛtocchrāya gavāṁ koṭiprado bhava
उस दिन गायों को सजाया जाना चाहिए तथा उन्हें बोझ ढोने और दुहने से मुक्त रखना चाहिए। "हे गोवर्धन, पृथ्वी के आधार, गोकुल के रक्षक, विष्णु की भुजा से उठाए गए, तुम मुझे करोड़ गायों का फल देने वाले बनो।"
श्लोक 23 (skanda.2.107.23)
या लक्ष्मीर्लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता । घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु
yā lakṣmīrlokapālānāṁ dhenurūpeṇa saṁsthitā ghṛtaṁ vahati yajñārthe mama pāpaṁ vyapohatu
"जो लक्ष्मी लोकपालों की, गाय के रूप में विराजमान, यज्ञ के लिए घृत धारण करने वाली हैं, वे मेरे पाप का नाश करें।"
श्लोक 24 (skanda.2.107.24)
अग्रतः संतु मे गावो गावो मे संतु पृष्ठतः । गावो मे हृदयं संतु गवां मध्ये वसाम्यहम्
agrataḥ saṁtu me gāvo gāvo me saṁtu pṛṣṭhataḥ gāvo me hṛdayaṁ saṁtu gavāṁ madhye vasāmyaham
"मेरे आगे गायें हों, मेरे पीछे गायें हों; गायें ही मेरा हृदय हों, मैं गायों के मध्य में निवास करूँ।"
श्लोक 25 (skanda.2.107.25)
इति गोवर्द्धनपूजा । सद्भावेनैव संतोष्य देवान्सत्पुरुषान्नरान् । इतरेषामन्नपानैर्वाक्यदानेन पंडितान्
iti govarddhanapūjā sadbhāvenaiva saṁtoṣya devānsatpuruṣānnarān itareṣāmannapānairvākyadānena paṁḍitān
यह गोवर्धन-पूजा है। सद्भावपूर्वक देवताओं, सत्पुरुषों तथा मनुष्यों को संतुष्ट करके, अन्य विद्वानों को अन्न-पान और वचन-दान से,
श्लोक 26 (skanda.2.107.26)
वस्त्रैस्तांबूलधूपैश्च पुष्पकर्पूरकुंकुमैः । भक्ष्यैरुच्चावचैर्भोज्यैरंतःपुरनिवासिनः
vastraistāṁbūladhūpaiśca puṣpakarpūrakuṁkumaiḥ bhakṣyairuccāvacairbhojyairaṁtaḥpuranivāsinaḥ
अंतःपुर-निवासियों को वस्त्र, तांबूल, धूप, पुष्प, कर्पूर, कुंकुम तथा विभिन्न प्रकार के भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से संतुष्ट करके,
श्लोक 27 (skanda.2.107.27)
ग्राम्यान्वृषभदानैश्च सामंतान्नृपतिर्धनैः । पदातिजनसंघांश्च ग्रैवेयैः कटकैः शुभैः । स्वनामांकैश्च तान्राजा तोषयेत्सज्जनान्पृथक्
grāmyānvṛṣabhadānaiśca sāmaṁtānnṛpatirdhanaiḥ padātijanasaṁghāṁśca graiveyaiḥ kaṭakaiḥ śubhaiḥ svanāmāṁkaiśca tānrājā toṣayetsajjanānpṛthak
ग्रामवासियों को बैलों के दान से, सामंतों को धन से, राजा को पैदल सैनिकों के समूहों को शुभ गले के हार और कड़ों से, अपने नाम से अंकित करके, पृथक्-पृथक् संतुष्ट करना चाहिए।
श्लोक 28 (skanda.2.107.28)
यथार्थं तोषयित्वा तु ततो मल्लान्नरांस्तथा । वृषभान्महिषांश्चैव युध्यमानान्परैः सह
yathārthaṁ toṣayitvā tu tato mallānnarāṁstathā vṛṣabhānmahiṣāṁścaiva yudhyamānānparaiḥ saha
इस प्रकार यथोचित संतुष्ट करके, तत्पश्चात् पहलवानों, मनुष्यों, तथा एक-दूसरे से लड़ते हुए बैलों और भैंसों को,
श्लोक 29 (skanda.2.107.29)
राज्ञस्तथैव योधांश्च पदातीन्समलंकृतान् । मंचाऽऽरूढः स्वयं पश्येन्नटनर्तकचारणान्
rājñastathaiva yodhāṁśca padātīnsamalaṁkṛtān maṁcā''rūḍhaḥ svayaṁ paśyennaṭanartakacāraṇān
तथा राजाओं के योद्धाओं और सुसज्जित पैदल सैनिकों को — मंच पर बैठकर राजा स्वयं नर्तकों, नाटककारों और चारणों को देखे,
श्लोक 30 (skanda.2.107.30)
युद्धापयेद्वासयेच्च गोमहिष्यादिकं च यत् । वत्सानाकर्षयेद्गोभिरुक्तिप्रत्युक्तिवादनात्
yuddhāpayedvāsayecca gomahiṣyādikaṁ ca yat vatsānākarṣayedgobhiruktipratyuktivādanāt
गायों-भैंसों आदि को लड़ाए और विश्राम कराए, तथा आवाज़ों से बछड़ों को गायों की ओर आकर्षित कराए।
श्लोक 31 (skanda.2.107.31)
ततोऽपराह्नसमये पूर्वस्यां दिशि सुव्रत । मार्गपालीं प्रबध्नाति दुर्गस्तंभेऽथ पादपे
tato'parāhnasamaye pūrvasyāṁ diśi suvrata mārgapālīṁ prabadhnāti durgastaṁbhe'tha pādape
तत्पश्चात् अपराह्न के समय, हे सुव्रत, पूर्व दिशा में किले के खम्भे या वृक्ष पर मार्गपाली (मार्ग-रक्षक डोरी) बाँधनी चाहिए,
श्लोक 32 (skanda.2.107.32)
कुशकाशमयीं दिव्यां लंबकैर्बहुभिः प्रिये । वीक्षयित्वा गजानश्वान्मार्गपाल्यास्तले नयेत्
kuśakāśamayīṁ divyāṁ laṁbakairbahubhiḥ priye vīkṣayitvā gajānaśvānmārgapālyāstale nayet
कुश-काश से बनी, अनेक लटकते आभूषणों से युक्त, हे प्रिये; उसे दिखाकर हाथियों और घोड़ों को मार्गपाली के नीचे से ले जाना चाहिए।
श्लोक 33 (skanda.2.107.33)
गावो वृषांश्च महिषान्महिषीर्घटकोत्कटान् । कृतहोमैर्द्विजेंद्रैस्तु बध्नीयान्मार्गपालिकाम्
gāvo vṛṣāṁśca mahiṣānmahiṣīrghaṭakotkaṭān kṛtahomairdvijeṁdraistu badhnīyānmārgapālikām
गायों, बैलों, भैंसों, तथा मदमस्त हथिनियों को भी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा हवन किए जाने पर, मार्गपाली के नीचे से ले जाना चाहिए,
श्लोक 34 (skanda.2.107.34)
नमस्कारं ततः कुर्यान्मन्त्रेणानेन सुव्रत । मार्गपालि नमस्तुभ्यं सर्वलोकसुखप्रदे । तले तव सुखेनाश्वा गजा गावश्च संतु मे
namaskāraṁ tataḥ kuryānmantreṇānena suvrata mārgapāli namastubhyaṁ sarvalokasukhaprade tale tava sukhenāśvā gajā gāvaśca saṁtu me
तत्पश्चात् इस मंत्र से नमस्कार करना चाहिए, हे सुव्रत — "हे मार्गपालि, तुम्हें नमस्कार है, हे सम्पूर्ण लोकों को सुख देने वाली; तुम्हारे नीचे से मेरे घोड़े, हाथी और गायें सुखपूर्वक निकलें।"
श्लोक 35 (skanda.2.107.35)
मार्गपालीतले पुत्र यांति गावो महावृषाः । राजानो राजपुत्राश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः
mārgapālītale putra yāṁti gāvo mahāvṛṣāḥ rājāno rājaputrāśca brāhmaṇāśca viśeṣataḥ
हे पुत्र, मार्गपाली के नीचे से गायें, महान् बैल, राजा, राजकुमार तथा विशेषतः ब्राह्मण निकलते हैं,
श्लोक 36 (skanda.2.107.36)
मार्गपाली समुल्लंघ्य नीरुजः सुखिनो हि ते । कृत्वैतत्सर्वमेवेह रात्रौ दैत्यपतेर्बलेः
mārgapālī samullaṁghya nīrujaḥ sukhino hi te kṛtvaitatsarvameveha rātrau daityapaterbaleḥ
और मार्गपाली को पार करके वे रोगरहित और सुखी होते हैं। यहाँ यह सब करके, रात्रि में दैत्यराज बलि की,
श्लोक 37 (skanda.2.107.37)
पूजां कुर्यात्ततः साक्षाद्भूमौ मंडलके कृते । बलिमालिख्य दैत्येंद्रं वर्णकैः पंचरंगकैः
pūjāṁ kuryāttataḥ sākṣādbhūmau maṁḍalake kṛte balimālikhya daityeṁdraṁ varṇakaiḥ paṁcaraṁgakaiḥ
साक्षात् पूजा करनी चाहिए, भूमि पर मंडल बनाकर, दैत्यराज बलि को पाँच रंगों से चित्रित करके,
श्लोक 38 (skanda.2.107.38)
सर्वाभरणसंपूर्णं विंध्यावलिसमन्वितम् । कूष्मांडमयजंभोरुमधुदानवसंवृतम्
sarvābharaṇasaṁpūrṇaṁ viṁdhyāvalisamanvitam kūṣmāṁḍamayajaṁbhorumadhudānavasaṁvṛtam
सम्पूर्ण आभूषणों से युक्त, विंध्यावलि के साथ, कूष्मांड, जंभ, उरु तथा मधु नामक दानवों से घिरे हुए,
श्लोक 39 (skanda.2.107.39)
संपूर्णं कृष्टवदनं किरीटोत्कटकुण्डलम् । द्विभुजं दैत्यराजानं कारयित्वा स्वके पुनः
saṁpūrṇaṁ kṛṣṭavadanaṁ kirīṭotkaṭakuṇḍalam dvibhujaṁ daityarājānaṁ kārayitvā svake punaḥ
पूर्ण रूप से कठोर मुख वाले, मुकुट तथा बड़े कुंडलों वाले, दो भुजाओं वाले उस दैत्यराज को अपने घर में बनवाकर,
श्लोक 40 (skanda.2.107.40)
गृहस्य मध्ये शालायां विशालायां ततोऽर्चयेत् । मातृभ्रातृजनैः सार्द्धं संतुष्टो बन्धुभिः सह
gṛhasya madhye śālāyāṁ viśālāyāṁ tato'rcayet mātṛbhrātṛjanaiḥ sārddhaṁ saṁtuṣṭo bandhubhiḥ saha
घर के मध्य में एक विशाल शाला में उसकी पूजा करनी चाहिए, माता, भाइयों तथा अन्य बंधुओं के साथ प्रसन्न होकर,
श्लोक 41 (skanda.2.107.41)
कमलैः कुमुदैः पुष्पैः कह्लारै रक्तकोत्पलैः । गन्धपुष्पान्ननैवेद्यैः सक्षीरैर्गुडपायसैः
kamalaiḥ kumudaiḥ puṣpaiḥ kahlārai raktakotpalaiḥ gandhapuṣpānnanaivedyaiḥ sakṣīrairguḍapāyasaiḥ
कमल, कुमुद, कह्लार तथा लाल कमलों से, सुगंधित पुष्प-अन्न के नैवेद्यों से, दूध-गुड़ की खीर से,
श्लोक 42 (skanda.2.107.42)
मद्यमांससुरालेह्यचोष्यभक्ष्योपहारकैः । मन्त्रेणाऽनेन राजेंद्र समन्त्री सपुरोहितः । पूजां करिष्यते यो वै सौख्यं स्यात्तस्य वत्सरम्
madyamāṁsasurālehyacoṣyabhakṣyopahārakaiḥ mantreṇā'nena rājeṁdra samantrī sapurohitaḥ pūjāṁ kariṣyate yo vai saukhyaṁ syāttasya vatsaram
तथा मदिरा, मांस, सुरा, चाटने-चूसने योग्य पदार्थों और भक्ष्य उपहारों से। हे राजेंद्र, अपने मंत्री और पुरोहित सहित जो इस मंत्र से पूजा करेगा, उसका पूरा वर्ष सुखमय होगा।
श्लोक 43 (skanda.2.107.43)
बलिराज नमतुभ्यं विरोचनसुत प्रभो । भविष्येंद्र सुराराते पूजेयं प्रतिगृह्यताम्
balirāja namatubhyaṁ virocanasuta prabho bhaviṣyeṁdra surārāte pūjeyaṁ pratigṛhyatām
"हे राजा बलि, हे विरोचन-पुत्र प्रभो, आपको नमस्कार है; हे भावी इंद्र, हे देवताओं के शत्रु, यह पूजा स्वीकार कीजिए।"
श्लोक 44 (skanda.2.107.44)
एवं पूजाविधानेन रात्रौ जागरणं ततः । कारयेद्वै क्षणं रात्रौ नटनृत्यकथानकैः
evaṁ pūjāvidhānena rātrau jāgaraṇaṁ tataḥ kārayedvai kṣaṇaṁ rātrau naṭanṛtyakathānakaiḥ
इस प्रकार पूजा-विधान करके, तत्पश्चात् रात्रि में नाटक, नृत्य तथा कथाओं से रात्रि-जागरण करना चाहिए।
श्लोक 45 (skanda.2.107.45)
लोकश्चापि गृहस्यांते सपर्यां शुक्लतंदुलैः । संस्थाप्य बलिराजानं फलैः पुष्पैः प्रपूजयेत्
lokaścāpi gṛhasyāṁte saparyāṁ śuklataṁdulaiḥ saṁsthāpya balirājānaṁ phalaiḥ puṣpaiḥ prapūjayet
तथा साधारण लोगों को भी घर के आँगन के अंत में, सफेद चावलों से बलिराज की स्थापना करके, फलों और फूलों से उनकी पूजा करनी चाहिए,
श्लोक 46 (skanda.2.107.46)
बलिमुद्दिश्य वै तत्र कार्यं सर्व च सुव्रत । यानि यान्यक्षयाण्याहुर्मुनयस्तत्त्वदर्शिनः
balimuddiśya vai tatra kāryaṁ sarva ca suvrata yāni yānyakṣayāṇyāhurmunayastattvadarśinaḥ
तथा बलि को उद्दिष्ट करके वहाँ वे सभी कार्य करने चाहिए, हे सुव्रत, जिन्हें तत्त्वदर्शी मुनियों ने अक्षय कहा है।
श्लोक 47 (skanda.2.107.47)
यदत्र दीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु । तदक्षयं भवेत्सर्वं विष्णोः प्रीतिकरं शुभम्
yadatra dīyate dānaṁ svalpaṁ vā yadi vā bahu tadakṣayaṁ bhavetsarvaṁ viṣṇoḥ prītikaraṁ śubham
यहाँ जो भी दान दिया जाता है, चाहे थोड़ा हो या बहुत, वह सब अक्षय, शुभ तथा विष्णु को प्रसन्न करने वाला हो जाता है।
श्लोक 48 (skanda.2.107.48)
रात्रौ ये न करिष्यंति तव पूजां बले नराः । तेषां च श्रोत्रियो धर्मः सर्वस्त्वामुपतिष्ठतु
rātrau ye na kariṣyaṁti tava pūjāṁ bale narāḥ teṣāṁ ca śrotriyo dharmaḥ sarvastvāmupatiṣṭhatu
जो मनुष्य रात्रि में तुम्हारी पूजा नहीं करते, हे बलि, उनका सम्पूर्ण वेदज्ञान और धर्म तुम्हारे ही पास आ बसे।
श्लोक 49 (skanda.2.107.49)
विष्णुना च स्वयं वत्स तुष्टेन बलये पुनः । उपकारकरं दत्तमसुराणां महोत्सवम्
viṣṇunā ca svayaṁ vatsa tuṣṭena balaye punaḥ upakārakaraṁ dattamasurāṇāṁ mahotsavam
हे वत्स, स्वयं विष्णु ने ही प्रसन्न होकर बलि को पुनः यह उपकारक महोत्सव दिया,
श्लोक 50 (skanda.2.107.50)
एकमेवमहोरात्रं वर्षेवर्षे च कार्तिके । दत्तं दानवराजस्य आदर्शमिव भूतले
ekamevamahorātraṁ varṣevarṣe ca kārtike dattaṁ dānavarājasya ādarśamiva bhūtale
एक दिन-रात के लिए, प्रत्येक वर्ष कार्तिक में, दानवराज को, पृथ्वी पर मानो एक दर्पण के समान।
श्लोक 51 (skanda.2.107.51)
यः करोति नृपो राज्ये तस्य व्याधिभयं कुतः । सुभिक्षं क्षेममारोग्यं तस्य संपदनुत्तमा
yaḥ karoti nṛpo rājye tasya vyādhibhayaṁ kutaḥ subhikṣaṁ kṣemamārogyaṁ tasya saṁpadanuttamā
जो राजा अपने राज्य में यह करता है, उसे रोग का भय कहाँ रहता है? उसे सुभिक्ष, कल्याण, आरोग्य तथा उत्तम सम्पदा प्राप्त होती है,
श्लोक 52 (skanda.2.107.52)
नीरुजश्च जनाः सर्वे सर्वोपद्रववर्जिताः । कौमुदी क्रियते यस्माद्भावं कर्तुं महीतले । यो यादृशेन भावेन तिष्ठत्यस्यां च सुव्रत । हर्षदुःखादिभावेन तस्य वर्षं प्रयाति हि
nīrujaśca janāḥ sarve sarvopadravavarjitāḥ kaumudī kriyate yasmādbhāvaṁ kartuṁ mahītale yo yādṛśena bhāvena tiṣṭhatyasyāṁ ca suvrata harṣaduḥkhādibhāvena tasya varṣaṁ prayāti hi
और सभी लोग रोगरहित तथा सभी उपद्रवों से मुक्त हो जाते हैं। यह कौमुदी-उत्सव पृथ्वी पर एक विशेष भाव उत्पन्न करने के लिए मनाया जाता है — जो व्यक्ति जिस भाव में इस दिन रहता है, हे सुव्रत, हर्ष, दुःख आदि उसी भाव में उसका पूरा वर्ष बीतता है।
श्लोक 53 (skanda.2.107.53)
रुदिते रोदितं वर्षं प्रहृष्टे तु प्रहर्षितम् । भुक्तौ भोग्यं भवेद्वर्षं स्वस्थे स्वस्थं भविष्यति
rudite roditaṁ varṣaṁ prahṛṣṭe tu praharṣitam bhuktau bhogyaṁ bhavedvarṣaṁ svasthe svasthaṁ bhaviṣyati
रोने पर वर्ष रोने में बीतता है, प्रसन्न रहने पर प्रसन्नता में; भोग में रहने पर वर्ष भोग-योग्य होता है, स्वस्थ रहने पर वर्ष स्वस्थ होगा।
श्लोक 54 (skanda.2.107.54)
वैष्णवी दानवी चेयं तिथिः प्रोक्ता च कार्तिके । दीपोत्सवं जनितसर्वजनप्रमोदं कुर्वंति ये शुभतया वलिराजपूजाम् । दानोपभोगसुखबुद्धिमतां कुलानां हर्षं प्रयाति सकलं प्रमुदा च वर्षम्
vaiṣṇavī dānavī ceyaṁ tithiḥ proktā ca kārtike dīpotsavaṁ janitasarvajanapramodaṁ kurvaṁti ye śubhatayā valirājapūjām dānopabhogasukhabuddhimatāṁ kulānāṁ harṣaṁ prayāti sakalaṁ pramudā ca varṣam
कार्तिक में यह तिथि वैष्णवी और दानवी दोनों कही गई है। सम्पूर्ण जनों को आनंद देने वाले दीपोत्सव के साथ जो शुभतापूर्वक बलिराज की पूजा करते हैं, दान, भोग और सुख में बुद्धिमान उन कुलों का पूरा वर्ष हर्ष और आनंद से बीतता है।
श्लोक 55 (skanda.2.107.55)
बलिपूजां विधायैवं पश्चाद्गोक्रीडनं चरेत् । गवां क्रीडादिने यत्र रात्रौ दृश्येत चन्द्रमाः । सोमो राजा पशून्हंति सुरभीपूजकांस्तथा
balipūjāṁ vidhāyaivaṁ paścādgokrīḍanaṁ caret gavāṁ krīḍādine yatra rātrau dṛśyeta candramāḥ somo rājā paśūnhaṁti surabhīpūjakāṁstathā
इस प्रकार बलि-पूजा करके, तत्पश्चात् गो-क्रीड़ा करनी चाहिए। जिस गो-क्रीड़ा के दिन रात्रि में चंद्रमा दिखाई दे, तो राजा सोम पशुओं तथा गौ-पूजकों को भी हानि पहुँचाता है।
श्लोक 56 (skanda.2.107.56)
प्रतिपद्दर्शसंयोगे क्रीडनं तु गवां मतम् । परविद्धासु यः कुर्यात्पुत्रदारधनक्षयः
pratipaddarśasaṁyoge krīḍanaṁ tu gavāṁ matam paraviddhāsu yaḥ kuryātputradāradhanakṣayaḥ
प्रतिपदा और अमावस्या के संयोग में ही गो-क्रीड़ा करना उचित माना गया है; जो इसे परविद्धा तिथि में करता है, उसके पुत्र, पत्नी और धन का नाश होता है।
श्लोक 57 (skanda.2.107.57)
अलंकार्यास्तदा गावो गोग्रासादिभिरर्चिताः । गीतवादित्रनिर्घोषैर्नयेन्नगरबाह्यतः । आनीय च ततः पश्चात्कुर्यान्नीराजनाविधिम्
alaṁkāryāstadā gāvo gogrāsādibhirarcitāḥ gītavāditranirghoṣairnayennagarabāhyataḥ ānīya ca tataḥ paścātkuryānnīrājanāvidhim
उस समय गायों को सजाना चाहिए, उन्हें गो-ग्रास आदि से पूजना चाहिए, गीत-वाद्य की ध्वनियों के साथ उन्हें नगर के बाहर ले जाना चाहिए, तथा उन्हें वापस लाकर तत्पश्चात् आरती-विधि करनी चाहिए।
श्लोक 58 (skanda.2.107.58)
अथ चेत्प्रतिपत्स्वल्पा नारी नीराजनं चरेत् । द्वितीयायां ततः कुर्यात्सायं मंगलमालिकाः
atha cetpratipatsvalpā nārī nīrājanaṁ caret dvitīyāyāṁ tataḥ kuryātsāyaṁ maṁgalamālikāḥ
अब यदि प्रतिपदा थोड़ी ही हो, तो स्त्री को फिर भी आरती करनी चाहिए; तत्पश्चात् द्वितीया को संध्या समय शुभ मालाओं सहित यह करना चाहिए।
श्लोक 59 (skanda.2.107.59)
एवं नीराजनं कृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते । प्रतिपत्पूर्वविद्धैव यष्टिकाकर्षणे भवेत्
evaṁ nīrājanaṁ kṛtvā sarvapāpaiḥ pramucyate pratipatpūrvaviddhaiva yaṣṭikākarṣaṇe bhavet
इस प्रकार आरती करके मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है। पिछले दिन से युक्त प्रतिपदा को ही यष्टि-आकर्षण (डंडा-खींचने की प्रतिस्पर्धा) होती है।
श्लोक 60 (skanda.2.107.60)
कुशकाशमयीं कुर्याद्यष्टिकां सुदृढां नवाम् । देवद्वारे नृपद्वारेऽथवाऽऽनेया चतुष्पथे
kuśakāśamayīṁ kuryādyaṣṭikāṁ sudṛḍhāṁ navām devadvāre nṛpadvāre'thavā''neyā catuṣpathe
कुश-काश से बनी एक सुदृढ़ नई यष्टि (डंडा) बनानी चाहिए; उसे मंदिर के द्वार पर, राजद्वार पर, अथवा चौराहे पर लाना चाहिए।
श्लोक 61 (skanda.2.107.61)
तामेकतो राजपुत्रा हीनवर्णास्तथैकतः । गृहीत्वा कर्षयेयुस्ते यथासारं मुहुर्मुहुः
tāmekato rājaputrā hīnavarṇāstathaikataḥ gṛhītvā karṣayeyuste yathāsāraṁ muhurmuhuḥ
एक ओर राजकुमार तथा दूसरी ओर निम्नवर्ण के लोग उसे पकड़कर बार-बार अपनी पूरी शक्ति से खींचें।
श्लोक 62 (skanda.2.107.62)
समसंख्या द्वयोः कार्या सर्वेऽपि बलवत्तराः । जयोऽत्र हीनजातीनां जयो राज्ञस्तु वत्सरम्
samasaṁkhyā dvayoḥ kāryā sarve'pi balavattarāḥ jayo'tra hīnajātīnāṁ jayo rājñastu vatsaram
दोनों ओर बराबर संख्या में, सभी बलवान लोग होने चाहिए। यहाँ यदि निम्नवर्णों की विजय हो, तो वह एक बात है; परन्तु राजा-पक्ष की विजय उस वर्ष के लिए शुभ मानी जाती है।
श्लोक 63 (skanda.2.107.63)
उभयोः पृष्ठतः कार्या रेखा तत्कर्षकोपरि । रेखांते यो नयेत्तस्य जयो भवति नाऽन्यथा । जयचिह्नमिदं राजा निदधीत प्रयत्नतः
ubhayoḥ pṛṣṭhataḥ kāryā rekhā tatkarṣakopari rekhāṁte yo nayettasya jayo bhavati nā'nyathā jayacihnamidaṁ rājā nidadhīta prayatnataḥ
दोनों ओर, खींचने वाले के पीछे एक रेखा खींचनी चाहिए। जो उस रेखा के अंत तक खींच ले जाए, उसी की विजय होती है, अन्यथा नहीं। राजा को यह विजय-चिह्न सावधानीपूर्वक अंकित करना चाहिए।