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वैष्णव खण्ड · अध्याय 108

यमद्वितीयामाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 107अध्याय-सूचीअध्याय 109

श्लोक 1 (skanda.2.108.1)

नारद उवाच । भगवन्प्रष्टुमिच्छामि त्वामहं विनयान्वितः । तद्व्रतं ब्रूहि मे मर्त्यो मृत्युं येन न पश्यति

nārada uvāca bhagavanpraṣṭumicchāmi tvāmahaṁ vinayānvitaḥ tadvrataṁ brūhi me martyo mṛtyuṁ yena na paśyati

नारद ने कहा — हे भगवन्, मैं विनयपूर्वक आपसे पूछना चाहता हूँ; मुझे वह व्रत बताइए जिससे मनुष्य मृत्यु को नहीं देखता।

श्लोक 2 (skanda.2.108.2)

ब्रह्मोवाच । यदि पृच्छसि विप्रेन्द्र व्रतानामुत्तमं व्रतम् । व्रतं यमद्वितीयाख्यं शृणु त्वं मृत्युनाशनम्

brahmovāca yadi pṛcchasi viprendra vratānāmuttamaṁ vratam vrataṁ yamadvitīyākhyaṁ śṛṇu tvaṁ mṛtyunāśanam

ब्रह्माजी ने कहा — हे विप्रेन्द्र, यदि तुम व्रतों में उत्तम व्रत पूछते हो, तो सुनो — यमद्वितीया नामक व्रत मृत्यु का नाश करने वाला है।

श्लोक 3 (skanda.2.108.3)

कार्तिके मासि शुद्धायां द्वितीयायां मुनीश्वर । कर्तव्यं तद्विधानेन सर्वमृत्युनिवारणम्

kārtike māsi śuddhāyāṁ dvitīyāyāṁ munīśvara kartavyaṁ tadvidhānena sarvamṛtyunivāraṇam

हे मुनीश्वर, कार्तिक मास की शुद्ध द्वितीया को यह विधिपूर्वक करना चाहिए, जो सम्पूर्ण मृत्यु का निवारण करता है।

श्लोक 4 (skanda.2.108.4)

ब्राह्मे मुहूर्ते चोप्थाय द्वितीयायां मुनीश्वर । मनसा चिंतयेदात्महितं नैवाऽहितं स्मरेत्

brāhme muhūrte copthāya dvitīyāyāṁ munīśvara manasā ciṁtayedātmahitaṁ naivā'hitaṁ smaret

हे मुनीश्वर, द्वितीया को ब्राह्म मुहूर्त में उठकर, मन में केवल अपने हित का ही चिंतन करना चाहिए, कभी भी अहित का स्मरण नहीं करना चाहिए।

श्लोक 5 (skanda.2.108.5)

प्रातःस्नानं ततः कुर्याद्दन्तधावनपूर्वकम् । ततः शुक्लांबरधरः शुक्लमाल्यानुलेपनः

prātaḥsnānaṁ tataḥ kuryāddantadhāvanapūrvakam tataḥ śuklāṁbaradharaḥ śuklamālyānulepanaḥ

तत्पश्चात् दंतधावन सहित प्रातःस्नान करना चाहिए; फिर श्वेत वस्त्र धारण करके, श्वेत माला और उबटन लगाकर,

श्लोक 6 (skanda.2.108.6)

कृतनित्यक्रियो हृष्टः कुण्डलांगदभूषितः । औदुम्बर तरुं गत्वा कृत्वा मण्डलमुत्तमम्

kṛtanityakriyo hṛṣṭaḥ kuṇḍalāṁgadabhūṣitaḥ audumbara taruṁ gatvā kṛtvā maṇḍalamuttamam

नित्य कर्म करके, प्रसन्न होकर, कुंडल और बाजूबंद पहनकर, औदुम्बर (गूलर) वृक्ष के पास जाकर एक उत्तम मंडल बनाकर,

श्लोक 7 (skanda.2.108.7)

पद्ममष्टदलं कृत्वा तस्मिन्नौदुम्बरे शुभे । विधिं विष्णुं च रुद्रं च वरदां च सरस्वतीम्

padmamaṣṭadalaṁ kṛtvā tasminnaudumbare śubhe vidhiṁ viṣṇuṁ ca rudraṁ ca varadāṁ ca sarasvatīm

उस शुभ औदुम्बर वृक्ष पर आठ पंखुड़ियों वाला कमल बनाकर, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा वरदायिनी सरस्वती की,

श्लोक 8 (skanda.2.108.8)

वीणापुस्तकसंयुक्तां पूजयेत्स्वस्थमानसः । चन्दनागरुकस्तूरीकुंकुमैर्द्विजसत्तम

vīṇāpustakasaṁyuktāṁ pūjayetsvasthamānasaḥ candanāgarukastūrīkuṁkumairdvijasattama

वीणा और पुस्तक सहित, स्वस्थ मन से पूजा करनी चाहिए; हे द्विजसत्तम, चंदन, अगर, कस्तूरी तथा कुंकुम से,

श्लोक 9 (skanda.2.108.9)

पुष्पैर्धूपैश्च नैवेद्यैर्नारिकेलफलादिभिः । ततो मृत्युविनाशाथ सालंकारां पयस्विनीम्

puṣpairdhūpaiśca naivedyairnārikelaphalādibhiḥ tato mṛtyuvināśātha sālaṁkārāṁ payasvinīm

पुष्पों, धूप तथा नारियल आदि फलों के नैवेद्य से पूजा करके, तत्पश्चात् अकाल-मृत्यु के नाश के लिए आभूषणों से सजी हुई, दूध देने वाली गाय,

श्लोक 10 (skanda.2.108.10)

विप्राय वेदविदुषे गां दद्याच्च सवत्सकाम् । अपमृत्युविनाशार्थं संसारार्णवतारकाम्

viprāya vedaviduṣe gāṁ dadyācca savatsakām apamṛtyuvināśārthaṁ saṁsārārṇavatārakām

बछड़े सहित, वेदज्ञ ब्राह्मण को देनी चाहिए, अकाल-मृत्यु के नाश तथा संसार-सागर से पार उतारने के लिए,

श्लोक 11 (skanda.2.108.11)

हे विप्र ते त्विमां सौम्यां धेनुं संप्रददाम्यहम् । इति मंत्रेण गां दद्याद्विप्राय ब्रह्मवादिने

he vipra te tvimāṁ saumyāṁ dhenuṁ saṁpradadāmyaham iti maṁtreṇa gāṁ dadyādviprāya brahmavādine

"हे विप्र, मैं तुम्हें यह सौम्य गाय अर्पित करता हूँ" — इस मंत्र से ब्रह्मवादी ब्राह्मण को गाय देनी चाहिए।

श्लोक 12 (skanda.2.108.12)

तदलाभे तु विप्राय भक्त्या दद्यादुपानहौ । ततः पूजां समाप्याथ भक्तिमान्पुरुषोत्तमे

tadalābhe tu viprāya bhaktyā dadyādupānahau tataḥ pūjāṁ samāpyātha bhaktimānpuruṣottame

वह न मिले तो भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को जूते देने चाहिए। तत्पश्चात् पूजा समाप्त करके, पुरुषोत्तम में भक्तिमान् होकर,

श्लोक 13 (skanda.2.108.13)

ज्ञातिश्रेष्ठान्वयोवृद्धान्सम्यग्भक्त्याऽभिवादयेत् । नानाविधैः फलै रम्यैस्तर्प्पयेत्स्वजनानपि

jñātiśreṣṭhānvayovṛddhānsamyagbhaktyā'bhivādayet nānāvidhaiḥ phalai ramyaistarppayetsvajanānapi

श्रेष्ठ बंधुजनों और वृद्धजनों को भलीभाँति भक्तिपूर्वक अभिवादन करना चाहिए, तथा विभिन्न सुंदर फलों से अपने परिजनों को भी संतुष्ट करना चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.2.108.14)

ततः सोदरसंपन्ना भगिनी या भवेन्मुने । तस्या गृहं समागत्य सम्यग्भक्त्याऽभिवादयेत्

tataḥ sodarasaṁpannā bhaginī yā bhavenmune tasyā gṛhaṁ samāgatya samyagbhaktyā'bhivādayet

तत्पश्चात्, हे मुने, सगे भाई-बहन के रूप में जो बहन हो, उसके घर जाकर भलीभाँति भक्तिपूर्वक उसे अभिवादन करना चाहिए,

श्लोक 15 (skanda.2.108.15)

भगिनि सुभगे भद्रे त्वदंघ्रिसरसीरुहम् । श्रेयसेऽथ नमस्कर्तुमागतोऽस्मि तवालयम्

bhagini subhage bhadre tvadaṁghrisarasīruham śreyase'tha namaskartumāgato'smi tavālayam

"हे बहन, हे सौभाग्यवती, हे कल्याणी, मैं तुम्हारे चरण-कमलों को नमस्कार करने अपने कल्याण के लिए तुम्हारे घर आया हूँ।"

श्लोक 16 (skanda.2.108.16)

इत्युक्त्वा भगिनीं तां तु विष्णुबुद्ध्याऽभिवादयेत् । तदा तु भगिनी श्रुत्वा भ्रातुर्वचनमुत्तमम्

ityuktvā bhaginīṁ tāṁ tu viṣṇubuddhyā'bhivādayet tadā tu bhaginī śrutvā bhrāturvacanamuttamam

ऐसा कहकर उस बहन को विष्णु के समान समझकर अभिवादन करना चाहिए। तब वह बहन भाई के इस उत्तम वचन को सुनकर,

श्लोक 17 (skanda.2.108.17)

भगिन्या भ्रातरं वाक्यं वक्तव्यं प्रति नारद । अद्य भ्रातरहं जाता त्वत्तो धन्याऽस्मि मंगला

bhaginyā bhrātaraṁ vākyaṁ vaktavyaṁ prati nārada adya bhrātarahaṁ jātā tvatto dhanyā'smi maṁgalā

हे नारद, भाई को कहने योग्य वचन इस प्रकार कहती है — "आज मैं भाई के कारण धन्य और मंगलमयी हुई हूँ।

श्लोक 18 (skanda.2.108.18)

भोक्तव्यं तेऽद्य मद्गेहे स्वायुषे कुलदीपक । कार्तिके शुक्लपक्षस्य द्वितीयायां सहोदर

bhoktavyaṁ te'dya madgehe svāyuṣe kuladīpaka kārtike śuklapakṣasya dvitīyāyāṁ sahodara

हे कुलदीपक, आज तुम्हें अपनी दीर्घायु के लिए मेरे घर भोजन करना है, कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया को, हे भाई।

श्लोक 19 (skanda.2.108.19)

यमो यमुनया पूर्वं भोजितः स्वगृहेर्चितः । अस्मिन्दिने यमेनाऽपि नारकीयाश्च मोचिताः । अपि बद्धाः कर्मपाशैः स्वेच्छया पर्यटंति ते

yamo yamunayā pūrvaṁ bhojitaḥ svagṛhercitaḥ asmindine yamenā'pi nārakīyāśca mocitāḥ api baddhāḥ karmapāśaiḥ svecchayā paryaṭaṁti te

पूर्वकाल में यमुना ने यम को अपने घर में भोजन कराकर सम्मानित किया था; इस दिन यम द्वारा भी नरकवासी छोड़े जाते हैं; कर्म-पाशों में बँधे हुए वे भी इच्छानुसार विचरण करते हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.108.20)

स्वसुर्नरो वेश्मनि यो न भुंक्ते यमद्वितीयादिनमत्र लब्ध्वा । तं पापिनं प्राप्य वयं सुहृष्टाः प्रभक्षयामोऽद्य च भक्ष्यहीनाः

svasurnaro veśmani yo na bhuṁkte yamadvitīyādinamatra labdhvā taṁ pāpinaṁ prāpya vayaṁ suhṛṣṭāḥ prabhakṣayāmo'dya ca bhakṣyahīnāḥ

"जो पुरुष यह यमद्वितीया का दिन पाकर भी बहन के घर भोजन नहीं करता, उस पापी को पाकर हम अत्यंत प्रसन्न होकर, आज भोजन से वंचित हम उसे ही खा जाएँगे।"

श्लोक 21 (skanda.2.108.21)

इति पापा रटंतीह ब्रह्महत्यादयस्तथा । तस्माद्भ्रातर्मद्गृहे तु भोजनं कुरु कार्तिके

iti pāpā raṭaṁtīha brahmahatyādayastathā tasmādbhrātarmadgṛhe tu bhojanaṁ kuru kārtike

इस प्रकार यहाँ ब्रह्महत्या आदि पाप चिल्लाते हैं। इसलिए, हे भाई, कार्तिक में मेरे घर भोजन करो,

श्लोक 22 (skanda.2.108.22)

शुक्लायां तु द्वितीयायां विश्रुतायां जगत्त्रये । अस्यां निजगृहे पुत्र भुज्यते न बुधैरपि

śuklāyāṁ tu dvitīyāyāṁ viśrutāyāṁ jagattraye asyāṁ nijagṛhe putra bhujyate na budhairapi

तीनों लोकों में विख्यात शुक्ल द्वितीया को। इस दिन, हे पुत्र, विद्वान् भी अपने घर भोजन नहीं करते।"

श्लोक 23 (skanda.2.108.23)

इत्युक्तः स तथेत्युक्ता भगिनीं पूजयेद्व्रती । प्रहर्षास्तुमहाभाग वस्त्रालंकारभूषणैः

ityuktaḥ sa tathetyuktā bhaginīṁ pūjayedvratī praharṣāstumahābhāga vastrālaṁkārabhūṣaṇaiḥ

ऐसा कहे जाने पर "ऐसा ही होगा" कहकर व्रती को अपनी बहन को अत्यंत प्रसन्न होकर, हे महाभाग, वस्त्र और आभूषणों से सम्मानित करना चाहिए,

श्लोक 24 (skanda.2.108.24)

अग्रजामभिवंद्याऽथ आशिषं च प्रगृह्य च । सर्वा भगिन्यः संतोष्या वस्त्रालंकारदानतः

agrajāmabhivaṁdyā'tha āśiṣaṁ ca pragṛhya ca sarvā bhaginyaḥ saṁtoṣyā vastrālaṁkāradānataḥ

बड़ी बहन को प्रणाम करके तथा उसका आशीर्वाद ग्रहण करके; सभी बहनों को वस्त्र और आभूषण देकर संतुष्ट करना चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.2.108.25)

अभावे स्वस्य तु स्वसुः पितृव्याः स्वपितुः स्वसा । तस्या गृहं समागत्य कुर्याद्भोजनमादरात्

abhāve svasya tu svasuḥ pitṛvyāḥ svapituḥ svasā tasyā gṛhaṁ samāgatya kuryādbhojanamādarāt

अपनी बहन के अभाव में, चाचा की बेटी (चचेरी बहन) के घर जाकर आदरपूर्वक भोजन करना चाहिए।

श्लोक 26 (skanda.2.108.26)

एवं यः कुरुते पुत्र द्वितीयां यमनामिकाम् । अपमृत्युविनिर्मुक्तः पुत्रपौत्रादिभिर्वृतः

evaṁ yaḥ kurute putra dvitīyāṁ yamanāmikām apamṛtyuvinirmuktaḥ putrapautrādibhirvṛtaḥ

हे पुत्र, इस प्रकार जो यम-नामक द्वितीया करता है, वह अकाल-मृत्यु से मुक्त होकर, पुत्र-पौत्रों से घिरा हुआ,

श्लोक 27 (skanda.2.108.27)

इह भुक्त्वा तु विपुलान्भोगानन्यान्यथेप्सितान् । अंते मोक्षमवाप्नोति नान्यथा मद्वचो भवेत्

iha bhuktvā tu vipulānbhogānanyānyathepsitān aṁte mokṣamavāpnoti nānyathā madvaco bhavet

इस लोक में अनेक इच्छित भोगों को भोगकर, अंत में मोक्ष प्राप्त करता है; मेरा वचन अन्यथा नहीं हो सकता।

श्लोक 28 (skanda.2.108.28)

व्रतान्येतानि सर्वाणि दानानि विविधानि च । गृहस्थस्यैव युज्यंते तस्माद्गार्हस्थ्यमाश्रयेत्

vratānyetāni sarvāṇi dānāni vividhāni ca gṛhasthasyaiva yujyaṁte tasmādgārhasthyamāśrayet

ये सभी व्रत तथा विविध दान गृहस्थ के लिए ही उपयुक्त हैं; इसलिए गृहस्थाश्रम का आश्रय लेना चाहिए।

श्लोक 29 (skanda.2.108.29)

कथां यमद्वितीयाया व्रतस्थः शृणुयान्नरः । तस्य सर्वाणि पापानि नश्यंतीत्याह माधवः

kathāṁ yamadvitīyāyā vratasthaḥ śṛṇuyānnaraḥ tasya sarvāṇi pāpāni naśyaṁtītyāha mādhavaḥ

जो मनुष्य व्रत में रहकर यमद्वितीया की कथा सुनता है, उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं — ऐसा माधव ने कहा है।

श्लोक 30 (skanda.2.108.30)

सूत उवाच । कार्तिके च द्वितीयायां पूर्वाह्णे यममर्चयेत् । भानुजायां नरः स्नात्वा यमलोकं न पश्यति

sūta uvāca kārtike ca dvitīyāyāṁ pūrvāhṇe yamamarcayet bhānujāyāṁ naraḥ snātvā yamalokaṁ na paśyati

सूत ने कहा — कार्तिक की द्वितीया को पूर्वाह्न में यम की पूजा करनी चाहिए; यमुना में स्नान करने वाला मनुष्य यमलोक नहीं देखता।

श्लोक 31 (skanda.2.108.31)

कार्तिके शुक्लपक्षे तु द्वितीयायां तु शौनक । यमो यमुनया पूर्वं भोजितः स्वगृहेऽर्चितः

kārtike śuklapakṣe tu dvitīyāyāṁ tu śaunaka yamo yamunayā pūrvaṁ bhojitaḥ svagṛhe'rcitaḥ

हे शौनक, कार्तिक के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को पूर्वकाल में यमुना ने यम को अपने घर में भोजन कराकर सम्मानित किया था।

श्लोक 32 (skanda.2.108.32)

द्वितीयायां महोत्सर्गो नारकीयाश्च तर्पिताः । पापेभ्यो विप्रयुक्तास्ते मुक्ताः सर्वे निबंधनात्

dvitīyāyāṁ mahotsargo nārakīyāśca tarpitāḥ pāpebhyo viprayuktāste muktāḥ sarve nibaṁdhanāt

द्वितीया को महान् मुक्ति होती है, नरकवासियों को भी तर्पण मिलता है; पापों से मुक्त होकर वे सभी बंधन से छूट जाते हैं।

श्लोक 33 (skanda.2.108.33)

अत्राऽऽशिताश्च संतुष्टाः स्थिताः सर्वे यदृच्छया । तेषां महोत्सवो वृत्तो यमराष्ट्रसुखावहः

atrā''śitāśca saṁtuṣṭāḥ sthitāḥ sarve yadṛcchayā teṣāṁ mahotsavo vṛtto yamarāṣṭrasukhāvahaḥ

इस दिन भोजन पाकर संतुष्ट सभी लोग इच्छानुसार रहते हैं; यमराज के राज्य को सुखदायक ऐसा महान् उत्सव होता है।

श्लोक 34 (skanda.2.108.34)

अतो यमद्वितीयेयं त्रिषु लोकेषु विश्रुता । तस्मान्निजगृहे विप्र न भोक्तव्यं ततो बुधैः

ato yamadvitīyeyaṁ triṣu lokeṣu viśrutā tasmānnijagṛhe vipra na bhoktavyaṁ tato budhaiḥ

इसलिए यह यमद्वितीया तीनों लोकों में विख्यात है; इसलिए, हे विप्र, बुद्धिमान लोगों को इस दिन अपने घर भोजन नहीं करना चाहिए।

श्लोक 35 (skanda.2.108.35)

स्नेहेन भगिनीहस्ताद्भोक्तव्यं बलवर्धनम् । ऊर्जे शुक्लद्वितीयायां पूजितस्तर्पितो यमः

snehena bhaginīhastādbhoktavyaṁ balavardhanam ūrje śukladvitīyāyāṁ pūjitastarpito yamaḥ

स्नेहपूर्वक बहन के हाथ से बल बढ़ाने वाला भोजन करना चाहिए। ऊर्ज (कार्तिक) की शुक्ल द्वितीया को पूजित और तृप्त हुए यम,

श्लोक 36 (skanda.2.108.36)

महिषासनमारूढो दंडमुद्गरभृत्प्रभुः । वेष्टितः किंकरैर्हृष्टैस्तस्मै याम्यात्मने नमः

mahiṣāsanamārūḍho daṁḍamudgarabhṛtprabhuḥ veṣṭitaḥ kiṁkarairhṛṣṭaistasmai yāmyātmane namaḥ

भैंसे के आसन पर बैठे, दंड और मुद्गर धारण किए हुए प्रभु, प्रसन्न सेवकों से घिरे हुए — उन यमस्वरूप को नमस्कार है।

श्लोक 37 (skanda.2.108.37)

यैर्भगिन्यः सुवासिन्यो वस्त्रदानादितोषिताः । न तेषां वत्सरं यावत्कलहो न रिपोर्भयम्

yairbhaginyaḥ suvāsinyo vastradānāditoṣitāḥ na teṣāṁ vatsaraṁ yāvatkalaho na riporbhayam

जिन्होंने सुहागिन बहनों को वस्त्र-दान आदि से संतुष्ट किया है, उनके लिए एक वर्ष तक न कोई कलह होता है, न शत्रु का भय।

श्लोक 38 (skanda.2.108.38)

धन्यं यशस्यमायुष्यं धर्मकामार्थसाधनम् । व्याख्यातं सकलं पुत्र सरहस्यं मयाऽनघ

dhanyaṁ yaśasyamāyuṣyaṁ dharmakāmārthasādhanam vyākhyātaṁ sakalaṁ putra sarahasyaṁ mayā'nagha

हे निष्पाप पुत्र, यह धन्य, यशस्वी, आयुष्यकर, धर्म-काम-अर्थ का साधक सम्पूर्ण रहस्य सहित मैंने तुम्हें बताया।

श्लोक 39 (skanda.2.108.39)

यस्यां तिथौ यमुनया यमराजदेवः संभोजितः प्रतितिथौ स्वसृसौहृदेन । तस्मात्स्वसुः करतलादिह यो भुनक्ति प्राप्नोति वित्तशुभसंपदमुत्तमां सः

yasyāṁ tithau yamunayā yamarājadevaḥ saṁbhojitaḥ pratitithau svasṛsauhṛdena tasmātsvasuḥ karatalādiha yo bhunakti prāpnoti vittaśubhasaṁpadamuttamāṁ saḥ

जिस तिथि को यमुना ने बहन के स्नेह से प्रतिवर्ष यमराज को भोजन कराया, उसी बहन के हाथ से जो यहाँ भोजन करता है, वह उत्तम धन और शुभ सम्पदा प्राप्त करता है।

श्लोक 40 (skanda.2.108.40)

सूत उवाच । विशेषश्चात्र संप्रोक्तो वालखिल्यैर्महर्षिभिः । तदहं संप्रवक्ष्यामि शृणुध्वं मुनिसत्तमाः

sūta uvāca viśeṣaścātra saṁprokto vālakhilyairmaharṣibhiḥ tadahaṁ saṁpravakṣyāmi śṛṇudhvaṁ munisattamāḥ

सूत ने कहा — इस विषय में महर्षि वालखिल्यों ने एक विशेष बात कही है; अब मैं उसे बताऊँगा, हे मुनिसत्तमो, सुनिए।

श्लोक 41 (skanda.2.108.41)

वालखिल्या ऊचुः । कार्तिकस्य सिते पक्षे द्वितीया यमसंज्ञिता । तत्राऽपराह्ने कर्तव्यं सर्वथैव यमार्चनम्

vālakhilyā ūcuḥ kārtikasya site pakṣe dvitīyā yamasaṁjñitā tatrā'parāhne kartavyaṁ sarvathaiva yamārcanam

वालखिल्यों ने कहा — कार्तिक के शुक्ल पक्ष में द्वितीया यम-नामक तिथि है; उस दिन अपराह्न में सर्वथा यम-पूजन करना चाहिए।

श्लोक 42 (skanda.2.108.42)

प्रत्यहं यमुनाऽऽगत्य यमं संप्रार्थयत्पुरा । भ्रातर्मम गृहे याहि भोजनार्थं गणावृतः

pratyahaṁ yamunā''gatya yamaṁ saṁprārthayatpurā bhrātarmama gṛhe yāhi bhojanārthaṁ gaṇāvṛtaḥ

पूर्वकाल में यमुना प्रतिदिन आकर यम से प्रार्थना करती थी — "हे भाई, अपने गणों सहित भोजन के लिए मेरे घर आओ।"

श्लोक 43 (skanda.2.108.43)

अद्यश्वो वा परश्वो वा प्रत्यहं वदते यमः । कार्यव्याकुलचित्तानामवकाशो न जायते

adyaśvo vā paraśvo vā pratyahaṁ vadate yamaḥ kāryavyākulacittānāmavakāśo na jāyate

"आज, कल अथवा परसों" — यम प्रतिदिन ऐसा कहते थे। कर्तव्यों में व्यस्त चित्त वालों को अवकाश नहीं मिलता।

श्लोक 44 (skanda.2.108.44)

तदैकदा यमुनया बलात्कारान्निमंत्रितः । स गतः कार्तिके मासि द्वितीयायां मुनीश्वराः

tadaikadā yamunayā balātkārānnimaṁtritaḥ sa gataḥ kārtike māsi dvitīyāyāṁ munīśvarāḥ

तब एक बार यमुना द्वारा लगभग बलपूर्वक आमंत्रित किए जाने पर, हे मुनीश्वरो, वे कार्तिक मास की द्वितीया को गए।

श्लोक 45 (skanda.2.108.45)

नारकीयजनान्मुक्त्वा गणैः सह रवेः सुतः । कृताऽऽतिथ्यो यमुनया नानापाकाः कृताः खग

nārakīyajanānmuktvā gaṇaiḥ saha raveḥ sutaḥ kṛtā''tithyo yamunayā nānāpākāḥ kṛtāḥ khaga

हे खग, नरकवासियों को मुक्त करके, गणों सहित सूर्यपुत्र यम का यमुना ने आतिथ्य किया; अनेक प्रकार के व्यंजन बनाए गए।

श्लोक 46 (skanda.2.108.46)

कृताभ्यंगो यमुनया तैलैर्गंधमनोहरैः । उद्वर्तनं लापयित्वा स्नापितः सूर्यनंदनः

kṛtābhyaṁgo yamunayā tailairgaṁdhamanoharaiḥ udvartanaṁ lāpayitvā snāpitaḥ sūryanaṁdanaḥ

यमुना ने सुगंधित तेल से उनका उबटन किया, उन्हें उबटन लगाकर स्नान कराया।

श्लोक 47 (skanda.2.108.47)

ततोऽलंकारकं दत्तं नानावस्त्राणि चंदनम् । माल्यानि च प्रदत्तानि मंचोपरि उपाविशत्

tato'laṁkārakaṁ dattaṁ nānāvastrāṇi caṁdanam mālyāni ca pradattāni maṁcopari upāviśat

तत्पश्चात् आभूषण, विविध वस्त्र, चंदन तथा मालाएँ अर्पित की गईं; और वे एक आसन पर बैठे।

श्लोक 48 (skanda.2.108.48)

पक्वान्नानि विचित्राणि कृत्वा सा स्वर्णभाजने । यमायाभोजयद्देवी यमुना प्रीतमानसा

pakvānnāni vicitrāṇi kṛtvā sā svarṇabhājane yamāyābhojayaddevī yamunā prītamānasā

सोने के बर्तन में विभिन्न प्रकार के पके हुए व्यंजन बनाकर, प्रसन्न मन वाली देवी यमुना ने यम को भोजन कराया।

श्लोक 49 (skanda.2.108.49)

भुक्त्वा यमोऽपि भगिनीमलंकारैः समर्चयत् । नानावस्त्रैस्ततः प्राह वरं वरय भामिनि । इति तद्वचनं श्रुत्वा यमुना वाक्यमब्रवीत्

bhuktvā yamo'pi bhaginīmalaṁkāraiḥ samarcayat nānāvastraistataḥ prāha varaṁ varaya bhāmini iti tadvacanaṁ śrutvā yamunā vākyamabravīt

भोजन करके यम ने भी अपनी बहन को आभूषणों और विविध वस्त्रों से सम्मानित किया, और फिर कहा — "हे भामिनी, वर माँगो।" इस वचन को सुनकर यमुना ने कहा —

श्लोक 50 (skanda.2.108.50)

यमुनोवाच । प्रतिवर्षं समागच्छ भोजनार्थं तु मद्गृहे

yamunovāca prativarṣaṁ samāgaccha bhojanārthaṁ tu madgṛhe

यमुना ने कहा — "प्रतिवर्ष भोजन के लिए मेरे घर आना।

श्लोक 51 (skanda.2.108.51)

अद्य सर्वे मोचनीयाः पापिनो नरकाद्यम । येऽद्यैव भगिनीहस्तात्करिष्यंति च भोजनम् । तेषां सौख्यं प्रदेहि त्वमेतदेव वृणोम्यहम्

adya sarve mocanīyāḥ pāpino narakādyama ye'dyaiva bhaginīhastātkariṣyaṁti ca bhojanam teṣāṁ saukhyaṁ pradehi tvametadeva vṛṇomyaham

आज सभी पापी नरक से मुक्त हों, हे यम। जो आज ही बहन के हाथ से भोजन करेंगे, उन्हें सुख प्रदान करो — यही मैं माँगती हूँ।"

श्लोक 52 (skanda.2.108.52)

यम उवाच । यमुनायां तु यः स्नात्वा संतर्प्य पितृदेवताः

yama uvāca yamunāyāṁ tu yaḥ snātvā saṁtarpya pitṛdevatāḥ

यम ने कहा — "जो यमुना में स्नान करके, पितरों और देवताओं का तर्पण करके,

श्लोक 53 (skanda.2.108.53)

भुंक्ते च भगिनीगेहे भगिनीं पूजयेदपि । कदाचिदपि मद्वारं न स पश्यति भानुजे

bhuṁkte ca bhaginīgehe bhaginīṁ pūjayedapi kadācidapi madvāraṁ na sa paśyati bhānuje

बहन के घर भोजन करता है तथा बहन का पूजन भी करता है — हे भानुजे, वह मनुष्य कभी भी मेरे द्वार को नहीं देखता।"

श्लोक 54 (skanda.2.108.54)

वीरेशैशानदिग्भागे यमतीर्थं प्रकीर्तितम् । तत्र स्नात्वा च विधिवत्संतर्प्य पितृदेवताः

vīreśaiśānadigbhāge yamatīrthaṁ prakīrtitam tatra snātvā ca vidhivatsaṁtarpya pitṛdevatāḥ

वीरेश्वर के ईशान दिशा भाग में यम-तीर्थ प्रसिद्ध है। वहाँ स्नान करके तथा विधिपूर्वक पितरों और देवताओं का तर्पण करके,

श्लोक 55 (skanda.2.108.55)

पठेदेतानि नामानि आमध्याह्नं नरोत्तमः । सूर्यस्याभिमुखो मौनी हृतचित्तः स्थिरासनः

paṭhedetāni nāmāni āmadhyāhnaṁ narottamaḥ sūryasyābhimukho maunī hṛtacittaḥ sthirāsanaḥ

श्रेष्ठ पुरुष को मध्याह्न तक ये नाम पढ़ने चाहिए, सूर्य के सम्मुख, मौन रहकर, चित्त को एकाग्र करके, स्थिर आसन में बैठकर —

श्लोक 56 (skanda.2.108.56)

यमो निहंता पितृधर्मराजो वैवस्वतो दंडधरश्च कालः । भूताधिपो दत्तकृतानुसारी कृतांतमेतद्दशभिर्जपंति

yamo nihaṁtā pitṛdharmarājo vaivasvato daṁḍadharaśca kālaḥ bhūtādhipo dattakṛtānusārī kṛtāṁtametaddaśabhirjapaṁti

"यम, निहंता, पितृ, धर्मराज, वैवस्वत, दंडधर, काल, भूताधिप, दत्तकृतानुसारी, कृतांत" — ये दस नाम जपते हैं।

श्लोक 57 (skanda.2.108.57)

ततो यमेश्वरं पूज्य भगिनीगृहमाव्रजेत् । मंत्रेणाऽनेन च तया भोजितः पूर्वमादरात्

tato yameśvaraṁ pūjya bhaginīgṛhamāvrajet maṁtreṇā'nena ca tayā bhojitaḥ pūrvamādarāt

तत्पश्चात् यमेश्वर की पूजा करके बहन के घर जाना चाहिए; वहाँ पहले उसके द्वारा इस मंत्र के साथ आदरपूर्वक भोजन कराया जाता है —

श्लोक 58 (skanda.2.108.58)

भ्रातस्तवानुजाताऽहं भुंक्ष्व भक्तमिदं शुभम् । प्रीतये यमराजस्य यमुनाया विशेषतः

bhrātastavānujātā'haṁ bhuṁkṣva bhaktamidaṁ śubham prītaye yamarājasya yamunāyā viśeṣataḥ

"हे भाई, मैं तुम्हारी छोटी बहन, यह शुभ भोजन ग्रहण करो; यह यमराज तथा विशेषतः यमुना की प्रसन्नता के लिए है।"

श्लोक 59 (skanda.2.108.59)

ततः संतोष्य भगिनीं वस्त्रालंकरणादिभिः । स्वप्नेऽपि यमलोकस्य भविष्यति न दर्शनम्

tataḥ saṁtoṣya bhaginīṁ vastrālaṁkaraṇādibhiḥ svapne'pi yamalokasya bhaviṣyati na darśanam

तत्पश्चात् वस्त्र-आभूषण आदि से बहन को संतुष्ट करके — स्वप्न में भी यमलोक का दर्शन नहीं होगा।

श्लोक 60 (skanda.2.108.60)

नृपैः कारागृहे ये च स्थापिता मम वासरे । अवश्यं ते प्रेषणीया भोजनार्थं स्वसुर्गृहे

nṛpaiḥ kārāgṛhe ye ca sthāpitā mama vāsare avaśyaṁ te preṣaṇīyā bhojanārthaṁ svasurgṛhe

"राजाओं द्वारा जो मेरे दिन कारागार में बंद किए गए हैं, उन्हें अवश्य भोजन के लिए बहन के घर भेजा जाना चाहिए।

श्लोक 61 (skanda.2.108.61)

विमोक्तव्या मया पापा नरकेभ्योऽद्य वासरे । येऽद्य बंदी करिष्यंति ते ताड्या मम सर्वथा

vimoktavyā mayā pāpā narakebhyo'dya vāsare ye'dya baṁdī kariṣyaṁti te tāḍyā mama sarvathā

आज मेरे द्वारा पापी लोग नरक से अवश्य मुक्त किए जाने चाहिए; जो आज किसी को बंदी बनाएगा, वह मेरे द्वारा सर्वथा दंडित होगा।"

श्लोक 62 (skanda.2.108.62)

कनीयसी स्वसा नास्ति तदा ज्येष्ठागृहं व्रजेत् । तदभावे सपत्यायाः पितृव्यजागृहे ततः

kanīyasī svasā nāsti tadā jyeṣṭhāgṛhaṁ vrajet tadabhāve sapatyāyāḥ pitṛvyajāgṛhe tataḥ

यदि छोटी बहन न हो, तो बड़ी बहन के घर जाना चाहिए; उसके अभाव में, सौतेली माँ की बहन की बेटी के घर,

श्लोक 63 (skanda.2.108.63)

तदभावे मातृष्वसुर्मातुलस्याऽऽत्मजा तथा । सापत्नगोत्रसंबंधैः कल्पयेदथवा क्रमम्

tadabhāve mātṛṣvasurmātulasyā''tmajā tathā sāpatnagotrasaṁbaṁdhaiḥ kalpayedathavā kramam

उसके भी अभाव में मौसी की बेटी या मामा की बेटी के घर; अथवा विवाह-संबंध या गोत्र-संबंध के क्रम से व्यवस्था करनी चाहिए।

श्लोक 64 (skanda.2.108.64)

सर्वाऽभावे माननीया भगिनी काचिदेव हि । गोनद्याद्यथवा तस्या अभावे सति कारयेत्

sarvā'bhāve mānanīyā bhaginī kācideva hi gonadyādyathavā tasyā abhāve sati kārayet

इन सबके अभाव में किसी भी स्त्री को बहन मानकर सम्मान देना चाहिए; उसके भी अभाव में गाय या नदी को बहन मानकर यह विधि करनी चाहिए।

श्लोक 65 (skanda.2.108.65)

तदभावेप्यरण्यानीं कल्पयित्वा सहोदराम् । अस्यां निजगृहे देवि न भोक्तव्यं कदाचन

tadabhāvepyaraṇyānīṁ kalpayitvā sahodarām asyāṁ nijagṛhe devi na bhoktavyaṁ kadācana

उसके भी अभाव में वन-देवी को बहन मानकर यह करना चाहिए। हे देवी, इस दिन अपने घर में कभी भोजन नहीं करना चाहिए।

श्लोक 66 (skanda.2.108.66)

ये भुंजते दुराचारा नरके ते पतंति च । एवमुक्त्वा धर्मराजो ययौ संयमिनीं ततः

ye bhuṁjate durācārā narake te pataṁti ca evamuktvā dharmarājo yayau saṁyaminīṁ tataḥ

जो दुराचारी इस दिन अपने घर भोजन करते हैं, वे नरक में गिरते हैं। ऐसा कहकर धर्मराज तत्पश्चात् अपनी नगरी संयमिनी को चले गए।

श्लोक 67 (skanda.2.108.67)

तस्मादृषिवराः सर्वे कार्तिकव्रतकारिणः । भुंजते भगिनीहस्तात्सत्यं सत्यं न संशयः

tasmādṛṣivarāḥ sarve kārtikavratakāriṇaḥ bhuṁjate bhaginīhastātsatyaṁ satyaṁ na saṁśayaḥ

इसलिए कार्तिक-व्रत करने वाले सभी श्रेष्ठ ऋषि बहन के हाथ से ही भोजन करते हैं — यह सत्य है, सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 68 (skanda.2.108.68)

यमद्वितीयां यः प्राप्य भगिनीगृहभोजनम् । न कुर्याद्वर्षजं पुण्यं नश्यतीति रवेः श्रुतिः

yamadvitīyāṁ yaḥ prāpya bhaginīgṛhabhojanam na kuryādvarṣajaṁ puṇyaṁ naśyatīti raveḥ śrutiḥ

जो यमद्वितीया को पाकर बहन के घर भोजन नहीं करता, उसका वर्षभर का अर्जित पुण्य नष्ट हो जाता है — यह सूर्य से सुना गया वचन है।

श्लोक 69 (skanda.2.108.69)

या तु भोजयते नारी भ्रातरं भ्रातृके तिथौ । अर्चयेच्चाऽपि तांबूलैर्न सा वैधव्यमाप्नुयात्

yā tu bhojayate nārī bhrātaraṁ bhrātṛke tithau arcayeccā'pi tāṁbūlairna sā vaidhavyamāpnuyāt

जो स्त्री भ्रातृ-तिथि को अपने भाई को भोजन कराती है तथा उसे तांबूल से भी सम्मानित करती है, वह कभी वैधव्य को प्राप्त नहीं होती।

श्लोक 70 (skanda.2.108.70)

भ्रातुरायुःक्षयो नूनं न भवेत्तत्र कर्हिचित् । अपराह्नव्यापिनी सा द्वितीया भ्रातृभोजने

bhrāturāyuḥkṣayo nūnaṁ na bhavettatra karhicit aparāhnavyāpinī sā dvitīyā bhrātṛbhojane

उसके भाई की आयु का क्षय कभी नहीं होता। वह द्वितीया, भाई के भोजन के लिए अपराह्न तक व्याप्त मानी जाती है।

श्लोक 71 (skanda.2.108.71)

अज्ञानाद्यदि वा मोहान्न भुक्तं भगिनीगृहे । प्रवासिना ह्यभावाद्वा ज्वरितेनाऽथ बंदिना

ajñānādyadi vā mohānna bhuktaṁ bhaginīgṛhe pravāsinā hyabhāvādvā jvaritenā'tha baṁdinā

यदि अज्ञान या मोह से बहन के घर भोजन न हो सका हो, अथवा परदेश में होने से, बुखार से अथवा बंदी होने से भोजन न हो सका हो,

श्लोक 72 (skanda.2.108.72)

एतदाख्यानकं श्रुत्वा भोजनस्य फलं भवेत् । कार्तिके तु विशेषेण धात्रीछायां समाश्रितः । भोजनं कुरुते यस्तु स वैकुंठमवाप्नुयात्

etadākhyānakaṁ śrutvā bhojanasya phalaṁ bhavet kārtike tu viśeṣeṇa dhātrīchāyāṁ samāśritaḥ bhojanaṁ kurute yastu sa vaikuṁṭhamavāpnuyāt

तो यह कथा सुनने से ही भोजन का फल प्राप्त हो जाता है। जो कार्तिक में विशेष रूप से धात्री वृक्ष की छाया का आश्रय लेकर वहाँ भोजन करता है, वह वैकुण्ठ को प्राप्त होता है।

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