वैष्णव खण्ड · अध्याय 109
धात्रीमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.2.109.1)
शौनक उवाच । कार्तिकस्य च माहात्म्यं महत्पुण्यफलप्रदम् । कदा धात्री समुत्पन्ना कथं सा ख्यातिमागता
śaunaka uvāca kārtikasya ca māhātmyaṁ mahatpuṇyaphalapradam kadā dhātrī samutpannā kathaṁ sā khyātimāgatā
शौनक ने कहा — कार्तिक का माहात्म्य महान् पुण्यफल देने वाला बताया गया; धात्री (आँवला) कब उत्पन्न हुई और कैसे वह प्रसिद्धि को प्राप्त हुई?
श्लोक 2 (skanda.2.109.2)
कस्मादियं पवित्रा च कस्मात्पापप्रणाशिनी । आमर्दकी कृता केन कथयस्वात्र विस्तरात्
kasmādiyaṁ pavitrā ca kasmātpāpapraṇāśinī āmardakī kṛtā kena kathayasvātra vistarāt
यह क्यों पवित्र है, तथा क्यों पापों का नाश करने वाली है? इसे "आमर्दकी" किसने बनाया? यह विस्तार से बताइए।
श्लोक 3 (skanda.2.109.3)
सूत उवाच । कथयामि द्विजश्रेष्ठ यथा चेयं हि पुण्यदा । ऊर्जशुक्लचतुर्दश्यां धात्रीपूजां समाचरेत्
sūta uvāca kathayāmi dvijaśreṣṭha yathā ceyaṁ hi puṇyadā ūrjaśuklacaturdaśyāṁ dhātrīpūjāṁ samācaret
सूत ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ, मैं बताता हूँ कि यह किस प्रकार पुण्यदायक है। ऊर्ज (कार्तिक) की शुक्ल चतुर्दशी को धात्री-पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.2.109.4)
आमर्दकीमहावृक्षः सर्वपापप्रणाशनः । वैकुण्ठाख्यचतुर्दश्यां धात्रीछायां गतो नरः
āmardakīmahāvṛkṣaḥ sarvapāpapraṇāśanaḥ vaikuṇṭhākhyacaturdaśyāṁ dhātrīchāyāṁ gato naraḥ
आमर्दकी नामक महान् वृक्ष सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाला है। वैकुण्ठ नामक चतुर्दशी को धात्री की छाया में जाने वाला मनुष्य,
श्लोक 5 (skanda.2.109.5)
पूजयेत्तत्र देवेशं राधया सहितं हरिम् । प्रदक्षिणां ततः कुर्याच्छतमष्टोत्तरं तथा
pūjayettatra deveśaṁ rādhayā sahitaṁ harim pradakṣiṇāṁ tataḥ kuryācchatamaṣṭottaraṁ tathā
वहाँ राधा सहित देवेश हरि की पूजा करे; तत्पश्चात् एक सौ आठ बार प्रदक्षिणा करे।
श्लोक 6 (skanda.2.109.6)
सुवर्णरजतैर्वापि फलैरामलकैस्तथा । शतमष्टोत्तरं कुर्यादेकैकेन प्रदक्षिणाम्
suvarṇarajatairvāpi phalairāmalakaistathā śatamaṣṭottaraṁ kuryādekaikena pradakṣiṇām
सोने, चाँदी अथवा आँवले के फलों से भी, एक-एक करके एक सौ आठ प्रदक्षिणाएँ करनी चाहिए।
श्लोक 7 (skanda.2.109.7)
साष्टांगं प्रणतो भूत्वा प्रार्थयेत्परमेश्वरम् । धात्रीछायां समाश्रित्य शृणुयाच्च कथामिमाम्
sāṣṭāṁgaṁ praṇato bhūtvā prārthayetparameśvaram dhātrīchāyāṁ samāśritya śṛṇuyācca kathāmimām
साष्टांग प्रणाम करके परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए; धात्री की छाया का आश्रय लेकर यह कथा सुननी चाहिए।
श्लोक 8 (skanda.2.109.8)
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्यथाशक्त्या च दक्षिणाम् । ब्राह्मणेषु च तुष्टेषु तुष्टो मोक्षप्रदो हरिः । अत्र ते कथयिष्यामि कथां पुण्यफलप्रदाम् । आमर्दकीफलं वक्तुं ब्रह्मा चाऽपि न पार्यते
brāhmaṇānbhojayetpaścādyathāśaktyā ca dakṣiṇām brāhmaṇeṣu ca tuṣṭeṣu tuṣṭo mokṣaprado hariḥ atra te kathayiṣyāmi kathāṁ puṇyaphalapradām āmardakīphalaṁ vaktuṁ brahmā cā'pi na pāryate
तत्पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराकर, अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए। ब्राह्मणों के संतुष्ट होने पर मोक्षदाता हरि संतुष्ट होते हैं। यहाँ मैं तुम्हें पुण्यफल देने वाली कथा सुनाऊँगा; आमर्दकी के फल का वर्णन तो स्वयं ब्रह्मा भी नहीं कर सकते।
श्लोक 9 (skanda.2.109.9)
एकार्णवे पुरा जाते नष्टे स्थावरजंगमे । नष्टे देवाऽसुरगणे प्रणष्टोरगराक्षसे
ekārṇave purā jāte naṣṭe sthāvarajaṁgame naṣṭe devā'suragaṇe praṇaṣṭoragarākṣase
पूर्वकाल में जब एकार्णव उत्पन्न हुआ था, जब चराचर सब नष्ट हो गया था, जब देव-असुर गण नष्ट हो गए थे, तथा नाग-राक्षस भी नष्ट हो गए थे,
श्लोक 10 (skanda.2.109.10)
तत्र देवाधिदेवेशः परमात्मा सनातनः । जजाप ब्रह्म परममात्मनः परमाव्ययम्
tatra devādhideveśaḥ paramātmā sanātanaḥ jajāpa brahma paramamātmanaḥ paramāvyayam
तब वहाँ देवाधिदेव, सनातन परमात्मा ने परम अव्यय ब्रह्म का जप किया।
श्लोक 11 (skanda.2.109.11)
ततोऽस्य ब्रह्म जपतो निरगाच्छ्वसितं पुरः । तद्दर्शनाऽनुरागेण नेत्राभ्यामगमज्जलम्
tato'sya brahma japato niragācchvasitaṁ puraḥ taddarśanā'nurāgeṇa netrābhyāmagamajjalam
तत्पश्चात् ब्रह्म का जप करते हुए उनसे एक श्वास बाहर निकला; उस दर्शन के प्रेम से उनकी दोनों आँखों से जल आया।
श्लोक 12 (skanda.2.109.12)
प्रेमाश्रुभरनिर्भिन्नो भूमौ बिंदुः पपात सः । तस्माद्बिंदो समुत्पन्नः स्वयं धात्री नगो महान्
premāśrubharanirbhinno bhūmau biṁduḥ papāta saḥ tasmādbiṁdo samutpannaḥ svayaṁ dhātrī nago mahān
प्रेम के आँसुओं के भार से भरा हुआ वह बिंदु भूमि पर गिरा; उसी बिंदु से स्वयं महान् वृक्ष धात्री उत्पन्न हुआ।
श्लोक 13 (skanda.2.109.13)
शाखाप्रशाखाबहुलः फलभारेण पीडितः । सर्वेषामेव वृक्षाणामादिरोहः प्रकीर्तितः
śākhāpraśākhābahulaḥ phalabhāreṇa pīḍitaḥ sarveṣāmeva vṛkṣāṇāmādirohaḥ prakīrtitaḥ
शाखाओं और उपशाखाओं से भरपूर, फलों के भार से दबा हुआ, यह सम्पूर्ण वृक्षों में सबसे पहले उगा हुआ वृक्ष कहा गया है।
श्लोक 14 (skanda.2.109.14)
ब्रह्मा तमसृजत्पूर्वं तत्पश्चाच्चाऽसृजत्प्रजाः । देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगान्
brahmā tamasṛjatpūrvaṁ tatpaścāccā'sṛjatprajāḥ devadānavagandharvayakṣarākṣasapannagān
ब्रह्माजी ने पहले इसे उत्पन्न किया, तत्पश्चात् उन्होंने प्रजाओं को उत्पन्न किया — देव, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस तथा सर्प,
श्लोक 15 (skanda.2.109.15)
असृजद्भगवान्देवो मानुषांश्च तथामलान् । आजग्मुस्तत्र देवास्ते यत्र धात्री हरिप्रिया
asṛjadbhagavāndevo mānuṣāṁśca tathāmalān ājagmustatra devāste yatra dhātrī haripriyā
तथा भगवान् देव ने मनुष्यों को भी, निर्मल रूप में उत्पन्न किया। वे देवता वहाँ आए, जहाँ हरि की प्रिय धात्री थी।
श्लोक 16 (skanda.2.109.16)
तां दृष्ट्वा ते महाभागाः परमं विस्मयं गताः । न जानीम इमं वृक्षं चिंतयन्तो मुहुर्मुहुः
tāṁ dṛṣṭvā te mahābhāgāḥ paramaṁ vismayaṁ gatāḥ na jānīma imaṁ vṛkṣaṁ ciṁtayanto muhurmuhuḥ
उसे देखकर वे महाभाग परम आश्चर्य को प्राप्त हुए; बार-बार विचार करते हुए वे बोले — "हम इस वृक्ष को नहीं जानते।"
श्लोक 17 (skanda.2.109.17)
एवं चिंतयतां तेषां वागुवाचाऽशरीरिणी । आमर्दकी नगो ह्येष प्रवरो वैष्णवो यतः
evaṁ ciṁtayatāṁ teṣāṁ vāguvācā'śarīriṇī āmardakī nago hyeṣa pravaro vaiṣṇavo yataḥ
इस प्रकार उनके विचार करते समय एक अशरीरी वाणी बोली — "यह वृक्ष आमर्दकी है, जो श्रेष्ठ है, क्योंकि यह विष्णु का है।
श्लोक 18 (skanda.2.109.18)
अस्य वै स्मरणादेव लभेद्गोदानजं फलम् । दर्शनाद्द्विगुणं पुण्यं त्रिगुणं भक्षणात्तथा
asya vai smaraṇādeva labhedgodānajaṁ phalam darśanāddviguṇaṁ puṇyaṁ triguṇaṁ bhakṣaṇāttathā
इसके केवल स्मरण से ही गोदान का फल प्राप्त होता है; दर्शन से दुगुना पुण्य, तथा भक्षण से तिगुना पुण्य प्राप्त होता है,
श्लोक 19 (skanda.2.109.19)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सेव्या आमर्दकी सदा । सर्वपापहरा प्रोक्ता वैष्णवी पापनाशिनी
tasmātsarvaprayatnena sevyā āmardakī sadā sarvapāpaharā proktā vaiṣṇavī pāpanāśinī
इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से आमर्दकी की सदा सेवा करनी चाहिए। यह सम्पूर्ण पापों का हरण करने वाली, विष्णु की, पाप का नाश करने वाली कही गई है।
श्लोक 20 (skanda.2.109.20)
तस्या मूले स्थितो विष्णुस्तदूर्ध्वं च पितामहः । स्कन्धे च भगवान्रुद्रः संस्थितः परमेश्वरः
tasyā mūle sthito viṣṇustadūrdhvaṁ ca pitāmahaḥ skandhe ca bhagavānrudraḥ saṁsthitaḥ parameśvaraḥ
इसकी जड़ में विष्णु विराजमान हैं, उसके ऊपर पितामह ब्रह्मा; तथा तने में भगवान् परमेश्वर रुद्र विराजमान हैं।
श्लोक 21 (skanda.2.109.21)
शाखासु सवितारश्च प्रशाखासु च देवताः । पर्णेषु देवताः संति पुष्पेषु मरुतस्तथा
śākhāsu savitāraśca praśākhāsu ca devatāḥ parṇeṣu devatāḥ saṁti puṣpeṣu marutastathā
शाखाओं में आदित्यगण तथा उपशाखाओं में अन्य देवता विराजमान हैं; पत्तों में देवता हैं, तथा फूलों में मरुद्गण,
श्लोक 22 (skanda.2.109.22)
प्रजानां पतयः सर्वे फलेष्वेवं व्यवस्थिताः । सर्वदेवमयी ह्येषा धात्री वै कथिता मया
prajānāṁ patayaḥ sarve phaleṣvevaṁ vyavasthitāḥ sarvadevamayī hyeṣā dhātrī vai kathitā mayā
तथा प्रजापतिगण फलों में इस प्रकार विराजमान हैं। यह धात्री, मेरे द्वारा कहा गया, सर्वदेवमयी है।
श्लोक 23 (skanda.2.109.23)
अतः सा पूजनीया च सर्वकामार्थसिद्धये । एकदा नारदो योगी ब्रह्मणः पुरतः स्थितः । नमस्कृत्वा जगन्नाथं पप्रच्छातीव विस्मितः
ataḥ sā pūjanīyā ca sarvakāmārthasiddhaye ekadā nārado yogī brahmaṇaḥ purataḥ sthitaḥ namaskṛtvā jagannāthaṁ papracchātīva vismitaḥ
इसलिए यह सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि के लिए पूजनीय है। एक बार योगी नारद ब्रह्माजी के सम्मुख खड़े होकर,
श्लोक 24 (skanda.2.109.24)
श्रीनारद उवाच । यथा प्रियं सुतुलसीकाननं सर्वदा हरेः । तथा धात्रीवनं मासे कार्तिके श्रीहरिप्रियम्
śrīnārada uvāca yathā priyaṁ sutulasīkānanaṁ sarvadā hareḥ tathā dhātrīvanaṁ māse kārtike śrīharipriyam
जगन्नाथ को नमस्कार करके अत्यंत विस्मित होकर पूछने लगे।
श्लोक 25 (skanda.2.109.25)
ब्रह्मोवाच । धात्रीवने हरेः पूजा धात्री छायासु भोजनम् । कार्तिके मासि यः कुर्यात्तस्य पापं विनश्यति
brahmovāca dhātrīvane hareḥ pūjā dhātrī chāyāsu bhojanam kārtike māsi yaḥ kuryāttasya pāpaṁ vinaśyati
श्रीनारद ने कहा — जिस प्रकार सुंदर तुलसी-वन हरि को सदा प्रिय है, उसी प्रकार कार्तिक मास में धात्री-वन भी श्रीहरि को प्रिय है।
श्लोक 26 (skanda.2.109.26)
तीर्थानि मुनयो देवा यज्ञाः सर्वेऽपि कार्तिके । नित्यं धात्रीं समाश्रित्य तिष्ठंत्यर्के तुलास्थिते
tīrthāni munayo devā yajñāḥ sarve'pi kārtike nityaṁ dhātrīṁ samāśritya tiṣṭhaṁtyarke tulāsthite
ब्रह्माजी ने कहा — जो कार्तिक मास में धात्री-वन में हरि की पूजा करता है तथा धात्री की छाया में भोजन करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है।
श्लोक 27 (skanda.2.109.27)
यत्किंचित्कुरुते पुण्यं धात्रीछायासु मानवः । तत्कोटिगुणितं भूयान्नाऽत्र कार्या विचारणा
yatkiṁcitkurute puṇyaṁ dhātrīchāyāsu mānavaḥ tatkoṭiguṇitaṁ bhūyānnā'tra kāryā vicāraṇā
तीर्थ, मुनि, देवता तथा सभी यज्ञ, कार्तिक में, सूर्य के तुला राशि में रहते समय, नित्य धात्री का आश्रय लेकर विराजते हैं।
श्लोक 28 (skanda.2.109.28)
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अयोध्यानगरे कश्चिद्वैश्यश्चासीद्विजोत्तम । पुत्रदारविहीनश्च दैवाद्दारिद्र्यपीडितः
atraivodāharantīmamitihāsaṁ purātanam ayodhyānagare kaścidvaiśyaścāsīdvijottama putradāravihīnaśca daivāddāridryapīḍitaḥ
मनुष्य धात्री की छाया में जो भी पुण्य करता है, वह करोड़ गुना अधिक हो जाता है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 29 (skanda.2.109.29)
भिक्षया चोदराग्निं स शमयामास नारद । कदाचिद्वणिजो वैश्यो ययाचे क्षुत्प्रपीडितः
bhikṣayā codarāgniṁ sa śamayāmāsa nārada kadācidvaṇijo vaiśyo yayāce kṣutprapīḍitaḥ
इस विषय में एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है — अयोध्या नगर में, हे द्विजोत्तम, एक वैश्य था, जो पुत्र-पत्नी से रहित तथा दैववश दरिद्रता से पीड़ित था।
श्लोक 30 (skanda.2.109.30)
भिक्षाप्तचणकान्गृह्य धात्रीछायामगात्किल । तत्र तान्भक्षयामास कार्तिके मासि नारद
bhikṣāptacaṇakāngṛhya dhātrīchāyāmagātkila tatra tānbhakṣayāmāsa kārtike māsi nārada
हे नारद, वह भिक्षा से अपने पेट की आग शांत करता था। एक बार वह भूख से पीड़ित वैश्य व्यापारी भिक्षा माँगने निकला,
श्लोक 31 (skanda.2.109.31)
केचिदुर्वरितास्तेपु चणकास्तत्र नारद । वैश्येन तेन दत्ता हि क्षुत्क्षामाय द्विजातये
kecidurvaritāstepu caṇakāstatra nārada vaiśyena tena dattā hi kṣutkṣāmāya dvijātaye
और भिक्षा में प्राप्त चने लेकर धात्री की छाया में गया। हे नारद, वहाँ उसने कार्तिक मास में उन्हें खाया।
श्लोक 32 (skanda.2.109.32)
तेन पुण्यप्रभावेन राजाऽऽसीद्धनिकः क्षितौ । तस्माद्दानं प्रकर्तव्यं कार्तिके मासि सर्वदा
tena puṇyaprabhāvena rājā''sīddhanikaḥ kṣitau tasmāddānaṁ prakartavyaṁ kārtike māsi sarvadā
हे नारद, उनमें से कुछ चने वहाँ बच गए, जो उस वैश्य ने भूख से क्षीण एक ब्राह्मण को दे दिए।
श्लोक 33 (skanda.2.109.33)
धात्रीवने मुनिश्रेष्ठ सर्वकामार्थसिद्धये । धात्रीछायां समाश्रित्य कार्तिके च हरेः कथाम् । यः शृणोति स पापेभ्यो मुच्यते द्विजसूनुवत्
dhātrīvane muniśreṣṭha sarvakāmārthasiddhaye dhātrīchāyāṁ samāśritya kārtike ca hareḥ kathām yaḥ śṛṇoti sa pāpebhyo mucyate dvijasūnuvat
उस पुण्य के प्रभाव से वह पृथ्वी पर एक धनी राजा बन गया। इसलिए कार्तिक मास में सदा दान करना चाहिए।
श्लोक 34 (skanda.2.109.34)
नारद उवाच । कोऽभूद्द्विजसुतो ब्रह्मन्किं पापं कृतवान्पुरा । तस्य जाता कथं मुक्तिरेतद्विस्तरतो वद
nārada uvāca ko'bhūddvijasuto brahmankiṁ pāpaṁ kṛtavānpurā tasya jātā kathaṁ muktiretadvistarato vada
हे मुनिश्रेष्ठ, धात्री-वन में, सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि के लिए, धात्री की छाया का आश्रय लेकर, जो कार्तिक में हरि की कथा सुनता है, वह ब्राह्मण-पुत्र के समान पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 35 (skanda.2.109.35)
ब्रह्मोवाच । पुरा द्विजवरश्चासीत्कावेर्या उत्तरे तटे
brahmovāca purā dvijavaraścāsītkāveryā uttare taṭe
नारद ने कहा — हे ब्रह्मन्, वह ब्राह्मण-पुत्र कौन था, तथा पूर्वकाल में उसने कौन-सा पाप किया था? उसे मुक्ति कैसे मिली? यह विस्तार से बताइए।
श्लोक 36 (skanda.2.109.36)
देवशर्मेति विख्यातो वेदवेदांगपारगः । तस्य पुत्रो दुराचारस्तमाह च पिता हितम्
devaśarmeti vikhyāto vedavedāṁgapāragaḥ tasya putro durācārastamāha ca pitā hitam
ब्रह्माजी ने कहा — पूर्वकाल में कावेरी के उत्तर तट पर एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था,
श्लोक 37 (skanda.2.109.37)
इदानीं कार्तिको मासो वर्तते हरिवल्लभः । तत्र स्नानं च दानं च व्रतानि नियमान्कुरु
idānīṁ kārtiko māso vartate harivallabhaḥ tatra snānaṁ ca dānaṁ ca vratāni niyamānkuru
जो देवशर्मा नाम से विख्यात, वेद-वेदांगों में पारंगत था। उसका पुत्र दुराचारी था; पिता ने उसे हितकारी बात कही —
श्लोक 38 (skanda.2.109.38)
तुलसीपुष्पसहितां कुरुपूजां हरेः सुत । दीपदानं च विविधं नमस्कारं प्रदक्षिणाम्
tulasīpuṣpasahitāṁ kurupūjāṁ hareḥ suta dīpadānaṁ ca vividhaṁ namaskāraṁ pradakṣiṇām
"अभी हरि को प्रिय कार्तिक मास चल रहा है; उसमें स्नान, दान, व्रत तथा नियम करो।
श्लोक 39 (skanda.2.109.39)
एवं पितुर्वचः श्रुत्वा पुत्रः क्रोधसमन्वितः । पितरं प्राह दुष्टात्मा चलदोष्ठो विनिंदयन्
evaṁ piturvacaḥ śrutvā putraḥ krodhasamanvitaḥ pitaraṁ prāha duṣṭātmā caladoṣṭho viniṁdayan
हे पुत्र, तुलसी-पुष्प सहित हरि की पूजा करो, तथा विविध दीपदान, नमस्कार और प्रदक्षिणा भी करो।"
श्लोक 40 (skanda.2.109.40)
पुत्र उवाच । न करिष्याम्यहं तात कार्तिके पुण्यसंग्रहम् । इति पुत्रवचः श्रुत्वा सक्रोधः प्राह तं सुतम्
putra uvāca na kariṣyāmyahaṁ tāta kārtike puṇyasaṁgraham iti putravacaḥ śrutvā sakrodhaḥ prāha taṁ sutam
इस प्रकार पिता का वचन सुनकर पुत्र क्रोध से भर गया; उस दुष्टात्मा ने काँपते होंठों से निंदा करते हुए पिता से कहा —
श्लोक 41 (skanda.2.109.41)
मूषको भव दुर्बुद्धे वने वृक्षस्य कोटरे । इति शापभयाद्भीतो नत्वा पितरमब्रवीत्
mūṣako bhava durbuddhe vane vṛkṣasya koṭare iti śāpabhayādbhīto natvā pitaramabravīt
पुत्र ने कहा — "हे तात, मैं कार्तिक में पुण्य-संग्रह नहीं करूँगा।" पुत्र के इस वचन को सुनकर, क्रोधित होकर उन्होंने उस पुत्र से कहा —
श्लोक 42 (skanda.2.109.42)
दुर्योनेर्मम मुक्तिः स्यात्कथं तद्वद मे गुरो । इति प्रसादितो विप्रः प्राह निष्कृतिकारणम्
duryonermama muktiḥ syātkathaṁ tadvada me guro iti prasādito vipraḥ prāha niṣkṛtikāraṇam
"हे दुर्बुद्धे, वन में वृक्ष की कोटर में चूहा बन जाओ!" इस शाप के भय से भयभीत होकर वह पिता को नमन करके बोला —
श्लोक 43 (skanda.2.109.43)
यदोर्ज्जव्रतजं पुण्यं शृणोषि हरिवल्लभम् । तदा ते भविता मुक्तिस्तत्कथाश्रवणात्सुत
yadorjjavratajaṁ puṇyaṁ śṛṇoṣi harivallabham tadā te bhavitā muktistatkathāśravaṇātsuta
"मुझे इस दुर्योनि से मुक्ति कैसे मिलेगी, हे गुरो, वह बताइए।" इस प्रकार प्रसन्न किए जाने पर विप्र ने मुक्ति का उपाय बताया —
श्लोक 44 (skanda.2.109.44)
स पित्रा चैवमुक्तस्तु तत्क्षणान्मूषकोऽभवत् । बहुवर्षसहस्राणि गह्वरे विपिने वसन्
sa pitrā caivamuktastu tatkṣaṇānmūṣako'bhavat bahuvarṣasahasrāṇi gahvare vipine vasan
"जब तुम ऊर्ज-व्रत से उत्पन्न, हरि को प्रिय पुण्य को सुनोगे, तब, हे पुत्र, उस कथा-श्रवण से तुम्हारी मुक्ति होगी।"
श्लोक 45 (skanda.2.109.45)
एकदा कार्तिके मासि विश्वामित्रः सशिष्यकः । स्नात्वा नद्यां हरिं चार्च्य धात्रीछायां समाश्रितः
ekadā kārtike māsi viśvāmitraḥ saśiṣyakaḥ snātvā nadyāṁ hariṁ cārcya dhātrīchāyāṁ samāśritaḥ
पिता द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह उसी क्षण चूहा बन गया, और बहुत हज़ार वर्षों तक वन की एक गुफा में रहा।
श्लोक 46 (skanda.2.109.46)
कथयामास माहात्म्यं शिष्येभ्यश्चोर्ज्जसंभवम् । तदा कश्चिद्दुराचारो व्याधोऽगान्मृगयां चरन्
kathayāmāsa māhātmyaṁ śiṣyebhyaścorjjasaṁbhavam tadā kaściddurācāro vyādho'gānmṛgayāṁ caran
एक बार कार्तिक मास में विश्वामित्र अपने शिष्यों सहित नदी में स्नान करके, हरि की पूजा करके, धात्री की छाया का आश्रय लेकर,
श्लोक 47 (skanda.2.109.47)
दृष्ट्वा ऋषिगणान्हंतुं कृतेच्छः प्राणिघातकः । तेषां दर्शनमात्रेण सुबुद्धिरभवत्तदा
dṛṣṭvā ṛṣigaṇānhaṁtuṁ kṛtecchaḥ prāṇighātakaḥ teṣāṁ darśanamātreṇa subuddhirabhavattadā
अपने शिष्यों को ऊर्ज से उत्पन्न माहात्म्य सुना रहे थे। तभी एक दुराचारी शिकारी शिकार करता हुआ आया,
श्लोक 48 (skanda.2.109.48)
अथोवाच द्विजान्नत्वा भवद्भिः क्रियतेऽत्र किम् । तेनैवमुक्तो विप्रेंद्रो विश्वामित्रस्तमब्रवीत्
athovāca dvijānnatvā bhavadbhiḥ kriyate'tra kim tenaivamukto vipreṁdro viśvāmitrastamabravīt
ऋषियों को देखकर उन्हें मारने की इच्छा रखने वाला वह प्राणीघातक — उन्हें देखते ही उसकी बुद्धि सुंदर हो गई।
श्लोक 49 (skanda.2.109.49)
विश्वामित्र उवाच । सर्वेषामेव मासानां कार्तिकः श्रेष्ठ उच्यते । तस्मिन्यत्क्रियते कर्म वर्धते वटबीजवत्
viśvāmitra uvāca sarveṣāmeva māsānāṁ kārtikaḥ śreṣṭha ucyate tasminyatkriyate karma vardhate vaṭabījavat
तत्पश्चात् उसने ब्राह्मणों को प्रणाम करके पूछा — "आप लोग यहाँ क्या कर रहे हैं?" इस प्रकार पूछे जाने पर विश्वामित्र ने उससे कहा —
श्लोक 50 (skanda.2.109.50)
कार्तिके मासि यः कुर्यात्स्नानं दानं च पूजनम् । विप्राणां भोजनं चैव तदक्षय्यफलं भवेत्
kārtike māsi yaḥ kuryātsnānaṁ dānaṁ ca pūjanam viprāṇāṁ bhojanaṁ caiva tadakṣayyaphalaṁ bhavet
विश्वामित्र ने कहा — "सम्पूर्ण महीनों में कार्तिक श्रेष्ठ कहा जाता है; उसमें जो कर्म किया जाता है, वह वट-बीज के समान बढ़ता है।
श्लोक 51 (skanda.2.109.51)
व्याधप्रयुक्तमाकर्ण्य धर्मं च ऋषिणा द्विजः । मौषकं देहमुत्सृज्य दिव्यदेहोऽभवत्तदा
vyādhaprayuktamākarṇya dharmaṁ ca ṛṣiṇā dvijaḥ mauṣakaṁ dehamutsṛjya divyadeho'bhavattadā
जो कार्तिक मास में स्नान, दान तथा पूजा करता है, और ब्राह्मणों को भोजन कराता है, वह अक्षय फल प्राप्त करता है।"
श्लोक 52 (skanda.2.109.52)
विश्वामित्रं प्रणम्याथ स्ववृत्तांतं निवेद्य च । अनुज्ञातोऽथ ऋषिणा विमानस्थो दिवं ययौ
viśvāmitraṁ praṇamyātha svavṛttāṁtaṁ nivedya ca anujñāto'tha ṛṣiṇā vimānastho divaṁ yayau
शिकारी द्वारा पूछे गए धर्म को ऋषि से सुनकर, वह ब्राह्मण चूहे के शरीर को त्यागकर उसी क्षण दिव्य शरीर वाला हो गया।
श्लोक 53 (skanda.2.109.53)
विस्मितो गाधिपुत्रस्तु व्याधश्चैव विशेषतः । व्याधोऽप्यूर्जव्रतं कृत्वा जगाम हरिमंदिरम्
vismito gādhiputrastu vyādhaścaiva viśeṣataḥ vyādho'pyūrjavrataṁ kṛtvā jagāma harimaṁdiram
विश्वामित्र को प्रणाम करके तथा अपना वृत्तांत बताकर, ऋषि द्वारा आज्ञा दिए जाने पर वह विमान पर बैठकर स्वर्ग को चला गया।
श्लोक 54 (skanda.2.109.54)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कार्तिके केशवाऽग्रतः । धात्रीछायां समाश्रित्य कथाश्रवणमाचरेत्
tasmātsarvaprayatnena kārtike keśavā'grataḥ dhātrīchāyāṁ samāśritya kathāśravaṇamācaret
गाधि-पुत्र विश्वामित्र आश्चर्यचकित हुए, तथा शिकारी विशेष रूप से; शिकारी ने भी ऊर्ज-व्रत करके हरि-मंदिर को प्राप्त किया।
श्लोक 55 (skanda.2.109.55)
मूषकोऽपि च दुर्योनेर्मुक्त ऊर्जकथाश्रुतेः । शृणुयाच्छ्रावयेद्यो वा मुक्तिभागी न संशयः
mūṣako'pi ca duryonermukta ūrjakathāśruteḥ śṛṇuyācchrāvayedyo vā muktibhāgī na saṁśayaḥ
इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से, कार्तिक में केशव के समक्ष, धात्री की छाया का आश्रय लेकर कथा-श्रवण करना चाहिए।
श्लोक 56 (skanda.2.109.56)
धात्रीछायां समाश्रित्य वनभोजनमाचरेत् । आदौ कृत्वा तथा स्नानमुदके वनसंस्थिते । कृत्वा कर्माणि नित्यानि माधवं पूजयेत्ततः
dhātrīchāyāṁ samāśritya vanabhojanamācaret ādau kṛtvā tathā snānamudake vanasaṁsthite kṛtvā karmāṇi nityāni mādhavaṁ pūjayettataḥ
चूहा भी ऊर्ज-कथा सुनने मात्र से दुर्योनि से मुक्त हुआ; जो इसे सुनता या सुनाता है, वह निश्चय ही मुक्ति का भागी होता है।
श्लोक 57 (skanda.2.109.57)
धात्रीछायां समाश्रित्य हरौ भक्तिसमन्वितः । शृणुयाच्च कथां दिव्यां मासमाहात्म्यशंसनीम्
dhātrīchāyāṁ samāśritya harau bhaktisamanvitaḥ śṛṇuyācca kathāṁ divyāṁ māsamāhātmyaśaṁsanīm
धात्री की छाया का आश्रय लेकर वन-भोजन करना चाहिए। पहले वन में स्थित जल में स्नान करके, नित्य कर्म करके, तत्पश्चात् माधव की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 58 (skanda.2.109.58)
ततस्तु ब्राह्मणान्भक्त्या भोजयेद्ब्रह्मवित्तमान् । ततो भुंजीत विप्रेंद्र स्वयं हरिमनुस्मरन्
tatastu brāhmaṇānbhaktyā bhojayedbrahmavittamān tato bhuṁjīta vipreṁdra svayaṁ harimanusmaran
धात्री की छाया का आश्रय लेकर, हरि में भक्ति से युक्त होकर, मास के माहात्म्य को कहने वाली दिव्य कथा सुननी चाहिए।
श्लोक 59 (skanda.2.109.59)
एवंकृते व्रते विप्र कार्तिके हरिवल्लभे । यत्पापं नश्यते पुत्र सावधानमना शृणु
evaṁkṛte vrate vipra kārtike harivallabhe yatpāpaṁ naśyate putra sāvadhānamanā śṛṇu
तत्पश्चात् ब्रह्मज्ञान में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिए; तत्पश्चात्, हे विप्रेन्द्र, स्वयं हरि का स्मरण करते हुए भोजन करना चाहिए।
श्लोक 60 (skanda.2.109.60)
हरेर्नार्पितभोगाच्च भोजने सूर्यदर्शनात् । रजस्वलावाक्छ्रवणपापाद्भोजनके तथा
harernārpitabhogācca bhojane sūryadarśanāt rajasvalāvākchravaṇapāpādbhojanake tathā
हे विप्र, इस प्रकार हरि को प्रिय कार्तिक में व्रत करने पर, हे पुत्र, कौन-सा पाप नष्ट होता है, वह सावधान मन से सुनो —
श्लोक 61 (skanda.2.109.61)
भोजनावसरे चान्यस्पर्शदोषस्तु यद्भवेत् । निषिद्धभोजनात्तस्माद्भोजने चाऽन्नदूषणात्
bhojanāvasare cānyasparśadoṣastu yadbhavet niṣiddhabhojanāttasmādbhojane cā'nnadūṣaṇāt
हरि को अर्पित न किए गए भोग को खाने से, भोजन करते समय सूर्य को देखने से, भोजन करते समय रजस्वला स्त्री की वाणी सुनने से,
श्लोक 62 (skanda.2.109.62)
शुद्धस्यापि तथा त्यागात्पुण्यकाले हरिप्रिये । एतैर्यत्साधितं पापं तत्सर्वं नश्यति धुवम्
śuddhasyāpi tathā tyāgātpuṇyakāle haripriye etairyatsādhitaṁ pāpaṁ tatsarvaṁ naśyati dhuvam
भोजन के समय अन्य किसी के स्पर्श का जो भी दोष हो, निषिद्ध भोजन करने से, तथा भोजन में अन्न-दूषण से,
श्लोक 63 (skanda.2.109.63)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन धात्र्यां भोजनमाचरेत् । कार्तिके मासि वै विप्रो धात्रीमालां तु यो वहेत् । तथैव तुलसीमालां तस्य पुण्यमनंतकम्
tasmātsarvaprayatnena dhātryāṁ bhojanamācaret kārtike māsi vai vipro dhātrīmālāṁ tu yo vahet tathaiva tulasīmālāṁ tasya puṇyamanaṁtakam
तथा हरि को प्रिय पुण्यकाल में शुद्धता के त्याग से भी — इनसे उत्पन्न जो भी पाप हो, वह सब निश्चय ही नष्ट हो जाता है।
श्लोक 64 (skanda.2.109.64)
धात्रीछायां समाश्रित्य दीपमालार्पणं नरः । करिष्यति विशेषेण तस्य पुण्यमनंतकम्
dhātrīchāyāṁ samāśritya dīpamālārpaṇaṁ naraḥ kariṣyati viśeṣeṇa tasya puṇyamanaṁtakam
इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से धात्री के नीचे भोजन करना चाहिए। कार्तिक मास में जो ब्राह्मण धात्री-माला तथा तुलसी-माला धारण करता है, उसका पुण्य अनंत होता है।
श्लोक 65 (skanda.2.109.65)
राधादामोदरौ पूज्यौ तुलस्यधो विशेषतः । तुलस्यभावे कर्तव्या पूजा धात्रीतले शुभा
rādhādāmodarau pūjyau tulasyadho viśeṣataḥ tulasyabhāve kartavyā pūjā dhātrītale śubhā
जो मनुष्य धात्री की छाया का आश्रय लेकर दीप-माला अर्पित करता है, उसका पुण्य विशेष रूप से अनंत होता है।
श्लोक 66 (skanda.2.109.66)
धात्रीछायातले येन सकृद्भुक्तं तु कार्तिके । दंपत्योर्भोजनं दत्तमन्नदोषात्प्रमुच्यते
dhātrīchāyātale yena sakṛdbhuktaṁ tu kārtike daṁpatyorbhojanaṁ dattamannadoṣātpramucyate
राधा-दामोदर विशेषतः तुलसी के नीचे पूजनीय हैं; तुलसी के अभाव में धात्री के नीचे शुभ पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 67 (skanda.2.109.67)
संपूर्णे कार्तिके यस्तु संपूज्यामलकीं शुभाम् । राधादामोदरप्रीत्यै भोजयित्वा च दंपती । पश्चात्स्वयं तु भुंजीत न श्रीस्तस्य क्षयं व्रजेत्
saṁpūrṇe kārtike yastu saṁpūjyāmalakīṁ śubhām rādhādāmodaraprītyai bhojayitvā ca daṁpatī paścātsvayaṁ tu bhuṁjīta na śrīstasya kṣayaṁ vrajet
जिसने कार्तिक में धात्री की छाया के नीचे एक बार भी भोजन किया हो, तथा एक दंपति को भोजन कराया हो, वह अन्न के दोष से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 68 (skanda.2.109.68)
यः कश्चिद्वैष्णवो लोके धत्ते धात्रीफलं मुने । प्रियो भवति देवानां मनुष्याणां च का कथा
yaḥ kaścidvaiṣṇavo loke dhatte dhātrīphalaṁ mune priyo bhavati devānāṁ manuṣyāṇāṁ ca kā kathā
जो सम्पूर्ण कार्तिक में शुभ आँवले की पूजा करके, राधा-दामोदर की प्रसन्नता के लिए एक दंपति को भोजन कराकर, तत्पश्चात् स्वयं भोजन करता है, उसकी लक्ष्मी कभी क्षीण नहीं होती।
श्लोक 69 (skanda.2.109.69)
धात्रीफलविलिप्तांगो धात्रीफलसमन्वितः । धात्रीफलकृताहारो नरो नारायणो भवेत्
dhātrīphalaviliptāṁgo dhātrīphalasamanvitaḥ dhātrīphalakṛtāhāro naro nārāyaṇo bhavet
हे मुने, इस लोक में जो भी वैष्णव धात्री का फल धारण करता है, वह देवताओं को प्रिय हो जाता है, फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या!
श्लोक 70 (skanda.2.109.70)
धात्रीफलानि यो नित्यं वहते करसंपुटे । तस्य नारायणो देवो वरमिष्टं प्रयच्छति
dhātrīphalāni yo nityaṁ vahate karasaṁpuṭe tasya nārāyaṇo devo varamiṣṭaṁ prayacchati
जिसके अंग धात्री-फल से लिपटे हों, जो धात्री-फल से युक्त हो, जिसका आहार धात्री-फल से बना हो, वह मनुष्य नारायण के समान हो जाता है।
श्लोक 71 (skanda.2.109.71)
श्रीकामः सर्वदा स्नानं कुर्यादामलकैर्नरः । तुष्यत्यामलकैर्विष्णुरेकादश्यां विशेषतः
śrīkāmaḥ sarvadā snānaṁ kuryādāmalakairnaraḥ tuṣyatyāmalakairviṣṇurekādaśyāṁ viśeṣataḥ
जो नित्य अपनी अंजलि में धात्री-फल धारण करता है, उसे देव नारायण अभीष्ट वर प्रदान करते हैं।
श्लोक 72 (skanda.2.109.72)
नवम्यां दर्शे सप्तम्यां संक्रांतौ रविवासरे । चन्द्रसूर्योपरागे च स्नानमामलकैस्त्यजेत्
navamyāṁ darśe saptamyāṁ saṁkrāṁtau ravivāsare candrasūryoparāge ca snānamāmalakaistyajet
लक्ष्मी की कामना करने वाले मनुष्य को सदा आँवले से स्नान करना चाहिए; विष्णु आँवले से संतुष्ट होते हैं, विशेषतः एकादशी को।
श्लोक 73 (skanda.2.109.73)
धात्रीछायां समाश्रित्य कुर्य्यात्पिंडं त यो नरः । प्रयांति पितरो मुक्तिं प्रसादान्माधवस्य तु
dhātrīchāyāṁ samāśritya kuryyātpiṁḍaṁ ta yo naraḥ prayāṁti pitaro muktiṁ prasādānmādhavasya tu
नवमी, अमावस्या, सप्तमी, संक्रांति, रविवार, तथा चंद्र या सूर्य ग्रहण में आँवले से स्नान का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 74 (skanda.2.109.74)
मूर्ध्नि पाणौ मुखे चैव बाह्वोः कंठे तु यो नरः । धत्ते धात्रीफलं वत्स धात्रीफलविभूषितः
mūrdhni pāṇau mukhe caiva bāhvoḥ kaṁṭhe tu yo naraḥ dhatte dhātrīphalaṁ vatsa dhātrīphalavibhūṣitaḥ
धात्री की छाया का आश्रय लेकर जो मनुष्य पिंड अर्पित करता है, माधव की कृपा से उसके पितर मुक्ति प्राप्त करते हैं।
श्लोक 75 (skanda.2.109.75)
यावल्लुठति कण्ठस्था धात्रीमाला नरस्य हि । तावत्तस्य शरीरे तु प्रीत्या लुंठति केशवः । धात्रीफलं च तुलसी मृत्तिका द्वारकोद्भवा । सफलं जीवितं तस्य त्रितयं यस्य वेश्मनि
yāvalluṭhati kaṇṭhasthā dhātrīmālā narasya hi tāvattasya śarīre tu prītyā luṁṭhati keśavaḥ dhātrīphalaṁ ca tulasī mṛttikā dvārakodbhavā saphalaṁ jīvitaṁ tasya tritayaṁ yasya veśmani
जो मनुष्य सिर, हाथ, मुख, भुजाओं तथा कंठ पर धात्री-फल धारण करता है, हे वत्स, वह धात्री-फल से सुशोभित होकर, जब तक कंठ में धारण की गई धात्री-माला मनुष्य के गले में रहती है, तब तक स्वयं केशव प्रेमपूर्वक उसके शरीर पर विराजते हैं। धात्री-फल, तुलसी तथा द्वारका की मिट्टी — जिसके घर में ये तीनों हों, उसका जीवन सफल है।
श्लोक 76 (skanda.2.109.76)
यावद्दिनानि वहते धात्रीमालां कलौ नरः । तावद्युगसहस्राणि वैकुण्ठे वसतिर्भवेत्
yāvaddināni vahate dhātrīmālāṁ kalau naraḥ tāvadyugasahasrāṇi vaikuṇṭhe vasatirbhavet
कलियुग में मनुष्य जितने दिनों तक धात्री-माला धारण करता है, उतने ही हज़ार युगों तक वह वैकुण्ठ में निवास करता है।
श्लोक 77 (skanda.2.109.77)
मालायुग्मं वहेद्यस्तु धात्रीतुलसिसंभवम् । यो नरः कंठदेशे तु कल्पकोटिं दिवं वसेत्
mālāyugmaṁ vahedyastu dhātrītulasisaṁbhavam yo naraḥ kaṁṭhadeśe tu kalpakoṭiṁ divaṁ vaset
जो मनुष्य धात्री और तुलसी से बनी दोनों मालाएँ अपने कंठ में धारण करता है, वह करोड़ों कल्पों तक स्वर्ग में निवास करता है।
श्लोक 78 (skanda.2.109.78)
धात्रीछायां गतो यस्तु द्वादश्यां पूजयेद्धरिम् । तत्रैव भोजनं यस्तु ब्राह्मणानां च कारयेत्
dhātrīchāyāṁ gato yastu dvādaśyāṁ pūjayeddharim tatraiva bhojanaṁ yastu brāhmaṇānāṁ ca kārayet
जो धात्री की छाया में जाकर द्वादशी को हरि की पूजा करता है, तथा वहीं ब्राह्मणों को भोजन कराता है,
श्लोक 79 (skanda.2.109.79)
स्वयं च तत्र भुंक्ते यः सूपभक्षादिकं तथा । न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि
svayaṁ ca tatra bhuṁkte yaḥ sūpabhakṣādikaṁ tathā na tasya punarāvṛttiḥ kalpakoṭiśatairapi
तथा स्वयं भी वहाँ दाल-भात आदि खाता है — उसका सैकड़ों करोड़ कल्पों तक भी पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक 80 (skanda.2.109.80)
तुलस्याश्चैव धात्र्याश्च फलैः पत्रैर्हरिं यजेत्
tulasyāścaiva dhātryāśca phalaiḥ patrairhariṁ yajet
तुलसी और धात्री, दोनों के फलों और पत्तों से हरि की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 81 (skanda.2.109.81)
तुलसी धात्रीयुक्ता हि सिक्ते सति च कार्तिके । विलयं यांति पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च
tulasī dhātrīyuktā hi sikte sati ca kārtike vilayaṁ yāṁti pāpāni brahmahatyādikāni ca
कार्तिक में तुलसी और धात्री, दोनों को एक साथ सींचे जाने पर, ब्रह्महत्या आदि पाप भी विलीन हो जाते हैं।
श्लोक 82 (skanda.2.109.82)
धर्मदत्तो द्विजः पूर्वं यथा मुक्तिमवाप ह । नारद उवाच । कार्तिके मासि सा सेव्या पूजनीया सदा नरैः । चातुर्मास्ये न सेव्या सा इत्युक्तं भवता पुरा । तस्मात्सर्वमशेषेण कथयस्व ममाग्रतः
dharmadatto dvijaḥ pūrvaṁ yathā muktimavāpa ha nārada uvāca kārtike māsi sā sevyā pūjanīyā sadā naraiḥ cāturmāsye na sevyā sā ityuktaṁ bhavatā purā tasmātsarvamaśeṣeṇa kathayasva mamāgrataḥ
जैसे धर्मदत्त नामक ब्राह्मण ने पूर्वकाल में मुक्ति प्राप्त की थी — नारद ने कहा — आपने पहले कहा था कि कार्तिक मास में यह सदा मनुष्यों द्वारा सेवनीय और पूजनीय है, परन्तु चातुर्मास्य में इसकी सेवा नहीं करनी चाहिए; इसलिए यह सब पूर्ण रूप से मेरे सामने कहिए।
श्लोक 83 (skanda.2.109.83)
ब्रह्मोवाच । कार्तिके मासि विप्रर्षे शुक्ला या दशमी शुभा । तद्दिनाऽऽरभ्य सा सेव्या दैवे पित्र्ये च कर्मणि । दशम्यारभ्य तत्पत्रैः फलकैर्मधुसूदनम्
brahmovāca kārtike māsi viprarṣe śuklā yā daśamī śubhā taddinā''rabhya sā sevyā daive pitrye ca karmaṇi daśamyārabhya tatpatraiḥ phalakairmadhusūdanam
ब्रह्माजी ने कहा — हे विप्रर्षे, कार्तिक मास की जो शुभ शुक्ल दशमी है, उस दिन से इसकी सेवा देव-कर्म और पितृ-कर्म दोनों में करनी चाहिए। दशमी से आरंभ करके इसके पत्तों और फलों से मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 84 (skanda.2.109.84)
पूजयंति नरा ये वै ते वै वैकुण्ठगामिनः । समाप्ते कार्तिकव्रते वनभोजनमाचरेत्
pūjayaṁti narā ye vai te vai vaikuṇṭhagāminaḥ samāpte kārtikavrate vanabhojanamācaret
जो मनुष्य इस प्रकार पूजा करते हैं, वे निश्चय ही वैकुण्ठ को जाते हैं। कार्तिक-व्रत समाप्त होने पर वन-भोजन करना चाहिए।
श्लोक 85 (skanda.2.109.85)
दशम्यां वाऽथ द्वादश्यां पौर्णमास्यामथाऽपि वा । पंचम्यां वा महाभाग वनभोजनमाचरेत्
daśamyāṁ vā'tha dvādaśyāṁ paurṇamāsyāmathā'pi vā paṁcamyāṁ vā mahābhāga vanabhojanamācaret
दशमी को, अथवा द्वादशी को, पूर्णिमा को, अथवा हे महाभाग, पंचमी को भी वन-भोजन करना चाहिए।
श्लोक 86 (skanda.2.109.86)
सर्वोपस्करसंयुक्तो वृद्धबालैश्च संयुतः । वनं प्रवेशयेद्धीमान्धात्रीवृक्षैः सुशोभितम्
sarvopaskarasaṁyukto vṛddhabālaiśca saṁyutaḥ vanaṁ praveśayeddhīmāndhātrīvṛkṣaiḥ suśobhitam
सम्पूर्ण सामग्री सहित, वृद्धों और बालकों के साथ, बुद्धिमान पुरुष को धात्री वृक्षों से सुशोभित वन में प्रवेश करना चाहिए,
श्लोक 87 (skanda.2.109.87)
चूतैर्बकैस्तथाऽश्वत्थैः पिचुमंदैः कदंबकैः । न्यग्रोधतिंतिणीवृक्षैः समंतात्परिशोभितम्
cūtairbakaistathā'śvatthaiḥ picumaṁdaiḥ kadaṁbakaiḥ nyagrodhatiṁtiṇīvṛkṣaiḥ samaṁtātpariśobhitam
जो आम्र, बक, अश्वत्थ, नीम तथा कदंब वृक्षों, वट और इमली के वृक्षों से चारों ओर से सुशोभित हो।
श्लोक 88 (skanda.2.109.88)
तत्र गत्वा महाप्राज्ञ पुण्याऽहं कारयेत्पुरा । वास्तुपीठं तथा पूज्यं धात्रीमूले तु कारयेत्
tatra gatvā mahāprājña puṇyā'haṁ kārayetpurā vāstupīṭhaṁ tathā pūjyaṁ dhātrīmūle tu kārayet
हे महाप्राज्ञ, वहाँ जाकर पहले पुण्यकारक कार्य करना चाहिए; धात्री की जड़ में एक वास्तु-पीठ बनाकर उसकी भी पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 89 (skanda.2.109.89)
वेदिकां चतुरस्रां च हस्तमात्रायतां शुभाम् । तथोपवेदिकां कृत्वा वेदिकाग्रे महामते
vedikāṁ caturasrāṁ ca hastamātrāyatāṁ śubhām tathopavedikāṁ kṛtvā vedikāgre mahāmate
हे महामते, एक हाथ लंबी चौकोर शुभ वेदिका बनाकर, तथा वेदिका के आगे एक उप-वेदिका भी बनाकर,
श्लोक 90 (skanda.2.109.90)
उपवेशाय देवस्य ह्यलं कार्यं तु धातुभिः । वेदिकापश्चिमेभागे कारयेत्कुण्डमंडपम्
upaveśāya devasya hyalaṁ kāryaṁ tu dhātubhiḥ vedikāpaścimebhāge kārayetkuṇḍamaṁḍapam
देवता के बैठने के लिए, विभिन्न रंगों से पर्याप्त सजावट करनी चाहिए। वेदिका के पश्चिम भाग में एक कुंड-मंडप बनाना चाहिए,
श्लोक 91 (skanda.2.109.91)
मेखलात्रयसंयुक्तं पिप्पलच्छदसंयुतम् । हस्तमात्रायतं सौम्य एवं कुण्डं तु कारयेत्
mekhalātrayasaṁyuktaṁ pippalacchadasaṁyutam hastamātrāyataṁ saumya evaṁ kuṇḍaṁ tu kārayet
तीन घेरों से युक्त, पीपल के पत्तों के डिज़ाइन से सज्जित, हे सौम्य, एक हाथ लंबा — इस प्रकार कुंड बनाना चाहिए।
श्लोक 92 (skanda.2.109.92)
पश्चात्स्नात्वा ततो जप्त्वा देवपूजां समाचरेत् । पश्चादग्निं समाधाय होमं कुर्याद्यथाविधि
paścātsnātvā tato japtvā devapūjāṁ samācaret paścādagniṁ samādhāya homaṁ kuryādyathāvidhi
तत्पश्चात् स्नान करके, फिर जप करके देवता की पूजा करनी चाहिए; तत्पश्चात् अग्नि प्रज्वलित करके विधिपूर्वक हवन करना चाहिए,
श्लोक 93 (skanda.2.109.93)
पायसाऽऽज्यगुडसूपपालाशसमिधा तथा । ग्रहाणां वास्तुदेवेभ्यश्चरुं कृत्वा प्रयत्नतः
pāyasā''jyaguḍasūpapālāśasamidhā tathā grahāṇāṁ vāstudevebhyaścaruṁ kṛtvā prayatnataḥ
खीर, घी, गुड़, दाल तथा पलाश की समिधा से; ग्रहों और वास्तु-देवताओं के लिए यत्नपूर्वक चरु बनाकर,
श्लोक 94 (skanda.2.109.94)
धात्री शांतिस्तथा कांतिर्माया प्रकृतिरेव च । विष्णुपत्नी महालक्ष्मी रमा मा कमला तथा
dhātrī śāṁtistathā kāṁtirmāyā prakṛtireva ca viṣṇupatnī mahālakṣmī ramā mā kamalā tathā
धात्री, शांति, कांति, माया, प्रकृति, विष्णु-पत्नी महालक्ष्मी, रमा, मा तथा कमला,
श्लोक 95 (skanda.2.109.95)
इंदिरा लोकमाता च कल्याणी कमला तथा । सावित्री च जगद्धात्री गायत्री सुधृतिस्तथा
iṁdirā lokamātā ca kalyāṇī kamalā tathā sāvitrī ca jagaddhātrī gāyatrī sudhṛtistathā
इंदिरा, लोकमाता, कल्याणी, कमला, सावित्री, जगद्धात्री, गायत्री तथा सुधृति,
श्लोक 96 (skanda.2.109.96)
अंतज्ञा विश्वरूपा च सुकृपा ह्यब्धिसंभवा । प्रधानदेवताभिस्तु रक्षाहोमं समारभेत्
aṁtajñā viśvarūpā ca sukṛpā hyabdhisaṁbhavā pradhānadevatābhistu rakṣāhomaṁ samārabhet
अंतज्ञा, विश्वरूपा, सुकृपा तथा समुद्र से उत्पन्न देवी — इन प्रमुख देवताओं के साथ रक्षा-होम आरंभ करना चाहिए,
श्लोक 97 (skanda.2.109.97)
संसृष्टेति च मंत्रेण ऋषभं मेति मंत्रतः । अपूपं गुडसूपाभ्यां संयुतं जुहुयाद्धविः
saṁsṛṣṭeti ca maṁtreṇa ṛṣabhaṁ meti maṁtrataḥ apūpaṁ guḍasūpābhyāṁ saṁyutaṁ juhuyāddhaviḥ
"संसृष्ट" मंत्र से, तथा "ऋषभं मे" मंत्र से, गुड़ और दाल से युक्त पूआ हवि के रूप में अर्पित करना चाहिए,
श्लोक 98 (skanda.2.109.98)
अष्टोत्तरशतं हुत्वा मूलमंत्रेण पायसम् । ततो ग्रहादि देवांस्तु यथासंख्येन होमयेत्
aṣṭottaraśataṁ hutvā mūlamaṁtreṇa pāyasam tato grahādi devāṁstu yathāsaṁkhyena homayet
मूल मंत्र से एक सौ आठ बार खीर की आहुति देकर; तत्पश्चात् ग्रह आदि देवताओं को उनकी उचित संख्या के अनुसार आहुति देनी चाहिए।
श्लोक 99 (skanda.2.109.99)
धात्रीहोमे महाप्राज्ञ रक्षाहोमे तु पायसम् । ततः स्विष्टकृतं हुत्वा बलिदानं समाचरेत्
dhātrīhome mahāprājña rakṣāhome tu pāyasam tataḥ sviṣṭakṛtaṁ hutvā balidānaṁ samācaret
हे महाप्राज्ञ, धात्री-होम में तथा रक्षा-होम में खीर अर्पित की जाती है; तत्पश्चात् स्विष्टकृत की आहुति देकर बलिदान करना चाहिए।
श्लोक 100 (skanda.2.109.100)
इंद्रादि लोकपालांश्च रक्षा पूज्या प्रयत्नतः । धात्रीवृक्षस्य सर्वत्र वेदिकासंयुतस्य च
iṁdrādi lokapālāṁśca rakṣā pūjyā prayatnataḥ dhātrīvṛkṣasya sarvatra vedikāsaṁyutasya ca
इंद्र आदि लोकपालों की तथा रक्षक देवताओं की, वेदिका सहित धात्री-वृक्ष के चारों ओर, यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 101 (skanda.2.109.101)
सूपेन गुडमिश्रेण बलिं पश्चान्निवेदयेत् । देवि धात्रि नमस्तुभ्यं गृहाण बलिमुत्तमम्
sūpena guḍamiśreṇa baliṁ paścānnivedayet devi dhātri namastubhyaṁ gṛhāṇa balimuttamam
तत्पश्चात् गुड़ मिश्रित दाल से बलि अर्पित करनी चाहिए — "हे देवी धात्री, तुम्हें नमस्कार है; यह उत्तम बलि ग्रहण करो,
श्लोक 102 (skanda.2.109.102)
मिश्रितं गुडसूपाभ्यां सर्वमंगलदायिनि । पुत्रान्देहि महाप्राज्ञान्यशो देहि शुभप्रदम्
miśritaṁ guḍasūpābhyāṁ sarvamaṁgaladāyini putrāndehi mahāprājñānyaśo dehi śubhapradam
गुड़ और दाल से मिश्रित, हे सर्वमंगलदायिनी। मुझे महाप्राज्ञ पुत्र दो, शुभ यश दो,
श्लोक 103 (skanda.2.109.103)
प्रज्ञां मेधां च सौभाग्यं विष्णुभक्तिं च देहि मे । नीरोगं कुरु मे नित्यं निष्पापं कुरु सर्वदा
prajñāṁ medhāṁ ca saubhāgyaṁ viṣṇubhaktiṁ ca dehi me nīrogaṁ kuru me nityaṁ niṣpāpaṁ kuru sarvadā
मुझे प्रज्ञा, मेधा, सौभाग्य तथा विष्णु-भक्ति दो; मुझे सदा निरोग रखो, सदा निष्पाप बनाओ,
श्लोक 104 (skanda.2.109.104)
वर्चस्कं कुरु मां देवि धनवंतं तथा कुरु । इति तां प्रार्थयेद्देवीं प्रादक्षिण्याद्बलिं न्यसेत्
varcaskaṁ kuru māṁ devi dhanavaṁtaṁ tathā kuru iti tāṁ prārthayeddevīṁ prādakṣiṇyādbaliṁ nyaset
हे देवी, मुझे तेजस्वी बनाओ, तथा मुझे धनवान भी बनाओ।" इस प्रकार उस देवी से प्रार्थना करके, प्रदक्षिणा करते हुए बलि रखनी चाहिए।
श्लोक 105 (skanda.2.109.105)
बलिप्रदानकाले तु ये कुर्वंति प्रदक्षिणम् । ते यांति विष्णुसालोक्यं पितृभिः सार्द्धमेव च
balipradānakāle tu ye kurvaṁti pradakṣiṇam te yāṁti viṣṇusālokyaṁ pitṛbhiḥ sārddhameva ca
बलि अर्पित करते समय जो प्रदक्षिणा करते हैं, वे अपने पितरों सहित विष्णु के लोक को जाते हैं।
श्लोक 106 (skanda.2.109.106)
ततः पूर्णाहुतिं कृत्वा होमशेषं समापयेत् । धात्रीवृक्षस्य मूलस्थं मंदस्मितरमापतिम् । ते यांति विष्णुसायुज्यं ये पश्यंतीह चक्षुषा
tataḥ pūrṇāhutiṁ kṛtvā homaśeṣaṁ samāpayet dhātrīvṛkṣasya mūlasthaṁ maṁdasmitaramāpatim te yāṁti viṣṇusāyujyaṁ ye paśyaṁtīha cakṣuṣā
तत्पश्चात् पूर्णाहुति देकर हवन का शेष भाग समाप्त करना चाहिए; जो लोग धात्री की जड़ में विराजमान, मंद मुस्कान वाले रमापति को अपनी आँखों से देखते हैं, वे विष्णु-सायुज्य को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 107 (skanda.2.109.107)
वैश्वदेवं ततः कृत्वा पूजयेद्वनदेवताः । गंधाक्षतांस्ततो दत्त्वा विप्रेभ्यः पद्मसंभव
vaiśvadevaṁ tataḥ kṛtvā pūjayedvanadevatāḥ gaṁdhākṣatāṁstato dattvā viprebhyaḥ padmasaṁbhava
तत्पश्चात् वैश्वदेव करके वन-देवताओं की पूजा करनी चाहिए; तत्पश्चात्, हे पद्मसंभव, ब्राह्मणों को गंध और अक्षत देकर,
श्लोक 108 (skanda.2.109.108)
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात्स्वयं भुंजीत बंधुभिः । गृहं प्रवेशयेत्पश्चाद्वृद्धान्बालादिकैः सह
brāhmaṇānbhojayetpaścātsvayaṁ bhuṁjīta baṁdhubhiḥ gṛhaṁ praveśayetpaścādvṛddhānbālādikaiḥ saha
ब्राह्मणों को भोजन कराकर, तत्पश्चात् स्वयं बंधुओं सहित भोजन करना चाहिए; तत्पश्चात् वृद्धों-बालकों सहित घर में प्रवेश करना चाहिए।
श्लोक 109 (skanda.2.109.109)
ब्रह्मचारी भवेद्रात्रौ क्षितिशायी भवेत्ततः । ग्रामस्थैश्च मिलित्वा च स्वयं वा कारयेद्बुधः
brahmacārī bhavedrātrau kṣitiśāyī bhavettataḥ grāmasthaiśca militvā ca svayaṁ vā kārayedbudhaḥ
रात्रि में ब्रह्मचारी रहना चाहिए तथा भूमि पर सोना चाहिए; बुद्धिमान पुरुष को यह ग्रामवासियों के साथ मिलकर अथवा स्वयं भी करना चाहिए।
श्लोक 110 (skanda.2.109.110)
सर्वपापविमुक्त्यर्थं वनभोजनमुत्तमम् । कृत्वैवं सकलं कर्म कृष्णाय च समर्पयेत्
sarvapāpavimuktyarthaṁ vanabhojanamuttamam kṛtvaivaṁ sakalaṁ karma kṛṣṇāya ca samarpayet
सम्पूर्ण पापों से मुक्ति के लिए यह उत्तम वन-भोजन — इस प्रकार सम्पूर्ण कर्म करके कृष्ण को समर्पित करना चाहिए।
श्लोक 111 (skanda.2.109.111)
अश्वमेधसहस्रस्य राजसूयशतस्य च । यत्फलं समवाप्नोति तत्फलं वनभोजने
aśvamedhasahasrasya rājasūyaśatasya ca yatphalaṁ samavāpnoti tatphalaṁ vanabhojane
सहस्र अश्वमेध यज्ञों तथा सौ राजसूय यज्ञों का जो फल प्राप्त होता है, वही फल वन-भोजन में मिलता है।
श्लोक 112 (skanda.2.109.112)
अतो धात्री महाभाग पवित्रा पापनाशनी । धात्री चैव नृणां धात्री धात्रीवत्कुरुते क्रियाम्
ato dhātrī mahābhāga pavitrā pāpanāśanī dhātrī caiva nṛṇāṁ dhātrī dhātrīvatkurute kriyām
इसलिए, हे महाभाग, धात्री पवित्र और पापनाशिनी है; धात्री ही मनुष्यों की सच्ची धात्री (पालनकर्त्री) है, वह धात्री के समान ही अपना कार्य करती है।
श्लोक 113 (skanda.2.109.113)
ददात्यायुः पयःपानात्स्नानाद्वै धर्मसंचयम् । अलक्ष्मीनाशनं स्नानमात्रैर्निर्वाणमाप्नुयात् । विघ्नानि नैव जायंते धात्रीस्नानेन वै नृणाम्
dadātyāyuḥ payaḥpānātsnānādvai dharmasaṁcayam alakṣmīnāśanaṁ snānamātrairnirvāṇamāpnuyāt vighnāni naiva jāyaṁte dhātrīsnānena vai nṛṇām
यह रस पीने से आयु देती है, स्नान से धर्म-संचय देती है; इससे स्नान करने मात्र से अलक्ष्मी का नाश होता है और मोक्ष प्राप्त होता है। धात्री-स्नान से मनुष्यों के लिए कभी विघ्न उत्पन्न नहीं होते।
श्लोक 114 (skanda.2.109.114)
तस्मात्त्वं कुरु विप्रेंद्र धात्रीस्नानं हि यत्नतः । प्रयास्यसि हरेर्द्धाम देवत्वं प्राप्य नारद
tasmāttvaṁ kuru vipreṁdra dhātrīsnānaṁ hi yatnataḥ prayāsyasi harerddhāma devatvaṁ prāpya nārada
इसलिए, हे विप्रेन्द्र, तुम यत्नपूर्वक धात्री-स्नान करो; तुम देवत्व प्राप्त करके हरि के धाम को जाओगे, हे नारद।
श्लोक 115 (skanda.2.109.115)
यत्रयत्र मुनिश्रेष्ठ धात्रीस्नानं समाचरेत् । तीर्थे वाऽपि गृहे वाऽपि तत्रतत्र हरिः स्थितः
yatrayatra muniśreṣṭha dhātrīsnānaṁ samācaret tīrthe vā'pi gṛhe vā'pi tatratatra hariḥ sthitaḥ
हे मुनिश्रेष्ठ, जहाँ-जहाँ धात्री-स्नान किया जाता है, चाहे तीर्थ में हो या घर में, वहाँ-वहाँ हरि विराजमान रहते हैं।
श्लोक 116 (skanda.2.109.116)
धात्रीस्नानेन विप्रर्षे यस्यास्थीनि कलेवरे । प्रक्षाल्यंते मुनिश्रेष्ठ न स गर्भगृहं वसेत्
dhātrīsnānena viprarṣe yasyāsthīni kalevare prakṣālyaṁte muniśreṣṭha na sa garbhagṛhaṁ vaset
हे विप्रर्षे, जिसकी हड्डियाँ शरीर में धात्री-स्नान से शुद्ध हो जाती हैं, हे मुनिश्रेष्ठ, वह पुनः गर्भ में नहीं रहता।
श्लोक 117 (skanda.2.109.117)
धात्रीजलेन विप्रेंद्र येषां केशाश्च रंजिताः । ते नराः केशवं यांति नाशयित्वा कलेर्मलम्
dhātrījalena vipreṁdra yeṣāṁ keśāśca raṁjitāḥ te narāḥ keśavaṁ yāṁti nāśayitvā kalermalam
हे विप्रेन्द्र, जिनके केश धात्री-जल से रँगे जाते हैं, वे मनुष्य कलियुग के मैल का नाश करके केशव को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 118 (skanda.2.109.118)
धात्रीफलं महापुण्यं स्नानं पुण्यतमं स्मृतम् । पुण्यात्पुण्यतरं वत्स भक्षणे मुनिसत्तम
dhātrīphalaṁ mahāpuṇyaṁ snānaṁ puṇyatamaṁ smṛtam puṇyātpuṇyataraṁ vatsa bhakṣaṇe munisattama
धात्री-फल महापुण्यकारक है, स्नान उससे भी अधिक पुण्यकारक कहा गया है; हे वत्स, हे मुनिसत्तम, उसके भक्षण से पुण्य से भी अधिक पुण्य होता है।
श्लोक 119 (skanda.2.109.119)
न गंगा न गया काशी न वेणी न च पुष्करम् । एकैव हि यथा पुण्या धात्री माधववासरे
na gaṁgā na gayā kāśī na veṇī na ca puṣkaram ekaiva hi yathā puṇyā dhātrī mādhavavāsare
न गंगा, न गया, न काशी, न वेणी, न पुष्कर — इनमें से कोई भी उतना पुण्यदायक नहीं है जितना माधव के दिन (कार्तिक में) अकेली धात्री है।
श्लोक 120 (skanda.2.109.120)
धात्रीस्नानं हरेर्नाम तथैवैकादशी सुत । गयाश्राद्धं तथा वत्स समानि मुनयो विदुः
dhātrīsnānaṁ harernāma tathaivaikādaśī suta gayāśrāddhaṁ tathā vatsa samāni munayo viduḥ
धात्री-स्नान, हरि का नाम, तथा एकादशी, हे पुत्र, तथा गया में श्राद्ध — हे वत्स, इन्हें मुनियों ने समान माना है।
श्लोक 121 (skanda.2.109.121)
संस्पृशन्यस्तु वै धात्रीमहन्यहनि मानवः । मुच्यते पातकैः सर्वैर्मनोवाक्कायसंभवैः
saṁspṛśanyastu vai dhātrīmahanyahani mānavaḥ mucyate pātakaiḥ sarvairmanovākkāyasaṁbhavaiḥ
जो मनुष्य प्रतिदिन धात्री का स्पर्श करता है, वह मन, वाणी और शरीर से उत्पन्न सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 122 (skanda.2.109.122)
धात्रीफलैरमावास्यासप्तमीनवमीषु च । रविवारे च संक्रांतौ न स्नायान्मुनिसत्तम
dhātrīphalairamāvāsyāsaptamīnavamīṣu ca ravivāre ca saṁkrāṁtau na snāyānmunisattama
हे मुनिसत्तम, अमावस्या, सप्तमी, नवमी, रविवार तथा संक्रांति को धात्री-फलों से स्नान नहीं करना चाहिए।
श्लोक 123 (skanda.2.109.123)
यस्मिन्गृहेमुनिवर धात्री तिष्ठति सर्वदा । तस्मिन्गृहे न गच्छंति प्रेतकूष्मांडराक्षसाः
yasmingṛhemunivara dhātrī tiṣṭhati sarvadā tasmingṛhe na gacchaṁti pretakūṣmāṁḍarākṣasāḥ
हे मुनिवर, जिस घर में धात्री सदा विराजमान रहती है, उस घर में प्रेत, कूष्मांड तथा राक्षस नहीं जाते।
श्लोक 124 (skanda.2.109.124)
धात्रीफलकृतां मालां कंठस्थां यो वहेन्नहि । स वैष्णवो न विज्ञेयो विष्णोर्भक्तिपरो यदि
dhātrīphalakṛtāṁ mālāṁ kaṁṭhasthāṁ yo vahennahi sa vaiṣṇavo na vijñeyo viṣṇorbhaktiparo yadi
जो धात्री-फल से बनी माला अपने कंठ में धारण नहीं करता, वह विष्णु-भक्त होते हुए भी सच्चा वैष्णव नहीं माना जाना चाहिए।
श्लोक 125 (skanda.2.109.125)
न त्याज्या तुलसीमाला धात्रीमाला विशेषतः । तथा पद्माक्षमालाऽपि धर्मकामार्थमीप्सुभिः
na tyājyā tulasīmālā dhātrīmālā viśeṣataḥ tathā padmākṣamālā'pi dharmakāmārthamīpsubhiḥ
धर्म, काम और अर्थ की इच्छा रखने वालों को तुलसी-माला का त्याग नहीं करना चाहिए, विशेषतः धात्री-माला का भी, तथा पद्माक्ष-माला का भी।
श्लोक 126 (skanda.2.109.126)
यावद्दिनानि वहते धात्रीमालां कलौ नरः । तावद्युगसहस्राणि वैकुण्ठे वसतिर्भवेत्
yāvaddināni vahate dhātrīmālāṁ kalau naraḥ tāvadyugasahasrāṇi vaikuṇṭhe vasatirbhavet
कलियुग में मनुष्य जितने दिनों तक धात्री-माला धारण करता है, उतने ही हज़ार युगों तक वह वैकुण्ठ में निवास करता है।
श्लोक 127 (skanda.2.109.127)
सर्वदेवमयी धात्री वासुदेवमनःप्रिया । आरोपणीया सेव्या च पूजनीया सदा नरैः
sarvadevamayī dhātrī vāsudevamanaḥpriyā āropaṇīyā sevyā ca pūjanīyā sadā naraiḥ
सर्वदेवमयी धात्री, वासुदेव के मन को प्रिय है; मनुष्यों को इसे सदा रोपना, सेवन करना तथा पूजना चाहिए।
श्लोक 128 (skanda.2.109.128)
एतत्ते सर्वमाख्यातं धात्रीमाहात्म्यमुत्तमम् । श्रोतव्यं च सदा भक्तैश्चतुर्वर्गफलप्रदम्
etatte sarvamākhyātaṁ dhātrīmāhātmyamuttamam śrotavyaṁ ca sadā bhaktaiścaturvargaphalapradam
यह सब तुम्हें धात्री का उत्तम माहात्म्य बताया गया; इसे भक्तों को सदा सुनना चाहिए, जो चारों पुरुषार्थों का फल देने वाला है।
श्लोक 129 (skanda.2.109.129)
धात्रीछायां समाश्रित्य कार्तिकेऽन्नं भुनक्ति यः । अन्नसंसर्गजं पापमावर्षं तस्य नश्यति
dhātrīchāyāṁ samāśritya kārtike'nnaṁ bhunakti yaḥ annasaṁsargajaṁ pāpamāvarṣaṁ tasya naśyati
जो कार्तिक में धात्री की छाया का आश्रय लेकर अन्न भोगता है, अन्न के संसर्ग से उत्पन्न, वर्षभर का उसका पाप नष्ट हो जाता है।