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वैष्णव खण्ड · अध्याय 110

सत्यभामापूर्वजन्मवृत्तांतकथनपूर्वकप्रयागतीर्थप्रशंसाप्रसंगवर्णनम्

अध्याय 109अध्याय-सूचीअध्याय 111

श्लोक 1 (skanda.2.110.1)

सूत उवाच । श्रियः पतिमथामंत्र्य गते देवर्षिसत्तमे । हर्षोत्फुल्लाऽऽनना सत्या वासुदेवमथाऽब्रवीत्

sūta uvāca śriyaḥ patimathāmaṁtrya gate devarṣisattame harṣotphullā''nanā satyā vāsudevamathā'bravīt

सूत ने कहा — तत्पश्चात्, जब देवर्षिश्रेष्ठ नारद, लक्ष्मीपति से विदा लेकर चले गए, तब हर्ष से खिले हुए मुख वाली सत्या (सत्यभामा) वासुदेव से बोलीं —

श्लोक 2 (skanda.2.110.2)

सत्यभामोवाच । धन्यास्मि कृतकृत्याऽस्मि सफलं जीवितं मम । दानं व्रतं तपो वाऽपि किं नु पूर्वं कृतं मया

satyabhāmovāca dhanyāsmi kṛtakṛtyā'smi saphalaṁ jīvitaṁ mama dānaṁ vrataṁ tapo vā'pi kiṁ nu pūrvaṁ kṛtaṁ mayā

सत्यभामा ने कहा — मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ, मेरा जीवन सफल है। मैंने पूर्वकाल में कौन-सा दान, व्रत अथवा तप किया था,

श्लोक 3 (skanda.2.110.3)

येनाऽहं मर्त्यजा देव तवांगार्द्धहराऽभवम् । भवांतरे च किंशीला काचाऽहं कस्य कन्यका । तवाऽहं वल्लभा जाता तद्वदस्व ममाऽखिलम्

yenā'haṁ martyajā deva tavāṁgārddhaharā'bhavam bhavāṁtare ca kiṁśīlā kācā'haṁ kasya kanyakā tavā'haṁ vallabhā jātā tadvadasva mamā'khilam

जिससे मैं, हे देव, मर्त्य होते हुए भी आपके आधे शरीर की स्वामिनी बनी? पूर्वजन्म में मेरा स्वभाव कैसा था, मैं कौन थी, किसकी पुत्री थी? आपकी प्रिया बनी हूँ, इसलिए यह सब मुझे बताइए।

श्लोक 4 (skanda.2.110.4)

श्रीकृष्ण उवाच । शृणुष्वैकमना कांते यथा त्वं पूर्वजन्मनि

śrīkṛṣṇa uvāca śṛṇuṣvaikamanā kāṁte yathā tvaṁ pūrvajanmani

श्रीकृष्ण ने कहा — हे कांते, एकाग्र मन से सुनो, जैसे तुमने पूर्वजन्म में

श्लोक 5 (skanda.2.110.5)

पुण्यव्रतं कृतवती तत्सर्वं कथयामि ते । आसीत्कृतयुगस्यांते मायापुर्यां द्विजोत्तमः

puṇyavrataṁ kṛtavatī tatsarvaṁ kathayāmi te āsītkṛtayugasyāṁte māyāpuryāṁ dvijottamaḥ

पुण्य-व्रत किया था, वह सब मैं तुम्हें बताता हूँ। कृतयुग के अंत में मायापुरी नगर में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था,

श्लोक 6 (skanda.2.110.6)

आत्रेयो देवशर्मेति वेदवेदांगपारगः । तस्यातिवयसश्चाऽऽसीन्नाम्ना गुणवती सुता

ātreyo devaśarmeti vedavedāṁgapāragaḥ tasyātivayasaścā''sīnnāmnā guṇavatī sutā

आत्रेय गोत्री, देवशर्मा नामक, वेद-वेदांगों में पारंगत। उसकी वृद्धावस्था में गुणवती नामक एक पुत्री हुई।

श्लोक 7 (skanda.2.110.7)

अपुत्रः स स्वशिष्याय चंद्रनाम्ने ददौ सुताम् । तमेव पुत्रवन्मेने स च तं पितृवद्वशी

aputraḥ sa svaśiṣyāya caṁdranāmne dadau sutām tameva putravanmene sa ca taṁ pitṛvadvaśī

पुत्रहीन उसने अपनी पुत्री को अपने ही शिष्य चंद्र नामक को दे दिया; वह उसे पुत्र के समान मानता था, और वह शिष्य उसे पिता के समान मानकर वशीभूत रहता था।

श्लोक 8 (skanda.2.110.8)

तौ कदाचिद्वनं यातौ कुशेध्माहरणार्थिनौ । निहतौ रक्षसा तौ च कृतांतसमरूपिणा

tau kadācidvanaṁ yātau kuśedhmāharaṇārthinau nihatau rakṣasā tau ca kṛtāṁtasamarūpiṇā

एक बार दोनों कुश और ईंधन लेने के लिए वन गए; वहाँ यमराज के समान रूप वाले एक राक्षस ने दोनों को मार डाला।

श्लोक 9 (skanda.2.110.9)

स्वस्वपुण्य प्रभावेन विष्णुलोकं गतावुभौ । ततो गुणवती श्रुत्वा रक्षसा निहतावुभौ

svasvapuṇya prabhāvena viṣṇulokaṁ gatāvubhau tato guṇavatī śrutvā rakṣasā nihatāvubhau

अपने-अपने पुण्य के प्रभाव से दोनों विष्णुलोक को गए। तब गुणवती ने सुना कि राक्षस ने दोनों को मार डाला है,

श्लोक 10 (skanda.2.110.10)

पितृभर्तृजदुःखार्ता कारुण्यं पर्यदेवयत् । सा गृहोपस्करा न्सर्वान्विक्रीयाशु च कर्मं तत्

pitṛbhartṛjaduḥkhārtā kāruṇyaṁ paryadevayat sā gṛhopaskarā nsarvānvikrīyāśu ca karmaṁ tat

पिता और पति की मृत्यु से दुःखी होकर वह अत्यंत करुण विलाप करने लगी। उसने घर की सभी वस्तुएँ शीघ्र बेचकर,

श्लोक 11 (skanda.2.110.11)

तयोश्चक्रे यथाशक्ति पारलौकीं ततः क्रियाम् । तस्मिन्नेव पुरे चक्रे वासं सा मृतजीविनी

tayoścakre yathāśakti pāralaukīṁ tataḥ kriyām tasminneva pure cakre vāsaṁ sā mṛtajīvinī

अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन दोनों की परलौकिक क्रिया की। और वह, अकेली जीवित बची हुई, उसी नगर में निवास करने लगी।

श्लोक 12 (skanda.2.110.12)

व्रतद्वयं तया सम्यगाजन्ममरणात्कृतम् । एकादशीव्रतं सम्यक्सेवनं कार्तिकस्य च

vratadvayaṁ tayā samyagājanmamaraṇātkṛtam ekādaśīvrataṁ samyaksevanaṁ kārtikasya ca

उसने जन्म से मृत्यु तक भलीभाँति दो व्रतों का पालन किया — एकादशी-व्रत तथा कार्तिक-सेवन का व्रत।

श्लोक 13 (skanda.2.110.13)

इत्थं गुणवती सम्यक्प्रत्यब्द व्रतिनी ह्यभूत् । कदाचित्सरुजा साऽथ कृशांगी ज्वरपीडिता

itthaṁ guṇavatī samyakpratyabda vratinī hyabhūt kadācitsarujā sā'tha kṛśāṁgī jvarapīḍitā

इस प्रकार गुणवती प्रतिवर्ष भलीभाँति व्रत करने वाली हुई। एक बार वह रोगग्रस्त, दुर्बल शरीर वाली, ज्वर से पीड़ित होकर,

श्लोक 14 (skanda.2.110.14)

स्नातुं गंगां गता कांते कथंचिच्छनकैस्तदा । यावज्जलांतरगता कंपिता शीतपीडिता

snātuṁ gaṁgāṁ gatā kāṁte kathaṁcicchanakaistadā yāvajjalāṁtaragatā kaṁpitā śītapīḍitā

हे कांते, किसी प्रकार धीरे-धीरे गंगा स्नान करने गई। जैसे ही वह जल में गई, ठंड से काँपती हुई,

श्लोक 15 (skanda.2.110.15)

तावत्सा विह्वलाऽपश्यद्विमानं यातमंबरात् । अथ सा तद्विमानस्था वैकुण्ठभुवनं ययौ

tāvatsā vihvalā'paśyadvimānaṁ yātamaṁbarāt atha sā tadvimānasthā vaikuṇṭhabhuvanaṁ yayau

तभी उसने विह्वल होकर आकाश से उतरता हुआ एक विमान देखा। तत्पश्चात् वह उस विमान में बैठकर वैकुण्ठ-धाम को गई।

श्लोक 16 (skanda.2.110.16)

कार्तिकव्रतपुण्येन मत्सान्निध्यं गताऽभवत् । अथ ब्रह्मादिदेवानां यदा प्रार्थनया भुवम्

kārtikavratapuṇyena matsānnidhyaṁ gatā'bhavat atha brahmādidevānāṁ yadā prārthanayā bhuvam

कार्तिक-व्रत के पुण्य से वह मेरे सान्निध्य को प्राप्त हुई। तत्पश्चात् जब ब्रह्मा आदि देवताओं की प्रार्थना पर मैं,

श्लोक 17 (skanda.2.110.17)

आगतोऽहं गणाः सर्वे यातास्तेऽपि मया सह । एते हि यादवाः सर्वे मद्गणा एव भामिनि

āgato'haṁ gaṇāḥ sarve yātāste'pi mayā saha ete hi yādavāḥ sarve madgaṇā eva bhāmini

पृथ्वी पर आया, तब उसके सभी साथी भी मेरे साथ आए; क्योंकि हे भामिनी, ये सभी यादव मेरे ही गण हैं।

श्लोक 18 (skanda.2.110.18)

पिता ते देवशर्माऽभूत्सत्राजिदभिधो ह्ययम् । यश्चंद्रनामाऽसोऽक्रूरस्त्वं सा गुणवती शुभा

pitā te devaśarmā'bhūtsatrājidabhidho hyayam yaścaṁdranāmā'so'krūrastvaṁ sā guṇavatī śubhā

तुम्हारे पिता देवशर्मा ही यह सत्राजित नामक बने, तथा जो चंद्र नामक था, वह यह अक्रूर बना; और तुम ही वह शुभ गुणवती हो।

श्लोक 19 (skanda.2.110.19)

कार्तिकव्रतपुण्येन बहु मत्प्रीतिदायिनी । मद्द्वारि यत्त्वया पूर्वं तुलसीवाटिका कृता

kārtikavratapuṇyena bahu matprītidāyinī maddvāri yattvayā pūrvaṁ tulasīvāṭikā kṛtā

कार्तिक-व्रत के पुण्य से तुमने मुझे बहुत प्रसन्नता दी है। क्योंकि तुमने पूर्वकाल में मेरे द्वार पर तुलसी-वाटिका बनाई थी,

श्लोक 20 (skanda.2.110.20)

तस्मादयं कल्पवृक्षस्तवांगणगतः शुभे । आजन्ममरणात्पूर्वं यत्कृतं कार्तिकव्रतम्

tasmādayaṁ kalpavṛkṣastavāṁgaṇagataḥ śubhe ājanmamaraṇātpūrvaṁ yatkṛtaṁ kārtikavratam

इसलिए, हे शुभे, यह कल्पवृक्ष तुम्हारे आँगन में है। जन्म से मृत्यु तक तुमने जो कार्तिक-व्रत किया,

श्लोक 21 (skanda.2.110.21)

कदाचिदपि तेन त्वं मद्वियोगं न यास्यसि । सत्योवाच । मासानां तु कथं नाम स मासः कार्तिको वरः

kadācidapi tena tvaṁ madviyogaṁ na yāsyasi satyovāca māsānāṁ tu kathaṁ nāma sa māsaḥ kārtiko varaḥ

उसके प्रभाव से तुम कभी भी मुझसे वियुक्त नहीं होगी। सत्या ने कहा — महीनों में यह कार्तिक मास किस प्रकार श्रेष्ठ है,

श्लोक 22 (skanda.2.110.22)

प्रियस्ते देवदेवेश कारणं तत्र कथ्यताम् । श्रीकृष्ण उवाच । साधु पृष्टं त्वया कांते शृणुष्वैकाग्रमानसा

priyaste devadeveśa kāraṇaṁ tatra kathyatām śrīkṛṣṇa uvāca sādhu pṛṣṭaṁ tvayā kāṁte śṛṇuṣvaikāgramānasā

और हे देवदेवेश, यह आपको प्रिय है, उसका कारण बताइए। श्रीकृष्ण ने कहा — हे कांते, तुमने अच्छा पूछा है, एकाग्र मन से सुनो —

श्लोक 23 (skanda.2.110.23)

पृथोर्वैन्यस्य संवादं महर्षेर्नारदस्य च । एवमेव पुरा पृष्टो नारदः पृथुनाब्रवीत्

pṛthorvainyasya saṁvādaṁ maharṣernāradasya ca evameva purā pṛṣṭo nāradaḥ pṛthunābravīt

वेनपुत्र पृथु तथा महर्षि नारद का संवाद। इसी प्रकार पूर्वकाल में पृथु द्वारा पूछे जाने पर नारद ने कहा था —

श्लोक 24 (skanda.2.110.24)

नारद उवाच । शंखनामाऽभवत्पूर्वमसुरः सागरात्मजः । इन्द्रादिलोकपालानामधिकाराञ्जहार ह

nārada uvāca śaṁkhanāmā'bhavatpūrvamasuraḥ sāgarātmajaḥ indrādilokapālānāmadhikārāñjahāra ha

नारद ने कहा — पूर्वकाल में शंख नामक एक असुर था, जो समुद्र का पुत्र था। उसने इंद्र आदि लोकपालों के अधिकार छीन लिए।

श्लोक 25 (skanda.2.110.25)

सुवर्णाद्रिगुहादुर्गसंस्थितास्त्रिदशादयः । तद्वीक्षयांबभूवुस्ते तदा दैत्यो व्यचारयत्

suvarṇādriguhādurgasaṁsthitāstridaśādayaḥ tadvīkṣayāṁbabhūvuste tadā daityo vyacārayat

स्वर्णाचल की गुफा में दुर्ग बनाकर बैठे हुए देवगण उसे निहारने लगे; तब उस दैत्य ने विचार किया —

श्लोक 26 (skanda.2.110.26)

हृताधिकारास्त्रिदशा मया यद्यपि निर्जिताः । लक्ष्यंते बलयुक्तास्ते करणीयं मयाऽत्र किम्

hṛtādhikārāstridaśā mayā yadyapi nirjitāḥ lakṣyaṁte balayuktāste karaṇīyaṁ mayā'tra kim

"यद्यपि मैंने अधिकार छीने हुए देवताओं को जीत लिया है, फिर भी वे बलवान दिखाई देते हैं; अब मुझे क्या करना चाहिए?

श्लोक 27 (skanda.2.110.27)

ज्ञातं तत्तु मया देवा वेदमन्त्रबलान्विताः । तान्हरिष्ये ततः सर्वे बलहीना भवंति वै

jñātaṁ tattu mayā devā vedamantrabalānvitāḥ tānhariṣye tataḥ sarve balahīnā bhavaṁti vai

मैंने यह जान लिया है कि देवता वेद-मंत्रों के बल से युक्त हैं; उन्हें हरण करूँगा, तब सभी निश्चय ही बलहीन हो जाएँगे।"

श्लोक 28 (skanda.2.110.28)

इति मत्वा ततो दैत्यो विष्णुमालक्ष्य निद्रितम् । सत्यलोकाज्जहाराशु वेदानादिस्वयंभुवः

iti matvā tato daityo viṣṇumālakṣya nidritam satyalokājjahārāśu vedānādisvayaṁbhuvaḥ

ऐसा सोचकर उस दैत्य ने विष्णु को सोया हुआ देखकर, सत्यलोक से आदि स्वयंभू (ब्रह्मा) के वेदों को शीघ्र हर लिया।

श्लोक 29 (skanda.2.110.29)

नीतास्तु तेन ते वेदास्तद्भयात्ते निराक्रमन् । तोयानि विविशुर्यज्ञमंत्रबीजसमन्विताः

nītāstu tena te vedāstadbhayātte nirākraman toyāni viviśuryajñamaṁtrabījasamanvitāḥ

उसके द्वारा ले जाए गए वे वेद उसके भय से भाग गए; यज्ञ-मंत्रों के बीज सहित वे जल में प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 30 (skanda.2.110.30)

तान्मार्गमाणः शंखोऽपि समुद्रांतर्गतो भ्रमन् । न ददर्श तदा दैत्यः क्वचिदेकत्र संस्थितान् । अथ देवैः स्तुतो विष्णुर्बोधितस्तानुवाच ह

tānmārgamāṇaḥ śaṁkho'pi samudrāṁtargato bhraman na dadarśa tadā daityaḥ kvacidekatra saṁsthitān atha devaiḥ stuto viṣṇurbodhitastānuvāca ha

उन्हें खोजता हुआ शंख भी समुद्र के भीतर भटकता रहा, परन्तु वह दैत्य उन्हें कहीं एक साथ स्थित नहीं देख सका। तब देवताओं द्वारा स्तुति किए जाने पर जागृत हुए विष्णु ने उनसे कहा —

श्लोक 31 (skanda.2.110.31)

विष्णुरुवाच । वरदोऽहं सुरगणा गीतवाद्यादिमंगलैः

viṣṇuruvāca varado'haṁ suragaṇā gītavādyādimaṁgalaiḥ

विष्णु ने कहा — हे देवगण, मैं वर देने वाला हूँ, क्योंकि गीत-वाद्य आदि मंगल-कार्यों से,

श्लोक 32 (skanda.2.110.32)

ऊर्जस्य शुक्लैकादश्यां भवद्भिः प्रतिबोधितः । अतश्चैषा तिथिर्मान्या साऽतीव प्रीतिदा मम

ūrjasya śuklaikādaśyāṁ bhavadbhiḥ pratibodhitaḥ ataścaiṣā tithirmānyā sā'tīva prītidā mama

तुमने ऊर्ज (कार्तिक) की शुक्ल एकादशी को मुझे जगाया है; इसलिए यह तिथि माननीय है, यह मुझे अत्यंत प्रिय है।

श्लोक 33 (skanda.2.110.33)

वेदाः शंखहृताः सर्वे तिष्ठंत्युदकसंस्थिताः । तानानयाम्यहं देवा हत्वा सागरनंदनम्

vedāḥ śaṁkhahṛtāḥ sarve tiṣṭhaṁtyudakasaṁsthitāḥ tānānayāmyahaṁ devā hatvā sāgaranaṁdanam

शंख द्वारा हरे गए सभी वेद जल में स्थित हैं; हे देवगण, मैं समुद्रपुत्र को मारकर उन्हें ले आऊँगा।

श्लोक 34 (skanda.2.110.34)

अद्यप्रभृति वेदास्तु मंत्रबीजसमन्विताः । प्रत्यब्दं कार्तिके मासि विश्रमंत्वप्सु सर्वदा

adyaprabhṛti vedāstu maṁtrabījasamanvitāḥ pratyabdaṁ kārtike māsi viśramaṁtvapsu sarvadā

आज से मंत्र-बीज सहित वे वेद प्रतिवर्ष कार्तिक मास में सदा जल में विश्राम करें।

श्लोक 35 (skanda.2.110.35)

कालेऽस्मिन्ये प्रकुर्वंति प्रातःस्नानं नरोत्तमाः । ते सर्वे यज्ञाऽवभृथैः सुस्नाताः स्युर्न संशयः

kāle'sminye prakurvaṁti prātaḥsnānaṁ narottamāḥ te sarve yajñā'vabhṛthaiḥ susnātāḥ syurna saṁśayaḥ

इस काल में जो श्रेष्ठ पुरुष प्रातःस्नान करते हैं, वे सभी यज्ञ के अवभृथ-स्नान के समान भलीभाँति स्नात हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 36 (skanda.2.110.36)

अद्यप्रभृत्यहमपि भवामि जलमध्यगः । भवन्तोऽपि मया सार्द्धमायांतु समुनीश्वराः

adyaprabhṛtyahamapi bhavāmi jalamadhyagaḥ bhavanto'pi mayā sārddhamāyāṁtu samunīśvarāḥ

आज से मैं भी जल के भीतर निवास करूँगा; हे मुनीश्वरो, आप भी मेरे साथ आइए।

श्लोक 37 (skanda.2.110.37)

कातिकव्रतिनां चेंद्र रक्षा कार्या त्वया सदा । इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः शफरीतुल्यरूपधृक् । खात्पपात जले विंध्यवासिनः कस्य पश्यतः

kātikavratināṁ ceṁdra rakṣā kāryā tvayā sadā ityuktvā bhagavānviṣṇuḥ śapharītulyarūpadhṛk khātpapāta jale viṁdhyavāsinaḥ kasya paśyataḥ

और हे इंद्र, कार्तिक-व्रतियों की रक्षा सदा तुम्हें ही करनी होगी।" ऐसा कहकर भगवान् विष्णु एक छोटी मछली के समान रूप धारण करके, विंध्यवासी किसी के देखते-देखते ही आकाश से जल में गिर पड़े।

श्लोक 38 (skanda.2.110.38)

हत्वा शंखासुरं विष्णुर्बदरीवनमागमत् । तत्राऽऽहूय ऋषीन्सर्वानिदमाज्ञापयत्प्रभुः

hatvā śaṁkhāsuraṁ viṣṇurbadarīvanamāgamat tatrā''hūya ṛṣīnsarvānidamājñāpayatprabhuḥ

शंखासुर को मारकर विष्णु बदरीवन आए; वहाँ सभी ऋषियों को बुलाकर प्रभु ने यह आज्ञा दी —

श्लोक 39 (skanda.2.110.39)

विष्णुरुवाच । जलांतरविशीर्णांस्तान्यूयं वेदान्प्रमार्गथ । आनयध्वं च त्वरिताः सागरस्य जलांतरात् । तावत्प्रयागं तिष्ठामि देवतागणसंयुतः

viṣṇuruvāca jalāṁtaraviśīrṇāṁstānyūyaṁ vedānpramārgatha ānayadhvaṁ ca tvaritāḥ sāgarasya jalāṁtarāt tāvatprayāgaṁ tiṣṭhāmi devatāgaṇasaṁyutaḥ

विष्णु ने कहा — जल के भीतर बिखरे हुए उन वेदों को तुम खोजो, और समुद्र के जल के भीतर से शीघ्र लाओ; तब तक मैं देवताओं सहित प्रयाग में रहूँगा।

श्लोक 40 (skanda.2.110.40)

नारद उवाच । ततस्तैस्सर्वमुनिभिस्तपोबलसमन्वितैः

nārada uvāca tatastaissarvamunibhistapobalasamanvitaiḥ

नारद ने कहा — तत्पश्चात् तप के बल से युक्त उन सभी मुनियों द्वारा,

श्लोक 41 (skanda.2.110.41)

उद्धृताश्च सबीजास्ते वेदा यज्ञसमन्विताः । तेषु यावन्मितं येन लब्धं तावद्धि तस्य तत्

uddhṛtāśca sabījāste vedā yajñasamanvitāḥ teṣu yāvanmitaṁ yena labdhaṁ tāvaddhi tasya tat

यज्ञ-सहित बीज-मंत्रों वाले वे वेद निकाले गए; उनमें से जिसने जितना पाया, वह उतना ही उसका हो गया,

श्लोक 42 (skanda.2.110.42)

स स एव ऋषिर्जातस्तत्तत्प्रभृति पार्थिव । अथ सर्वेऽपि संगम्य प्रयागं मुनयो ययुः

sa sa eva ṛṣirjātastattatprabhṛti pārthiva atha sarve'pi saṁgamya prayāgaṁ munayo yayuḥ

और, हे राजन्, तभी से वही ऋषि उस भाग का द्रष्टा हुआ। तत्पश्चात् सभी मुनि एकत्र होकर प्रयाग गए,

श्लोक 43 (skanda.2.110.43)

विष्णवे सविधात्रे ते लब्धान्वेदान्न्यवेदयन् । लब्ध्वा वेदान्समग्रांस्तु ब्रह्मा हर्षसमन्वितः

viṣṇave savidhātre te labdhānvedānnyavedayan labdhvā vedānsamagrāṁstu brahmā harṣasamanvitaḥ

और उन्होंने प्राप्त वेदों को विधाता सहित विष्णु को अर्पित किया। सम्पूर्ण वेदों को प्राप्त करके हर्षित हुए ब्रह्माजी ने,

श्लोक 44 (skanda.2.110.44)

अयजद्वाजिमेधेन देवर्षिगणसंयुतः । यज्ञांऽते देवताः सर्वे विज्ञप्तिं चक्रुरंजसा

ayajadvājimedhena devarṣigaṇasaṁyutaḥ yajñāṁ'te devatāḥ sarve vijñaptiṁ cakruraṁjasā

देवर्षियों सहित अश्वमेध यज्ञ किया। यज्ञ के अंत में सभी देवताओं ने सीधे यह विनती की —

श्लोक 45 (skanda.2.110.45)

देवा ऊचुः । देवदेव जगन्नाथ विज्ञप्तिं शृणु नः प्रभो । हर्षकालोऽयमस्माकं तस्मात्त्वं वरदो भव

devā ūcuḥ devadeva jagannātha vijñaptiṁ śṛṇu naḥ prabho harṣakālo'yamasmākaṁ tasmāttvaṁ varado bhava

देवताओं ने कहा — हे देवदेव, हे जगन्नाथ, हे प्रभो, हमारी विनती सुनिए। यह हमारे लिए हर्ष का समय है, इसलिए आप वरदाता बनिए।

श्लोक 46 (skanda.2.110.46)

स्थानेऽस्मिन्द्रुहिणो वेदान्नष्टान्प्राप पुनस्त्वयम् । यज्ञभागान्वयं प्राप्तास्त्वत्प्रसादाद्रमापते

sthāne'smindruhiṇo vedānnaṣṭānprāpa punastvayam yajñabhāgānvayaṁ prāptāstvatprasādādramāpate

इस स्थान पर ब्रह्माजी ने पुनः खोए हुए वेदों को आपके द्वारा प्राप्त किया; हे रमापते, हमें भी आपकी कृपा से यज्ञ-भाग प्राप्त हुए।

श्लोक 47 (skanda.2.110.47)

स्थानमेतद्धि नः श्रेष्ठं पृथिव्यां पुण्यवर्धनम् । भुक्तिमुक्तिप्रदं चाऽस्तु प्रसादाद्भवतः सदा

sthānametaddhi naḥ śreṣṭhaṁ pṛthivyāṁ puṇyavardhanam bhuktimuktipradaṁ cā'stu prasādādbhavataḥ sadā

यह स्थान पृथ्वी पर हमारे लिए श्रेष्ठ, पुण्य-वर्धक है; आपकी कृपा से यह सदा भोग और मोक्ष देने वाला बने।

श्लोक 48 (skanda.2.110.48)

कालोऽप्ययं महापुण्यो ब्रह्मघ्नाऽऽदिविशुद्धिकृत् । दत्ताऽक्षयकरं चाऽस्तु वरमेवं ददस्व नः

kālo'pyayaṁ mahāpuṇyo brahmaghnā''diviśuddhikṛt dattā'kṣayakaraṁ cā'stu varamevaṁ dadasva naḥ

यह काल भी महापुण्यकारी, ब्रह्महत्या आदि पापों को भी शुद्ध करने वाला हो; यहाँ दिया गया दान अक्षय हो — ऐसा वर हमें दीजिए।

श्लोक 49 (skanda.2.110.49)

विष्णुरुवाच । ममाप्येतद्वृतं देवा यद्भवद्भिरुदाहृतम् । तथास्तु सुलभं त्वेतद्ब्रह्मक्षेत्रमितिप्रथम्

viṣṇuruvāca mamāpyetadvṛtaṁ devā yadbhavadbhirudāhṛtam tathāstu sulabhaṁ tvetadbrahmakṣetramitipratham

विष्णु ने कहा — हे देवगण, जो तुमने कहा है, वह मेरा भी संकल्प है; ऐसा ही हो। यह ब्रह्म-क्षेत्र नाम से पहले सुलभ माना जाएगा।

श्लोक 50 (skanda.2.110.50)

सूर्यवंशोद्भवो राजा गंगामत्रानयिष्यति । सा सूर्यकन्यया चात्र कालिंद्या योगमेष्यति

sūryavaṁśodbhavo rājā gaṁgāmatrānayiṣyati sā sūryakanyayā cātra kāliṁdyā yogameṣyati

सूर्यवंश में उत्पन्न एक राजा यहाँ गंगा को लाएगा; वह यहाँ सूर्य-पुत्री कालिंदी (यमुना) से मिलेगी।

श्लोक 51 (skanda.2.110.51)

यूयं च सर्वे ब्रह्माद्या निवसंतु मया सह । तीर्थराजेति विख्यातं तीर्थमेतद्भविष्यति

yūyaṁ ca sarve brahmādyā nivasaṁtu mayā saha tīrtharājeti vikhyātaṁ tīrthametadbhaviṣyati

तुम सब भी, ब्रह्मा सहित, मेरे साथ यहाँ निवास करो। यह तीर्थ "तीर्थराज" के नाम से विख्यात होगा।

श्लोक 52 (skanda.2.110.52)

सर्वपापानि नश्यंति तीर्थराजस्य दर्शनात् । सूर्ये मकरगे प्राप्ते स्नायिनां पापनाशनः

sarvapāpāni naśyaṁti tīrtharājasya darśanāt sūrye makarage prāpte snāyināṁ pāpanāśanaḥ

तीर्थराज के दर्शन मात्र से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं; सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर स्नान करने वालों के लिए यह पाप का नाश करने वाला है।

श्लोक 53 (skanda.2.110.53)

कालोऽप्येष महापुण्यफलदोऽस्तु सदा नृणाम् । सालोक्यादिफलं स्नानैर्माघे मकरगे रवौ

kālo'pyeṣa mahāpuṇyaphalado'stu sadā nṛṇām sālokyādiphalaṁ snānairmāghe makarage ravau

यह काल भी मनुष्यों के लिए सदा महापुण्यफल देने वाला हो; माघ मास में, सूर्य के मकर राशि में रहते हुए स्नान करने से सालोक्य आदि फल प्राप्त हों।

श्लोक 54 (skanda.2.110.54)

नारद उवाच । एवं देवान्देवदेवस्तदुक्त्वा तत्रैवांतर्धानमागात्सवेधाः । देवाः सर्वेप्यंशकैस्तेऽप्यतिष्ठंश्चांतर्धानं प्रापुरिंद्रादयस्ते

nārada uvāca evaṁ devāndevadevastaduktvā tatraivāṁtardhānamāgātsavedhāḥ devāḥ sarvepyaṁśakaiste'pyatiṣṭhaṁścāṁtardhānaṁ prāpuriṁdrādayaste

नारद ने कहा — इस प्रकार देवताओं से यह कहकर, विधाता सहित देवदेव वहीं अंतर्धान हो गए; सभी देवता भी अपने-अपने अंश-रूप में वहीं रहे, जबकि इंद्र आदि पूर्ण रूप से अंतर्धान हो गए।

श्लोक 55 (skanda.2.110.55)

कार्तिके तुलसीमूले योऽर्चयेद्धरिमीश्वरम् । भुक्त्वेह निखिलान्भोगानंते विष्णुपुरं व्रजेत्

kārtike tulasīmūle yo'rcayeddharimīśvaram bhuktveha nikhilānbhogānaṁte viṣṇupuraṁ vrajet

जो कार्तिक में तुलसी के मूल में भगवान् हरि की पूजा करता है, वह यहाँ सम्पूर्ण भोगों को भोगकर अंत में विष्णुपुर को जाता है।

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