वैष्णव खण्ड · अध्याय 111
जलंधरोत्पत्तिवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.2.111.1)
पृथुरुवाच । यत्त्वया कथितं ब्रह्मन्व्रतमूर्जस्य विस्तरात् । तत्र या तुलसीमूले विष्णोः पूजा त्वयोदिता
pṛthuruvāca yattvayā kathitaṁ brahmanvratamūrjasya vistarāt tatra yā tulasīmūle viṣṇoḥ pūjā tvayoditā
पृथु ने कहा — हे ब्रह्मन्, आपने ऊर्ज-व्रत का जो विस्तार से वर्णन किया, उसमें तुलसी की जड़ में विष्णु-पूजा का जो उल्लेख किया,
श्लोक 2 (skanda.2.111.2)
तेनाऽहं प्रष्टुमिच्छामि माहात्म्यं तुलसीभवम् । कथं साऽतिप्रिया तस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः
tenā'haṁ praṣṭumicchāmi māhātmyaṁ tulasībhavam kathaṁ sā'tipriyā tasya devadevasya śārṅgiṇaḥ
उसी कारण मैं तुलसी से उत्पन्न माहात्म्य पूछना चाहता हूँ — वह उन देवदेव शार्ङ्गधारी को इतनी प्रिय कैसे है?
श्लोक 3 (skanda.2.111.3)
कथमेषा समुत्पन्ना कस्मिन्स्थाने च नारद । एवं ब्रूहि समासेन सर्वज्ञोऽसि मतो मम
kathameṣā samutpannā kasminsthāne ca nārada evaṁ brūhi samāsena sarvajño'si mato mama
यह कैसे उत्पन्न हुई तथा किस स्थान पर, हे नारद? यह संक्षेप में बताइए, आप सर्वज्ञ माने जाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.2.111.4)
नारद उवाच । शृणु राजन्नवहितो माहात्म्यं तुलसीभवम् । सेतिहासं पुरावृत्तं तत्सर्वं कथयामि ते
nārada uvāca śṛṇu rājannavahito māhātmyaṁ tulasībhavam setihāsaṁ purāvṛttaṁ tatsarvaṁ kathayāmi te
नारद ने कहा — हे राजन्, ध्यान से सुनो तुलसी से उत्पन्न माहात्म्य; उसका प्राचीन इतिहास भी, वह सब मैं तुम्हें सुनाता हूँ।
श्लोक 5 (skanda.2.111.5)
पुरा शक्रः शिवं द्रष्टुमगात्कैलासपर्वतम् । सर्वदेवैः परिवृतो ह्यप्सरोगणसेवितः
purā śakraḥ śivaṁ draṣṭumagātkailāsaparvatam sarvadevaiḥ parivṛto hyapsarogaṇasevitaḥ
पूर्वकाल में इंद्र शिव के दर्शन के लिए कैलास पर्वत पर गए, सभी देवताओं से घिरे हुए तथा अप्सरागणों से सेवित।
श्लोक 6 (skanda.2.111.6)
यावद्गतः शिवगृहं तावत्तत्र स दृष्टवान् । पुरुषं भीमकर्माणं दंष्ट्राऽऽननविभीषणम्
yāvadgataḥ śivagṛhaṁ tāvattatra sa dṛṣṭavān puruṣaṁ bhīmakarmāṇaṁ daṁṣṭrā''nanavibhīṣaṇam
जैसे ही वे शिव-गृह पहुँचे, वहाँ उन्होंने भयंकर कर्म करने वाला, दाढ़ों से भयावह मुख वाला एक पुरुष देखा।
श्लोक 7 (skanda.2.111.7)
स पृष्टस्तेन कस्त्वं भोः क्व गतो जगदीश्वरः । एवं पुनः पुनः पृष्टः स तदा नोक्तवान्नृप
sa pṛṣṭastena kastvaṁ bhoḥ kva gato jagadīśvaraḥ evaṁ punaḥ punaḥ pṛṣṭaḥ sa tadā noktavānnṛpa
उन्होंने उससे पूछा — "तुम कौन हो, हे भो? जगदीश्वर कहाँ गए हैं?" इस प्रकार बार-बार पूछे जाने पर, हे राजन्, उसने उस समय कोई उत्तर नहीं दिया।
श्लोक 8 (skanda.2.111.8)
ततः कुद्धो वज्रपाणिस्तं निर्भर्त्स्य वचोऽब्रवीत् । रे मया पृच्छयमानोऽपि नोत्तरं दत्तवानसि
tataḥ kuddho vajrapāṇistaṁ nirbhartsya vaco'bravīt re mayā pṛcchayamāno'pi nottaraṁ dattavānasi
तब क्रोधित हुए वज्रपाणि इंद्र ने उसे धिक्कारते हुए कहा — "अरे, मेरे द्वारा पूछे जाने पर भी तुमने कोई उत्तर नहीं दिया!
श्लोक 9 (skanda.2.111.9)
अतस्त्वां हन्मि वज्रेण कस्ते त्राताऽस्ति दुर्मते । इत्युदीर्य ततो वज्री वज्रेणाऽभ्यहनद्दृढम्
atastvāṁ hanmi vajreṇa kaste trātā'sti durmate ityudīrya tato vajrī vajreṇā'bhyahanaddṛḍham
इसलिए, हे दुर्बुद्धे, मैं तुम्हें वज्र से मारूँगा — तुम्हें कौन बचाएगा?" ऐसा कहकर वज्रधारी इंद्र ने दृढ़ता से उसे वज्र से मारा।
श्लोक 10 (skanda.2.111.10)
तेनास्य कण्ठो नीलत्वमगाद्वज्रं च भस्मताम् । ततो रुद्रः प्रजज्वाल तेजसा प्रदहन्निव
tenāsya kaṇṭho nīlatvamagādvajraṁ ca bhasmatām tato rudraḥ prajajvāla tejasā pradahanniva
इससे उसका कंठ नीला हो गया और वज्र भस्म हो गया; तब रुद्र तेज से मानो जलाते हुए प्रज्वलित हो उठे।
श्लोक 11 (skanda.2.111.11)
दृष्ट्वा बृहस्पतिस्तूर्णं कृतांजलिपुटोऽभवत् । इन्द्रं च दंडवद्भूमौ कृत्वा स्तोतुं प्रचक्रमे
dṛṣṭvā bṛhaspatistūrṇaṁ kṛtāṁjalipuṭo'bhavat indraṁ ca daṁḍavadbhūmau kṛtvā stotuṁ pracakrame
यह देखकर बृहस्पति ने तुरंत हाथ जोड़ लिए; तथा इंद्र को भूमि पर दंडवत् प्रणाम कराकर वे स्तुति करने लगे —
श्लोक 12 (skanda.2.111.12)
बृहस्पतिरुवाच । नमो देवाधिपतये त्र्यंबकाय कपर्दिने । त्रिपुरघ्नाय शर्वाय नमोऽधंकनिषूदिने
bṛhaspatiruvāca namo devādhipataye tryaṁbakāya kapardine tripuraghnāya śarvāya namo'dhaṁkaniṣūdine
बृहस्पति ने कहा — देवाधिपति, त्र्यंबक, कपर्दी को नमस्कार; त्रिपुर के संहारक शर्व को, अंधक के नाशक को नमस्कार,
श्लोक 13 (skanda.2.111.13)
विरूपायाऽतिरूपाय बहुरूपाय शंभवे । यज्ञविध्वंसकर्त्रे च यज्ञानां फलदायिने
virūpāyā'tirūpāya bahurūpāya śaṁbhave yajñavidhvaṁsakartre ca yajñānāṁ phaladāyine
विरूप, अतिरूप, बहुरूप शंभु को, यज्ञ के विध्वंसक तथा यज्ञों को फल देने वाले को,
श्लोक 14 (skanda.2.111.14)
कालांतकाय कालाय कालभोगिधराय च । नमो ब्रह्मशिरोहंत्रे ब्राह्मणाय नमो नमः
kālāṁtakāya kālāya kālabhogidharāya ca namo brahmaśirohaṁtre brāhmaṇāya namo namaḥ
काल के अंतक, काल-स्वरूप, काल-सर्प को धारण करने वाले को, ब्रह्मा के शिर को काटने वाले, ब्राह्मण-स्वरूप को नमस्कार, नमस्कार।
श्लोक 15 (skanda.2.111.15)
नारद उवाच । एवं स्तुतस्तदा शंभुर्धिषणेन जगाद तम् । संहरन्नयनज्वालां त्रिलोकीदहन क्षमाम्
nārada uvāca evaṁ stutastadā śaṁbhurdhiṣaṇena jagāda tam saṁharannayanajvālāṁ trilokīdahana kṣamām
नारद ने कहा — इस प्रकार स्तुति किए जाने पर शंभु ने अपनी नेत्र-ज्वाला को, जो तीनों लोकों को जलाने में सक्षम थी, समेटकर बृहस्पति से कहा —
श्लोक 16 (skanda.2.111.16)
वरं वरय भो ब्रह्मन्प्रीतः स्तुत्याऽनया तव । इन्द्रस्य जीवदानेन जीवेति त्वं प्रथां वज्र
varaṁ varaya bho brahmanprītaḥ stutyā'nayā tava indrasya jīvadānena jīveti tvaṁ prathāṁ vajra
"हे ब्रह्मन्, वर माँगो, तुम्हारी इस स्तुति से मैं प्रसन्न हूँ।" — इंद्र के जीवनदान की याचना पर उन्होंने कहा — "जीवित रहो, हे वज्रधारी" — इस प्रकार उन्हें पुनः जीवन का वर दिया।
श्लोक 17 (skanda.2.111.17)
बृहस्पतिरुवाच । यदि तुष्टोऽसि देव त्वं पाहींद्रं शरणागतम् । अग्निरेष शमं यातु भालनेत्रसमुद्भवः
bṛhaspatiruvāca yadi tuṣṭo'si deva tvaṁ pāhīṁdraṁ śaraṇāgatam agnireṣa śamaṁ yātu bhālanetrasamudbhavaḥ
बृहस्पति ने कहा — "यदि आप प्रसन्न हैं, हे देव, तो शरणागत इंद्र की रक्षा कीजिए; आपके ललाट-नेत्र से उत्पन्न यह अग्नि शांत हो जाए।
श्लोक 18 (skanda.2.111.18)
ईश्वर उवाच । पुनः प्रवेशमायाति भालनेत्रे कथं शिखी । एनं त्यक्ष्याम्यहं दूरे यथेंद्रं नैव पीडयेत्
īśvara uvāca punaḥ praveśamāyāti bhālanetre kathaṁ śikhī enaṁ tyakṣyāmyahaṁ dūre yatheṁdraṁ naiva pīḍayet
ईश्वर ने कहा — "यह अग्नि पुनः मेरे ललाट-नेत्र में कैसे प्रवेश करे? मैं इसे दूर फेंक दूँगा, जिससे यह इंद्र को कभी पीड़ित न करे।
श्लोक 19 (skanda.2.111.19)
नारद उवाच । इत्युक्त्वा तं करे धृत्वा प्राक्षिपल्लवणार्णवे । सोऽपतत्सिंधुगंगायाः सागरस्य च संगमे
nārada uvāca ityuktvā taṁ kare dhṛtvā prākṣipallavaṇārṇave so'patatsiṁdhugaṁgāyāḥ sāgarasya ca saṁgame
नारद ने कहा — ऐसा कहकर उसे हाथ में लेकर उन्होंने उसे खारे समुद्र में फेंक दिया; वह सिंधु-गंगा और सागर के संगम पर जा गिरी।
श्लोक 20 (skanda.2.111.20)
तावत्स बालरूपत्वमगात्तत्र रुरोद च । रुदतस्तस्य शब्देन प्राकंपद्धरणी मुहुः
tāvatsa bālarūpatvamagāttatra ruroda ca rudatastasya śabdena prākaṁpaddharaṇī muhuḥ
तभी वह शिशु-रूप में परिवर्तित होकर वहाँ रोने लगी; उसके रोने की ध्वनि से पृथ्वी बार-बार काँप उठी।
श्लोक 21 (skanda.2.111.21)
स्वर्गाद्याः सत्यलोकांतास्तत्स्वनाद्बधिरीकृताः । श्रुत्वा ब्रह्मा ययौ तत्र किमेतदिति विस्मितः
svargādyāḥ satyalokāṁtāstatsvanādbadhirīkṛtāḥ śrutvā brahmā yayau tatra kimetaditi vismitaḥ
स्वर्ग से लेकर सत्यलोक तक सभी उस ध्वनि से बहरे हो गए; इसे सुनकर ब्रह्माजी "यह क्या है?" यह सोचते हुए आश्चर्यचकित होकर वहाँ गए।
श्लोक 22 (skanda.2.111.22)
तावत्समुद्रस्योत्संगे तं बालं स ददर्श ह । दृष्ट्वा ब्रह्माणमायातं समुद्रोऽपि कृतांजलिः
tāvatsamudrasyotsaṁge taṁ bālaṁ sa dadarśa ha dṛṣṭvā brahmāṇamāyātaṁ samudro'pi kṛtāṁjaliḥ
तभी उन्होंने समुद्र की गोद में उस शिशु को देखा; ब्रह्माजी को आते देखकर समुद्र ने भी हाथ जोड़कर,
श्लोक 23 (skanda.2.111.23)
प्रणम्य शिरसा बालं तस्योत्संगे न्यवेशयत् । भो ब्रह्मन्सिंधुगंगायां जातोऽयं मम पुत्रकः । जातकर्माऽऽदिसंस्कारान्कुरुष्वाऽद्य जगद्गुरो
praṇamya śirasā bālaṁ tasyotsaṁge nyaveśayat bho brahmansiṁdhugaṁgāyāṁ jāto'yaṁ mama putrakaḥ jātakarmā''disaṁskārānkuruṣvā'dya jagadguro
सिर झुकाकर प्रणाम करके, शिशु को उनकी गोद में रख दिया — "हे ब्रह्मन्, सिंधु-गंगा में उत्पन्न यह मेरा ही पुत्र है; हे जगद्गुरु, आज इसके जातकर्म आदि संस्कार कीजिए।
श्लोक 24 (skanda.2.111.24)
नारद उवाच । इत्थं वदति पाथोधौ स बालः सागरात्मजः
nārada uvāca itthaṁ vadati pāthodhau sa bālaḥ sāgarātmajaḥ
नारद ने कहा — जब समुद्र इस प्रकार कह रहा था, तभी वह शिशु, समुद्र का पुत्र,
श्लोक 25 (skanda.2.111.25)
ब्रह्माणमग्रहीत्कूर्चे विधुन्वंस्तं मुहुर्मुहुः । धुन्वतस्तस्य कूर्चे तु नेत्राभ्यामगमज्जलम् । कथंचिन्मुक्तकूर्चोऽथ ब्रह्मा प्रोवाच सागरम्
brahmāṇamagrahītkūrce vidhunvaṁstaṁ muhurmuhuḥ dhunvatastasya kūrce tu netrābhyāmagamajjalam kathaṁcinmuktakūrco'tha brahmā provāca sāgaram
ब्रह्माजी की दाढ़ी पकड़कर उसे बार-बार हिलाने लगा; उनकी दाढ़ी हिलाए जाने पर ब्रह्माजी की दोनों आँखों से जल आ गया। किसी प्रकार दाढ़ी छुड़ाकर ब्रह्माजी ने समुद्र से कहा —
श्लोक 26 (skanda.2.111.26)
ब्रह्मोवाच । नेत्राभ्यां विधृतं यस्मादनेनैतज्जलं मम । तस्माज्जलंधर इति ख्यातो नाम्ना भविष्यति
brahmovāca netrābhyāṁ vidhṛtaṁ yasmādanenaitajjalaṁ mama tasmājjalaṁdhara iti khyāto nāmnā bhaviṣyati
ब्रह्माजी ने कहा — क्योंकि इसने मेरी दोनों आँखों से यह जल खिंचवाया, इसलिए यह "जलंधर" नाम से विख्यात होगा।
श्लोक 27 (skanda.2.111.27)
अनेनैवैष तरुणः सर्वशस्त्रास्त्रपारगः । अवध्यः सर्वभूतानां विना रुद्रं भविष्यति
anenaivaiṣa taruṇaḥ sarvaśastrāstrapāragaḥ avadhyaḥ sarvabhūtānāṁ vinā rudraṁ bhaviṣyati
इसी कारण यह युवावस्था में सम्पूर्ण शस्त्र-अस्त्रों में पारंगत होकर, रुद्र को छोड़कर सम्पूर्ण प्राणियों के लिए अवध्य होगा।
श्लोक 28 (skanda.2.111.28)
यत एष समुद्भूतस्तत्रैवांतं गमिष्यति । नारद उवाच । इत्युक्त्वा शुक्रमाहूय राज्ये तं चाभ्यषेचयत् । आमंत्र्य सरितां नाथं ब्रह्मांतर्धानमागमत्
yata eṣa samudbhūtastatraivāṁtaṁ gamiṣyati nārada uvāca ityuktvā śukramāhūya rājye taṁ cābhyaṣecayat āmaṁtrya saritāṁ nāthaṁ brahmāṁtardhānamāgamat
जहाँ से यह उत्पन्न हुआ है, वहीं इसका अंत होगा। नारद ने कहा — ऐसा कहकर, शुक्राचार्य को बुलाकर, ब्रह्माजी ने उसे राज्य पर अभिषिक्त किया; नदियों के स्वामी (समुद्र) से विदा लेकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए।
श्लोक 29 (skanda.2.111.29)
अथ तद्दर्शनोत्फुल्लनयनः सागरस्तदा । कालनेमिसुतां वृंदां तद्भार्यार्थमयाचत
atha taddarśanotphullanayanaḥ sāgarastadā kālanemisutāṁ vṛṁdāṁ tadbhāryārthamayācata
तत्पश्चात् उस दर्शन से खिले हुए नेत्रों वाले समुद्र ने, कालनेमि की पुत्री वृंदा को उसकी (जलंधर की) पत्नी बनाने के लिए माँगा।
श्लोक 30 (skanda.2.111.30)
ते कालनेमिप्रमुखास्ततोऽसुरास्तस्मै सुतां तां प्रददुः प्रहर्षिताः । स चाऽपि तां प्राप्य सुहृद्वरां वशां शशास गां शुक्रसहायवान्बली
te kālanemipramukhāstato'surāstasmai sutāṁ tāṁ pradaduḥ praharṣitāḥ sa cā'pi tāṁ prāpya suhṛdvarāṁ vaśāṁ śaśāsa gāṁ śukrasahāyavānbalī
तब कालनेमि आदि प्रमुख असुरों ने अत्यंत प्रसन्न होकर वह पुत्री उसे दे दी; और उसने भी उस श्रेष्ठ, वशवर्ती, प्रिय सखी को पाकर, शुक्राचार्य की सहायता से बलशाली होकर पृथ्वी पर शासन किया।