वैष्णव खण्ड · अध्याय 112
जलंधरविजयप्राप्तिः
श्लोक 1 (skanda.2.112.1)
नारद उवाच । ये देवैर्निर्जिताः पूर्वं दैत्याः पातालसंस्थिताः । तेऽपि भूमंडलं याता निर्भयास्तमुपाश्रिताः
nārada uvāca ye devairnirjitāḥ pūrvaṁ daityāḥ pātālasaṁsthitāḥ te'pi bhūmaṁḍalaṁ yātā nirbhayāstamupāśritāḥ
नारद ने कहा — जो दैत्य पूर्वकाल में देवताओं से पराजित होकर पाताल में रहते थे, वे भी निर्भय होकर भूमंडल पर आकर उसकी (जलंधर की) शरण में आ गए।
श्लोक 2 (skanda.2.112.2)
कदाचिच्छिन्नशिरसं राहुं दृष्ट्वा स दैत्यराट् । पप्रच्छ भार्गवं तत्र तच्छिरश्छेदकारणम्
kadācicchinnaśirasaṁ rāhuṁ dṛṣṭvā sa daityarāṭ papraccha bhārgavaṁ tatra tacchiraśchedakāraṇam
एक बार उस दैत्यराज ने कटे हुए सिर वाले राहु को देखकर, वहाँ शुक्राचार्य से उसके सिर कटने का कारण पूछा।
श्लोक 3 (skanda.2.112.3)
स शशंस समुद्रस्य मथनं देवकारितम् । रत्नापहरणं चैव दैत्यानां च पराभवम्
sa śaśaṁsa samudrasya mathanaṁ devakāritam ratnāpaharaṇaṁ caiva daityānāṁ ca parābhavam
उन्होंने देवताओं द्वारा किए गए समुद्र-मंथन का वर्णन किया, तथा रत्नों के अपहरण और दैत्यों की पराजय का भी।
श्लोक 4 (skanda.2.112.4)
स श्रुत्वा क्रोधरक्ताक्षः स्वपितुर्मथनं तदा । दूतं संप्रेषयामास घस्मरं शक्रसन्निधौ
sa śrutvā krodharaktākṣaḥ svapiturmathanaṁ tadā dūtaṁ saṁpreṣayāmāsa ghasmaraṁ śakrasannidhau
अपने पिता के मंथन की बात सुनकर, क्रोध से लाल आँखों वाले उसने तब घस्मर नामक दूत को इंद्र के पास भेजा।
श्लोक 5 (skanda.2.112.5)
दूतस्त्रिविष्टपं गत्वा सुधर्मां प्राविशद्वराम् । जगादाखर्वमौलिस्तु देवेंद्रं वाक्यमद्भुतम्
dūtastriviṣṭapaṁ gatvā sudharmāṁ prāviśadvarām jagādākharvamaulistu deveṁdraṁ vākyamadbhutam
दूत स्वर्ग में जाकर श्रेष्ठ सुधर्मा सभा में प्रविष्ट हुआ; और अकड़ा हुआ सिर लिए हुए ही देवेंद्र से अद्भुत वचन कहने लगा —
श्लोक 6 (skanda.2.112.6)
घस्मर उवाच । जलंधरोऽब्धितनयः सर्वदैत्यजनेश्वरः । दूतोऽहंप्रेषितस्तेन स यदाह शृणुष्व तत्
ghasmara uvāca jalaṁdharo'bdhitanayaḥ sarvadaityajaneśvaraḥ dūto'haṁpreṣitastena sa yadāha śṛṇuṣva tat
घस्मर ने कहा — मैं समुद्र-पुत्र, सम्पूर्ण दैत्यजनों के स्वामी जलंधर का भेजा हुआ दूत हूँ; उन्होंने जो कहा है, वह सुनिए —
श्लोक 7 (skanda.2.112.7)
कस्मात्त्वया मम पिता मथितः सागरोऽद्रिणा । नीतानि सर्वरत्नानि तानि शीघ्रं प्रयच्छ मे
kasmāttvayā mama pitā mathitaḥ sāgaro'driṇā nītāni sarvaratnāni tāni śīghraṁ prayaccha me
"आपने पर्वत से मेरे पिता समुद्र का मंथन क्यों किया? जो सम्पूर्ण रत्न ले जाए गए हैं, उन्हें शीघ्र मुझे दीजिए।"
श्लोक 8 (skanda.2.112.8)
इति दूतवचः श्रुत्वा विस्मितस्त्रिदशाधिपः । उवाच घस्मरं रौद्रं भयरोषसमन्वितः
iti dūtavacaḥ śrutvā vismitastridaśādhipaḥ uvāca ghasmaraṁ raudraṁ bhayaroṣasamanvitaḥ
दूत के इस वचन को सुनकर, आश्चर्यचकित इंद्र ने भय और क्रोध से युक्त होकर उस भयंकर घस्मर से कहा —
श्लोक 9 (skanda.2.112.9)
इंद्र उवाच । शृणु दूत मया पूर्वं मथितः सागरो यथा । अद्रयो मद्भयात्त्रस्ताः स्वकुक्षिस्थाः कृतास्तथा
iṁdra uvāca śṛṇu dūta mayā pūrvaṁ mathitaḥ sāgaro yathā adrayo madbhayāttrastāḥ svakukṣisthāḥ kṛtāstathā
इंद्र ने कहा — हे दूत, सुनो, मैंने पूर्वकाल में समुद्र का मंथन जिस प्रकार किया, उस समय पर्वत भी मेरे भय से भयभीत होकर उसी के उदर में जा छिपे थे।
श्लोक 10 (skanda.2.112.10)
अन्येऽपि मद्द्विषस्तेन रक्षिता दितिजाः पुरा । तस्माद्यत्तत्प्रजातं तु मयाऽप्यपहृतं किल
anye'pi maddviṣastena rakṣitā ditijāḥ purā tasmādyattatprajātaṁ tu mayā'pyapahṛtaṁ kila
मेरे अन्य शत्रु, दिति-पुत्र भी पूर्वकाल में उसी के द्वारा रक्षित किए गए थे; इसलिए जो कुछ भी उससे उत्पन्न हुआ, वह मेरे द्वारा ही हरण किया गया।
श्लोक 11 (skanda.2.112.11)
शंखोऽप्येवं पुरा देवानद्विषत्सागरात्मजः । ममाऽनुजेन निहतः प्रविष्टः सागरोदरम्
śaṁkho'pyevaṁ purā devānadviṣatsāgarātmajaḥ mamā'nujena nihataḥ praviṣṭaḥ sāgarodaram
इसी प्रकार समुद्र-पुत्र शंख भी पूर्वकाल में देवताओं से द्वेष रखता था; वह मेरे छोटे भाई (विष्णु) द्वारा मारा जाकर समुद्र के उदर में प्रविष्ट हो गया।
श्लोक 12 (skanda.2.112.12)
तद्गच्छ कथयस्वाऽस्य सर्वं मथनकारणम् । नारद उवाच । इत्थं विसर्जितो दूतस्तदेंद्रेणाऽगमद्भुवम्
tadgaccha kathayasvā'sya sarvaṁ mathanakāraṇam nārada uvāca itthaṁ visarjito dūtastadeṁdreṇā'gamadbhuvam
इसलिए जाओ, इसे मंथन का सम्पूर्ण कारण बताओ। नारद ने कहा — इस प्रकार विदा किया गया दूत तब इंद्र से पृथ्वी को गया।
श्लोक 13 (skanda.2.112.13)
तदिदं वचनं सर्वं दैत्यायाकथयत्तदा । तन्निशम्य तदा दैत्यो रोषात्प्रस्फुरिताऽधरः
tadidaṁ vacanaṁ sarvaṁ daityāyākathayattadā tanniśamya tadā daityo roṣātprasphuritā'dharaḥ
उसने वह सम्पूर्ण वचन तब दैत्य को बताया। इसे सुनकर वह दैत्य क्रोध से काँपते होंठों वाला होकर,
श्लोक 14 (skanda.2.112.14)
दैत्यसेनासमायुक्तो ययौ योद्धुं त्रिविष्टपम् । ततो युद्धे महाञ्जातो देवदानवसंक्षयः
daityasenāsamāyukto yayau yoddhuṁ triviṣṭapam tato yuddhe mahāñjāto devadānavasaṁkṣayaḥ
दैत्य-सेना सहित स्वर्ग से युद्ध करने चला गया। तत्पश्चात् युद्ध में देवताओं और दानवों का महान् संहार हुआ।
श्लोक 15 (skanda.2.112.15)
तत्र युद्धे मृतान्दैत्यान्भार्गवस्तूदतिष्ठपत् । विद्यया मृतजीविन्या मंत्रितैस्तोयबिंदुभिः
tatra yuddhe mṛtāndaityānbhārgavastūdatiṣṭhapat vidyayā mṛtajīvinyā maṁtritaistoyabiṁdubhiḥ
वहाँ युद्ध में मरे हुए दैत्यों को शुक्राचार्य ने मृत-संजीवनी विद्या से, मंत्रित जल-बिंदुओं से पुनः खड़ा कर दिया।
श्लोक 16 (skanda.2.112.16)
देवानपि तथा युद्धे तत्राऽजीवयदंगिराः । दिव्यौषधी समानीय द्रोणाद्रेः स पुनःपुनः
devānapi tathā yuddhe tatrā'jīvayadaṁgirāḥ divyauṣadhī samānīya droṇādreḥ sa punaḥpunaḥ
तथा उस युद्ध में देवताओं को भी बृहस्पति ने, द्रोण पर्वत से बार-बार दिव्य औषधियाँ लाकर, जीवित कर दिया।
श्लोक 17 (skanda.2.112.17)
दृष्ट्वा देवांस्तथा युद्धे पुनरेव समुत्थितान् । जलंधरः क्रोधवशो भार्गवं वाक्यमब्रवीत्
dṛṣṭvā devāṁstathā yuddhe punareva samutthitān jalaṁdharaḥ krodhavaśo bhārgavaṁ vākyamabravīt
युद्ध में देवताओं को बार-बार पुनः उठ खड़े होते देखकर, क्रोधवश जलंधर ने शुक्राचार्य से कहा —
श्लोक 18 (skanda.2.112.18)
जलंधर उवाच । मया युद्धे हता देवा उत्तिष्ठंति कथं पुनः । तव संजीविनीविद्या न वाऽन्यत्रेति विश्रुतम्
jalaṁdhara uvāca mayā yuddhe hatā devā uttiṣṭhaṁti kathaṁ punaḥ tava saṁjīvinīvidyā na vā'nyatreti viśrutam
जलंधर ने कहा — "मेरे द्वारा युद्ध में मारे गए देवता पुनः कैसे उठ खड़े होते हैं? क्या आपकी संजीवनी विद्या अन्यत्र प्रसिद्ध नहीं है?"
श्लोक 19 (skanda.2.112.19)
शुक्र उवाच । दिव्यौषधीः समानीय द्रोणाद्रेरंगिराः सुरान् । जीवयत्येव तच्छीघ्रं द्रोणाद्रिं त्वमपाहर
śukra uvāca divyauṣadhīḥ samānīya droṇādreraṁgirāḥ surān jīvayatyeva tacchīghraṁ droṇādriṁ tvamapāhara
शुक्राचार्य ने कहा — "द्रोण पर्वत से दिव्य औषधियाँ लाकर बृहस्पति ही देवताओं को शीघ्र जीवित करता है; तुम द्रोण पर्वत को ही हटा दो।"
श्लोक 20 (skanda.2.112.20)
नारद उवाच । इत्युक्तः स तु दैत्येंद्रो नीत्वा द्रोणाचलं तदा । प्राक्षिपत्सागरे तूर्णं पुनरागान्महाहवम्
nārada uvāca ityuktaḥ sa tu daityeṁdro nītvā droṇācalaṁ tadā prākṣipatsāgare tūrṇaṁ punarāgānmahāhavam
नारद ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर उस दैत्येंद्र ने तब द्रोणाचल को उठाकर तुरंत समुद्र में फेंक दिया, और पुनः महायुद्ध में लौट आया।
श्लोक 21 (skanda.2.112.21)
अथ देवान्हतान्दृष्ट्वा द्रोणाद्रिमगमद्गुरुः । तावत्तत्र गिरींद्रं तु न ददर्श सुरार्चितः
atha devānhatāndṛṣṭvā droṇādrimagamadguruḥ tāvattatra girīṁdraṁ tu na dadarśa surārcitaḥ
तत्पश्चात् देवताओं को मरा हुआ देखकर गुरु बृहस्पति द्रोणाद्रि को गए; परन्तु देवताओं द्वारा पूजित वे वहाँ उस पर्वतराज को न पा सके।
श्लोक 22 (skanda.2.112.22)
ज्ञात्वा दैत्यहृतं द्रोणं धिषणो भयविह्वलः । आगत्य दूराद्व्याजह्रे श्वासाऽऽकुलितविग्रहः
jñātvā daityahṛtaṁ droṇaṁ dhiṣaṇo bhayavihvalaḥ āgatya dūrādvyājahre śvāsā''kulitavigrahaḥ
द्रोण के दैत्य द्वारा हरण किए जाने की बात जानकर, भयभीत बृहस्पति ने दूर से ही आकर, हाँफते हुए शरीर से पुकारकर कहा —
श्लोक 23 (skanda.2.112.23)
पलायध्वं हवाद्देवा नाऽयं जेतुं क्षमो यतः । रुद्रांशसंभवो ह्येष स्मरध्वं शक्रचेष्टितम्
palāyadhvaṁ havāddevā nā'yaṁ jetuṁ kṣamo yataḥ rudrāṁśasaṁbhavo hyeṣa smaradhvaṁ śakraceṣṭitam
"हे देवगण, युद्ध से भाग जाओ, क्योंकि यह जीता नहीं जा सकता; यह रुद्र के अंश से उत्पन्न है — इंद्र के उस कृत्य का स्मरण करो!"
श्लोक 24 (skanda.2.112.24)
श्रुत्वा तद्वचनं देवा भयविह्वलितास्तदा । दैत्येन वध्यमानास्ते पलायंते दिशो दश
śrutvā tadvacanaṁ devā bhayavihvalitāstadā daityena vadhyamānāste palāyaṁte diśo daśa
यह वचन सुनकर देवता तब भय से व्याकुल हो गए; दैत्य द्वारा मारे जाते हुए वे दसों दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 25 (skanda.2.112.25)
देवान्विद्रावितान्दृष्ट्वा दैत्यैः सागरनंदनः । शंखभेरीजयरवैः प्रविवेशाऽमरावतीम्
devānvidrāvitāndṛṣṭvā daityaiḥ sāgaranaṁdanaḥ śaṁkhabherījayaravaiḥ praviveśā'marāvatīm
देवताओं को दैत्यों द्वारा तितर-बितर होते देखकर, समुद्र-पुत्र शंख, भेरी तथा जय-घोष के साथ अमरावती में प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 26 (skanda.2.112.26)
प्रविष्टे नगरीं दैत्ये देवाः शक्रपुरोगमाः । सुवर्णाद्रिगुहां प्राप्ता न्यवसन्दैत्यतापिताः
praviṣṭe nagarīṁ daitye devāḥ śakrapurogamāḥ suvarṇādriguhāṁ prāptā nyavasandaityatāpitāḥ
दैत्य के नगरी में प्रवेश करने पर, इंद्र आदि देवता स्वर्णाचल की गुफा में पहुँचकर, दैत्य से संतप्त होकर वहीं रहने लगे।
श्लोक 27 (skanda.2.112.27)
ततश्च सर्वेष्वसुरोऽधिकारेष्विंद्रादिकानां विनिवेशयत्तदा । शुंभादिकान्दैत्यवरान्पृथक्पृथक्स्वयं सुवर्णाद्रिगुहामगात्पुनः
tataśca sarveṣvasuro'dhikāreṣviṁdrādikānāṁ viniveśayattadā śuṁbhādikāndaityavarānpṛthakpṛthaksvayaṁ suvarṇādriguhāmagātpunaḥ
तत्पश्चात् उस असुर ने इंद्र आदि के सम्पूर्ण अधिकारों पर शुंभ आदि श्रेष्ठ दैत्यों को अलग-अलग नियुक्त कर दिया, और स्वयं पुनः स्वर्णाचल की गुफा में चला गया।