वैष्णव खण्ड · अध्याय 113
जलंधरसभायांनारदागमनम्
श्लोक 1 (skanda.2.113.1)
नारद उवाच । पुनर्दैत्यं समायांतं दृष्ट्वा देवाः सवासवाः । भयप्रकंपिताः सर्वे विष्णुं स्तोतुं प्रचक्रमुः
nārada uvāca punardaityaṁ samāyāṁtaṁ dṛṣṭvā devāḥ savāsavāḥ bhayaprakaṁpitāḥ sarve viṣṇuṁ stotuṁ pracakramuḥ
नारद ने कहा — दैत्य को पुनः आते देखकर, इंद्र सहित सभी देवता भय से काँपते हुए विष्णु की स्तुति करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.2.113.2)
नमो मत्स्यकूर्मादिनानास्वरूपैः सदाभक्तकार्योद्यतायाऽर्तिहंत्रे । विधात्रादिसर्गस्थितिध्वंसकर्त्रे गदाशंखपद्मारिहस्ताय तेस्तु
namo matsyakūrmādinānāsvarūpaiḥ sadābhaktakāryodyatāyā'rtihaṁtre vidhātrādisargasthitidhvaṁsakartre gadāśaṁkhapadmārihastāya testu
मत्स्य, कूर्म आदि नाना रूपों से सदा भक्तों के कार्य के लिए तत्पर, दुःख का हरण करने वाले; ब्रह्मा आदि के द्वारा सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाले; गदा, शंख, पद्म और चक्र धारण करने वाले हाथों वाले आपको नमस्कार है।
श्लोक 3 (skanda.2.113.3)
रमा वल्लभायाऽसुराणां निहंत्रे भुजंगारियानाय पीतांबराय । मखादिक्रियापाककर्त्रे विकर्त्रे शरण्याय तस्मै नताः स्मो नताः स्मः
ramā vallabhāyā'surāṇāṁ nihaṁtre bhujaṁgāriyānāya pītāṁbarāya makhādikriyāpākakartre vikartre śaraṇyāya tasmai natāḥ smo natāḥ smaḥ
रमा के प्रिय, असुरों के संहारक, सर्पों के शत्रु (गरुड़) को वाहन बनाने वाले, पीताम्बरधारी; यज्ञ आदि कर्मों के फल के कर्ता और संहारक, शरण देने वाले — उन्हें हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं।
श्लोक 4 (skanda.2.113.4)
नमो दैत्यसंतापितामर्त्यदुःखाचलध्वंसदंभोलये विष्णवे ते । भुजंगेशतल्पेशयायार्कचंद्रद्विनेत्राय तस्मै नताः स्मो नताः स्मः
namo daityasaṁtāpitāmartyaduḥkhācaladhvaṁsadaṁbholaye viṣṇave te bhujaṁgeśatalpeśayāyārkacaṁdradvinetrāya tasmai natāḥ smo natāḥ smaḥ
दैत्यों से संतप्त अमरों के दुःख-रूपी पर्वत का नाश करने वाले वज्र-स्वरूप विष्णु को नमस्कार; सर्पराज की शय्या पर शयन करने वाले, सूर्य-चंद्र जिनके दो नेत्र हैं, उन्हें हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं।
श्लोक 5 (skanda.2.113.5)
नारद उवाच । संकष्टनाशनंनाम स्तोत्रमेतत्पठेन्नरः । स कदाचिन्न संकष्टैः पीड्यते कृपया हरेः
nārada uvāca saṁkaṣṭanāśanaṁnāma stotrametatpaṭhennaraḥ sa kadācinna saṁkaṣṭaiḥ pīḍyate kṛpayā hareḥ
नारद ने कहा — जो मनुष्य इस "संकष्टनाशन" नामक स्तोत्र का पाठ करता है, वह हरि की कृपा से कभी संकटों से पीड़ित नहीं होता।
श्लोक 6 (skanda.2.113.6)
इति देवाः स्तुतिं यावत्कुर्वंति दनुजद्विषः । तावत्सुराणामापत्तिर्विज्ञाता विष्णुना तदा
iti devāḥ stutiṁ yāvatkurvaṁti danujadviṣaḥ tāvatsurāṇāmāpattirvijñātā viṣṇunā tadā
इस प्रकार जब दनुजों से द्वेष रखने वाले देवता स्तुति कर रहे थे, तभी विष्णु को देवताओं की विपत्ति का ज्ञान हो गया।
श्लोक 7 (skanda.2.113.7)
सहसोत्थाय दैत्यारिः सक्रोधः खिन्नमानसः । आरूढो गरुडं वेगाल्लक्ष्मीं वचनमब्रवीत्
sahasotthāya daityāriḥ sakrodhaḥ khinnamānasaḥ ārūḍho garuḍaṁ vegāllakṣmīṁ vacanamabravīt
दैत्यशत्रु विष्णु अचानक उठकर, क्रोध से भरे तथा खिन्न मन से, वेगपूर्वक गरुड़ पर सवार होकर लक्ष्मी से बोले —
श्लोक 8 (skanda.2.113.8)
श्रीभगवानुवाच । जलंधरेण ते भ्रात्रा देवानां कदनं कृतम् । तैराहूतो गमिष्यामि युद्धायाद्य त्वरान्वितः
śrībhagavānuvāca jalaṁdhareṇa te bhrātrā devānāṁ kadanaṁ kṛtam tairāhūto gamiṣyāmi yuddhāyādya tvarānvitaḥ
श्रीभगवान् ने कहा — तुम्हारे भाई जलंधर ने देवताओं का संहार किया है; उनके बुलाने पर मैं आज शीघ्र युद्ध के लिए जाऊँगा।
श्लोक 9 (skanda.2.113.9)
श्रीरुवाच । अहं ते वल्लभा नाथ भक्त्या च यदि सर्वदा । तत्कथं ते मम भ्राता युद्धे वध्यः कृपानिधे
śrīruvāca ahaṁ te vallabhā nātha bhaktyā ca yadi sarvadā tatkathaṁ te mama bhrātā yuddhe vadhyaḥ kṛpānidhe
श्री ने कहा — हे नाथ, यदि मैं सदा भक्तिपूर्वक आपकी प्रिया हूँ, तो हे कृपानिधे, मेरा भाई युद्ध में आपके हाथों कैसे वध्य हो सकता है?
श्लोक 10 (skanda.2.113.10)
श्रीभगवानुवाच । रुद्रांशसंभवत्वाच्च ब्रह्मणो वचनादपि । प्रीत्या च तव नैवायं मम वध्यो जलंधरः
śrībhagavānuvāca rudrāṁśasaṁbhavatvācca brahmaṇo vacanādapi prītyā ca tava naivāyaṁ mama vadhyo jalaṁdharaḥ
श्रीभगवान् ने कहा — रुद्र के अंश से उत्पन्न होने के कारण, तथा ब्रह्मा के वचन के कारण भी, और तुम्हारे प्रेम के कारण भी, यह जलंधर मेरे द्वारा वध्य नहीं होगा।
श्लोक 11 (skanda.2.113.11)
नारद उवाच । इत्युक्त्वा गरुडारूढः शंखचक्रगदासिभृत् । विष्णुर्वेगाद्ययौ योद्धुं यत्र देवाः स्तुवंति ते
nārada uvāca ityuktvā garuḍārūḍhaḥ śaṁkhacakragadāsibhṛt viṣṇurvegādyayau yoddhuṁ yatra devāḥ stuvaṁti te
नारद ने कहा — ऐसा कहकर, गरुड़ पर सवार, शंख-चक्र-गदा-खड्ग धारण करने वाले विष्णु वेगपूर्वक वहाँ युद्ध के लिए गए, जहाँ वे देवता स्तुति कर रहे थे।
श्लोक 12 (skanda.2.113.12)
अथाऽरुणानुजात्युग्रपक्षवातप्रपीडिताः । वात्या विमर्दिता दैत्या बभ्रमुः खे यथा घनाः
athā'ruṇānujātyugrapakṣavātaprapīḍitāḥ vātyā vimarditā daityā babhramuḥ khe yathā ghanāḥ
तब गरुड़ के पंखों की अत्यंत उग्र वायु से पीड़ित होकर, आँधी से विचलित दैत्य आकाश में बादलों की भाँति घूमने लगे।
श्लोक 13 (skanda.2.113.13)
ततो जलंधरो दृष्ट्वा दैत्यान्वात्याप्रपीडितान् । उद्वृत्तनयनः क्रोधात्ततोविष्णुं समभ्ययात्
tato jalaṁdharo dṛṣṭvā daityānvātyāprapīḍitān udvṛttanayanaḥ krodhāttatoviṣṇuṁ samabhyayāt
तब जलंधर ने दैत्यों को आँधी से पीड़ित देखकर, क्रोध से आँखें फैलाकर विष्णु की ओर बढ़ा।
श्लोक 14 (skanda.2.113.14)
ततः समभवद्युद्धं विष्णुदैत्येंद्रयोर्महत् । आकाशं कुर्वतोर्बाणैस्तदा निरवकाशवत्
tataḥ samabhavadyuddhaṁ viṣṇudaityeṁdrayormahat ākāśaṁ kurvatorbāṇaistadā niravakāśavat
तत्पश्चात् विष्णु और दैत्यराज के बीच महान् युद्ध हुआ; बाणों से आकाश को भरते हुए वे मानो कोई स्थान खाली न छोड़ रहे थे।
श्लोक 15 (skanda.2.113.15)
विष्णुर्दैत्यस्य बाणौघैर्ध्वजं छत्रं धनुर्हयान् । चिच्छेद तं च हृदये बाणेनैकेन ताडयत्
viṣṇurdaityasya bāṇaughairdhvajaṁ chatraṁ dhanurhayān ciccheda taṁ ca hṛdaye bāṇenaikena tāḍayat
विष्णु ने बाणों की झड़ी से दैत्य की ध्वजा, छत्र, धनुष तथा घोड़ों को काट डाला, और उसे हृदय में एक ही बाण से मारा।
श्लोक 16 (skanda.2.113.16)
ततो दैत्यः समुत्पत्य गदापाणिस्त्वरान्वितः । आहत्य गरुडं मूर्ध्नि पातयामास भूतले
tato daityaḥ samutpatya gadāpāṇistvarānvitaḥ āhatya garuḍaṁ mūrdhni pātayāmāsa bhūtale
तब दैत्य ने उछलकर, हाथ में गदा लिए तुरंत गरुड़ के सिर पर प्रहार करके उसे पृथ्वी पर गिरा दिया।
श्लोक 17 (skanda.2.113.17)
विष्णुर्गदां स्वखङ्गेन चिच्छेद प्रहसन्निव । तावत्स हृदये विष्णुं जघान दृढमुष्टिना
viṣṇurgadāṁ svakhaṅgena ciccheda prahasanniva tāvatsa hṛdaye viṣṇuṁ jaghāna dṛḍhamuṣṭinā
विष्णु ने मानो हँसते हुए अपनी तलवार से उसकी गदा को काट डाला; तभी उसने विष्णु को दृढ़ मुट्ठी से हृदय पर मारा।
श्लोक 18 (skanda.2.113.18)
ततस्तौ बाहुयुद्धेन युयुधाते महाबलौ । बाहुभिर्मुष्टिभिश्चैव जानुभिर्नादयन्महीम्
tatastau bāhuyuddhena yuyudhāte mahābalau bāhubhirmuṣṭibhiścaiva jānubhirnādayanmahīm
तत्पश्चात् वे दोनों महाबली भुजाओं से युद्ध करने लगे, भुजाओं, मुट्ठियों तथा घुटनों से पृथ्वी को गुँजाते हुए।
श्लोक 19 (skanda.2.113.19)
एवं तौ सुचिरं युद्धं कृत्वा विष्णुः प्रतापवान् । उवाच दैत्यराजानं मेघगंभीरनिस्वनः
evaṁ tau suciraṁ yuddhaṁ kṛtvā viṣṇuḥ pratāpavān uvāca daityarājānaṁ meghagaṁbhīranisvanaḥ
इस प्रकार दोनों दीर्घकाल तक युद्ध करके, प्रतापी विष्णु ने मेघ के समान गंभीर स्वर में दैत्यराज से कहा —
श्लोक 20 (skanda.2.113.20)
विष्णुरुवाच । वरं वरय दैत्येंद्र प्रीतोऽस्मि तव विक्रमात् । अदेयमपि ते दद्मि यत्ते मनसि वर्तते
viṣṇuruvāca varaṁ varaya daityeṁdra prīto'smi tava vikramāt adeyamapi te dadmi yatte manasi vartate
विष्णु ने कहा — हे दैत्येंद्र, वर माँगो, मैं तुम्हारे पराक्रम से प्रसन्न हूँ; जो अदेय भी हो, वह भी मैं तुम्हें दूँगा, जो तुम्हारे मन में हो।
श्लोक 21 (skanda.2.113.21)
जलंधर उवाच । यदि भावुक तुष्टोऽसि वरमेनं ददस्व मे । मद्भगिन्या सहाऽद्य त्वं मद्गृहे सगणो वस
jalaṁdhara uvāca yadi bhāvuka tuṣṭo'si varamenaṁ dadasva me madbhaginyā sahā'dya tvaṁ madgṛhe sagaṇo vasa
जलंधर ने कहा — हे कृपालु, यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे यह वर दीजिए — आज मेरी बहन (लक्ष्मी) के साथ, अपने गणों सहित, मेरे घर में निवास कीजिए।
श्लोक 22 (skanda.2.113.22)
नारद उवाच । तथेत्युक्ता स भगवान्सर्वदेवगणैः सह । तदा जलंधरपुरमगमद्रमया सह
nārada uvāca tathetyuktā sa bhagavānsarvadevagaṇaiḥ saha tadā jalaṁdharapuramagamadramayā saha
नारद ने कहा — "ऐसा ही हो" कहकर वे भगवान् सम्पूर्ण देवगणों सहित, तब रमा के साथ जलंधर की नगरी में गए।
श्लोक 23 (skanda.2.113.23)
जलंधरस्तु देवानामधिकारेषु दानवान् । स्थापयित्वा महाबाहुः पुनरागान्महीतलम्
jalaṁdharastu devānāmadhikāreṣu dānavān sthāpayitvā mahābāhuḥ punarāgānmahītalam
महाबाहु जलंधर देवताओं के अधिकारों पर दानवों को स्थापित करके पुनः पृथ्वी-तल पर लौट आया।
श्लोक 24 (skanda.2.113.24)
देवगंधर्वसिद्धेषु यत्किंचिद्रत्नसंयुतम् । तदात्मवशगं कृत्वाऽतिष्ठत्सागरनंदनः
devagaṁdharvasiddheṣu yatkiṁcidratnasaṁyutam tadātmavaśagaṁ kṛtvā'tiṣṭhatsāgaranaṁdanaḥ
देवताओं, गंधर्वों तथा सिद्धों के पास जो भी रत्न थे, उन्हें अपने वश में करके समुद्र-पुत्र वहीं स्थित रहा।
श्लोक 25 (skanda.2.113.25)
पातालभुवने दैत्यं निशुंभं स महाबलम् । स्थापयित्वा स शेषादीनानयद्भूतलं बली
pātālabhuvane daityaṁ niśuṁbhaṁ sa mahābalam sthāpayitvā sa śeṣādīnānayadbhūtalaṁ balī
पाताल-लोक में महाबली दैत्य निशुंभ को स्थापित करके, उस बलवान ने शेष आदि को पृथ्वी-तल पर ला दिया।
श्लोक 26 (skanda.2.113.26)
देवगंधर्वसिद्धाऽऽद्यान्सर्पराक्षसमानुषान् । स्वपुरे नागरान्कृत्वा शशास भुवनत्रयम्
devagaṁdharvasiddhā''dyānsarparākṣasamānuṣān svapure nāgarānkṛtvā śaśāsa bhuvanatrayam
देवता, गंधर्व, सिद्ध आदि, सर्प, राक्षस तथा मनुष्यों को अपनी नगरी का नागरिक बनाकर उसने तीनों लोकों पर शासन किया।
श्लोक 27 (skanda.2.113.27)
एवं जलंधरः कृत्वा देवान्स्ववशवर्तिनः । धर्मेण पालयामास प्रजाः पुत्रानिवौरसान्
evaṁ jalaṁdharaḥ kṛtvā devānsvavaśavartinaḥ dharmeṇa pālayāmāsa prajāḥ putrānivaurasān
इस प्रकार जलंधर ने देवताओं को अपने वशवर्ती बनाकर, अपनी प्रजा को अपने सगे पुत्रों की भाँति धर्मपूर्वक पाला।
श्लोक 28 (skanda.2.113.28)
न कश्चिद्व्याधितो नैव दुःखी नैव कृतस्तथा । न दीनो दृश्यते तस्मिन्धर्माद्राज्यं प्रशासति
na kaścidvyādhito naiva duḥkhī naiva kṛtastathā na dīno dṛśyate tasmindharmādrājyaṁ praśāsati
जब वह धर्मपूर्वक राज्य का शासन करता था, तब उसके राज्य में कोई भी न रोगी, न दुःखी, न सताया हुआ, न दीन दिखाई देता था।
श्लोक 29 (skanda.2.113.29)
एवं महीं शासति दानवेंद्रे धर्मेण सम्यक्च दिदृक्षयाऽहम् । कदाचिदागामथ तस्य लक्ष्मीं विलोकितुं श्रीरमणं च सेवितुम्
evaṁ mahīṁ śāsati dānaveṁdre dharmeṇa samyakca didṛkṣayā'ham kadācidāgāmatha tasya lakṣmīṁ vilokituṁ śrīramaṇaṁ ca sevitum
इस प्रकार जब दानवेंद्र भलीभाँति धर्मपूर्वक पृथ्वी का शासन कर रहा था, तब मैं (नारद) भी उसकी शोभा देखने की इच्छा से, तथा श्रीरमण (विष्णु) की सेवा के लिए, एक बार वहाँ गया।