वैष्णव खण्ड · अध्याय 114
जलंधरोपाख्याने दूतवाक्यकथनम्
श्लोक 1 (skanda.2.114.1)
नारद उवाच । स मां प्रोवाच विधिवत्संपूज्यातीव भक्तिमान् । संप्रहस्य तदा वाक्यं स्नेहपूर्वं च वै नृप
nārada uvāca sa māṁ provāca vidhivatsaṁpūjyātīva bhaktimān saṁprahasya tadā vākyaṁ snehapūrvaṁ ca vai nṛpa
नारद ने कहा — अत्यंत भक्तिमान् उस जलंधर ने मेरा विधिपूर्वक सम्मान करके, हे राजन्, हँसते हुए स्नेहपूर्वक वचन कहे —
श्लोक 2 (skanda.2.114.2)
कुत आगम्यते ब्रह्मन्किचिद्दृष्टं त्वया प्रभो । यदर्थमिह चाऽऽयातस्तदाऽऽज्ञापय मां मुने
kuta āgamyate brahmankiciddṛṣṭaṁ tvayā prabho yadarthamiha cā''yātastadā''jñāpaya māṁ mune
"हे ब्रह्मन्, आप कहाँ से आ रहे हैं? हे प्रभो, क्या आपने कुछ विशेष देखा है? आप जिस प्रयोजन से यहाँ आए हैं, हे मुने, वह मुझे बताइए।"
श्लोक 3 (skanda.2.114.3)
नारद उवाच । गतः कैलासशिखरं दैत्येंद्राहं यदृच्छया । तत्रोमया समासीनं दृष्टवानस्मि शंकरम्
nārada uvāca gataḥ kailāsaśikharaṁ daityeṁdrāhaṁ yadṛcchayā tatromayā samāsīnaṁ dṛṣṭavānasmi śaṁkaram
नारद ने कहा — हे दैत्येंद्र, मैं इच्छानुसार कैलास शिखर पर गया था; वहाँ मैंने उमा के साथ विराजमान शंकर को देखा,
श्लोक 4 (skanda.2.114.4)
योजनायुतविस्तीर्णे कल्पवृक्षमहावने । कामधेनुशताकीर्णे चिंतामणिसुदीपिते
yojanāyutavistīrṇe kalpavṛkṣamahāvane kāmadhenuśatākīrṇe ciṁtāmaṇisudīpite
दस हज़ार योजन विस्तृत कल्पवृक्षों के महावन में, सैकड़ों कामधेनुओं से भरे हुए, चिंतामणियों से जगमगाते हुए।
श्लोक 5 (skanda.2.114.5)
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मयो मेऽभवत्तदा । क्वाऽपीदृशी भवेदृद्धिस्त्रैलोक्ये वा न वेति च
taddṛṣṭvā mahadāścaryaṁ vismayo me'bhavattadā kvā'pīdṛśī bhavedṛddhistrailokye vā na veti ca
यह देखकर मुझे महान् आश्चर्य हुआ — क्या कहीं और भी ऐसी समृद्धि हो सकती है, त्रैलोक्य में या नहीं?
श्लोक 6 (skanda.2.114.6)
तदा तवाऽपि दैत्येंद्र समृद्धिः संस्मृता मया । तद्विलोकनकामोऽस्मि त्वत्सान्निध्यमिहाऽऽगतः
tadā tavā'pi daityeṁdra samṛddhiḥ saṁsmṛtā mayā tadvilokanakāmo'smi tvatsānnidhyamihā''gataḥ
तभी, हे दैत्येंद्र, मुझे तुम्हारी समृद्धि का भी स्मरण हुआ; उसे देखने की इच्छा से ही मैं तुम्हारे समीप यहाँ आया हूँ।
श्लोक 7 (skanda.2.114.7)
त्वत्समृद्धिमिमां पश्यन्स्त्रीरत्नरहितां धुवम् । तर्कयामि शिवादन्यस्त्रिलोक्यां न समृद्धिमान्
tvatsamṛddhimimāṁ paśyanstrīratnarahitāṁ dhuvam tarkayāmi śivādanyastrilokyāṁ na samṛddhimān
तुम्हारी इस समृद्धि को देखकर, जो निश्चय ही स्त्री-रत्न से रहित है, मैं यह अनुमान लगाता हूँ कि शिव के अतिरिक्त त्रिलोक में कोई भी वास्तव में समृद्धिशाली नहीं है।
श्लोक 8 (skanda.2.114.8)
अप्सरोनागकन्याद्या यद्यपि त्वद्वशे स्थिताः । तथाऽपि ता न पार्वत्या रूपेण सदृशा ध्रुवम्
apsaronāgakanyādyā yadyapi tvadvaśe sthitāḥ tathā'pi tā na pārvatyā rūpeṇa sadṛśā dhruvam
यद्यपि अप्सराएँ, नाग-कन्याएँ आदि तुम्हारे वश में हैं, फिर भी वे निश्चय ही रूप में पार्वती के समान नहीं हैं।
श्लोक 9 (skanda.2.114.9)
यस्या लावण्यजलधौ निमग्नश्चतुराननः । स्वधैर्यममुचत्पूर्वं तया काऽन्योपमीयते
yasyā lāvaṇyajaladhau nimagnaścaturānanaḥ svadhairyamamucatpūrvaṁ tayā kā'nyopamīyate
जिनके सौंदर्य-सागर में स्वयं चतुर्मुख ब्रह्मा भी पहले डूबकर अपना धैर्य खो बैठे थे, उनकी तुलना और किससे की जाए?
श्लोक 10 (skanda.2.114.10)
वीतरागोऽपि हि यथा मदनारिः स्वलीलया । सौंदर्यगहनेऽभ्रामि शफरीरूपया पुरा
vītarāgo'pi hi yathā madanāriḥ svalīlayā sauṁdaryagahane'bhrāmi śapharīrūpayā purā
जैसे वीतराग शिव भी उनकी लीला से, पूर्वकाल में एक छोटी मछली के रूप में सौंदर्य के गहन सागर में मोहित होकर भटकने लगे थे।
श्लोक 11 (skanda.2.114.11)
यस्याः पुनः पुनः पश्यन्रूपं धाताऽपि सर्जने । ससर्जाऽप्सरसस्तासां तत्समैकाऽपि नाभवत्
yasyāḥ punaḥ punaḥ paśyanrūpaṁ dhātā'pi sarjane sasarjā'psarasastāsāṁ tatsamaikā'pi nābhavat
जिनके रूप को सृष्टि करते समय बार-बार देखते हुए, स्वयं विधाता ने अप्सराओं को रचा, फिर भी उनमें से एक भी उनके समान नहीं हुई।
श्लोक 12 (skanda.2.114.12)
अतः स्त्रीरत्नसंभोक्तुः समृद्धिस्तस्य सा वरा । तथा न तव दैत्येंद्र सर्वरत्नाऽधिपस्य च
ataḥ strīratnasaṁbhoktuḥ samṛddhistasya sā varā tathā na tava daityeṁdra sarvaratnā'dhipasya ca
इसलिए स्त्री-रत्न को भोगने वाले की ही समृद्धि श्रेष्ठ है; हे दैत्येंद्र, सम्पूर्ण रत्नों के स्वामी होते हुए भी तुम्हारी समृद्धि वैसी नहीं है।"
श्लोक 13 (skanda.2.114.13)
एवमुक्त्वा तमामंत्र्य गते सति स दैत्यराट् । तद्रूप श्रवणादासीदनंगज्वरपीडितः
evamuktvā tamāmaṁtrya gate sati sa daityarāṭ tadrūpa śravaṇādāsīdanaṁgajvarapīḍitaḥ
ऐसा कहकर, उससे विदा लेकर मैं चला गया; तत्पश्चात् वह दैत्यराज उस रूप को सुनने मात्र से ही काम-ज्वर से पीड़ित हो उठा।
श्लोक 14 (skanda.2.114.14)
अथ संप्रेषयामास स दूतं सिंहिकासुतम् । त्र्यंबकायाऽपि च तदा विष्णुमायाविमोहितः
atha saṁpreṣayāmāsa sa dūtaṁ siṁhikāsutam tryaṁbakāyā'pi ca tadā viṣṇumāyāvimohitaḥ
तत्पश्चात्, विष्णु की माया से मोहित होकर, उसने सिंहिका-पुत्र राहु को त्र्यंबक (शिव) के पास दूत बनाकर भेजा।
श्लोक 15 (skanda.2.114.15)
कैलासमगमद्राहुः कुर्वञ्छुक्लेंदुवर्चसम् । कार्ष्ण्येन कृष्णपक्षेन्दुवर्चसं स्वांगजेन तम्
kailāsamagamadrāhuḥ kurvañchukleṁduvarcasam kārṣṇyena kṛṣṇapakṣenduvarcasaṁ svāṁgajena tam
राहु कैलास गया, अपनी कालिमा से चंद्रमा की तरह उज्ज्वल पर्वत को मानो कृष्ण-पक्ष के चंद्रमा जैसी कांति में बदलता हुआ।
श्लोक 16 (skanda.2.114.16)
निवेदितस्तदेशाय नंदिना प्रविवेश सः । त्र्यंबकभ्रूलतासंज्ञा प्रेरितो वाक्यमब्रवीत्
niveditastadeśāya naṁdinā praviveśa saḥ tryaṁbakabhrūlatāsaṁjñā prerito vākyamabravīt
नंदी द्वारा उसकी सूचना दिए जाने पर वह अंदर प्रविष्ट हुआ; त्र्यंबक की भ्रू-लता के संकेत से प्रेरित होकर वह बोला —
श्लोक 17 (skanda.2.114.17)
राहुरुवाच । देवपन्नगसेव्यस्य त्रैलोक्याधिपतेः प्रभोः । सर्वरत्नेश्वरस्य त्वमाज्ञां शृणु वृषध्वज
rāhuruvāca devapannagasevyasya trailokyādhipateḥ prabhoḥ sarvaratneśvarasya tvamājñāṁ śṛṇu vṛṣadhvaja
राहु ने कहा — हे वृषभध्वज, देव-नागों द्वारा सेवित त्रैलोक्याधिपति प्रभु, सम्पूर्ण रत्नों के स्वामी की आज्ञा सुनो —
श्लोक 18 (skanda.2.114.18)
स्मशानवासिनो नित्यमस्थिभारवहस्य च । दिगंबरस्य ते भार्या कथं हैमवती शुभा
smaśānavāsino nityamasthibhāravahasya ca digaṁbarasya te bhāryā kathaṁ haimavatī śubhā
"सदा श्मशान में निवास करने वाले, हड्डियों का भार ढोने वाले, दिगंबर तुम्हारी पत्नी शुभ हैमवती (पार्वती) कैसे हो सकती है?
श्लोक 19 (skanda.2.114.19)
अहं रत्नाधिनाथोऽस्मि सा च स्त्रीरत्नसंज्ञिका । तस्मान्ममैव सा योग्या नैव भिक्षाशिनस्तव
ahaṁ ratnādhinātho'smi sā ca strīratnasaṁjñikā tasmānmamaiva sā yogyā naiva bhikṣāśinastava
मैं रत्नों का स्वामी हूँ, और वह स्त्री-रत्न कहलाती है; इसलिए वह मेरे ही योग्य है, भिक्षा माँगने वाले तुम्हारे योग्य कदापि नहीं।"
श्लोक 20 (skanda.2.114.20)
नारद उवाच । वदत्येवं तदा राहौ भ्रूमध्याच्छूलपाणिनः । अभवत्पुरुषो रौद्रस्तीव्राशनिसमस्वनः
nārada uvāca vadatyevaṁ tadā rāhau bhrūmadhyācchūlapāṇinaḥ abhavatpuruṣo raudrastīvrāśanisamasvanaḥ
नारद ने कहा — राहु के इस प्रकार कहते समय, त्रिशूलधारी शिव के भ्रू-मध्य से,
श्लोक 21 (skanda.2.114.21)
सिंहास्यः प्रललज्जिह्वः स ज्वलन्नयनो महान् । ऊर्ध्वकेशः शुष्कतनुर्नृसिंह इव चाऽपरः
siṁhāsyaḥ pralalajjihvaḥ sa jvalannayano mahān ūrdhvakeśaḥ śuṣkatanurnṛsiṁha iva cā'paraḥ
एक भयंकर, तीव्र वज्र के समान गर्जन करता हुआ पुरुष प्रकट हुआ, सिंह-मुख वाला, जिह्वा लपलपाता हुआ, जलती हुई आँखों वाला, विशाल,
श्लोक 22 (skanda.2.114.22)
स तं खादितुमायांतं दृष्ट्वा राहुर्भयातुरः । अधावत स वेगेन बहिः स च दधार तम्
sa taṁ khāditumāyāṁtaṁ dṛṣṭvā rāhurbhayāturaḥ adhāvata sa vegena bahiḥ sa ca dadhāra tam
ऊर्ध्व केशों वाला, सूखे शरीर वाला, मानो दूसरा नृसिंह हो। राहु उसे अपने को खाने के लिए आते देखकर भयभीत होकर,
श्लोक 23 (skanda.2.114.23)
स च राहुर्महाबाहो मेघगम्भीरया गिरा । उवाच देवदेव त्वं पाहि मां शरणागतम्
sa ca rāhurmahābāho meghagambhīrayā girā uvāca devadeva tvaṁ pāhi māṁ śaraṇāgatam
वेगपूर्वक बाहर की ओर भागा, परन्तु उसने उसे पकड़ लिया। और उस राहु ने, हे महाबाहो, मेघ के समान गंभीर स्वर में कहा —
श्लोक 24 (skanda.2.114.24)
ब्राह्मणं मां महादेव खादितुं समुपागतः । महादेवो वचः श्रुत्वा ब्राह्मणस्य तदाऽब्रवीत्
brāhmaṇaṁ māṁ mahādeva khādituṁ samupāgataḥ mahādevo vacaḥ śrutvā brāhmaṇasya tadā'bravīt
"हे देवदेव, शरणागत मेरी रक्षा कीजिए! हे महादेव, यह मुझ ब्राह्मण को खाने के लिए आया है।" महादेव ने ब्राह्मण के इन वचनों को सुनकर तब कहा —
श्लोक 25 (skanda.2.114.25)
नैवाऽसौ वध्यतामेति दूतोऽयं परवान्यतः । मुंचेति पुरुषः श्रुत्वा राहुं तत्याज्य सोंऽबरे
naivā'sau vadhyatāmeti dūto'yaṁ paravānyataḥ muṁceti puruṣaḥ śrutvā rāhuṁ tatyājya soṁ'bare
"इसे मत मारो, क्योंकि यह दूसरे के अधीन दूत है; इसे छोड़ दो" — यह सुनकर उस पुरुष ने राहु को छोड़ दिया, और वह आकाश में चला गया।
श्लोक 26 (skanda.2.114.26)
राहुं त्यक्त्वाऽथ पुरुषस्तदा रुद्रं व्यजिज्ञपत् । पुरुष उवाच । क्षुधा मां वाधतेऽत्यंतं क्षुत्क्षामश्चाऽस्मि सर्वथा
rāhuṁ tyaktvā'tha puruṣastadā rudraṁ vyajijñapat puruṣa uvāca kṣudhā māṁ vādhate'tyaṁtaṁ kṣutkṣāmaścā'smi sarvathā
राहु को छोड़कर तत्पश्चात् उस पुरुष ने रुद्र से विनती की। पुरुष ने कहा — "मुझे भूख अत्यंत सता रही है, मैं भूख से पूर्णतः क्षीण हो गया हूँ।
श्लोक 27 (skanda.2.114.27)
किं भक्षयामि देवेश तदाज्ञापय मां प्रभो । ईश्वर उवाच । भक्षयस्वात्मनः शीघ्रं मांसं त्वं हस्तपादयोः
kiṁ bhakṣayāmi deveśa tadājñāpaya māṁ prabho īśvara uvāca bhakṣayasvātmanaḥ śīghraṁ māṁsaṁ tvaṁ hastapādayoḥ
मैं क्या खाऊँ, हे देवेश? हे प्रभो, यह मुझे बताइए।" ईश्वर ने कहा — "तुम अपने ही हाथ-पैरों का मांस शीघ्र खा लो।"
श्लोक 28 (skanda.2.114.28)
नारद उवाच । स शिवेनैवमाज्ञप्तश्चखाद पुरुषः स्वकम् । हस्तपादोद्भवं मांसं शिरःशेषो यथाऽभवत्
nārada uvāca sa śivenaivamājñaptaścakhāda puruṣaḥ svakam hastapādodbhavaṁ māṁsaṁ śiraḥśeṣo yathā'bhavat
नारद ने कहा — शिव द्वारा इस प्रकार आज्ञप्त होकर वह पुरुष अपने ही हाथ-पैरों से उत्पन्न मांस को खा गया, यहाँ तक कि केवल सिर ही शेष रह गया।
श्लोक 29 (skanda.2.114.29)
दृष्ट्वा शिरोऽवशेषं तं सुप्रसन्नस्तदा शिवः । उवाच भीमकर्माणं पुरुषं जातविस्मयः
dṛṣṭvā śiro'vaśeṣaṁ taṁ suprasannastadā śivaḥ uvāca bhīmakarmāṇaṁ puruṣaṁ jātavismayaḥ
उसे केवल सिर-मात्र शेष देखकर, अत्यंत प्रसन्न हुए शिव ने आश्चर्यचकित होकर उस भयंकर कर्म वाले पुरुष से कहा —
श्लोक 30 (skanda.2.114.30)
ईश्वर उवाच । त्वं कीर्तिमुखसंज्ञो हि भव मद्द्वारिगः सदा । त्वदर्चां ये न कुर्वंति नैव ते मे प्रियंकराः
īśvara uvāca tvaṁ kīrtimukhasaṁjño hi bhava maddvārigaḥ sadā tvadarcāṁ ye na kurvaṁti naiva te me priyaṁkarāḥ
ईश्वर ने कहा — "तुम कीर्तिमुख नाम से जाने जाओगे, और सदा मेरे द्वारपाल बनोगे; जो तुम्हारा पूजन नहीं करते, वे मुझे कभी प्रिय नहीं होंगे।"
श्लोक 31 (skanda.2.114.31)
नारद उवाच । तदा प्रभृति देवस्य द्वारि कीर्तिमुखः स्थितः । नार्चयन्तीह ये पूर्वं तेषामर्चा वृथा भवेत्
nārada uvāca tadā prabhṛti devasya dvāri kīrtimukhaḥ sthitaḥ nārcayantīha ye pūrvaṁ teṣāmarcā vṛthā bhavet
नारद ने कहा — तभी से कीर्तिमुख भगवान् के द्वार पर विराजमान है; जो पहले उसकी पूजा नहीं करते, उनकी आगे की पूजा भी व्यर्थ हो जाती है।
श्लोक 32 (skanda.2.114.32)
राहुर्विमुक्तो यस्तेन सोऽपि तद्बर्बरे स्थले । अतः स बर्बरोद्भूत इति भूमौ प्रथां गतः
rāhurvimukto yastena so'pi tadbarbare sthale ataḥ sa barbarodbhūta iti bhūmau prathāṁ gataḥ
जिस बर्बर (जंगली) स्थान पर राहु उसके द्वारा छोड़ा गया, उसी कारण वह "बर्बरोद्भूत" कहलाकर पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 33 (skanda.2.114.33)
ततः स राहुः पुनरेव जातमात्मानमस्मिन्निति मन्यमानः । समेत्य सर्वं कथयांबभूव जलंधरायैव विचेष्टितं तत्
tataḥ sa rāhuḥ punareva jātamātmānamasminniti manyamānaḥ sametya sarvaṁ kathayāṁbabhūva jalaṁdharāyaiva viceṣṭitaṁ tat
तत्पश्चात् वह राहु, मानो इस घटना में अपने को पुनः जन्मा हुआ मानते हुए, स्वयं को सम्भालकर, यह सम्पूर्ण वृत्तांत जलंधर को ही सुनाने लगा।