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वैष्णव खण्ड · अध्याय 115

जलंधरोपाख्याने रुद्रसेनापराभवः

अध्याय 114अध्याय-सूचीअध्याय 116

श्लोक 1 (skanda.2.115.1)

नारद उवाच । जलंधरस्तु तच्छुत्वा कोपाकुलितविग्रहः । निर्जगामाऽऽशु दैत्यानां कोटिभिः परिवारितः

nārada uvāca jalaṁdharastu tacchutvā kopākulitavigrahaḥ nirjagāmā''śu daityānāṁ koṭibhiḥ parivāritaḥ

नारद ने कहा — यह सुनकर जलंधर, क्रोध से विचलित शरीर वाला होकर, करोड़ों दैत्यों से घिरा हुआ तुरंत निकल पड़ा।

श्लोक 2 (skanda.2.115.2)

गच्छतोऽस्याऽग्रतः शुक्रो राहुर्दृष्टिपथेऽभवत् । मुकुटश्चाऽपतद्भूमौ वेगात्प्रस्खलितस्तदा

gacchato'syā'grataḥ śukro rāhurdṛṣṭipathe'bhavat mukuṭaścā'patadbhūmau vegātpraskhalitastadā

जाते हुए उसके आगे शुक्राचार्य थे, और राहु उसकी दृष्टि में आया; वेग के कारण उसका मुकुट लड़खड़ाकर भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 3 (skanda.2.115.3)

दैत्यसैन्याऽऽवृतैस्तस्य विमानानां शतैस्तदा । व्यराजत नभःपूर्णं प्रावृषीव यथा घनैः

daityasainyā''vṛtaistasya vimānānāṁ śataistadā vyarājata nabhaḥpūrṇaṁ prāvṛṣīva yathā ghanaiḥ

दैत्य-सेना से घिरे उसके सैकड़ों विमानों से तब आकाश ऐसे सुशोभित हो उठा, मानो वर्षा-ऋतु में बादलों से भरा हो।

श्लोक 4 (skanda.2.115.4)

तस्योद्योगं तदा दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः । अलक्षितास्तदा जग्मुः शूलिनं तं व्यजिज्ञपुः

tasyodyogaṁ tadā dṛṣṭvā devāḥ śakrapurogamāḥ alakṣitāstadā jagmuḥ śūlinaṁ taṁ vyajijñapuḥ

उसकी इस तैयारी को देखकर, इंद्र सहित देवता तब अदृश्य होकर वहाँ गए और त्रिशूलधारी शिव से विनती की —

श्लोक 5 (skanda.2.115.5)

देवा ऊचुः । न जानासि कथं स्वामिन्देवापत्तिमिमां विभो । तदस्मद्रक्षणार्थाय जहि सागरनंदनम्

devā ūcuḥ na jānāsi kathaṁ svāmindevāpattimimāṁ vibho tadasmadrakṣaṇārthāya jahi sāgaranaṁdanam

देवताओं ने कहा — "हे स्वामिन्, हे विभो, आप देवताओं की इस विपत्ति को क्यों नहीं जानते? इसलिए हमारी रक्षा के लिए समुद्र-पुत्र को मार डालिए।"

श्लोक 6 (skanda.2.115.6)

नारद उवाच । इति देववचः श्रुत्वा प्रहस्य वृषभध्वजः । महाविष्णुं समाहूय वचनं चेदमब्रवीत्

nārada uvāca iti devavacaḥ śrutvā prahasya vṛṣabhadhvajaḥ mahāviṣṇuṁ samāhūya vacanaṁ cedamabravīt

नारद ने कहा — देवताओं के इस वचन को सुनकर, हँसते हुए वृषभध्वज शिव ने महाविष्णु को बुलाकर यह वचन कहा —

श्लोक 7 (skanda.2.115.7)

ईश्वर उवाच । जलंधरः कथं विष्णो न हतः संगरे त्वया । तद्गृहं चाऽपि यातोऽसि त्यक्त्वा वैकुंठमात्मनः

īśvara uvāca jalaṁdharaḥ kathaṁ viṣṇo na hataḥ saṁgare tvayā tadgṛhaṁ cā'pi yāto'si tyaktvā vaikuṁṭhamātmanaḥ

ईश्वर ने कहा — "हे विष्णु, जलंधर युद्ध में तुम्हारे द्वारा क्यों नहीं मारा गया? और तुम तो अपना वैकुण्ठ छोड़कर उसके घर भी चले गए!"

श्लोक 8 (skanda.2.115.8)

विष्णुरुवाच । तवांशसंभवत्वाच्च भ्रातृत्वाच्च तथा श्रियः । न मया निहतः संख्ये त्वमेनं जहि दानवम्

viṣṇuruvāca tavāṁśasaṁbhavatvācca bhrātṛtvācca tathā śriyaḥ na mayā nihataḥ saṁkhye tvamenaṁ jahi dānavam

विष्णु ने कहा — "आपके अंश से उत्पन्न होने के कारण, तथा श्री (लक्ष्मी) के भाई होने के कारण, वह युद्ध में मेरे द्वारा नहीं मारा गया; आप ही इस दानव को मारिए।"

श्लोक 9 (skanda.2.115.9)

ईश्वर उवाच । नायमेभिर्महातेजाः शस्त्रास्त्रैर्वध्यते मया । देवैः सह स्वतेजोंशं शस्त्रार्थं दीयतां मम

īśvara uvāca nāyamebhirmahātejāḥ śastrāstrairvadhyate mayā devaiḥ saha svatejoṁśaṁ śastrārthaṁ dīyatāṁ mama

ईश्वर ने कहा — "यह महातेजस्वी इन साधारण शस्त्रास्त्रों से मेरे द्वारा वध्य नहीं है; देवताओं सहित, तुम भी अपने-अपने तेज का अंश शस्त्र बनाने के लिए मुझे दो।"

श्लोक 10 (skanda.2.115.10)

नारद उवाच । अथ विष्णुमुखा देवाः स्वतेजांसि ददुस्तदा । तान्यैक्यमागतानीशो दृष्ट्वा स्वं चामुचन्महः

nārada uvāca atha viṣṇumukhā devāḥ svatejāṁsi dadustadā tānyaikyamāgatānīśo dṛṣṭvā svaṁ cāmucanmahaḥ

नारद ने कहा — तत्पश्चात् विष्णु सहित देवताओं ने अपने-अपने तेज दे दिए; उन्हें एक होते देखकर स्वयं ईश्वर ने भी अपना तेज छोड़ दिया।

श्लोक 11 (skanda.2.115.11)

तेनाकरोन्महादेवो महसा शस्त्रमुत्तमम् । चक्रं सुदर्शनं नाम ज्वालामालातिभीषणम्

tenākaronmahādevo mahasā śastramuttamam cakraṁ sudarśanaṁ nāma jvālāmālātibhīṣaṇam

उस तेज से महादेव ने एक उत्तम शस्त्र बनाया — ज्वाला-मालाओं से अत्यंत भयंकर सुदर्शन नामक चक्र।

श्लोक 12 (skanda.2.115.12)

ततः शेषेण च तदा वज्रं च कृतवान्हरिः । तावज्जलंधरो दृष्टः कैलासतलभूमिषु

tataḥ śeṣeṇa ca tadā vajraṁ ca kṛtavānhariḥ tāvajjalaṁdharo dṛṣṭaḥ kailāsatalabhūmiṣu

तत्पश्चात् शेषनाग की सहायता से हरि ने भी उस समय एक वज्र बनाया। तब तक जलंधर कैलास की तलहटी में दिखाई दिया,

श्लोक 13 (skanda.2.115.13)

हस्त्यश्वरथपत्तीनां कोटिभिः परिवारितः । तं दृष्ट्वा लक्षिता जग्मुर्देवाः सर्वे यथागताः

hastyaśvarathapattīnāṁ koṭibhiḥ parivāritaḥ taṁ dṛṣṭvā lakṣitā jagmurdevāḥ sarve yathāgatāḥ

करोड़ों हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकों से घिरा हुआ। उसे देखकर, अब प्रकट हुए सभी देवता जिस प्रकार आए थे, उसी प्रकार वापस गए।

श्लोक 14 (skanda.2.115.14)

गणाश्च समसज्जंत युद्धायाऽतित्वरान्विताः । नन्दीभवक्त्रसेनानीमुखाः सर्वे शिवाज्ञया

gaṇāśca samasajjaṁta yuddhāyā'titvarānvitāḥ nandībhavaktrasenānīmukhāḥ sarve śivājñayā

और शिव के गण अत्यंत शीघ्रता से युद्ध के लिए सज्जित हो गए, नंदी, भृंगी तथा सेनापति आदि सभी शिव की आज्ञा से।

श्लोक 15 (skanda.2.115.15)

अवतेरुर्गणा वेगात्कैलासाद्युद्धदुर्मदाः । ततः समभवद्युद्धं कैलासोपत्यकाभुवि

avaterurgaṇā vegātkailāsādyuddhadurmadāḥ tataḥ samabhavadyuddhaṁ kailāsopatyakābhuvi

युद्ध की उत्कंठा से मत्त गण वेगपूर्वक कैलास से उतरे; तत्पश्चात् कैलास की तलहटी में युद्ध छिड़ गया,

श्लोक 16 (skanda.2.115.16)

प्रमथाधिपदैत्यानां घोरशस्त्रास्त्रसंकुलम् । भेरीमृदंगशंखौघ निःस्वनैर्वीरहर्षणैः

pramathādhipadaityānāṁ ghoraśastrāstrasaṁkulam bherīmṛdaṁgaśaṁkhaugha niḥsvanairvīraharṣaṇaiḥ

प्रमथों के स्वामी (गणों) और दैत्यों के बीच, भयंकर शस्त्रास्त्रों से भरपूर, भेरी-मृदंग-शंखों की ध्वनियों से युक्त, वीरों को हर्षित करने वाला,

श्लोक 17 (skanda.2.115.17)

गजाश्वरथशब्दैश्च नादिता भूर्व्यकंपत । शक्तितोमरबाणौघमुसलप्रासपट्टिशैः

gajāśvarathaśabdaiśca nāditā bhūrvyakaṁpata śaktitomarabāṇaughamusalaprāsapaṭṭiśaiḥ

हाथी-घोड़े-रथों की ध्वनियों से गुँजायमान पृथ्वी काँप उठी; शक्ति, तोमर, बाणों की झड़ी, मूसल, प्रास तथा पट्टिशों से,

श्लोक 18 (skanda.2.115.18)

व्यराजत नभः पूर्णमुल्काभिरिव संवृतम् । निहतैरथनागाश्वपत्तिभिर्भूर्व्यराजत

vyarājata nabhaḥ pūrṇamulkābhiriva saṁvṛtam nihatairathanāgāśvapattibhirbhūrvyarājata

आकाश भरा हुआ मानो उल्काओं से आच्छादित हो उठा; मारे गए रथों, हाथियों, घोड़ों तथा पैदल सैनिकों से पृथ्वी छा गई,

श्लोक 19 (skanda.2.115.19)

वज्राहताचलशिरःशकलैरिव संवृता । प्रमथाहतदैत्यौघैर्दैत्याहतगणैस्तथा

vajrāhatācalaśiraḥśakalairiva saṁvṛtā pramathāhatadaityaughairdaityāhatagaṇaistathā

मानो वज्र से टूटे हुए पर्वत-शिखरों के टुकड़ों से आच्छादित हो; प्रमथों द्वारा मारे गए दैत्य-समूहों से तथा दैत्यों द्वारा मारे गए गणों से,

श्लोक 20 (skanda.2.115.20)

वसासृङ्मांसपंकाढ्या भूरगम्याऽभवत्तदा । प्रमथाहतदैत्यौघान्भार्गवः समजीवयत्

vasāsṛṅmāṁsapaṁkāḍhyā bhūragamyā'bhavattadā pramathāhatadaityaughānbhārgavaḥ samajīvayat

चर्बी, रक्त तथा मांस के कीचड़ से भरी हुई पृथ्वी अगम्य हो गई। शुक्राचार्य ने प्रमथों द्वारा मारे गए दैत्य-समूहों को,

श्लोक 21 (skanda.2.115.21)

युद्धे पुनः पुनस्तत्र मृतसंजीविनीबलात् । तं दृष्ट्वा व्याकुलीभूता गणाः सर्वे भयान्विताः । शशंसुर्देवदेवाय तत्सर्वं शुक्रचेष्टितम्

yuddhe punaḥ punastatra mṛtasaṁjīvinībalāt taṁ dṛṣṭvā vyākulībhūtā gaṇāḥ sarve bhayānvitāḥ śaśaṁsurdevadevāya tatsarvaṁ śukraceṣṭitam

युद्ध में बार-बार मृत-संजीवनी विद्या के बल से जीवित कर दिया। यह देखकर सभी गण व्याकुल तथा भयभीत हो गए, और उन्होंने शुक्राचार्य के इस समस्त कृत्य को देवदेव (शिव) से बताया।

श्लोक 22 (skanda.2.115.22)

अथ रुद्रमुखात्कृत्या बभूवाऽतीवभीषणा । तालजंघा दरीवक्त्रा स्तनापीडितभूरुहा

atha rudramukhātkṛtyā babhūvā'tīvabhīṣaṇā tālajaṁghā darīvaktrā stanāpīḍitabhūruhā

तब रुद्र के मुख से एक अत्यंत भयंकर कृत्या (राक्षसी शक्ति) प्रकट हुई, ताड़ के समान लंबे पैरों वाली, गुफा जैसे मुख वाली, वृक्षों को भी कुचल देने वाले स्तनों वाली,

श्लोक 23 (skanda.2.115.23)

सा युद्धभूमिमासाद्य भक्षयंती महासुरान् । भार्गवं स्वभगे धृत्वा जगामांतर्हिता नभः

sā yuddhabhūmimāsādya bhakṣayaṁtī mahāsurān bhārgavaṁ svabhage dhṛtvā jagāmāṁtarhitā nabhaḥ

वह युद्ध-भूमि में पहुँचकर महादैत्यों को खाती हुई, शुक्राचार्य को अपने गर्भ में धारण करके, अदृश्य होकर आकाश में चली गई।

श्लोक 24 (skanda.2.115.24)

विधृतं भार्गवं दृष्ट्वा दैत्यसैन्यं गणास्तदा । अम्लानवदना हर्षान्निजघ्नुर्युद्धदुर्मदाः

vidhṛtaṁ bhārgavaṁ dṛṣṭvā daityasainyaṁ gaṇāstadā amlānavadanā harṣānnijaghnuryuddhadurmadāḥ

शुक्राचार्य को इस प्रकार पकड़ा हुआ देखकर, गण तब निर्भीक मुख वाले होकर, युद्ध के हर्ष से मत्त होकर दैत्य-सेना का संहार करने लगे।

श्लोक 25 (skanda.2.115.25)

अथाभज्यत दैत्यानां सेना गणभयार्दिता । वायुवेगेनाहतेव प्रकीर्णा तृणसंततिः । भग्नां गणभयात्सेनां दृष्ट्वामर्षयुता ययुः । निशुंभशुंभौ सेनान्यौ कालनेमिश्च वीर्यवान्

athābhajyata daityānāṁ senā gaṇabhayārditā vāyuvegenāhateva prakīrṇā tṛṇasaṁtatiḥ bhagnāṁ gaṇabhayātsenāṁ dṛṣṭvāmarṣayutā yayuḥ niśuṁbhaśuṁbhau senānyau kālanemiśca vīryavān

तत्पश्चात् गणों के भय से पीड़ित दैत्यों की सेना भाग खड़ी हुई, मानो वायु के वेग से बिखरे हुए तिनकों का समूह हो। गणों के भय से टूटी हुई सेना को देखकर क्रोधित होकर, निशुंभ और शुंभ नामक दोनों सेनापति तथा बलशाली कालनेमि आगे बढ़े।

श्लोक 26 (skanda.2.115.26)

त्रयस्ते वारयामासुर्गणसेनां महाबलाः । मुञ्चतः शरवर्षाणि प्रावृषीव बलाहकाः

trayaste vārayāmāsurgaṇasenāṁ mahābalāḥ muñcataḥ śaravarṣāṇi prāvṛṣīva balāhakāḥ

वे तीनों महाबली, वर्षा-ऋतु के बादलों की भाँति बाणों की वर्षा छोड़ते हुए, गणों की सेना को रोकने लगे।

श्लोक 27 (skanda.2.115.27)

ततो दैत्यशरौघास्ते शलभानामिव व्रजाः । रुरुधुः खं दिशः सर्वा गणसेनामकंपयन्

tato daityaśaraughāste śalabhānāmiva vrajāḥ rurudhuḥ khaṁ diśaḥ sarvā gaṇasenāmakaṁpayan

तत्पश्चात् उन दैत्यों के बाणों के समूह, टिड्डियों के झुंड के समान, सभी दिशाओं में आकाश को रोककर गणों की सेना को कँपा दिया।

श्लोक 28 (skanda.2.115.28)

गणाः शरशतैर्भिन्ना रुधिरासारवर्षिणः । वसंते किंशुकाभासा न प्राज्ञायत किंचन

gaṇāḥ śaraśatairbhinnā rudhirāsāravarṣiṇaḥ vasaṁte kiṁśukābhāsā na prājñāyata kiṁcana

सैकड़ों बाणों से बिंधे हुए, रक्त की धारा बहाते हुए गण, वसंत ऋतु के किंशुक पुष्पों के समान लाल दिखाई देने लगे; कुछ भी स्पष्ट पहचाना नहीं जा सका।

श्लोक 29 (skanda.2.115.29)

पतिताः पात्यमानाश्च भिन्नाश्छिन्नास्तदा गणाः । त्यक्त्वा संग्रामभूमिं ते सर्वेपि विमुखाऽभवन्

patitāḥ pātyamānāśca bhinnāśchinnāstadā gaṇāḥ tyaktvā saṁgrāmabhūmiṁ te sarvepi vimukhā'bhavan

गिरते हुए तथा गिराए जाते हुए, बिंधे हुए और कटे हुए गण तब सभी युद्ध-भूमि छोड़कर पीठ दिखाकर भाग गए।

श्लोक 30 (skanda.2.115.30)

ततः प्रभग्नं स्वबलं विलोक्य शैलादिलंबोदरकार्तिकेयाः । त्वरान्विता दैत्यवरान्प्रसह्य निवारयामासुरमर्षिणस्ते

tataḥ prabhagnaṁ svabalaṁ vilokya śailādilaṁbodarakārtikeyāḥ tvarānvitā daityavarānprasahya nivārayāmāsuramarṣiṇaste

तत्पश्चात् अपनी सेना को टूटा हुआ देखकर, शैलादि (नंदी), लंबोदर (गणेश) तथा कार्तिकेय क्रोधित होकर शीघ्रतापूर्वक श्रेष्ठ दैत्यों को बलपूर्वक रोकने लगे।

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