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वैष्णव खण्ड · अध्याय 116

वीरभद्र का पतन

अध्याय 115अध्याय-सूचीअध्याय 117

श्लोक 1 (skanda.2.116.1)

॥नारद उवाच॥ ते गणाधिपतीन्दृष्ट्वा नंदीभमुखषण्मुखान् ॥ अमर्षादभ्यधावंत द्वंद्वयुद्धाय दानवाः

nārada uvāca te gaṇādhipatīndṛṣṭvā nandībhamukhaṣaṇmukhān || amarṣādabhyadhāvaṁta dvaṁdvayuddhāya dānavāḥ

नारद ने कहा - गणों के उन अधिपतियों - नन्दी, गजमुख (गणेश) और षण्मुख (कार्तिकेय) - को देखकर दानव क्रोधवश द्वंद्वयुद्ध के लिए दौड़ पड़े।

श्लोक 2 (skanda.2.116.2)

नन्दिनं कालनेमिश्च शुम्भो लंबोदरं तथा ॥ निशुम्भः षण्मुखं वेगादभ्यधावत दंशितः

nandinaṁ kālanemiśca śumbho laṁbodaraṁ tathā || niśumbhaḥ ṣaṇmukhaṁ vegādabhyadhāvata daṁśitaḥ

कालनेमि नन्दी पर, शुम्भ लम्बोदर (गणेश) पर, और कवचधारी निशुम्भ वेग से षण्मुख (कार्तिकेय) पर टूट पड़ा।

श्लोक 3 (skanda.2.116.3)

निशुम्भः कार्तिकेयस्य मयूरं पंचभिः शरैः ॥ हृदि विव्याध वेगेन मूर्च्छितः स पपात च

niśumbhaḥ kārtikeyasya mayūraṁ paṁcabhiḥ śaraiḥ || hṛdi vivyādha vegena mūrcchitaḥ sa papāta ca

निशुम्भ ने कार्तिकेय के मयूर को पाँच बाणों से वेगपूर्वक हृदय में बींध दिया, जिससे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।

श्लोक 4 (skanda.2.116.4)

ततः शक्तिधरः शक्तिं यावज्जग्राह रोषितः ॥ तावन्निशुंभो वेगेन स्वशक्त्या तमपातयत्

tataḥ śaktidharaḥ śaktiṁ yāvajjagrāha roṣitaḥ || tāvanniśuṁbho vegena svaśaktyā tamapātayat

तब जैसे ही शक्तिधारी कार्तिकेय ने क्रोधित होकर अपनी शक्ति उठाई, वैसे ही निशुम्भ ने वेग से अपनी शक्ति द्वारा उन्हें गिरा दिया।

श्लोक 5 (skanda.2.116.5)

नंदीश्वरः शरव्रातैः कालनेमिमवध्यत ॥ सप्तभिश्च हयान्केतुं त्रिभिः सारथिमच्छिनत्

nandīśvaraḥ śaravrātaiḥ kālanemimavadhyata || saptabhiśca hayānketuṁ tribhiḥ sārathimacchinat

नन्दीश्वर ने बाणों की झड़ी से कालनेमि को घायल किया; सात बाणों से उसके घोड़ों और ध्वज को तथा तीन बाणों से सारथि को काट डाला।

श्लोक 6 (skanda.2.116.6)

कालनेमिस्तु संक्रुद्धो धनुश्चिच्छेद नंदिनः ॥ तदपास्य स शूलेन तं वक्षस्यहनद्बली

kālanemistu saṁkruddho dhanuściccheda nandinaḥ || tadapāsya sa śūlena taṁ vakṣasyahanadbalī

कालनेमि ने क्रोधित होकर नन्दी का धनुष काट दिया, और उसे त्यागकर त्रिशूल से बलपूर्वक उनके वक्षस्थल पर प्रहार किया।

श्लोक 7 (skanda.2.116.7)

स शूलभिन्नहृदयो हताश्वो हतसारथिः ॥ अद्रेः शिखरमामुच्य शैलादिं सोऽप्यपातयत्

sa śūlabhinnahṛdayo hatāśvo hatasārathiḥ || adreḥ śikharamāmucya śailādiṁ so'pyapātayat

त्रिशूल से हृदय बिंधने पर, घोड़े और सारथि के मारे जाने पर, कालनेमि ने एक पर्वत-शिखर उठाकर शैलादि (नन्दी) को भी गिरा दिया।

श्लोक 8 (skanda.2.116.8)

अथ शुंभो गणेशश्च रथमूषकवाहनौ ॥ युध्यमानौ शरव्रातैः परस्परमविध्यताम्

atha śuṁbho gaṇeśaśca rathamūṣakavāhanau || yudhyamānau śaravrātaiḥ parasparamavidhyatām

तब शुम्भ और गणेश - एक रथ पर, दूसरा मूषक पर सवार - परस्पर युद्ध करते हुए बाणों की झड़ी से एक-दूसरे को बींधने लगे।

श्लोक 9 (skanda.2.116.9)

गणेशस्तु तदा शुंभं हृदि विव्याध पत्रिणा ॥ सारथिं च त्रिभिर्बाणैः पातयामास भूतले

gaṇeśastu tadā śuṁbhaṁ hṛdi vivyādha patriṇā || sārathiṁ ca tribhirbāṇaiḥ pātayāmāsa bhūtale

गणेश ने शुम्भ के हृदय में पंखयुक्त बाण मारा और तीन बाणों से उसके सारथि को भूमि पर गिरा दिया।

श्लोक 10 (skanda.2.116.10)

ततोऽतिक्रुद्धः शुंभोऽपि बाणषष्ट्या गणाधिपम् ॥ मूषकं च त्रिभिर्विद्ध्वा ननाद जलदस्वनः

tato'tikruddhaḥ śuṁbho'pi bāṇaṣaṣṭyā gaṇādhipam || mūṣakaṁ ca tribhirviddhvā nanāda jaladasvanaḥ

तब अत्यंत क्रुद्ध शुम्भ ने साठ बाणों से गणाधिप को तथा तीन बाणों से मूषक को बींधकर मेघ के समान गर्जना की।

श्लोक 11 (skanda.2.116.11)

मूषकः शरभिन्नांगश्चचाल दृढवेदनः ॥ लंबोदरश्च पतितः पदातिरभवन्नृप

mūṣakaḥ śarabhinnāṁgaścacāla dṛḍhavedanaḥ || laṁbodaraśca patitaḥ padātirabhavannṛpa

बाणों से बिंधे अंगों वाला मूषक तीव्र वेदना से डगमगाने लगा, और लम्बोदर गिरकर पैदल हो गए, हे राजन्!

श्लोक 12 (skanda.2.116.12)

ततो लंबोदरः शुंभं हत्वा परशुना हृदि ॥ अपातयत्तदा भूमौ मूषकं चारुहत्पुनः

tato laṁbodaraḥ śuṁbhaṁ hatvā paraśunā hṛdi || apātayattadā bhūmau mūṣakaṁ cāruhatpunaḥ

तब लम्बोदर ने परशु से शुम्भ के हृदय पर प्रहार कर उसे भूमि पर गिरा दिया और पुनः अपने मूषक पर आरूढ़ हो गए।

श्लोक 13 (skanda.2.116.13)

कालनेमिर्निशुंभश्चाऽप्युभौ लंबोदरं शरैः ॥ युगपज्जघ्नतुः क्रोधात्तोत्रैरिव महाद्विपम्

kālanemirniśuṁbhaścā'pyubhau laṁbodaraṁ śaraiḥ || yugapajjaghnatuḥ krodhāttotrairiva mahādvipam

कालनेमि और निशुम्भ दोनों ने क्रोधवश एक साथ बाणों से लम्बोदर पर वैसे ही प्रहार किया जैसे अंकुशों से महागज को हांका जाता है।

श्लोक 14 (skanda.2.116.14)

तं पीडयमानमालोक्य वीरभद्रो महाबलः ॥ अभ्यधावत वेगेन भूतकोटियुतस्तदा

taṁ pīḍayamānamālokya vīrabhadro mahābalaḥ || abhyadhāvata vegena bhūtakoṭiyutastadā

उन्हें इस प्रकार पीड़ित देखकर महाबली वीरभद्र करोड़ों भूतगणों सहित वेग से दौड़ पड़े।

श्लोक 15 (skanda.2.116.15)

कूष्मांडभैरवाश्चाऽपि वेताला योगिनीगणाः ॥ पिशाचयोगिनीसंघा गणाश्चाऽपि तमन्वयुः

kūṣmāṁḍabhairavāścā'pi vetālā yoginīgaṇāḥ || piśācayoginīsaṁghā gaṇāścā'pi tamanvayuḥ

कूष्मांड-भैरव, वेताल, योगिनी-गण, पिशाच-योगिनी-समूह तथा अन्य गण भी उनके पीछे-पीछे चले।

श्लोक 16 (skanda.2.116.16)

ततः किलकिलाशब्दैः सिंहनादैः सुघर्घरैः ॥ भेरीतालमृदंगैश्च पृथिवी समकंपत

tataḥ kilakilāśabdaiḥ siṁhanādaiḥ sughargharaiḥ || bherītālamṛdaṁgaiśca pṛthivī samakaṁpata

तब किलकिल शब्दों, सिंहनादों, गंभीर घर्घर ध्वनियों तथा भेरी-ताल-मृदंगों के नाद से पृथ्वी कांप उठी।

श्लोक 17 (skanda.2.116.17)

ततो भूतान्यधावंत भक्षयंतिस्म दानवान् ॥ उत्पतंत्यापतंति स्म ननृतुश्च रणांगणे

tato bhūtānyadhāvaṁta bhakṣayaṁtisma dānavān || utpataṁtyāpataṁti sma nanṛtuśca raṇāṁgaṇe

तब भूतगण दौड़कर दानवों को खाने लगे; वे कूदते-फांदते और रणभूमि में नाचते रहे।

श्लोक 18 (skanda.2.116.18)

नन्दी च कार्तिकेयश्च समाश्वस्य त्वरत्वितौ ॥ निजघ्नतू रणे दैत्यान्निरंतरशरव्रजैः

nandī ca kārtikeyaśca samāśvasya tvaratvitau || nijaghnatū raṇe daityānniraṁtaraśaravrajaiḥ

नन्दी और कार्तिकेय, पुनः स्वस्थ होकर, वेगपूर्वक निरंतर बाणों की झड़ी से युद्ध में दैत्यों का संहार करने लगे।

श्लोक 19 (skanda.2.116.19)

छिन्नभिन्ना हतैर्देत्यैः पतितैर्भक्षितैस्तदा ॥ व्याकुला साऽभवत्सेना विषण्णवदना तदा

chinnabhinnā hatairdetyaiḥ patitairbhakṣitaistadā || vyākulā sā'bhavatsenā viṣaṇṇavadanā tadā

मारे गए, गिरे हुए और खाए गए दैत्यों से छिन्न-भिन्न होकर वह सेना व्याकुल और उदास मुख वाली हो गई।

श्लोक 20 (skanda.2.116.20)

प्रविध्वस्तां तदा सेनां दृष्ट्वा सागरनंदनः ॥ रथेनाऽतिपताकेन गणानभिययौ बली

pravidhvastāṁ tadā senāṁ dṛṣṭvā sāgaranaṁdanaḥ || rathenā'tipatākena gaṇānabhiyayau balī

अपनी सेना को इस प्रकार तहस-नहस देखकर सागर-नंदन (जलंधर) महान ध्वजयुक्त रथ पर गणों के सम्मुख आगे बढ़ा।

श्लोक 21 (skanda.2.116.21)

हस्त्यश्वरथसंह्रादाः शंखभेरीस्वनास्तथा ॥ अभवन्सिंहनादाश्च सेनयोरुभयोस्तदा

hastyaśvarathasaṁhrādāḥ śaṁkhabherīsvanāstathā || abhavansiṁhanādāśca senayorubhayostadā

तब दोनों सेनाओं में हाथी, घोड़े और रथों की गड़गड़ाहट, शंख-भेरी की ध्वनि तथा सिंहनाद गूंजने लगे।

श्लोक 22 (skanda.2.116.22)

जलंधरशरव्रातैर्नीहारपटलैरिव ॥ द्यावापृथिव्योराच्छिन्नमंतरं समपद्यत

jalaṁdharaśaravrātairnīhārapaṭalairiva || dyāvāpṛthivyorācchinnamaṁtaraṁ samapadyata

जलंधर के बाणों की झड़ी से मानो कुहासे की चादर से आकाश और पृथ्वी के बीच का अंतर ही ढँक गया।

श्लोक 23 (skanda.2.116.23)

गणेशं पंचभिर्विद्ध्वा शैलादिं नवभिः शरैः ॥ वीरभद्रं च विंशत्या ननाद जलदस्वनः

gaṇeśaṁ paṁcabhirviddhvā śailādiṁ navabhiḥ śaraiḥ || vīrabhadraṁ ca viṁśatyā nanāda jaladasvanaḥ

गणेश को पाँच बाणों से, शैलादि (नन्दी) को नौ बाणों से और वीरभद्र को बीस बाणों से बींधकर वह मेघ के समान गरजा।

श्लोक 24 (skanda.2.116.24)

कार्तिकेयस्तदा दैत्यं शक्त्या विव्याध सत्वरः ॥ युयुधे शक्तिनिर्भिन्नः किंचिद्व्याकुलमानसः

kārtikeyastadā daityaṁ śaktyā vivyādha satvaraḥ || yuyudhe śaktinirbhinnaḥ kiṁcidvyākulamānasaḥ

कार्तिकेय ने तत्काल अपनी शक्ति से उस दैत्य को बींध दिया; शक्ति से बिंधकर वह भी कुछ व्याकुल मन से युद्ध करता रहा।

श्लोक 25 (skanda.2.116.25)

ततः क्रोधपरीताक्षः कार्तिकेयं जलंधरः ॥ गदया ताडयामास स च भूमितलेऽपतत्

tataḥ krodhaparītākṣaḥ kārtikeyaṁ jalaṁdharaḥ || gadayā tāḍayāmāsa sa ca bhūmitale'patat

तब क्रोध से लाल आँखों वाले जलंधर ने गदा से कार्तिकेय पर प्रहार किया, और वे भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 26 (skanda.2.116.26)

तथैव नंदिनं वेगादपातयत भूतले ॥ ततो गणेश्वरः क्रुद्धो गदां परशुनाऽहनत्

tathaiva nandinaṁ vegādapātayata bhūtale || tato gaṇeśvaraḥ kruddho gadāṁ paraśunā'hanat

उसी प्रकार उसने वेग से नन्दी को भी भूमि पर गिरा दिया; तब क्रुद्ध गणेश्वर (गणेश) ने परशु से उसकी गदा पर प्रहार किया।

श्लोक 27 (skanda.2.116.27)

वीरभद्रस्त्रिभिर्बाणैर्हृदि विव्याध दानवम् ॥ सप्तभिश्च हयान्केतुं धनुश्छत्रं च चिच्छिदे

vīrabhadrastribhirbāṇairhṛdi vivyādha dānavam || saptabhiśca hayānketuṁ dhanuśchatraṁ ca cicchide

वीरभद्र ने तीन बाणों से दानव के हृदय को बींधा और सात बाणों से उसके घोड़े, ध्वज, धनुष और छत्र को काट डाला।

श्लोक 28 (skanda.2.116.28)

ततोऽतिक्रुद्धो दैत्येंद्रः शक्तिमुद्यम्य दारुणाम् ॥ गणेशं पातयामास रथं चाऽन्यमथाऽऽरुहत्

tato'tikruddho daityeṁdraḥ śaktimudyamya dāruṇām || gaṇeśaṁ pātayāmāsa rathaṁ cā'nyamathā'āruhat

तब अत्यंत क्रुद्ध दैत्येंद्र ने भयंकर शक्ति उठाकर गणेश को गिरा दिया और दूसरे रथ पर सवार हो गया।

श्लोक 29 (skanda.2.116.29)

अभ्ययादथ वेगेन वीरभद्रं रुषान्वितः ॥ ततस्तौ सूर्यसंकाशौ युयुधाते परस्परम्

abhyayādatha vegena vīrabhadraṁ ruṣānvitaḥ || tatastau sūryasaṁkāśau yuyudhāte parasparam

फिर क्रोधपूर्वक वह वेग से वीरभद्र की ओर बढ़ा, और वे दोनों सूर्य के समान तेजस्वी योद्धा परस्पर युद्ध करने लगे।

श्लोक 30 (skanda.2.116.30)

वीरभद्रः पुनस्तस्य हयान्बाणैरपातयत् ॥ धनुश्चिच्छेद दैत्येंद्रः पुप्लुवे परिघायुधः

vīrabhadraḥ punastasya hayānbāṇairapātayat || dhanuściccheda daityeṁdraḥ pupluve parighāyudhaḥ

वीरभद्र ने पुनः बाणों से उसके घोड़ों को गिराया और धनुष काट दिया; दैत्येंद्र लोहे की गदा (परिघ) लेकर कूद पड़ा।

श्लोक 31 (skanda.2.116.31)

स वीरभद्रं त्वरयाऽभिगम्य जघान दैत्यः परिघेण मूर्ध्नि ॥ स चाऽपि वीरः प्रविभिन्नमूर्द्धा पपात भूमौ रुधिरं समुद्गिरन्

sa vīrabhadraṁ tvarayā'bhigamya jaghāna daityaḥ parighena mūrdhni || sa cā'pi vīraḥ pravibhinnamūrddhā papāta bhūmau rudhiraṁ samudgiran

उस दैत्य ने शीघ्रता से वीरभद्र के पास जाकर परिघ से उसके सिर पर प्रहार किया; वह वीर भी सिर फटने से रक्त वमन करता हुआ भूमि पर गिर पड़ा।

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