वैष्णव खण्ड · अध्याय 117
शिव-जलंधर युद्ध
श्लोक 1 (skanda.2.117.1)
॥नारद उवाच॥ पतितं वीरभद्रं तु दृष्ट्वा रुद्रगणा भयात् ॥ अगमंस्ते रणं हित्वा क्रोशमाना महेश्वरम्
nārada uvāca patitaṁ vīrabhadraṁ tu dṛṣṭvā rudragaṇā bhayāt || agamaṁste raṇaṁ hitvā krośamānā maheśvaram
नारद ने कहा - वीरभद्र को गिरा हुआ देखकर रुद्र के गण भयभीत होकर, युद्धभूमि छोड़कर, चिल्लाते हुए महेश्वर के पास गए।
श्लोक 2 (skanda.2.117.2)
अथ कोलाहलं श्रुत्वा गणानां चंद्रशेखरः ॥ अभ्ययाद्वृषभारूढः संग्रामं प्रहसन्निव
atha kolāhalaṁ śrutvā gaṇānāṁ caṁdraśekharaḥ || abhyayādvṛṣabhārūḍhaḥ saṁgrāmaṁ prahasanniva
तब गणों का कोलाहल सुनकर चंद्रशेखर (शिव) वृषभ पर आरूढ़ होकर मानो हँसते हुए संग्राम की ओर चल पड़े।
श्लोक 3 (skanda.2.117.3)
रुद्रमायांतमालोक्य सिंहनादैर्गणाः पुनः ॥ निवृत्ताः संगरे दैत्यान्निर्जघ्नुः शरवृष्टिभिः
rudramāyāṁtamālokya siṁhanādairgaṇāḥ punaḥ || nivṛttāḥ saṁgare daityānnirjaghnuḥ śaravṛṣṭibhiḥ
रुद्र को आते देखकर गण पुनः सिंहनाद करते हुए युद्धभूमि में लौट आए और बाणों की वर्षा से दैत्यों का संहार करने लगे।
श्लोक 4 (skanda.2.117.4)
दैत्याश्च भीषणं दृष्ट्वा सर्वे चैव विदुद्रुवुः ॥ कार्तिकव्रतिनं दृष्ट्वा पातकानीव तद्भयात्
daityāśca bhīṣaṇaṁ dṛṣṭvā sarve caiva vidudruvuḥ || kārtikavratinaṁ dṛṣṭvā pātakānīva tadbhayāt
उस भयंकर (शिव) को देखकर सभी दैत्य उसी भय से भाग खड़े हुए, जैसे कार्तिक-व्रती को देखकर पाप भाग जाते हैं।
श्लोक 5 (skanda.2.117.5)
जलंधरोथ तान्दैत्यान्निवृत्तान्प्रेक्ष्य संगरे ॥ रोषादधावच्चंडीशं मुंचन्बाणान्सहस्रशः
jalaṁdharotha tāndaityānnivṛttānprekṣya saṁgare || roṣādadhāvaccaṁḍīśaṁ muṁcanbāṇānsahasraśaḥ
तब जलंधर ने उन दैत्यों को युद्ध से पीछे हटते देखकर क्रोधपूर्वक हजारों बाण छोड़ते हुए चंडीश (शिव) की ओर दौड़ लगाई।
श्लोक 6 (skanda.2.117.6)
शुंभो निशुंभोऽश्वमुखः कालनेमिर्बलाहकः ॥ खड्गरोमा प्रचंडश्च घस्मराद्याः शिवं ययुः
śuṁbho niśuṁbho'śvamukhaḥ kālanemirbalāhakaḥ || khaḍgaromā pracaṁḍaśca ghasmarādyāḥ śivaṁ yayuḥ
शुम्भ, निशुम्भ, अश्वमुख, कालनेमि, बलाहक, खड्गरोमा, प्रचण्ड, घस्मर आदि दैत्य शिव की ओर बढ़े।
श्लोक 7 (skanda.2.117.7)
बाणांधकारसंछन्नं दृष्ट्वा गणबलं शिवः ॥ बाणजालमवाच्छिद्य स्वबाणैरावृणोन्नभः
bāṇāṁdhakārasaṁchannaṁ dṛṣṭvā gaṇabalaṁ śivaḥ || bāṇajālamavācchidya svabāṇairāvṛṇonnabhaḥ
गणों की सेना को बाणों के अंधकार से ढका देखकर शिव ने उस बाण-जाल को काट डाला और अपने बाणों से आकाश को ढँक दिया।
श्लोक 8 (skanda.2.117.8)
दैत्यांश्च बाणवात्याभिः पीडितानकरोत्तदा ॥ प्रचंडबाणजालौघैरपातयत भूतले
daityāṁśca bāṇavātyābhiḥ pīḍitānakarottadā || pracaṁḍabāṇajālaughairapātayata bhūtale
उसने बाणों की आँधी से दैत्यों को पीड़ित कर दिया और प्रचंड बाण-समूहों की धाराओं से उन्हें भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 9 (skanda.2.117.9)
खड्गरोम्णः शिरः कायात्तदा परशुनाऽच्छिनत् ॥ बलाहकस्य च शिरः खट्वांगेनाऽकरोद्द्विधा
khaḍgaromṇaḥ śiraḥ kāyāttadā paraśunā'cchinat || balāhakasya ca śiraḥ khaṭvāṁgenā'karoddvidhā
उसने परशु से खड्गरोमा का सिर धड़ से काट डाला और खट्वांग से बलाहक के सिर के दो टुकड़े कर दिए।
श्लोक 10 (skanda.2.117.10)
बद्ध्वा च घस्मरं दैत्यं पाशेनाभ्यहनद्भुवि ॥ वृषभेण हताः केचित्केचिद्बाणैर्निपातिताः
baddhvā ca ghasmaraṁ daityaṁ pāśenābhyahanadbhuvi || vṛṣabheṇa hatāḥ kecitkecidbāṇairnipātitāḥ
उसने घस्मर दैत्य को पाश से बांधकर भूमि पर पटक दिया; कुछ दैत्य वृषभ द्वारा मारे गए, कुछ बाणों से गिराए गए।
श्लोक 11 (skanda.2.117.11)
न शेकुरसुराः स्थातुं गजाः सिंहार्दिता इव ॥ ततः क्रोधपरीतात्मा वेगाद्रुद्रं जलंधरः
na śekurasurāḥ sthātuṁ gajāḥ siṁhārditā iva || tataḥ krodhaparītātmā vegādrudraṁ jalaṁdharaḥ
सिंह से त्रस्त हाथियों की भाँति असुर वहाँ खड़े न रह सके। तब क्रोध से भरे जलंधर ने वेगपूर्वक रुद्र को -
श्लोक 12 (skanda.2.117.12)
आह्वयामास समरे तीव्राशनिसमस्वनः ॥ ॥जलंधर उवाच॥ युध्यस्व च मया सार्द्धं किमेभिर्निहितैस्तव
āhvayāmāsa samare tīvrāśanisamasvanaḥ || jalaṁdhara uvāca yudhyasva ca mayā sārddhaṁ kimebhirnihitaistava
उसने युद्ध में तीव्र वज्र के समान गर्जना करते हुए रुद्र को ललकारा। जलंधर ने कहा - मेरे साथ युद्ध करो; तुम्हें इन गणों से क्या लेना-देना?
श्लोक 13 (skanda.2.117.13)
यच्च किंचिद्बलं तेऽस्ति तद्दर्शय जटाधर ॥ इत्युक्त्वा बाणसप्तत्या जघान वृषभध्वजम्
yacca kiṁcidbalaṁ te'sti taddarśaya jaṭādhara || ityuktvā bāṇasaptatyā jaghāna vṛṣabhadhvajam
हे जटाधारी! तुममें जो भी बल है, वह दिखाओ - ऐसा कहकर उसने सत्तर बाणों से वृषभध्वज (शिव) पर प्रहार किया।
श्लोक 14 (skanda.2.117.14)
तान्प्राप्तान्निशितैर्बाणैश्चिच्छेद प्रहसन्निव ॥ ततो हयान्ध्वजं छत्रं धनुश्चिच्छेद शक्तिभिः
tānprāptānniśitairbāṇaiściccheda prahasanniva || tato hayāndhvajaṁ chatraṁ dhanuściccheda śaktibhiḥ
शिव ने हँसते हुए उन आते हुए बाणों को अपने तीक्ष्ण बाणों से काट डाला और फिर अपनी शक्तियों से उसके घोड़ों, ध्वज, छत्र और धनुष को काट दिया।
श्लोक 15 (skanda.2.117.15)
स च्छिन्नधन्वा विरथो गदामुद्यम्य वेगवान् ॥ अभ्यधावच्छिवस्तावद्गदां बाणैर्द्विधाऽच्छिनत्
sa cchinnadhanvā virātho gadāmudyamya vegavān || abhyadhāvacchivastāvadgadāṁ bāṇairdvidhā'cchinat
धनुष कट जाने और रथहीन हो जाने पर वह वेगपूर्वक गदा उठाकर दौड़ा, किंतु शिव ने अपने बाणों से उसकी गदा के भी दो टुकड़े कर दिए।
श्लोक 16 (skanda.2.117.16)
तथाऽपि मुष्टिमुद्यम्य ययौ रुद्रं जिघांसया ॥ तावच्छिवेन बाणौघैः क्रोशमात्रमपाकृतः
tathā'pi muṣṭimudyamya yayau rudraṁ jighāṁsayā || tāvacchivena bāṇaughaiḥ krośamātramapākṛtaḥ
फिर भी वह मुट्ठी उठाकर रुद्र को मार डालने की इच्छा से आगे बढ़ा, किंतु शिव ने बाणों की झड़ी से उसे एक कोस दूर हटा दिया।
श्लोक 17 (skanda.2.117.17)
ततो जलंधरो दैत्यो मत्वा रुद्रं बलाधिकम् ॥ ससर्ज मायां गांधर्वीमद्भुतां रुद्रमोहिनीम्
tato jalaṁdharo daityo matvā rudraṁ balādhikam || sasarja māyāṁ gāṁdharvīmadbhutāṁ rudramohinīm
तब दैत्य जलंधर, रुद्र को अपने से अधिक बलवान समझकर, रुद्र को मोहित करने वाली अद्भुत गांधर्वी माया रचने लगा।
श्लोक 18 (skanda.2.117.18)
ततो जगुश्च ननृतुर्गंधर्वाप्सरसां गणाः ॥ तालवेणुमृदंगाद्यान्वादयंति स्म चाऽपरे
tato jaguśca nanṛturgaṁdharvāpsarasāṁ gaṇāḥ || tālaveṇumṛdaṁgādyānvādayaṁti sma cā'pare
तब गंधर्व और अप्सराओं के समूह गाने और नाचने लगे, और अन्य लोग ताल, वेणु, मृदंग आदि बजाने लगे।
श्लोक 19 (skanda.2.117.19)
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं रुद्रो नादविमोहितः ॥ पतितान्यपि शस्त्राणि करेभ्यो न विवेद सः
taddṛṣṭvā mahadāścaryaṁ rudro nādavimohitaḥ || patitānyapi śastrāṇi karebhyo na viveda saḥ
उस महान आश्चर्य को देखकर रुद्र उस ध्वनि से मोहित हो गए, और उन्हें यह भी पता न चला कि उनके हाथों से शस्त्र गिर पड़े हैं।
श्लोक 20 (skanda.2.117.20)
एकाग्रीभूतमालोक्य रुद्रं दैत्यो जलंधरः ॥ कामार्तः स जगामाशु यत्र गौरी स्थिताऽभवत्
ekāgrībhūtamālokya rudraṁ daityo jalaṁdharaḥ || kāmārtaḥ sa jagāmāśu yatra gaurī sthitā'bhavat
रुद्र को इस प्रकार एकाग्रचित्त देखकर, कामातुर दैत्य जलंधर तुरंत वहाँ चला गया जहाँ गौरी विराजमान थीं।
श्लोक 21 (skanda.2.117.21)
युद्धे शुंभनिशुंभाख्यौ स्थापयित्वा महाबली ॥ दशदोर्दंडपंचास्यस्त्रिनेत्रश्च जटाधरः
yuddhe śuṁbhaniśuṁbhākhyau sthāpayitvā mahābalī || daśadordaṁḍapaṁcāsyastrinetraśca jaṭādharaḥ
महाबली जलंधर, शुम्भ और निशुम्भ नामक दैत्यों को युद्धभूमि में स्थापित कर, स्वयं दस भुजाओं वाला, पाँच मुखों वाला, त्रिनेत्र और जटाधारी बन गया,
श्लोक 22 (skanda.2.117.22)
महावृषभमारूढः स बभूव जलंधरः ॥ अथो रुद्रं समायांतमालोक्य भववल्लभा
mahāvṛṣabhamārūḍhaḥ sa babhūva jalaṁdharaḥ || atho rudraṁ samāyāṁtamālokya bhavavallabhā
और एक विशाल वृषभ पर आरूढ़ हो गया - यह जलंधर ही उस रूप में था। तब भव (शिव) को आता देखकर शिव की प्रिया (पार्वती) -
श्लोक 23 (skanda.2.117.23)
अभ्याययौ सखीमध्यात्तद्दर्शनपथेऽभवत् ॥ यावद्ददर्श चार्वंगी पार्वती दनुजेश्वरः
abhyāyayau sakhīmadhyāttaddarśanapathe'bhavat || yāvaddadarśa cārvaṁgī pārvatī danujeśvaraḥ
अपनी सखियों के बीच से निकलकर उसे देखने के मार्ग पर आ गईं। किंतु ज्यों ही सुंदरी पार्वती ने उस दनुजेश्वर को देखा -
श्लोक 24 (skanda.2.117.24)
तावत्स्ववीर्यं मुमुचे जडांगश्चाऽभवत्तदा ॥ अथ ज्ञात्वा तदा गौरी दानवं भयविह्वला
tāvatsvavīryaṁ mumuce jaḍāṁgaścā'bhavattadā || atha jñātvā tadā gaurī dānavaṁ bhayavihvalā
वह छद्मरूपी जलंधर उसी क्षण स्खलित हो गया और उसके अंग जड़ हो गए। तब गौरी उस छद्मवेशी दानव को पहचानकर भय से व्याकुल हो गईं।
श्लोक 25 (skanda.2.117.25)
जगामाऽन्तर्हिता वेगात्सा तदोत्तरमानसे ॥ तामदृष्ट्वा ततो दैत्यः क्षणाद्विद्युल्लतामिव
jagāmā'ntarhitā vegātsā tadottaramānase || tāmadṛṣṭvā tato daityaḥ kṣaṇādvidyullatāmiva
वह तुरंत अंतर्धान होकर उत्तर मानस सरोवर में चली गईं। उन्हें अदृश्य पाकर वह दैत्य, बिजली की लता के समान क्षणभर में -
श्लोक 26 (skanda.2.117.26)
जवेनाऽऽगात्पुनर्युद्धं यत्र देवो वृषध्वजः ॥ पार्वत्यपि भयाद्विष्णुं सस्मार मनसा तदा
javenā'āgātpunaryuddhaṁ yatra devo vṛṣadhvajaḥ || pārvatyapi bhayādviṣṇuṁ sasmāra manasā tadā
वेग से पुनः उस युद्धस्थल की ओर लौट आया जहाँ वृषभध्वज देव (शिव) थे। इधर पार्वती ने भी भयवश मन ही मन विष्णु का स्मरण किया।
श्लोक 27 (skanda.2.117.27)
तावद्ददर्श तं देवं सूपविष्टं समीपगम् ॥ ॥पार्वत्युवाच॥ विष्णो जलंधरो दैत्यः कृतवान्परमाद्भुतम्
tāvaddadarśa taṁ devaṁ sūpaviṣṭaṁ samīpagam || pārvatyuvāca viṣṇo jalaṁdharo daityaḥ kṛtavānparamādbhutam
तभी उन्होंने उस देव विष्णु को अपने निकट, सुखपूर्वक बैठे हुए देखा। पार्वती ने कहा - हे विष्णु! दैत्य जलंधर ने अत्यंत अद्भुत कार्य किया है।
श्लोक 28 (skanda.2.117.28)
तत्किं न विदितं तेऽस्ति चेष्टितं तस्य दुर्मतेः ॥ ॥विष्णुरुवाच॥ तेनैव दर्शितः पंथा वयमप्यन्वयामहे
tatkiṁ na viditaṁ te'sti ceṣṭitaṁ tasya durmateḥ || viṣṇuruvāca tenaiva darśitaḥ paṁthā vayamapyanvayāmahe
क्या तुम्हें उस दुर्बुद्धि के आचरण का पता नहीं है? विष्णु ने कहा - उसी ने हमें मार्ग दिखा दिया है; हम भी वही मार्ग अपनाएँगे।
श्लोक 29 (skanda.2.117.29)
नाऽन्यथा स भवेद्वध्यः पातिव्रत्यसुरक्षितः ॥ ॥नारद उवाच॥ जगाम विष्णुरित्युक्त्वा पुनर्जालंधरं पुरम्
nā'nyathā sa bhavedvadhyaḥ pātivratyasurakṣitaḥ || nārada uvāca jagāma viṣṇurityuktvā punarjālaṁdharaṁ puram
अन्यथा वह, अपनी पत्नी के पातिव्रत्य से सुरक्षित होने के कारण, वध्य नहीं हो सकता। नारद ने कहा - ऐसा कहकर विष्णु जालंधर नगर की ओर चले गए।
श्लोक 30 (skanda.2.117.30)
अथ रुद्रश्च गंधर्वाऽनुगतः संगरे स्थितः ॥ अंतर्धानं गतां मायां दृष्ट्वा स बुबुधे तदा
atha rudraśca gaṁdharvā'nugataḥ saṁgare sthitaḥ || aṁtardhānaṁ gatāṁ māyāṁ dṛṣṭvā sa bubudhe tadā
इधर रुद्र, गंधर्व-माया से मोहित, युद्धभूमि में ही खड़े थे; उस माया के अंतर्धान होते ही वे सचेत हो गए।
श्लोक 31 (skanda.2.117.31)
ततो भवो विस्मितमानसः पुनर्जगाम युद्धाय जलंधरं रुषा ॥ स चाऽपि दैत्यः पुनरागतं शिवं दृष्ट्वा शरौघैः समवाकिरद्रणे
tato bhavo vismitamānasaḥ punarjagāma yuddhāya jalaṁdharaṁ ruṣā || sa cā'pi daityaḥ punarāgataṁ śivaṁ dṛṣṭvā śaraughaiḥ samavākiradraṇe
तब आश्चर्यचकित भव (शिव) पुनः क्रोधपूर्वक जलंधर से युद्ध करने चल पड़े; और उस दैत्य ने भी शिव को पुनः आया देखकर बाणों की वर्षा से रणभूमि में उन्हें ढँक दिया।