वैष्णव खण्ड · अध्याय 118
वृन्दा का अग्निप्रवेश
श्लोक 1 (skanda.2.118.1)
॥नारद उवाच॥ विष्णुर्जलंधरं गत्वा तद्दैत्यपुटभेदनम् ॥ पातिव्रत्यस्य भंगाय वृंदायाश्चाऽकरोन्मतिम्
nārada uvāca viṣṇurjalaṁdharaṁ gatvā taddaityapuṭabhedanam || pātivratyasya bhaṁgāya vṛṁdāyāścā'karonmatim
नारद ने कहा - विष्णु जलंधर नगर जाकर, उस दैत्य के छल को तोड़ने के लिए, वृंदा के पातिव्रत्य को भंग करने का विचार करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.2.118.2)
अथ वृंदारका देवी स्वप्नमध्ये ददर्श ह ॥ भर्तारं महिषाऽऽरूढं तैलाभ्यक्तं दिगंम्बरम्
atha vṛṁdārakā devī svapnamadhye dadarśa ha || bhartāraṁ mahiṣā'ārūḍhaṁ tailābhyaktaṁ digaṁmbaram
तब उस देवी वृंदा ने स्वप्न में अपने पति को भैंसे पर सवार, तेल से लिपटा, दिगंबर (वस्त्रहीन) देखा,
श्लोक 3 (skanda.2.118.3)
कृष्णप्रसूनभूषाढ्यं क्रव्यादगणसेवितम् ॥ दक्षिणाशागतं मुण्डं तमसाप्याऽऽवृतं तदा
kṛṣṇaprasūnabhūṣāḍhyaṁ kravyādagaṇasevitam || dakṣiṇāśāgataṁ muṇḍaṁ tamasāpyā'āvṛtaṁ tadā
काले फूलों से अलंकृत, मांसभक्षी गणों से सेवित, दक्षिण दिशा की ओर जाता हुआ, मुंडित सिर वाला और अंधकार से घिरा हुआ देखा।
श्लोक 4 (skanda.2.118.4)
स्वपुरं सागरे मग्नं सहसैवाऽऽत्मना सह ॥ ततः प्रबुद्धा सा बाला तत्स्वप्नं प्रविचिन्वती
svapuraṁ sāgare magnaṁ sahasaivā'ātmanā saha || tataḥ prabuddhā sā bālā tatsvapnaṁ pravicinvatī
उसने यह भी देखा कि अपना नगर स्वयं के सहित अचानक ही समुद्र में डूब गया। तब वह बाला जागकर उस स्वप्न पर विचार करने लगी।
श्लोक 5 (skanda.2.118.5)
ददर्शोदितमादित्यं सच्छिद्रं निष्प्रभं मुहुः ॥ तदनिष्टमिति ज्ञात्वा रुदती भयविह्वला
dadarśoditamādityaṁ sacchidraṁ niṣprabhaṁ muhuḥ || tadaniṣṭamiti jñātvā rudatī bhayavihvalā
उसने उगते हुए सूर्य को भी छिद्रयुक्त और बार-बार निस्तेज देखा; इसे अशुभ जानकर वह भयभीत होकर रोने लगी।
श्लोक 6 (skanda.2.118.6)
कुत्रचिन्नाऽलभच्छर्म गोपुराट्टालभूमिषु ॥ ततः सखीद्वययुता नगरोद्यानमागमत्
kutracinnā'labhaccharma gopurāṭṭālabhūmiṣu || tataḥ sakhīdvayayutā nagarodyānamāgamat
उसे नगर-द्वारों और अटारियों में कहीं भी शांति नहीं मिली। तब दो सखियों के साथ वह नगर के उद्यान में गई।
श्लोक 7 (skanda.2.118.7)
तत्राऽपि साऽभ्रमद्बाला नाऽलभत्कुत्रचित्सुखम् ॥ वनाद्वनांतरं याता नैव वेदात्मनस्तदा
tatrā'pi sā'bhramadbālā nā'labhatkutracitsukham || vanādvanāṁtaraṁ yātā naiva vedātmanastadā
वहाँ भी वह बाला भटकती रही, किंतु कहीं सुख नहीं मिला; एक वन से दूसरे वन में जाती हुई वह अपनी सुध-बुध भी खो बैठी।
श्लोक 8 (skanda.2.118.8)
ततः सा भ्रमती बाला ददर्शातीवभीषणौ ॥ राक्षसौ सिंहवदनौ दंष्ट्राऽऽननविभीषणौ
tataḥ sā bhramatī bālā dadarśātīvabhīṣaṇau || rākṣasau siṁhavadanau daṁṣṭrā'ānanavibhīṣaṇau
इस प्रकार भटकती हुई उस बाला ने दो अत्यंत भयंकर, सिंह-मुख वाले, दाढ़ों से डरावने मुख वाले राक्षसों को देखा।
श्लोक 9 (skanda.2.118.9)
तौ दृष्ट्वा विह्वलाऽतीव पलायनपराऽभवत् ॥ ददर्श तापसं शांतं सशिष्यं मौनमास्थितम्
tau dṛṣṭvā vihvalā'tīva palāyanaparā'bhavat || dadarśa tāpasaṁ śāṁtaṁ saśiṣyaṁ maunamāsthitam
उन्हें देखकर वह अत्यंत व्याकुल होकर भागने लगी; तभी उसने एक शांत, मौनव्रती तापस को उसके शिष्य सहित देखा।
श्लोक 10 (skanda.2.118.10)
ततस्तत्कण्ठमावृत्य निजां बाहुलतां भयात् ॥ मुने मां रक्ष शरणमागताऽस्मीत्यभाषत
tatastatkaṇṭhamāvṛtya nijāṁ bāhulatāṁ bhayāt || mune māṁ rakṣa śaraṇamāgatā'smītyabhāṣata
तब भय से उसने अपनी भुजलताओं से उस मुनि के कंठ को घेरते हुए कहा - हे मुने! मेरी रक्षा करो, मैं शरण में आई हूँ।
श्लोक 11 (skanda.2.118.11)
मुनिस्तां विह्वलां दृष्ट्वा राक्षसाऽनुगतां तदा ॥ हुंकारेणैव तौ घोरौ चकार विमुखौ रुषा
munistāṁ vihvalāṁ dṛṣṭvā rākṣasā'nugatāṁ tadā || huṁkāreṇaiva tau ghorau cakāra vimukhau ruṣā
उस व्याकुल और राक्षसों द्वारा पीछा की जा रही वृंदा को देखकर मुनि ने क्रोधपूर्वक केवल हुंकार से ही उन दोनों भयंकर राक्षसों को विमुख कर दिया।
श्लोक 12 (skanda.2.118.12)
तौ हुंकारभयत्रस्तौ दृष्ट्वा च विमुखौ गतौ ॥ प्रणम्य दंडवद्भूमौ वृन्दा वचनमब्रवीत्
tau huṁkārabhayatrastau dṛṣṭvā ca vimukhau gatau || praṇamya daṁḍavadbhūmau vṛndā vacanamabravīt
उस हुंकार से भयभीत होकर वे दोनों पीछे हटकर चले गए, यह देखकर वृंदा ने भूमि पर दंडवत प्रणाम कर यह वचन कहा -
श्लोक 13 (skanda.2.118.13)
॥वृन्दोवाच॥ रक्षिताहं त्वया घोराद्भयादस्मात्कृपानिधे ॥ किंचिद्विप्तुमिच्छामि कृपया तन्निशामय
vṛndovāca rakṣitāhaṁ tvayā ghorādbhayādasmātkṛpānidhe || kiṁcidviptumicchāmi kṛpayā tanniśāmaya
वृंदा ने कहा - हे कृपानिधि! आपने मुझे इस भयंकर संकट से बचाया है। मैं कुछ निवेदन करना चाहती हूँ, कृपया उसे सुनिए।
श्लोक 14 (skanda.2.118.14)
जलंधरो हि मद्भर्ता रुद्रं योद्धुं गतः प्रभो ॥ स तत्राऽस्ते कथं युद्धे तन्मे कथय सुव्रत
jalaṁdharo hi madbhartā rudraṁ yoddhuṁ gataḥ prabho || sa tatrā'ste kathaṁ yuddhe tanme kathaya suvrata
हे प्रभो! जलंधर मेरे पति हैं, जो रुद्र से युद्ध करने गए हैं। हे सुव्रत! मुझे बताइए कि वे उस युद्ध में कैसे हैं?
श्लोक 15 (skanda.2.118.15)
॥नारद उवाच॥ मुनिस्तद्वाक्यमाकर्ण्य कृपयोर्ध्वमवैक्षत ॥ तावत्कपी समायातौ प्रणम्य चाग्रतः स्थितौ
nārada uvāca munistadvākyamākarṇya kṛpayordhvamavaikṣata || tāvatkapī samāyātau praṇamya cāgrataḥ sthitau
नारद ने कहा - मुनि ने उसकी बात सुनकर कृपापूर्वक ऊपर की ओर देखा; तभी दो वानर आकर प्रणाम कर उनके सामने खड़े हो गए।
श्लोक 16 (skanda.2.118.16)
ततस्तद्भ्रूलतासंज्ञानियुक्तौ गगनं गतौ ॥ गत्वा क्षणार्द्धादागत्य प्रणतावग्रतः स्थितौ ॥ शिरःकबन्धे हस्तौ च गृहीत्वा समुपस्थितौ
tatastadbhrūlatāsaṁjñāniyuktau gaganaṁ gatau || gatvā kṣaṇārddhādāgatya praṇatāvagrataḥ sthitau || śiraḥkabaṁdhe hastau ca gṛhītvā samupasthitau
तब उसकी भौहों के संकेत से आदेश पाकर वे दोनों आकाश में उड़ गए, और आधे क्षण में लौटकर, प्रणाम करते हुए, हाथों में एक कटा हुआ सिर और धड़ लेकर उपस्थित हुए।
श्लोक 17 (skanda.2.118.17)
शिरःकबंधे हस्तौ च दृष्ट्वाऽब्धितनयस्य सा ॥ पपात मूर्छिता भूमौ भर्तृव्यसनदुःखिता
śiraḥkabaṁdhe hastau ca dṛṣṭvā'bdhitanayasya sā || papāta mūrcchitā bhūmau bhartṛvyasanaduḥkhitā
उस समुद्र-पुत्र (जलंधर) के हाथ में लिए हुए कटे सिर और धड़ को देखकर वह मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ी, पति के दुर्भाग्य से दुखी होकर।
श्लोक 18 (skanda.2.118.18)
कमंडलूदकैः सिक्त्वा मुनिनाऽऽश्वासिता तदा ॥ स्वभर्तृभाले सा भालं कृत्वा दीना रुरोद ह
kamaṁḍalūdakaiḥ siktvā muninā'āśvāsitā tadā || svabhartṛbhāle sā bhālaṁ kṛtvā dīnā ruroda ha
मुनि ने अपने कमंडल के जल से सींचकर उसे सचेत किया; तब वह दीन होकर अपने माथे को अपने पति के माथे से लगाकर रोने लगी।
श्लोक 19 (skanda.2.118.19)
॥वृन्दोवाच॥ यः पुरा सुखसंवादे विनोदयसि मां प्रभो ॥ स कथं न वदस्यद्य वल्लभा मामनागसम्
vṛndovāca yaḥ purā sukhasaṁvāde vinodayasi māṁ prabho || sa kathaṁ na vadasyadya vallabhā māmanāgasam
वृंदा ने कहा - हे प्रभो! जो आप पहले सुखद वार्तालाप से मुझे प्रसन्न रखते थे, आज मुझ निर्दोष प्रिया से आप क्यों कुछ नहीं कहते?
श्लोक 20 (skanda.2.118.20)
येन देवाः सगंधर्वा निर्जिता विष्णुना सह ॥ स कथं तापसेनाऽद्य त्रैलोक्यविजयी हतः
yena devāḥ sagaṁdharvā nirjitā viṣṇunā saha || sa kathaṁ tāpasenā'dya trailokyavijayī hataḥ
जिन्होंने गंधर्वों सहित देवताओं को और विष्णु को भी जीत लिया था, वह त्रैलोक्य-विजयी आज किसी तापस के हाथों कैसे मारा गया?
श्लोक 21 (skanda.2.118.21)
॥नारद उवाच॥ रुदित्वेति तदा वृन्दा तं मुनिं वाक्यमब्रवीत् ॥ ॥वृन्दोवाच॥ कृपानिधे मुनिश्रेष्ठ जीवयैनं मम प्रियम्
nārada uvāca ruditveti tadā vṛndā taṁ muniṁ vākyamabravīt || vṛndovāca kṛpānidhe muniśreṣṭha jīvayainaṁ mama priyam
नारद ने कहा - इस प्रकार रोते हुए वृंदा ने उस मुनि से यह वचन कहा। वृंदा ने कहा - हे कृपानिधे! हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे इस प्रियतम को जीवित कीजिए।
श्लोक 22 (skanda.2.118.22)
त्वमेवास्य मुने शक्तो जीवनाय मतो मम ॥ ॥नारद उवाच॥ इति तद्वाक्यमाकर्ण्य प्रहसन्मुनिरब्रवीत्
tvamevāsya mune śakto jīvanāya mato mama || nārada uvāca iti tadvākyamākarṇya prahasanmunirabravīt
हे मुनि! मुझे लगता है कि केवल आप ही इसे जीवित करने में समर्थ हैं। नारद ने कहा - उसकी यह बात सुनकर मुनि हँसते हुए बोले -
श्लोक 23 (skanda.2.118.23)
॥मुनिरुवाच॥ नाऽयं जीवयितुं शक्तो रुद्रेण निहतो युधि ॥ तथाऽपि त्वत्कृपाविष्ट एनं संजीवयाम्यहम्
muniruvāca nā'yaṁ jīvayituṁ śakto rudreṇa nihato yudhi || tathā'pi tvatkṛpāviṣṭa enaṁ saṁjīvayāmyaham
मुनि ने कहा - रुद्र द्वारा युद्ध में मारा गया यह शरीर पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता; फिर भी, तुम्हारे प्रति करुणा से प्रेरित होकर मैं इसे जीवित करता हूँ।
श्लोक 24 (skanda.2.118.24)
॥नारद उवाच॥ इत्युक्त्वांतर्दधे विप्रस्तावत्सागरनंदनः ॥ वृंदामालिंग्य तद्वक्त्रं चुचुंब प्रीतमानसः
nārada uvāca ityuktvā'ntardadhe viprastāvatsāgaranaṁdanaḥ || vṛṁdāmāliṁgya tadvaktraṁ cucuṁba prītamānasaḥ
नारद ने कहा - ऐसा कहकर वह ब्राह्मण अंतर्धान हो गया, और उसी क्षण वह समुद्र-पुत्र (जलंधर के रूप में विष्णु) वृंदा को आलिंगन कर, प्रसन्न मन से उसके मुख को चूमने लगा।
श्लोक 25 (skanda.2.118.25)
अथ वृन्दाऽपि भर्तारं दृष्ट्वा हर्षितमानसा ॥ रेमे तद्वनमध्यस्था तद्युक्ता बहुवासरम्
atha vṛndā'pi bhartāraṁ dṛṣṭvā harṣitamānasā || reme tadvanamadhyasthā tadyuktā bahuvāsaram
वृंदा भी अपने पति को देखकर हर्षित मन से उस वन के मध्य उसके साथ अनेक दिनों तक रमण करती रही।
श्लोक 26 (skanda.2.118.26)
कदाचित्सुरतस्यांते दृष्ट्वा विष्णुं तमेव च ॥ निर्भर्त्स्य क्रोधसंयुक्ता वृन्दा वचनमब्रवीत्
kadācitsuratasyāṁte dṛṣṭvā viṣṇuṁ tameva ca || nirbhartsya krodhasaṁyuktā vṛndā vacanamabravīt
एक बार, प्रणय-क्रीड़ा के अंत में, उसी को विष्णु के रूप में देखकर, क्रोध से भरी वृंदा ने उसे धिक्कारते हुए यह वचन कहा -
श्लोक 27 (skanda.2.118.27)
॥वृंदोवाच॥ धिक्त्वदीयं हरे शीलं परदाराभिगामिनः ॥ ज्ञातोऽसि त्वं मया सम्यङ्मायाप्रच्छन्नतापसः
vṛndovāca dhiktvadīyaṁ hare śīlaṁ paradārābhigāminaḥ || jñāto'si tvaṁ mayā samyaṅmāyāpracchannatāpasaḥ
वृंदा ने कहा - हे हरि! धिक्कार है तुम्हारे इस चरित्र को, जो पराई स्त्री के पास जाने वाला है। हे माया से छिपे तापस! अब मैंने तुम्हें भलीभाँति पहचान लिया है।
श्लोक 28 (skanda.2.118.28)
यौ त्वया मायया द्वाःस्थौ स्वकीयौ दर्शितौ मम ॥ तावेव राक्षसौ भूत्वा भार्यां तव हरिष्यतः
yau tvayā māyayā dvāḥsthau svakīyau darśitau mama || tāveva rākṣasau bhūtvā bhāryāṁ tava hariṣyataḥ
जिन दोनों द्वारपालों को तुमने अपनी माया से मुझे दिखाया था, वे ही दोनों राक्षस बनकर तुम्हारी पत्नी का हरण करेंगे।
श्लोक 29 (skanda.2.118.29)
त्वं चाऽपि भार्यादुःखार्तो वने कपिसहायवान् ॥ भ्रम सर्पेश्वरेणाऽयं यस्ते शिष्यत्वमागतः
tvaṁ cā'pi bhāryāduḥkhārto vane kapisahāyavān || bhrama sarpeśvareṇā'yaṁ yaste śiṣyatvamāgataḥ
और तुम भी अपनी पत्नी के दुःख से पीड़ित होकर वानरों की सहायता से वन-वन भटकोगे; और यह जो तुम्हारा शिष्य बना है, वह सर्पों के स्वामी के रूप में तुम्हारी सहायता करेगा।
श्लोक 30 (skanda.2.118.30)
इत्युक्त्वा सा तदा वृन्दा प्राविशद्धव्यवाहनम् ॥ विष्णुना वार्यमाणाऽपि तस्यामासक्तचेतसा
ityuktvā sā tadā vṛndā prāviśaddhavyavāhanam || viṣṇunā vāryamāṇā'pi tasyāmāsaktacetasā
ऐसा कहकर वृंदा ने अग्नि में प्रवेश कर लिया, यद्यपि उसमें आसक्त-चित्त विष्णु ने उसे रोकने का प्रयत्न किया।
श्लोक 31 (skanda.2.118.31)
ततो हरिस्तामनुसंस्मरन्मुहुर्वृंदान्वितोभस्मरजोवगुंठितः ॥ तत्रैव तस्थौ सुरसिद्धसंघैः प्रबोध्यमानोऽपि ययौ न शांतिम्
tato haristāmanusaṁsmaranmuhurvṛṁdānvito bhasmarajovaguṁṭhitaḥ || tatraiva tasthau surasiddhasaṁghaiḥ prabodhyamāno'pi yayau na śāṁtim
तब हरि, बार-बार उसका स्मरण करते हुए, वृंदा के भस्म-रज से लिपटे हुए, वहीं खड़े रहे; देवों और सिद्धों के समूहों द्वारा समझाए जाने पर भी उन्हें शांति नहीं मिली।