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वैष्णव खण्ड · अध्याय 119

जलंधर की मुक्ति का कथन

अध्याय 118अध्याय-सूचीअध्याय 120

श्लोक 1 (skanda.2.119.1)

॥नारद उवाच॥ ततो जलंधरो दृष्ट्वा रुद्रमद्भुतविक्रमम् ॥ चकार मायया गौरीं त्र्यंबकं मोहयन्निव

nārada uvāca tato jalaṁdharo dṛṣṭvā rudramadbhutavikramam || cakāra māyayā gaurīṁ tryaṁbakaṁ mohayanniva

नारद ने कहा - तब जलंधर ने अद्भुत पराक्रमी रुद्र को देखकर, मानो त्र्यम्बक (शिव) को मोहित करने के लिए, अपनी माया से गौरी का रूप बनाया।

श्लोक 2 (skanda.2.119.2)

रथोपरि च तां बद्धां रुदन्तीं पार्वतीं शिवः ॥ निशुंभप्रमुखाद्यैश्च वध्यमानां ददर्श सः

rathopari ca tāṁ baddhāṁ rudaṁtīṁ pārvatīṁ śivaḥ || niśuṁbhapramukhādyaiśca vadhyamānāṁ dadarśa saḥ

शिव ने रथ पर बंधी हुई, रोती हुई और निशुम्भ आदि प्रमुख दैत्यों द्वारा मारी जा रही उस मायामयी पार्वती को देखा।

श्लोक 3 (skanda.2.119.3)

गौरीं तथाविधां दृष्ट्वा शिवोऽप्युद्विग्नमानसः ॥ अवाङ्मुखः स्थितस्तूष्णीं विस्मृत्य स्वपराक्रमम्

gaurīṁ tathāvidhāṁ dṛṣṭvā śivo'pyudvignamānasaḥ || avāṅmukhaḥ sthitastūṣṇīṁ vismṛtya svaparākramam

गौरी को उस दशा में देखकर शिव भी व्याकुल-चित्त हो गए, और अपना पराक्रम भूलकर मौन होकर सिर झुकाए खड़े रहे।

श्लोक 4 (skanda.2.119.4)

ततो जलंधरो वेगात्त्रिभिर्विव्याध सायकैः ॥ आपुंखमग्रैस्तं रुद्रं शिरस्युरसि चोदरे

tato jalaṁdharo vegāttribhirvivyādha sāyakaiḥ || āpuṁkhamagraistaṁ rudraṁ śirasyurasi codare

तब जलंधर ने वेगपूर्वक तीन बाणों से, पूरी तरह चढ़ाकर, उस रुद्र को सिर में, वक्ष में और उदर में बींध दिया।

श्लोक 5 (skanda.2.119.5)

ततो जज्ञे स तां मायां विष्णुना च प्रबोधितः ॥ रौद्ररूपधरो जातो ज्वालामालाऽतिभीषणः

tato jajñe sa tāṁ māyāṁ viṣṇunā ca prabodhitaḥ || raudrarūpadharo jāto jvālāmālā'tibhīṣaṇaḥ

तब विष्णु द्वारा सचेत किए जाने पर उन्होंने उस माया को पहचान लिया, और अत्यंत भयंकर ज्वाला-मालाओं से युक्त रौद्र रूप धारण कर लिया।

श्लोक 6 (skanda.2.119.6)

तस्याऽतीव महारौद्रं रूपं दृष्ट्वा महासुराः ॥ न शेकुः संमुखे स्थातुं भेजिरे ते दिशो दश

tasyā'tīva mahāraudraṁ rūpaṁ dṛṣṭvā mahāsurāḥ || na śekuḥ saṁmukhe sthātuṁ bhejire te diśo daśa

उसके उस अत्यंत भयंकर रौद्र रूप को देखकर महासुर उसके सामने खड़े न रह सके, और दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 7 (skanda.2.119.7)

ततः शापं ददौ रुद्रस्तयोः शुंभनिशुंभयोः ॥ मम युद्धादपक्रांतौ गौर्या बध्यौ भविष्यथः

tataḥ śāpaṁ dadau rudrastayoḥ śuṁbhaniśuṁbhayoḥ || mama yuddhādapakrāṁtau gauryā badhyau bhaviṣyathaḥ

तब रुद्र ने शुम्भ और निशुम्भ दोनों को शाप दिया - मेरे युद्ध से भाग जाने वाले तुम दोनों, गौरी के हाथों मारे जाओगे।

श्लोक 8 (skanda.2.119.8)

पुनर्जलंधरो वेगाद्ववर्ष निशितैः शरैः ॥ बाणांधकारैः संछन्नं तदा भूमितलं महत्

punarjalaṁdharo vegādvavarṣa niśitaiḥ śaraiḥ || bāṇāṁdhakāraiḥ saṁchannaṁ tadā bhūmitalaṁ mahat

फिर जलंधर ने वेगपूर्वक तीक्ष्ण बाणों की वर्षा की, जिससे विशाल भूतल बाणों के अंधकार से ढँक गया।

श्लोक 9 (skanda.2.119.9)

यावद्रुद्रश्च चिच्छेद तस्य बाणगणं जवात् ॥ तावत्स परिघेणाऽऽशु जघान वृषभं बली

yāvadrudraśca ciccheda tasya bāṇagaṇaṁ javāt || tāvatsa parighenā'āśu jaghāna vṛṣabhaṁ balī

ज्यों ही रुद्र ने वेग से उसके बाण-समूह को काटा, त्यों ही उस बलवान ने परिघ से तुरंत वृषभ (नंदी) पर प्रहार किया।

श्लोक 10 (skanda.2.119.10)

वृषस्तेन प्रहारेण परावृत्तो रणांगणात् ॥ रुद्रेणाऽऽकृष्यमाणोऽपि न तस्थौ रणभूमिषु

vṛṣastena prahāreṇa parāvṛtto raṇāṁgaṇāt || rudreṇā'ākṛṣyamāṇo'pi na tasthau raṇabhūmiṣu

उस प्रहार से वृषभ रणभूमि से पीछे हट गया; रुद्र द्वारा खींचे जाने पर भी वह युद्धभूमि में टिक न सका।

श्लोक 11 (skanda.2.119.11)

ततः परमसंक्रुद्धो रुद्रो रौद्रवपुर्धरः ॥ चक्रं सुदर्शनं वेगाच्चिक्षेपाऽऽदित्यवर्चसम्

tataḥ paramasaṁkruddho rudro raudravapurdharaḥ || cakraṁ sudarśanaṁ vegāccikṣepā'ādityavarcasam

तब अत्यंत क्रुद्ध होकर, रौद्र रूप धारण किए हुए रुद्र ने सूर्य के समान तेजस्वी सुदर्शन चक्र वेगपूर्वक चला दिया।

श्लोक 12 (skanda.2.119.12)

प्रदहद्रोदसी वेगात्पपात वसुधातले ॥ जहार तच्छिरः कायान्महदायतलोचनम्

pradahadrodasī vegātpapāta vasudhātale || jahāra tacchiraḥ kāyānmahadāyatalocanam

वह चक्र वेगपूर्वक दोनों लोकों (आकाश और पृथ्वी) को जलाता हुआ भूतल पर गिरा और उस विशाल-नेत्र वाले जलंधर के सिर को धड़ से अलग कर दिया।

श्लोक 13 (skanda.2.119.13)

रथात्कायः पपाताऽस्य नादयन्वसुधातलम् ॥ तेजश्च निर्गतं देहात्तद्रुद्रे लयमागमत्

rathātkāyaḥ papātāsya nādayanvasudhātalam || tejaśca nirgataṁ dehāttadrudre layamāgamat

उसका धड़ रथ से गिरकर भूतल को गुंजाने लगा; और उसके शरीर से निकला हुआ तेज रुद्र में लीन हो गया।

श्लोक 14 (skanda.2.119.14)

वृन्दादेहोद्भवं तेजस्तद्गौर्यां विलयं गतम् ॥ अथ ब्रह्मादयो देवा हर्षादुत्फुल्ललोचनाः

vṛṁdādehodbhavaṁ tejastadgauryāṁ vilayaṁ gatam || atha brahmādayo devā harṣādutphullalocanāḥ

वृंदा के शरीर से उत्पन्न हुआ तेज गौरी में विलीन हो गया। तब ब्रह्मा आदि देवगण हर्ष से खिले हुए नेत्रों वाले होकर -

श्लोक 15 (skanda.2.119.15)

प्रणम्य शिरसा रुद्रं शशंसुर्विष्णुचेष्टितम् ॥ ॥देवा ऊचुः॥ महादेव त्वया देवा रक्षिताः शत्रुजाद्भयात्

praṇamya śirasā rudraṁ śaśaṁsurviṣṇuceṣṭitam || devā ūcuḥ mahādeva tvayā devā rakṣitāḥ śatrujādbhayāt

सिर झुकाकर रुद्र को प्रणाम कर, विष्णु के कार्य की प्रशंसा करने लगे। देवों ने कहा - हे महादेव! आपने देवताओं को शत्रु के भय से बचाया है।

श्लोक 16 (skanda.2.119.16)

किंचिदन्यत्समुद्भूतं तत्र किं करवामहे ॥ वृन्दालावण्यसंभ्रांतो विष्णुस्तिष्ठति मोहितः

kiṁcidanyatsamudbhūtaṁ tatra kiṁ karavāmahe || vṛṁdālāvaṇyasaṁbhrāṁto viṣṇustiṣṭhati mohitaḥ

किंतु अब एक और घटना घट गई है; हम उसमें क्या करें? विष्णु वृंदा के सौंदर्य में मोहित होकर व्याकुल-भ्रांत खड़े हैं।

श्लोक 17 (skanda.2.119.17)

॥ईश्वर उवाच॥ गच्छध्वं शरणं देवा विष्णोर्मोहापनुत्तये ॥ शरण्यां मोहिनीं मायां सा वः कार्यं करिष्यति

īśvara uvāca gacchadhvaṁ śaraṇaṁ devā viṣṇormohāpanuttaye || śaraṇyāṁ mohinīṁ māyāṁ sā vaḥ kāryaṁ kariṣyati

ईश्वर (शिव) ने कहा - हे देवगण! विष्णु के मोह को दूर करने के लिए तुम सब शरण्या मोहिनी माया की शरण में जाओ; वह तुम्हारा कार्य पूरा करेगी।

श्लोक 18 (skanda.2.119.18)

॥नारद उवाच॥ इत्युक्त्वांतर्दधे देवः सर्वभूतगणैस्तदा ॥ देवाश्च तुष्टुवुर्मूलप्रकृतिं भक्तवत्सलाम्

nārada uvāca ityuktvā'ntardadhe devaḥ sarvabhūtagaṇaistadā || devāśca tuṣṭuvurmūlaprakṛtiṁ bhaktavatsalām

नारद ने कहा - ऐसा कहकर वह देव (शिव) सभी भूतगणों सहित अंतर्धान हो गए; और देवगण भक्तवत्सला मूलप्रकृति की स्तुति करने लगे।

श्लोक 19 (skanda.2.119.19)

॥देवा ऊचुः॥ यदुद्भवाः सत्त्वरजस्तमोगुणाः सर्गस्थितिध्वंसनिदानकारिणः ॥ यदिच्छया विश्वमिदं भवाऽभवौ तनोति मूलप्रकृतिं नताः स्म ताम्

devā ūcuḥ yadudbhavāḥ sattvarajastamoguṇāḥ sargasthitidhvaṁsanidānakāriṇaḥ || yadicchayā viśvamidaṁ bhavā'bhavau tanoti mūlaprakṛtiṁ natāḥ sma tām

देवों ने कहा - जिनसे सत्त्व, रज और तम गुण उत्पन्न हुए, जो सृष्टि, स्थिति और प्रलय के कारण हैं, जिनकी इच्छा से यह संसार उत्पत्ति और लय को धारण करता है - उस मूलप्रकृति को हम नमस्कार करते हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.119.20)

या हि त्रयोविंशतिभेदशब्दिता जगत्यशेषे समधिष्ठिता परा ॥ यद्रूपकर्माणि जडास्त्रयोऽपि देवा न विद्युः प्रकृतिं नताः स्म ताम्

yā hi trayoviṁśatibhedaśabditā jagatyaśeṣe samadhiṣṭhitā parā || yadrūpakarmāṇi jaḍāstrayo'pi devā na vidyuḥ prakṛtiṁ natāḥ sma tām

"जो तेईस भेदों से कही जाती हैं, जो संपूर्ण जगत में सर्वत्र व्याप्त परा शक्ति हैं, जिनके रूप और कर्मों को तीनों जड़ देवता भी नहीं जानते - उस प्रकृति को हम नमस्कार करते हैं।

श्लोक 21 (skanda.2.119.21)

यद्भक्तियुक्ताः पुरुषास्तु नित्यं दारिद्र्यभीमोहपराभवादीन् ॥ न प्राप्नुवंत्येव हि भक्तवत्सलां सदैव मूलप्रकृतिं नताः स्म ताम्

yadbhaktiyuktāḥ puruṣāstu nityaṁ dāridryabhīmohaparābhavādīn || na prāpnuvaṁtyeva hi bhaktavatsalāṁ sadaiva mūlaprakṛtiṁ natāḥ sma tām

जिनकी भक्ति से युक्त पुरुष कभी दरिद्रता, भय, मोह, पराभव आदि को प्राप्त नहीं होते - उस सदा भक्तवत्सला मूलप्रकृति को हम नमस्कार करते हैं।"

श्लोक 22 (skanda.2.119.22)

॥नारद उवाच॥ स्तोत्रमेतत्त्रिसंध्यं यः पठेदेकाग्रमानसः ॥ दारिद्यमोहदुःखानि न कदाचित्स्पृशंति तम्

nārada uvāca stotrametattrisaṁdhyaṁ yaḥ paṭhedekāgramānasaḥ || dāridyamohaduḥkhāni na kadācitspṛśaṁti tam

नारद ने कहा - जो एकाग्रचित्त होकर इस स्तोत्र को तीनों संध्याओं में पढ़ता है, उसे दरिद्रता, मोह और दुःख कभी स्पर्श नहीं करते।

श्लोक 23 (skanda.2.119.23)

इत्थं स्तुवंतस्ते देवास्तेजोमण्डलमास्थितम् ॥ ददृशुर्गगनं तत्र ज्वालाव्याप्तदिगंतरम्

itthaṁ stuvaṁtaste devāstejomaṇḍalamāsthitam || dadṛśurgaganaṁ tatra jvālāvyāptadigaṁtaram

इस प्रकार स्तुति करते हुए उन देवों ने आकाश में एक तेजोमंडल स्थित देखा, जिसकी ज्वालाओं से दिशाओं के छोर व्याप्त हो गए थे।

श्लोक 24 (skanda.2.119.24)

तन्मध्याद्भारतीं सर्वे शुश्रुवुर्व्योमचारिणीम् ॥ ॥शक्तिरुवाच॥ अहमेव त्रिधा भिन्ना तिष्ठामि त्रिविधैर्गुणैः

tanmadhyādbhāratīṁ sarve śuśruvurvyomacāriṇīm || śaktiruvāca ahameva tridhā bhinnā tiṣṭhāmi trividhairguṇaiḥ

उसके मध्य से सभी ने आकाशचारिणी वाणी सुनी। शक्ति ने कहा - मैं ही तीनों गुणों के द्वारा तीन रूपों में भिन्न होकर स्थित हूँ -

श्लोक 25 (skanda.2.119.25)

गौरी लक्ष्मी स्वरा चेति रजःसत्त्वतमोगुणैः ॥ तत्र गच्छत ताः कार्यं विधास्यति च वः सुराः

gaurī lakṣmī svarā ceti rajaḥsattvatamoguṇaiḥ || tatra gacchata tāḥ kāryaṁ vidhāsyati ca vaḥ surāḥ

गौरी, लक्ष्मी और स्वरा (सरस्वती) के रूप में, क्रमशः रज, सत्त्व और तम गुणों द्वारा। हे सुरगण! तुम वहाँ जाओ, वे तुम्हारा कार्य संपन्न करेंगी।

श्लोक 26 (skanda.2.119.26)

॥नारद उवाच॥ शृण्वतामिति तां वाचमंतर्धानमगान्महः ॥ देवानां विस्मयोत्फुल्लनेत्राणां तत्तदा नृप

nārada uvāca śṛṇvatāmiti tāṁ vācamaṁtardhānamagānmahaḥ || devānāṁ vismayotphullanetrāṇāṁ tattadā nṛpa

नारद ने कहा - हे राजन्! उन देवताओं के सुनते-सुनते ही वह तेज, आश्चर्यचकित और विस्फारित नेत्रों वाले देवताओं के देखते-देखते अंतर्धान हो गया।

श्लोक 27 (skanda.2.119.27)

ततः सर्वेऽपि ते देवा गत्वा तद्वाक्यनोदिताः ॥ गौरीं लक्ष्मीं स्वरां चैव प्रणेमुर्भक्तितत्पराः

tataḥ sarve'pi te devā gatvā tadvākyanoditāḥ || gaurīṁ lakṣmīṁ svarāṁ caiva praṇemurbhaktitatparāḥ

तब उस वाणी से प्रेरित होकर वे सभी देवता गए और भक्तिपूर्वक गौरी, लक्ष्मी और स्वरा को प्रणाम किया।

श्लोक 28 (skanda.2.119.28)

ततस्तास्तान्सुरान्दृष्ट्वा प्रणतान्भक्तवत्सलाः ॥ बीजानि प्रददुस्तेभ्यो वाक्यान्यूचुश्च भूमिप

tatastāstānsurāndṛṣṭvā praṇatānbhaktavatsalāḥ || bījāni pradadustebhyo vākyānyūcuśca bhūmipa

तब भक्तवत्सला उन देवियों ने प्रणत हुए उन देवताओं को देखकर उन्हें बीज दिए और यह वचन कहा, हे राजन्!

श्लोक 29 (skanda.2.119.29)

॥देव्य ऊचुः॥ इमानि तत्र बीजानि विष्णुर्यत्राऽवतिष्ठते ॥ निर्वपध्वं ततः कार्यं भवतां सिद्धिमेष्यति

devya ūcuḥ imāni tatra bījāni viṣṇuryatrā'vatiṣṭhate || nirvapadhvaṁ tataḥ kāryaṁ bhavatāṁ siddhimeṣyati

देवियों ने कहा - इन बीजों को वहाँ बोओ जहाँ विष्णु ठहरे हुए हैं; तब तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाएगा।

श्लोक 30 (skanda.2.119.30)

॥नारद उवाच॥ ततस्तु हृष्टाः सुरसिद्धसंघाः प्रगृह्य बीजानि विचिक्षिपुस्ते ॥ वृंदान्वितो भूमितले स यत्र विष्णुः सदा तिष्ठति सौख्यहीनः

nārada uvāca tatastu hṛṣṭāḥ surasiddhasaṁghāḥ pragṛhya bījāni vicikṣipuste || vṛṁdānvito bhūmitale sa yatra viṣṇuḥ sadā tiṣṭhati saukhyahīnaḥ

नारद ने कहा - तब प्रसन्न होकर देव और सिद्धगणों ने उन बीजों को लेकर, उस भूतल पर बिखेर दिया जहाँ विष्णु, वृंदा से युक्त, सुखरहित होकर सदा खड़े रहते थे।

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