वैष्णव खण्ड · अध्याय 120
धात्री और तुलसी की उत्पत्ति
श्लोक 1 (skanda.2.120.1)
॥नारद उवाच॥ क्षिप्तेभ्यस्तत्र बीजेभ्यो वनस्पत्यस्त्रयोऽभवन् ॥ धात्री च मालती चैव तुलसी च नृपोत्तम
nārada uvāca kṣiptebhyastatra bījebhyo vanaspatyastrayo'bhavan || dhātrī ca mālatī caiva tulasī ca nṛpottama
नारद ने कहा - वहाँ बिखेरे गए बीजों से तीन वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं - धात्री (आँवला), मालती और तुलसी, हे नृपोत्तम!
श्लोक 2 (skanda.2.120.2)
धात्र्युद्भवा स्मृता धात्री माभवा मालती स्मृता ॥ गौरीभवा च तुलसी तमःसत्त्वरजोगुणाः
dhātryudbhavā smṛtā dhātrī mābhavā mālatī smṛtā || gaurībhavā ca tulasī tamaḥsattvarajoguṇāḥ
तम-गुण से उत्पन्न होने के कारण धात्री कहलाई, सत्त्व-अंश से मालती कहलाई, और रज-अंश से तुलसी - ये तीनों क्रमशः तम, सत्त्व और रज गुणों की प्रतीक हैं।
श्लोक 3 (skanda.2.120.3)
स्त्रीरूपिण्यौ वनस्पत्यौ दृष्ट्वा विष्णुस्तदा नृप ॥ उत्तस्थौ संभ्रमाद्वृंदा रूपातिशयविभ्रमः
strīrūpiṇyau vanaspatyau dṛṣṭvā viṣṇustadā nṛpa || uttasthau saṁbhramādvṛṁdā rūpātiśayavibhramaḥ
हे राजन्! उन दो वनस्पतियों को स्त्री-रूप में देखकर विष्णु, वृंदा के अत्यंत सुंदर रूप के मोह से घबराकर उठ खड़े हुए।
श्लोक 4 (skanda.2.120.4)
दृष्ट्वा च याचते मोहात्कामासक्तेन चेतसा ॥ तं चाऽपि तुलसीधात्र्यौ रागेणैव व्यलोकताम्
dṛṣṭvā ca yācate mohātkāmāsaktena cetasā || taṁ cā'pi tulasīdhātryau rāgeṇaiva vyalokatām
उन्हें देखकर मोहवश कामासक्त-चित्त होकर वे उनकी याचना करने लगे; और तुलसी तथा धात्री भी उन्हें अनुराग-भरी दृष्टि से देखने लगीं।
श्लोक 5 (skanda.2.120.5)
यच्च लक्ष्म्या पुरा बीजमीर्ष्ययैव समर्पितम् ॥ तस्मात्तदुद्भवा नारी तस्मिन्नीर्ष्यापराऽभवत्
yacca lakṣmyā purā bījamīrṣyayaiva samarpitam || tasmāttadudbhavā nārī tasminnīrṣyāparā'bhavat
पहले लक्ष्मी ने ईर्ष्यावश ही जो बीज दिया था, उससे उत्पन्न नारी (मालती) भी उसके प्रति ईर्ष्यालु ही बनी रही।
श्लोक 6 (skanda.2.120.6)
अतः सा बर्बरीत्याख्यामवापाऽध विगर्हिताम् ॥ धात्रीतुलस्यौ तद्रागात्तस्य प्रीतिप्रदे सदा
ataḥ sā barbarītyākhyāmavāpā'dha vigarhitām || dhātrītulasyau tadrāgāttasya prītipradē sadā
इसलिए वह "बर्बरी" नामक निंदित संज्ञा को प्राप्त हो गई; जबकि धात्री और तुलसी अपने अनुराग के कारण उसे सदा प्रिय रहीं।
श्लोक 7 (skanda.2.120.7)
ततो विस्मृतदुःखोऽसौ विष्णुस्ताभ्यां सहैव तु ॥ वैकुण्ठमगमद्धृष्टः सर्वदेव नमस्कृतः
tato vismṛtaduḥkho'sau viṣṇustābhyāṁ sahaiva tu || vaikuṇṭhamagamaddhṛṣṭaḥ sarvadeva namaskṛtaḥ
तब अपना दुःख भूलकर विष्णु उन दोनों के साथ प्रसन्नतापूर्वक वैकुण्ठ को गए, और सभी देवताओं ने उन्हें नमस्कार किया।
श्लोक 8 (skanda.2.120.8)
कार्तिकोद्यापने विष्णोस्तस्मात्पूजा विधीयते ॥ तुलसीमूलदेशेऽस्य प्रीतिदा सा यतः स्मृता
kārtikodyāpane viṣṇostasmātpūjā vidhīyate || tulasīmūladeśe'sya prītidā sā yataḥ smṛtā
इसीलिए कार्तिक-व्रत के उद्यापन में तुलसी के मूल-स्थान में विष्णु की पूजा की जाती है, क्योंकि वह उन्हें सदा प्रिय रही है।
श्लोक 9 (skanda.2.120.9)
तुलसीकाननं राजन्गृहे यस्याऽवतिष्ठते ॥ तद्गृहं तीर्थरूपं तु नाऽऽयांति यमकिंकराः
tulasīkānanaṁ rājangṛhe yasyā'vatiṣṭhate || tadgṛhaṁ tīrtharūpaṁ tu nā'āyāṁti yamakiṁkarāḥ
हे राजन्! जिसके घर में तुलसी-वन विद्यमान रहता है, वह घर तीर्थ के समान हो जाता है, और वहाँ यमदूत नहीं आते।
श्लोक 10 (skanda.2.120.10)
सर्वपापहरं नित्यं कामदं तुलसीवनम् ॥ रोपयंति नराः श्रेष्ठास्ते न पश्यंति भास्करिम्
sarvapāpaharaṁ nityaṁ kāmadaṁ tulasīvanam || ropayaṁti narāḥ śreṣṭhāste na paśyaṁti bhāskarim
तुलसी-वन सदा सभी पापों को हरने वाला और मनोरथ पूरा करने वाला है; जो श्रेष्ठ मनुष्य इसे रोपते हैं, वे यम (सूर्यपुत्र) को नहीं देखते।
श्लोक 11 (skanda.2.120.11)
दर्शनं नर्मदायास्तु गंगास्नानं तथैव च ॥ तुलसीवनसंसर्गः सममेव त्रयं स्मृतम्
darśanaṁ narmadāyāstu gaṁgāsnānaṁ tathaiva ca || tulasīvanasaṁsargaḥ samameva trayaṁ smṛtam
नर्मदा का दर्शन, गंगा में स्नान, और तुलसी-वन का संसर्ग - ये तीनों समान फल देने वाले माने गए हैं।
श्लोक 12 (skanda.2.120.12)
रोपणात्पालनात्सेकाद्दर्शनात्स्पर्शनान्नृणाम् ॥ तुलसी दहते पापं वाङ्मनःकायसंचितम्
ropaṇātpālanātsekāddarśanātsparśanānnṛṇām || tulasī dahate pāpaṁ vāṅmanaḥkāyasaṁcitam
रोपण, पालन, सिंचन, दर्शन और स्पर्श से तुलसी मनुष्यों के वाणी, मन और शरीर से संचित पाप को जला देती है।
श्लोक 13 (skanda.2.120.13)
तुलसीमंजरीभिर्यः कुर्याद्धरिहराऽर्चनम् ॥ न स गर्भगृहं याति मुक्तिभागी न संशयः
tulasīmaṁjarībhiryaḥ kuryāddhariharārcanam || na sa garbhagṛhaṁ yāti muktibhāgī na saṁśayaḥ
जो तुलसी की मंजरियों से हरि और हर की पूजा करता है, वह गर्भ में नहीं जाता, निःसंदेह वह मुक्ति का भागी होता है।
श्लोक 14 (skanda.2.120.14)
पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा ॥ वासुदेवादयो देवास्तिष्ठंति तुलसीदले
puṣkarādyāni tīrthāni gaṁgādyāḥ saritastathā || vāsudevādayo devāstiṣṭhaṁti tulasīdale
पुष्कर आदि तीर्थ, गंगा आदि नदियाँ तथा वासुदेव आदि देवता - सभी तुलसी के पत्ते में निवास करते हैं।
श्लोक 15 (skanda.2.120.15)
तुलसीमंजरीयुक्तो यस्तु प्राणान्विमुंचति ॥ यमोऽपि नेक्षितुं शक्तो युक्तं पापशतैरपि
tulasīmaṁjarīyukto yastu prāṇānvimuṁcati || yamo'pi nekṣituṁ śakto yuktaṁ pāpaśatairapi
जो तुलसी की मंजरी के साथ अपने प्राण त्यागता है, उसे सैकड़ों पापों से युक्त होने पर भी यम देखने में समर्थ नहीं होते।
श्लोक 16 (skanda.2.120.16)
विष्णोः सायुज्यमाप्नोति सत्यं सत्यं नृपोत्तम ॥ तुलसीकाष्ठजं यस्तु चंदनं धारयेन्नरः
viṣṇoḥ sāyujyamāpnoti satyaṁ satyaṁ nṛpottama || tulasīkāṣṭhajaṁ yastu caṁdanaṁ dhārayennaraḥ
वह विष्णु का सायुज्य प्राप्त करता है - यह सत्य है, हे नृपोत्तम, सत्य है। जो मनुष्य तुलसी की काष्ठ से बना चंदन-लेप धारण करता है -
श्लोक 17 (skanda.2.120.17)
तद्देहं न स्पृशेत्पापं क्रियमाणमपीह यत् ॥ तुलसीविपिनच्छाया यत्रयत्र भवेन्नृप
taddehaṁ na spṛśetpāpaṁ kriyamāṇamapīha yat || tulasīvipinacchāyā yatrayatra bhavennṛpa
उसके शरीर को कोई पाप, चाहे वह किया भी जा रहा हो, स्पर्श नहीं करता। हे राजन्! जहाँ-जहाँ तुलसी-वन की छाया पड़ती है -
श्लोक 18 (skanda.2.120.18)
तत्र श्राद्धं प्रकर्तव्यं पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥ धात्रीफलविमिश्रैश्च तुलसीपत्रमिश्रितैः
tatra śrāddhaṁ prakartavyaṁ pitṝṇāṁ dattamakṣayam || dhātrīphalavimiśraiśca tulasīpatramiśritaiḥ
वहाँ श्राद्ध करना चाहिए, क्योंकि पितरों को वहाँ दिया गया श्राद्ध अक्षय होता है। आँवले के फल और तुलसी-पत्र से मिश्रित -
श्लोक 19 (skanda.2.120.19)
जलैः स्नाति नरस्तस्य गंगास्नानफलं स्मृतम् ॥ देवार्चनं नरः कुर्याद्धात्रीपत्रैः फलैस्तथा
jalaiḥ snāti narastasya gaṁgāsnānaphalaṁ smṛtam || devārcanaṁ naraḥ kuryāddhātrīpatraiḥ phalaistathā
जल से जो मनुष्य स्नान करता है, उसे गंगा-स्नान का फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य आँवले के पत्तों और फलों से देवता की पूजा करता है -
श्लोक 20 (skanda.2.120.20)
सुवर्णमणिमुक्तौघैरर्चनस्याप्नुयात्फलम् ॥ तीर्थानि मुनयो देवा यज्ञाः सर्वेऽपि कार्तिके
suvarṇamaṇimuktaughairarcanasyāpnuyātphalam || tīrthāni munayo devā yajñāḥ sarve'pi kārtike
वह सोने, मणियों और मोतियों से की गई पूजा का फल प्राप्त करता है। कार्तिक मास में सभी तीर्थ, मुनि, देवता और यज्ञ -
श्लोक 21 (skanda.2.120.21)
नित्यं धात्रीं समाश्रित्य तिष्ठंत्यर्के तुलास्थिते ॥ द्वादश्यां तुलसीपत्रं धात्रीपत्रं तु कार्तिके
nityaṁ dhātrīṁ samāśritya tiṣṭhaṁtyarke tulāsthite || dvādaśyāṁ tulasīpatraṁ dhātrīpatraṁ tu kārtike
जब सूर्य तुला राशि में रहता है, तब सदा आँवले के वृक्ष का आश्रय लेकर रहते हैं। जो मनुष्य कार्तिक की द्वादशी को तुलसी-पत्र और आँवले का पत्ता -
श्लोक 22 (skanda.2.120.22)
लुनाति स नरो गच्छेन्निरयानतिगर्हितान् ॥ धात्रीतुलस्योर्माहात्म्यमपि देवश्चतुर्मुखः ॥ न समर्थो भवेद्वक्तुं यथा देवस्य शार्ङ्गिणः
lunāti sa naro gacchennirayānatigarhitān || dhātrītulasyormāhātmyamapi devaścaturmukhaḥ || na samartho bhavedvaktuṁ yathā devasya śārṅgiṇaḥ
बिना कारण तोड़ता है, वह अत्यंत निंदित नरकों में जाता है। धात्री और तुलसी की महिमा को चार मुख वाले ब्रह्मा भी उतना नहीं कह सकते, जितना शार्ङ्गधारी विष्णु के लिए वह महिमा है।
श्लोक 23 (skanda.2.120.23)
धात्रीतुलस्युद्भवकारणं यः शृणोति यः श्रावयते च भक्त्या ॥ विधूतपाप्मा सह पूर्वजैः स्वैः स्वर्गं व्रजत्यग्र्यविमानसंस्थैः
dhātrītulasyudbhavakāraṇaṁ yaḥ śṛṇoti yaḥ śrāvayate ca bhaktyā || vidhūtapāpmā saha pūrvajaiḥ svaiḥ svargaṁ vrajatyagryavimānasaṁsthaiḥ
जो कोई भक्तिपूर्वक धात्री और तुलसी की उत्पत्ति की इस कथा को सुनता है या सुनाता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अपने पूर्वजों सहित उत्तम विमानों पर बैठकर स्वर्ग को जाता है।