वैष्णव खण्ड · अध्याय 121
धर्मदत्त का इतिहास
श्लोक 1 (skanda.2.121.1)
॥पृथुरुवाच॥ यदूर्जव्रतिनः पुंसः फलं महदुदादृतम् ॥ तत्पुनर्ब्रूहि माहात्म्यं केन चीर्णमिदं शुभम्
pṛthuruvāca yadūrjavratinaḥ puṁsaḥ phalaṁ mahadudādṛtam || tatpunarbrūhi māhātmyaṁ kena cīrṇamidaṁ śubham
पृथु ने कहा - कार्तिक-व्रती पुरुष का जो महान फल आपने बताया, उस शुभ माहात्म्य को पुनः कहिए - यह किसके द्वारा आचरित किया गया था?
श्लोक 2 (skanda.2.121.2)
॥नारद उवाच॥ आसीत्सह्याद्रिविषये करवीरपुरे पुरा ॥ ब्राह्मणो धर्मवित्कश्चिद्धर्मदत्तेति विश्रुतः
nārada uvāca āsītsahyādriviṣaye karavīrapure purā || brāhmaṇo dharmavitkaściddharmadatteti viśrutaḥ
नारद ने कहा - पूर्वकाल में सह्याद्रि प्रदेश के करवीरपुर में धर्म को जानने वाला एक ब्राह्मण था, जो धर्मदत्त नाम से विख्यात था।
श्लोक 3 (skanda.2.121.3)
विष्णुव्रतकरः सम्यग्विष्णुपूजारतः सदा ॥ कदाचित्कार्तिके मासि हरिजागरणाय सः
viṣṇuvratakaraḥ samyagviṣṇupūjārataḥ sadā || kadācitkārtike māsi harijāgaraṇāya saḥ
वह सदा विष्णु-व्रत का पालन करने वाला और विष्णु-पूजा में तत्पर रहता था। एक बार कार्तिक मास में हरि-जागरण के लिए वह -
श्लोक 4 (skanda.2.121.4)
रात्र्यां तुर्यावशेषायां जगाम हरिमन्दिरम् ॥ हरिपूजोपकरणान्प्रगृह्य व्रजता तदा
rātryāṁ turyāvaśeṣāyāṁ jagāma harimandiram || haripūjopakaraṇānpragṛhya vrajatā tadā
रात्रि के चौथे प्रहर में हरि-मंदिर की ओर चल पड़ा, हरि-पूजा की सामग्री लेकर जाते हुए -
श्लोक 5 (skanda.2.121.5)
तेन दृष्टा समायाता राक्षसी भीमदर्शना ॥ तां दृष्ट्वा भयवित्रस्तः कंपितावयवस्तदा
tena dṛṣṭā samāyātā rākṣasī bhīmadarśanā || tāṁ dṛṣṭvā bhayavitrastaḥ kaṁpitāvayavastadā
उसने एक भयंकर रूप वाली राक्षसी को आती हुई देखा। उसे देखकर वह भय से त्रस्त होकर, कांपते हुए अंगों वाला हो गया।
श्लोक 6 (skanda.2.121.6)
पूजोपकरणैः सर्वैः पयोभिश्चाहनद्भयात् ॥ संस्मृत्य तद्धरेर्नाम तुलसीयुक्तवारिणा ॥ तेन वै हतमात्रे तु पापं तस्या ह्यगाल्लयम्
pūjopakaraṇaiḥ sarvaiḥ payobhiścāhanadbhayāt || saṁsmṛtya taddharernāma tulasīyuktavāriṇā || tena vai hatamātre tu pāpaṁ tasyā hyagāllayam
भयवश उसने पूजा की सभी सामग्रियों और तुलसी-मिश्रित जल से, हरि के नाम का स्मरण करते हुए, उस पर प्रहार किया। उसके इस प्रकार प्रहार करते ही उसका पाप तत्काल नष्ट हो गया।
श्लोक 7 (skanda.2.121.7)
अथ संस्मृत्य सा पूर्वजन्मकर्मविपाकजाम् ॥ स्वां दशामब्रवीद्विप्रं दंडवच्च प्रणम्य वै
atha saṁsmṛtya sā pūrvajanmakarmavipākajām || svāṁ daśāmabravīdvipraṁ daṇḍavacca praṇamya vai
तब वह अपने पूर्वजन्म के कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त दशा का स्मरण करती हुई, उस ब्राह्मण को दंडवत प्रणाम कर बोली -
श्लोक 8 (skanda.2.121.8)
॥कलहोवाच॥ पूर्वकर्मविपाकेन दशामेतां गतास्म्यहम् ॥ तत्कथं नु पुनर्विप्र प्रयास्याम्युत्तमां गतिम्
kalahovāca pūrvakarmavipākena daśāmetāṁ gatāsmyaham || tatkathaṁ nu punarvipra prayāsyāmyuttamāṁ gatim
कलहा ने कहा - पूर्व कर्मों के फलस्वरूप मैं इस दशा को प्राप्त हुई हूँ। हे विप्र! अब मैं कैसे उत्तम गति को प्राप्त करूँगी?
श्लोक 9 (skanda.2.121.9)
॥नारद उवाच॥ तां दृष्ट्वा प्रणतां सम्यग्वदमानां स्वकर्म तत् ॥ अतीव विस्मितो विप्रस्तदा वचनमब्रवीत्
nārada uvāca tāṁ dṛṣṭvā praṇatāṁ samyagvadamānāṁ svakarma tat || atīva vismito viprastadā vacanamabravīt
नारद ने कहा - उसे इस प्रकार प्रणत और अपने कर्म का वृत्तांत कहती देखकर वह ब्राह्मण अत्यंत आश्चर्यचकित होकर बोला -
श्लोक 10 (skanda.2.121.10)
॥धर्मदत्त उवाच॥ केन कर्मविपाकेन त्वं दशामीदृशीं गता ॥ कुत्रत्या का च किं शीला तत्सर्वं कथयस्व मे
dharmadatta uvāca kena karmavipākena tvaṁ daśāmīdṛśīṁ gatā || kutratyā kā ca kiṁ śīlā tatsarvaṁ kathayasva me
धर्मदत्त ने कहा - किस कर्म के फलस्वरूप तुम इस दशा को प्राप्त हुई हो? तुम कहाँ की हो, कौन हो, और तुम्हारा स्वभाव कैसा था - यह सब मुझे बताओ।
श्लोक 11 (skanda.2.121.11)
॥कलहोवाच॥ सौराष्ट्रनगरे ब्रह्मन्भिक्षुर्नामाऽभवद्द्विजः ॥ तस्याहं गृहिणी पूर्वं कलहाख्याऽतिनिष्ठुरा
kalahovāca saurāṣṭranagare brahmanbhikṣurnāmā'bhavaddvijaḥ || tasyāhaṁ gṛhiṇī pūrvaṁ kalahākhyā'tiniṣṭhurā
कलहा ने कहा - हे ब्रह्मन्! सौराष्ट्र नगर में भिक्षु नाम का एक द्विज था। मैं पहले उसकी अत्यंत निष्ठुर गृहिणी थी, जिसका नाम कलहा था।
श्लोक 12 (skanda.2.121.12)
न कदाचिन्मया भर्तुर्वचसाऽपि शुभं कृतम् ॥ नाऽर्पितं तस्य मिष्टान्नं भर्तुर्वचनशीलया
na kadācinmayā bhartūrvacasā'pi śubhaṁ kṛtam || nā'rpitaṁ tasya miṣṭānnaṁ bhartūrvacanaśīlayā
मैंने कभी अपने पति का भला वचन से भी नहीं किया; अपनी हठधर्मी स्वभाव के कारण मैंने उसे मीठा भोजन तक नहीं दिया।
श्लोक 13 (skanda.2.121.13)
कलहप्रियया नित्यं मयोद्विग्नमना यदा ॥ परिणेतुं यदाऽन्यां स मतिं चक्रे पतिर्मम
kalahapriyayā nityaṁ mayodvignamanā yadā || pariṇetuṁ yadā'nyāṁ sa matiṁ cakre patirmama
कलह-प्रिय होने के कारण मेरे कारण वह सदा उद्विग्न-चित्त रहता था; जब मेरे पति ने दूसरा विवाह करने का विचार किया -
श्लोक 14 (skanda.2.121.14)
ततो गरं समादाय प्राणास्त्यक्ता मया द्विज ॥ अथ बद्ध्वा बध्यमानां मां निन्युर्यमकिंकराः
tato garaṁ samādāya prāṇāstyaktā mayā dvija || atha baddhvā badhyamānāṁ māṁ ninyuryamakiṁkarāḥ
तब, हे द्विज! मैंने विष खाकर अपने प्राण त्याग दिए। तब यमदूत मुझे बांधकर, पीटते हुए ले गए।
श्लोक 15 (skanda.2.121.15)
यमश्च मां तदा दृष्ट्वा चित्रगुप्तमपृच्छत ॥ ॥यम उवाच॥ अनया किं कृतं कर्म चित्रगुप्त विलोकय
yamaśca māṁ tadā dṛṣṭvā citraguptamapṛcchata || yama uvāca anayā kiṁ kṛtaṁ karma citragupta vilokaya
यम ने मुझे देखकर चित्रगुप्त से पूछा। यम ने कहा - हे चित्रगुप्त! इसने क्या कर्म किया है, यह देखो।
श्लोक 16 (skanda.2.121.16)
प्राप्नोत्वेषा च तत्कर्म शुभं वा यदि वाऽशुभम् ॥ ॥कलहोवाच॥ चित्रगुप्तस्तदा वाक्यं भर्त्सयन्मामुवाच सः
prāpnotveṣā ca tatkarma śubhaṁ vā yadi vā'śubham || kalahovāca citraguptastadā vākyaṁ bhartsayanmāmuvāca saḥ
वह अपने उन कर्मों का फल पाए, चाहे शुभ हो या अशुभ। कलहा ने कहा - तब चित्रगुप्त ने मुझे धिक्कारते हुए यह वचन कहा -
श्लोक 17 (skanda.2.121.17)
॥चित्रगुप्त उवाच॥ अनया तु कृतं कर्म शुभं किंचिन्न विद्यते ॥ मिष्टान्नं भुंजमानेयं न भर्तरि तदर्पितम्
citragupta uvāca anayā tu kṛtaṁ karma śubhaṁ kiṁcinna vidyate || miṣṭānnaṁ bhuṁjamāneyaṁ na bhartari tadarpitam
चित्रगुप्त ने कहा - इसने कोई भी शुभ कर्म नहीं किया है। मीठा भोजन स्वयं खाते हुए इसने अपने पति को कभी नहीं दिया -
श्लोक 18 (skanda.2.121.18)
अतश्च वल्गुलीयोन्यां स्वविष्ठादाऽवतिष्ठतु ॥ भर्तुर्द्वेषात्तदाप्येषा नित्यं कलहकारिणी
ataśca valgulīyonyāṁ svaviṣṭhādā'vatiṣṭhatu || bhartūrdveṣāttadāpyeṣā nityaṁ kalahakāriṇī
इसलिए यह चमगादड़ की योनि में जाकर अपने ही मल का भक्षण करते हुए रहे। अपने पति से द्वेष रखने और सदा कलह करने के कारण -
श्लोक 19 (skanda.2.121.19)
विष्ठादां सूकरीं योनिं तस्मात्तिष्ठत्वियं हरे ॥ पाकभांडे सदा भुंक्ते भुंक्ते चैका यतस्ततः
viṣṭhādāṁ sūkarīṁ yoniṁ tasmāttiṣṭhatviyaṁ hare || pākabhāṇḍe sadā bhuṁkte bhuṁkte caikā yatastataḥ
यह मल खाने वाली सूअरी की योनि में भी रहे, हे हरि! और चूँकि यह भोजन के बर्तन में से अकेली ही खाती रही -
श्लोक 20 (skanda.2.121.20)
तस्मादेषा बिडाल्यस्तु स्वजाताऽपत्यभक्षिणी ॥ भर्तारमपि चोद्दिश्य ह्यात्मघातः कृतोऽनया
tasmādeṣā biḍālyastu svajātā'patyabhakṣiṇī || bhartāramapi coddiśya hyātmaghātaḥ kṛto'nayā
इसलिए यह अपने ही जन्मे बच्चों को खाने वाली बिल्ली भी बने। और चूँकि इसने अपने पति के प्रति द्वेष रखते हुए आत्महत्या की -
श्लोक 21 (skanda.2.121.21)
तस्मात्प्रेतशरीरेऽपि तिष्ठत्वेकाऽतिनिंदिता ॥ अतश्चैषा मरुद्देशं प्रापितव्या भटैरियम्
tasmātpretaśarīre'pi tiṣṭhatvekā'tinindita || ataścaiṣā marudveśaṁ prāpitavyā bhaṭairiyam
इसलिए यह अत्यंत निंदित प्रेत-शरीर में भी अकेली रहे। इसलिए इसे सैनिकों (यमदूतों) द्वारा मरुदेश (रेगिस्तान) भेजा जाए।
श्लोक 22 (skanda.2.121.22)
तत्र प्रेतशरीरस्था चिरं तिष्ठत्वियं ततः ॥ ऊर्ध्वं योनित्रयं चैषा भुनक्त्वशुभकारिणी
tatra pretaśarīrasthā ciraṁ tiṣṭhatviyaṁ tataḥ || ūrdhvaṁ yonitrayaṁ caiṣā bhunaktvaśubhakāriṇī
वहाँ प्रेत-शरीर में स्थित रहकर यह दीर्घकाल तक रहे; इसके बाद यह अशुभकारिणी तीन योनियों को भी भोगे।
श्लोक 23 (skanda.2.121.23)
॥कलहोवाच॥ साहं पंचशताब्दानि प्रेतदेहे स्थिता किल ॥ क्षुतृड्भ्यां पीडिताऽऽविश्य शरीरं वणिजस्य च
kalahovāca sāhaṁ paṁcaśatābdāni pretadehe sthitā kila || kṣutṛḍbhyāṁ pīḍitā'āviśya śarīraṁ vaṇijaśca
कलहा ने कहा - मैं इस प्रकार पांच सौ वर्षों तक प्रेत-देह में रही। भूख-प्यास से पीड़ित होकर मैंने एक वणिक के शरीर में प्रवेश किया -
श्लोक 24 (skanda.2.121.24)
आयाता दक्षिणं देशं कृष्णावेण्योश्च संगमम् ॥ तत्तीरं संश्रिता यावत्तावत्तस्य शरीरतः
āyātā dakṣiṇaṁ deśaṁ kṛṣṇāveṇyośca saṁgamam || tattīraṁ saṁśritā yāvattāvattasya śarīrataḥ
और दक्षिण देश में कृष्णा और वेणी नदियों के संगम पर आई। जब तक मैं उसके शरीर में उस तट का आश्रय लिए रही -
श्लोक 25 (skanda.2.121.25)
शिवविष्णुगणैर्दूरमपकृष्टा बलादहम् ॥ ततः क्षुत्क्षामया दृष्टो मया हि त्वं द्विजोत्तम
śivaviṣṇugaṇairdūramapakṛṣṭā balādaham || tataḥ kṣutkṣāmayā dṛṣṭo mayā hi tvaṁ dvijottama
शिव और विष्णु के गणों ने मुझे बलपूर्वक दूर खींच लिया। तब भूख से क्षीण हुई मैंने, हे द्विजोत्तम, तुम्हें देखा -
श्लोक 26 (skanda.2.121.26)
त्वद्धस्ततुलसीवारिसंसर्गगतपापया ॥ तत्कृत्यं कुरु विप्रेंद्र कथं मुक्तिमियाम्यहम् ॥ योनित्रयादग्रभवादस्माच्च प्रेतदेहतः
tvaddhastatulasīvārisaṁsargagatapāpayā || tatkṛtyaṁ kuru vipreṁdra kathaṁ muktimiyāmyaham || yonitrayādagrabhavādasmācca pretadehataḥ
और तुम्हारे हाथ के तुलसी-मिश्रित जल के स्पर्श से मेरा वह पाप नष्ट हो गया। हे विप्रेंद्र! अब वह उपाय करो जिससे मैं इस प्रेत-देह से और आगे आने वाली उन तीन योनियों से मुक्ति पा सकूँ।
श्लोक 27 (skanda.2.121.27)
इत्थं विचिंत्य कलहावचनं द्विजाग्र्यस्तत्कर्मपाकभयविस्मयदुःखयुक्तः ॥ तद्ग्लानिदर्शनकृपाचलचित्तवृत्ति ध्यात्वा चिरं स वचनं निजगाद दुःखात्
itthaṁ vicintya kalahāvacanaṁ dvijāgryastatkarmapākabhayavismayaduḥkhayuktaḥ || tadglānidarśanakṛpācalacittavṛtti dhyātvā ciraṁ sa vacanaṁ nijagāda duḥkhāt
कलहा के इस वचन पर इस प्रकार विचार करते हुए, वह श्रेष्ठ ब्राह्मण उसके कर्म-फल से भय, आश्चर्य और दुःख से युक्त हो गया; उसकी दुर्दशा देखकर करुणा से चंचल-चित्त होकर, बहुत देर तक विचार करने के बाद उसने दुःखपूर्वक यह वचन कहा।