वैष्णव खण्ड · अध्याय 122
कलहा की मुक्ति
श्लोक 1 (skanda.2.122.1)
॥धर्मदत्त उवाच॥ विलयं यांति पापानि तीर्थे दानव्रतादिभिः ॥ प्रेतदेहस्थितायास्ते तेषु नैवाऽधिकारिता
dharmadatta uvāca vilayaṁ yāṁti pāpāni tīrthe dānavratādibhiḥ || pretadehasthitāyāste teṣu naivā'dhikāritā
धर्मदत्त ने कहा - तीर्थ, दान, व्रत आदि से पाप नष्ट हो जाते हैं; किंतु प्रेत-देह में स्थित तुझे इनका अधिकार नहीं है।
श्लोक 2 (skanda.2.122.2)
त्वद्ग्लानिदर्शनादस्मात्खिन्नं च मम मानसम् ॥ न वै निर्वृतिमायाति त्वामनुद्धृत्य दुःखिताम्
tvadglānidarśanādasmātkhinnaṁ ca mama mānasam || na vai nirvṛtimāyāti tvāmanuddhṛtya duḥkhitām
तुम्हारी इस दुर्दशा को देखकर मेरा मन दुखी हो गया है; तुम्हें, इस दुःखिनी को, उद्धार किए बिना मुझे शांति नहीं मिलेगी।
श्लोक 3 (skanda.2.122.3)
तस्मादाजन्मचरितं यन्मया कार्तिकव्रतम् ॥ तत्पुण्यस्यार्द्धभागेन सद्गतिं त्वमवाप्नुहि
tasmādājanmacaritaṁ yanmayā kārtikavratam || tatpuṇyasyārddhabhāgena sadgatiṁ tvamavāpnuhi
इसलिए मैंने जन्म से जो कार्तिक-व्रत आचरित किया है, उसके पुण्य के आधे भाग से तुम सद्गति को प्राप्त करो।
श्लोक 4 (skanda.2.122.4)
॥नारद उवाच॥ इत्युक्त्वा धर्मदत्तोऽसौ यावत्तामभ्यषेचयत् ॥ तुलसीमिश्रतोयेन श्रावयन्द्वादशाक्षरम्
nārada uvāca ityuktvā dharmadatto'sau yāvattāmabhyaṣecayat || tulasīmiśratoyena śrāvayandvādaśākṣaram
नारद ने कहा - ऐसा कहकर धर्मदत्त ने तुलसी-मिश्रित जल से उसका अभिषेक किया, और उसे द्वादशाक्षर मंत्र सुनाया।
श्लोक 5 (skanda.2.122.5)
तावत्प्रेतत्वनिर्मुक्ता ज्वलदग्निशिखोपमा ॥ दिव्यरूपधरा जाता लावण्येन यथेंदिरा
tāvatpretatvanirmuktā jvaladagniśikhopamā || divyarūpadharā jātā lāvaṇyena yatheṁdirā
उसी क्षण वह प्रेतत्व से मुक्त होकर, प्रज्वलित अग्निशिखा के समान, इंदिरा (लक्ष्मी) के समान सौंदर्यशाली दिव्य रूप को प्राप्त हो गई।
श्लोक 6 (skanda.2.122.6)
ततः सा दंडवद्भूमौ प्रणनामाथ तं द्विजम् ॥ उवाच सा तदा वाक्यैर्हर्षगद्गदभाषिणी
tataḥ sā daṇḍavadbhūmau praṇanāmātha taṁ dvijam || uvāca sā tadā vākyairharṣagadgadabhāṣiṇī
तब उसने भूमि पर दंडवत प्रणाम कर उस द्विज को नमस्कार किया, और हर्ष से गद्गद वाणी में यह वचन कहा -
श्लोक 7 (skanda.2.122.7)
॥कलहोवाच॥ त्वत्प्रसादाद्द्विजश्रेष्ठ विमुक्ता निरयादहम् ॥ पापाब्धौ मज्जमानायास्त्वं नौभूतोऽसि मे ध्रुवम्
kalahovāca tvatprasādāddvijaśreṣṭha vimuktā nirayādaham || pāpābdhau majjamānāyāstvaṁ naubhūto'si me dhruvam
कलहा ने कहा - हे द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारी कृपा से मैं नरक से मुक्त हो गई हूँ। पाप-सागर में डूबती हुई मेरे लिए तुम निश्चय ही नाव बन गए हो।
श्लोक 8 (skanda.2.122.8)
॥नारद उवाच॥ इत्थं वदन्ती सा विप्रं ददर्शाऽऽयातमंबरात् ॥ विमानं भास्वरं युक्तं विष्णुरूपधरैर्गणैः
nārada uvāca itthaṁ vadaṁtī sā vipraṁ dadarśā'āyātamaṁbarāt || vimānaṁ bhāsvaraṁ yuktaṁ viṣṇurūpadharaiḥ gaṇaiḥ
नारद ने कहा - ऐसा कहती हुई उसने आकाश से आते हुए, विष्णु-रूपधारी गणों से युक्त, तेजोमय विमान को उस ब्राह्मण के साथ देखा।
श्लोक 9 (skanda.2.122.9)
अथ सा तद्विमानाऽग्र्यं द्वाःस्थाभ्यामवरोपिता ॥ पुण्यशीलसुशीलाभ्यामप्सरोगणसेविता
atha sā tadvimānāgryaṁ dvāḥsthābhyāmavaropitā || puṇyaśīlasuśīlābhyāmapsarogaṇasevitā
तब वह पुण्यशील और सुशील नामक द्वारपालों द्वारा, अप्सराओं के समूह से सेवित उस उत्तम विमान से उतारी गई।
श्लोक 10 (skanda.2.122.10)
तद्विमानं तदाऽपश्यद्धर्मदत्तः सविस्मयः ॥ पपात दण्डवद्भूमौ दृष्ट्वा तौ विष्णुरूपिणौ
tadvimānaṁ tadā'paśyaddharmadattaḥ savismayaḥ || papāta daṇḍavadbhūmau dṛṣṭvā tau viṣṇurūpiṇau
उस विमान को देखकर धर्मदत्त आश्चर्यचकित हो गया, और उन दोनों विष्णु-रूपधारी द्वारपालों को देखकर भूमि पर दंडवत गिर पड़ा।
श्लोक 11 (skanda.2.122.11)
पुण्यशीलसुशीलौ च तमुत्थाप्याऽऽनतं द्विजम् ॥ अभिनन्द्य ततो वाक्यमूचतुर्धर्मसंयुतम्
puṇyaśīlasuśīlau ca tamutthāpyā'ānataṁ dvijam || abhinandya tato vākyamūcaturdharmasaṁyutam
पुण्यशील और सुशील ने उस प्रणत ब्राह्मण को उठाकर, उसका अभिनंदन कर, धर्मयुक्त वचन कहा -
श्लोक 12 (skanda.2.122.12)
॥गणावूचतुः॥ साधुसाधु द्विजश्रेष्ठ यस्त्वं विष्णुरतः सदा ॥ दीनाऽनुकम्पी सर्वज्ञो विष्णुव्रतपरायणः
gaṇāvūcatuḥ sādhusādhu dvijaśreṣṭha yastvaṁ viṣṇurataḥ sadā || dīnā'nukampī sarvajño viṣṇuvrataparāyaṇaḥ
दोनों गणों ने कहा - साधु-साधु, हे द्विजश्रेष्ठ! तुम, जो सदा विष्णु में अनुरक्त, दीनों पर दया करने वाले, सर्वज्ञ और विष्णु-व्रत में तत्पर हो -
श्लोक 13 (skanda.2.122.13)
आ बालत्वाच्छुभं त्वेतद्यत्त्वया कार्तिकव्रतम् ॥ कृतं तस्याऽर्द्धदानेन पुण्यं द्वैगुण्यमागमत्
ā bālatvācchubhaṁ tvetadyattvayā kārtikavratam || kṛtaṁ tasyā'rddhadānena puṇyaṁ dvaiguṇyamāgamat
तुमने बचपन से ही जो यह शुभ कार्तिक-व्रत किया है, उसके आधे भाग के दान से उसका पुण्य दुगुना हो गया है।
श्लोक 14 (skanda.2.122.14)
जन्मांतरशतोद्भूतं पापं तद्विलयं गतम् ॥ स्नानैरेव गतं पापं यदस्याः पूर्वकर्मजम्
janmāṁtaraśatodbhūtaṁ pāpaṁ tadvilayaṁ gatam || snānaireva gataṁ pāpaṁ yadasyāḥ pūrvakarmajam
सैकड़ों जन्मों से संचित उसका पाप नष्ट हो गया; इसके पूर्वकर्मों से उत्पन्न पाप तुम्हारे दिए स्नान मात्र से ही समाप्त हो गया।
श्लोक 15 (skanda.2.122.15)
हरिजागरणाद्यैश्च विमानमिदमास्थिता ॥ वैकुण्ठे नीयते साधो नानाभोगयुता त्वियम्
harijāgaraṇādyaiśca vimānamidamāsthitā || vaikuṇṭhe nīyate sādho nānābhogayutā tviyam
हरि-जागरण आदि के पुण्य से यह इस विमान पर आरूढ़ होकर, हे साधु! नाना भोगों से युक्त होकर वैकुण्ठ को ले जाई जा रही है।
श्लोक 16 (skanda.2.122.16)
दीपदानभवैः पुण्यैस्तेजःसारूप्यमास्थिता ॥ तुलसीपूजनाद्यैश्च कार्तिकव्रतकैः शुभैः ॥ विष्णुसान्निध्यगा जाता त्वया दत्तैः कृपानिधे
dīpadānabhavaiḥ puṇyaistejaḥsārūpyamāsthitā || tulasīpūjanādyaiśca kārtikavratakaiḥ śubhaiḥ || viṣṇusānnidhyagā jātā tvayā dattaiḥ kṛpānidhe
दीपदान आदि के पुण्यों से वह तेजोमय रूप को प्राप्त हुई है; और तुम्हारे द्वारा दिए गए तुलसी-पूजन आदि शुभ कार्तिक-व्रतों से, हे कृपानिधे, वह विष्णु के सान्निध्य को प्राप्त हुई है।
श्लोक 17 (skanda.2.122.17)
त्वमप्यस्य भवस्यांते भार्याभ्यां सह यास्यसि ॥ वैकुण्ठ भुवनं विष्णोः सान्निध्यं च सरूपताम्
tvamapyasya bhavasyāṁte bhāryābhyāṁ saha yāsyasi || vaikuṇṭha bhuvanaṁ viṣṇoḥ sānnidhyaṁ ca sarūpatām
तुम भी इस जीवन के अंत में अपनी दोनों पत्नियों सहित विष्णु के वैकुण्ठ-लोक को, उनके सान्निध्य और सरूपता को प्राप्त करोगे।
श्लोक 18 (skanda.2.122.18)
ते धन्याः कृतकृत्यास्ते तेषां च सफलो भवः ॥ यैर्भक्त्याराधितो विष्णुर्धर्मदत्त यथा त्वया
te dhanyāḥ kṛtakṛtyāste teṣāṁ ca saphalo bhavaḥ || yairbhaktyārādhito viṣṇurdharmadatta yathā tvayā
वे धन्य हैं, वे कृतकृत्य हैं, और उनका जीवन सफल है, जिन्होंने भक्तिपूर्वक विष्णु की आराधना की है, जैसे तुमने की है, हे धर्मदत्त!
श्लोक 19 (skanda.2.122.19)
सम्यगाराधितो विष्णुः किं न यच्छति देहिनाम् ॥ औत्तानचरणिर्येन ध्रुवत्वे स्थापितः पुरा
samyagārādhito viṣṇuḥ kiṁ na yacchati dehinām || auttānacaraṇiryena dhruvatve sthāpitaḥ purā
भलीभाँति आराधित विष्णु प्राणियों को क्या नहीं देते? जिन्होंने पूर्वकाल में उत्तानपाद-पुत्र (ध्रुव) को ध्रुव-पद पर स्थापित किया -
श्लोक 20 (skanda.2.122.20)
यन्नामस्मरणादेव देहिनो यांति सद्गतिम् ॥ ग्राहग्रस्तो हि नागेंद्रो यन्नामस्मरणात्पुरा
yannāmasmaraṇādeva dehino yāṁti sadgatim || grāhagrasto hi nāgeṁdro yannāmasmaraṇātpurā
जिनके नाम-स्मरण मात्र से ही प्राणी सद्गति को प्राप्त होते हैं। जिनके नाम-स्मरण से पूर्वकाल में मगरमच्छ द्वारा ग्रसित गजराज -
श्लोक 21 (skanda.2.122.21)
विमुक्तः संनिधिं प्राप्तो जातोऽयं जयसंज्ञकः ॥ यतस्त्वयाऽर्चितो विष्णुस्तत्सान्निध्यं प्रयास्यसि
vimuktaḥ saṁnidhiṁ prāpto jāto'yaṁ jayasaṁjñakaḥ || yatastvayā'rcito viṣṇustatsānnidhyaṁ prayāsyasi
मुक्त होकर उनके सान्निध्य को प्राप्त हुआ और "जय" नाम से प्रसिद्ध हुआ। चूँकि तुमने विष्णु की आराधना की है, इसलिए तुम भी उनके सान्निध्य को प्राप्त करोगे -
श्लोक 22 (skanda.2.122.22)
बहून्यब्दसहस्राणि भार्याद्वययुतः किल ॥ ततः पुण्यक्षयेजाते यदा यास्यसि भूतलम्
bahūnyabdasahasrāṇi bhāryādvayayutaḥ kila || tataḥ puṇyakṣayejāte yadā yāsyasi bhūtalam
और अनेक हजार वर्षों तक अपनी दोनों पत्नियों सहित रहोगे। तत्पश्चात, पुण्य क्षीण होने पर जब तुम भूतल पर आओगे -
श्लोक 23 (skanda.2.122.23)
सूर्यवंशोद्भवो राजा विख्यातस्त्वं भविष्यसि ॥ नाम्ना दशरथस्तत्र भार्याद्वययुतः पुनः
sūryavaṁśodbhavo rājā vikhyātastvaṁ bhaviṣyasi || nāmnā daśarathastatra bhāryādvayayutaḥ punaḥ
तुम सूर्यवंश में उत्पन्न, दशरथ नाम से प्रसिद्ध राजा बनोगे, पुनः अपनी दोनों पत्नियों सहित -
श्लोक 24 (skanda.2.122.24)
तृतीययाऽनया चाऽपि या ते पुण्यार्द्धभागिनी ॥ तत्राऽपि तव सान्निध्यं विष्णुर्यास्यति भूतले
tṛtīyayā'nayā cā'pi yā te puṇyārddhabhāginī || tatrā'pi tava sānnidhyaṁ viṣṇuryāsyati bhūtale
और तीसरी पत्नी के रूप में यह कलहा भी, जो तुम्हारे पुण्य की आधी भागी है। वहाँ भी विष्णु तुम्हारे सान्निध्य में भूतल पर आएँगे -
श्लोक 25 (skanda.2.122.25)
आत्मानं तव पुत्रत्वे प्रकल्प्याऽमरकार्यकृत् ॥ तव जन्मव्रतादस्माद्विष्णुसंतुष्टिकारकात् ॥ न यज्ञा न च दानानि न तीर्थान्यधिकानि वै
ātmānaṁ tava putratve prakalpyā'marakāryakṛt || tava janmavratādasmādviṣṇusaṁtuṣṭikārakāt || na yajñā na ca dānāni na tīrthānyadhikāni vai
स्वयं को तुम्हारा पुत्र बनाकर, देवताओं का कार्य करने के लिए। तुम्हारे इस जन्मभर के, विष्णु को संतुष्ट करने वाले व्रत से बढ़कर न यज्ञ हैं, न दान हैं, न ही अन्य कोई तीर्थ हैं।
श्लोक 26 (skanda.2.122.26)
धन्योऽसि विप्राग्र्य यतस्त्वयैतद्व्रतं कृतं तुष्टिकरं जगद्गुरोः ॥ यदर्धभागात्सफला मुरारेः प्रणीयतेऽस्माभिरियं सलोकताम्
dhanyo'si viprāgrya yatastvayaitadvrataṁ kṛtaṁ tuṣṭikaraṁ jagadguroḥ || yadardhabhāgātsaphalā murāreḥ praṇīyate'smābhiriyaṁ salokatām
हे श्रेष्ठ विप्र! तुम धन्य हो, क्योंकि तुमने जगद्गुरु विष्णु को संतुष्ट करने वाला यह व्रत किया है, जिसके आधे भाग से सफल होकर यह स्त्री मुरारि की उसी लोकता को प्राप्त हो रही है, जहाँ हम इसे ले जा रहे हैं।"