वैष्णव खण्ड · अध्याय 123
राजा चोल और विष्णुदास ब्राह्मण का विवाद
श्लोक 1 (skanda.2.123.1)
॥नारद उवाच॥ इत्थं तद्वचनं श्रुत्वा धर्मदत्तः सविस्मयः ॥ प्रणम्य दण्डवद्भूमौ वाक्यमेतदुवाच ह
nārada uvāca itthaṁ tadvacanaṁ śrutvā dharmadattaḥ savismayaḥ || praṇamya daṇḍavadbhūmau vākyametaduvāca ha
नारद ने कहा - इस प्रकार यह वचन सुनकर धर्मदत्त आश्चर्यचकित हो गया, और भूमि पर दंडवत प्रणाम कर यह वचन कहा -
श्लोक 2 (skanda.2.123.2)
॥धर्मदत्त उवाच॥ आराधयंति सर्वेऽपि विष्णुं भक्ताऽर्तिनाशनम् ॥ यज्ञैर्दानैर्व्रतैस्तीर्थैस्तपोभिश्च यथाविधि
dharmadatta uvāca ārādhayaṁti sarve'pi viṣṇuṁ bhaktā'rtināśanam || yajñairdānairvrataistīrthaistapobhiśca yathāvidhi
धर्मदत्त ने कहा - सभी लोग यज्ञों, दानों, व्रतों, तीर्थों और तपस्याओं द्वारा विधिपूर्वक भक्तों के दुःख का नाश करने वाले विष्णु की आराधना करते हैं।
श्लोक 3 (skanda.2.123.3)
विष्णुप्रीतिकरं तेषां किंचित्सान्निध्यकारकम् ॥ यत्कृत्वा तानि चीर्णानि सर्वाण्यपि भवंति हि
viṣṇuprītikaraṁ teṣāṁ kiṁcitsānnidhyakārakam || yatkṛtvā tāni cīrṇāni sarvāṇyapi bhavaṁti hi
उन सबमें कुछ ऐसा भी है जो विष्णु को विशेष रूप से प्रसन्न करता है और उनके सान्निध्य का कारण बनता है; जिसे करने से वे सारे साधन सफल हो जाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.2.123.4)
॥गणावूचतुः॥ साधु पृष्टं त्वया विप्र शृणुष्वैकाग्रमानसः ॥ सेतिहासकथां पुण्यां कथ्यमानां पुराभवाम्
gaṇāvūcatuḥ sādhu pṛṣṭaṁ tvayā vipra śṛṇuṣvaikāgramānasaḥ || setihāsakathāṁ puṇyāṁ kathyamānāṁ purābhavām
दोनों गणों ने कहा - हे विप्र! तुमने अच्छा प्रश्न पूछा है; एकाग्रचित्त होकर सुनो इस पुण्य कथा को, जो पूर्वकाल में घटित हुई थी, और जिसे इतिहास सहित कहा जा रहा है।
श्लोक 5 (skanda.2.123.5)
कांचिपुर्यां पुरा चोलश्चक्रवर्ती नृपोऽभवत् ॥ यस्याख्ययैव ते देशाश्चोला इति प्रथां गताः
kāṁcipuryāṁ purā colaścakravartī nṛpo'bhavat || yasyākhyayaiva te deśāścolā iti prathāṁ gatāḥ
पूर्वकाल में कांचीपुरी में चोल नाम का एक चक्रवर्ती राजा था, जिसके नाम से ही वे देश "चोल" के नाम से प्रसिद्ध हुए।
श्लोक 6 (skanda.2.123.6)
यस्मिञ्छासति भूचक्रं दरिद्रो वाऽपि दुःखितः ॥ पापबुद्धिः सरुग्वापि नैव कश्चिदभून्नरः
yasmiñchāsati bhūcakraṁ daridro vā'pi duḥkhitaḥ || pāpabuddhiḥ sarugvāpi naiva kaścidabhūnnaraḥ
जब वह भूमंडल का शासन करता था, तब कोई भी मनुष्य दरिद्र, दुखी, पापबुद्धि वाला या रोगी नहीं था।
श्लोक 7 (skanda.2.123.7)
यस्याप्युन्नतयज्ञस्य ताम्रपर्ण्यास्तटावुभौ ॥ सुवर्णयूपैः शोभाढ्यावास्तां चैत्ररथोपमौ
yasyāpyunnatayajñasya tāmraparṇyāstaṭāvubhau || suvarṇayūpaiḥ śobhāḍhyāvāstāṁ caitrarathopamau
उसके महान यज्ञ के सोने के यूपों (यज्ञ-स्तंभों) से सुशोभित होकर ताम्रपर्णी नदी के दोनों तट चैत्ररथ वन के समान हो गए थे।
श्लोक 8 (skanda.2.123.8)
स कदाचिदगाद्राजा ह्यनंतशयनं द्विज ॥ यत्राऽसौ जगतां नाथो योगनिद्रामुपाश्रितः
sa kadācidagādrājā hyanaṁtaśayanaṁ dvija || yatrā'sau jagatāṁ nātho yoganidrāmupāśritaḥ
हे द्विज! एक बार वह राजा अनंतशयन क्षेत्र को गया, जहाँ वे जगत्-नाथ (विष्णु) योगनिद्रा में लीन थे।
श्लोक 9 (skanda.2.123.9)
तत्र श्रीरमणं देवं संपूज्य विधिवन्नृपः ॥ मणिमुक्ताफलैर्दिव्यैः स्वर्णपुष्पैश्च शोभनैः
tatra śrīramaṇaṁ devaṁ saṁpūjya vidhivannṛpaḥ || maṇimuktāphalairdivyaiḥ svarṇapuṣpaiśca śobhanaiḥ
वहाँ राजा ने श्री के प्रियतम उस देव की विधिपूर्वक, दिव्य मणि-मोतियों और सुंदर सोने के फूलों से पूजा की।
श्लोक 10 (skanda.2.123.10)
प्रणम्य दण्डवद्भूमावुपविष्टः स तत्र वै ॥ तावद्ब्राह्मणमायांतमपश्यद्देवसन्निधौ
praṇamya daṇḍavadbhūmāvupaviṣṭaḥ sa tatra vai || tāvadbrāhmaṇamāyāṁtamapaśyaddevasannidhau
भूमि पर दंडवत प्रणाम कर वह वहीं बैठ गया; तभी उसने देव के समीप एक ब्राह्मण को आते हुए देखा,
श्लोक 11 (skanda.2.123.11)
देवार्चनार्थं पाणौ तु तुलस्युदकधारिणम् ॥ स्वपुरीवासिनं तत्र विष्णुदासाह्वयं द्विजम्
devārcanārthaṁ pāṇau tu tulasyudakadhāriṇam || svapurīvāsinaṁ tatra viṣṇudāsāhvayaṁ dvijam
जिसके हाथ में देव की पूजा के लिए तुलसी-जल था; वह अपने ही नगर का निवासी विष्णुदास नाम का द्विज था।
श्लोक 12 (skanda.2.123.12)
स तत्राभ्येत्य विप्रर्षिर्देवदेवमपूजयत् ॥ विष्णुसूक्तेन संस्नाप्य तुलसीमंजरीदलैः
sa tatrābhyetya viprarṣirdevadevamapūjayat || viṣṇusūktena saṁsnāpya tulasīmaṁjarīdalaiḥ
वह ब्राह्मण-ऋषि वहाँ आकर विष्णुसूक्त से स्नान कराते हुए तुलसी की मंजरियों और पत्तों से देवाधिदेव की पूजा करने लगा।
श्लोक 13 (skanda.2.123.13)
तुलसीपूजया तस्य रत्नपूजां पुरा कृताम् ॥ आच्छादितां समालोक्य राजा कुद्धोऽब्रवीदिदम्
tulasīpūjayā tasya ratnapūjāṁ purā kṛtām || ācchāditāṁ samālokya rājā kuddho'bravīdidam
उसकी तुलसी-पूजा से पहले की गई रत्न-पूजा को ढका हुआ देखकर राजा क्रोधित होकर यह बोला -
श्लोक 14 (skanda.2.123.14)
॥चोल उवाच॥ माणिक्यस्वर्णपूजाऽत्र शोभाढ्या या कृता मया ॥ विष्णुदास कथं सेयमाच्छन्ना तुलसीदलैः
cola uvāca māṇikyasvarṇapūjā'tra śobhāḍhyā yā kṛtā mayā || viṣṇudāsa kathaṁ seyamācchannā tulasīdalaiḥ
चोल ने कहा - हे विष्णुदास! मैंने यहाँ जो माणिक्य और सोने से सुशोभित पूजा की थी, वह तुलसी-पत्तों से क्यों ढक दी गई?
श्लोक 15 (skanda.2.123.15)
विष्णुभक्तिं न जानासि वराकोऽसि मतो मम ॥ यस्त्विमामतिशोभाढ्यां पूजामाच्छादयस्यहो
viṣṇubhaktiṁ na jānāsi varāko'si mato mama || yastvimāmatiśobhāḍhyāṁ pūjāmācchādayasyaho
तुम विष्णु-भक्ति को नहीं जानते, तुम मुझे तुच्छ प्रतीत होते हो, जो इस अत्यंत सुंदर पूजा को ढक देते हो, हे विप्र!"
श्लोक 16 (skanda.2.123.16)
इति तद्वचनं श्रुत्वा सक्रोधः स द्विजोत्तमः ॥ राज्ञो गौरवमुल्लंघ्य जगाद वचनं तदा
iti tadvacanaṁ śrutvā sakrodhaḥ sa dvijottamaḥ || rājño gauravamullaṁghya jagāda vacanaṁ tadā
यह वचन सुनकर वह श्रेष्ठ द्विज क्रोधित होकर, राजा की गरिमा की परवाह किए बिना, यह वचन बोला -
श्लोक 17 (skanda.2.123.17)
॥विष्णुदास उवाच॥ राजन्भक्तिं न जानासि गर्वितोऽसि नृपश्रिया ॥ कियद्विष्णुव्रतं पूर्वं त्वया चीर्णं वदस्व तत्
viṣṇudāsa uvāca rājanbhaktiṁ na jānāsi garvito'si nṛpaśriyā || kiyadviṣṇuvrataṁ pūrvaṁ tvayā cīrṇaṁ vadasva tat
विष्णुदास ने कहा - हे राजन्! तुम भक्ति को नहीं जानते, तुम राजसी वैभव के मद में डूबे हो। पहले यह बताओ कि तुमने कितना विष्णु-व्रत किया है?
श्लोक 18 (skanda.2.123.18)
॥गणावूचतुः॥ तद्ब्राह्मणवचः श्रुत्वा प्रहस्य स नृपोत्तमः ॥ विष्णुदासं तदा गर्वादुवाच वचनं द्विजम्
gaṇāvūcatuḥ tadbrāhmaṇavacaḥ śrutvā prahasya sa nṛpottamaḥ || viṣṇudāsaṁ tadā garvādūvāca vacanaṁ dvijam
दोनों गणों ने कहा - उस ब्राह्मण के वचन को सुनकर वह श्रेष्ठ राजा हँसते हुए, गर्व से विष्णुदास से यह वचन बोला -
श्लोक 19 (skanda.2.123.19)
॥राजोवाच॥ इत्थं चेद्वदसे विप्र विष्णुभक्त्याऽतिगर्वितः ॥ भक्तिस्ते कियती विष्णोर्दरिद्रस्याऽधनस्य च
rājovāca itthaṁ cedvadase vipra viṣṇubhaktyā'tigarvitaḥ || bhaktiste kiyatī viṣṇordaridrasyā'dhanasya ca
राजा ने कहा - हे विप्र! यदि तुम इस प्रकार विष्णु-भक्ति के अभिमान में इतनी बड़ी बात कहते हो, तो बताओ, तुम्हारी - एक दरिद्र और धनहीन व्यक्ति की - विष्णु के प्रति कितनी भक्ति है?
श्लोक 20 (skanda.2.123.20)
यज्ञदानादिकं नैव विष्णोस्तुष्टिकरं कृतम् ॥ नाऽपि देवालयं पूर्वं कृतं विप्र त्वया क्वचित्
yajñadānādikaṁ naiva viṣṇostuṣṭikaraṁ kṛtam || nā'pi devālayaṁ pūrvaṁ kṛtaṁ vipra tvayā kvacit
तुमने न तो यज्ञ-दान आदि कोई ऐसा कार्य किया जो विष्णु को संतुष्ट करे, न ही तुमने पहले कभी कोई देवालय बनवाया, हे विप्र!
श्लोक 21 (skanda.2.123.21)
ईदृशस्याऽपि ते गर्व एष तिष्ठति भक्तितः ॥ तच्छृण्वंतु वचो मेऽद्य सर्वेऽप्येते द्विजातयः
īdṛśasyā'pi te garva eṣa tiṣṭhati bhaktitaḥ || tacchṛṇvaṁtu vaco me'dya sarve'pyete dvijātayaḥ
फिर भी तुम्हें भक्ति का ऐसा अभिमान है। आज यहाँ उपस्थित सभी द्विजगण मेरी यह बात सुनें -
श्लोक 22 (skanda.2.123.22)
साक्षात्कारमहं विष्णोरेष वादो गमिष्यति ॥ पश्यंतु सर्वेऽपि ततो भक्तिं ज्ञास्यंति चावयोः
sākṣātkāramahaṁ viṣṇoreṣa vādo gamiṣyati || paśyaṁtu sarve'pi tato bhaktiṁ jñāsyaṁti cāvayoḥ
यह विवाद विष्णु के साक्षात्कार तक जाएगा; तब सब देखेंगे और हम दोनों की भक्ति को जान लेंगे।"
श्लोक 23 (skanda.2.123.23)
॥गणावूचतुः॥ इत्युक्त्वा स नृपोऽगच्छन्निजराजगृहं तदा ॥ आरभद्वैष्णवं सत्रं कृत्वाऽऽचार्यं तु मुद्गलम्
gaṇāvūcatuḥ ityuktvā sa nṛpo'gacchannijarājagṛhaṁ tadā || ārabhadvaiṣṇavaṁ satraṁ kṛtvā'ācāryaṁ tu mudgalam
दोनों गणों ने कहा - ऐसा कहकर वह राजा अपने राजभवन को गया, और मुद्गल को आचार्य बनाकर वैष्णव यज्ञ-सत्र आरंभ किया।
श्लोक 24 (skanda.2.123.24)
ऋषिसंघसमाजुष्टं बह्वन्नं बहुदक्षिणम् ॥ यच्च ब्रह्मकृतं पूर्वं गयाक्षेत्रे समृद्धिमत्
ṛṣisaṁghasamājuṣṭaṁ bahvannaṁ bahudakṣiṇam || yacca brahmakṛtaṁ pūrvaṁ gayākṣetre samṛddhimat
वह यज्ञ ऋषि-समूहों से युक्त, प्रचुर अन्न और प्रचुर दक्षिणा वाला था, जैसा कि पूर्वकाल में ब्रह्मा द्वारा गया-क्षेत्र में किया गया समृद्ध यज्ञ था।
श्लोक 25 (skanda.2.123.25)
विष्णुदासोऽपि तत्रैव तस्थौ देवालये व्रती ॥ यथोक्तनियमान्कुर्वन्विष्णोस्तुष्टिकरान्सदा
viṣṇudāso'pi tatraiva tasthau devālaye vratī || yathoktaniyamānkurvanviṣṇostuṣṭikarānsadā
विष्णुदास भी वहीं देवालय में व्रती होकर रहा, और सदा विष्णु को संतुष्ट करने वाले शास्त्रोक्त नियमों का पालन करता रहा।
श्लोक 26 (skanda.2.123.26)
माघोर्जयोर्व्रतं सम्यक्तुलसीवनपालनम् ॥ एकादश्यां हरेर्जाप्यं द्वादशाक्षरविद्यया
māghorjayorvrataṁ samyaktulasīvanapālanam || ekādaśyāṁ harerjāpyaṁ dvādaśākṣaravidyayā
वह माघ और कार्तिक (ऊर्जा) मास का व्रत भलीभाँति पालन करता, तुलसी-वन की देखभाल करता, और एकादशी को द्वादशाक्षर विद्या द्वारा हरि का जप करता था।
श्लोक 27 (skanda.2.123.27)
उपचारैः षोडशभिर्नृत्यगीतादिमंगलैः ॥ नित्यं विष्णोस्तथा पूजां व्रतान्येतानि सोऽकरोत्
upacāraiḥ ṣoḍaśabhirnṛtyagītādimaṁgalaiḥ || nityaṁ viṣṇostathā pūjāṁ vratānyetāni so'karot
वह सोलह उपचारों से, नृत्य-गीत आदि मंगल कार्यों से, नित्य विष्णु की पूजा करता हुआ इन व्रतों का पालन करता रहा।
श्लोक 28 (skanda.2.123.28)
नित्यं संस्मरणं विष्णोर्गच्छन्भुवि स्वपन्नपि ॥ सर्वभूतस्थितं विष्णुमपश्यत्समदर्शनः
nityaṁ saṁsmaraṇaṁ viṣṇorgacchanbhuvi svapannapi || sarvabhūtasthitaṁ viṣṇumapaśyatsamadarśanaḥ
चलते, पृथ्वी पर सोते हुए भी वह नित्य विष्णु का स्मरण करता रहता; समदर्शी होकर वह सभी प्राणियों में स्थित विष्णु को देखता था।
श्लोक 29 (skanda.2.123.29)
माघकार्तिकयोर्नित्यं विशेषनियमानपि ॥ अकरोद्विष्णुतुष्ट्यर्थं सोद्यापनविधिं तथा
māghakārtikayornityaṁ viśeṣaniyamānapi || akarodviṣṇutuṣṭyarthaṁ sodyāpanavidhiṁ tathā
माघ और कार्तिक में वह नित्य विशेष नियमों का पालन करता, और विष्णु को संतुष्ट करने के लिए उद्यापन-विधि भी करता था।
श्लोक 30 (skanda.2.123.30)
एवं समाराधयतोः श्रियः पतिं तयोश्च चोलेश्वरविष्णुदासयोः ॥ अगाद्धि कालः सुमहान्व्रतस्थयोस्तन्निष्ठसर्वेंद्रियकर्मणोस्तदा
evaṁ samārādhayatoḥ śriyaḥ patiṁ tayośca coleśvaraviṣṇudāsayoḥ || agāddhi kālaḥ sumahānvratasthayostanniṣṭhasarveṁdriyakarmaṇostadā
इस प्रकार श्री के स्वामी विष्णु की आराधना करते हुए, उन दोनों - चोलेश्वर और विष्णुदास - के, अपने व्रत में स्थित और सभी इंद्रियों के कर्मों को उसी में लगाए हुए, बहुत लंबा समय बीत गया।