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वैष्णव खण्ड · अध्याय 124

चोल और विष्णुदास की मुक्ति

अध्याय 123अध्याय-सूचीअध्याय 125

श्लोक 1 (skanda.2.124.1)

॥नारद उवाच॥ कदाचिद्विष्णुदासोऽथ कृत्वा नित्यविधिं द्विज ॥ स पाकमकरोत्तावदहरत्कोऽप्यलक्षितः

nārada uvāca kadācidviṣṇudāso'tha kṛtvā nityavidhiṁ dvija || sa pākamakarottāvadaharatko'pyalakṣitaḥ

नारद ने कहा - हे द्विज! एक बार विष्णुदास अपनी नित्य विधि करके भोजन बना ही रहा था, तभी किसी अदृश्य ने उसे चुरा लिया।

श्लोक 2 (skanda.2.124.2)

तमदृष्ट्वाऽप्यसौ पाकं पुनर्नैवाऽकरोत्तदा ॥ सायंकालाऽर्चनस्याऽसौ व्रतभंगभयाद्द्विजः

tamadṛṣṭvā'pyasau pākaṁ punarnaivā'karottadā || sāyaṁkālā'rcanasyā'sau vratabhaṁgabhayāddvijaḥ

उस चोर को न देखते हुए भी उसने पुनः भोजन नहीं बनाया, क्योंकि उस ब्राह्मण को सायंकाल की पूजा के व्रत-भंग का भय था।

श्लोक 3 (skanda.2.124.3)

द्वितीयेऽह्नि पुनः पाकं कृत्वा यावत्स विष्णवे ॥ उपहारार्पणं कर्तुं गतः कोऽप्यहरत्पुनः

dvitīye'hni punaḥ pākaṁ kṛtvā yāvatsa viṣṇave || upahārārpaṇaṁ kartuṁ gataḥ ko'pyaharatpunaḥ

दूसरे दिन पुनः भोजन बनाकर, जैसे ही वह विष्णु को नैवेद्य अर्पित करने गया, किसी ने उसे फिर से चुरा लिया।

श्लोक 4 (skanda.2.124.4)

एवं सप्तदिनं तस्य पाकं कोऽप्यहरन्नृप ॥ ततः सविस्मयश्चाथ मनस्येवमधारयत्

evaṁ saptadinaṁ tasya pākaṁ ko'pyaharannṛpa || tataḥ savismayaścātha manasyevamadhārayat

हे राजन्! इस प्रकार सात दिनों तक कोई उसका भोजन चुराता रहा। तब वह आश्चर्यचकित होकर मन में इस प्रकार विचार करने लगा -

श्लोक 5 (skanda.2.124.5)

अहो नित्यं समभ्येत्य कः पाकं हरते मम ॥ क्षेत्रसंन्यासिनः स्थानं न त्याज्यं मम सर्वथा

aho nityaṁ samabhyetya kaḥ pākaṁ harate mama || kṣetrasaṁnyāsinaḥ sthānaṁ na tyājyaṁ mama sarvathā

अहो! प्रतिदिन आकर कौन मेरा भोजन चुरा ले जाता है? इस क्षेत्र में व्रतबद्ध होकर मुझे अपना स्थान किसी भी दशा में नहीं छोड़ना चाहिए।

श्लोक 6 (skanda.2.124.6)

पुनः पाकं विधायाऽत्र भुज्यते यदि चेन्मया ॥ सायंकालाऽर्चनं चैव परित्याज्यं कथं भवेत्

punaḥ pākaṁ vidhāyā'tra bhujyate yadi cenmayā || sāyaṁkālā'rcanaṁ caiva parityājyaṁ kathaṁ bhavet

यदि मैं यहाँ पुनः भोजन बनाकर स्वयं खा लूँ, तो सायंकाल की पूजा को कैसे त्यागा जा सकता है?

श्लोक 7 (skanda.2.124.7)

यदि पाकं विधायैवं भोक्तव्यं तु मया न तत् ॥ अनिवेद्य हरौ सर्वं वैष्णवैर्नैव भुज्यते

yadi pākaṁ vidhāyaivaṁ bhoktavyaṁ tu mayā na tat || anivedya harau sarvaṁ vaiṣṇavairnaiva bhujyate

यदि मैं भोजन बनाऊँ भी, तो उसे इस प्रकार बिना अर्पित किए मुझे नहीं खाना चाहिए; वैष्णव लोग हरि को अर्पित किए बिना कुछ भी नहीं खाते।

श्लोक 8 (skanda.2.124.8)

उपोषितोऽहं सप्ताऽहं तिष्ठाम्यत्र व्रतस्थितः ॥ अद्यसंरक्षणं सम्यक्पाकस्याऽत्र करोम्यहम्

upoṣito'haṁ saptā'haṁ tiṣṭhāmyatra vratasthitaḥ || adyasaṁrakṣaṇaṁ samyakpākasyā'tra karomyaham

मैंने सात दिन उपवास किया है, और अपने व्रत में स्थित रहकर यहीं रहूँगा; आज मैं यहीं रहकर भोजन की भलीभाँति रक्षा करूँगा।"

श्लोक 9 (skanda.2.124.9)

इति पाकं विधायाऽसौ तत्रैवाऽलक्षितः स्थितः ॥ तावद्ददर्श चंडालं पाकान्नहरणे स्थितम्

iti pākaṁ vidhāyā'sau tatraivā'lakṣitaḥ sthitaḥ || tāvaddadarśa caṁḍālaṁ pākānnaharaṇe sthitam

ऐसा सोचकर उसने भोजन बनाया और स्वयं वहीं छिपकर बैठ गया; तभी उसने एक चांडाल को भोजन चुराते हुए देखा,

श्लोक 10 (skanda.2.124.10)

क्षुत्क्षामं दीनवदनमस्थिचर्माऽवशेषितम् ॥ तमालोक्य द्विजाग्र्योऽभूत्कृपयाऽन्वितमानसः

kṣutkṣāmaṁ dīnavadanamasthicarmā'vaśeṣitam || tamālokya dvijāgryo'bhūtkṛpayā'nvitamānasaḥ

जो भूख से क्षीण, दीन मुख वाला, केवल हड्डी और चमड़ी शेष रह गया था। उसे देखकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण करुणा से भर गया।

श्लोक 11 (skanda.2.124.11)

विलोक्याऽन्नहरं विप्रस्तिष्ठतिष्ठेत्यभाषत ॥ कथमश्नासि तद्रूक्षं घृतमेतद्गृहाण भोः

vilokyā'annaharaṁ vipraḥ tiṣṭhatiṣṭhetyabhāṣata || kathamaśnāsi tadrūkṣaṁ ghṛtametadgṛhāṇa bhoḥ

उस अन्न-चोर को देखकर ब्राह्मण ने कहा - रुको, रुको! तुम यह रूखा भोजन कैसे खाते हो, यह घी ले लो।

श्लोक 12 (skanda.2.124.12)

इत्थं वदंतं विप्राग्र्यमायांतं स विलोक्य च ॥ वेगादधावत्तद्भीत्या मृर्च्छितश्च पपात ह

itthaṁ vadaṁtaṁ viprāgryamāyāṁtaṁ sa vilokya ca || vegādadhāvattadbhītyā mūrcchitaśca papāta ha

उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को इस प्रकार बोलते और अपनी ओर आते देखकर वह चांडाल भय से वेगपूर्वक भागने लगा, और मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।

श्लोक 13 (skanda.2.124.13)

भीतं संमूर्च्छितं दृष्ट्वा चंडालं स द्विजाग्रणीः ॥ वेगादभ्येत्य कृपया स्ववस्त्रांतैरवीजयत्

bhītaṁ saṁmūrcchitaṁ dṛṣṭvā caṁḍālaṁ sa dvijāgraṇīḥ || vegādabhyetya kṛpayā svavastrāṁtairavījayat

उस भयभीत और मूर्च्छित चांडाल को देखकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण शीघ्रता से पास जाकर, कृपापूर्वक अपने वस्त्र के छोर से उसे हवा करने लगा।

श्लोक 14 (skanda.2.124.14)

अथोत्थितं तमेवासौ विष्णुदासो व्यलोकयत् ॥ साक्षान्नारायणं देवं शंखचक्रगदाधरम्

athotthitaṁ tamevāsau viṣṇudāso vyalokayat || sākṣānnārāyaṇaṁ devaṁ śaṁkhacakragadādharam

तब जब वह उठा, तो विष्णुदास ने उसे साक्षात् शंख, चक्र और गदा धारण किए हुए भगवान नारायण के रूप में देखा।

श्लोक 15 (skanda.2.124.15)

तं दृष्ट्वा सात्त्विकैर्भावैरावृतो द्विजसत्तमः ॥ स्तोतुं चैव नमस्कर्तुं तदा नाऽलं बभूव सः

taṁ dṛṣṭvā sāttvikairbhāvairāvṛto dvijasattamaḥ || stotuṁ caiva namaskartuṁ tadā nā'laṁ babhūva saḥ

उसे देखकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सात्त्विक भावों से अभिभूत हो गया, और उस समय वह स्तुति करने या नमस्कार करने में भी असमर्थ हो गया।

श्लोक 16 (skanda.2.124.16)

अथ शक्रादयो देवास्तत्रैवाभ्याययुस्तदा ॥ गंधर्वाप्सरसश्चाऽपि जगुश्च ननृतुर्मुदा

atha śakrādayo devāstatraivābhyāyayustadā || gaṁdharvāpsarasaścā'pi jaguśca nanṛturmudā

तब इंद्र आदि देवगण भी वहीं आ गए, और गंधर्व तथा अप्सराएं भी प्रसन्नतापूर्वक गाने और नाचने लगीं।

श्लोक 17 (skanda.2.124.17)

विमानशतसंकीर्णं देवर्षिशतसंकुलम् ॥ गीतवादित्रनिर्घोषं स्थानं तदभवत्तदा

vimānaśatasaṁkīrṇaṁ devarṣiśatasaṁkulam || gītavāditranirghoṣaṁ sthānaṁ tadabhavattadā

वह स्थान सैकड़ों विमानों से भरा हुआ, सैकड़ों देवर्षियों से युक्त, और गीत-वाद्य की ध्वनि से गूँजने लगा।

श्लोक 18 (skanda.2.124.18)

ततो विष्णुः समालिंग्य स्वभक्तं सात्त्विकव्रतम् ॥ सारूप्यमात्मनो दत्त्वाऽनयद्वैकुण्ठमंदिरम्

tato viṣṇuḥ samāliṁgya svabhaktaṁ sāttvikavratam || sārūpyamātmano dattvā'anayadvaikuṇṭhamaṁdiram

तब विष्णु ने अपने सात्त्विक-व्रती भक्त को आलिंगन कर, उसे अपनी सरूपता प्रदान कर, वैकुण्ठ-धाम को ले गए।

श्लोक 19 (skanda.2.124.19)

विमानवरसंस्थं तं गच्छंतं विष्णुसन्निधिम् ॥ दीक्षितश्चोलनृपतिर्विष्णुदासं ददर्श सः

vimānavarasaṁsthaṁ taṁ gacchaṁtaṁ viṣṇusannidhim || dīkṣitaścolanṛpatirviṣṇudāsaṁ dadarśa saḥ

उस उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर विष्णु के सान्निध्य को जाते हुए विष्णुदास को, यज्ञ-दीक्षित राजा चोल ने देखा।

श्लोक 20 (skanda.2.124.20)

वैकुण्ठभुवनं यांतं विष्णुदासं विलोक्य सः ॥ स्वगुरुं मुद्गलं वेगादाहूयेत्थं वचोऽब्रवीत्

vaikuṇṭhabhuvanaṁ yāṁtaṁ viṣṇudāsaṁ vilokya saḥ || svaguruṁ mudgalaṁ vegādāhūyettthaṁ vaco'bravīt

विष्णुदास को वैकुण्ठ-लोक जाते हुए देखकर उसने तुरंत अपने गुरु मुद्गल को बुलाकर यह वचन कहा -

श्लोक 21 (skanda.2.124.21)

॥चोल उवाच॥ यत्स्पर्द्धया मया चैव यज्ञदानादिकं कृतम् ॥ स विष्णुरूपधृग्विप्रो याति वैकुण्ठमंदिरम्

cola uvāca yatspardhayā mayā caiva yajñadānādikaṁ kṛtam || sa viṣṇurūpadhṛgvipro yāti vaikuṇṭhamaṁdiram

चोल ने कहा - जिस स्पर्धा के कारण मैंने यज्ञ-दान आदि किया, वही विष्णु-रूपधारी विप्र आज वैकुण्ठ-धाम को जा रहा है।

श्लोक 22 (skanda.2.124.22)

दीक्षितेन मया सम्यक्सत्रेऽस्मिन्वैष्णवे त्वया ॥ हुतमग्नौ कृता विप्रा दानाद्यैः पूर्णमानसाः

dīkṣitena mayā samyaksatre'sminvaiṣṇave tvayā || hutamagnau kṛtā viprā dānādyaiḥ pūrṇamānasāḥ

यज्ञ-दीक्षा लेकर, तुम्हारे द्वारा संपन्न इस वैष्णव सत्र में मैंने अग्नि में आहुति दी है, और दान आदि से ब्राह्मणों के मन को पूर्णतः संतुष्ट किया है।

श्लोक 23 (skanda.2.124.23)

नैवाऽद्यापि स मे देवः प्रसन्नो जायते ध्रुवम् ॥ विष्णुदासस्य भक्त्यैव साक्षात्कारं ददौ हरिः

naivā'dyāpi sa me devaḥ prasanno jāyate dhruvam || viṣṇudāsasya bhaktyaiva sākṣātkāraṁ dadau hariḥ

फिर भी वह देव मुझ पर निश्चय ही अभी तक प्रसन्न नहीं हुए हैं। किंतु हरि ने केवल विष्णुदास की भक्ति से ही उसे साक्षात्कार दे दिया!

श्लोक 24 (skanda.2.124.24)

तस्माद्दानैश्च यज्ञैश्च नैव विष्णुः प्रसीदति ॥ भक्तिरेव परं तस्य निदानं दर्शने विभोः

tasmāddānaiśca yajñaiśca naiva viṣṇuḥ prasīdati || bhaktireva paraṁ tasya nidānaṁ darśane vibhoḥ

इसलिए दान और यज्ञों से विष्णु प्रसन्न नहीं होते; उस प्रभु के दर्शन का परम कारण भक्ति ही है।"

श्लोक 25 (skanda.2.124.25)

॥गणावूचतुः॥ इत्युक्त्वा भागिनेयं स्वमभ्यषिंचन्नृपासने ॥ आबाल्याद्दीक्षितो यज्ञे ह्यपुत्रत्वमगाद्यतः

gaṇāvūcatuḥ ityuktvā bhāgineyaṁ svamabhyaṣiṁcannṛpāsane || ābālyāddīkṣito yajñe hyaputratvamagādyataḥ

दोनों गणों ने कहा - ऐसा कहकर उसने अपने भांजे को राजसिंहासन पर अभिषिक्त किया, क्योंकि बचपन से ही यज्ञ में दीक्षित होने के कारण वह निःसंतान रह गया था।

श्लोक 26 (skanda.2.124.26)

तस्मादद्याऽपि तद्देशे सदा राज्यांऽशभागिनः ॥ स्वस्रेया एव जायंते तत्कृतावधिवर्तिनः

tasmādadyā'pi taddeśe sadā rājyāṁśabhāginaḥ || svasreyā eva jāyaṁte tatkṛtāvadhivartinaḥ

इसलिए आज भी उस देश में राज्य के भागी सदा भांजे ही होते हैं, उसी परंपरा का पालन करते हुए जो उसने स्थापित की थी।

श्लोक 27 (skanda.2.124.27)

यज्ञवाटं ततोऽभ्येत्य यज्ञकुण्डाग्रतः स्थितः ॥ त्रिरुच्चैर्व्याजहाराऽऽशु विष्णुं संबोधयंस्तदा

yajñavāṭaṁ tato'bhyetya yajñakuṇḍāgrataḥ sthitaḥ || triruccairvyājahārā'āśu viṣṇuṁ saṁbodhayaṁstadā

तब वह यज्ञशाला में जाकर यज्ञ-कुंड के सामने खड़ा हुआ, और विष्णु को संबोधित करते हुए तीन बार ऊँचे स्वर से पुकारा -

श्लोक 28 (skanda.2.124.28)

विष्णो भक्तिं स्थिरां देहि मनोवाक्काय कर्मभिः ॥ इत्युक्त्वा सोऽपतद्वह्नौ सर्वेषामेव पश्यताम्

viṣṇo bhaktiṁ sthirāṁ dehi manovākkāya karmabhiḥ || ityuktvā so'patadvahnau sarveṣāmeva paśyatām

हे विष्णु! मुझे मन, वाणी, शरीर और कर्म से स्थिर भक्ति प्रदान करो - ऐसा कहकर वह सबके देखते-देखते अग्नि में गिर पड़ा।

श्लोक 29 (skanda.2.124.29)

मुद्गलस्तु तदा क्रोधाच्छिखामुत्पाटयत्स्वकाम् ॥ ततस्त्वद्यापि तद्गोत्रे मुद्गला विशिखा बभुः

mudgalastu tadā krodhācchikhāmutpāṭayatsvakām || tatastvadyāpi tadgotre mudgalā viśikhā babhuḥ

तब मुद्गल ने क्रोधवश अपनी शिखा उखाड़ फेंकी; इसीलिए आज भी उस गोत्र के मुद्गल शिखाहीन होते हैं।

श्लोक 30 (skanda.2.124.30)

तावदाविरभूद्विष्णुः कुण्डाग्नौ भक्तवत्सलः ॥ तमालिंग्य विमानाग्र्यं समारोहयदच्युतः

tāvadāvirabhūdviṣṇuḥ kuṇḍāgnau bhaktavatsalaḥ || tamāliṁgya vimānāgryaṁ samārohayadacyutaḥ

तभी भक्तवत्सल विष्णु उस यज्ञकुंड की अग्नि में प्रकट हुए, और उसे आलिंगन कर अच्युत ने उसे उत्तम विमान पर आरूढ़ कर लिया।

श्लोक 31 (skanda.2.124.31)

तमालिंग्याऽऽत्मसारूप्यं दत्त्वा वैकुण्ठमंदिरम् ॥ तेनैव सह देवेशो जगाम त्रिदशैर्वृतः

tamāliṁgyā'ātmasārūpyaṁ dattvā vaikuṇṭhamaṁdiram || tenaiva saha deveśo jagāma tridaśairvṛtaḥ

उसे आलिंगन कर और अपनी सरूपता प्रदान कर, देवेश विष्णु उसी के साथ, देवताओं से घिरे हुए, वैकुण्ठ-धाम को चले गए।

श्लोक 32 (skanda.2.124.32)

॥नारद उवाच॥ यो विष्णुदासः स तु पुण्यशीलो यश्चोलभूपः स सुशीलनामा ॥ एतावुभौ तत्समरूपभाजौ द्वाःस्थौ कृतौ तेन रमाप्रियेण

nārada uvāca yo viṣṇudāsaḥ sa tu puṇyaśīlo yaścolabhūpaḥ sa suśīlanāmā || etāvubhau tatsamarūpabhājau dvāḥsthau kṛtau tena ramāpriyeṇa

नारद ने कहा - जो विष्णुदास था, वह पुण्यशील नाम से, और जो चोल राजा था, वह सुशील नाम से - ये दोनों उस रमापति विष्णु के समान रूप धारण करने वाले द्वारपाल बनाए गए।

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