वैष्णव खण्ड · अध्याय 125
धर्मदत्त की मोक्ष-प्राप्ति
श्लोक 1 (skanda.2.125.1)
॥धर्मदत्त उवाच॥ जयश्च विजयश्चैव विष्णोर्द्वास्थौ श्रुतौ मया ॥ किं नु ताभ्यां पुरा चीर्णं तस्मात्तद्रूपधारिणौ
dharmadatta uvāca jayaśca vijayaścaiva viṣṇordvāsthau śrutau mayā || kiṁ nu tābhyāṁ purā cīrṇaṁ tasmāttadrūpadhāriṇau
धर्मदत्त ने कहा - मैंने सुना है कि जय और विजय विष्णु के द्वारपाल हैं। उन्होंने पूर्वकाल में ऐसा क्या किया था, जिसके कारण वे उस रूप को धारण करने वाले बने?
श्लोक 2 (skanda.2.125.2)
॥गणावूचतुः॥ तृणबिंदोस्तु कन्यायां देवहूत्यां पुरा द्विज ॥ कर्दमस्य तु दृष्ट्यैव पुत्रौ द्वौ संबभूवतुः
gaṇāvūcatuḥ tṛṇabindostu kanyāyāṁ devahūtyāṁ purā dvija || kardamasya tu dṛṣṭyaiva putrau dvau saṁbabhūvatuḥ
दोनों गणों ने कहा - हे द्विज! पूर्वकाल में तृणबिंदु की कन्या देवहूति में, कर्दम मुनि के दृष्टिपात मात्र से ही दो पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 3 (skanda.2.125.3)
ज्येष्ठो जयः कनिष्ठोऽभूद्विजयश्चैव नामतः ॥ तस्यामेवाऽभवत्पश्चात्कपिलो योगधर्मवित्
jyeṣṭho jayaḥ kaniṣṭho'bhūdvijayaścaiva nāmataḥ || tasyāmevā'bhavatpaścātkapilo yogadharmavit
बड़े का नाम जय और छोटे का नाम विजय था। उन्हीं देवहूति से बाद में योग-धर्म को जानने वाले कपिल भी उत्पन्न हुए।
श्लोक 4 (skanda.2.125.4)
जयश्च विजयश्चैव विष्णुभक्तिरतौ सदा ॥ तौ तन्निष्ठेन्द्रियग्रामौ धर्मशीलौ बभूवतुः
jayaśca vijayaścaiva viṣṇubhaktirataū sadā || tau tanniṣṭhendriyagrāmau dharmaśīlau babhūvatuḥ
जय और विजय दोनों सदा विष्णु-भक्ति में तत्पर, अपनी सभी इंद्रियों को उसी में लगाए हुए, धर्मशील बने रहे।
श्लोक 5 (skanda.2.125.5)
नित्यमष्टाक्षरीजाप्यौ विष्णुव्रतकरावुभौ ॥ साक्षात्कारं ददौ विष्णुस्तयोर्नित्यार्चने सदा
nityamaṣṭākṣarījāpyau viṣṇuvratakarāvubhau || sākṣātkāraṁ dadau viṣṇustayornityārcane sadā
दोनों नित्य अष्टाक्षर मंत्र का जप करते और विष्णु-व्रत का पालन करते थे; विष्णु ने उनकी नित्य पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें सदा साक्षात्कार दिया।
श्लोक 6 (skanda.2.125.6)
मरुत्तेन कदाचित्तावाहूतौ यज्ञकर्मणि ॥ जग्मतुर्यज्ञकुशलौ देवर्षिगणपूजितौ
maruttena kadācittāvāhūtau yajñakarmaṇi || jagmaturyajñakuśalau devarṣigaṇapūjitau
एक बार मरुत्त राजा ने उन दोनों को यज्ञ-कर्म के लिए बुलाया; यज्ञ-विधि में कुशल, देवर्षियों द्वारा पूजित वे दोनों वहाँ गए।
श्लोक 7 (skanda.2.125.7)
जयस्तत्राभवद्ब्रह्मायाजको विजयोऽभवत् ॥ ततो यज्ञविधिं कृत्स्नं परिपूर्णं च चक्रतुः
jayastatrābhavadbrahmāyājako vijayo'bhavat || tato yajñavidhiṁ kṛtsnaṁ paripūrṇaṁ ca cakratuḥ
वहाँ जय ब्रह्मा (मुख्य पुरोहित) बने और विजय याजक बने। तब उन दोनों ने संपूर्ण यज्ञ-विधि को पूर्ण किया।
श्लोक 8 (skanda.2.125.8)
मरुत्तोऽवभृथस्नातस्ताभ्यां वित्तं ददौ बहु ॥ तत्समादाय तौ वित्तं जग्मतुः स्वाश्रमं प्रति
marutto'vabhṛthasnātastābhyāṁ vittaṁ dadau bahu || tatsamādāya tau vittaṁ jagmatuḥ svāśramaṁ prati
अवभृथ-स्नान करने के बाद मरुत्त ने उन दोनों को प्रचुर धन दिया; वह धन लेकर वे दोनों अपने आश्रम को गए।
श्लोक 9 (skanda.2.125.9)
यजनाय पृथग्विष्णोस्तुष्ट्यर्थं तौ ततो मुनी ॥ तद्धनं विभजंतौ तु पस्पर्धाते परस्परम्
yajanāya pṛthagviṣṇostuṣṭyarthaṁ tau tato munī || taddhanaṁ vibhajaṁtau tu pasparddhāte parasparam
विष्णु को प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग यज्ञ करने के उद्देश्य से वे दोनों मुनि उस धन को बांटते हुए आपस में स्पर्धा करने लगे।
श्लोक 10 (skanda.2.125.10)
जयोऽब्रवीत्समो भागः क्रियतामिति तत्र सः ॥ विजयश्चाब्रवीन्नैतद्यल्लब्धं येन तस्य तत्
jayo'bravītsamo bhāgaḥ kriyatāmiti tatra saḥ || vijayaścābravīnnaitadyallabdhaṁ yena tasya tat
जय ने कहा - इसका बराबर बंटवारा किया जाए। किंतु विजय ने कहा - नहीं, जिसने जो प्राप्त किया है, वह उसी का है।
श्लोक 11 (skanda.2.125.11)
ततोऽशपज्जयः क्रोधाद्विजयं लुब्धमानसम् ॥ गृहीत्वा न ददास्येतत्तस्माद्ग्राहो भवेति तम्
tato'śapajjayaḥ krodhādvijayaṁ lubdhamānasam || gṛhītvā na dadāsyetattasmādgrāho bhaveti tam
तब जय ने क्रोधवश लोभी विजय को शाप दिया - तू इसे लेकर देना नहीं चाहता, इसलिए तू मगरमच्छ बन जा।
श्लोक 12 (skanda.2.125.12)
विजयस्तस्य तं शापं श्रुत्वा सोप्यशपच्च तम् ॥ मदभ्रांतोऽशपस्त्वं मां तस्मान्मातंगतां व्रज
vijayastasya taṁ śāpaṁ śrutvā sopyaśapacca tam || madabhrāṁto'śapastvaṁ māṁ tasmānmātaṁgatāṁ vraja
विजय ने उस शाप को सुनकर उसे भी शाप दिया - तूने मुझे मद में भ्रमित होकर शाप दिया है, इसलिए तू हाथी की योनि को प्राप्त हो।
श्लोक 13 (skanda.2.125.13)
तत्तदाचख्यतुर्विष्णुं दृष्ट्वा नित्यार्चने विभुम् ॥ शापयोश्च निवृत्तिं तौ ययाचाते रमापतिम्
tattadācakhyaturviṣṇuṁ dṛṣṭvā nityārcane vibhum || śāpayośca nivṛttiṁ tau yayācāte ramāpatim
तब उन दोनों ने अपनी नित्य पूजा में उस प्रभु विष्णु को देखकर उन्हें यह सब बताया, और रमापति से अपने-अपने शाप की निवृत्ति की याचना की।
श्लोक 14 (skanda.2.125.14)
॥जयविजयावूचतुः॥ भक्तावावां कथं देव ग्राहमातंगयोनिगौ ॥ भविष्यावः कृपासिंधो तच्छापो विनिवर्त्यताम्
jayavijayāvūcatuḥ bhaktāvāvāṁ kathaṁ deva grāhamātaṁgayonigau || bhaviṣyāvaḥ kṛpāsiṁdho tacchāpo vinivartyatām
जय और विजय दोनों ने कहा - हे देव! हम दोनों तुम्हारे भक्त हैं; हम मगरमच्छ और हाथी की योनि को कैसे प्राप्त होंगे? हे कृपासिंधु! उस शाप को हटा दीजिए।
श्लोक 15 (skanda.2.125.15)
॥श्रीभगवानुवाच॥ मद्भक्तयोर्वचोऽसत्यं न कदाचिद्भविष्यति ॥ मयाऽपि नान्यथा कर्तुं शक्यते तत्कदाचन
śrībhagavānuvāca madbhaktayorvaco'satyaṁ na kadācidbhaviṣyati || mayā'pi nānyathā kartuṁ śakyate tatkadācana
भगवान ने कहा - मेरे भक्तों का वचन कभी असत्य नहीं होगा; मैं भी इसे किसी भी प्रकार से अन्यथा नहीं कर सकता।
श्लोक 16 (skanda.2.125.16)
प्रह्लादवचसा स्तंभेऽप्याविर्भूतो ह्यहं पुरा ॥ तथांऽबरीषवाक्येन जातो गर्भे स्वयं किल
prahlādavacasā staṁbhe'pyāvirbhūto hyahaṁ purā || tathāṁbarīṣavākyena jāto garbhe svayaṁ kila
प्रह्लाद के वचन के कारण ही मैं पूर्वकाल में स्तंभ में प्रकट हुआ था; और अंबरीष के वचन से मैं स्वयं ही उसके गर्भ में जन्मा।
श्लोक 17 (skanda.2.125.17)
तस्माद्युवामिमौ शापावनुऽभूय स्वयंकृतौ ॥ लभेथां मत्पदं नित्यमित्युक्त्वांऽतर्दधे हरिः
tasmādyuvāmimau śāpāvanubhūya svayaṁkṛtau || labhethāṁ matpadaṁ nityamityuktvāṁtardadhe hariḥ
इसलिए तुम दोनों अपने ही किए हुए इन शापों को भोगकर मेरे नित्य पद को प्राप्त करोगे - ऐसा कहकर हरि अंतर्धान हो गए।
श्लोक 18 (skanda.2.125.18)
॥गणावूचतुः॥ ततस्तौ ग्राहमातंगावभूतां गंडकीतटे ॥ जातिस्मरौ तु तद्योन्यामपि विष्णुव्रते स्थितौ
gaṇāvūcatuḥ tatastau grāhamātaṁgāvabhūtāṁ gaṁḍakītaṭe || jātismarau tu tadyonyāmapi viṣṇuvrate sthitau
दोनों गणों ने कहा - तब वे दोनों गंडकी नदी के तट पर मगरमच्छ और हाथी बने; उस योनि में भी वे जातिस्मर रहते हुए विष्णु-व्रत में स्थित रहे।
श्लोक 19 (skanda.2.125.19)
कदाचित्स गजः स्नातुं कार्तिके गंडकीं गतः ॥ तावज्जग्राह तं ग्राहः संस्मरञ्च्छापकारणम्
kadācitsa gajaḥ snātuṁ kārtike gaṁḍakīṁ gataḥ || tāvajjagrāha taṁ grāhaḥ saṁsmarañcchāpakāraṇam
एक बार वह हाथी कार्तिक मास में स्नान करने गंडकी नदी में गया; तभी शाप के कारण को स्मरण करते हुए उस मगरमच्छ ने उसे पकड़ लिया।
श्लोक 20 (skanda.2.125.20)
ग्राहग्रस्तो ह्यसौ नागः सस्मार श्रीपतिं तदा ॥ तावदाविरभूद्विष्णुश्चक्रशंखगदाधरः
grāhagrasto hyasau nāgaḥ sasmāra śrīpatiṁ tadā || tāvadāvirabhūdviṣṇuścakraśaṁkhagadādharaḥ
मगरमच्छ द्वारा ग्रसित उस गजराज ने तब श्रीपति विष्णु का स्मरण किया; तभी चक्र, शंख और गदा धारण किए हुए विष्णु प्रकट हुए।
श्लोक 21 (skanda.2.125.21)
ततस्तौ ग्राहमातंगौ चक्रं क्षिप्त्वा समुद्धृतौ ॥ दत्त्वैव निजसारूप्यं वैकुण्ठमनयद्विभुः
tatastau grāhamātaṁgau cakraṁ kṣiptvā samuddhṛtau || dattvaiva nijasārūpyaṁ vaikuṇṭhamanayadvibhuḥ
तब उस चक्र को चलाकर विष्णु ने उस मगरमच्छ और हाथी दोनों का उद्धार किया, और अपनी सरूपता प्रदान कर उन्हें वैकुण्ठ को ले गए।
श्लोक 22 (skanda.2.125.22)
ततःप्रभृति तत्स्थानं हरिक्षेत्रमितिस्मृतम् ॥ चक्रसंघर्षणाद्यस्मिन्ग्रावाणोऽपि हि लांछिताः
tataḥprabhṛti tatsthānaṁ harikṣetramitismṛtam || cakrasaṁgharṣaṇādyasmingrāvāṇo'pi hi lāṁchitāḥ
उसी समय से वह स्थान हरिक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जहाँ चक्र के घर्षण से पत्थर भी चिह्नित हो गए।
श्लोक 23 (skanda.2.125.23)
तावुभौ विश्रुतौ लोके जयश्च विजयस्तथा ॥ नित्यं विष्णुप्रियौ द्वाःस्थौ पृष्टौ यौ हि त्वया द्विज
tāvubhau viśrutau loke jayaśca vijayastathā || nityaṁ viṣṇupriyau dvāḥsthau pṛṣṭau yau hi tvayā dvija
वे ही दोनों जय और विजय के नाम से लोक में प्रसिद्ध हुए, विष्णु के सदा प्रिय द्वारपाल, जिनके विषय में तुमने पूछा था, हे द्विज!
श्लोक 24 (skanda.2.125.24)
अतस्त्वमपि धर्मज्ञ नित्यं विष्णुव्रते स्थितः ॥ त्यक्तमात्सर्यदंभोऽपि भवस्व समदर्शनः
atastvamapi dharmajña nityaṁ viṣṇuvrate sthitaḥ || tyaktamātsaryadaṁbho'pi bhavasva samadarśanaḥ
इसलिए हे धर्मज्ञ! तुम भी सदा विष्णु-व्रत में स्थित रहो, मात्सर्य और दंभ को त्यागकर समदर्शी बनो।
श्लोक 25 (skanda.2.125.25)
तुलामकरमेषेषु प्रातःस्नायी सदा भव ॥ एकादशीव्रते तिष्ठ तुलसीवनपालकः
tulāmakarameṣeṣu prātaḥsnāyī sadā bhava || ekādaśīvrate tiṣṭha tulasīvanapālakaḥ
तुला, मकर और मेष राशियों में सूर्य के होने पर सदा प्रातःकाल स्नान करने वाले बनो; एकादशी-व्रत में स्थित रहो और तुलसी-वन के रक्षक बनो।
श्लोक 26 (skanda.2.125.26)
ब्राह्मणानथ गाश्चाऽपि वैष्णवांश्च सदा भज ॥ मसूरिकामारनालं वृंताकान्यपि खाद मा
brāhmaṇānatha gāścā'pi vaiṣṇavāṁśca sadā bhaja || masūrikāmāranālaṁ vṛṁtākānyapi khāda mā
ब्राह्मणों, गायों और वैष्णवों की सदा सेवा करो; मसूर की दाल, कमल-नाल और बैंगन कभी मत खाओ।
श्लोक 27 (skanda.2.125.27)
एवं त्वमपि देहांते तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ प्राप्नोषि धर्मदत्त त्वं तद्भक्त्यैव यथा वयम्
evaṁ tvamapi dehāṁte tadviṣṇoḥ paramaṁ padam || prāpnoṣi dharmadatta tvaṁ tadbhaktyaiva yathā vayam
इस प्रकार, हे धर्मदत्त! तुम भी देहांत के बाद, उसी भक्ति के द्वारा जैसे हम, विष्णु के परम पद को प्राप्त करोगे।
श्लोक 28 (skanda.2.125.28)
तावज्जन्म व्रतादस्माद्विष्णुसंतुष्टिकारकात् ॥ न यज्ञा न च दानानि न तीर्थान्यधिकानि वै
tāvajjanma vratādasmādviṣṇusaṁtuṣṭikārakāt || na yajñā na ca dānāni na tīrthānyadhikāni vai
इस विष्णु को संतुष्ट करने वाले व्रत से बढ़कर न यज्ञ हैं, न दान हैं, न ही कोई अन्य तीर्थ हैं।
श्लोक 29 (skanda.2.125.29)
धन्योऽसि विप्राग्र्य यतस्त्वयैतद्व्रतं कृतं तुष्टिकरं जगद्गुरोः ॥ यदर्धभागाऽऽप्तफला मुरारेः प्रणीयतेऽस्माभिरियं सलोकताम्
dhanyo'si viprāgrya yatastvayaitadvrataṁ kṛtaṁ tuṣṭikaraṁ jagadguroḥ || yadardhabhāgā'āptaphalā murāreḥ praṇīyate'smābhiriyaṁ salokatām
हे श्रेष्ठ विप्र! तुम धन्य हो, क्योंकि तुमने जगद्गुरु को संतुष्ट करने वाला यह व्रत किया है, जिसके आधे भाग से फल प्राप्त कर यह स्त्री मुरारि की उसी लोकता को प्राप्त हो रही है, जहाँ हम इसे ले जा रहे हैं।
श्लोक 30 (skanda.2.125.30)
॥नारद उवाच॥ इत्थं तौ धर्मदत्तं तमुपदिश्य विमानगौ ॥ तया कलहया सार्द्धं वैकुण्ठभवनं गतौ
nārada uvāca itthaṁ tau dharmadattaṁ tamupadiśya vimānagau || tayā kalahayā sārddhaṁ vaikuṇṭhabhavanaṁ gatau
नारद ने कहा - इस प्रकार उन दोनों विमानगामियों ने धर्मदत्त को उपदेश देकर, कलहा के साथ वैकुण्ठ-भवन की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 31 (skanda.2.125.31)
धर्मदत्तो ह्यसौ जातप्रत्ययस्तद्व्रते स्थितः ॥ देहांऽते तद्विभोः स्थानं भार्याभ्यां संयुतोऽभ्ययात्
dharmadatto hyasau jātapratyayastadvrate sthitaḥ || dehāṁte tadvibhoḥ sthānaṁ bhāryābhyāṁ saṁyuto'bhyayāt
वह धर्मदत्त, इस प्रकार श्रद्धावान होकर उसी व्रत में स्थित रहा; देहांत के बाद वह अपनी दोनों पत्नियों सहित उस प्रभु के धाम को गया।
श्लोक 32 (skanda.2.125.32)
इतिहासमिमं पुराभवं शृणुते श्रावयते च यः पुमान् ॥ हरिसन्निधिकारणीं मतिं लभतेऽसौ कृपया जगद्गुरोः
itihāsamimaṁ purābhavaṁ śṛṇute śrāvayate ca yaḥ pumān || harisannidhikāraṇīṁ matiṁ labhate'sau kṛpayā jagadguroḥ
जो पुरुष इस पूर्वकालिक इतिहास को सुनता है या सुनाता है, वह जगद्गुरु की कृपा से हरि के सान्निध्य को प्राप्त कराने वाली बुद्धि को प्राप्त करता है।