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वैष्णव खण्ड · अध्याय 126

धनेश्वर की यक्ष-जन्म-प्राप्ति

अध्याय 125अध्याय-सूचीअध्याय 127

श्लोक 1 (skanda.2.126.1)

॥श्रीकृष्ण उवाच॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा पृथुर्विस्मितमानसः ॥ संपूज्य नारदं सम्यग्विससर्ज तदा प्रिये

śrīkṛṣṇa uvāca iti tadvacanaṁ śrutvā pṛthurvismitamānasaḥ || saṁpūjya nāradaṁ samyagvisasarja tadā priye

श्रीकृष्ण ने कहा - हे प्रिये! यह वचन सुनकर पृथु आश्चर्यचकित हो गया, और नारद की भलीभाँति पूजा कर उन्हें विदा किया।

श्लोक 2 (skanda.2.126.2)

पुराऽवंतीपुरे कश्चिद्विप्र आसीद्धनेश्वरः ॥ ब्रह्मकर्मपरिभ्रष्टः पापकर्मा सुदुर्मतिः

purā'vantīpure kaściddvipra āsīddhaneśvaraḥ || brahmakarmaparibhraṣṭaḥ pāpakarmā sudurmatiḥ

पूर्वकाल में अवंतीपुरी में धनेश्वर नाम का एक विप्र था, जो ब्राह्मण-कर्म से भ्रष्ट, पापकर्मी और अत्यंत दुर्बुद्धि था।

श्लोक 3 (skanda.2.126.3)

देशाद्देशातरं गच्छन्क्रयविक्रयकारणात् ॥ माहिष्मतीपुरीमागात्कदाचित्स धनेश्वरः

deśāddeśātaraṁ gacchankrayavikrayakāraṇāt || māhiṣmatīpurīmāgātkadācitsa dhaneśvaraḥ

वह क्रय-विक्रय के लिए देश-देशांतर घूमता रहता था; एक बार वह धनेश्वर माहिष्मती नगरी आया।

श्लोक 4 (skanda.2.126.4)

महिषेण कृता पूर्वं तस्मान्माहिष्मतीति सा ॥ यस्या वप्रगता भाति नर्मदा पापनाशिनी

mahiṣeṇa kṛtā pūrvaṁ tasmānmāhiṣmatīti sā || yasyā vapragatā bhāti narmadā pāpanāśinī

पूर्वकाल में महिष द्वारा बसाई गई होने के कारण वह माहिष्मती कहलाई, जिसके परकोटे के पास पाप-नाशिनी नर्मदा शोभित होती है।

श्लोक 5 (skanda.2.126.5)

कार्तिकव्रतिनस्तत्र नानादेशाऽऽगतान्नरान् ॥ स दृष्ट्वा विक्रयं कुर्वन्मासमेकमुवास सः

kārtikavratinastatra nānādeśā'āgatānnarān || sa dṛṣṭvā vikrayaṁ kurvanmāsamekamuvāsa saḥ

वहाँ नाना देशों से आए कार्तिक-व्रतियों को देखकर, वह व्यापार करते हुए एक मास तक रहा।

श्लोक 6 (skanda.2.126.6)

स नित्यं नर्मदातीरे भ्रमन्विक्रयकारणात् ॥ ददर्श ब्राह्मणान्स्नानजपदेवार्चने स्थितान्

sa nityaṁ narmadātīre bhramanvikrayakāraṇāt || dadarśa brāhmaṇānsnānajapadevārcane sthitān

वह नित्य व्यापार के लिए नर्मदा-तट पर घूमते हुए, स्नान, जप और देवार्चन में लगे हुए ब्राह्मणों को देखता था।

श्लोक 7 (skanda.2.126.7)

कांश्चित्पुराणं पठतः कांश्चिच्च श्रवणे रतान् ॥ नृत्यगायनवादित्रविष्णुश्रवणतत्परान्

kāṁścitpurāṇaṁ paṭhataḥ kāṁścicca śravaṇe ratān || nṛtyagāyanavāditraviṣṇuśravaṇatatparān

कुछ को पुराण पढ़ते हुए, कुछ को श्रवण में लीन, नृत्य-गायन-वादन में और विष्णु-कथा-श्रवण में तत्पर देखा।

श्लोक 8 (skanda.2.126.8)

उद्यापनविधौ सक्तान्कांश्चिज्जागरणे रतान् ॥ विप्रगोपूजनरतान्दीपदानरतांस्तथा

udyāpanavidhau saktānkāṁścijjāgaraṇe ratān || vipragopūjanaratāndīpadānaratāṁstathā

कुछ को उद्यापन-विधि में लगे, कुछ को जागरण में तत्पर, ब्राह्मणों और गायों की पूजा में लगे तथा दीप-दान में रत देखा।

श्लोक 9 (skanda.2.126.9)

ददर्श कौतुकाविष्टस्तत्रतत्र धनेश्वरः ॥ नित्यं परिभ्रमंस्तत्र दर्शनस्पर्शभाषणात्

dadarśa kautukāviṣṭastatratatra dhaneśvaraḥ || nityaṁ paribhramaṁstatra darśanasparśabhāṣaṇāt

कौतूहल से भरा हुआ धनेश्वर वहाँ-वहाँ यह सब देखता रहा; नित्य वहाँ घूमते हुए उसे दर्शन, स्पर्श और वार्तालाप से -

श्लोक 10 (skanda.2.126.10)

वैष्णवानां तथा विष्णोर्नामश्रावादि सोऽलभत् ॥ एवं मासं स्थितस्तस्या नर्मदायास्तटे द्विजः

vaiṣṇavānāṁ tathā viṣṇornāmaśrāvādi so'labhat || evaṁ māsaṁ sthitastasyā narmadāyāstaṭe dvijaḥ

वैष्णवों का संग और विष्णु के नाम-श्रवण आदि प्राप्त किया। इस प्रकार वह द्विज एक मास तक नर्मदा के तट पर रहा।

श्लोक 11 (skanda.2.126.11)

तावत्कृष्णाऽहिना दष्टो विह्वलः स पपात ह ॥ अथ देहपरित्यक्तं तं वद्ध्वा यमकिंकराः

tāvatkṛṣṇā'hinā daṣṭo vihvalaḥ sa papāta ha || atha dehaparityaktaṁ taṁ vaddhvā yamakiṁkarāḥ

तभी एक काले सर्प ने उसे डस लिया, और वह व्याकुल होकर गिर पड़ा। तब यमदूतों ने उसके शरीर से निकले हुए उस जीव को बांधकर -

श्लोक 12 (skanda.2.126.12)

यमाज्ञया कुंभिपाके चिक्षिपुस्तं धनेश्वरम् ॥ यावत्क्षिप्तश्च तत्रासौ तावच्छीतलतां ययौ

yamājñayā kuṁbhipāke cikṣipustaṁ dhaneśvaram || yāvatkṣiptaśca tatrāsau tāvacchītalatāṁ yayau

यम की आज्ञा से उस धनेश्वर को कुंभीपाक नरक में डाल दिया। किंतु ज्यों ही उसे वहाँ डाला गया, त्यों ही वह अग्नि शीतल हो गई -

श्लोक 13 (skanda.2.126.13)

कुंभीपाको यथा वह्निः प्रह्लादक्षेपणात्पुरा ॥ यमस्तु कौतुकं दृष्ट्वा पप्रच्छानीय तं ततः

kuṁbhīpāko yathā vahniḥ prahlādakṣepaṇātpurā || yamastu kautukaṁ dṛṣṭvā papracchānīya taṁ tataḥ

जैसे पूर्वकाल में प्रह्लाद के डाले जाने पर कुंभीपाक की अग्नि शीतल हो गई थी। यह अद्भुत बात देखकर यम ने उसे बुलाकर पूछा -

श्लोक 14 (skanda.2.126.14)

तावदभ्यागतस्तत्र नारदः प्राह सत्वरम् ॥ ॥नारद उवाच॥ नैवाऽयं निरयान्भोक्तुमर्हो ह्यरुणनंदन

tāvadabhyāgatastatra nāradaḥ prāha satvaram || nārada uvāca naivā'yaṁ nirayānbhoktumarho hyaruṇanaṁdana

तभी वहाँ नारद आ पहुँचे और तुरंत बोले। नारद ने कहा - हे अरुणनंदन (यम)! यह नरक भोगने योग्य नहीं है।

श्लोक 15 (skanda.2.126.15)

यस्मादंतेऽस्य संजातं कर्म यन्निरयापहम् ॥ यः पुण्यकर्मिणां कुर्याद्दर्शनस्पर्शभाषणम्

yasmādaṁte'sya saṁjātaṁ karma yannirayāpaham || yaḥ puṇyakarmiṇāṁ kuryāddarśanasparśabhāṣaṇam

क्योंकि उसके अंतिम समय में उसने ऐसा कर्म किया जो नरक को दूर करने वाला है। जो व्यक्ति पुण्यकर्मियों का दर्शन, स्पर्श और वार्तालाप करता है -

श्लोक 16 (skanda.2.126.16)

ततः षडंशमाप्नोति पुण्यस्य नियतं नरः ॥ सख्यं तु तैस्तु संसर्गं कृतवान्वै धनेश्वरः

tataḥ ṣaḍaṁśamāpnoti puṇyasya niyataṁ naraḥ || sakhyaṁ tu taistu saṁsargaṁ kṛtavānvai dhaneśvaraḥ

वह निश्चय ही उनके पुण्य का छठा भाग प्राप्त करता है। और धनेश्वर ने तो उनके साथ मित्रता और संसर्ग भी किया था -

श्लोक 17 (skanda.2.126.17)

कार्तिकव्रतिभिर्मासं तेषां पुण्यांशभागयम् ॥ तस्मादकामपुण्यो हि यक्षयोनिस्थितो ह्ययम् ॥ विलोक्य निरयान्सर्वान्पापभोगप्रदर्शकान्

kārtikavratibhirmāsaṁ teṣāṁ puṇyāṁśabhāgayam || tasmādakāmapuṇyo hi yakṣayoniṣthito hyayam || vilokya nirayānsarvānpāpabhogapradarśakān

कार्तिक-व्रतियों के साथ एक मास तक रहकर वह उनके पुण्य का भागी बना है। इसलिए, अनिच्छापूर्वक ही पुण्य पाकर, यह सभी पाप-फल दिखाने वाले नरकों को देखकर, यक्ष-योनि में स्थित होगा।

श्लोक 18 (skanda.2.126.18)

॥श्रीकृष्ण उवाच॥ इत्युक्त्वा गतवति नारदे स सौरिस्तद्वाक्यश्रवणविबुद्धतत्सुकर्मा ॥ तं विप्रं पुनरनयत्स्वकिंकरेण तान्सर्वान्निरयगणान्प्रदर्शयिष्यन्

śrīkṛṣṇa uvāca ityuktvā gatavati nārade sa sauristadvākyaśravaṇavibuddhatatsukarmā || taṁ vipraṁ punaranayatsvakiṁkareṇa tānsarvānnirayagaṇānpradarśayiṣyan

श्रीकृष्ण ने कहा - ऐसा कहकर नारद के चले जाने पर, उनके वचन सुनकर अपने पुण्य-कर्म को समझने वाले सूर्य-पुत्र यम ने उस विप्र को अपने किंकर के द्वारा फिर से भेजा, ताकि उसे सभी नरकों को दिखाया जा सके।

श्लोक 19 (skanda.2.126.19)

ततो धनेश्वरं नीत्वा निरयान्प्रेतपोऽब्रवीत् ॥ दर्शयिष्यंस्तु तान्सर्वान्यमानुज्ञाकरस्तदा

tato dhaneśvaraṁ nītvā nirayānpretapo'bravīt || darśayiṣyaṁstu tānsarvānyamānujñākarastadā

तब यम की आज्ञा का पालन करने वाला प्रेत-रक्षक धनेश्वर को नरकों में ले जाकर, उन सभी को दिखाते हुए बोला -

श्लोक 20 (skanda.2.126.20)

॥प्रेतप उवाच॥ पश्येमान्निरयान्घोरान्धनेश्वर महाभयान् ॥ एषु पापकरा नित्यं पच्यंते यमकिंकरैः

pretapa uvāca paśyemānnirayānghorāndhaneśvara mahābhayān || eṣu pāpakarā nityaṁ pacyaṁte yamakiṁkaraiḥ

प्रेत-रक्षक ने कहा - हे धनेश्वर! इन भयंकर, महाभयकारी नरकों को देखो; इनमें पापकर्मी नित्य यमदूतों द्वारा पकाए जाते हैं।

श्लोक 21 (skanda.2.126.21)

अकामात्पातकं शुष्कं कामादार्द्रमुदाहृतम् ॥ आर्द्रशुष्कादिभिः पापैर्द्विप्रकारानवस्थितान्

akāmātpātakaṁ śuṣkaṁ kāmādārdramudāhṛtam || ārdraśuṣkādibhiḥ pāpairdviprakārānavasthitān

बिना इच्छा के किया गया पाप शुष्क कहलाता है, इच्छापूर्वक किया गया पाप आर्द्र कहलाता है। इन आर्द्र-शुष्क आदि पापों के द्वारा नरक दो प्रकार के होते हैं -

श्लोक 22 (skanda.2.126.22)

चतुराशीतिसंख्याकैः पृथग्भेदैरवस्थितान् ॥ यत्प्रकीर्णमपांक्तेयं मलिनीकरणं तथा

caturāśītisaṁkhyākaiḥ pṛthagbhedairavasthitān || yatprakīrṇamapāṁkteyaṁ malinīkaraṇaṁ tathā

और चौरासी अलग-अलग भेदों में स्थित हैं। जो पाप फैले हुए, पंक्तिबाह्य करने वाले और मलिन करने वाले हैं -

श्लोक 23 (skanda.2.126.23)

जातिभ्रंशकरं तद्वदुपपातकसंज्ञकम् ॥ अतिपापं महापापं सप्तधा पातकं स्मृतम्

jātibhraṁśakaraṁ tadvadupapātakasaṁjñakam || atipāpaṁ mahāpāpaṁ saptadhā pātakaṁ smṛtam

तथा जो जाति से भ्रष्ट करने वाला है - ये उपपातक कहलाते हैं। अतिपाप, महापाप - इस प्रकार पातक सात प्रकार के माने गए हैं।

श्लोक 24 (skanda.2.126.24)

एभिः सप्तसु पच्यंते निरयेषु यथाक्रमम् ॥ कार्तिकव्रतिभिर्यस्मात्संसर्गो ह्यभवत्तव

ebhiḥ saptasu pacyaṁte nirayeṣu yathākramam || kārtikavratibhiryasmātsaṁsargo hyabhavattava

इन्हीं सातों के अनुसार क्रमशः विभिन्न नरकों में जीव पकाए जाते हैं। किंतु चूँकि तुम्हारा कार्तिक-व्रतियों के साथ संसर्ग हुआ था -

श्लोक 25 (skanda.2.126.25)

तत्पुण्योपचयादेते निर्हृता निरयाः खलु ॥ ॥श्रीकृष्ण उवाच॥ दर्शयित्वेति निरयान्प्रेतपस्तमथाहरत्

tatpuṇyopacayādete nirhṛtā nirayāḥ khalu || śrīkṛṣṇa uvāca darśayitveti nirayānpretapastamathāharat

उस पुण्य के संचय से ये नरक तुम्हारे लिए दूर कर दिए गए हैं।" श्रीकृष्ण ने कहा - इस प्रकार नरकों को दिखाकर प्रेत-रक्षक उसे वहाँ से ले गया,

श्लोक 26 (skanda.2.126.26)

धनेश्वरं यक्षलोकं यक्षश्चाऽभूत्स तत्र हि ॥ धनदस्याऽनुगः सोऽयं धनयक्षेति विश्रुतः

dhaneśvaraṁ yakṣalokaṁ yakṣaścā'bhūtsa tatra hi || dhanadasyā'nugaḥ so'yaṁ dhanayakṣeti viśrutaḥ

धनेश्वर को यक्ष-लोक में; और वहाँ वह यक्ष बन गया। धनद (कुबेर) का अनुचर बना यह "धनयक्ष" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 27 (skanda.2.126.27)

॥सूत उवाच॥ इत्युक्त्वा वासुदेवोऽसौ सत्यभामामतिप्रियम् ॥ सायंसंध्याविधिं कर्तुं जगाम जननीगृहम्

sūta uvāca ityuktvā vāsudevo'sau satyabhāmāmatipriyam || sāyaṁsaṁdhyāvidhiṁ kartuṁ jagāma jananīgṛham

सूत ने कहा - ऐसा कहकर वासुदेव अपनी अत्यंत प्रिय सत्यभामा को छोड़कर, सायं-संध्या का विधान करने के लिए अपनी माता के घर गए।

श्लोक 28 (skanda.2.126.28)

॥ब्रह्मोवाच॥ एवंप्रभावः खलु कार्तिकोऽयं मुक्तिप्रदो भुक्तिकरश्च यस्मात् ॥ प्रयांत्यनेकाऽर्जितपातकानि व्रतस्य संदर्शयतोऽपि मुक्तिम्

brahmovāca evaṁprabhāvaḥ khalu kārtiko'yaṁ muktiprado bhuktikaraśca yasmāt || prayāṁtyanekā'rjitapātakāni vratasya saṁdarśayato'pi muktim

ब्रह्मा ने कहा - इस प्रकार यह कार्तिक मास ऐसा प्रभावशाली है कि यह मुक्ति और भोग दोनों प्रदान करने वाला है, क्योंकि इसके व्रत का केवल दर्शन मात्र करने वाले के भी अनेक अर्जित पाप नष्ट हो जाते हैं, और वह मुक्ति को प्राप्त करता है।

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