वैष्णव खण्ड · अध्याय 99
कार्तिकव्रतधर्मनिरूपणम्
श्लोक 1 (skanda.2.99.1)
ब्रह्मोवाच । अथ कार्तिकमासस्य धर्मान्वक्ष्यामि नारद । संप्राप्तं कार्तिकं दृष्ट्वा परान्नं यस्तु वर्जयेत्
brahmovāca atha kārtikamāsasya dharmānvakṣyāmi nārada saṁprāptaṁ kārtikaṁ dṛṣṭvā parānnaṁ yastu varjayet
ब्रह्माजी ने कहा — अब, हे नारद, मैं कार्तिक मास के धर्मों का वर्णन करूँगा। जो कार्तिक के आगमन को देखकर पराया अन्न त्याग देता है,
श्लोक 2 (skanda.2.99.2)
स तु मोक्षमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा । सर्वेषामेव धर्माणां गुरुपूजा परा मता । गुरुशुश्रूषया सर्वं प्राप्नोति ऋषिसत्तम
sa tu mokṣamavāpnoti nātra kāryā vicāraṇā sarveṣāmeva dharmāṇāṁ gurupūjā parā matā guruśuśrūṣayā sarvaṁ prāpnoti ṛṣisattama
वह निःसंदेह मोक्ष प्राप्त करता है, इसमें कोई विचार नहीं। सम्पूर्ण धर्मों में गुरु-पूजा को सर्वश्रेष्ठ माना गया है; हे ऋषिसत्तम, गुरु-सेवा से मनुष्य सब कुछ प्राप्त करता है।
श्लोक 3 (skanda.2.99.3)
गुरौ तुष्टे च तुष्टाः स्युर्देवाः सर्वे सवासवा । गुरौ रुष्टे च रुष्टाः स्युर्देवाः सर्वे सवासवाः
gurau tuṣṭe ca tuṣṭāḥ syurdevāḥ sarve savāsavā gurau ruṣṭe ca ruṣṭāḥ syurdevāḥ sarve savāsavāḥ
गुरु के प्रसन्न होने पर इन्द्र सहित सभी देवता प्रसन्न होते हैं; गुरु के रुष्ट होने पर इन्द्र सहित सभी देवता रुष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.2.99.4)
कार्तिकं मासि संप्राप्ते कृत्वा कर्माणि भूरिशः । अकृत्वा गुरुशुश्रूषां नरकानेव विंदति
kārtikaṁ māsi saṁprāpte kṛtvā karmāṇi bhūriśaḥ akṛtvā guruśuśrūṣāṁ narakāneva viṁdati
कार्तिक मास आने पर बहुत से कर्म करके भी, यदि गुरु की सेवा न की जाए, तो मनुष्य नरकों को ही प्राप्त होता है।
श्लोक 5 (skanda.2.99.5)
यत्किंचिद्वा समादिष्टो गुरुणा तत्समाचरेत् । आज्ञप्तो गुरुणा विप्र न तद्वाक्यं तु लंघयेत् । यदि दुःखादिकं प्राप्तं गुरुं तु शरणं व्रजेत्
yatkiṁcidvā samādiṣṭo guruṇā tatsamācaret ājñapto guruṇā vipra na tadvākyaṁ tu laṁghayet yadi duḥkhādikaṁ prāptaṁ guruṁ tu śaraṇaṁ vrajet
गुरु जो भी आज्ञा दें, वही करना चाहिए; हे विप्र, गुरु की आज्ञा को कभी नहीं टालना चाहिए; यदि दुःख आदि प्राप्त हो, तो गुरु की ही शरण में जाना चाहिए।
श्लोक 6 (skanda.2.99.6)
मातृत्वे च पितृत्वे च गुरुमेव स्मरेद्बुधः । गुरौ न प्राप्यते यत्तन्नान्यत्राऽपि हि लभ्यते
mātṛtve ca pitṛtve ca gurumeva smaredbudhaḥ gurau na prāpyate yattannānyatrā'pi hi labhyate
बुद्धिमान् पुरुष गुरु को ही माता और पिता के समान समझे; गुरु से जो प्राप्त नहीं होता, वह अन्यत्र भी प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 7 (skanda.2.99.7)
गुरुप्रसादात्सर्वं तु प्राप्नोत्येव न संशयः । मेधावी कपिलश्चैव सुमतिश्च महातपाः । गौतमस्य गुरोः सम्यक्सेवयाऽमरतां गताः
guruprasādātsarvaṁ tu prāpnotyeva na saṁśayaḥ medhāvī kapilaścaiva sumatiśca mahātapāḥ gautamasya guroḥ samyaksevayā'maratāṁ gatāḥ
गुरु के प्रसाद से निःसंदेह सब कुछ प्राप्त होता है। महातपस्वी मेधावी, कपिल और सुमति ने अपने गुरु गौतम की भलीभाँति सेवा करके अमरत्व प्राप्त किया।
श्लोक 8 (skanda.2.99.8)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कार्तिके विष्णुतत्परः । गुरुसेवां प्रकुर्वीत ततो मोक्षमवाप्नुयात्
tasmātsarvaprayatnena kārtike viṣṇutatparaḥ gurusevāṁ prakurvīta tato mokṣamavāpnuyāt
इसलिए कार्तिक मास में विष्णु-भक्ति में तत्पर पुरुष को सम्पूर्ण प्रयत्न से गुरु-सेवा करनी चाहिए, तभी वह मोक्ष प्राप्त करता है।
श्लोक 9 (skanda.2.99.9)
नरेभ्यो वैष्णवं धर्मं यो ददाति द्विजोत्तमः । ससागरमहीदाने तत्पुण्यं लभते हि सः
narebhyo vaiṣṇavaṁ dharmaṁ yo dadāti dvijottamaḥ sasāgaramahīdāne tatpuṇyaṁ labhate hi saḥ
जो श्रेष्ठ ब्राह्मण मनुष्यों को वैष्णव धर्म का उपदेश देता है, वह सागर सहित सम्पूर्ण पृथ्वी के दान का पुण्य प्राप्त करता है।
श्लोक 10 (skanda.2.99.10)
तिलधेनुं हिरण्यं च रजतं भूमिवाससी । गोप्रदानानि दास्यंति सर्वभावेन सुव्रत
tiladhenuṁ hiraṇyaṁ ca rajataṁ bhūmivāsasī gopradānāni dāsyaṁti sarvabhāvena suvrata
हे सुव्रत, तिलधेनु, स्वर्ण, चाँदी, भूमि, वस्त्र तथा गोदान — ये सब पूर्ण भाव से दिए जाते हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.99.11)
सर्वेषामेव दानानां कन्यादानं विशिष्यते । सहस्रमेव धेनूनां शतं चानडुहां समम्
sarveṣāmeva dānānāṁ kanyādānaṁ viśiṣyate sahasrameva dhenūnāṁ śataṁ cānaḍuhāṁ samam
सम्पूर्ण दानों में कन्यादान विशिष्ट माना गया है; यह एक सहस्र गायों अथवा सौ बैलों के दान के समान है।
श्लोक 12 (skanda.2.99.12)
दशानडुत्समं यानं दशयानसमो हयः । हयदान सहस्रेभ्यो गजदानं विशिष्यते
daśānaḍutsamaṁ yānaṁ daśayānasamo hayaḥ hayadāna sahasrebhyo gajadānaṁ viśiṣyate
दस बैलों के समान एक रथ है, दस रथों के समान एक घोड़ा है; सहस्र घोड़ों के दान से भी हाथी का दान बढ़कर है।
श्लोक 13 (skanda.2.99.13)
गजदानसहस्राणां स्वर्णदानं च तत्समम् । स्वर्णदानसहस्राणां विद्यादानं च तत्समम्
gajadānasahasrāṇāṁ svarṇadānaṁ ca tatsamam svarṇadānasahasrāṇāṁ vidyādānaṁ ca tatsamam
सहस्र हाथियों के दान के समान स्वर्ण का दान है; सहस्र स्वर्ण-दान के समान विद्या का दान है।
श्लोक 14 (skanda.2.99.14)
विद्यादानात्कोटिगुणं भूमिदानं विशिष्यते । भूमिदानसहस्रेण गोप्रदानं विशिष्यते
vidyādānātkoṭiguṇaṁ bhūmidānaṁ viśiṣyate bhūmidānasahasreṇa gopradānaṁ viśiṣyate
विद्यादान से करोड़ गुना बढ़कर भूमिदान है; सहस्र भूमिदान से भी गोदान बढ़कर है।
श्लोक 15 (skanda.2.99.15)
गोप्रदानसहस्रेभ्यो ह्यन्नदानं विशिष्यते । अन्नाधारमिदं प्रोक्तं तस्माद्देयं तु कार्तिके
gopradānasahasrebhyo hyannadānaṁ viśiṣyate annādhāramidaṁ proktaṁ tasmāddeyaṁ tu kārtike
सहस्र गोदान से भी अन्नदान बढ़कर है; कहा गया है कि यह सम्पूर्ण जगत् अन्न के ही आधार पर टिका है, इसलिए कार्तिक में विशेष रूप से अन्नदान करना चाहिए।
श्लोक 16 (skanda.2.99.16)
परान्नवर्जनादेव लभेच्चांद्रायणं फलम् । दिनेदिनेऽतिकृच्छ्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः
parānnavarjanādeva labheccāṁdrāyaṇaṁ phalam dinedine'tikṛcchrasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ
केवल पराया अन्न त्यागने मात्र से चांद्रायण व्रत का फल प्राप्त होता है; मनुष्य प्रतिदिन बिना कष्ट के ही अत्यन्त कठिन तप का फल पाता है।
श्लोक 17 (skanda.2.99.17)
कार्तिके वर्जयेन्मांसं सन्धानं च विशेषतः । राक्षसीं योनिमाप्नोति सकृन्मांसस्य भक्षणात्
kārtike varjayenmāṁsaṁ sandhānaṁ ca viśeṣataḥ rākṣasīṁ yonimāpnoti sakṛnmāṁsasya bhakṣaṇāt
कार्तिक में मांस का तथा विशेषतः अचार-सन्धान का त्याग करना चाहिए; एक बार भी मांस-भक्षण करने से मनुष्य राक्षस-योनि को प्राप्त होता है।
श्लोक 18 (skanda.2.99.18)
प्रवृत्तानां तु भक्ष्याणां कार्तिके नियमे कृते । अवश्यं विष्णुरूपत्वं प्राप्यते मोक्षदं पदम्
pravṛttānāṁ tu bhakṣyāṇāṁ kārtike niyame kṛte avaśyaṁ viṣṇurūpatvaṁ prāpyate mokṣadaṁ padam
सामान्य रूप से खाए जाने वाले पदार्थों का भी कार्तिक में नियमपूर्वक त्याग करने से मनुष्य निश्चय ही विष्णु के स्वरूप को, मोक्षदायक पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 19 (skanda.2.99.19)
ब्राह्मणेभ्यो महीं दत्त्वा ग्रहणे सूर्यचंद्रयोः । यत्फलं लभते वत्स तत्फलं भूमिशायिनः
brāhmaṇebhyo mahīṁ dattvā grahaṇe sūryacaṁdrayoḥ yatphalaṁ labhate vatsa tatphalaṁ bhūmiśāyinaḥ
हे वत्स, सूर्य या चन्द्र ग्रहण के समय ब्राह्मणों को भूमि-दान करने से जो फल मिलता है, वही फल कार्तिक में भूमि पर सोने वाले को प्राप्त होता है।
श्लोक 20 (skanda.2.99.20)
भोजनं द्विजदंपत्योः पूजनं च विलेपनैः । कंबलानि च रत्नानि वासांसि विविधानि च
bhojanaṁ dvijadaṁpatyoḥ pūjanaṁ ca vilepanaiḥ kaṁbalāni ca ratnāni vāsāṁsi vividhāni ca
ब्राह्मण-दम्पति को भोजन कराना, उन्हें उबटन आदि से पूजना, कम्बल, रत्न तथा विविध वस्त्र देना,
श्लोक 21 (skanda.2.99.21)
तूलिकाश्च प्रदातव्याः प्रच्छादनपटैः सह । उपानहावातपत्रं कार्तिके देहि सुव्रत
tūlikāśca pradātavyāḥ pracchādanapaṭaiḥ saha upānahāvātapatraṁ kārtike dehi suvrata
तथा ओढ़ने के कपड़ों सहित गद्दे भी देने चाहिए; हे सुव्रत, कार्तिक में जूते और छाता भी दान करो।
श्लोक 22 (skanda.2.99.22)
कार्तिके क्षितिशायी च हन्यात्पापं युगार्जितम् । जागरं कार्तिके मासि यः करोत्यरुणोदये
kārtike kṣitiśāyī ca hanyātpāpaṁ yugārjitam jāgaraṁ kārtike māsi yaḥ karotyaruṇodaye
कार्तिक में भूमि पर सोने वाला मनुष्य युगों में अर्जित पाप का भी नाश कर देता है; जो कार्तिक मास में अरुणोदय के समय जागरण करता है,
श्लोक 23 (skanda.2.99.23)
दामोदराग्रे देवर्षे गोसहस्रफलं लभेत् । नदीस्नानं कथा विष्णोर्वैष्णवानां च दर्शनम्
dāmodarāgre devarṣe gosahasraphalaṁ labhet nadīsnānaṁ kathā viṣṇorvaiṣṇavānāṁ ca darśanam
हे देवर्षे, वह दामोदर के समक्ष सहस्र गोदान का फल प्राप्त करता है; नदी में स्नान, विष्णु की कथा, तथा वैष्णवों का दर्शन —
श्लोक 24 (skanda.2.99.24)
न भवेत्कार्तिके यस्य हरेत्पुण्यं दशाब्दिकम् । पुष्करं यः स्मरेत्प्राज्ञः कर्मणा मनसा गिरा
na bhavetkārtike yasya haretpuṇyaṁ daśābdikam puṣkaraṁ yaḥ smaretprājñaḥ karmaṇā manasā girā
— जिसे कार्तिक में ये प्राप्त न हों, उसके दस वर्षों का पुण्य नष्ट हो जाता है। जो बुद्धिमान् पुरुष कर्म, मन और वाणी से पुष्कर का स्मरण करता है,
श्लोक 25 (skanda.2.99.25)
कार्तिके मुनिशार्दूल लक्षकोटिगुणं भवेत् । प्रयागो माघमासे तु पुष्करं कार्तिके तथा
kārtike muniśārdūla lakṣakoṭiguṇaṁ bhavet prayāgo māghamāse tu puṣkaraṁ kārtike tathā
हे मुनिशार्दूल, कार्तिक में वह स्मरण लाखों-करोड़ों गुना फलदायी हो जाता है। माघ मास में प्रयाग तथा कार्तिक में पुष्कर विशेष फलदायी हैं।
श्लोक 26 (skanda.2.99.26)
अवन्ती माधवे मासि हन्यात्पापं युगार्जितम् । धन्यास्ते मानवा लोके कलिकाले विशेषतः
avantī mādhave māsi hanyātpāpaṁ yugārjitam dhanyāste mānavā loke kalikāle viśeṣataḥ
वैशाख (माधव) मास में अवन्ती (उज्जैन) की यात्रा युगार्जित पाप का नाश करती है। धन्य हैं वे मनुष्य इस लोक में, विशेषतः कलियुग में,
श्लोक 27 (skanda.2.99.27)
ये कुर्वंति नरा नित्यं प्रीत्यर्थं हरिपूजनम् । तारितास्तैश्च पितरो नरकाच्च न संशयः
ye kurvaṁti narā nityaṁ prītyarthaṁ haripūjanam tāritāstaiśca pitaro narakācca na saṁśayaḥ
जो नित्य प्रेमपूर्वक हरि-पूजन करते हैं; उनके द्वारा उनके पितर भी निःसंदेह नरक से तार दिए जाते हैं।
श्लोक 28 (skanda.2.99.28)
क्षीरादिस्नपनं विष्णोः क्रियते पितृकारणात् । कल्पकोटिं दिवं प्राप्य वसन्ति त्रिदिवैः सह
kṣīrādisnapanaṁ viṣṇoḥ kriyate pitṛkāraṇāt kalpakoṭiṁ divaṁ prāpya vasanti tridivaiḥ saha
पितरों के निमित्त जब विष्णु का दुग्धादि से अभिषेक किया जाता है, तो वे करोड़ों कल्पों तक स्वर्ग प्राप्त कर देवताओं के साथ निवास करते हैं।
श्लोक 29 (skanda.2.99.29)
कार्तिके नार्चितो यैस्तु कृष्णस्तु कमलेक्षणः । जन्मकोटिषु विप्रेन्द्र न तेषां कमला गृहे
kārtike nārcito yaistu kṛṣṇastu kamalekṣaṇaḥ janmakoṭiṣu viprendra na teṣāṁ kamalā gṛhe
हे विप्रेन्द्र, जिनके द्वारा कार्तिक में कमल-नयन कृष्ण का पूजन नहीं किया गया, उनके घर में करोड़ों जन्मों तक लक्ष्मी नहीं आतीं।
श्लोक 30 (skanda.2.99.30)
अहो मुष्टा विनष्टास्ते पतिताः कलिकन्दरे । यैर्नार्चितो हरिर्भक्त्या कमलैरसितैः सितैः
aho muṣṭā vinaṣṭāste patitāḥ kalikandare yairnārcito harirbhaktyā kamalairasitaiḥ sitaiḥ
आश्चर्य है, वे ठगे गए और नष्ट हो गए, कलियुग की गहरी खाई में गिर गए, जिन्होंने काले और सफेद कमलों से भक्तिपूर्वक हरि की पूजा नहीं की।
श्लोक 31 (skanda.2.99.31)
पद्मेनैकेन देवेशं योऽर्चयेत्कमलापतिम् । वर्षायुतसहस्रस्य पापस्य कुरुते क्षयम् । पुष्करार्चनयोगेन श्वेतो मुक्तिमवाप ह
padmenaikena deveśaṁ yo'rcayetkamalāpatim varṣāyutasahasrasya pāpasya kurute kṣayam puṣkarārcanayogena śveto muktimavāpa ha
जो एक ही कमल-पुष्प से कमलापति देवेश की पूजा करता है, वह दस हज़ार वर्षों के पाप का नाश कर देता है; पुष्कर में पूजा-योग से राजा श्वेत ने मुक्ति प्राप्त की थी।
श्लोक 32 (skanda.2.99.32)
अपराधसहस्राणि तथा सप्तशतानि च । पद्मेनैकेन देवेशः क्षमते प्रणतोऽर्चितः
aparādhasahasrāṇi tathā saptaśatāni ca padmenaikena deveśaḥ kṣamate praṇato'rcitaḥ
सहस्र और सात सौ अपराधों को भी, प्रणाम करके एक ही कमल से पूजित देवेश क्षमा कर देते हैं।
श्लोक 33 (skanda.2.99.33)
तुलसीपत्रलक्षेण कार्तिके योऽर्चयेद्धरिम् । पत्रेपत्रे मुनिश्रेष्ठ मौक्तिकं लभते फलम्
tulasīpatralakṣeṇa kārtike yo'rcayeddharim patrepatre muniśreṣṭha mauktikaṁ labhate phalam
हे मुनिश्रेष्ठ, जो कार्तिक में हरि की एक लाख तुलसी-पत्रों से पूजा करता है, उसे प्रत्येक पत्र पर मोती के समान फल प्राप्त होता है।
श्लोक 34 (skanda.2.99.34)
मुखे शिरसि देहे तु कृष्णोत्तीर्णां तु यो वहेत् । तुलसी कृष्णनिर्माल्यैर्यो गात्रं परिमार्जयेत् । सर्वरोगैस्तथा पापैर्मुक्तो भवति मानवः
mukhe śirasi dehe tu kṛṣṇottīrṇāṁ tu yo vahet tulasī kṛṣṇanirmālyairyo gātraṁ parimārjayet sarvarogaistathā pāpairmukto bhavati mānavaḥ
जो कृष्ण को अर्पित तुलसी को मुख, सिर या शरीर पर धारण करता है, अथवा कृष्ण के निर्माल्य और तुलसी से अपने अंगों को शुद्ध करता है, वह मनुष्य सभी रोगों तथा पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 35 (skanda.2.99.35)
शंखोदकं हरेर्भक्तिर्निर्माल्यं पादयोर्जलम् । चन्दनं धूपशेषं च ब्रह्महत्यापहारकम्
śaṁkhodakaṁ harerbhaktirnirmālyaṁ pādayorjalam candanaṁ dhūpaśeṣaṁ ca brahmahatyāpahārakam
शंख का जल, हरि-भक्ति, निर्माल्य, चरणामृत, चन्दन तथा धूप का शेष — ये सब ब्रह्महत्या जैसे पाप का भी हरण करने वाले हैं।
श्लोक 36 (skanda.2.99.36)
कार्तिके मासि विप्रेन्द्र प्रातःस्नानपरायणः । विप्रेभ्यश्चान्नदानं तु कुर्याच्छक्त्यनुसारतः
kārtike māsi viprendra prātaḥsnānaparāyaṇaḥ viprebhyaścānnadānaṁ tu kuryācchaktyanusārataḥ
हे विप्रेन्द्र, कार्तिक मास में प्रातःकाल स्नान में तत्पर रहकर, अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को अन्नदान करना चाहिए।
श्लोक 37 (skanda.2.99.37)
सर्वेषामेव दानानामन्नदानं विशिष्यते । अन्नेन जायते लोको ह्यन्नेनैवाऽभिवर्द्धते
sarveṣāmeva dānānāmannadānaṁ viśiṣyate annena jāyate loko hyannenaivā'bhivarddhate
सम्पूर्ण दानों में अन्नदान श्रेष्ठ है; अन्न से ही संसार उत्पन्न होता है और अन्न से ही उसकी वृद्धि होती है।
श्लोक 38 (skanda.2.99.38)
अन्नं हि सर्वभूतानां प्राणभूतं परं विदुः । अन्नदः सर्वदो लोके सर्वयज्ञादिकृद्भवेत्
annaṁ hi sarvabhūtānāṁ prāṇabhūtaṁ paraṁ viduḥ annadaḥ sarvado loke sarvayajñādikṛdbhavet
अन्न को सभी प्राणियों का परम प्राण-तत्त्व माना गया है; जो अन्न देता है, वह लोक में सब कुछ देने वाला तथा सभी यज्ञों को करने वाला माना जाता है।
श्लोक 39 (skanda.2.99.39)
तीर्थस्नानेन किं तस्य देवयात्रादिनाऽपि किम् । सर्वं संपाद्यते ब्रह्मन्नन्नदानान्न संशयः
tīrthasnānena kiṁ tasya devayātrādinā'pi kim sarvaṁ saṁpādyate brahmannannadānānna saṁśayaḥ
उसे तीर्थ-स्नान से क्या प्रयोजन, देव-यात्रा आदि से भी क्या? हे ब्रह्मन्, अन्नदान से निःसंदेह सब कुछ सिद्ध हो जाता है।
श्लोक 40 (skanda.2.99.40)
सत्यकेतुर्द्विजः पूर्वं चान्नदानेन केवलम् । सर्वपुण्यफलं प्राप्य मोक्षं प्राप सुदुर्लभम्
satyaketurdvijaḥ pūrvaṁ cānnadānena kevalam sarvapuṇyaphalaṁ prāpya mokṣaṁ prāpa sudurlabham
पूर्वकाल में सत्यकेतु नामक ब्राह्मण ने केवल अन्नदान से ही समस्त पुण्यों का फल प्राप्त कर अत्यन्त दुर्लभ मोक्ष पाया था।
श्लोक 41 (skanda.2.99.41)
कार्तिकव्रतनिष्ठस्तु कुर्याद्गोदानमुत्तमम् । व्रतं संपूर्णतां याति गोदानेन न संशयः
kārtikavrataniṣṭhastu kuryādgodānamuttamam vrataṁ saṁpūrṇatāṁ yāti godānena na saṁśayaḥ
कार्तिक-व्रत में निष्ठावान् पुरुष को उत्तम गोदान करना चाहिए; गोदान से ही व्रत निःसंदेह पूर्णता को प्राप्त होता है।
श्लोक 42 (skanda.2.99.42)
गोदानात्परमं दानं संसारार्णवतारकम् । नास्ति नारद लोकेऽस्मिन्सुशर्मा ब्राह्मणो यथा
godānātparamaṁ dānaṁ saṁsārārṇavatārakam nāsti nārada loke'sminsuśarmā brāhmaṇo yathā
हे नारद, गोदान से बढ़कर संसार-सागर से तारने वाला कोई दान इस लोक में नहीं है — जैसा सुशर्मा ब्राह्मण के उदाहरण से सिद्ध होता है।
श्लोक 43 (skanda.2.99.43)
कार्तिके मासि विप्रेंद्र दत्त्वा दानान्यनेकशः । हरिस्मृतिविहीनश्चेन्न पुनंति कदाचन
kārtike māsi vipreṁdra dattvā dānānyanekaśaḥ harismṛtivihīnaścenna punaṁti kadācana
हे विप्रेन्द्र, कार्तिक मास में अनेक दान देकर भी, यदि मनुष्य हरि-स्मरण से रहित हो, तो वे दान उसे कभी पवित्र नहीं कर पाते।
श्लोक 44 (skanda.2.99.44)
नामस्मरणमाहात्म्यं मया वक्तुं न शक्यते । पुष्करेण यथा पूर्वं नारकीयाश्च मोचिताः
nāmasmaraṇamāhātmyaṁ mayā vaktuṁ na śakyate puṣkareṇa yathā pūrvaṁ nārakīyāśca mocitāḥ
नाम-स्मरण के माहात्म्य को मैं भी कहने में समर्थ नहीं हूँ — जैसे पूर्वकाल में पुष्कर के प्रभाव से नरक के प्राणी भी मुक्त हो गए थे।
श्लोक 45 (skanda.2.99.45)
गोविंद गोविंद हरे मुरारे गोविंद गोविंद् मुकुंद कृष्ण । गोविंद गोविंद रथांगपाणे गोविंद दामोदर माधवेति
goviṁda goviṁda hare murāre goviṁda goviṁd mukuṁda kṛṣṇa goviṁda goviṁda rathāṁgapāṇe goviṁda dāmodara mādhaveti
"गोविन्द, गोविन्द, हे हरि, हे मुरारि, गोविन्द, गोविन्द, मुकुन्द, कृष्ण! गोविन्द, गोविन्द, हे रथांगपाणे, गोविन्द, दामोदर, माधव!" — इस प्रकार उसने पुकारा।
श्लोक 46 (skanda.2.99.46)
श्लोकार्द्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतोद्भवम् । कार्तिके यः पठन्मर्त्यः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः
ślokārddhaṁ ślokapādaṁ vā nityaṁ bhāgavatodbhavam kārtike yaḥ paṭhanmartyaḥ śraddhābhaktisamanvitaḥ
जो मनुष्य कार्तिक में श्रद्धा-भक्ति सहित नित्य भागवत-पुराण से उत्पन्न आधा श्लोक या श्लोक का चरण भी पढ़ता है,
श्लोक 47 (skanda.2.99.47)
यैर्न श्रुतं भागवतं पुराणं नाराधितो वै पुरुषः पुराणः । हुतं मुखे नैव धरामराणां तेषां वृथा जन्म गतं नराणाम्
yairna śrutaṁ bhāgavataṁ purāṇaṁ nārādhito vai puruṣaḥ purāṇaḥ hutaṁ mukhe naiva dharāmarāṇāṁ teṣāṁ vṛthā janma gataṁ narāṇām
जिन्होंने भागवत पुराण को नहीं सुना और उन सनातन पुरुष की आराधना नहीं की, जिनके द्वारा ब्राह्मणों के मुख में हवन नहीं किया गया, उन मनुष्यों का जन्म व्यर्थ ही गया समझो।
श्लोक 48 (skanda.2.99.48)
कार्तिके मासि विप्रेंद्र यस्तु गीतां पठेन्नरः । तस्य पुण्यफलं वक्तुं मम शक्तिर्न विद्यते
kārtike māsi vipreṁdra yastu gītāṁ paṭhennaraḥ tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ mama śaktirna vidyate
हे विप्रेन्द्र, जो मनुष्य कार्तिक मास में गीता का पाठ करता है, उसके पुण्य-फल को बताने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है।
श्लोक 49 (skanda.2.99.49)
गीतायास्तु समं शास्त्रं न भूतं न भविष्यति । सर्वपापहरा नित्यं गीतैका मोक्षदायिनी
gītāyāstu samaṁ śāstraṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati sarvapāpaharā nityaṁ gītaikā mokṣadāyinī
गीता के समान शास्त्र न कभी हुआ है और न होगा; सर्वदा सम्पूर्ण पापों का हरण करने वाली गीता ही अकेली मोक्ष देने वाली है।
श्लोक 50 (skanda.2.99.50)
एकेनाऽध्यायपाठेन सर्वपापकृतोऽपि च । मुच्यंते नरकाद्घोराज्जडो वै ब्राह्मणो यथा
ekenā'dhyāyapāṭhena sarvapāpakṛto'pi ca mucyaṁte narakādghorājjaḍo vai brāhmaṇo yathā
केवल एक अध्याय के पाठ मात्र से सम्पूर्ण पाप करने वाला भी घोर नरक से मुक्त हो जाता है — जैसे एक जड़बुद्धि ब्राह्मण मुक्त हुआ था।
श्लोक 51 (skanda.2.99.51)
शालिग्रामशिलादानं यः कुर्यात्कार्तिके मुने । तस्य पुण्यस्य विश्रांतिर्विष्णुना न निरूपिता
śāligrāmaśilādānaṁ yaḥ kuryātkārtike mune tasya puṇyasya viśrāṁtirviṣṇunā na nirūpitā
हे मुने, जो कार्तिक में शालिग्राम-शिला का दान करता है, उसके पुण्य की सीमा स्वयं विष्णु ने भी नहीं बताई।
श्लोक 52 (skanda.2.99.52)
शालिग्रामं समभ्यर्च्य श्रोत्रियाय महामुने । दानं यः कुरुते विप्र तस्य पुण्यफलं शृणु
śāligrāmaṁ samabhyarcya śrotriyāya mahāmune dānaṁ yaḥ kurute vipra tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu
हे विप्र, महामुने, जो शालिग्राम का भलीभाँति पूजन करके किसी वेदज्ञ ब्राह्मण को दान करता है, उसके पुण्य-फल को सुनो।
श्लोक 53 (skanda.2.99.53)
सप्तसागरपर्यंतं भूदानाद्यत्फलं भवेत् । शालिग्रामशिलादानात्तत्फलं समवाप्नुयात्
saptasāgaraparyaṁtaṁ bhūdānādyatphalaṁ bhavet śāligrāmaśilādānāttatphalaṁ samavāpnuyāt
सात समुद्रों तक फैली पृथ्वी के दान से जो फल प्राप्त होता है, वही फल शालिग्राम-शिला के दान से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 54 (skanda.2.99.54)
शालिग्रामशिलादानात्कार्तिके ब्राह्मणी यथा । विधवा सधवा जाता विवाहे पंचमेऽहनि
śāligrāmaśilādānātkārtike brāhmaṇī yathā vidhavā sadhavā jātā vivāhe paṁcame'hani
शालिग्राम-शिला के दान के प्रभाव से, जैसे कार्तिक में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुनर्विवाह के पाँचवें दिन ही सुहागिन हो गई।
श्लोक 55 (skanda.2.99.55)
तस्मात्तु कार्तिके मासि स्नानदानपुरःसरम् । शालिग्रामशिलादानं कर्तव्यं नाऽत्र संशयः
tasmāttu kārtike māsi snānadānapuraḥsaram śāligrāmaśilādānaṁ kartavyaṁ nā'tra saṁśayaḥ
इसलिए कार्तिक मास में स्नान और दान के साथ शालिग्राम-शिला का दान अवश्य करना चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं है।