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वैष्णव खण्ड · अध्याय 98

कार्तिकव्रतप्रशंसावर्णनम्

अध्याय 97अध्याय-सूचीअध्याय 99

श्लोक 1 (skanda.2.98.1)

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्

nārāyaṇaṁ namaskṛtya naraṁ caiva narottamam devīṁ sarasvatīṁ caiva tato jayamudīrayet

भगवान् नारायण को, नरों में श्रेष्ठ नर को तथा देवी सरस्वती को नमस्कार करके, तत्पश्चात् इस पुण्य ग्रंथ का उच्चारण करना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.2.98.2)

ऋषय ऊचुः । सूत नः कथितं पुण्यं माहात्म्यमाश्विनस्य च । भूयोऽन्यच्छ्रोतुमिच्छामः कार्तिकस्य च वैभवम्

ṛṣaya ūcuḥ sūta naḥ kathitaṁ puṇyaṁ māhātmyamāśvinasya ca bhūyo'nyacchrotumicchāmaḥ kārtikasya ca vaibhavam

ऋषियों ने कहा — हे सूत, आपने हमें आश्विन मास का पुण्य माहात्म्य सुनाया; अब हम कार्तिक मास के वैभव को भी सुनना चाहते हैं।

श्लोक 3 (skanda.2.98.3)

कलौ कलुषचित्तानां नराणां पापकर्मणाम् । संसाराब्धौ निमग्नानामनायासेन का गतिः

kalau kaluṣacittānāṁ narāṇāṁ pāpakarmaṇām saṁsārābdhau nimagnānāmanāyāsena kā gatiḥ

कलियुग में मलिन चित्त वाले, पापकर्मी तथा संसार-सागर में डूबे हुए मनुष्यों के लिए बिना कष्ट के मुक्ति का कौन-सा उपाय है?

श्लोक 4 (skanda.2.98.4)

को धर्मः सर्वधर्माणामधिको मोक्षसाधकः । इहाऽपि मुक्तिदो नृणामेतत्त्वं कथय प्रभो

ko dharmaḥ sarvadharmāṇāmadhiko mokṣasādhakaḥ ihā'pi muktido nṛṇāmetattvaṁ kathaya prabho

सम्पूर्ण धर्मों में कौन-सा धर्म श्रेष्ठ है, जो मोक्ष का साधक हो और इसी लोक में भी मनुष्यों को मुक्ति देने वाला हो? हे प्रभो, यह तत्त्व हमें बताइए।

श्लोक 5 (skanda.2.98.5)

सूत उवाच । भवद्भिर्यदहं पृष्टस्तदेतत्पृष्टवान्मुनिः । नारदो ब्रह्मणः पुत्रो ब्रह्माणं तु जगद्गुरुम्

sūta uvāca bhavadbhiryadahaṁ pṛṣṭastadetatpṛṣṭavānmuniḥ nārado brahmaṇaḥ putro brahmāṇaṁ tu jagadgurum

सूत ने कहा — आपने जो मुझसे पूछा है, वही प्रश्न पूर्वकाल में ब्रह्माजी के पुत्र नारद मुनि ने जगद्गुरु ब्रह्माजी से पूछा था।

श्लोक 6 (skanda.2.98.6)

तथैव सत्यभामा च श्रीकृष्णं जगदीश्वरम् । अपृच्छत्कार्तिकस्यैव वैभवं श्रवणोत्सुका

tathaiva satyabhāmā ca śrīkṛṣṇaṁ jagadīśvaram apṛcchatkārtikasyaiva vaibhavaṁ śravaṇotsukā

और उसी प्रकार सत्यभामा ने भी कार्तिक-वैभव सुनने की उत्कण्ठा से जगदीश्वर श्रीकृष्ण से यह प्रश्न पूछा था।

श्लोक 7 (skanda.2.98.7)

वालखिल्यैश्च ऋषिभिर्यदुक्तमृषिसंसदि । श्रीसूर्यारुणसंवादरूपेणाऽतिमनोहरम्

vālakhilyaiśca ṛṣibhiryaduktamṛṣisaṁsadi śrīsūryāruṇasaṁvādarūpeṇā'timanoharam

तथा जो वालखिल्य ऋषियों ने ऋषि-सभा में सूर्य और अरुण के अत्यन्त मनोहर संवाद के रूप में कहा था;

श्लोक 8 (skanda.2.98.8)

कैलासे शंकरेणैव कार्तिकस्य च वैभवम् । वर्णितं षण्मुखस्याग्रे नानाख्यानसमन्वितम्

kailāse śaṁkareṇaiva kārtikasya ca vaibhavam varṇitaṁ ṣaṇmukhasyāgre nānākhyānasamanvitam

और जो कैलास पर्वत पर स्वयं शंकरजी ने षण्मुख (कार्तिकेय) के समक्ष अनेक आख्यानों सहित कार्तिक-वैभव का वर्णन किया था;

श्लोक 9 (skanda.2.98.9)

पृथुं प्रति नारदेन कथितं च महात्म्यकम् । कार्तिकस्य च विप्रेंद्रा श्रुत्वा ब्रह्ममुखात्पुरा

pṛthuṁ prati nāradena kathitaṁ ca mahātmyakam kārtikasya ca vipreṁdrā śrutvā brahmamukhātpurā

तथा जो नारदजी ने पृथु राजा से महात्म्य कहा था — हे विप्रेन्द्रो, यह सब पूर्वकाल में ब्रह्माजी के मुख से सुनकर —

श्लोक 10 (skanda.2.98.10)

एकदा नारदो योगी सत्यलोकमुपागतः । पप्रच्छ विनयेनैव सर्वलोकपितामहम्

ekadā nārado yogī satyalokamupāgataḥ papraccha vinayenaiva sarvalokapitāmaham

एक बार योगी नारद सत्यलोक में पहुँचे और अत्यन्त विनयपूर्वक सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्माजी से पूछने लगे।

श्लोक 11 (skanda.2.98.11)

श्रीनारद उवाच । पापेंधनस्य घोरस्य शुष्कार्द्रस्य च भूरिशः । को वह्निर्दहते ब्रह्मंस्तद्भवान्वक्तुमर्हति

śrīnārada uvāca pāpeṁdhanasya ghorasya śuṣkārdrasya ca bhūriśaḥ ko vahnirdahate brahmaṁstadbhavānvaktumarhati

श्रीनारद ने कहा — हे ब्रह्मन्, अत्यन्त भयंकर, शुष्क और आर्द्र पापरूपी ईंधन को प्रचुर मात्रा में कौन-सी अग्नि जलाती है? आप यह कहने योग्य हैं।

श्लोक 12 (skanda.2.98.12)

नाज्ञातं त्रिषु लोकेषु ब्रह्मांडांतर्गतस्य यत् । विद्यते तव देवेश त्रिविधस्य सुनिश्चितम्

nājñātaṁ triṣu lokeṣu brahmāṁḍāṁtargatasya yat vidyate tava deveśa trividhasya suniścitam

हे देवेश, इस त्रिविध ब्रह्माण्ड के भीतर तीनों लोकों में जो कुछ भी है, वह निश्चय ही आपसे अज्ञात नहीं है।

श्लोक 13 (skanda.2.98.13)

मासानां प्रवरो मासो देवानामुत्तमोत्तमः । तीर्थानि तद्विशेषेण कथयस्व पितामह

māsānāṁ pravaro māso devānāmuttamottamaḥ tīrthāni tadviśeṣeṇa kathayasva pitāmaha

महीनों में सर्वश्रेष्ठ महीना कौन-सा है, जो देवताओं में भी उत्तमोत्तम है? हे पितामह, उसके सम्बन्ध में विशेष रूप से तीर्थों का भी वर्णन कीजिए।

श्लोक 14 (skanda.2.98.14)

ब्रह्मोवाच । मासानां कार्तिकः श्रेष्ठो देवानां मधुसूदनः । तीर्थं नारायणाख्यं हि त्रितयं दुर्लभं कलौ

brahmovāca māsānāṁ kārtikaḥ śreṣṭho devānāṁ madhusūdanaḥ tīrthaṁ nārāyaṇākhyaṁ hi tritayaṁ durlabhaṁ kalau

ब्रह्माजी ने कहा — महीनों में कार्तिक श्रेष्ठ है, देवताओं में मधुसूदन श्रेष्ठ हैं, और नारायण नामक तीर्थ — ये तीनों कलियुग में दुर्लभ हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.98.15)

नारद उवाच । भगवंस्तव दासोऽस्मि भक्तोऽस्मि हरिवल्लभ । वैष्णवान्ब्रूहि मे धर्मान्सर्वज्ञोऽसि पितामह

nārada uvāca bhagavaṁstava dāso'smi bhakto'smi harivallabha vaiṣṇavānbrūhi me dharmānsarvajño'si pitāmaha

नारद ने कहा — हे भगवन्, मैं आपका दास हूँ, आपका भक्त हूँ, हे हरिवल्लभ। हे पितामह, आप सर्वज्ञ हैं, मुझे वैष्णव धर्म बताइए।

श्लोक 16 (skanda.2.98.16)

आदौ कार्तिकमाहात्म्यं वक्तुमर्हसि मे प्रभो । दीपदानस्य माहात्म्यं व्रतिनां नियमांस्तथा

ādau kārtikamāhātmyaṁ vaktumarhasi me prabho dīpadānasya māhātmyaṁ vratināṁ niyamāṁstathā

हे प्रभो, सर्वप्रथम आप मुझे कार्तिक-माहात्म्य कहिए, फिर दीपदान का माहात्म्य तथा व्रतियों के नियम भी बताइए।

श्लोक 17 (skanda.2.98.17)

गोपीचंदनमाहात्म्यं तुलस्याश्च तथा विभो । धात्र्याश्चैव च माहात्म्यं विधिं स्नानादिकस्य च । व्रतारंभः कदा कार्यं उद्यापनविधिं तथा

gopīcaṁdanamāhātmyaṁ tulasyāśca tathā vibho dhātryāścaiva ca māhātmyaṁ vidhiṁ snānādikasya ca vratāraṁbhaḥ kadā kāryaṁ udyāpanavidhiṁ tathā

हे विभो, गोपीचन्दन का माहात्म्य, तुलसी का माहात्म्य, तथा धात्री का भी माहात्म्य, स्नानादि की विधि, व्रत का आरम्भ कब करना चाहिए तथा उद्यापन-विधि भी बताइए।

श्लोक 18 (skanda.2.98.18)

यत्किंचिद्वैष्णवं धर्मं तत्सर्वं वक्तुमर्हसि । येनाऽहं त्वत्प्रसादेन पदं यास्याम्यनामयम्

yatkiṁcidvaiṣṇavaṁ dharmaṁ tatsarvaṁ vaktumarhasi yenā'haṁ tvatprasādena padaṁ yāsyāmyanāmayam

जो कुछ भी वैष्णव धर्म है, वह सब आप कहने योग्य हैं, जिससे मैं आपकी कृपा से निर्दोष पद (मोक्ष) को प्राप्त हो सकूँ।

श्लोक 19 (skanda.2.98.19)

सूत उवाच । इति पुत्रवचः श्रुत्वा ब्रह्मा हर्षसमन्वितः । राधादामोदरं स्मृत्वा प्रोवाच तनुजं प्रति

sūta uvāca iti putravacaḥ śrutvā brahmā harṣasamanvitaḥ rādhādāmodaraṁ smṛtvā provāca tanujaṁ prati

सूत ने कहा — पुत्र के इन वचनों को सुनकर हर्ष से भरे हुए ब्रह्माजी ने राधा-दामोदर का स्मरण करके अपने पुत्र से कहा।

श्लोक 20 (skanda.2.98.20)

ब्रह्मोवाच । साधु पृष्टं त्वया पुत्र लोकोद्धरणहेतवे । कथयामि न संदेहः कार्तिकस्य च वैभवम्

brahmovāca sādhu pṛṣṭaṁ tvayā putra lokoddharaṇahetave kathayāmi na saṁdehaḥ kārtikasya ca vaibhavam

ब्रह्माजी ने कहा — हे पुत्र, तुमने लोकोद्धार के हेतु उत्तम प्रश्न पूछा है; मैं निःसंदेह कार्तिक के वैभव का वर्णन करता हूँ।

श्लोक 21 (skanda.2.98.21)

एकतः सर्वतीर्थानि सर्वे यज्ञाः सदक्षिणाः । कार्तिकस्य तु मासस्य कलां नार्हंति षोडशीम्

ekataḥ sarvatīrthāni sarve yajñāḥ sadakṣiṇāḥ kārtikasya tu māsasya kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm

एक ओर सम्पूर्ण तीर्थ तथा दक्षिणा-सहित सभी यज्ञ हैं, दूसरी ओर कार्तिक मास है — वे सब मिलकर भी कार्तिक मास की सोलहवीं कला के बराबर नहीं हो सकते।

श्लोक 22 (skanda.2.98.22)

एकतः पुष्करे वासः कुरुक्षेत्रे हिमालये । एकतः कार्तिकः पुत्र सर्वपुण्याधिको मतः

ekataḥ puṣkare vāsaḥ kurukṣetre himālaye ekataḥ kārtikaḥ putra sarvapuṇyādhiko mataḥ

एक ओर पुष्कर, कुरुक्षेत्र और हिमालय में निवास है, दूसरी ओर हे पुत्र, कार्तिक मास ही समस्त पुण्यों से अधिक माना गया है।

श्लोक 23 (skanda.2.98.23)

स्वर्णानि मेरुतुल्यानि सर्वदानानि चैकतः । एकतः कार्तिको वत्स सर्वदा केशवप्रियः

svarṇāni merutulyāni sarvadānāni caikataḥ ekataḥ kārtiko vatsa sarvadā keśavapriyaḥ

एक ओर मेरु पर्वत के समान सोने के तथा अन्य सभी दान हैं, दूसरी ओर हे वत्स, सदा केशव को प्रिय कार्तिक मास है।

श्लोक 24 (skanda.2.98.24)

यत्किंचित्क्रियते पुण्यं विष्णुमुद्दिश्य कार्तिके । तस्य क्षयं न पश्यामि मयोक्तं तव नारद

yatkiṁcitkriyate puṇyaṁ viṣṇumuddiśya kārtike tasya kṣayaṁ na paśyāmi mayoktaṁ tava nārada

कार्तिक मास में विष्णु को उद्दिष्ट करके जो भी पुण्यकर्म किया जाता है, हे नारद, मैं उसका कभी क्षय होते नहीं देखता — यह मैंने तुम्हें बताया।

श्लोक 25 (skanda.2.98.25)

सोपानभूतं स्वर्गस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् । तथात्मानं समादद्यान्न भ्रश्येत यथा पुनः

sopānabhūtaṁ svargasya mānuṣyaṁ prāpya durlabham tathātmānaṁ samādadyānna bhraśyeta yathā punaḥ

स्वर्ग की सीढ़ी के समान इस दुर्लभ मनुष्य-जन्म को पाकर मनुष्य को अपने को इस प्रकार सम्भालना चाहिए कि वह पुनः न गिरे।

श्लोक 26 (skanda.2.98.26)

दुष्प्राप्यं प्राप्य मानुष्यं कार्तिकोक्तं चरेन्न यः । धर्मं धर्मभृतां श्रेष्ठ स मातापितृघातकः

duṣprāpyaṁ prāpya mānuṣyaṁ kārtikoktaṁ carenna yaḥ dharmaṁ dharmabhṛtāṁ śreṣṭha sa mātāpitṛghātakaḥ

जो दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर भी कार्तिक में कहे गए धर्म का आचरण नहीं करता, हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, वह अपने माता-पिता का हत्यारा है।

श्लोक 27 (skanda.2.98.27)

कार्तिकः खलु वै मासः सर्वमासेषु चोत्तमः । पुण्यानां परमं पुण्यं पावनानां च पावनम्

kārtikaḥ khalu vai māsaḥ sarvamāseṣu cottamaḥ puṇyānāṁ paramaṁ puṇyaṁ pāvanānāṁ ca pāvanam

कार्तिक निश्चय ही सभी महीनों में सर्वोत्तम महीना है; यह पुण्यों में परम पुण्य है और पवित्र वस्तुओं में भी परम पवित्र है।

श्लोक 28 (skanda.2.98.28)

अस्मिन्मासे त्रयस्त्रिंशद्देवाः सन्निहिता मुने । अत्र स्नानानिदानानि भोजनानि व्रतानि च

asminmāse trayastriṁśaddevāḥ sannihitā mune atra snānānidānāni bhojanāni vratāni ca

हे मुने, इस मास में तैंतीस करोड़ देवता उपस्थित रहते हैं; यहाँ स्नान, दान, भोजन तथा व्रत —

श्लोक 29 (skanda.2.98.29)

तिलधेनुं हिरण्यं च रजतं भूमिवाससी । गोप्रदानानि कुर्वंति सर्वभावेन नारद

tiladhenuṁ hiraṇyaṁ ca rajataṁ bhūmivāsasī gopradānāni kurvaṁti sarvabhāvena nārada

— तिलधेनु, स्वर्ण, चाँदी, भूमि, वस्त्र तथा गोदान — हे नारद, ये सब पूर्ण भाव से किए जाते हैं।

श्लोक 30 (skanda.2.98.30)

तानि दानानि दत्तानि गृह्णंति विधिवत्सुराः । यत्किंच दत्तं विप्रेंद्र तपश्चैव तथा कृतम्

tāni dānāni dattāni gṛhṇaṁti vidhivatsurāḥ yatkiṁca dattaṁ vipreṁdra tapaścaiva tathā kṛtam

वे दिए गए दान देवता विधिपूर्वक ग्रहण करते हैं; और हे विप्रेन्द्र, जो कुछ भी दिया गया और जो भी तप किया गया,

श्लोक 31 (skanda.2.98.31)

तदक्षय्यफलं प्रोक्तं विष्णुना प्रभविष्णुना । पापानां मोक्षणं चैव कार्तिके मासि शस्यते

tadakṣayyaphalaṁ proktaṁ viṣṇunā prabhaviṣṇunā pāpānāṁ mokṣaṇaṁ caiva kārtike māsi śasyate

— उसका अक्षय फल स्वयं महाशक्तिशाली भगवान् विष्णु ने बताया है; तथा कार्तिक मास में पापों से मुक्ति की भी विशेष प्रशंसा की गई है।

श्लोक 32 (skanda.2.98.32)

तस्माद्यत्नेन विप्रेंद्र कार्तिके मासि दीयते । यत्किंचित्कार्तिके दत्तं विष्णुमुद्दिश्य मानवैः

tasmādyatnena vipreṁdra kārtike māsi dīyate yatkiṁcitkārtike dattaṁ viṣṇumuddiśya mānavaiḥ

इसलिए, हे विप्रेन्द्र, कार्तिक मास में यत्नपूर्वक जो कुछ दिया जाता है, मनुष्यों द्वारा विष्णु के लिए जो भी दिया जाता है,

श्लोक 33 (skanda.2.98.33)

तदक्षयं हि लभते अन्नदानं विशेषतः । यथा नदीनां विप्रेंद्र शैलानां चैव नारद

tadakṣayaṁ hi labhate annadānaṁ viśeṣataḥ yathā nadīnāṁ vipreṁdra śailānāṁ caiva nārada

वह विशेषतः अन्नदान अक्षय फल देने वाला होता है; हे विप्रेन्द्र, हे नारद, जैसे नदियों तथा पर्वतों का,

श्लोक 34 (skanda.2.98.34)

उदधीनां च विप्रर्षे क्षयो नैवोपपद्यते । दानं कार्तिकमासे तु यत्किंचिद्दीयते मुने

udadhīnāṁ ca viprarṣe kṣayo naivopapadyate dānaṁ kārtikamāse tu yatkiṁciddīyate mune

और हे विप्रर्षे, समुद्रों का कभी क्षय नहीं होता, वैसे ही हे मुने, कार्तिक मास में दिया गया कोई भी दान क्षयरहित रहता है।

श्लोक 35 (skanda.2.98.35)

न तस्यास्ति क्षयो विप्र पापं याति सहस्रधा । संप्राप्तं कार्तिकं दृष्ट्वा परान्नं यस्तु वर्जयेत्

na tasyāsti kṣayo vipra pāpaṁ yāti sahasradhā saṁprāptaṁ kārtikaṁ dṛṣṭvā parānnaṁ yastu varjayet

हे विप्र, उसका कभी क्षय नहीं होता। जो कार्तिक के आगमन को देखकर पराया अन्न त्याग देता है, उसका पाप सहस्र गुना नष्ट हो जाता है।

श्लोक 36 (skanda.2.98.36)

दिनेदिनेऽतिकृच्छ्रस्य फलं प्राप्नोत्ययत्नतः । न कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम्

dinedine'tikṛcchrasya phalaṁ prāpnotyayatnataḥ na kārtikasamo māso na kṛtena samaṁ yugam

वह प्रतिदिन बिना प्रयास के ही अत्यन्त कठिन तप का फल प्राप्त करता है। कार्तिक के समान कोई मास नहीं, कृतयुग के समान कोई युग नहीं,

श्लोक 37 (skanda.2.98.37)

न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम् । न चान्नसदृशं दानं न सुखं भार्यया समम्

na vedasadṛśaṁ śāstraṁ na tīrthaṁ gaṁgayā samam na cānnasadṛśaṁ dānaṁ na sukhaṁ bhāryayā samam

वेद के समान कोई शास्त्र नहीं, गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, अन्नदान के समान कोई दान नहीं, तथा पत्नी के सुख के समान कोई सुख नहीं है।

श्लोक 38 (skanda.2.98.38)

न्यायेनोपार्जितं द्रव्यं दुर्लभं दानकारिणाम् । दुर्लभं मर्त्यधर्माणां तीर्थे च प्रतिपादनम्

nyāyenopārjitaṁ dravyaṁ durlabhaṁ dānakāriṇām durlabhaṁ martyadharmāṇāṁ tīrthe ca pratipādanam

न्यायपूर्वक अर्जित धन दानशीलों को भी दुर्लभ होता है; और मर्त्य-धर्मों में बँधे मनुष्यों के लिए तीर्थ में स्थिर समर्पण भी दुर्लभ है।

श्लोक 39 (skanda.2.98.39)

कार्तिके मुनिशार्दूल शालिग्रामशिलार्चनम् । स्मरणं वासुदेवस्य कर्तव्यं पापभीरुणा

kārtike muniśārdūla śāligrāmaśilārcanam smaraṇaṁ vāsudevasya kartavyaṁ pāpabhīruṇā

हे मुनिशार्दूल, कार्तिक मास में पाप से डरने वाले पुरुष को शालिग्राम-शिला का पूजन और वासुदेव का स्मरण करना चाहिए।

श्लोक 40 (skanda.2.98.40)

एतादृशं कार्तिकं च अकृतेनैव यो नयेत् । पूर्वं कृतस्य पुण्यस्य क्षयमाप्नोत्यसंशयम्

etādṛśaṁ kārtikaṁ ca akṛtenaiva yo nayet pūrvaṁ kṛtasya puṇyasya kṣayamāpnotyasaṁśayam

जो ऐसे कार्तिक मास को बिना कुछ किए ही बिता देता है, वह निःसंदेह पूर्व-अर्जित पुण्य का भी क्षय प्राप्त करता है।

श्लोक 41 (skanda.2.98.41)

नारद उवाच । अशक्तेन कथं कार्यं कार्तिकव्रतमुत्तमम् । येन तत्फलमाप्नोति तन्मे वद पितामह

nārada uvāca aśaktena kathaṁ kāryaṁ kārtikavratamuttamam yena tatphalamāpnoti tanme vada pitāmaha

नारद ने कहा — जो असमर्थ है, वह उत्तम कार्तिक-व्रत कैसे करे, जिससे उसे उसका फल प्राप्त हो? हे पितामह, यह मुझे बताइए।

श्लोक 42 (skanda.2.98.42)

ब्रह्मोवाच । अशक्तस्तु यदा मर्त्यस्तदैवं व्रतमाचरेत् । अन्यस्मै द्रविणं दत्त्वा कारयेत्कार्तिकव्रतम्

brahmovāca aśaktastu yadā martyastadaivaṁ vratamācaret anyasmai draviṇaṁ dattvā kārayetkārtikavratam

ब्रह्माजी ने कहा — जब मनुष्य असमर्थ हो, तब उसे इस प्रकार व्रत करना चाहिए — किसी अन्य को धन देकर उससे कार्तिक-व्रत करवाए।

श्लोक 43 (skanda.2.98.43)

तस्मात्पुण्यं प्रगृह्णीत दानसंकल्पपूर्वकम् । द्रव्यदानेऽप्यशक्तश्चेद्यदा देवर्षिसत्तम

tasmātpuṇyaṁ pragṛhṇīta dānasaṁkalpapūrvakam dravyadāne'pyaśaktaścedyadā devarṣisattama

इस प्रकार दान के संकल्पपूर्वक वह पुण्य प्राप्त कर सकता है। और हे देवर्षिसत्तम, यदि वह धन देने में भी असमर्थ हो,

श्लोक 44 (skanda.2.98.44)

तदा तेन प्रकर्तव्यं पानं तीर्थजलस्य च । तत्राप्यशक्तो यो मर्त्यस्तेन नित्यं हरेर्मुदा

tadā tena prakartavyaṁ pānaṁ tīrthajalasya ca tatrāpyaśakto yo martyastena nityaṁ harermudā

तो उसे तीर्थ के जल का पान करना चाहिए। और यदि मनुष्य उसमें भी असमर्थ हो, तो उसे प्रसन्नतापूर्वक निरन्तर हरि का,

श्लोक 45 (skanda.2.98.45)

स्मरणं च प्रकर्तव्यं नाम्ना नियमपूर्वकम् । अखंडितं तदा तेन कार्तिकव्रतजं फलम्

smaraṇaṁ ca prakartavyaṁ nāmnā niyamapūrvakam akhaṁḍitaṁ tadā tena kārtikavratajaṁ phalam

नियमपूर्वक नाम-स्मरण करना चाहिए; तब उसे कार्तिक-व्रत से उत्पन्न फल अखण्डित रूप से प्राप्त होता है।

श्लोक 46 (skanda.2.98.46)

विष्णोः शिवस्य वा कुर्यादालये हरिजागरम् । शिवविष्ण्वोर्गृहाभावे सर्वदेवालयेष्वपि

viṣṇoḥ śivasya vā kuryādālaye harijāgaram śivaviṣṇvorgṛhābhāve sarvadevālayeṣvapi

विष्णु या शिव के मन्दिर में हरि-जागरण करना चाहिए; शिव-विष्णु के मन्दिर के अभाव में किसी भी देव-मन्दिर में भी।

श्लोक 47 (skanda.2.98.47)

दुर्गाटव्यां स्थितो वाऽथ यदिवाऽऽपद्गतो भवेत् । कुर्यादश्वत्थमूले तु तुलसीनां वनेष्वपि

durgāṭavyāṁ sthito vā'tha yadivā''padgato bhavet kuryādaśvatthamūle tu tulasīnāṁ vaneṣvapi

अथवा यदि कोई दुर्गम वन में स्थित हो या आपत्ति में पड़ा हो, तो उसे अश्वत्थ वृक्ष के मूल में अथवा तुलसी के वन में भी यह करना चाहिए।

श्लोक 48 (skanda.2.98.48)

विष्णुनामप्रबंधानां गायनं विष्णुसन्निधौ । गोसहस्रप्रदानस्य फलमाप्नोति मानवः

viṣṇunāmaprabaṁdhānāṁ gāyanaṁ viṣṇusannidhau gosahasrapradānasya phalamāpnoti mānavaḥ

विष्णु के नामों से युक्त स्तोत्रों का विष्णु के समीप गान करने से मनुष्य को सहस्र गोदान का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 49 (skanda.2.98.49)

वाद्यकृत्पुरुषश्चापि वाजपेयफलं लभेत् । सर्वतीर्थावगाहोत्थं नर्तकः फलमाप्नुयात्

vādyakṛtpuruṣaścāpi vājapeyaphalaṁ labhet sarvatīrthāvagāhotthaṁ nartakaḥ phalamāpnuyāt

तथा वाद्य बजाने वाला पुरुष वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है; नर्तक को सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान करने से उत्पन्न फल प्राप्त होता है।

श्लोक 50 (skanda.2.98.50)

सर्वमेतल्लभेत्पुण्यमेतेषां द्रव्यदः पुमान् । श्रवणाद्दर्शनाद्वापि षडंशं फलमाप्नुयात्

sarvametallabhetpuṇyameteṣāṁ dravyadaḥ pumān śravaṇāddarśanādvāpi ṣaḍaṁśaṁ phalamāpnuyāt

इन सबकी सामग्री देने वाला पुरुष यह सब पुण्य प्राप्त करता है; तथा केवल सुनने या देखने वाले को भी छठा भाग फल प्राप्त होता है।

श्लोक 51 (skanda.2.98.51)

आपद्गतो यदाप्यंभो न लभेत्कुत्रचिन्नरः । व्याधितो वाथवा कुर्याद्विष्णोर्नाम्नाऽपि मार्जनम्

āpadgato yadāpyaṁbho na labhetkutracinnaraḥ vyādhito vāthavā kuryādviṣṇornāmnā'pi mārjanam

यदि आपत्ति में पड़ा मनुष्य कहीं भी जल न पा सके, अथवा रोगी हो, तो वह विष्णु के नाम से भी शुद्धि कर सकता है।

श्लोक 52 (skanda.2.98.52)

उद्यापनविधिं कर्तुमशक्तो यो व्रतस्थितः । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्व्रतसंपूर्तिहेतवे

udyāpanavidhiṁ kartumaśakto yo vratasthitaḥ brāhmaṇānbhojayetpaścādvratasaṁpūrtihetave

जो व्रती उद्यापन-विधि करने में असमर्थ हो, उसे व्रत की पूर्ति के लिए बाद में ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 53 (skanda.2.98.53)

अशक्तो दीपदानाय परदीपं प्रबोधयेत् । तस्य वा रक्षणं कुर्याद्वातादिभ्यः प्रयत्नतः

aśakto dīpadānāya paradīpaṁ prabodhayet tasya vā rakṣaṇaṁ kuryādvātādibhyaḥ prayatnataḥ

दीपदान करने में असमर्थ व्यक्ति को दूसरे के दीपक को प्रज्वलित रखना चाहिए, अथवा प्रयत्नपूर्वक उसे हवा आदि से बचाना चाहिए।

श्लोक 54 (skanda.2.98.54)

श्रीविष्णोः पूजनाऽभावे तुलसीधात्रिपूजनम् । सर्वाऽभावे व्रती कुर्याद्ब्राह्मणानां गवामपि । तस्याप्यभावे मनसि विष्णोर्नामानुकीर्तनम्

śrīviṣṇoḥ pūjanā'bhāve tulasīdhātripūjanam sarvā'bhāve vratī kuryādbrāhmaṇānāṁ gavāmapi tasyāpyabhāve manasi viṣṇornāmānukīrtanam

श्री विष्णु के पूजन के अभाव में तुलसी और धात्री का पूजन करे; सबके अभाव में व्रती ब्राह्मणों और गायों का भी पूजन करे; और उसके भी अभाव में मन में विष्णु के नाम का कीर्तन करे।

श्लोक 55 (skanda.2.98.55)

नारद उवाच । ब्रह्मन्ब्रूहि विशेषेण धर्मान्कार्तिकसंभवान्

nārada uvāca brahmanbrūhi viśeṣeṇa dharmānkārtikasaṁbhavān

नारद ने कहा — हे ब्रह्मन्, कार्तिक से उत्पन्न होने वाले धर्मों को विशेष रूप से बताइए।

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