वैष्णव खण्ड · अध्याय 97
मेरु-स्थापन, लोकपाल-तीर्थ तथा दण्डपुष्करिणी आदि तीर्थों की महिमा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.97.1)
शिव उवाच । ब्रह्मकुण्डाद्दक्षिणतो नरावासगिरिर्महान् । यत्र भगवता मेरुः स्थापितो लोकसुन्दरः ।
śiva uvāca brahmakuṇḍāddakṣiṇato narāvāsagirirmahān yatra bhagavatā meruḥ sthāpito lokasundaraḥ
शिव ने कहा — ब्रह्मकुण्ड से दक्षिण दिशा में नरावास नामक विशाल पर्वत है, जहाँ भगवान् ने लोक-सुन्दर मेरु को स्थापित किया था।
श्लोक 2 (skanda.2.97.2)
स्कन्द उवाच । कथं भगवता मेरुः स्थापितो नरसन्निधौ । महत्कौतूहलं तात कथ्यतां यदि रोचते ।
skanda uvāca kathaṁ bhagavatā meruḥ sthāpito narasannidhau mahatkautūhalaṁ tāta kathyatāṁ yadi rocate
स्कंद ने कहा — भगवान् ने नर के समीप मेरु को कैसे स्थापित किया? मुझे बड़ा कौतूहल है, हे तात; यदि आपको उचित लगे तो कहिए।
श्लोक 3 (skanda.2.97.3)
महादेव उवाच । यदा भगवतो वासो विशालायां समागतः । देवा महर्षयः सिद्धाः सविद्याधरचारणाः ।
mahādeva uvāca yadā bhagavato vāso viśālāyāṁ samāgataḥ devā maharṣayaḥ siddhāḥ savidyādharacāraṇāḥ
महादेव ने कहा — जब भगवान् का निवास विशाला में हुआ, तब देवता, महर्षिगण, सिद्ध, विद्याधर और चारण सब,
श्लोक 4 (skanda.2.97.4)
विहाय मेरुशृंगाणि भगवद्दर्शनोत्सुकाः । भगवद्दर्शनाह्लादतिरस्कृतसुरालयाः ।
vihāya meruśṛṁgāṇi bhagavaddarśanotsukāḥ bhagavaddarśanāhlādatiraskṛtasurālayāḥ
भगवान् के दर्शन की उत्सुकता में मेरु-शिखरों को त्यागकर, भगवद्दर्शन के आह्लाद से देव-लोकों को भी तुच्छ मानने लगे।
श्लोक 5 (skanda.2.97.5)
तदा तु भगवांस्तेषां सुखहेतोः षडानन । उत्पाद्य मेरुशृंगाणि करेणैकेन लीलया । स्थापयामास सर्वेषां भगवान्प्रीतिवर्द्धनः ।
tadā tu bhagavāṁsteṣāṁ sukhahetoḥ ṣaḍānana utpādya meruśṛṁgāṇi kareṇaikena līlayā sthāpayāmāsa sarveṣāṁ bhagavānprītivarddhanaḥ
तब हे षडानन, उनके सुख के लिए भगवान् ने एक ही हाथ से लीलापूर्वक मेरु-शिखरों को उठाकर, सबकी प्रीति बढ़ाने वाले भगवान् ने उन्हें वहीं स्थापित कर दिया।
श्लोक 6 (skanda.2.97.6)
ततः सर्वे समालोक्य गिरिं कांचननिर्मितम् । प्रसन्नास्तुष्टुवुः सर्वे नारायणमनामयम् ।
tataḥ sarve samālokya giriṁ kāṁcananirmitam prasannāstuṣṭuvuḥ sarve nārāyaṇamanāmayam
तब सबने स्वर्ण-निर्मित उस पर्वत को देखकर प्रसन्न होकर निर्दोष नारायण की स्तुति की।
श्लोक 7 (skanda.2.97.7)
देवा ऊचुः । योस्मत्सुखाय भवविश्रमणाय बिभ्रल्लीलातनूः कनकशैलमिहानिनाय । जेता सुरार्द्दनशतं त्रिदशैकपक्षस्तस्मै विधेम नम उग्रतपःश्रियाय ।
devā ūcuḥ yosmatsukhāya bhavaviśramaṇāya bibhrallīlātanūḥ kanakaśailamihānināya jetā surārddanaśataṁ tridaśaikapakṣastasmai vidhema nama ugratapaḥśriyāya
देवताओं ने कहा — जो हमारे सुख के लिए और संसार से विश्राम के लिए लीला-शरीर धारण कर इस स्वर्ण-पर्वत को यहाँ ले आए, जो सैकड़ों देव-शत्रुओं के विजेता तथा त्रिदेवों के एकमात्र सहायक हैं — उन उग्र तप-श्री वाले भगवान् को हम नमस्कार करते हैं।
श्लोक 8 (skanda.2.97.8)
यद्यत्करोति कृपया कृपणार्तितूलशैलाग्निराश्रितकृदेकविदां वरिष्ठः । स्वेनैव तेन करणेन स तुष्यतां नो यस्यान्वकारि पुरुषेण न केनचिद्वै ।
yadyatkaroti kṛpayā kṛpaṇārtitūlaśailāgnirāśritakṛdekavidāṁ variṣṭhaḥ svenaiva tena karaṇena sa tuṣyatāṁ no yasyānvakāri puruṣeṇa na kenacidvai
जो कुछ भी वे कृपावश करते हैं — जो दीनों की पीड़ा-रूपी रुई-पर्वत के लिए अग्नि हैं, अपने आश्रितों को अपना बनाने में सर्वश्रेष्ठ जानकार हैं — वे अपने ही उस कार्य से हम पर प्रसन्न हों, जिनका अनुकरण किसी भी पुरुष ने कभी नहीं किया।
श्लोक 9 (skanda.2.97.9)
अस्माकमुन्नतधियां विदधाति सम्यक्छिक्षां पितेव करुणो निजलाभपूर्णः । त्रैलोक्यरक्षणविचक्षणदृष्टिपातपूर्णामृतांबुधिरसौ विपदः प्रपायात् ।
asmākamunnatadhiyāṁ vidadhāti samyakchikṣāṁ piteva karuṇo nijalābhapūrṇaḥ trailokyarakṣaṇavicakṣaṇadṛṣṭipātapūrṇāmṛtāṁbudhirasau vipadaḥ prapāyāt
वे पिता के समान करुणामय, स्वयं परिपूर्ण, अपनी उन्नत बुद्धि समझने वाले हम पर सम्यक् शिक्षा देते हैं; त्रिलोक की रक्षा में निपुण उनकी दृष्टि का पात अमृत के सागर के समान है — वे हमारी विपत्तियों को पी जाएँ।
श्लोक 10 (skanda.2.97.10)
ऋषय ऊचुः । येनाध्यस्तं भाति समस्तं जगदेकं क्रीडाभांडं सत्यतयाऽजस्य विभूम्नः । भानां वृदं यद्वदनेप्याश्रितमूर्तिस्तस्मै नित्यं शाश्वत तुभ्यं प्रणमाम ।
ṛṣaya ūcuḥ yenādhyastaṁ bhāti samastaṁ jagadekaṁ krīḍābhāṁḍaṁ satyatayā'jasya vibhūmnaḥ bhānāṁ vṛdaṁ yadvadanepyāśritamūrtistasmai nityaṁ śāśvata tubhyaṁ praṇamāma
ऋषियों ने कहा — जिनके आश्रय से यह सम्पूर्ण एक जगत्, अजन्मा और सर्वव्यापी की सत्यता से, मानो एक क्रीड़ा-पात्र के समान भासित होता है, जिनका आश्रित रूप उनके मुख में भी ज्योतियों के समूह के रूप में विद्यमान है — उन नित्य, शाश्वत आपको हम सदा प्रणाम करते हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.97.11)
सिद्धा ऊचुः । यत्कृपालवत एव महांतः सिद्धिमीयुरितरे भवभाजः । तेऽचिरेण भवभीमपयोधिं तीर्णवंत इति नः सुमनीषा ।
siddhā ūcuḥ yatkṛpālavata eva mahāṁtaḥ siddhimīyuritare bhavabhājaḥ te'cireṇa bhavabhīmapayodhiṁ tīrṇavaṁta iti naḥ sumanīṣā
सिद्धों ने कहा — जिनकी कृपा से ही महान् पुरुष सिद्धि को प्राप्त हुए, जबकि अन्य लोग संसार में ही बँधे रह गए; कि वे शीघ्र ही संसार के भयंकर सागर को पार कर गए — यही हमारी सुदृढ़ धारणा है।
श्लोक 12 (skanda.2.97.12)
विद्याधरा ऊचुः । विभो सद्गुणग्राम कल्याणमूर्ते परेशान संमानसंतानहेतो । भवत्पादपद्मासवस्वादमत्ताः कृतार्था न चित्रं भवत्यत्र किंचित् ।
vidyādharā ūcuḥ vibho sadguṇagrāma kalyāṇamūrte pareśāna saṁmānasaṁtānaheto bhavatpādapadmāsavasvādamattāḥ kṛtārthā na citraṁ bhavatyatra kiṁcit
विद्याधरों ने कहा — हे विभो, सद्गुणों के समूह, कल्याण-स्वरूप, परमेश्वर, सम्मान की परम्परा के हेतु — आपके चरण-कमलों के मकरन्द के आस्वादन से उन्मत्त होकर हम कृतार्थ हो गए हैं; अब यहाँ कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं रहा।
श्लोक 13 (skanda.2.97.13)
ततस्तुष्टोऽथ भगवांस्तेषामासीद्दिवौकसाम् । वरं वृणुध्वमित्युक्तास्ते प्रोचुर्वरदर्षभम् ।
tatastuṣṭo'tha bhagavāṁsteṣāmāsīddivaukasām varaṁ vṛṇudhvamityuktāste procurvaradarṣabham
तब उन स्वर्गवासियों पर भगवान् प्रसन्न हुए; 'वर माँगो' — ऐसा कहे जाने पर उन्होंने वरदाताओं में श्रेष्ठ से कहा।
श्लोक 14 (skanda.2.97.14)
परितुष्टो भवान्साक्षाद्देवदेवो रमापतिः । बदरी न त्वया त्याज्या न च मेरुः कदाचन ।
parituṣṭo bhavānsākṣāddevadevo ramāpatiḥ badarī na tvayā tyājyā na ca meruḥ kadācana
'यदि आप, साक्षात् देवों के देव, रमापति, हम पर प्रसन्न हैं, तो आप कभी न बदरी को त्यागें, न मेरु को।'
श्लोक 15 (skanda.2.97.15)
मेरुशृंगं प्रपश्यंति ये जनाः पुण्यभागिनः । तेषां वै त्वत्प्रसादेन मेरौ वासः प्रजायताम् ।
meruśṛṁgaṁ prapaśyaṁti ye janāḥ puṇyabhāginaḥ teṣāṁ vai tvatprasādena merau vāsaḥ prajāyatām
'जो पुण्यवान् लोग मेरु-शिखर का दर्शन करते हैं, उन्हें आपकी कृपा से मेरु पर ही निवास प्राप्त हो।'
श्लोक 16 (skanda.2.97.16)
तत्र भुक्त्वा चिराद्भोगान्भूयादन्ते लयस्त्वयि । एवमस्त्विति चाभाष्य तत्रैवांतर्हितो हरिः ।
tatra bhuktvā cirādbhogānbhūyādante layastvayi evamastviti cābhāṣya tatraivāṁtarhito hariḥ
'वहाँ दीर्घकाल तक भोगों को भोगकर, अन्त में हमारा आप में ही लय हो।' — 'ऐसा ही हो' कहकर हरि वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 17 (skanda.2.97.17)
ततः प्रभृति ते सर्वे मेरुशृंगविहारिणः । नरनारायणस्यांते पाल्यमाना मुहुर्मुहुः ।
tataḥ prabhṛti te sarve meruśṛṁgavihāriṇaḥ naranārāyaṇasyāṁte pālyamānā muhurmuhuḥ
तब से वे सभी मेरु-शिखर पर विहार करने वाले हुए, नर-नारायण के समीप बार-बार संरक्षित होते हुए।
श्लोक 18 (skanda.2.97.18)
कदाचिद्दिवि तिष्ठंति कदाचिन्मेरुमध्यतः । निर्विशंका निरुद्वेगा ऋषयश्च तपोधनाः ।
kadāciddivi tiṣṭhaṁti kadācinmerumadhyataḥ nirviśaṁkā nirudvegā ṛṣayaśca tapodhanāḥ
वे कभी स्वर्ग में रहते हैं, कभी मेरु के मध्य में — निःशंक और निरुद्वेग होकर, तपोधन ऋषिगण भी इसी प्रकार रहते हैं।
श्लोक 19 (skanda.2.97.19)
भगवानपि तत्रैव नररूपेण तिष्ठति । धनुर्बाणधरः श्रीमांस्तपसा पावकोपमः । आनंदमृषिवृंदस्य जनयंस्तप आस्थितः ।
bhagavānapi tatraiva nararūpeṇa tiṣṭhati dhanurbāṇadharaḥ śrīmāṁstapasā pāvakopamaḥ ānaṁdamṛṣivṛṁdasya janayaṁstapa āsthitaḥ
भगवान् भी वहीं नर के रूप में विराजमान हैं, धनुष-बाण धारण किए, तेजस्वी, तप से अग्नि के समान; वे ऋषि-समूह को आनन्द देते हुए तप में स्थित हैं।
श्लोक 20 (skanda.2.97.20)
ततस्तु परमं तीर्थं लोकपालाभिवंदितम् । यत्र संस्थापयामास लोकपालान्हरिः स्वयम् ।
tatastu paramaṁ tīrthaṁ lokapālābhivaṁditam yatra saṁsthāpayāmāsa lokapālānhariḥ svayam
फिर वहाँ लोकपालों द्वारा वन्दित परम तीर्थ है, जहाँ हरि ने स्वयं लोकपालों को स्थापित किया।
श्लोक 21 (skanda.2.97.21)
स्कंद उवाच । कथं भगवता तत्र लोकपालाश्च स्थापिताः । महत्कौतूहलं तात कथयस्व महामते ।
skaṁda uvāca kathaṁ bhagavatā tatra lokapālāśca sthāpitāḥ mahatkautūhalaṁ tāta kathayasva mahāmate
स्कंद ने कहा — भगवान् ने वहाँ लोकपालों को कैसे स्थापित किया? हे महामते तात, मुझे बड़ा कौतूहल है; कृपया कहिए।
श्लोक 22 (skanda.2.97.22)
शिव उवाच । एकदा मेरुमध्यस्थाश्रयानिह हरन्हरिः । देवानामृषिमुख्यानां चरितं द्रष्टुमुद्यतः ।
śiva uvāca ekadā merumadhyasthāśrayāniha haranhariḥ devānāmṛṣimukhyānāṁ caritaṁ draṣṭumudyataḥ
शिव ने कहा — एक बार मेरु के मध्य स्थित आश्रयों में विचरण करते हुए हरि, देवताओं और श्रेष्ठ ऋषियों के आचरण को देखने के लिए उद्यत हुए।
श्लोक 23 (skanda.2.97.23)
तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय नमस्कृत्य दिवौकसः । ऊचुस्ते विनयात्सर्वे प्रसीद भगवन्विभो ।
taṁ dṛṣṭvā sahasotthāya namaskṛtya divaukasaḥ ūcuste vinayātsarve prasīda bhagavanvibho
उन्हें देखकर स्वर्गवासी सहसा उठकर, नमस्कार करके, सबने विनयपूर्वक कहा — 'हे भगवन्, हे विभो, प्रसन्न होइए।'
श्लोक 24 (skanda.2.97.24)
क्षणं विश्राम्य विधिवद्दृष्ट्वा तां विरलां भुवम् । सान्निध्यमृषिदेवानामयुक्तं भावयन्मिथः ।
kṣaṇaṁ viśrāmya vidhivaddṛṣṭvā tāṁ viralāṁ bhuvam sānnidhyamṛṣidevānāmayuktaṁ bhāvayanmithaḥ
क्षणभर विश्राम कर, उस एकान्त भूमि को विधिपूर्वक देखकर, उन्होंने मन-ही-मन विचार किया कि ऋषियों और देवताओं की यह सन्निधि उचित नहीं है।
श्लोक 25 (skanda.2.97.25)
ततः प्रहस्य भगवानुवाच मधुसूदनः । लोकपालान्समाहूय नात्र स्थेयं भवद्विधैः ।
tataḥ prahasya bhagavānuvāca madhusūdanaḥ lokapālānsamāhūya nātra stheyaṁ bhavadvidhaiḥ
तब हँसकर भगवान् मधुसूदन ने लोकपालों को बुलाकर कहा — 'तुम्हारे जैसों को यहाँ नहीं रहना चाहिए।'
श्लोक 26 (skanda.2.97.26)
ऋषयस्तापसाः सिद्धाः सस्त्रीका निवसंति हि । भवद्विधानामास्थानं पुरेव कल्पितं मया ।
ṛṣayastāpasāḥ siddhāḥ sastrīkā nivasaṁti hi bhavadvidhānāmāsthānaṁ pureva kalpitaṁ mayā
'यहाँ ऋषि, तपस्वी और सिद्ध अपनी पत्नियों सहित निवास करते हैं; तुम्हारे जैसों के लिए मैंने पहले से ही एक स्थान तैयार कर रखा है।'
श्लोक 27 (skanda.2.97.27)
ततः स त्वरितो गत्वा रम्ये गिरिवरे हरिः । लोकपालान्समाहूय स्थापयामास तान्गुह ।
tataḥ sa tvarito gatvā ramye girivare hariḥ lokapālānsamāhūya sthāpayāmāsa tānguha
तब हरि तुरन्त एक रमणीय श्रेष्ठ पर्वत पर जाकर, हे गुह, लोकपालों को बुलाकर वहाँ स्थापित किया।
श्लोक 28 (skanda.2.97.28)
तत्रैव शैलदंडेन हत्वाग्निं जलकांक्षया । क्रीडापुष्करणीं तेषां निर्ममे सुमनोहराम ।
tatraiva śailadaṁḍena hatvāgniṁ jalakāṁkṣayā krīḍāpuṣkaraṇīṁ teṣāṁ nirmame sumanoharāma
वहीं जल की कामना से पर्वत के दण्ड से आघात कर, उनके लिए अत्यन्त मनोहर एक क्रीड़ा-पुष्करिणी का निर्माण किया।
श्लोक 29 (skanda.2.97.29)
सस्त्रीका यत्र गीर्वाणा विचरंति निजेच्छया । गायंति स्वनुमोदंति गंधर्वास्त्रिदिवौकसाम् ।
sastrīkā yatra gīrvāṇā vicaraṁti nijecchayā gāyaṁti svanumodaṁti gaṁdharvāstridivaukasām
जहाँ देवगण अपनी पत्नियों सहित इच्छानुसार विचरण करते हैं; गन्धर्व गाते हैं और स्वर्गवासियों का अनुमोदन करते हैं।
श्लोक 30 (skanda.2.97.30)
वनानि कुसुमामोदरम्याणि परितोषतः । दिनानि यत्र गच्छंति क्षणप्रायाणि देहिनाम् ।
vanāni kusumāmodaramyāṇi paritoṣataḥ dināni yatra gacchaṁti kṣaṇaprāyāṇi dehinām
पुष्पों की सुगन्ध से मनोहर वन, अपने संतोष के कारण, वहाँ प्राणियों के लिए दिन क्षणों के समान बीत जाते हैं।
श्लोक 31 (skanda.2.97.31)
भगवानपि तत्रैव तेषामानंदमावहन् । द्वादश्यां पौर्णमास्यां च स्वयमायाति मज्जने ।
bhagavānapi tatraiva teṣāmānaṁdamāvahan dvādaśyāṁ paurṇamāsyāṁ ca svayamāyāti majjane
भगवान् भी वहाँ उन्हें आनन्दित करते हुए, द्वादशी और पूर्णिमा को स्वयं स्नान करने आते हैं।
श्लोक 32 (skanda.2.97.32)
तत्पश्चादृषयः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः । यत्र स्नात्वा विधानेन गुह मध्याह्नकालतः । असंगं परमं ज्योतिर्जले पश्यंति चक्षुषा ।
tatpaścādṛṣayaḥ sarve munayaśca tapodhanāḥ yatra snātvā vidhānena guha madhyāhnakālataḥ asaṁgaṁ paramaṁ jyotirjale paśyaṁti cakṣuṣā
उनके पश्चात् सभी ऋषि और तपोधन मुनि, हे गुह, मध्याह्न से विधिपूर्वक वहाँ स्नान करके, जल में अपनी आँखों से उस अनासक्त परम ज्योति का दर्शन करते हैं।
श्लोक 33 (skanda.2.97.33)
सर्वतीर्थावगाहेन यत्फलं परिकीर्तितम् । तत्फलं तत्क्षणादेव दण्डपुष्करिणीक्षणात् ।
sarvatīrthāvagāhena yatphalaṁ parikīrtitam tatphalaṁ tatkṣaṇādeva daṇḍapuṣkariṇīkṣaṇāt
समस्त तीर्थों में स्नान करने से जो फल कहा गया है, वही फल यहाँ दण्डपुष्करिणी के दर्शन-मात्र से तत्काल प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 34 (skanda.2.97.34)
यत्र काम्यानि कर्माणि सफलानि मनीषिणाम् । यत्र पिंडप्रदानेन गयातोऽष्टगुणं फलम् ।
yatra kāmyāni karmāṇi saphalāni manīṣiṇām yatra piṁḍapradānena gayāto'ṣṭaguṇaṁ phalam
यहाँ बुद्धिमानों की काम्य क्रियाएँ सफल होती हैं; यहाँ पिण्डदान से गया से आठ गुना फल प्राप्त होता है।
श्लोक 35 (skanda.2.97.35)
यज्ञो दानं तपः कर्म सर्वमक्षयमुच्यते । द्वादश्यां शुक्लपक्षस्य ज्येष्ठे मासि षडानन ।
yajño dānaṁ tapaḥ karma sarvamakṣayamucyate dvādaśyāṁ śuklapakṣasya jyeṣṭhe māsi ṣaḍānana
यज्ञ, दान, तप — सब कर्म वहाँ अक्षय कहे गए हैं, विशेषतः हे षडानन, ज्येष्ठ मास की शुक्ल द्वादशी को।
श्लोक 36 (skanda.2.97.36)
तत्र स्नात्वा विधानेन कृतकृत्यो भवेद्यतः । बदरीतीर्थमध्ये तु गुप्तमेतत्सुरोत्तमैः । न वाच्यं यत्र कुत्रापि तव प्रीत्या मयोदितम् ।
tatra snātvā vidhānena kṛtakṛtyo bhavedyataḥ badarītīrthamadhye tu guptametatsurottamaiḥ na vācyaṁ yatra kutrāpi tava prītyā mayoditam
वहाँ विधिपूर्वक स्नान करने से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है; परन्तु बदरी-तीर्थों के मध्य यह देवश्रेष्ठों द्वारा गुप्त रखा गया है — यह कहीं भी न कहा जाए; मैंने तुम्हारे प्रति स्नेहवश ही इसे कहा है।
श्लोक 37 (skanda.2.97.37)
वक्तव्यं किमिह बहु प्रभूतपुण्याः पश्यंति प्रथितमिदं सुरैकगुप्तम् । नान्येषां कथमपि चेतसि प्रसंगाद्देवैः स्यादनुदिनचिंतितं गुहैतत् ।
vaktavyaṁ kimiha bahu prabhūtapuṇyāḥ paśyaṁti prathitamidaṁ suraikaguptam nānyeṣāṁ kathamapi cetasi prasaṁgāddevaiḥ syādanudinaciṁtitaṁ guhaitat
यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? यह प्रसिद्ध किन्तु देवताओं द्वारा ही गुप्त रखा गया स्थान केवल अत्यन्त पुण्यवान् ही देख पाते हैं; प्रसंगवश भी यह अन्य किसी के चित्त में कभी नहीं आता — यह देवताओं द्वारा प्रतिदिन चिन्तित रहने वाला रहस्य है।
श्लोक 38 (skanda.2.97.38)
येषां वै भगवति चेत्समग्रकर्म स्वाध्यायाभ्यसनविधिक्रमेण जातम् । पश्यंति त्रिभुवनदुर्ल्लभं सुतीर्थं दंडोदं न भवति चान्यथा सुदृष्टम् ।
yeṣāṁ vai bhagavati cetsamagrakarma svādhyāyābhyasanavidhikrameṇa jātam paśyaṁti tribhuvanadurllabhaṁ sutīrthaṁ daṁḍodaṁ na bhavati cānyathā sudṛṣṭam
जिनका समस्त कर्म स्वाध्याय और अभ्यास की विधि के क्रम से भगवान् के प्रति समर्पित हो गया है, वे ही तीनों लोकों में दुर्लभ इस उत्तम दण्डोदक तीर्थ का दर्शन करते हैं; अन्यथा यह किसी को सम्यक् दिखाई नहीं देता।
श्लोक 39 (skanda.2.97.39)
दंडोदकात्परं तीर्थं न विष्णोः सदृशोऽमरः । विशालासदृशं क्षेत्रं न भूतं न भविष्यति ।
daṁḍodakātparaṁ tīrthaṁ na viṣṇoḥ sadṛśo'maraḥ viśālāsadṛśaṁ kṣetraṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati
दण्डोदक से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान कोई देव नहीं; विशाला के समान कोई क्षेत्र न कभी हुआ है, न होगा।
श्लोक 40 (skanda.2.97.40)
सेवनीया प्रयत्नेन विशाला च विचक्षणैः । य इच्छेत्सततं धाम भगवत्पार्श्ववर्ति वै ।
sevanīyā prayatnena viśālā ca vicakṣaṇaiḥ ya icchetsatataṁ dhāma bhagavatpārśvavarti vai
जो व्यक्ति सदैव भगवान् के समीप स्थित धाम की इच्छा रखता है, उसे विचक्षण पुरुषों को चाहिए कि वे प्रयत्नपूर्वक विशाला की सेवा करें।
श्लोक 41 (skanda.2.97.41)
स्कंद उवाच । गंगामाश्रित्य तीर्थानि कानि संतीह सत्पदे । श्रेयस्कराणि भूरीणि संक्षेपात्तानि मे वद ।
skaṁda uvāca gaṁgāmāśritya tīrthāni kāni saṁtīha satpade śreyaskarāṇi bhūrīṇi saṁkṣepāttāni me vada
स्कंद ने कहा — इस पवित्र स्थान में गंगा के आश्रित कौन-कौन से कल्याणकारी तीर्थ हैं? कृपया मुझे संक्षेप में उन्हें बताइए।
श्लोक 42 (skanda.2.97.42)
महादेव उवाच । गंगायां यत्र संयोगो मानसोद्भेदसन्निधौ । तत्तीर्थं विमलं पुण्यं प्रयागादधिकं महत् ।
mahādeva uvāca gaṁgāyāṁ yatra saṁyogo mānasodbhedasannidhau tattīrthaṁ vimalaṁ puṇyaṁ prayāgādadhikaṁ mahat
महादेव ने कहा — जहाँ गंगा का मानसोद्भेद के समीप संगम होता है, वह निर्मल पुण्य तीर्थ प्रयाग से भी बढ़कर महान् है।
श्लोक 43 (skanda.2.97.43)
त्रिंशद्वर्षसहस्राणि वायुभोजनतो भवेत् । तत्फलं स्नानमात्रेण गंगायाः संगमे नृणाम् ।
triṁśadvarṣasahasrāṇi vāyubhojanato bhavet tatphalaṁ snānamātreṇa gaṁgāyāḥ saṁgame nṛṇām
तीस हजार वर्षों तक वायु का ही भोजन करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल मनुष्यों को गंगा के इस संगम में केवल स्नान करने से प्राप्त होता है।
श्लोक 44 (skanda.2.97.44)
संगमाद्दक्षिणे भागे धर्मक्षेत्रं प्रकीर्तितम् । यत्र मूर्त्या श्रुतौ जातौ नरनारायणावृषी ।
saṁgamāddakṣiṇe bhāge dharmakṣetraṁ prakīrtitam yatra mūrtyā śrutau jātau naranārāyaṇāvṛṣī
संगम के दक्षिण भाग में धर्मक्षेत्र नामक स्थान प्रसिद्ध है, जहाँ श्रुति के अनुसार धर्म की पत्नी मूर्ति से नर और नारायण ऋषि उत्पन्न हुए थे।
श्लोक 45 (skanda.2.97.45)
तत्क्षेत्रं पावनं मर्त्ये सर्वेषामुत्तमोत्तमम् । धर्मस्तत्रैव भगवांश्चतुष्पादवतिष्ठति ।
tatkṣetraṁ pāvanaṁ martye sarveṣāmuttamottamam dharmastatraiva bhagavāṁścatuṣpādavatiṣṭhati
वह क्षेत्र मृत्युलोक में सबसे उत्तम और पवित्र है; वहाँ भगवान् धर्म स्वयं अपने चारों चरणों सहित स्थित रहते हैं।
श्लोक 46 (skanda.2.97.46)
यत्र यज्ञास्तपो दानं यत्किंचित्क्रियते नृभिः । तत्पुण्यस्य क्षयो नास्ति कल्पकोटिशतैरपि ।
yatra yajñāstapo dānaṁ yatkiṁcitkriyate nṛbhiḥ tatpuṇyasya kṣayo nāsti kalpakoṭiśatairapi
वहाँ मनुष्यों द्वारा किया गया जो भी यज्ञ, तप या दान हो, उसके पुण्य का क्षय सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी नहीं होता।
श्लोक 47 (skanda.2.97.47)
ततो दक्षिणदिग्भाग उर्वशी संगमाभिधम् । सर्वपापहरं पुंसां स्नानमात्रेण देहिनाम् ।
tato dakṣiṇadigbhāga urvaśī saṁgamābhidham sarvapāpaharaṁ puṁsāṁ snānamātreṇa dehinām
फिर दक्षिण दिशा में उर्वशी-संगम नामक तीर्थ है, जो देहधारी मनुष्यों के समस्त पापों को केवल स्नान से हर लेता है।
श्लोक 48 (skanda.2.97.48)
कूर्मोद्धारस्ततः साक्षाद्धरिभक्त्येकसाधनम् । स्नानमात्रेण भूतानां सत्त्वशुद्धिः प्रजायते ।
kūrmoddhārastataḥ sākṣāddharibhaktyekasādhanam snānamātreṇa bhūtānāṁ sattvaśuddhiḥ prajāyate
फिर साक्षात् कूर्मोद्धार तीर्थ है, जो हरि-भक्ति का एकमात्र साधन है; वहाँ स्नान करने मात्र से प्राणियों की सत्त्व-शुद्धि हो जाती है।
श्लोक 49 (skanda.2.97.49)
ब्रह्मावर्त्तस्ततः साक्षाद्ब्रह्मलोकैककारणम् । दर्शनादेव तीर्थस्य सर्वपापक्षयो भवेत् ।
brahmāvarttastataḥ sākṣādbrahmalokaikakāraṇam darśanādeva tīrthasya sarvapāpakṣayo bhavet
फिर साक्षात् ब्रह्मावर्त तीर्थ है, जो ब्रह्मलोक की प्राप्ति का एकमात्र कारण है; इस तीर्थ के दर्शन-मात्र से समस्त पापों का नाश हो जाता है।
श्लोक 50 (skanda.2.97.50)
बहूनि संति तीर्थानि दुर्गम्यानीह देहिनाम् । संक्षेपात्कथितं वत्स तवादरवशादिदम् ।
bahūni saṁti tīrthāni durgamyānīha dehinām saṁkṣepātkathitaṁ vatsa tavādaravaśādidam
यहाँ देहधारियों के लिए दुर्गम बहुत-से तीर्थ हैं; हे पुत्र, तुम्हारे आदर के कारण मैंने यह संक्षेप में कहा है।
श्लोक 51 (skanda.2.97.51)
य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वा समाहितः । सर्वपापविनिर्मुक्तः पदं विष्णोः प्रपद्यते ।
ya idaṁ śṛṇuyānnityaṁ śrāvayedvā samāhitaḥ sarvapāpavinirmuktaḥ padaṁ viṣṇoḥ prapadyate
जो इसे नित्य सुनता है, अथवा समाहित-चित्त होकर दूसरों को सुनाता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 52 (skanda.2.97.52)
राजा विजयमाप्नोति सुतार्थी लभते सुतम् । कन्यार्थी लभते कन्यां कन्या विंदति सत्पतिम् ।
rājā vijayamāpnoti sutārthī labhate sutam kanyārthī labhate kanyāṁ kanyā viṁdati satpatim
राजा विजय प्राप्त करता है, पुत्र चाहने वाला पुत्र पाता है, कन्या चाहने वाला कन्या पाता है, और कन्या सुयोग्य पति पाती है।
श्लोक 53 (skanda.2.97.53)
धनार्थी धनमाप्नोति सर्वकामैकसाधनम् ।
dhanārthī dhanamāpnoti sarvakāmaikasādhanam
धन चाहने वाला धन पाता है — यह समस्त कामनाओं की सिद्धि का एकमात्र साधन है।
श्लोक 54 (skanda.2.97.54)
मासमात्रं नरो भक्त्या शृणुयाद्यः समाहितः । तस्याभीष्टसमावाप्तिर्दुर्लभोपि न संशयः ।
māsamātraṁ naro bhaktyā śṛṇuyādyaḥ samāhitaḥ tasyābhīṣṭasamāvāptirdurlabhopi na saṁśayaḥ
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक, समाहित-चित्त होकर केवल एक मास तक इसे सुनता है, उसके अभीष्ट की प्राप्ति, चाहे वह दुर्लभ ही क्यों न हो, निश्चित है — इसमें संशय नहीं।
श्लोक 55 (skanda.2.97.55)
आधिव्याधिभयं घोरं दारिद्र्य कलहं तथा । यस्य गेहेषु माहात्म्यं तत्रैतानि न कर्हिचित् ।
ādhivyādhibhayaṁ ghoraṁ dāridrya kalahaṁ tathā yasya geheṣu māhātmyaṁ tatraitāni na karhicit
मानसिक व्याधि, रोग, भयंकर भय, दरिद्रता तथा कलह — जिस घर में इसकी महिमा हो, वहाँ ये कभी नहीं होते।
श्लोक 56 (skanda.2.97.56)
नापमृत्युर्न सर्पादि दौर्भाग्यं चापि वर्तते । दुःस्वप्नग्रहपीडा च परराष्ट्रभयं तथा ।
nāpamṛtyurna sarpādi daurbhāgyaṁ cāpi vartate duḥsvapnagrahapīḍā ca pararāṣṭrabhayaṁ tathā
न अकाल मृत्यु होती है, न सर्प आदि का भय, न दुर्भाग्य; न दुःस्वप्न और ग्रह-पीड़ा होती है, न शत्रु-राष्ट्र का भय।
श्लोक 57 (skanda.2.97.57)
युद्धे यात्राप्रयाणे च पठनीयं प्रयत्नतः । विवाहे च विवादे च शुभकर्मणि यत्नतः ।
yuddhe yātrāprayāṇe ca paṭhanīyaṁ prayatnataḥ vivāhe ca vivāde ca śubhakarmaṇi yatnataḥ
युद्ध में, यात्रा-प्रस्थान में, विवाह में, विवाद में और हर शुभ कार्य में इसे प्रयत्नपूर्वक पढ़ना चाहिए।
श्लोक 58 (skanda.2.97.58)
पूर्णं वाऽध्यायमात्रं वा तदर्धं वा विचक्षणैः । सर्वकार्यप्रसिद्धिः स्यान्नात्र कार्या विचारणा ।
pūrṇaṁ vā'dhyāyamātraṁ vā tadardhaṁ vā vicakṣaṇaiḥ sarvakāryaprasiddhiḥ syānnātra kāryā vicāraṇā
चाहे सम्पूर्ण अध्याय हो, चाहे केवल आधा — बुद्धिमानों द्वारा पढ़े जाने पर समस्त कार्यों की सिद्धि निश्चित होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।