वैष्णव खण्ड · अध्याय 96
सोमकुण्ड, पञ्चधारा तीर्थ तथा उर्वशी-तीर्थ की महिमा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.96.1)
शिव उवाच । ततो नैर्ऋत्यदिग्भागे पंचधाराः पतंत्यधः । प्रभासं पुष्करं चैव गयां नैमिषमेव च । कुरुक्षेत्रं विजानीहि द्रवरूपं षडानन ।
śiva uvāca tato nairṛtyadigbhāge paṁcadhārāḥ pataṁtyadhaḥ prabhāsaṁ puṣkaraṁ caiva gayāṁ naimiṣameva ca kurukṣetraṁ vijānīhi dravarūpaṁ ṣaḍānana
शिव ने कहा — हे षडानन, उसके पश्चात् नैर्ऋत्य दिशा में पाँच धाराएँ नीचे गिरती हैं — प्रभास, पुष्कर, गया, नैमिष और कुरुक्षेत्र को वहाँ द्रव-रूप में जानो।
श्लोक 2 (skanda.2.96.2)
पुरा ते ब्रह्मणः स्थानं गता मलिनरूपिणः । पापिनां पापदोषेण विकृताः कृतबुद्धयः ।
purā te brahmaṇaḥ sthānaṁ gatā malinarūpiṇaḥ pāpināṁ pāpadoṣeṇa vikṛtāḥ kṛtabuddhayaḥ
प्राचीन काल में वे पापियों के पाप-दोष से मलिन-रूप और विकृत-बुद्धि होकर ब्रह्मा के स्थान को गए।
श्लोक 3 (skanda.2.96.3)
तत्र गत्वा नमस्कृत्य ब्रह्माणं लोकभावनम् । ऊचुः प्रांजलयः सर्वे निजागमनकारणम् ।
tatra gatvā namaskṛtya brahmāṇaṁ lokabhāvanam ūcuḥ prāṁjalayaḥ sarve nijāgamanakāraṇam
वहाँ जाकर, लोकों का भरण-पोषण करने वाले ब्रह्मा को प्रणाम करके, सब ने हाथ जोड़कर अपने आगमन का कारण बताया।
श्लोक 4 (skanda.2.96.4)
तच्छ्रुत्वा ध्यानमालंब्य प्रहस्य जगदीश्वरः । उवाच वचनं चारु स्मृत्वा बदरीकाश्रमम् ।
tacchrutvā dhyānamālaṁbya prahasya jagadīśvaraḥ uvāca vacanaṁ cāru smṛtvā badarīkāśramam
यह सुनकर, ध्यान का आश्रय लेकर, मुस्कुराते हुए जगदीश्वर ने बदरिकाश्रम का स्मरण करके मधुर वचन कहे।
श्लोक 5 (skanda.2.96.5)
मा भैष्ट गच्छत क्षिप्रं हरेर्बदरिकाश्रमम् । यस्य निर्देशमात्रेण सद्यः पुण्यं भविष्यति ।
mā bhaiṣṭa gacchata kṣipraṁ harerbadarikāśramam yasya nirdeśamātreṇa sadyaḥ puṇyaṁ bhaviṣyati
'भयभीत मत हो, शीघ्र ही हरि के बदरिकाश्रम को जाओ; जिसके नाम-मात्र के उच्चारण से तत्काल पुण्य प्राप्त होगा।'
श्लोक 6 (skanda.2.96.6)
ततस्ते हर्षवेगेन नमस्कृत्य पितामहम् । जग्मुरुत्फुल्लनयना विशालाममितप्रभाम् ।
tataste harṣavegena namaskṛtya pitāmaham jagmurutphullanayanā viśālāmamitaprabhām
तब वे हर्ष के वेग से पितामह को नमस्कार करके, प्रफुल्लित नेत्रों से अपार प्रभा वाली विशाला को गए।
श्लोक 7 (skanda.2.96.7)
यस्य निर्वेशमात्रेण तत्क्षणाद्विगतेनसः । ततो द्विरूपमास्थाय स्वस्थानं ययुरुत्सुकाः ।
yasya nirveśamātreṇa tatkṣaṇādvigatenasaḥ tato dvirūpamāsthāya svasthānaṁ yayurutsukāḥ
जिसमें प्रवेश करते ही वे तत्काल अपने दोष से मुक्त हो गए; तब वे दो रूप धारण कर उत्सुकतापूर्वक अपने-अपने स्थान को चले गए।
श्लोक 8 (skanda.2.96.8)
द्रवरूपेण चान्येन पंच तिष्ठंति निर्मलाः । तेषु स्नात्वा विधानेन कृत्वा नित्यक्रियां शुचिः ।
dravarūpeṇa cānyena paṁca tiṣṭhaṁti nirmalāḥ teṣu snātvā vidhānena kṛtvā nityakriyāṁ śuciḥ
दूसरे द्रव-रूप में वे पाँचों निर्मल होकर वहीं स्थित रहते हैं; उनमें विधिपूर्वक स्नान करके, नित्य-क्रिया करके, शुद्ध होकर,
श्लोक 9 (skanda.2.96.9)
तत्तत्तीर्थफलं लब्ध्वा यात्यंते परमं पदम् । पंचोपवास निरतः पूजयित्वा जनार्दनम् ।
tattattīrthaphalaṁ labdhvā yātyaṁte paramaṁ padam paṁcopavāsa nirataḥ pūjayitvā janārdanam
उन-उन तीर्थों का फल प्राप्त कर, पाँच दिन के उपवास में तत्पर रहकर और जनार्दन की पूजा करके, मनुष्य अन्त में परम पद को प्राप्त होता है।
श्लोक 10 (skanda.2.96.10)
इह भोगान्बहून्भुक्त्वा हरेः सालोक्यमाप्नुयात् ।
iha bhogānbahūnbhuktvā hareḥ sālokyamāpnuyāt
यहाँ अनेक भोगों को भोगकर, वह हरि की सालोक्य-स्थिति को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 11 (skanda.2.96.11)
ततस्तु विमलं तीर्थं सोमकुंडाभिधं परम् । तपश्चकार भगवान्सोमो यत्र कलानिधिः ।
tatastu vimalaṁ tīrthaṁ somakuṁḍābhidhaṁ param tapaścakāra bhagavānsomo yatra kalānidhiḥ
फिर वहाँ सोमकुण्ड नामक अत्यन्त निर्मल तीर्थ है, जहाँ कला-निधि भगवान् सोम ने तपस्या की थी।
श्लोक 12 (skanda.2.96.12)
स्कन्द उवाच । सोमकुण्डस्य माहात्म्यं वद मे वदतां वर । त्वत्प्रसादादहं श्रोतुमिच्छामि परमेश्वर ।
skanda uvāca somakuṇḍasya māhātmyaṁ vada me vadatāṁ vara tvatprasādādahaṁ śrotumicchāmi parameśvara
स्कंद ने कहा — हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, हे परमेश्वर, आपकी कृपा से मैं सोमकुण्ड की महिमा सुनना चाहता हूँ; कृपया मुझे बताइए।
श्लोक 13 (skanda.2.96.13)
शिव उवाच । पुरात्रितनयः श्रीमान्सोमः संप्राप्य यौवनम् । श्रुत्वा स्वर्वासिनां सौख्यं गंधर्वेभ्यो मुहुर्मुहुः । तदा स्वपितरं प्रायात्प्रष्टुं तल्लभते कथम् ।
śiva uvāca purātritanayaḥ śrīmānsomaḥ saṁprāpya yauvanam śrutvā svarvāsināṁ saukhyaṁ gaṁdharvebhyo muhurmuhuḥ tadā svapitaraṁ prāyātpraṣṭuṁ tallabhate katham
शिव ने कहा — प्राचीन काल में अत्रि के तेजस्वी पुत्र सोम, यौवन को प्राप्त होकर, गन्धर्वों से बार-बार स्वर्गवासियों के सुख की बातें सुनकर, अपने पिता के पास यह पूछने गए कि वह कैसे प्राप्त होता है।
श्लोक 14 (skanda.2.96.14)
सोम उवाच । भगवन्सर्वधर्मज्ञ करुणामृतसागर । कथं वा लभ्यते स्वर्गः सर्वेषामुत्तमोत्तमः ।
soma uvāca bhagavansarvadharmajña karuṇāmṛtasāgara kathaṁ vā labhyate svargaḥ sarveṣāmuttamottamaḥ
सोम ने कहा — हे भगवन्, सर्वधर्मज्ञ, करुणा के अमृत-सागर, सबसे उत्तम स्वर्ग कैसे प्राप्त होता है?
श्लोक 15 (skanda.2.96.15)
ग्रहनक्षत्रताराणामोषधीनां पतिः प्रभो । स्यामहं येन तं यत्नं कृपया वद मे पितः ।
grahanakṣatratārāṇāmoṣadhīnāṁ patiḥ prabho syāmahaṁ yena taṁ yatnaṁ kṛpayā vada me pitaḥ
हे प्रभो, मैं ग्रहों, नक्षत्रों, ताराओं और औषधियों का स्वामी किस उपाय से बन सकूँ — कृपया मुझे वह उपाय बताइए, हे पिता।
श्लोक 16 (skanda.2.96.16)
अत्रिरुवाच । तपसाराध्य गोविंदं यमैर्वा नियमैः सुत । किं दुर्ल्लभं तु साधूनामिह लोके परत्र च ।
atriruvāca tapasārādhya goviṁdaṁ yamairvā niyamaiḥ suta kiṁ durllabhaṁ tu sādhūnāmiha loke paratra ca
अत्रि ने कहा — हे पुत्र, तप से अथवा यम-नियमों से गोविन्द की आराधना करने पर, साधुओं के लिए इस लोक और परलोक में क्या दुर्लभ रह जाता है?
श्लोक 17 (skanda.2.96.17)
ततस्तु नारदाच्छ्रुत्वा क्षेत्रं परमनिर्मलम् । जगाम बदरीं नत्वा पितरं दिशमुत्तराम् ।
tatastu nāradācchrutvā kṣetraṁ paramanirmalam jagāma badarīṁ natvā pitaraṁ diśamuttarām
तब नारद से उस परम निर्मल क्षेत्र के विषय में सुनकर, वे पिता को प्रणाम कर उत्तर दिशा में बदरी की ओर चल पड़े।
श्लोक 18 (skanda.2.96.18)
तत्र गत्वा फलैर्मेध्यैर्विष्णोः पूजामकल्पयत् । जजाप परमं जाप्यमष्टाक्षरं मनोहरम् ।
tatra gatvā phalairmedhyairviṣṇoḥ pūjāmakalpayat jajāpa paramaṁ jāpyamaṣṭākṣaraṁ manoharam
वहाँ जाकर उन्होंने पवित्र फलों से विष्णु की पूजा की और मनोहर परम अष्टाक्षर मन्त्र का जप किया।
श्लोक 19 (skanda.2.96.19)
अष्टाशीतिसहस्राणि वर्षाणि भगवत्परम् । तपस्तेपेऽतिपरमं सर्वलोकभयावहम् ।
aṣṭāśītisahasrāṇi varṣāṇi bhagavatparam tapastepe'tiparamaṁ sarvalokabhayāvaham
अठासी हजार वर्षों तक, भगवान् में तल्लीन होकर, उन्होंने अत्यन्त कठोर तप किया, जो समस्त लोकों को भयभीत कर देने वाला था।
श्लोक 20 (skanda.2.96.20)
ततस्तुष्टः समागत्य भगवान्भक्तवत्सलः । उवाच सोमं विधिवद्वरं वरय सुव्रत ।
tatastuṣṭaḥ samāgatya bhagavānbhaktavatsalaḥ uvāca somaṁ vidhivadvaraṁ varaya suvrata
तब प्रसन्न होकर, भक्तवत्सल भगवान् वहाँ आए और विधिपूर्वक सोम से बोले — 'हे सुव्रत, वर माँगो।'
श्लोक 21 (skanda.2.96.21)
ततः सोमः समुत्थाय नमस्कृत्य पुनःपुनः । ग्रहनक्षत्रताराणामोषधीनामहं पतिः । द्विजानामपि सर्वेषां भूयासं ते प्रसादतः ।
tataḥ somaḥ samutthāya namaskṛtya punaḥpunaḥ grahanakṣatratārāṇāmoṣadhīnāmahaṁ patiḥ dvijānāmapi sarveṣāṁ bhūyāsaṁ te prasādataḥ
तब सोम उठकर बार-बार प्रणाम करते हुए बोले — 'आपकी कृपा से मैं ग्रहों, नक्षत्रों, ताराओं और औषधियों का, तथा समस्त द्विजों का भी स्वामी बनूँ।'
श्लोक 22 (skanda.2.96.22)
हरिरुवाच । वरमन्यं वृणुष्वातो दुर्ल्लभं त्वं भवादृशाम् । वरान्नो वरयामास तदा तं हिमजात्मज ।
hariruvāca varamanyaṁ vṛṇuṣvāto durllabhaṁ tvaṁ bhavādṛśām varānno varayāmāsa tadā taṁ himajātmaja
हरि ने कहा — 'इसके स्थान पर अन्य वर माँगो, यह तुम्हारे जैसों के लिए दुर्लभ है।' तब उन्होंने उस वर को नहीं चुना, हे हिमजात्मज।
श्लोक 23 (skanda.2.96.23)
ततोऽतिविमनाः सोमः पुनस्तेपे तपो महत् । त्रिंशद्वर्षसहस्राणि देवमानेन पुत्रक ।
tato'tivimanāḥ somaḥ punastepe tapo mahat triṁśadvarṣasahasrāṇi devamānena putraka
तब अत्यन्त खिन्न होकर सोम ने, हे पुत्र, देव-मान से तीस हजार वर्षों तक पुनः महान् तप किया।
श्लोक 24 (skanda.2.96.24)
तदासौ करुणापूर्णहृदयो भगवानगात् । वरं वरय भद्रं ते वरदोऽहं तवाग्रतः । सोमस्तु तादृशं वव्रे तच्छ्रुत्वान्तर्द्दधे हरिः ।
tadāsau karuṇāpūrṇahṛdayo bhagavānagāt varaṁ varaya bhadraṁ te varado'haṁ tavāgrataḥ somastu tādṛśaṁ vavre tacchrutvāntarddadhe hariḥ
तब करुणा से परिपूर्ण हृदय वाले भगवान् आए — 'वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो; मैं तुम्हारे समक्ष वरदाता हूँ।' किन्तु सोम ने वही वर पुनः माँगा; यह सुनकर हरि अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 25 (skanda.2.96.25)
ततोऽतिविमनाः सोमः पुनस्तेपे तपो महत् । चत्वारिंशत्सहस्राणि तपस्तप्तं सुदुष्करम् ।
tato'tivimanāḥ somaḥ punastepe tapo mahat catvāriṁśatsahasrāṇi tapastaptaṁ suduṣkaram
तब अत्यन्त खिन्न होकर सोम ने पुनः महान् तप किया — चालीस हजार वर्षों तक अत्यन्त दुष्कर तपस्या की।
श्लोक 26 (skanda.2.96.26)
ततस्तुष्टो हरिः साक्षाच्छंखचक्रगदाधरः । उवाच वचनं चारु सोमं श्रांतं तपोनिधिम् ।
tatastuṣṭo hariḥ sākṣācchaṁkhacakragadādharaḥ uvāca vacanaṁ cāru somaṁ śrāṁtaṁ taponidhim
तब शंख-चक्र-गदाधारी हरि साक्षात् प्रसन्न होकर, थके हुए तपोनिधि सोम से मधुर वचन बोले।
श्लोक 27 (skanda.2.96.27)
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते वरं वरय सुव्रत । तपसाराधितो नूनं त्वयाहं तपसां निधिः ।
uttiṣṭhottiṣṭha bhadraṁ te varaṁ varaya suvrata tapasārādhito nūnaṁ tvayāhaṁ tapasāṁ nidhiḥ
'उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो; हे सुव्रत, वर माँगो। निश्चय ही तुमने तप से मुझे, तपों के निधि को, प्रसन्न कर लिया है।'
श्लोक 28 (skanda.2.96.28)
सोम उवाच । यदि तुष्टो भवान्मह्यं भगवान्वरदर्षभः । ग्रहनक्षत्रताराणामाधिपत्यं प्रयच्छ मे । तथौषधीनां विप्राणां यामिन्याश्च जगत्पते ।
soma uvāca yadi tuṣṭo bhavānmahyaṁ bhagavānvaradarṣabhaḥ grahanakṣatratārāṇāmādhipatyaṁ prayaccha me tathauṣadhīnāṁ viprāṇāṁ yāminyāśca jagatpate
सोम ने कहा — यदि आप, वरदाताओं में श्रेष्ठ भगवन्, मुझसे प्रसन्न हैं, तो हे जगत्पते, मुझे ग्रहों, नक्षत्रों और ताराओं का, तथा औषधियों, विप्रों और रात्रि का भी आधिपत्य प्रदान कीजिए।
श्लोक 29 (skanda.2.96.29)
श्रीभगवानुवाच । दुर्ल्लभं प्रार्थितं वत्स वितरामि तथाप्यहम् । एवमस्तु ततः सर्वे समागत्य दिवौ कसः । अभिषिक्तवंतो विधिवत्सोमं राजानमादृताः ।
śrībhagavānuvāca durllabhaṁ prārthitaṁ vatsa vitarāmi tathāpyaham evamastu tataḥ sarve samāgatya divau kasaḥ abhiṣiktavaṁto vidhivatsomaṁ rājānamādṛtāḥ
श्री भगवान् ने कहा — हे वत्स, तुमने जो माँगा है वह दुर्लभ है, फिर भी मैं उसे प्रदान करता हूँ — 'ऐसा ही हो।' तब स्वर्गवासी सभी देवता एकत्र होकर, आदरपूर्वक, विधिवत् सोम को राजा के रूप में अभिषिक्त किया।
श्लोक 30 (skanda.2.96.30)
ततो विमानमारूढो रथेन शुभ्रवाससा । अभिष्टुतः सुरैरभूद्दिवं गतो निशाकरः ।
tato vimānamārūḍho rathena śubhravāsasā abhiṣṭutaḥ surairabhūddivaṁ gato niśākaraḥ
तब श्वेत वस्त्र वाले विमान-रथ पर आरूढ़ होकर, देवताओं द्वारा स्तुति किए जाते हुए, निशाकर (चन्द्रमा) स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 31 (skanda.2.96.31)
ततः प्रभृति तीर्थं तत्सोमकुंडेति दुर्ल्लभम् । यद्दृष्टिमात्रान्मनुजा गतदोषा भवंति हि ।
tataḥ prabhṛti tīrthaṁ tatsomakuṁḍeti durllabham yaddṛṣṭimātrānmanujā gatadoṣā bhavaṁti hi
तब से वह दुर्लभ तीर्थ सोमकुण्ड के नाम से प्रसिद्ध हुआ; जिसके दर्शन-मात्र से मनुष्य निश्चय ही दोष-रहित हो जाते हैं।
श्लोक 32 (skanda.2.96.32)
यदुपस्पर्शनाद्यांति सोमलोकं विनिंदिताः । यत्र स्नात्वा विधानेन संतर्प्य पितृदेवताः ।
yadupasparśanādyāṁti somalokaṁ viniṁditāḥ yatra snātvā vidhānena saṁtarpya pitṛdevatāḥ
जिसके स्पर्श-मात्र से निन्दित लोग भी सोमलोक को जाते हैं; वहाँ विधिपूर्वक स्नान कर, पितृ-देवताओं को तृप्त करके,
श्लोक 33 (skanda.2.96.33)
सोमलोकं विनिर्भिद्य विष्णुलोकं प्रपद्यते । उपवासत्रयं कृत्वा पूजयित्वा जनार्द्दनम् ।
somalokaṁ vinirbhidya viṣṇulokaṁ prapadyate upavāsatrayaṁ kṛtvā pūjayitvā janārddanam
तीन दिन का उपवास कर और जनार्दन की पूजा करके, मनुष्य सोमलोक को भी लांघकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 34 (skanda.2.96.34)
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि । त्रिरात्रेण स्थितो भूत्वा पूजयित्वा जनार्द्दनम् । जपं कुर्वन्विशेषेण मंत्रसिद्धिः प्रजायते ।
na teṣāṁ punarāvṛttiḥ kalpakoṭiśatairapi trirātreṇa sthito bhūtvā pūjayitvā janārddanam japaṁ kurvanviśeṣeṇa maṁtrasiddhiḥ prajāyate
सौ करोड़ कल्पों तक भी उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती; तीन रात्रि वहाँ रहकर, जनार्दन की पूजा करके, विशेष रूप से जप करते हुए मन्त्र-सिद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक 35 (skanda.2.96.35)
कर्मणा मनसा वाचा यत्कृतं पातकं नृभिः । तत्सर्वं क्षयमायाति सोमकुंडेक्षणादिह ।
karmaṇā manasā vācā yatkṛtaṁ pātakaṁ nṛbhiḥ tatsarvaṁ kṣayamāyāti somakuṁḍekṣaṇādiha
मनुष्यों द्वारा शरीर, मन और वाणी से किया गया जो भी पाप हो, वह सब यहाँ सोमकुण्ड के दर्शन-मात्र से क्षीण हो जाता है।
श्लोक 36 (skanda.2.96.36)
ततस्तु द्वादशादित्यतीर्थं पापहरं परम् । यत्र तप्त्वा पुनः कृच्छ्रं काश्यपः सूर्यतां ययौ ।
tatastu dvādaśādityatīrthaṁ pāpaharaṁ param yatra taptvā punaḥ kṛcchraṁ kāśyapaḥ sūryatāṁ yayau
फिर वहाँ द्वादशादित्य नामक परम पाप-हारी तीर्थ है, जहाँ काश्यप ने पुनः कठोर तप करके सूर्य-पद प्राप्त किया था।
श्लोक 37 (skanda.2.96.37)
दुर्ल्लभं त्रिषु लोकेषु तपःसिद्ध्येककारणम् । रविवारेषु सप्तम्यां संक्रात्यां विधिवन्नरः । सप्तजन्मकृतात्पापात्स्नानमात्रेण शुद्ध्यति ।
durllabhaṁ triṣu lokeṣu tapaḥsiddhyekakāraṇam ravivāreṣu saptamyāṁ saṁkrātyāṁ vidhivannaraḥ saptajanmakṛtātpāpātsnānamātreṇa śuddhyati
तीनों लोकों में दुर्लभ, तप-सिद्धि का एकमात्र कारण यह तीर्थ है; रविवार को, सप्तमी को अथवा संक्रान्ति के दिन विधिपूर्वक स्नान करने वाला मनुष्य सात जन्मों के पाप से भी शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 38 (skanda.2.96.38)
पाराकं विधिवत्कृत्वा पूजनीयो जनार्द्दनः । सूर्यलोके सुखं भुक्त्वा विष्णुलोके महीयते ।
pārākaṁ vidhivatkṛtvā pūjanīyo janārddanaḥ sūryaloke sukhaṁ bhuktvā viṣṇuloke mahīyate
विधिपूर्वक पाराक व्रत करके जनार्दन की पूजा करने से, मनुष्य सूर्यलोक में सुख भोगकर विष्णुलोक में महिमामण्डित होता है।
श्लोक 39 (skanda.2.96.39)
महारोगाभिभूतस्तु स्नात्वा पीत्वा जलं शुचिः । रोगमुक्तोऽचिरादेव नात्र कार्या विचारणा ।
mahārogābhibhūtastu snātvā pītvā jalaṁ śuciḥ rogamukto'cirādeva nātra kāryā vicāraṇā
बड़े रोग से पीड़ित मनुष्य भी वहाँ स्नान करके और शुद्ध होकर जल पीने से शीघ्र ही रोगमुक्त हो जाता है — इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 40 (skanda.2.96.40)
चतुःस्रोतं परं तीर्थं विलोचनमनोहरम् । धर्मार्थकाममोक्षास्ते तिष्ठंति द्रवरूपिणः ।
catuḥsrotaṁ paraṁ tīrthaṁ vilocanamanoharam dharmārthakāmamokṣāste tiṣṭhaṁti dravarūpiṇaḥ
वहाँ चतुःस्रोत नामक परम तीर्थ है, जो देखने में मनोहर है; वहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष द्रव-रूप में स्वयं स्थित हैं।
श्लोक 41 (skanda.2.96.41)
हरेराज्ञानुसारेण क्षेत्रेऽस्मिन्वैष्णवे स्वयम् । पुरुषार्था द्रवीभूता भूतानां मुक्तिहेतवः ।
harerājñānusāreṇa kṣetre'sminvaiṣṇave svayam puruṣārthā dravībhūtā bhūtānāṁ muktihetavaḥ
हरि की ही आज्ञा के अनुसार, इस वैष्णव क्षेत्र में पुरुषार्थ स्वयं द्रवीभूत होकर प्राणियों की मुक्ति के हेतु बने हैं।
श्लोक 42 (skanda.2.96.42)
पूर्वादिदिक्षु क्रमसन्निविष्टा धर्मप्रधाना इव रूपभाजः । भजंति ये तान्क्रमसन्निविष्टान्प्रसन्नतैषां सततं भवेद्धि ।
pūrvādidikṣu kramasanniviṣṭā dharmapradhānā iva rūpabhājaḥ bhajaṁti ye tānkramasanniviṣṭānprasannataiṣāṁ satataṁ bhaveddhi
पूर्व आदि दिशाओं में क्रमपूर्वक स्थित, मानो धर्म को प्रधान मानकर रूप धारण किए हुए — जो उन क्रमबद्ध रूपों की उपासना करते हैं, उन्हें सदा प्रसन्नता प्राप्त होती है।
श्लोक 43 (skanda.2.96.43)
नान्यत्र क्षेत्रे मिलिताः कथंचिच्चत्वार एते त्रिदशैरलभ्याः । तानग्रिमं जन्म जवेन लब्ध्वा पश्यंति पूर्वार्जितपुण्यपुंजाः ।
nānyatra kṣetre militāḥ kathaṁciccatvāra ete tridaśairalabhyāḥ tānagrimaṁ janma javena labdhvā paśyaṁti pūrvārjitapuṇyapuṁjāḥ
अन्य किसी क्षेत्र में ये चारों, जिन्हें देवता भी प्राप्त नहीं कर सकते, एक साथ कभी नहीं मिलते; पूर्व-अर्जित पुण्य-राशि वाले ही शीघ्र अगला जन्म पाकर उन्हें देख पाते हैं।
श्लोक 44 (skanda.2.96.44)
ये दुर्जना दुर्जनसंगभाजः क्षमार्जवप्राणजयप्रधानाः । क्रीडामृगा ग्राम्यवधूजनानां न ते प्रपश्यंत्यचिरात्पुमर्थान् ।
ye durjanā durjanasaṁgabhājaḥ kṣamārjavaprāṇajayapradhānāḥ krīḍāmṛgā grāmyavadhūjanānāṁ na te prapaśyaṁtyacirātpumarthān
जो दुर्जन हैं, दुर्जनों के संगी हैं, जो केवल ऊपर से क्षमा, सरलता और इन्द्रिय-संयम का ढोंग करते हैं, जो साधारण स्त्रियों के हाथ की क्रीड़ा के मृग-मात्र हैं — वे शीघ्र ही मनुष्य-जीवन के सच्चे लक्ष्यों को नहीं देख पाते।
श्लोक 45 (skanda.2.96.45)
तथैव पश्यंत्यचिरेण तत्त्वज्ञानैकहेतूनपि तान्पुमर्थान् ।
tathaiva paśyaṁtyacireṇa tattvajñānaikahetūnapi tānpumarthān
किन्तु सज्जन उसी अवस्था में शीघ्र ही उन पुरुषार्थों का दर्शन कर लेते हैं, जो सच्चे तत्त्व-ज्ञान के एकमात्र कारण हैं।
श्लोक 46 (skanda.2.96.46)
अत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः । पर्वणि प्रयताः स्नातुं समायांति षडानन ।
atra brahmādayo devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ parvaṇi prayatāḥ snātuṁ samāyāṁti ṣaḍānana
हे षडानन, यहाँ ब्रह्मा आदि देवता तथा तपोधन ऋषिगण, संयमपूर्वक पर्व के दिनों में स्नान करने आते हैं।
श्लोक 47 (skanda.2.96.47)
ततः सत्यपदंनाम तीर्थं सर्वमनोहरम् । त्रिकोणाकारमेवैतत्कुंडं कल्मषनाशनम् । एकादश्यां हरिस्तत्र स्वयमायाति पावने ।
tataḥ satyapadaṁnāma tīrthaṁ sarvamanoharam trikoṇākāramevaitatkuṁḍaṁ kalmaṣanāśanam ekādaśyāṁ haristatra svayamāyāti pāvane
फिर वहाँ सत्यपद नामक सर्वमनोहर तीर्थ है; यह त्रिकोण आकार वाला कुण्ड सारे कल्मष का नाश करने वाला है। एकादशी को हरि स्वयं उस पवित्र स्थान पर आते हैं।
श्लोक 48 (skanda.2.96.48)
तत्पश्चादृषयः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः । स्नातुमायांति विधिवत्कुंडे सत्यपदाभिधे ।
tatpaścādṛṣayaḥ sarve munayaśca tapodhanāḥ snātumāyāṁti vidhivatkuṁḍe satyapadābhidhe
उनके पश्चात् सभी ऋषि और तपोधन मुनि विधिपूर्वक सत्यपद नामक कुण्ड में स्नान करने आते हैं।
श्लोक 49 (skanda.2.96.49)
गंधर्वाप्सरसां यत्र मध्याह्ने हरिवासरे । गानं शृण्वंति विरलाः सत्यव्रतपरायणाः ।
gaṁdharvāpsarasāṁ yatra madhyāhne harivāsare gānaṁ śṛṇvaṁti viralāḥ satyavrataparāyaṇāḥ
वहाँ हरि के दिन (एकादशी) को मध्याह्न के समय गन्धर्वों और अप्सराओं का गान वे विरले लोग ही सुन पाते हैं, जो सत्य-व्रत में परायण हैं।
श्लोक 50 (skanda.2.96.50)
दर्शनाद्यस्य तीर्थस्य पातकानि महांत्यपि । पलायंते भयेनैव सिंहं दृष्ट्वा मृगा इव ।
darśanādyasya tīrthasya pātakāni mahāṁtyapi palāyaṁte bhayenaiva siṁhaṁ dṛṣṭvā mṛgā iva
इस तीर्थ के दर्शन-मात्र से बड़े-बड़े पाप भी भयभीत होकर वैसे ही भाग जाते हैं, जैसे सिंह को देखकर मृग भाग जाते हैं।
श्लोक 51 (skanda.2.96.51)
स्वशाखोक्तविधानेन स्नानं कृत्वा विचक्षणः । सत्यलोकमवाप्नोति ततो नैःश्रेयसं पदम् ।
svaśākhoktavidhānena snānaṁ kṛtvā vicakṣaṇaḥ satyalokamavāpnoti tato naiḥśreyasaṁ padam
अपनी शाखा में कहे गए विधान के अनुसार स्नान करने वाला विचक्षण पुरुष सत्यलोक को, और वहाँ से परम कल्याणमय पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 52 (skanda.2.96.52)
अहोरात्रं शुचिर्भूत्वा उपोष्य च जनार्द्दनम् । पूजयित्वा यथाशक्त्या स जीवन्मुक्तिभाजनः ।
ahorātraṁ śucirbhūtvā upoṣya ca janārddanam pūjayitvā yathāśaktyā sa jīvanmuktibhājanaḥ
दिन-रात शुद्ध रहकर, उपवास करके और यथाशक्ति जनार्दन की पूजा करके, वह जीवित रहते हुए ही मुक्ति का पात्र बन जाता है।
श्लोक 53 (skanda.2.96.53)
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रिकोणस्थाः समाहिताः । तपः कुर्वंत्यनुदिनं सर्वलोकादितोषणम् ।
brahmā viṣṇuśca rudraśca trikoṇasthāḥ samāhitāḥ tapaḥ kurvaṁtyanudinaṁ sarvalokāditoṣaṇam
ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र, त्रिकोण के तीनों स्थानों में समाहित होकर, समस्त लोकों की प्रसन्नता के लिए प्रतिदिन तप करते हैं।
श्लोक 54 (skanda.2.96.54)
त्रिकोणमंडितं तीर्थं नाम्ना सत्यपदप्रदम् । दर्शनीयं प्रयत्नेन सर्वपापमुमुक्षुभिः ।
trikoṇamaṁḍitaṁ tīrthaṁ nāmnā satyapadapradam darśanīyaṁ prayatnena sarvapāpamumukṣubhiḥ
त्रिकोण से सुशोभित, सत्यपद नाम से प्रसिद्ध यह तीर्थ, मोक्ष के इच्छुक और पाप से मुक्त होना चाहने वालों के लिए प्रयत्नपूर्वक दर्शनीय है।
श्लोक 55 (skanda.2.96.55)
जपं तपो हरिस्तोत्रं पूजां स्तुत्यभिवंदनम् । माहात्म्यं कुर्वतां वक्तुं ब्रह्मणापि न शक्यते ।
japaṁ tapo haristotraṁ pūjāṁ stutyabhivaṁdanam māhātmyaṁ kurvatāṁ vaktuṁ brahmaṇāpi na śakyate
वहाँ जप, तप, हरि-स्तोत्र, पूजा, स्तुति और अभिवन्दन करने वालों की महिमा को कहना ब्रह्मा के लिए भी सम्भव नहीं है।
श्लोक 56 (skanda.2.96.56)
ततोऽतिविमलं नाम नरनारायणाश्रमम् । द्विविधं दृश्यते तत्र पाथः परमनिर्मलम् ।
tato'tivimalaṁ nāma naranārāyaṇāśramam dvividhaṁ dṛśyate tatra pāthaḥ paramanirmalam
फिर वहाँ नर-नारायण नामक अत्यन्त निर्मल आश्रम है; वहाँ परम पवित्र जल दो प्रकार से दिखाई देता है।
श्लोक 57 (skanda.2.96.57)
उभाभ्यामुभयोः प्रीतिर्भवतीति विनिश्चितम् । तत्र स्नात्वा प्रयत्नेन पूजयित्वा जनार्द्दनम् । सर्वपापविनिर्मुक्तस्तत्क्षणान्नात्र संशयः ।
ubhābhyāmubhayoḥ prītirbhavatīti viniścitam tatra snātvā prayatnena pūjayitvā janārddanam sarvapāpavinirmuktastatkṣaṇānnātra saṁśayaḥ
यह निश्चित है कि दोनों में परस्पर प्रीति है; वहाँ प्रयत्नपूर्वक स्नान करके और जनार्दन की पूजा करके, मनुष्य उसी क्षण समस्त पापों से मुक्त हो जाता है — इसमें संशय नहीं।
श्लोक 58 (skanda.2.96.58)
ततो नारायणावासशिखरे विमलाकृति । तीर्थं पवित्रमुर्वश्या अभिव्यक्तिकरं भवेत् ।
tato nārāyaṇāvāsaśikhare vimalākṛti tīrthaṁ pavitramurvaśyā abhivyaktikaraṁ bhavet
फिर नारायण के आवास-शिखर पर, निर्मल आकृति वाला वह पवित्र तीर्थ है, जो उर्वशी के प्राकट्य का कारण बना।
श्लोक 59 (skanda.2.96.59)
स्कन्द उवाच । अभिव्यक्तिः कथं तस्या उर्वश्याः शिखरे पितः । किं पुण्यं किं फलं तत्र परं कौतूहलं वद ।
skanda uvāca abhivyaktiḥ kathaṁ tasyā urvaśyāḥ śikhare pitaḥ kiṁ puṇyaṁ kiṁ phalaṁ tatra paraṁ kautūhalaṁ vada
स्कंद ने कहा — हे पिता, उस शिखर पर उर्वशी का प्राकट्य कैसे हुआ? वहाँ क्या पुण्य है, क्या फल है — यह मुझे बड़े कौतूहल से बताइए।
श्लोक 60 (skanda.2.96.60)
शिव उवाच । धर्मस्यपत्नी मूर्त्यासीत्तस्यां जातौ षडानन । नरनारायणौ साक्षाद्भगवानेव केवलम् ।
śiva uvāca dharmasyapatnī mūrtyāsīttasyāṁ jātau ṣaḍānana naranārāyaṇau sākṣādbhagavāneva kevalam
शिव ने कहा — धर्म की पत्नी का नाम मूर्ति था; हे षडानन, उन्हीं से नर और नारायण उत्पन्न हुए, जो साक्षात् और पूर्णतः भगवान् ही हैं।
श्लोक 61 (skanda.2.96.61)
पित्रोराज्ञामनुप्राप्य तपोऽर्धं कृतमानसौ । उभयोर्नगयोस्तौ तु तपोमूर्ती इव स्थितौ ।
pitrorājñāmanuprāpya tapo'rdhaṁ kṛtamānasau ubhayornagayostau tu tapomūrtī iva sthitau
माता-पिता की आज्ञा प्राप्त कर, तप में मन लगाकर, वे दोनों अपने-अपने पर्वत पर मानो तप की साक्षात् मूर्ति बनकर स्थित हो गए।
श्लोक 62 (skanda.2.96.62)
तौ दृष्ट्वा विस्मितः शक्रः प्रेषयामास मन्मथम् । सगणं तपसो ध्वंसो यथा स्याद्गन्धमादनम् ।
tau dṛṣṭvā vismitaḥ śakraḥ preṣayāmāsa manmatham sagaṇaṁ tapaso dhvaṁso yathā syādgandhamādanam
उन्हें देखकर विस्मित इन्द्र ने अपने गण सहित कामदेव को गन्धमादन भेजा, ताकि उनका तप भंग हो जाए।
श्लोक 63 (skanda.2.96.63)
विक्रम्य विधिवत्ते तु नारायणबलोदयम् । ज्ञात्वा हतमनस्कास्तानुवाच जगतीपतिः ।
vikramya vidhivatte tu nārāyaṇabalodayam jñātvā hatamanaskāstānuvāca jagatīpatiḥ
उन्होंने विधिपूर्वक प्रयत्न किया, किन्तु नारायण के बल के उदय को जानकर, हतोत्साहित उन सबसे जगत्पति ने कहा।
श्लोक 64 (skanda.2.96.64)
हरिरुवाच । किमर्थमागता यूयमातिथ्यं गृह्यतामिति ।
hariruvāca kimarthamāgatā yūyamātithyaṁ gṛhyatāmiti
हरि ने कहा — 'तुम किसलिए आए हो? हमारा आतिथ्य ग्रहण करो।'
श्लोक 65 (skanda.2.96.65)
इत्युक्त्वा फलमूलानि तेभ्यो दत्त्वोर्वशीं तथा । दत्त्वान्तर्धिमगादेव पश्यतां विघ्नकारिणीम् ।
ityuktvā phalamūlāni tebhyo dattvorvaśīṁ tathā dattvāntardhimagādeva paśyatāṁ vighnakāriṇīm
ऐसा कहकर उन्हें फल-मूल दिए, और उर्वशी को भी उत्पन्न कर उन्हें सौंप दिया; फिर, विघ्न करने आई उस कामिनी को उन्हीं के देखते-देखते अन्तर्धान कर दिया।
श्लोक 66 (skanda.2.96.66)
ते तु गत्वा दिवं भीते शक्रायोचुर्बलं हरेः । शक्रस्तामुर्वशीं प्राप्य हर्षणैकयुतोऽभवत् ।
te tu gatvā divaṁ bhīte śakrāyocurbalaṁ hareḥ śakrastāmurvaśīṁ prāpya harṣaṇaikayuto'bhavat
वे भयभीत होकर स्वर्ग गए और इन्द्र से हरि के बल का वर्णन किया; इन्द्र उस उर्वशी को पाकर परम हर्ष से भर गए।
श्लोक 67 (skanda.2.96.67)
ततः प्रभृति तत्तीर्थमुर्वशी नामतः पृथक् । प्रसिद्धं यत्र भगवान्स्वयमास्ते तपोमयः ।
tataḥ prabhṛti tattīrthamurvaśī nāmataḥ pṛthak prasiddhaṁ yatra bhagavānsvayamāste tapomayaḥ
तब से वह तीर्थ उर्वशी नाम से पृथक् प्रसिद्ध हुआ, जहाँ भगवान् स्वयं तपोमय होकर विराजमान हैं।
श्लोक 68 (skanda.2.96.68)
तत्र स्नात्वा विधानेन उपोष्य रजनिद्वयम् । पूजयित्वा हरिस्तत्र नरो नारायणो भवेत् ।
tatra snātvā vidhānena upoṣya rajanidvayam pūjayitvā haristatra naro nārāyaṇo bhavet
वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके, दो रात्रि उपवास कर, हरि की पूजा करने से मनुष्य नर-नारायण-स्वरूप हो जाता है।
श्लोक 69 (skanda.2.96.69)
उर्वशीकुण्डमासाद्य कामनावशतो नरः । उर्वशीलोकमाप्नोति स्नानमात्रेण पुत्रक ।
urvaśīkuṇḍamāsādya kāmanāvaśato naraḥ urvaśīlokamāpnoti snānamātreṇa putraka
हे पुत्र, उर्वशी-कुण्ड को प्राप्त कर, कामनावश स्नान करने मात्र से मनुष्य उर्वशी-लोक को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 70 (skanda.2.96.70)
सदैव भगवांस्तत्र उर्वशीकुंड सन्निधौ । भूतानां भावयन्भव्यं तपोमूर्तिर्व्यवस्थितः ।
sadaiva bhagavāṁstatra urvaśīkuṁḍa sannidhau bhūtānāṁ bhāvayanbhavyaṁ tapomūrtirvyavasthitaḥ
वहाँ उर्वशी-कुण्ड के समीप भगवान् सदैव तप-मूर्ति के रूप में स्थित रहकर प्राणियों का कल्याण करते रहते हैं।
श्लोक 71 (skanda.2.96.71)
आमोदं तदुपरि वै प्रभञ्जनोऽपि श्रीभर्तुर्वहति पदांबुजैकलब्धम् । यत्संगात्कलियुगकल्मषातुराणामुत्संगे न भवति पापभारपाकः ।
āmodaṁ tadupari vai prabhañjano'pi śrībharturvahati padāṁbujaikalabdham yatsaṁgātkaliyugakalmaṣāturāṇāmutsaṁge na bhavati pāpabhārapākaḥ
उसके ऊपर बहने वाली वायु भी श्रीभर्ता के चरण-कमलों से प्राप्त सुगन्ध को धारण करती है; उसके संसर्ग से कलियुग के पाप से पीड़ितों की गोद में भी पाप-भार पकता (फलित होता) नहीं है।
श्लोक 72 (skanda.2.96.72)
यत्संगाद्धर्षमुपावहत्पदश्रीनिर्विण्णो गिरिविवरेच्युतैकसेवी । श्रीभर्तुश्चरणयुगं वहन्समन्तादभ्येति प्रशममहस्तपःसमीरे ।
yatsaṁgāddharṣamupāvahatpadaśrīnirviṇṇo girivivarecyutaikasevī śrībhartuścaraṇayugaṁ vahansamantādabhyeti praśamamahastapaḥsamīre
जिसके संसर्ग से, पद-वैभव से विरक्त होकर केवल पर्वत-गुफा में अच्युत की सेवा करने वाला साधक हर्ष प्राप्त करता है; श्रीभर्ता के चरण-युगल को हृदय में धारण करते हुए, वह तप की उस वायु में सर्वत्र परम शान्ति को प्राप्त होता है।
श्लोक 73 (skanda.2.96.73)
गीर्वाणानुपहसति स्वघेन पूर्णः कीटोऽपिप्रशमितदुर्नयो निरीहः । यत्रस्थः कुसुमनिवेदमात्मयोगपर्युष्टं जहदुपयास्यते पदं तत् ।
gīrvāṇānupahasati svaghena pūrṇaḥ kīṭo'pipraśamitadurnayo nirīhaḥ yatrasthaḥ kusumanivedamātmayogaparyuṣṭaṁ jahadupayāsyate padaṁ tat
वहाँ रहने वाला एक कीड़ा भी, अपने ही भाग्य में सन्तुष्ट, दुष्टता से रहित, निष्काम होकर, देवताओं का भी उपहास करने योग्य महिमा पा लेता है; आत्म-साधना से परिपक्व फूलों के अर्पण को भी त्यागकर, वह उस परम पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 74 (skanda.2.96.74)
यत्रेत्वा मुनिमतयो बहिःपदार्थान्नापश्यन्निहितपदांबुजैकभाजः । यत्रस्थः स्वयमपि गोपतिर्जनानामाधत्ते स्वपदमनुक्रमागतानाम् ।
yatretvā munimatayo bahiḥpadārthānnāpaśyannihitapadāṁbujaikabhājaḥ yatrasthaḥ svayamapi gopatirjanānāmādhatte svapadamanukramāgatānām
जहाँ मुनियों की बुद्धि, भीतर प्रवेश कर, बाहरी पदार्थों को नहीं देखती, केवल हृदय में स्थापित चरण-कमलों में ही लीन रहती है; जहाँ स्वयं गोपति (विष्णु) भी विराजमान होकर, क्रम से आने वाले जनों को अपना ही पद प्रदान करते हैं।
श्लोक 75 (skanda.2.96.75)
बहूनि संति तीर्थानि गिरौ नारायणाश्रिते । सर्वपापहराण्याशु तान्यहं वेद नो जनः ।
bahūni saṁti tīrthāni girau nārāyaṇāśrite sarvapāpaharāṇyāśu tānyahaṁ veda no janaḥ
नारायण के आश्रित इस पर्वत पर बहुत-से तीर्थ हैं, जो शीघ्र ही समस्त पापों को हरने वाले हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, पर साधारण जन नहीं जानते।
श्लोक 76 (skanda.2.96.76)
संसारकुहरे घोरे यत्र स्थगितमात्मनः । उर्वशीकुण्डमासाद्य दिनमेकं वसेन्नरः ।
saṁsārakuhare ghore yatra sthagitamātmanaḥ urvaśīkuṇḍamāsādya dinamekaṁ vasennaraḥ
संसार की भयंकर गुफा में जहाँ आत्मा अवरुद्ध पड़ी है — उससे मुक्ति के लिए मनुष्य को उर्वशी-कुण्ड में पहुँचकर वहाँ एक दिन निवास करना चाहिए।
श्लोक 77 (skanda.2.96.77)
उर्वशीदक्षिणे भागे आयुधानि जगत्पतेः । विद्यंते दर्शनात्तेषां न शस्त्रभयभाग्भवेत् ।
urvaśīdakṣiṇe bhāge āyudhāni jagatpateḥ vidyaṁte darśanātteṣāṁ na śastrabhayabhāgbhavet
उर्वशी के दक्षिण भाग में जगत्पति के आयुध विद्यमान हैं; उनके दर्शन से मनुष्य को कभी शस्त्र का भय नहीं रहता।
श्लोक 78 (skanda.2.96.78)
य इदं शृणुयाद्भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः । सर्वपापविनिर्मुक्तः सालोक्यं लभते हरेः ।
ya idaṁ śṛṇuyādbhaktyā śrāvayedvā samāhitaḥ sarvapāpavinirmuktaḥ sālokyaṁ labhate hareḥ
जो इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, अथवा समाहित-चित्त होकर दूसरों को सुनाता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर हरि की सालोक्य-स्थिति को प्राप्त करता है।