वैष्णव खण्ड · अध्याय 95
ब्रह्मकुण्ड, सरस्वती तथा मानसोद्भेद-वसुधारा तीर्थ की महिमा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.95.1)
स्कंद उवाच । कराद्विगलितं यत्र कपालं ते महेश्वर । तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं कृपया वद मे पितः ।
skaṁda uvāca karādvigalitaṁ yatra kapālaṁ te maheśvara tasya tīrthasya māhātmyaṁ kṛpayā vada me pitaḥ
स्कंद ने कहा — हे महेश्वर, जहाँ आपके हाथ से कपाल गिरा था, कृपया मुझे उस तीर्थ की महिमा बताइए, हे पिता।
श्लोक 2 (skanda.2.95.2)
शिव उवाच । अतिगुह्यमिदं तीर्थं सुरासुरनमस्कृतम् । ब्रह्महाऽपि नरो यत्र स्नानमात्रेण शुद्ध्यति ।
śiva uvāca atiguhyamidaṁ tīrthaṁ surāsuranamaskṛtam brahmahā'pi naro yatra snānamātreṇa śuddhyati
शिव ने कहा — यह तीर्थ अत्यन्त गुप्त है, देव और असुर दोनों इसे नमस्कार करते हैं; यहाँ ब्रह्महत्या करने वाला मनुष्य भी केवल स्नान से शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.2.95.3)
पंच तीर्थानि तिष्ठंति कपाले पापमोचने । तत्र स्नानं तपो दानं सर्वमक्षयमिष्यते ।
paṁca tīrthāni tiṣṭhaṁti kapāle pāpamocane tatra snānaṁ tapo dānaṁ sarvamakṣayamiṣyate
कपाल-मोचन नामक इस पाप-मोचक स्थान में पाँच तीर्थ स्थित हैं; वहाँ स्नान, तप और दान — सब कुछ अक्षय माना जाता है।
श्लोक 4 (skanda.2.95.4)
पिंडं विधाय विधिवन्नरकात्तारयेत्पितॄन् । पितृतीर्थमिदं प्रोक्तं गयातोऽष्टगुणाधिकम् ।
piṁḍaṁ vidhāya vidhivannarakāttārayetpitṝn pitṛtīrthamidaṁ proktaṁ gayāto'ṣṭaguṇādhikam
विधिपूर्वक पिण्डदान करने से मनुष्य अपने पितरों को नरक से तार देता है; यह पितृ-तीर्थ गया से भी आठ गुना अधिक फलदायी कहा गया है।
श्लोक 5 (skanda.2.95.5)
तिलतर्प्पणतो यांति पितरः स्वर्गमुत्तमम् ।
tilatarppaṇato yāṁti pitaraḥ svargamuttamam
तिल-तर्पण करने से पितर उत्तम स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 6 (skanda.2.95.6)
अहोरात्रं स्थिरो भूत्वा जपनिष्ठः समाहितः । तस्येष्टसिद्धिर्महती तत्क्षणादेव जायते ।
ahorātraṁ sthiro bhūtvā japaniṣṭhaḥ samāhitaḥ tasyeṣṭasiddhirmahatī tatkṣaṇādeva jāyate
जो दिन-रात स्थिर होकर, जप में तत्पर तथा समाहित-चित्त रहता है, उसकी अभीष्ट सिद्धि उसी क्षण महान् रूप से हो जाती है।
श्लोक 7 (skanda.2.95.7)
पारलौकिककर्माणि सर्वाण्यव्याहतानि च । कपालमोचने तीर्थे नाधिकं पितृकर्मणि ।
pāralaukikakarmāṇi sarvāṇyavyāhatāni ca kapālamocane tīrthe nādhikaṁ pitṛkarmaṇi
पारलौकिक सभी कर्म अबाध हो जाते हैं; कपालमोचन तीर्थ में किए गए पितृ-कर्म से बढ़कर कुछ नहीं है।
श्लोक 8 (skanda.2.95.8)
स्कंद उवाच । कुत्र वा ब्रह्मतीर्थं वै फलं वा कीदृशं भवेत् । के वा तत्र वसंतीह कृपया वद मे पितः ।
skaṁda uvāca kutra vā brahmatīrthaṁ vai phalaṁ vā kīdṛśaṁ bhavet ke vā tatra vasaṁtīha kṛpayā vada me pitaḥ
स्कंद ने कहा — ब्रह्म-तीर्थ कहाँ है, और उसका फल कैसा है? वहाँ कौन निवास करते हैं? कृपया मुझे बताइए, हे पिता।
श्लोक 9 (skanda.2.95.9)
शिव उवाच । एकदा विष्णुनाभ्यम्भोरुहस्थस्य प्रजापतेः । वेदान्मुखांबुजाद्धृत्वा जग्मतुर्मधुकैटभौ ।
śiva uvāca ekadā viṣṇunābhyambhoruhasthasya prajāpateḥ vedānmukhāṁbujāddhṛtvā jagmaturmadhukaiṭabhau
शिव ने कहा — एक बार, विष्णु की नाभि-कमल पर विराजमान प्रजापति ब्रह्मा के मुख-कमल से मधु और कैटभ वेदों को हरकर ले गए।
श्लोक 10 (skanda.2.95.10)
ततो ह्युत्थाय शयनात्सिसृक्षुरब्जसंभवः । स्रष्टुं विनाऽगमं लोके न शशाक हृतस्मृतिः ।
tato hyutthāya śayanātsisṛkṣurabjasaṁbhavaḥ sraṣṭuṁ vinā'gamaṁ loke na śaśāka hṛtasmṛtiḥ
तब कमल से उत्पन्न ब्रह्मा शय्या से उठे, सृष्टि करने की इच्छा से; किन्तु स्मृति और वेद खो जाने से, बिना शास्त्र के सृष्टि करने में समर्थ न हो सके।
श्लोक 11 (skanda.2.95.11)
तदा बदरिकामेत्य हरिणा प्रतिपालिताम् । तुष्टाव प्रणतो भूत्वा भगवंतं सनातनम् ।
tadā badarikāmetya hariṇā pratipālitām tuṣṭāva praṇato bhūtvā bhagavaṁtaṁ sanātanam
तब वे बदरिका में आए, जो सदा हरि द्वारा संरक्षित है; वहाँ प्रणत होकर उन्होंने सनातन भगवान् की स्तुति की।
श्लोक 12 (skanda.2.95.12)
ततः कुंडात्समुद्भूतो हयशीर्षो निजायुधः । पीतांबरधरः शुक्लश्चतुर्बाहुः सुदृप्तदृक् ।
tataḥ kuṁḍātsamudbhūto hayaśīrṣo nijāyudhaḥ pītāṁbaradharaḥ śuklaścaturbāhuḥ sudṛptadṛk
तब कुंड से एक हयग्रीव रूप प्रकट हुआ, अपने आयुधों सहित, पीताम्बरधारी, श्वेतवर्ण, चतुर्भुज, तेजस्वी नेत्रों वाला।
श्लोक 13 (skanda.2.95.13)
अत्यद्भुतः प्रकटकठोरलोचनश्चलच्छटाविच्छुरितमेघडंबरः । स्वतेजसा हतनिखिलप्रभाकुलः कृपान्वितो द्रुहिणपुरःसरोऽभवत् ।
atyadbhutaḥ prakaṭakaṭhoralocanaścalacchaṭāvicchuritameghaḍaṁbaraḥ svatejasā hatanikhilaprabhākulaḥ kṛpānvito druhiṇapuraḥsaro'bhavat
अत्यन्त अद्भुत, प्रगट कठोर नेत्रों वाला, चंचल कान्ति से मेघों के वैभव-सा प्रतीत होता हुआ; अपने ही तेज से सम्पूर्ण अन्य प्रभाओं को म्लान करता हुआ, वह करुणायुक्त होकर ब्रह्मा के समक्ष प्रकट हुआ।
श्लोक 14 (skanda.2.95.14)
निरीक्ष्य तं विधिरपि विस्मयाकुलः प्रणम्य च स्तुतिमकरोत्प्रसन्नदृक् ।
nirīkṣya taṁ vidhirapi vismayākulaḥ praṇamya ca stutimakarotprasannadṛk
उसे देखकर ब्रह्मा भी विस्मय से व्याकुल होकर प्रणाम करते हुए, प्रसन्न दृष्टि से स्तुति करने लगे।
श्लोक 15 (skanda.2.95.15)
ब्रह्मोवाच । नमः कमलनाभाय नमस्ते कमलाश्रय । नमस्ते कमलावासविशालवनमालिने ।
brahmovāca namaḥ kamalanābhāya namaste kamalāśraya namaste kamalāvāsaviśālavanamāline
ब्रह्मा ने कहा — कमलनाभ को नमस्कार है, हे कमल के आश्रय, आपको नमस्कार है; हे कमल में निवास करने वाले, विशाल वनमाला धारण करने वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक 16 (skanda.2.95.16)
नमो विज्ञानभात्राय गुहावास निवासिने । हृषीकेशाय शांताय तुभ्यं भगवते नमः ।
namo vijñānabhātrāya guhāvāsa nivāsine hṛṣīkeśāya śāṁtāya tubhyaṁ bhagavate namaḥ
विज्ञान से प्रकाशमान, गुहा में निवास करने वाले को नमस्कार है; हे हृषीकेश, शान्त स्वरूप भगवन्, आपको नमस्कार है।
श्लोक 17 (skanda.2.95.17)
स्वभक्तरक्षणकृते धृतदेहाय शार्ङ्गिणे । अनंतक्लेशनाशाय गदिने ब्रह्मणे नमः ।
svabhaktarakṣaṇakṛte dhṛtadehāya śārṅgiṇe anaṁtakleśanāśāya gadine brahmaṇe namaḥ
अपने भक्तों की रक्षा के लिए देह धारण करने वाले, शार्ङ्ग धनुष धारण करने वाले, अनन्त क्लेशों के नाशक, गदाधारी ब्रह्म-स्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 18 (skanda.2.95.18)
संसारविविधासारनिवृत्तिकृतकर्मणे । रक्षित्रे सर्वजंतूनां विष्णवे जिष्णवे नमः ।
saṁsāravividhāsāranivṛttikṛtakarmaṇe rakṣitre sarvajaṁtūnāṁ viṣṇave jiṣṇave namaḥ
संसार की विविध निःसारता से निवृत्ति कराने वाले कर्मों के कर्ता, समस्त प्राणियों के रक्षक विष्णु, विजयशील को नमस्कार है।
श्लोक 19 (skanda.2.95.19)
नमो विश्वंभराशेषनिवृत्तगुणवृत्तये । सुरासुरवरस्तंभनिवृत्तिस्थितिकीर्तये ।
namo viśvaṁbharāśeṣanivṛttaguṇavṛttaye surāsuravarastaṁbhanivṛttisthitikīrtaye
विश्व का भरण-पोषण करने वाले, समस्त गुणों से परे रहने वाले को नमस्कार है; देवों और असुरों में श्रेष्ठ को स्तम्भित करने तथा उन्हें स्थिर रखने की कीर्ति के धारक को नमस्कार है।
श्लोक 20 (skanda.2.95.20)
इतीरितः सुरपतिना महेश्वरो हृदिस्थितोऽखिलविदशेषकर्मभिः । ततोऽन्तरं सपदि गतो निबध्य तौ सुरद्रुहौ किल निजघान लीलया ।
itīritaḥ surapatinā maheśvaro hṛdisthito'khilavidaśeṣakarmabhiḥ tato'ntaraṁ sapadi gato nibadhya tau suradruhau kila nijaghāna līlayā
देवाधिपति (ब्रह्मा) द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, हृदय में स्थित, अपने समस्त कर्मों से सर्वज्ञ महेश्वर तत्काल अन्तर्भाग में गए और उन दोनों देव-द्रोहियों (मधु-कैटभ) को बाँधकर लीलापूर्वक उनका वध कर दिया।
श्लोक 21 (skanda.2.95.21)
ततो निगममादाय ब्रह्मणोंऽतिकमाययौ । दत्त्वा स्वनिगमं तस्मै स्वस्थोऽभूत्स समीडितः ।
tato nigamamādāya brahmaṇoṁ'tikamāyayau dattvā svanigamaṁ tasmai svastho'bhūtsa samīḍitaḥ
फिर वे वेदों को लेकर ब्रह्मा के समीप आए; उन्हें उनके वेद लौटाकर, वे स्तुत होकर स्वयं स्वस्थ हो गए।
श्लोक 22 (skanda.2.95.22)
ततः प्रभृति तत्तीर्थं ब्रह्मणा प्रकटीकृतम् । ब्रह्मकुंडमिति ख्यातं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
tataḥ prabhṛti tattīrthaṁ brahmaṇā prakaṭīkṛtam brahmakuṁḍamiti khyātaṁ triṣu lokeṣu viśrutam
उसी समय से वह तीर्थ, जो ब्रह्मा द्वारा प्रकट किया गया, ब्रह्मकुण्ड के नाम से प्रसिद्ध हुआ और तीनों लोकों में विख्यात हुआ।
श्लोक 23 (skanda.2.95.23)
यस्य दर्शनमात्रेण महापातकिनो जनाः । विमुक्तकिल्बिषाः सद्यो ब्रह्मलोकं व्रजंति ते ।
yasya darśanamātreṇa mahāpātakino janāḥ vimuktakilbiṣāḥ sadyo brahmalokaṁ vrajaṁti te
जिसके दर्शन-मात्र से बड़े-बड़े पापी भी अपने पापों से तत्काल मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाते हैं।
श्लोक 24 (skanda.2.95.24)
स्नानं कुर्वंति ये लोका व्रतचर्यामथापि वा । ब्रह्मलोकमतिक्रम्य विष्णुलोकं व्रजंति ते ।
snānaṁ kurvaṁti ye lokā vratacaryāmathāpi vā brahmalokamatikramya viṣṇulokaṁ vrajaṁti te
जो लोग वहाँ स्नान करते हैं अथवा व्रताचरण करते हैं, वे ब्रह्मलोक को भी लांघकर विष्णुलोक को जाते हैं।
श्लोक 25 (skanda.2.95.25)
स्कंद उवाच । ततः किमकरोद्धाता लब्ध्वा वेदाञ्जनार्द्दनात् । एतदन्यच्च सर्वं मे कृपया वद सांप्रतम् ।
skaṁda uvāca tataḥ kimakaroddhātā labdhvā vedāñjanārddanāt etadanyacca sarvaṁ me kṛpayā vada sāṁpratam
स्कंद ने कहा — जनार्दन से वेद प्राप्त करके फिर ब्रह्मा ने क्या किया? यह और इसके अतिरिक्त सब कुछ मुझे अभी कृपापूर्वक बताइए।
श्लोक 26 (skanda.2.95.26)
महादेव उवाच । चतुर्णामपि वेदानां दृष्ट्वा बदरिकाश्रमम् । मतिर्न जायते गंतुं ब्रह्मणा सह पुत्रक ।
mahādeva uvāca caturṇāmapi vedānāṁ dṛṣṭvā badarikāśramam matirna jāyate gaṁtuṁ brahmaṇā saha putraka
महादेव ने कहा — हे पुत्र, बदरिकाश्रम को देखकर चारों वेदों की भी ब्रह्मा के साथ वहाँ से जाने की इच्छा नहीं होती थी।
श्लोक 27 (skanda.2.95.27)
ततस्तु विकलं दृष्ट्वा ब्रह्माणं जनवासिनः । सिद्धास्तु विधिवत्स्तुत्वा प्रणिपत्येदमब्रुवन् ।
tatastu vikalaṁ dṛṣṭvā brahmāṇaṁ janavāsinaḥ siddhāstu vidhivatstutvā praṇipatyedamabruvan
तब ब्रह्मा को विकल देखकर, वहाँ निवास करने वाले सिद्धों ने विधिपूर्वक उनकी स्तुति की और प्रणाम करके यह कहा।
श्लोक 28 (skanda.2.95.28)
सिद्धा ऊचुः । आज्ञा भगवतः कार्या सर्वैः स्थावरजंगमैः । भगवान्सर्वजंतूनां कर्त्ता हर्ता पिता गुरुः ।
siddhā ūcuḥ ājñā bhagavataḥ kāryā sarvaiḥ sthāvarajaṁgamaiḥ bhagavānsarvajaṁtūnāṁ karttā hartā pitā guruḥ
सिद्धों ने कहा — भगवान् की आज्ञा का पालन सभी स्थावर-जंगमों को करना चाहिए; भगवान् ही समस्त प्राणियों के कर्ता, संहारक, पिता और गुरु हैं।
श्लोक 29 (skanda.2.95.29)
स्थितिर्ब्रह्मांतिके वश्च हरिणैवानुकल्पिता । निवृत्तिर्वर्तते चैषा तथाप्येतन्निरामयम् ।
sthitirbrahmāṁtike vaśca hariṇaivānukalpitā nivṛttirvartate caiṣā tathāpyetannirāmayam
आपका ब्रह्मलोक के समीप निवास स्वयं हरि द्वारा ही विहित है; यद्यपि यह निवृत्ति भी सम्भव है, तथापि यह उपाय निरापद है।
श्लोक 30 (skanda.2.95.30)
एकांते द्रवरूपेण मूर्तिर्वोऽत्रावतिष्ठताम् । द्वितीया ब्रह्मणा सार्द्धं ब्रह्मलोकं व्रजेत्पुनः ।
ekāṁte dravarūpeṇa mūrtirvo'trāvatiṣṭhatām dvitīyā brahmaṇā sārddhaṁ brahmalokaṁ vrajetpunaḥ
आपका एक द्रवरूप मूर्ति एकान्त में यहीं स्थित रहे; दूसरी ब्रह्मा के साथ पुनः ब्रह्मलोक को चली जाए।
श्लोक 31 (skanda.2.95.31)
ततः सहृदया वेदा द्वैधीकृतात्मरूपकाः । ब्रह्मणा ब्रह्मलोकं ते ययुः सार्द्धं प्रहर्षिताः ।
tataḥ sahṛdayā vedā dvaidhīkṛtātmarūpakāḥ brahmaṇā brahmalokaṁ te yayuḥ sārddhaṁ praharṣitāḥ
तब सहृदय वेदों ने अपने स्वरूप को दो भागों में विभक्त कर, हर्षपूर्वक ब्रह्मा के साथ ब्रह्मलोक को प्रस्थान किया।
श्लोक 32 (skanda.2.95.32)
ततस्त्रिलोकं विधिवत्ससर्ज चतुराननः । द्रवरूपेषु वेदेषु स्नानदानतपःक्रियाः । कृता विच्छेदिता न स्युर्यावदाभूतसंप्लवम् ।
tatastrilokaṁ vidhivatsasarja caturānanaḥ dravarūpeṣu vedeṣu snānadānatapaḥkriyāḥ kṛtā viccheditā na syuryāvadābhūtasaṁplavam
तब चतुरानन ब्रह्मा ने विधिपूर्वक त्रिलोक की रचना की; और द्रवरूप वेदों में किए गए स्नान, दान तथा तप के कर्म प्रलय-काल तक कभी विच्छिन्न नहीं होंगे।
श्लोक 33 (skanda.2.95.33)
फलमुद्दिश्य कुर्वंति उपवासत्रयं नराः । चतुर्णामपि वेदानां व्याख्यातारो न संशयः ।
phalamuddiśya kurvaṁti upavāsatrayaṁ narāḥ caturṇāmapi vedānāṁ vyākhyātāro na saṁśayaḥ
फल की कामना से जो मनुष्य वहाँ तीन दिन का उपवास करते हैं, वे निःसंदेह चारों वेदों के व्याख्याता बन जाते हैं।
श्लोक 34 (skanda.2.95.34)
अनुक्रमेण तिष्ठंति वेदाश्चत्वार एव च । ऋग्यजुःसामाथर्वाख्या भगवत्पार्श्ववर्तिनः ।
anukrameṇa tiṣṭhaṁti vedāścatvāra eva ca ṛgyajuḥsāmātharvākhyā bhagavatpārśvavartinaḥ
ऋग्, यजुः, साम और अथर्व नामक चारों वेद क्रमपूर्वक भगवान् के समीप स्थित रहते हैं।
श्लोक 35 (skanda.2.95.35)
ये पुण्यवंतोऽकलुषा वेदवेदांगपारगाः । ते वेदघोषं विरलाः शृण्वंत्यपि कलौ युगे ।
ye puṇyavaṁto'kaluṣā vedavedāṁgapāragāḥ te vedaghoṣaṁ viralāḥ śṛṇvaṁtyapi kalau yuge
जो पुण्यवान्, निष्कलुष और वेद-वेदांगों में पारंगत हैं, वे विरले लोग ही कलियुग में भी वेद-घोष सुन पाते हैं।
श्लोक 36 (skanda.2.95.36)
चतुर्णामपि वेदानामुदगस्ति सरस्वती । जप्ताथ सा नृणां हंति जडतां जलरूपिणी ।
caturṇāmapi vedānāmudagasti sarasvatī japtātha sā nṛṇāṁ haṁti jaḍatāṁ jalarūpiṇī
चारों वेदों से उत्पन्न सरस्वती वहाँ प्रवाहित होती हैं; जप करने पर वे जल-रूपिणी देवी मनुष्यों की जड़ता को नष्ट कर देती हैं।
श्लोक 37 (skanda.2.95.37)
सरस्वत्या जले स्थित्वा जपं कृत्वा समाहितः । मनोस्तस्य न विच्छेदः कदाचिदपि जायते ।
sarasvatyā jale sthitvā japaṁ kṛtvā samāhitaḥ manostasya na vicchedaḥ kadācidapi jāyate
सरस्वती के जल में स्थित होकर, समाहित-चित्त से जप करने वाले का मन कभी भी विचलित नहीं होता।
श्लोक 38 (skanda.2.95.38)
वेदव्यासोऽपि भगवान्यत्प्रसादादुदारधीः । पुराणसंहितार्थज्ञोऽभवदत्र न संशयः ।
vedavyāso'pi bhagavānyatprasādādudāradhīḥ purāṇasaṁhitārthajño'bhavadatra na saṁśayaḥ
जिनकी कृपा से भगवान् वेदव्यास भी, उदार बुद्धि वाले होकर, पुराणों और संहिताओं के अर्थ के ज्ञाता बने — इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 39 (skanda.2.95.39)
त्रयाणामपि लोकानां हिताय जगतां पतिः । स्थापयामास विधिना वाणीं वाग्विभवप्रदाम् ।
trayāṇāmapi lokānāṁ hitāya jagatāṁ patiḥ sthāpayāmāsa vidhinā vāṇīṁ vāgvibhavapradām
तीनों लोकों के हित के लिए, जगत्पति ने विधिपूर्वक वाणी को — जो वाणी का ऐश्वर्य प्रदान करने वाली है — वहाँ स्थापित किया।
श्लोक 40 (skanda.2.95.40)
दर्शनस्पर्शनस्नानपूजास्तुत्यभिवन्दनैः । सरस्वत्या न विच्छेदः कुले तस्य कदाचन ।
darśanasparśanasnānapūjāstutyabhivandanaiḥ sarasvatyā na vicchedaḥ kule tasya kadācana
दर्शन, स्पर्श, स्नान, पूजा, स्तुति और अभिवन्दन से, उस कुल में सरस्वती से कभी वियोग नहीं होता।
श्लोक 41 (skanda.2.95.41)
मन्त्रसिद्धिर्विशेषेण सरस्वत्यास्तटे नृणाम् । जपतामचिरणैव जायते नात्र संशयः ।
mantrasiddhirviśeṣeṇa sarasvatyāstaṭe nṛṇām japatāmaciraṇaiva jāyate nātra saṁśayaḥ
सरस्वती के तट पर जप करने वाले मनुष्यों को शीघ्र ही, विशेष रूप से, मन्त्र-सिद्धि प्राप्त होती है — इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 42 (skanda.2.95.42)
बहुना किमिहोक्तेन वाणी वाग्विभवप्रदा । द्रवरूपधरा नृणां दर्शनात्पूतिरुज्ज्वला ।
bahunā kimihoktena vāṇī vāgvibhavapradā dravarūpadharā nṛṇāṁ darśanātpūtirujjvalā
अधिक कहने से क्या लाभ? वाणी-वैभव प्रदान करने वाली वह वाणी, यहाँ द्रवरूप धारण किए हुए, दर्शन-मात्र से मनुष्यों को उज्ज्वल पवित्रता प्रदान करती है।
श्लोक 43 (skanda.2.95.43)
ततोऽर्वाग्दक्षिणे भागे द्रवधारेति विश्रुतम् । तीर्थमिंद्रपदं यत्र तपश्चक्रे पुरंदरः ।
tato'rvāgdakṣiṇe bhāge dravadhāreti viśrutam tīrthamiṁdrapadaṁ yatra tapaścakre puraṁdaraḥ
उससे कुछ आगे दक्षिण भाग में द्रवधारा नामक विख्यात तीर्थ है, जिसे इन्द्रपद भी कहते हैं, जहाँ पुरन्दर ने तपस्या की थी।
श्लोक 44 (skanda.2.95.44)
सुदारुणं तपः कृत्वा परितोष्य जनार्द्दनम् । पदमैंद्रं समालेभे सुरासुरनमस्कृतम् ।
sudāruṇaṁ tapaḥ kṛtvā paritoṣya janārddanam padamaiṁdraṁ samālebhe surāsuranamaskṛtam
अत्यन्त कठोर तप करके और जनार्दन को प्रसन्न करके, उन्होंने देव-असुर वन्दित इन्द्र-पद प्राप्त किया।
श्लोक 45 (skanda.2.95.45)
तपो दानं जपो होमो व्रतानि नियमा यमाः । तत्रानन्तगुणं प्रोक्तं तत्तीर्थमतिदुर्लभम् ।
tapo dānaṁ japo homo vratāni niyamā yamāḥ tatrānantaguṇaṁ proktaṁ tattīrthamatidurlabham
वहाँ तप, दान, जप, हवन, व्रत, नियम और यम — सबका फल अनन्त गुना बताया गया है; वह तीर्थ अत्यन्त दुर्लभ है।
श्लोक 46 (skanda.2.95.46)
प्रतिमासे त्रयोदश्यां शुक्लायां हरितोषणे । स्नात्वा सुतीर्थे सुत्रामाच्छन्दं चोपेत्य संगतः ।
pratimāse trayodaśyāṁ śuklāyāṁ haritoṣaṇe snātvā sutīrthe sutrāmācchandaṁ copetya saṁgataḥ
हर मास की शुक्ल त्रयोदशी को हरि को प्रसन्न करने के लिए इस उत्तम तीर्थ में स्नान करके, सुत्राम (इन्द्र) के छन्द के अनुसार निकट जाकर,
श्लोक 47 (skanda.2.95.47)
उपवासद्वयं कृत्वा पूजयित्वा जनार्द्दनम् । सर्वपापविनिर्मुक्तः शक्रलोके महीयते ।
upavāsadvayaṁ kṛtvā pūjayitvā janārddanam sarvapāpavinirmuktaḥ śakraloke mahīyate
दो दिन का उपवास करके और जनार्दन की पूजा करके, मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर इन्द्रलोक में महिमामण्डित होता है।
श्लोक 48 (skanda.2.95.48)
तत्रैव मानसोद्भेदः सर्वपापप्रणाशनः । दुर्लभः सर्वजंतूनां यत्र ते स्युर्महर्षयः ।
tatraiva mānasodbhedaḥ sarvapāpapraṇāśanaḥ durlabhaḥ sarvajaṁtūnāṁ yatra te syurmaharṣayaḥ
वहीं समस्त पापों का नाश करने वाला मानसोद्भेद तीर्थ है, जो समस्त प्राणियों के लिए दुर्लभ है और जहाँ महर्षिगण निवास करते हैं।
श्लोक 49 (skanda.2.95.49)
मानसं चिदचिद्ग्रन्थिमुद्ग्रथ्नंति च सर्वतः । मानसोद्भेव इत्याख्या ऋषिभिः परिगीयते ।
mānasaṁ cidacidgranthimudgrathnaṁti ca sarvataḥ mānasodbheva ityākhyā ṛṣibhiḥ parigīyate
यह चित् और अचित् के ग्रन्थि को मन से सर्वथा खोल देता है, इसीलिए ऋषियों द्वारा इसे मानसोद्भेद नाम से गाया जाता है।
श्लोक 50 (skanda.2.95.50)
भिंदंति हृदयग्रंथीश्छिंदन्ति बहुसंशयम् । कर्माणि क्षपयन्त्यस्मान्मानसोद्भेद इत्यभूत् ।
bhiṁdaṁti hṛdayagraṁthīśchiṁdanti bahusaṁśayam karmāṇi kṣapayantyasmānmānasodbheda ityabhūt
यह हृदय की ग्रन्थियों को भेदता है, अनेक संशयों को छिन्न करता है, और कर्मों का क्षय करता है — इसीलिए यह मानसोद्भेद कहलाया।
श्लोक 51 (skanda.2.95.51)
यदि भाग्यवशादत्र बिंदुमात्रं लभेन्नरः । तत्क्षणान्मुक्तिमाप्नोति किमतस्त्वधिकं भवेत् ।
yadi bhāgyavaśādatra biṁdumātraṁ labhennaraḥ tatkṣaṇānmuktimāpnoti kimatastvadhikaṁ bhavet
यदि सौभाग्यवश यहाँ मनुष्य को एक बूँद भी प्राप्त हो जाए, तो वह उसी क्षण मुक्ति पा लेता है — इससे बढ़कर और क्या होगा?
श्लोक 52 (skanda.2.95.52)
गिरिदरीनिलये निवसत्यमी ऋषिगणाः फलमूलजलाशनाः । जितमनोविषयाः शितबुद्धयः कलिभयादिव पापभयाकुलाः ।
giridarīnilaye nivasatyamī ṛṣigaṇāḥ phalamūlajalāśanāḥ jitamanoviṣayāḥ śitabuddhayaḥ kalibhayādiva pāpabhayākulāḥ
पर्वत की कन्दराओं में निवास करने वाले ये ऋषिगण फल-मूल-जल का भोजन करते हैं; उनका मन इन्द्रियों पर विजयी है, बुद्धि तीक्ष्ण है, और वे मानो कलिकाल के भय से ही पाप के भय से व्याकुल रहते हैं।
श्लोक 53 (skanda.2.95.53)
फलसमीरणगह्वरनिर्झराश्रमभरादुपलब्धपटोत्तमाः । त्रिषवणक्रमनिर्जितदुर्जयेन्द्रियपराक्रमणा मुनयस्त्वमी ।
phalasamīraṇagahvaranirjharāśramabharādupalabdhapaṭottamāḥ triṣavaṇakramanirjitadurjayendriyaparākramaṇā munayastvamī
फल, वायु, गुफा, झरने और आश्रम के सहारे उन्होंने उत्तम वस्त्र प्राप्त किए हैं; त्रिकाल-संध्या के क्रम से इन मुनियों ने दुर्जय इन्द्रियों के पराक्रम को भी जीत लिया है।
श्लोक 54 (skanda.2.95.54)
साधनानि बहून्येव कायक्लेशकराण्यहो । सुलभं साधनं लोके मानसोद्भेददर्शनम् ।
sādhanāni bahūnyeva kāyakleśakarāṇyaho sulabhaṁ sādhanaṁ loke mānasodbhedadarśanam
संसार में शरीर को क्लेश देने वाले अनेक साधन हैं, किन्तु मानसोद्भेद का दर्शन ही सबसे सुलभ साधन है।
श्लोक 55 (skanda.2.95.55)
यस्मिन्दिने जलं चैतल्लभते पुण्यवाञ्जनः । भवति व्याससदृशो यमपितृसमः क्रमात् ।
yasmindine jalaṁ caitallabhate puṇyavāñjanaḥ bhavati vyāsasadṛśo yamapitṛsamaḥ kramāt
जिस दिन कोई पुण्यवान् मनुष्य इसका जल प्राप्त करता है, वह क्रमशः व्यास के समान और यम-पितरों के समान हो जाता है।
श्लोक 56 (skanda.2.95.56)
काम्यतीर्थमिदं नॄणां कामनावशकृत्पुनः । अकामतस्तु मुक्तिः स्यादुभयोरेष निश्चयः ।
kāmyatīrthamidaṁ nṝṇāṁ kāmanāvaśakṛtpunaḥ akāmatastu muktiḥ syādubhayoreṣa niścayaḥ
यह मनुष्यों के लिए कामनाओं के अनुसार फल देने वाला काम्य-तीर्थ है; किन्तु निष्काम व्यक्ति के लिए यह मुक्ति ही देता है — यह दोनों के लिए निश्चित है।
श्लोक 57 (skanda.2.95.57)
यदि कश्चित्प्रमादेन कामनां कुरुते नरः । फलं भुक्त्वा पुनर्मुक्तिर्भवत्येव न संशयः ।
yadi kaścitpramādena kāmanāṁ kurute naraḥ phalaṁ bhuktvā punarmuktirbhavatyeva na saṁśayaḥ
यदि कोई मनुष्य असावधानीवश यहाँ कोई कामना कर बैठे, तो भी वह उसके फल को भोगकर अन्ततः मुक्ति ही प्राप्त करता है — इसमें संशय नहीं।
श्लोक 58 (skanda.2.95.58)
महरादिषु लोकेषु भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान् । भोगे भुक्ते पुनर्याति कामनावशतो जनः ।
maharādiṣu lokeṣu bhuktvā bhogānyathepsitān bhoge bhukte punaryāti kāmanāvaśato janaḥ
महर आदि लोकों में इच्छित भोगों को भोगकर, वे भोग समाप्त होने पर, कामनावश वह मनुष्य पुनः लौट आता है।
श्लोक 59 (skanda.2.95.59)
पुरुषार्थसमावाप्त्यै यतनीयं मनीषिभिः । मानसोद्भेदने तीर्थे नापेत्यत्रेति मे मतिः ।
puruṣārthasamāvāptyai yatanīyaṁ manīṣibhiḥ mānasodbhedane tīrthe nāpetyatreti me matiḥ
पुरुषार्थ की प्राप्ति के लिए बुद्धिमानों को प्रयत्न करना चाहिए; मेरा यह मत है कि मानसोद्भेदन तीर्थ में यह प्रयत्न कभी निष्फल नहीं होता।
श्लोक 60 (skanda.2.95.60)
मानसोद्भेदनात्प्रत्यग्दिशि सर्वमनोहरम् । वसुधारेति विख्यातं तीर्थं त्रैलोक्यदुर्लभम् ।
mānasodbhedanātpratyagdiśi sarvamanoharam vasudhāreti vikhyātaṁ tīrthaṁ trailokyadurlabham
मानसोद्भेदन से पश्चिम दिशा में सर्वमनोहर वसुधारा नामक तीर्थ विख्यात है, जो तीनों लोकों में दुर्लभ है।
श्लोक 61 (skanda.2.95.61)
त्रिलोक्यां सर्वतीर्थेभ्यः श्रेष्ठो बदरिकाश्रमः । श्रुत्वा तन्नारदात्सर्वे वसवः समुपागताः ।
trilokyāṁ sarvatīrthebhyaḥ śreṣṭho badarikāśramaḥ śrutvā tannāradātsarve vasavaḥ samupāgatāḥ
'तीनों लोकों में सब तीर्थों से बदरिकाश्रम श्रेष्ठ है' — यह नारद से सुनकर समस्त वसुगण वहाँ एकत्र आए।
श्लोक 62 (skanda.2.95.62)
त्रिंशद्वर्षसहस्राणि तपः परमदारुणम् । दलांबुप्राशनाश्चक्रुस्ततः सिद्धिमुपाययुः ।
triṁśadvarṣasahasrāṇi tapaḥ paramadāruṇam dalāṁbuprāśanāścakrustataḥ siddhimupāyayuḥ
तीस हजार वर्षों तक उन्होंने अत्यन्त कठोर तप किया, केवल पत्तों और जल का सेवन करते हुए, और तत्पश्चात् सिद्धि प्राप्त की।
श्लोक 63 (skanda.2.95.63)
भगवद्दर्शनात्प्राप्तानंदनिर्वृत्तविक्लमाः । हृदयानन्दसंदोहप्रफुल्लितमुखांबुजाः ।
bhagavaddarśanātprāptānaṁdanirvṛttaviklamāḥ hṛdayānandasaṁdohapraphullitamukhāṁbujāḥ
भगवान् के दर्शन से प्राप्त आनन्द से उनकी सारी थकान दूर हो गई; हृदय के आनन्द-समूह से उनके मुख-कमल खिल उठे।
श्लोक 64 (skanda.2.95.64)
दृष्ट्वा नारायणं देवं वरं लब्ध्वा मनोरमम् । हरिभक्तिसुखैश्वर्य्यं परं लब्ध्वा मुदं ययुः ।
dṛṣṭvā nārāyaṇaṁ devaṁ varaṁ labdhvā manoramam haribhaktisukhaiśvaryyaṁ paraṁ labdhvā mudaṁ yayuḥ
देव नारायण का दर्शन करके तथा मनोहर वर प्राप्त करके, वे हरि-भक्ति के सुख-ऐश्वर्य को पाकर परम आनन्द से भर उठे।
श्लोक 65 (skanda.2.95.65)
अत्र स्नात्वा जलं पीत्वा पूजयित्वा जनार्द्दनम् । इह लोके सुखं भुक्त्वा यात्यंते परमं पदम् ।
atra snātvā jalaṁ pītvā pūjayitvā janārddanam iha loke sukhaṁ bhuktvā yātyaṁte paramaṁ padam
यहाँ स्नान करके, जल पीकर और जनार्दन की पूजा करके, मनुष्य इस लोक में सुख भोगकर अन्त में परम पद को प्राप्त होता है।
श्लोक 66 (skanda.2.95.66)
अत्र पुण्यवतां ज्योतिर्दृश्यते जलमध्यतः । यद्दृष्ट्वा न पुनर्भूयो गर्भवासं प्रपद्यते ।
atra puṇyavatāṁ jyotirdṛśyate jalamadhyataḥ yaddṛṣṭvā na punarbhūyo garbhavāsaṁ prapadyate
यहाँ पुण्यवानों को जल के मध्य से एक ज्योति दिखाई देती है; उसे देखकर मनुष्य फिर कभी गर्भ-वास को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 67 (skanda.2.95.67)
येऽशुद्धपितृजाः पापाः पाषंडमतिवृत्तयः । न तेषां शिरसि प्रायः पतंत्यापः कदाचन ।
ye'śuddhapitṛjāḥ pāpāḥ pāṣaṁḍamativṛttayaḥ na teṣāṁ śirasi prāyaḥ pataṁtyāpaḥ kadācana
जो अशुद्ध पितरों से उत्पन्न पापी हैं, जिनकी बुद्धि पाखण्ड की ओर झुकी है — उनके सिर पर प्रायः यह जल कभी नहीं गिरता।
श्लोक 68 (skanda.2.95.68)
दिनत्रयं शुचिर्भूत्वा पूजयित्वा जनार्दनम् । उपोष्य भगवद्भक्त्या सिद्धान्पश्यंति साधवः ।
dinatrayaṁ śucirbhūtvā pūjayitvā janārdanam upoṣya bhagavadbhaktyā siddhānpaśyaṁti sādhavaḥ
तीन दिन शुद्ध रहकर, जनार्दन की पूजा करके, भगवद्भक्ति से उपवास करते हुए, साधुजन वहाँ सिद्धों का दर्शन प्राप्त करते हैं।
श्लोक 69 (skanda.2.95.69)
ये तत्र चपलास्तथ्यं न वदंति च लोलुपाः । परिहासपरद्रव्यपरस्त्रीकपटाग्रहाः ।
ye tatra capalāstathyaṁ na vadaṁti ca lolupāḥ parihāsaparadravyaparastrīkapaṭāgrahāḥ
जो वहाँ चंचल हैं, सत्य नहीं बोलते, लोभी हैं, उपहास में रत हैं, पराए धन तथा पराई स्त्री और छल के प्रति आग्रही हैं,
श्लोक 70 (skanda.2.95.70)
मलचैलावृताऽशांताऽशुचयस्त्यक्तसत्क्रियाः । तेषां मलिनचित्तानां फलमत्र न जायते ।
malacailāvṛtā'śāṁtā'śucayastyaktasatkriyāḥ teṣāṁ malinacittānāṁ phalamatra na jāyate
मलिन वस्त्र पहने, अशान्त, अशुद्ध और सत्कर्मों को त्याग चुके — ऐसे मलिन-चित्त लोगों को यहाँ कोई फल प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 71 (skanda.2.95.71)
ये तत्र साधकाः शांता विरला विधिवर्त्मगाः । तेषां जपस्तपोहोमो दानव्रतजपक्रियाः ।
ye tatra sādhakāḥ śāṁtā viralā vidhivartmagāḥ teṣāṁ japastapohomo dānavratajapakriyāḥ
किन्तु जो साधक वहाँ शान्त और विरले होकर विधि के मार्ग पर चलते हैं, उनके जप, तप, हवन, दान, व्रत और जप की क्रियाएँ —
श्लोक 72 (skanda.2.95.72)
क्रियमाणा यथाशक्त्या ह्यक्षय्यफलदायकाः ।
kriyamāṇā yathāśaktyā hyakṣayyaphaladāyakāḥ
यथाशक्ति की गई ये क्रियाएँ अवश्य ही अक्षय फल देने वाली होती हैं।
श्लोक 73 (skanda.2.95.73)
यत्किंचिच्छुभकर्माणि क्रियमाणानि देहिनाम् । महदादिफलं दद्युर्निःश्रेयसमनुत्तमम् ।
yatkiṁcicchubhakarmāṇi kriyamāṇāni dehinām mahadādiphalaṁ dadyurniḥśreyasamanuttamam
प्राणियों द्वारा किया गया जो कुछ भी शुभ कर्म है, वह यहाँ महान् और अनुपम कल्याण-रूपी फल प्रदान करता है।
श्लोक 74 (skanda.2.95.74)
श्रावणीयमिह किं फलाधिकं यत्र यांति विबुधाः फलार्थिनः । पूजितादनु हरेः प्रियार्थिनः स्वर्गमार्गनिरताः प्रमोदिनः ।
śrāvaṇīyamiha kiṁ phalādhikaṁ yatra yāṁti vibudhāḥ phalārthinaḥ pūjitādanu hareḥ priyārthinaḥ svargamārganiratāḥ pramodinaḥ
इससे बढ़कर सुनने योग्य फल यहाँ और क्या है — कि फल के इच्छुक बुद्धिमान लोग यहाँ आते हैं, और हरि की पूजा करके, उनकी प्रियता चाहते हुए, प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग-मार्ग में लगे रहते हैं?
श्लोक 75 (skanda.2.95.75)
यत्र संति न च विघ्नकारिणः कर्मणां हरिभयात्सुसिध्यति । निर्विशंति च फलं विवेकिनः कर्ममार्गनिरताः सुदेहिनः ।
yatra saṁti na ca vighnakāriṇaḥ karmaṇāṁ haribhayātsusidhyati nirviśaṁti ca phalaṁ vivekinaḥ karmamārganiratāḥ sudehinaḥ
यहाँ कर्मों में कोई विघ्नकारी नहीं है, क्योंकि हरि के भय से हर कार्य सुसिद्ध हो जाता है; और विवेकी, कर्ममार्ग में तत्पर उत्तम शरीरधारी उसका फल भली-भाँति भोगते हैं।
श्लोक 76 (skanda.2.95.76)
ये पठंत्यथ च पाठयंत्यहो पुण्यतीर्थविषयं प्रकाशितम् । भक्तिभावसमलंकृताश्च ते संप्रयान्ति हरिमंदिरं शुभम् ।
ye paṭhaṁtyatha ca pāṭhayaṁtyaho puṇyatīrthaviṣayaṁ prakāśitam bhaktibhāvasamalaṁkṛtāśca te saṁprayānti harimaṁdiraṁ śubham
जो इस प्रकाशित पुण्य-तीर्थ के विषय को पढ़ते और दूसरों को पढ़ाते हैं, वे भक्ति-भाव से अलंकृत होकर हरि के शुभ मन्दिर को प्राप्त होते हैं।