वैष्णव खण्ड · अध्याय 94
विशाला से भगवान् के अन्तर्धान तथा बदरी-नैवेद्य की महिमा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.94.1)
स्कंद उवाच । किमर्थं भगवांस्तत्र वसति श्रद्धया पुनः । किं पुण्यं किं फलं तस्य दर्शनस्पर्शनादिभिः ।
skaṁda uvāca kimarthaṁ bhagavāṁstatra vasati śraddhayā punaḥ kiṁ puṇyaṁ kiṁ phalaṁ tasya darśanasparśanādibhiḥ
स्कंद ने कहा — हे भगवन्, वे भगवान् वहाँ पुनः श्रद्धापूर्वक क्यों निवास करते हैं? उनके दर्शन, स्पर्श आदि का क्या पुण्य है, क्या फल है?
श्लोक 2 (skanda.2.94.2)
नैवेद्यभक्षणं चापि महापूजाकृतेस्तथा । प्रदक्षिणस्य च फलं ब्रूहि मे कृपया पितः ।
naivedyabhakṣaṇaṁ cāpi mahāpūjākṛtestathā pradakṣiṇasya ca phalaṁ brūhi me kṛpayā pitaḥ
उनके नैवेद्य के भक्षण का, महापूजा करने का, तथा प्रदक्षिणा का फल भी मुझे कृपापूर्वक बताइए, हे पिता।
श्लोक 3 (skanda.2.94.3)
शिव उवाच । पुरा कृतयुगस्यादौ सर्वभूतहिताय च । मूर्तिमान्भगवांस्तत्र तपोयोगसमाश्रितः ।
śiva uvāca purā kṛtayugasyādau sarvabhūtahitāya ca mūrtimānbhagavāṁstatra tapoyogasamāśritaḥ
शिव ने कहा — प्राचीन काल में, कृतयुग के आरम्भ में, सम्पूर्ण प्राणियों के हित के लिए, साक्षात् मूर्तिमान भगवान् वहाँ तप और योग का आश्रय लेकर विराजमान हुए।
श्लोक 4 (skanda.2.94.4)
त्रेतायुगे ह्यृषिगणैर्योगाभ्यासैकतत्परः । द्वापरे समनुप्राप्ते ज्ञाननिष्ठो हि दुर्लभः ।
tretāyuge hyṛṣigaṇairyogābhyāsaikatatparaḥ dvāpare samanuprāpte jñānaniṣṭho hi durlabhaḥ
त्रेतायुग में ऋषिगण योगाभ्यास में एकाग्र होकर उनका दर्शन करते रहे; द्वापर के आते ही ज्ञान-निष्ठा दुर्लभ हो गई।
श्लोक 5 (skanda.2.94.5)
ऋषीणां देवतानां च दुर्दर्शो भगवानभूत् । ततो ह्यृषिगणा देवा अलभ्य भगवद्गतिम् ।
ṛṣīṇāṁ devatānāṁ ca durdarśo bhagavānabhūt tato hyṛṣigaṇā devā alabhya bhagavadgatim
भगवान् ऋषियों और देवताओं के लिए भी दुर्लभ-दर्शन हो गए। तब ऋषिगण और देवता, भगवान् की गति को न पाकर,
श्लोक 6 (skanda.2.94.6)
स्वायंभुवं पदं याता विस्मयाकुलचेतसः । तत्र गत्वा नमस्कृत्य ऊचुर्लोकेश्वरं मुदा । बृहस्पतिं पुरस्कृत्य ऋषयश्च तपोधनाः ।
svāyaṁbhuvaṁ padaṁ yātā vismayākulacetasaḥ tatra gatvā namaskṛtya ūcurlokeśvaraṁ mudā bṛhaspatiṁ puraskṛtya ṛṣayaśca tapodhanāḥ
विस्मय से व्याकुल-चित्त होकर स्वायम्भुव (ब्रह्मा) के पद को गए। वहाँ जाकर, नमस्कार करके, तपोधन ऋषियों ने बृहस्पति को आगे करके हर्षपूर्वक लोकेश्वर (ब्रह्मा) से कहा।
श्लोक 7 (skanda.2.94.7)
देवा ऊचुः । नमस्ते सर्वलोकानामाश्रयः शरणार्तिहा । वृत्तिदः करुणापूर्णः पितामह सुरेश्वर । निवेदनीया विपदः समुद्धर्ता पितासि नः ।
devā ūcuḥ namaste sarvalokānāmāśrayaḥ śaraṇārtihā vṛttidaḥ karuṇāpūrṇaḥ pitāmaha sureśvara nivedanīyā vipadaḥ samuddhartā pitāsi naḥ
देवताओं ने कहा — हे सम्पूर्ण लोकों के आश्रय, शरण में आए हुओं की पीड़ा हरने वाले, आजीविका के दाता, करुणा से परिपूर्ण, हे पितामह, हे सुरेश्वर, आपको नमस्कार है! हमारी विपत्ति आपसे ही निवेदन करने योग्य है — आप ही हमारे उद्धारकर्ता पिता हैं।
श्लोक 8 (skanda.2.94.8)
ब्रह्मोवाच । किमर्थमागता यूयं विस्मयाकुलमानसाः । मिलिता ऋषिभिः साकं ब्रूतागमनकारणम् ।
brahmovāca kimarthamāgatā yūyaṁ vismayākulamānasāḥ militā ṛṣibhiḥ sākaṁ brūtāgamanakāraṇam
ब्रह्मा ने कहा — विस्मय से व्याकुल-मन होकर, ऋषियों के साथ मिलकर, आप सब किसलिए आए हैं? अपने आगमन का कारण कहिए।
श्लोक 9 (skanda.2.94.9)
देवा ऊचुः । द्वापरे समनुप्राप्ते विशालायां विशालधीः । भगवान्दृश्यते नैव तत्र किं कारणं वद ।
devā ūcuḥ dvāpare samanuprāpte viśālāyāṁ viśāladhīḥ bhagavāndṛśyate naiva tatra kiṁ kāraṇaṁ vada
देवताओं ने कहा — हे विशाल बुद्धि वाले, द्वापर युग के आ जाने पर, विशाला नगरी में भगवान् अब दिखाई नहीं देते। इसका क्या कारण है, कहिए।
श्लोक 10 (skanda.2.94.10)
विशाला किं परित्यक्ता ततो वा क्व गतः स्वयम् । अपराधादुतास्माकं कथं चासौ प्रसीदति ।
viśālā kiṁ parityaktā tato vā kva gataḥ svayam aparādhādutāsmākaṁ kathaṁ cāsau prasīdati
क्या विशाला को उन्होंने त्याग दिया है, या फिर स्वयं कहाँ चले गए हैं? क्या यह हमारे किसी अपराध के कारण है? और वे किस प्रकार पुनः प्रसन्न होंगे?
श्लोक 11 (skanda.2.94.11)
ब्रह्मोवाच । नाहमेतद्विजानामि श्रुतं चाद्य मुखाद्धि वः । को हेतुर्दृक्पथातीतो भगवान्भवतां सुराः । आगच्छत वयं यामस्तीरं क्षीरपयोनिधेः ।
brahmovāca nāhametadvijānāmi śrutaṁ cādya mukhāddhi vaḥ ko heturdṛkpathātīto bhagavānbhavatāṁ surāḥ āgacchata vayaṁ yāmastīraṁ kṣīrapayonidheḥ
ब्रह्मा ने कहा — मैं भी यह नहीं जानता; आज ही तुम्हारे मुख से यह मैंने सुना है। हे देवगण! भगवान् के दृष्टि-पथ से ओझल होने का क्या कारण है? आओ, हम क्षीरसागर के तट पर चलें।
श्लोक 12 (skanda.2.94.12)
इत्युक्तास्ते पुरोधाय ब्रह्माणं त्रिदिवौकसः । ययुः क्षीरांबुधेस्तीरमृषयश्च तपोधनाः ।
ityuktāste purodhāya brahmāṇaṁ tridivaukasaḥ yayuḥ kṣīrāṁbudhestīramṛṣayaśca tapodhanāḥ
ऐसा कहे जाने पर, स्वर्गवासी देवता ब्रह्मा को आगे करके, तपोधन ऋषियों के साथ क्षीरसागर के तट पर गए।
श्लोक 13 (skanda.2.94.13)
तत्र गत्वा जगन्नाथं देवदेवं वृषाकपिम् । गीर्भिश्चित्रपदार्थाभिस्तुष्टुवुर्जगदीश्वरम् ।
tatra gatvā jagannāthaṁ devadevaṁ vṛṣākapim gīrbhiścitrapadārthābhistuṣṭuvurjagadīśvaram
वहाँ जाकर उन्होंने जगन्नाथ, देवों के देव, वृषाकपि, जगदीश्वर की विचित्र अर्थ वाले स्तोत्रों से स्तुति की।
श्लोक 14 (skanda.2.94.14)
ब्रह्मोवाच । नमस्ते पुरुषाध्यक्ष सर्वभूतगुहाशय । वासुदेवाखिलाधार जगद्धेतो जगन्मय ।
brahmovāca namaste puruṣādhyakṣa sarvabhūtaguhāśaya vāsudevākhilādhāra jagaddheto jaganmaya
ब्रह्मा ने कहा — हे पुरुषों के अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों के हृदय की गुहा में निवास करने वाले, आपको नमस्कार है। हे वासुदेव, सबके आधार, जगत् के हेतु, जगन्मय — आपको नमस्कार है।
श्लोक 15 (skanda.2.94.15)
त्वमेव सर्वभूतानां हेतुः पतिरुताश्रयः । मायाशक्तिमुपाश्रित्य विचरस्येकसुन्दर ।
tvameva sarvabhūtānāṁ hetuḥ patirutāśrayaḥ māyāśaktimupāśritya vicarasyekasundara
आप ही समस्त प्राणियों के कारण, स्वामी और आश्रय हैं; माया-शक्ति का आश्रय लेकर, हे एकमात्र सुन्दर, आप विचरण करते हैं।
श्लोक 16 (skanda.2.94.16)
एको नानायते योऽसौ नटवज्जायतेऽव्ययः । व्यापकोऽपि कृपालुत्वाद्भक्तहृत्पद्मषट्पद । ददाति विविधानंदं तं वंदे जगतां पतिम् ।
eko nānāyate yo'sau naṭavajjāyate'vyayaḥ vyāpako'pi kṛpālutvādbhaktahṛtpadmaṣaṭpada dadāti vividhānaṁdaṁ taṁ vaṁde jagatāṁ patim
जो एक होते हुए भी अनेक रूप धारण करता है, जो अभिनेता के समान जन्म लेता प्रतीत होता है, फिर भी अविनाशी है; जो सर्वव्यापी होते हुए भी करुणावश भक्तों के हृदय-कमल का भ्रमर बन जाता है और नाना प्रकार का आनन्द प्रदान करता है — उस जगत्पति को मैं वन्दन करता हूँ।
श्लोक 17 (skanda.2.94.17)
देवा ऊचुः । विपद्वनांते हुतभुग्जनानां गृहीतसत्त्वस्त्रिदशावनीशः । चराचरात्मा भगवाननंतः कृपाकटाक्षैरवलोकतां नः ।
devā ūcuḥ vipadvanāṁte hutabhugjanānāṁ gṛhītasattvastridaśāvanīśaḥ carācarātmā bhagavānanaṁtaḥ kṛpākaṭākṣairavalokatāṁ naḥ
देवताओं ने कहा — विपत्ति-रूपी वन की अग्नि से पीड़ित जनों के प्राणों के आश्रय, त्रिलोकी के रक्षक, चराचर के आत्मा, अनन्त भगवान् — कृपा-कटाक्ष से हमारी ओर देखिए।
श्लोक 18 (skanda.2.94.18)
सकृद्यन्नामपीयूषरसपानपरः पुमान् । निःश्रेयसं तृणमिव मन्यते तं हरिं भजे ।
sakṛdyannāmapīyūṣarasapānaparaḥ pumān niḥśreyasaṁ tṛṇamiva manyate taṁ hariṁ bhaje
जिस पुरुष ने एक बार भी उनके नाम-रूपी अमृत-रस का पान कर लिया है, वह मोक्ष को भी तृण के समान मानने लगता है — उन्हीं हरि का मैं भजन करता हूँ।
श्लोक 19 (skanda.2.94.19)
अविद्याप्रतिबिंबत्वाज्जीवभावमुपागतः । विज्ञत्वादुपशांतात्मा स पुनातु जगत्त्रयम् ।
avidyāpratibiṁbatvājjīvabhāvamupāgataḥ vijñatvādupaśāṁtātmā sa punātu jagattrayam
जो अविद्या में प्रतिबिम्बित होने के कारण जीव-भाव को प्राप्त हुआ है, किन्तु ज्ञान के कारण जिसका आत्मा सदा शान्त है — वह तीनों लोकों को पवित्र करे।
श्लोक 20 (skanda.2.94.20)
गंधर्वा ऊचुः । पिबंति ये हरेः पदांबुसंगलेशतः पयः पयो न ते पुनःपुनः पिबंति मातुरंकतः । प्रसंगतो यदा भिधासुधां निपीय मानवा मृताऽमृतं व्रजंत्यधो न जातु यांत्यशंकिताः ।
gaṁdharvā ūcuḥ pibaṁti ye hareḥ padāṁbusaṁgaleśataḥ payaḥ payo na te punaḥpunaḥ pibaṁti māturaṁkataḥ prasaṁgato yadā bhidhāsudhāṁ nipīya mānavā mṛtā'mṛtaṁ vrajaṁtyadho na jātu yāṁtyaśaṁkitāḥ
गन्धर्वों ने कहा — जो हरि के चरण-जल के संसर्ग से थोड़ा भी जल पीते हैं, वे फिर बार-बार माता की गोद से दूध नहीं पीते (अर्थात् पुनः जन्म नहीं लेते)। जब मनुष्य सत्संग के प्रसंग से उनके नाम-रूपी सुधा का पान करते हैं, तो मरणधर्मा होते हुए भी अमृतत्व को प्राप्त होते हैं — निःसंदेह वे फिर कभी अधोगति को नहीं जाते।
श्लोक 21 (skanda.2.94.21)
ततः स्तुतो हरिः साक्षात्सिंधोरुत्थाय चाब्रवीत् । अलक्षितोऽपरैर्ब्रह्मा परं तद्वेद नापरः ।
tataḥ stuto hariḥ sākṣātsiṁdhorutthāya cābravīt alakṣito'parairbrahmā paraṁ tadveda nāparaḥ
तब इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, हरि साक्षात् क्षीरसागर से उठकर बोले — 'ब्रह्मा ने इस परम तत्त्व को जान लिया है, जो औरों को दिखाई नहीं देता; इसे और कोई नहीं जानता।'
श्लोक 22 (skanda.2.94.22)
ब्रह्मा तदुपधार्याथ नत्वा तस्मै दिवौकस । बोधयामास सकलं सुराः शृणुत सादरम् ।
brahmā tadupadhāryātha natvā tasmai divaukasa bodhayāmāsa sakalaṁ surāḥ śṛṇuta sādaram
ब्रह्मा ने इसे समझकर उन्हें प्रणाम किया, हे देववासी, और सबको यह ज्ञान कराया — 'हे देवगण, श्रद्धापूर्वक सुनो।'
श्लोक 23 (skanda.2.94.23)
अंतर्हितोऽसौ भगवान्दृष्ट्वा लोकान्कुमेधसः । श्रुत्वेत्थं वचनं तस्य सर्वे देवा दिवं ययुः ।
aṁtarhito'sau bhagavāndṛṣṭvā lokānkumedhasaḥ śrutvetthaṁ vacanaṁ tasya sarve devā divaṁ yayuḥ
लोगों को दुर्बुद्धि हुआ देखकर भगवान् अन्तर्धान हो गए। ब्रह्मा के इन वचनों को सुनकर सभी देवता स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 24 (skanda.2.94.24)
ततोऽहं यतिरूपेण तीर्थान्नारदसंज्ञकात् । उद्धृत्य स्थापयिष्यामि हरिं लोकहितेच्छया ।
tato'haṁ yatirūpeṇa tīrthānnāradasaṁjñakāt uddhṛtya sthāpayiṣyāmi hariṁ lokahitecchayā
'तब मैं यति के रूप में नारद नामक तीर्थ से हरि को उद्धृत कर, लोक-हित की इच्छा से, वहाँ स्थापित करूँगा' — [ब्रह्मा ने ऐसा कहा]।
श्लोक 25 (skanda.2.94.25)
यस्य दर्शनमात्रेण पातकानि महान्त्यपि । विलीयंते क्षणादेव सिंहं दृष्ट्वा मृगा इव ।
yasya darśanamātreṇa pātakāni mahāntyapi vilīyaṁte kṣaṇādeva siṁhaṁ dṛṣṭvā mṛgā iva
जिनके दर्शन-मात्र से बड़े-बड़े पाप भी क्षणभर में विलीन हो जाते हैं, जैसे सिंह को देखकर मृग भाग जाते हैं।
श्लोक 26 (skanda.2.94.26)
धर्माधर्मान्विजित्याथ बदरीशं विभुं हरिम् । दृष्ट्वा मुक्तिमुपायांति विनाऽऽयासं षडानन ।
dharmādharmānvijityātha badarīśaṁ vibhuṁ harim dṛṣṭvā muktimupāyāṁti vinā''yāsaṁ ṣaḍānana
हे षडानन! धर्म और अधर्म दोनों को जीतकर, बदरी के स्वामी, सर्वव्यापी हरि का दर्शन कर, लोग बिना किसी परिश्रम के मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।
श्लोक 27 (skanda.2.94.27)
त्यक्तप्रायाणि तीर्थानि हरिणा कलिकालतः । बदरीं समनुप्राप्य साक्षादेवावतिष्ठते ।
tyaktaprāyāṇi tīrthāni hariṇā kalikālataḥ badarīṁ samanuprāpya sākṣādevāvatiṣṭhate
कलिकाल के कारण हरि ने प्रायः अन्य सभी तीर्थों को त्याग दिया है; बदरी को प्राप्त कर वे स्वयं साक्षात् वहीं निवास करते हैं।
श्लोक 28 (skanda.2.94.28)
कलिकालमनुप्राप्य मुक्तिर्येषामभीप्सिता । द्रष्टव्या बदरी तैस्तु हित्वा तीर्थान्यशेषतः ।
kalikālamanuprāpya muktiryeṣāmabhīpsitā draṣṭavyā badarī taistu hitvā tīrthānyaśeṣataḥ
कलिकाल में जिन्हें मुक्ति की अभिलाषा है, उन्हें अन्य सभी तीर्थों को छोड़कर बदरी का दर्शन करना चाहिए।
श्लोक 29 (skanda.2.94.29)
विना ज्ञानेन योगेन तीर्थाटनपरिश्रमैः । एकेन जन्मना जंतुः कैवल्यं पदमश्नुते ।
vinā jñānena yogena tīrthāṭanapariśramaiḥ ekena janmanā jaṁtuḥ kaivalyaṁ padamaśnute
ज्ञान, योग अथवा तीर्थयात्रा के परिश्रम के बिना ही, प्राणी एक ही जन्म में कैवल्य-पद को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 30 (skanda.2.94.30)
जन्मांतरसहस्रैस्तु येन चाराधितो हरिः । स गच्छेद्बदरीं द्रष्टुं यत्र जंतुर्न शोचति ।
janmāṁtarasahasraistu yena cārādhito hariḥ sa gacchedbadarīṁ draṣṭuṁ yatra jaṁturna śocati
जिसने हजारों पूर्व-जन्मों में हरि की आराधना की हो, वही बदरी को देखने के लिए वहाँ पहुँचता है — जहाँ कोई भी प्राणी शोक नहीं करता।
श्लोक 31 (skanda.2.94.31)
बदरीबदरीत्युक्त्वा प्रसंगान्मनुजोत्तमः । संसारतिमिराबाधे दीपमुज्वालयत्यसौ ।
badarībadarītyuktvā prasaṁgānmanujottamaḥ saṁsāratimirābādhe dīpamujvālayatyasau
श्रेष्ठ मनुष्य प्रसंगवश भी 'बदरी, बदरी' कहकर संसार के अन्धकार में एक दीपक जला लेता है।
श्लोक 32 (skanda.2.94.32)
यथा दीपावलोकेन तमोबाधा न जायते । तथैव बदरीं दृष्ट्वा पुंसो मृत्युभयं कुतः ।
yathā dīpāvalokena tamobādhā na jāyate tathaiva badarīṁ dṛṣṭvā puṁso mṛtyubhayaṁ kutaḥ
जैसे दीपक के प्रकाश से अन्धकार की बाधा नहीं रहती, वैसे ही बदरी का दर्शन करने पर मनुष्य को मृत्यु का भय कहाँ रह जाता है?
श्लोक 33 (skanda.2.94.33)
दर्शनाद्यस्य पापानि रुदंत्यव्याहतानि च । मुक्तिमार्गमुपालक्ष्य तं वंदे बदरीपतिम् ।
darśanādyasya pāpāni rudaṁtyavyāhatāni ca muktimārgamupālakṣya taṁ vaṁde badarīpatim
जिनके दर्शन से बड़े-बड़े अनियंत्रित पाप भी रो पड़ते हैं — मुक्ति के मार्ग को इस प्रकार पहचानकर, मैं उन बदरीपति को वन्दन करता हूँ।
श्लोक 34 (skanda.2.94.34)
सशैलकानना भूमिर्दशधा दक्षिणीकृता । हरेः प्रदक्षिणं तद्वद्बदर्यां तत्पदेपदे ।
saśailakānanā bhūmirdaśadhā dakṣiṇīkṛtā hareḥ pradakṣiṇaṁ tadvadbadaryāṁ tatpadepade
पर्वतों और वनों सहित पृथ्वी की दस बार परिक्रमा करने का जो फल है, वही फल बदरी में हरि की प्रदक्षिणा के प्रत्येक पग पर प्राप्त होता है।
श्लोक 35 (skanda.2.94.35)
अश्वमेधे तु यत्पुण्यं वाजपेयशतेन च । हरेः प्रदक्षिणात्तद्वद्बदर्यां तत्पदेपदे ।
aśvamedhe tu yatpuṇyaṁ vājapeyaśatena ca hareḥ pradakṣiṇāttadvadbadaryāṁ tatpadepade
अश्वमेध यज्ञ और सौ वाजपेय यज्ञों का जो पुण्य है, वही पुण्य बदरी में हरि की प्रदक्षिणा के प्रत्येक पग पर प्राप्त होता है।
श्लोक 36 (skanda.2.94.36)
चतुर्मासे तु यत्पुण्यं ब्रह्मांडदानतस्तथा । हरेः प्रदक्षिणं तद्वद्बदर्यां तत्पदेपदे ।
caturmāse tu yatpuṇyaṁ brahmāṁḍadānatastathā hareḥ pradakṣiṇaṁ tadvadbadaryāṁ tatpadepade
चातुर्मास्य व्रत का तथा ब्रह्माण्ड-दान का जो पुण्य है, वही पुण्य बदरी में हरि की प्रदक्षिणा के प्रत्येक पग पर प्राप्त होता है।
श्लोक 37 (skanda.2.94.37)
अतिकृच्छ्रैर्महाकृच्छ्रैश्छांदसैः सुकृतं भवेत् । हरेः प्रदक्षिणं तद्वद्बदर्यां तत्पदेपदे ।
atikṛcchrairmahākṛcchraiśchāṁdasaiḥ sukṛtaṁ bhavet hareḥ pradakṣiṇaṁ tadvadbadaryāṁ tatpadepade
अतिकृच्छ्र, महाकृच्छ्र और वैदिक तपों से जो पुण्य होता है, वही पुण्य बदरी में हरि की प्रदक्षिणा के प्रत्येक पग पर प्राप्त होता है।
श्लोक 38 (skanda.2.94.38)
बदर्यां विष्णुनैवेद्यं सिक्थमात्रं षडानन । अशनाच्छोधयेत्पापं तुषाग्निरिव कांचनम् ।
badaryāṁ viṣṇunaivedyaṁ sikthamātraṁ ṣaḍānana aśanācchodhayetpāpaṁ tuṣāgniriva kāṁcanam
हे षडानन! बदरी में विष्णु के नैवेद्य का एक कण भी खाने से पाप ऐसे शुद्ध हो जाता है, जैसे भूसी की अग्नि से सोना शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 39 (skanda.2.94.39)
यदन्नं भगवानत्ति ऋषिभिर्न्नारदादिभिः । तत्सत्त्वशुद्धये सर्वैर्भोक्तव्यमविचारितम् ।
yadannaṁ bhagavānatti ṛṣibhirnnāradādibhiḥ tatsattvaśuddhaye sarvairbhoktavyamavicāritam
जो अन्न भगवान् नारद आदि ऋषियों के साथ स्वयं ग्रहण करते हैं, उसे बिना किसी संकोच के सत्त्व-शुद्धि के लिए सबको खाना चाहिए।
श्लोक 40 (skanda.2.94.40)
अमरा अपि यन्नूनं व्याजेनेच्छन्ति सर्वतः । भोक्तुं बदरिकां विष्णोर्नैवेद्यं यांति तत्पराः ।
amarā api yannūnaṁ vyājenecchanti sarvataḥ bhoktuṁ badarikāṁ viṣṇornaivedyaṁ yāṁti tatparāḥ
जिसे प्राप्त करने की इच्छा देवता भी सब ओर से किसी न किसी बहाने रखते हैं, उसी विष्णु के नैवेद्य को भोगने के लिए वे तत्पर होकर बदरिका आते हैं।
श्लोक 41 (skanda.2.94.41)
भोजनानंतरं विष्णोः प्रगच्छन्ति स्वमालयम् । प्रह्लादप्रमुखा भक्ताः प्रविशंति हरेः पदम् ।
bhojanānaṁtaraṁ viṣṇoḥ pragacchanti svamālayam prahlādapramukhā bhaktāḥ praviśaṁti hareḥ padam
विष्णु के भोजन (नैवेद्य) के पश्चात् देवता अपने-अपने धाम को लौट जाते हैं, किन्तु प्रह्लाद आदि भक्त हरि के परम पद में प्रवेश कर जाते हैं।
श्लोक 42 (skanda.2.94.42)
बाल्ययौवनवार्द्धक्ये यत्पापं ज्ञानतः कृतम् । नैवेद्यभक्षणाद्विष्णोर्बदर्यां तद्विलीयते ।
bālyayauvanavārddhakye yatpāpaṁ jñānataḥ kṛtam naivedyabhakṣaṇādviṣṇorbadaryāṁ tadvilīyate
बचपन, यौवन और वृद्धावस्था में जो पाप जान-बूझकर किया गया हो, वह विष्णु के नैवेद्य को बदरी में खाने से विलीन हो जाता है।
श्लोक 43 (skanda.2.94.43)
प्राणांतं यस्य पापस्य प्रायश्चित्तं प्रकीर्तितम् । विष्णोर्निवेदितं भुक्त्वा बदर्य्यां तन्निवर्त्तते ।
prāṇāṁtaṁ yasya pāpasya prāyaścittaṁ prakīrtitam viṣṇorniveditaṁ bhuktvā badaryyāṁ tannivarttate
जिस पाप का प्रायश्चित्त प्राण त्याग देना ही बताया गया है, वह भी बदरी में विष्णु को अर्पित अन्न ग्रहण करने से निवृत्त हो जाता है।
श्लोक 44 (skanda.2.94.44)
तीर्थांतरेषु यत्नेन मुक्तिं गच्छति मानवः । नैवेद्यभक्षणाद्विष्णोः सालोक्यं लभते नरः ।
tīrthāṁtareṣu yatnena muktiṁ gacchati mānavaḥ naivedyabhakṣaṇādviṣṇoḥ sālokyaṁ labhate naraḥ
अन्य तीर्थों में मनुष्य प्रयत्नपूर्वक मुक्ति प्राप्त करता है, किन्तु विष्णु के नैवेद्य को भोगने मात्र से मनुष्य साक्षात् उनकी लोक-प्राप्ति (सालोक्य) पा लेता है।
श्लोक 45 (skanda.2.94.45)
हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः । पादोदकं सनिर्माल्यं मस्तके यस्य सोऽच्युतः ।
hṛdi rūpaṁ mukhe nāma naivedyamudare hareḥ pādodakaṁ sanirmālyaṁ mastake yasya so'cyutaḥ
हृदय में जिसका रूप हो, मुख में जिसका नाम, उदर में हरि का नैवेद्य, तथा मस्तक पर जिनके चरणामृत और निर्माल्य विराजमान हों, वही अच्युत हो जाता है।
श्लोक 46 (skanda.2.94.46)
ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वंगनागमः । नैवेद्यभक्षणाद्विष्णोर्बदर्यां यांति संक्षयम् ।
brahmahatyā surāpānaṁ steyaṁ gurvaṁganāgamaḥ naivedyabhakṣaṇādviṣṇorbadaryāṁ yāṁti saṁkṣayam
ब्रह्महत्या, मद्यपान, चोरी और गुरुपत्नी-गमन जैसे महापाप भी, विष्णु के नैवेद्य के भक्षण से बदरी में सर्वथा नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 47 (skanda.2.94.47)
बदरीसदृशं क्षेत्रं नैवेद्यसदृशं वसु । नारदीयसमं क्षेत्रं न भूतं न भविष्यति ।
badarīsadṛśaṁ kṣetraṁ naivedyasadṛśaṁ vasu nāradīyasamaṁ kṣetraṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati
बदरी के समान कोई क्षेत्र, नैवेद्य के समान कोई सम्पत्ति, और नारदीय के समान कोई क्षेत्र न कभी हुआ है, न कभी होगा।
श्लोक 48 (skanda.2.94.48)
बदरी यत्नतो गम्या भोक्तव्यं तन्निवेदितम् । द्रष्टव्यो भगवान्वह्नितीर्थे स्नानं सुदुर्लभम् ।
badarī yatnato gamyā bhoktavyaṁ tanniveditam draṣṭavyo bhagavānvahnitīrthe snānaṁ sudurlabham
बदरी को प्रयत्नपूर्वक जाना चाहिए, वहाँ का निवेदित अन्न खाना चाहिए, भगवान् का दर्शन करना चाहिए; परन्तु अग्नि-तीर्थ में स्नान करना अत्यन्त दुर्लभ है।
श्लोक 49 (skanda.2.94.49)
पृथिव्यां यानि तीर्थानि व्रतानि नियमास्तथा । पादोदकं विशालायां पावनं पुरतो भवेत् ।
pṛthivyāṁ yāni tīrthāni vratāni niyamāstathā pādodakaṁ viśālāyāṁ pāvanaṁ purato bhavet
पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ, व्रत और नियम हैं, उन सबसे बढ़कर पवित्र है विशाला में प्राप्त होने वाला चरणामृत।
श्लोक 50 (skanda.2.94.50)
किं तस्य दानैस्तपसा तीर्थाटनपरिश्रमैः । बदर्यां विष्णुपादोदबिंदुमात्रं लभेद्यदि ।
kiṁ tasya dānaistapasā tīrthāṭanapariśramaiḥ badaryāṁ viṣṇupādodabiṁdumātraṁ labhedyadi
यदि बदरी में विष्णु के चरण-जल की एक बूँद भी प्राप्त हो जाए, तो फिर दान, तप और तीर्थयात्रा के परिश्रम से क्या प्रयोजन?
श्लोक 51 (skanda.2.94.51)
प्रायश्चित्तानि जल्पंति तावदेव षडानन । यावन्न लभ्यते विष्णोर्बदर्यां चरणोदकम् ।
prāyaścittāni jalpaṁti tāvadeva ṣaḍānana yāvanna labhyate viṣṇorbadaryāṁ caraṇodakam
हे षडानन! प्रायश्चित्तों की चर्चा तभी तक होती है, जब तक बदरी में विष्णु का चरणोदक प्राप्त नहीं हो जाता।
श्लोक 52 (skanda.2.94.52)
अनायासेन येषां वा इच्छा मुक्तिपथे नृणाम् । कर्त्तव्यं तैः प्रयत्नेन विष्णोर्नैवेद्यभक्षणम् ।
anāyāsena yeṣāṁ vā icchā muktipathe nṛṇām karttavyaṁ taiḥ prayatnena viṣṇornaivedyabhakṣaṇam
जिन मनुष्यों की बिना परिश्रम के मुक्ति-मार्ग पाने की इच्छा हो, उन्हें प्रयत्नपूर्वक विष्णु के नैवेद्य का भक्षण करना चाहिए।
श्लोक 53 (skanda.2.94.53)
ये नराः प्रतिगृह्णंति पापाः संसारभागिनः । यात्राकृतं फलं तेषां न कदाचित्प्रजायते ।
ye narāḥ pratigṛhṇaṁti pāpāḥ saṁsārabhāginaḥ yātrākṛtaṁ phalaṁ teṣāṁ na kadācitprajāyate
जो पापी मनुष्य लोभवश ग्रहण करते हुए संसार में ही बँधे रहते हैं, उनकी तीर्थयात्रा का फल कभी सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 54 (skanda.2.94.54)
नैवेद्यनिंदनाद्विष्णोर्निंद्यंते ते तमोगताः । नैवेद्यभक्षणात्सत्त्वशुद्धिरेव न संशयः ।
naivedyaniṁdanādviṣṇorniṁdyaṁte te tamogatāḥ naivedyabhakṣaṇātsattvaśuddhireva na saṁśayaḥ
विष्णु के नैवेद्य की निन्दा करने से वे स्वयं ही निन्दित होकर अन्धकार को प्राप्त होते हैं; नैवेद्य के भक्षण से निश्चय ही सत्त्व की शुद्धि होती है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 55 (skanda.2.94.55)
नैवेद्यं स्वयमानीय ब्राह्मणान्भोजयंति ये । तुलापुरुषदानेन किं फलं ते कृतार्थिनः ।
naivedyaṁ svayamānīya brāhmaṇānbhojayaṁti ye tulāpuruṣadānena kiṁ phalaṁ te kṛtārthinaḥ
जो लोग स्वयं नैवेद्य लाकर ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, उन कृतार्थ जनों को फिर तुला-पुरुष दान से क्या फल प्राप्त करना शेष रहता है?
श्लोक 56 (skanda.2.94.56)
कुरुक्षेत्रे समासाद्य राहुग्रस्ते दिवाकरे । महादानेन यत्पुण्यं बदर्य्यां ग्रासमात्रतः ।
kurukṣetre samāsādya rāhugraste divākare mahādānena yatpuṇyaṁ badaryyāṁ grāsamātrataḥ
सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में महादान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य बदरी में केवल एक ग्रास (कौर) से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 57 (skanda.2.94.57)
बदरीक्षेत्रमासाद्य ग्रासमात्रं प्रयत्नतः । उपायोऽयं महांस्तत्र बदर्यां हरितोषणे । यतिभ्यो भोजनाद्विष्णोरपराध्यपि वल्लभः ।
badarīkṣetramāsādya grāsamātraṁ prayatnataḥ upāyo'yaṁ mahāṁstatra badaryāṁ haritoṣaṇe yatibhyo bhojanādviṣṇoraparādhyapi vallabhaḥ
बदरी क्षेत्र में पहुँचकर प्रयत्नपूर्वक प्राप्त किया गया एक ग्रास ही हरि को प्रसन्न करने का महान् उपाय है; विष्णु के लिए यतियों को भोजन कराने से अपराधी भी उन्हें प्रिय हो जाता है।
श्लोक 58 (skanda.2.94.58)
न विष्णोः सदृशो देवो न विशाला समा पुरी । न भिक्षुसदृशं पात्रमृषितीर्थसमं न हि ।
na viṣṇoḥ sadṛśo devo na viśālā samā purī na bhikṣusadṛśaṁ pātramṛṣitīrthasamaṁ na hi
विष्णु के समान कोई देव नहीं, विशाला के समान कोई नगरी नहीं; भिक्षु के समान कोई सुपात्र नहीं, और ऋषि-तीर्थ के समान कुछ भी नहीं।
श्लोक 59 (skanda.2.94.59)
चातुर्मास्यं प्रकुर्वंति ये नराः पुण्यशालिनः । तेषां पुण्यफलं वक्तुं ब्रह्मणापि न शक्यते ।
cāturmāsyaṁ prakurvaṁti ye narāḥ puṇyaśālinaḥ teṣāṁ puṇyaphalaṁ vaktuṁ brahmaṇāpi na śakyate
जो पुण्यशाली मनुष्य वहाँ चातुर्मास्य व्रत करते हैं, उनके पुण्य के फल को कहना ब्रह्मा के लिए भी सम्भव नहीं है।
श्लोक 60 (skanda.2.94.60)
भिक्षुकाणां फलावाप्तिर्विशेषादिह कीर्त्यते । वेदांतश्रवणात्पुण्यं दशधा यत्प्रकीर्तितम् ।
bhikṣukāṇāṁ phalāvāptirviśeṣādiha kīrtyate vedāṁtaśravaṇātpuṇyaṁ daśadhā yatprakīrtitam
भिक्षुकों को यहाँ विशेष रूप से फल-प्राप्ति कही गई है; वेदान्त-श्रवण से जो दस गुना पुण्य कहा गया है,
श्लोक 61 (skanda.2.94.61)
बदरी दृष्टिमात्रेण भिक्षुकाणां तदिष्यते । चातुर्मास्ये विशेषेण कैवल्यफलभागिनः ।
badarī dṛṣṭimātreṇa bhikṣukāṇāṁ tadiṣyate cāturmāsye viśeṣeṇa kaivalyaphalabhāginaḥ
वही पुण्य भिक्षुकों को बदरी के दर्शन-मात्र से प्राप्त हो जाता है; चातुर्मास्य में तो वे विशेष रूप से कैवल्य-फल के भागी बन जाते हैं।
श्लोक 62 (skanda.2.94.62)
न्यासिनो बदरीस्थाने विनायासेन पुत्रक । ये मूर्खा जाड्यमापन्ना दम्भकाषायवाससः । बदरीदर्शनात्तेषां मुक्तिः करतले स्थिता ।
nyāsino badarīsthāne vināyāsena putraka ye mūrkhā jāḍyamāpannā dambhakāṣāyavāsasaḥ badarīdarśanātteṣāṁ muktiḥ karatale sthitā
हे पुत्र! बदरी के स्थान में संन्यासियों को बिना किसी परिश्रम के ही मुक्ति मिल जाती है। जो मूर्ख भी हैं, जड़ता को प्राप्त हैं, केवल दम्भ से गेरुआ वस्त्र धारण किए हैं — उनके लिए भी बदरी के दर्शन से मुक्ति हथेली पर रखी हुई है।
श्लोक 63 (skanda.2.94.63)
ज्ञानिनोऽज्ञानिनो वापि न्यासिनो नियतव्रता । द्रष्टव्या बदरी तैस्तु फलानि समभीप्सुभिः ।
jñānino'jñānino vāpi nyāsino niyatavratā draṣṭavyā badarī taistu phalāni samabhīpsubhiḥ
ज्ञानी हों या अज्ञानी, नियत व्रत वाले संन्यासी हों — जो भी इन फलों की समान रूप से इच्छा रखते हैं, उन सबको बदरी का दर्शन करना चाहिए।
श्लोक 64 (skanda.2.94.64)
श्रुत्वाऽध्यायमिमं पुण्यं प्रसंगेनापि मानवः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते ।
śrutvā'dhyāyamimaṁ puṇyaṁ prasaṁgenāpi mānavaḥ sarvapāpavinirmukto viṣṇuloke mahīyate
जो मनुष्य इस पुण्यमय अध्याय को प्रसंगवश भी सुन लेता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में महिमामण्डित होता है।