वैष्णव खण्ड · अध्याय 93
गरुडशिला, वाराहीशिला और नारसिंहीशिला की महिमा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.93.1)
स्कन्द उवाच । वैनतेयशिलायास्तु माहात्म्यं वद मे पितः । किं पुण्यं किं फलं चास्य अनुभावं च किं भवेत् ।
skanda uvāca vainateyaśilāyāstu māhātmyaṁ vada me pitaḥ kiṁ puṇyaṁ kiṁ phalaṁ cāsya anubhāvaṁ ca kiṁ bhavet
स्कन्द ने कहा — हे पिता, वैनतेय-शिला का माहात्म्य मुझे बताइए। इसका क्या पुण्य है, क्या फल है, और इसका प्रभाव क्या है?
श्लोक 2 (skanda.2.93.2)
शिव उवाच । कश्यपाद्विनतागर्भे महाबलपराक्रमौ । गरुडारुणौ प्रजातौ द्वावरुणः सूर्यसारथिः ।
śiva uvāca kaśyapādvinatāgarbhe mahābalaparākramau garuḍāruṇau prajātau dvāvaruṇaḥ sūryasārathiḥ
शिव ने कहा — कश्यप से विनता के गर्भ में महान बल और पराक्रम वाले दो पुत्र उत्पन्न हुए — गरुड़ और अरुण; उनमें अरुण सूर्य के सारथी बने।
श्लोक 3 (skanda.2.93.3)
बदर्य्या दक्षिणे भागे गन्धमादनशृङ्गके । गरुडस्तप आतेपे हरिवाहनकाम्यया ।
badaryā dakṣiṇe bhāge gandhamādanaśṛṅgake garuḍastapa ātepe harivāhanakāmyayā
बदरी के दक्षिण भाग में गंधमादन पर्वत के शिखर पर, गरुड़ ने हरि का वाहन बनने की इच्छा से तप किया।
श्लोक 4 (skanda.2.93.4)
फलमूलजलाहारो निर्द्वंद्वो जपतां वरः । पदैकेनोपसंक्रम्य भुवि जेपे निरामयः ।
phalamūlajalāhāro nirdvaṁdvo japatāṁ varaḥ padaikenopasaṁkramya bhuvi jepe nirāmayaḥ
फल-मूल और जल का ही आहार करते हुए, द्वंद्वों से रहित, जप करने वालों में श्रेष्ठ गरुड़ एक ही पैर पर भूमि पर खड़े होकर निरोगी होकर जप करते रहे।
श्लोक 5 (skanda.2.93.5)
त्रिंशद्वर्षसहस्राणि हरिदर्शन लालसः । ततस्तु भगवान्साक्षात्पीतवासा निजायुधः ।
triṁśadvarṣasahasrāṇi haridarśana lālasaḥ tatastu bhagavānsākṣātpītavāsā nijāyudhaḥ
तीस हजार वर्षों तक हरि के दर्शन की लालसा रखते हुए तप किया; तब साक्षात् भगवान् पीताम्बरधारी, अपने आयुधों सहित—
श्लोक 6 (skanda.2.93.6)
आविरासीद्यथा प्राच्यां दिशींदुरिव पुष्कलः । उवाच वचनं सम्यङ्मेघगंभीरनिस्वनः ।
āvirāsīdyathā prācyāṁ diśīnduriva puṣkalaḥ uvāca vacanaṁ samyaṅmeghagaṁbhīranisvanaḥ
पूर्व दिशा में पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकट हुए, तथा मेघ के समान गंभीर स्वर में सम्यक् वचन बोले।
श्लोक 7 (skanda.2.93.7)
तथापि न बहिर्वृत्तिर्दध्मौ दरवरं ततः । तथापि न बहिर्वृत्तिर्गरुडस्य महात्मनः ।
tathāpi na bahirvṛttirdadhmau daravaraṁ tataḥ tathāpi na bahirvṛttirgaruḍasya mahātmanaḥ
फिर भी बिना किसी बाह्य क्रिया के उन्होंने उत्तम शंख बजाया; और महात्मा गरुड़ की भी कोई बाह्य चेष्टा नहीं हुई, वे समाधिस्थ ही बने रहे।
श्लोक 8 (skanda.2.93.8)
ततः प्रविश्य भगवानंतरं पवनक्रमात् । बहिरुन्मुखतां चैव रचयन्बहिराबभौ ।
tataḥ praviśya bhagavānantaraṁ pavanakramāt bahirunmukhatāṁ caiva racayanbahirābabhau
तब भगवान् प्राणवायु के क्रम से उसके अंतःकरण में प्रवेश करके, उसे बाहरमुख करते हुए, स्वयं बाहर प्रकट हो गए।
श्लोक 9 (skanda.2.93.9)
भगवंतं हरिं दृष्ट्वा गरुडो गतसाध्वसः । पुलकांकित सर्वांगस्तुष्टाव विहितांजलिः ।
bhagavantaṁ hariṁ dṛṣṭvā garuḍo gatasādhvasaḥ pulakāṁkita sarvāṁgastuṣṭāva vihitāṁjaliḥ
भगवान् हरि को देखकर गरुड़ का समस्त भय जाता रहा; रोमांचित होकर, हाथ जोड़कर उन्होंने स्तुति की।
श्लोक 10 (skanda.2.93.10)
गरुड उवाच । जयजय त्रिभुवनजनमनोभवन विदलिताघगुण सकलगीर्वाणवंदित चरणकमलयुगलपरिमलबहलरिपुवनविभंजन विद्योतमान सकलसुरासुरमुकुटकोटिविलसित निजपीठकमलनिरसित निजजनहृदयतिमिरपटलबहल हिमकर इव त्रिविधसंतापसंदोहहरणचरण जगदुदयस्थितिलयविलासविलसित त्रिविधमूर्तिकीर्तिविस्फूर्जित जगदुदयसंदोह दिनकर इव निजजनमानससरोजषट्पदविदित सकलवेदविद्योतमान मानस निजजनमुनिजनवन्दित पदनखनीरपवित्रीकृत गीर्वाणमुनिमानसवंदित चरणरजःप्रसादसारभूत जगतामधीश नमस्ते नमस्ते ।
garuḍa uvāca jayajaya tribhuvanajanamanobhavana vidalitāghaguṇa sakalagīrvāṇavaṁdita caraṇakamalayugalaparimalabahalaripuvanavibhaṁjana vidyotamāna sakalasurāsuramukuṭakoṭivilasita nijapīṭhakamalanirasita nijajanahṛdayatimirapaṭalabahala himakara iva trividhasaṁtāpasaṁdohaharaṇacaraṇa jagadudayasthitilayavilāsavilasita trividhamūrtikīrtivisphūrjita jagadudayasaṁdoha dinakara iva nijajanamānasasarojaṣaṭpadavidita sakalavedavidyotamāna mānasa nijajanamunijanavandita padanakhanīrapavitrīkṛta gīrvāṇamunimānasavandita caraṇarajaḥprasādasārabhūta jagatāmadhīśa namaste namaste
गरुड़ ने कहा — जय हो, जय हो! हे तीनों लोकों के जीवों के मन में निवास करने वाले, पापों के समूह को नष्ट करने वाले, समस्त देवताओं द्वारा वंदित चरणकमल-युगल की सुगंध से शत्रुओं के वन को नष्ट करने वाले, देदीप्यमान, समस्त सुर-असुरों के करोड़ों मुकुटों से सुशोभित अपने पीठ-कमल से भक्तों के हृदय के घने अंधकार-पटल को चन्द्रमा के समान दूर करने वाले, त्रिविध तापों के समूह को हरने वाले चरणों वाले, जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय की लीला से सुशोभित, त्रिविध मूर्तियों की कीर्ति से देदीप्यमान, जगत की उत्पत्ति के लिए सूर्य के समान, अपने भक्तों के मानस-सरोवर के भ्रमर-स्वरूप ज्ञात, समस्त वेदों से प्रकाशित मन वाले, अपने भक्तों और मुनियों द्वारा वंदित चरण-नखों के जल से पवित्र करने वाले, देवताओं और मुनियों के मानस में वंदित चरण-रज की कृपा के सार-स्वरूप, हे जगत के अधीश्वर, आपको बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है!
श्लोक 11 (skanda.2.93.11)
अपि च । अष्टशक्तिसहितो वनमाली पीतचैलकुसुमावलिशोभः । पंकजाकरविराजितपादः पातु मामवहितेन्द्रियवर्गः ।
api ca aṣṭaśaktisahito vanamālī pītacailakusumāvaliśobhaḥ paṅkajākaravirājitapādaḥ pātu māmavahitendriyavargaḥ
और भी — आठों शक्तियों सहित, वनमाला धारण किए हुए, पीत वस्त्र और पुष्पों की माला से सुशोभित, कमल-समूह के समान देदीप्यमान चरणों वाले, इन्द्रियों के समूह पर सावधान वे प्रभु मेरी रक्षा करें।
श्लोक 12 (skanda.2.93.12)
भक्तहृत्कमलराजितमूर्तिर्दुष्टदैत्यदलनोत्थितकीर्तिः । बद्धसेतुरविताश्रितलोकः पातु मामनुदिनं भुवनेशः ।
bhaktahṛtkamalarājitamūrtirduṣṭadaityadalanotthitakīrtiḥ baddhaseturavitāśritalokaḥ pātu māmanudinaṁ bhuvaneśaḥ
जिनकी मूर्ति भक्तों के हृदय-कमल में विराजमान है, जिनकी कीर्ति दुष्ट दैत्यों के विनाश से उत्पन्न हुई है, जिन्होंने सेतु बाँधकर आश्रित लोकों की रक्षा की है — वे भुवनेश्वर प्रतिदिन मेरी रक्षा करें।
श्लोक 13 (skanda.2.93.13)
स्थिरचलत्रिविधतापहिमांशुर्भासमानतरणिप्रतिभासः । एक एव बहुधा कृतवेषो माययावतु महामतिरीशः ।
sthiracalatrividhatāpahimāṁśurbhāsamānataraṇipratibhāsaḥ eka eva bahudhā kṛtaveṣo māyayāvatu mahāmatirīśaḥ
जो चर-अचर सभी को पीड़ित करने वाले त्रिविध तापों के लिए चन्द्रमा के समान शीतल हैं, और स्वयं देदीप्यमान सूर्य के समान प्रकाशमान हैं, जो एक होते हुए भी अपनी माया से नाना रूप धारण करते हैं — वह महाबुद्धि ईश्वर मेरी रक्षा करें।
श्लोक 14 (skanda.2.93.14)
भक्तचिंतनकृते कृतरूपः शैशवेन बहुशासितभूपः । वेदमार्ग उरुधा हितकारी रीतिरीशितुरियं गुणशाली ।
bhaktaciṁtanakṛte kṛtarūpaḥ śaiśavena bahuśāsitabhūpaḥ vedamārga urudhā hitakārī rītirīśiturīyaṁ guṇaśālī
जो भक्तों के चिंतन के लिए रूप धारण करते हैं, जिन्होंने बाल्यावस्था में ही अनेक राजाओं को अनुशासित किया, जो वेद-मार्ग से विस्तृत रूप में हितकारी हैं — यह ईश्वर की गुणसंपन्न रीति है।
श्लोक 15 (skanda.2.93.15)
यज्ञभुग्घृदयबंधनधारी विश्वमूर्तिरबलांशुकहारी । पालनेऽपि महतां बहुदेहो रास एष तनुमानवतान्नः ।
yajñabhuggghṛdayabandhanadhārī viśvamūrtirabalāṁśukahārī pālane'pi mahatāṁ bahudeho rāsa eṣa tanumānavatānnaḥ
यज्ञ को भोगने वाले, हृदय के बंधन को धारण करने वाले, विश्व-मूर्ति, गोपियों के वस्त्र हरने वाले, महापुरुषों के पालन में भी अनेक देह धारण करने वाले — यह रास ही हमारे लिए देहधारी मनुष्यों की मुक्ति का साधन है।
श्लोक 16 (skanda.2.93.16)
प्रेमभक्तिपुरुषैरुपलभ्यः पूरुषः कृतसमस्तनिवासः । दास्यवृंदहृषितो निजदासः प्रेक्षणैककरुणोवतु विश्वम् ।
premabhaktipuruṣairupalabhyaḥ pūruṣaḥ kṛtasamastanivāsaḥ dāsyavṛṁdahṛṣito nijadāsaḥ prekṣaṇaikakaruṇovatu viśvam
जो प्रेम-भक्ति वाले पुरुषों द्वारा ही प्राप्त किए जाते हैं, जिन्होंने सभी में अपना निवास बनाया है, जो अपने दासों के समूह से हर्षित होकर स्वयं भी दास बन जाते हैं — वह एकमात्र करुणामयी दृष्टि से विश्व की रक्षा करें।
श्लोक 17 (skanda.2.93.17)
कंठलंबिततरक्षुनखाग्रक्रुष्टगोपरमणीकुचभारः । लीलया युवतिभिः कृतवेषः शेष एष भवतादुपशांत्यै ।
kaṇṭhalaṁbitatarakṣunakhāgrakruṣṭagoparamaṇīkucabhāraḥ līlayā yuvatibhiḥ kṛtaveṣaḥ śeṣa eṣa bhavatādupaśāṁtyai
गले में लटकते हुए, नखों के अग्रभाग से गोपिकाओं के कुच-भार को स्पर्श करने वाले, लीलापूर्वक युवतियों के साथ वेष धारण करने वाले — यह शेष-स्वरूप ही हमारी शांति के लिए हो।
श्लोक 18 (skanda.2.93.18)
दंडपाणिरयमेव जनानां शासितात्मनियमोक्तहितानाम् । पावनाय महतामनुशाली विश्वदुःखशमनो भवतान्नः ।
daṇḍapāṇirayameva janānāṁ śāsitātmaniyamoktahitānām pāvanāya mahatāmanuśālī viśvaduḥkhaśamano bhavatānnaḥ
यही दण्डधारी हैं जो अपने नियमों के अनुसार लोगों का शासन करके उनका हित करते हैं; महापुरुषों की पवित्रता के लिए अनुकूल, विश्व के दुःख को शांत करने वाले वे हमारे लिए हों।
श्लोक 19 (skanda.2.93.19)
एवं स्तुतस्ततः साक्षाद्गरुडेन महात्मना । पूजार्थमाजुहावैनां गंगां त्रिपथगामिनीम् ।
evaṁ stutastataḥ sākṣādgaruḍena mahātmanā pūjārthamājuhāvaināṁ gaṁgāṁ tripathagāminīm
इस प्रकार महात्मा गरुड़ द्वारा साक्षात् स्तुत होकर, भगवान् ने पूजा के लिए त्रिपथगामिनी गंगा का आह्वान किया।
श्लोक 20 (skanda.2.93.20)
ततः पंचमुखी साक्षादाविरासीन्नगोपरि । तेनोदकेन पादार्घं चकार विनतासुतः ।
tataḥ paṁcamukhī sākṣādāvirāsīnnagopari tenodakena pādārghaṁ cakāra vinatāsutaḥ
तब पंचमुखी गंगा साक्षात् उस पर्वत के ऊपर प्रकट हुईं; उसी जल से विनता-पुत्र (गरुड़) ने चरणों का अर्घ्य दिया।
श्लोक 21 (skanda.2.93.21)
व्रियतां वर इत्युक्तो गरुडो हरिणा ततः । तवैकवाहनः श्रीमान्बलवीर्यपराक्रमः । अजेयो देवदैत्यानां स्यामहं ते प्रसादतः ।
vriyatāṁ vara ityukto garuḍo hariṇā tataḥ tavaikavāhanaḥ śrīmānbalavīryaparākramaḥ ajeyo devadaityānāṁ syāmahaṁ te prasādataḥ
'वर माँगो' — ऐसा हरि द्वारा कहे जाने पर गरुड़ ने कहा — मैं आपका ही एकमात्र वाहन, बल-वीर्य-पराक्रम से युक्त, तथा आपकी कृपा से देवों और दैत्यों दोनों के लिए अजेय हो जाऊँ।
श्लोक 22 (skanda.2.93.22)
इयं मन्नामविख्याता सर्वपापहरा शिला । एतस्याः स्मरणात्पुंसां विषव्याधिर्न जायताम् ।
iyaṁ mannāmavikhyātā sarvapāpaharā śilā etasyāḥ smaraṇātpuṁsāṁ viṣavyādhirna jāyatām
'यह शिला मेरे ही नाम से विख्यात होकर समस्त पापों का हरण करने वाली होगी। इसके स्मरण मात्र से मनुष्यों को विष का रोग कभी न हो।'
श्लोक 23 (skanda.2.93.23)
एवमुक्त्वा ततस्तूष्णीं बभूव विनतासुतः । ओमित्युक्त्वा ततो विष्णुरुवाचेदं वचो हितम् ।
evamuktvā tatastūṣṇīṁ babhūva vinatāsutaḥ omityuktvā tato viṣṇuruvācedaṁ vaco hitam
ऐसा कहकर विनता-पुत्र मौन हो गए। तब विष्णु ने 'ॐ' कहकर यह हितकर वचन कहा।
श्लोक 24 (skanda.2.93.24)
बदरीं त्वं प्रयाहीति नारदेन निषेविताम् । स्नानं नारदतीर्थादावुपवासत्रयं शुचिः । कृत्वा मद्दर्शनं तत्र सुलभं ते भविष्यति ।
badarīṁ tvaṁ prayāhīti nāradena niṣevitām snānaṁ nāradatīrthādāvupavāsatrayaṁ śuciḥ kṛtvā maddarśanaṁ tatra sulabhaṁ te bhaviṣyati
'तुम बदरी जाओ, जो नारद द्वारा सेवित है; नारदतीर्थ आदि में स्नान करके, शुद्ध होकर तीन दिन उपवास करने से, वहाँ मेरा दर्शन तुम्हारे लिए सुलभ हो जाएगा।'
श्लोक 25 (skanda.2.93.25)
इत्युक्त्वांतर्द्दधे विष्णुस्तडित्सौदामनी यथा । गरुडस्तु ततः शीघ्रमागत्य बदरीं मुदा ।
ityuktvāntarddadhe viṣṇustaḍitsaudāmanī yathā garuḍastu tataḥ śīghramāgatya badarīṁ mudā
ऐसा कहकर विष्णु बिजली की चमक के समान अंतर्धान हो गए। गरुड़ भी तब शीघ्रता से हर्षपूर्वक बदरी में आए।
श्लोक 26 (skanda.2.93.26)
वह्नितीर्थं समासाद्य शिलामाश्रित्य तत्परः । स्नात्वा नारदतीर्थेषु व्रतचर्यामथाकरोत् ।
vahnitīrthaṁ samāsādya śilāmāśritya tatparaḥ snātvā nāradatīrtheṣu vratacaryāmathākarot
वह्नितीर्थ में पहुँचकर, शिला का आश्रय लेकर, तत्पर होकर, नारद-तीर्थों में स्नान करके उन्होंने व्रत का आचरण किया।
श्लोक 27 (skanda.2.93.27)
ततस्तु नारदे तीर्थे दृष्ट्वा भगवतः स्थितिम् । नमस्कृत्य विधानेन तदाज्ञातः पुरं ययौ ।
tatastu nārade tīrthe dṛṣṭvā bhagavataḥ sthitim namaskṛtya vidhānena tadājñātaḥ puraṁ yayau
तब नारद-तीर्थ में भगवान् की स्थिति का दर्शन करके, विधिपूर्वक नमस्कार करके, उनकी आज्ञा पाकर वे अपने नगर को चले गए।
श्लोक 28 (skanda.2.93.28)
ततः प्रभृति त्रैलोक्ये गारुडीति शिलोच्यते ।
tataḥ prabhṛti trailokye gāruḍīti śilocyate
तब से लेकर तीनों लोकों में वह शिला 'गारुडी' कहलाती है।
श्लोक 29 (skanda.2.93.29)
स्कंद उवाच । वाराह्या वद माहात्म्यं कीदृशं हीश्वरेश्वर । किं पुण्यं किं फलं तस्या अभिधानं तथा कथम् ।
skanda uvāca vārāhyā vada māhātmyaṁ kīdṛśaṁ hīśvareśvara kiṁ puṇyaṁ kiṁ phalaṁ tasyā abhidhānaṁ tathā katham
स्कन्द ने कहा — हे ईश्वरों के भी ईश्वर, वाराही शिला का माहात्म्य कैसा है, यह बताइए। उसका क्या पुण्य है, क्या फल है, और उसका नाम ऐसा कैसे पड़ा?
श्लोक 30 (skanda.2.93.30)
शिव उवाच । रसातलात्समुद्धृत्य महीं दैवतवैरिणम् । हिरण्याक्षं रणे हत्वा बदरीं समुपागतः ।
śiva uvāca rasātalātsamuddhṛtya mahīṁ daivatavairiṇam hiraṇyākṣaṁ raṇe hatvā badarīṁ samupāgataḥ
शिव ने कहा — पाताल से पृथ्वी का उद्धार करके, देवताओं के शत्रु हिरण्याक्ष को युद्ध में मारकर, भगवान् वाराह बदरी में पधारे।
श्लोक 31 (skanda.2.93.31)
आकल्पांतं महादेवो योगधारणया स्थितः । बदर्याः सौष्ठवादेव विदधे स्थितिमात्मनः ।
ākalpāṁtaṁ mahādevo yogadhāraṇayā sthitaḥ badaryāḥ sauṣṭhavādeva vidadhe sthitimātmanaḥ
वह महादेव (वाराह) कल्प के अंत तक योग-धारणा में स्थित रहे; बदरी की उत्कृष्टता के कारण ही उन्होंने अपनी स्थिति वहाँ बनाई।
श्लोक 32 (skanda.2.93.32)
शिलारूपेण भगवान्स्थितिं तत्र चकार ह । तत्र गत्वा तु मनुजः स्नात्वा गंगाजलेऽमले ।
śilārūpeṇa bhagavānsthitiṁ tatra cakāra ha tatra gatvā tu manujaḥ snātvā gaṁgājale'male
भगवान् ने वहाँ शिला के रूप में अपनी स्थिति बनाई। वहाँ जाकर मनुष्य निर्मल गंगाजल में स्नान करके—
श्लोक 33 (skanda.2.93.33)
दानं दत्त्वा स्वशक्त्या वै गंगांभः शांतमानसः । अहोरात्रे स्थितो भूत्वा जपेदेकाग्रमानसः ।
dānaṁ dattvā svaśaktyā vai gaṁgāṁbhaḥ śāntamānasaḥ ahorātre sthito bhūtvā japedekāgramānasaḥ
अपनी शक्ति के अनुसार दान देकर, शांतचित्त होकर, गंगाजल के तट पर एक दिन-रात्रि तक स्थित रहकर एकाग्रचित्त होकर जप करे,
श्लोक 34 (skanda.2.93.34)
शिलायां देवदृष्टिश्च तस्य पुंसः प्रजायते । बहुना किमिहोक्तेन यद्वदिष्यति साधकः ।
śilāyāṁ devadṛṣṭiśca tasya puṁsaḥ prajāyate bahunā kimihoktena yadvadiṣyati sādhakaḥ
उस पुरुष को शिला में देवता का साक्षात्कार होता है। यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? साधक जो कुछ भी चाहेगा,
श्लोक 35 (skanda.2.93.35)
तत्तस्य सिध्यति क्षिप्रं यद्यपि स्यात्सुदुष्करम् ।
tattasya sidhyati kṣipraṁ yadyapi syātsuduṣkaram
वह उसे शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है, चाहे वह कितना ही दुष्कर क्यों न हो।
श्लोक 36 (skanda.2.93.36)
स्कंद उवाच । नारसिंहीशिलायास्तु माहात्म्यं वद मे प्रभो । त्वत्प्रसादान्महादेव दुर्ल्लभं श्रुतवानहम् ।
skanda uvāca nārasiṁhīśilāyāstu māhātmyaṁ vada me prabho tvatprasādānmahādeva durllabhaṁ śrutavānaham
स्कन्द ने कहा — हे प्रभो, अब नारसिंही-शिला का माहात्म्य मुझे बताइए। हे महादेव, आपकी कृपा से ही मैंने यह दुर्लभ ज्ञान सुना है।
श्लोक 37 (skanda.2.93.37)
शिव उवाच । हिरण्यकशिपुं हत्वा नखाग्रेणैव लीलया । क्रोधाग्निना प्रदीप्तांगः प्रलयानलसन्निभः ।
śiva uvāca hiraṇyakaśipuṁ hatvā nakhāgreṇaiva līlayā krodhāgninā pradīptāṁgaḥ pralayānalasannibhaḥ
शिव ने कहा — केवल नखाग्र से लीलापूर्वक हिरण्यकशिपु का वध करके, क्रोधाग्नि से जिनके अंग प्रज्वलित थे, जो प्रलय-अग्नि के समान थे—
श्लोक 38 (skanda.2.93.38)
तदा देवैः समागत्य स्थित्वा दूरे दयालुभिः । स्तुतोऽसौ भगवान्देवो लीलया धृतविग्रहः ।
tadā devaiḥ samāgatya sthitvā dūre dayāluvhiḥ stuto'sau bhagavāndevo līlayā dhṛtavigrahaḥ
तब दयालु देवगण दूर खड़े होकर एकत्रित हुए और उस भगवान् देव की स्तुति की, जिन्होंने लीलापूर्वक वह रूप धारण किया था।
श्लोक 39 (skanda.2.93.39)
तदा प्रसन्नो हरिरुग्रविक्रमः स्वतेजसा व्याप्तसुरासुरोत्तमः । उवाच मत्तो वरमावृणीध्वं गीर्वाणनिर्वाण सुखैकहेतुम् ।
tadā prasanno harirugravikramaḥ svatejasā vyāptasurāsurottamaḥ uvāca matto varamāvṛṇīdhvaṁ gīrvāṇanirvāṇa sukhaikahetum
तब उग्र-पराक्रमी हरि, जिनके तेज से समस्त सुर-असुरों में श्रेष्ठ जन व्याप्त थे, प्रसन्न होकर बोले — 'मुझसे वर माँगो, जो देवताओं के परम सुख का एकमात्र कारण हो।'
श्लोक 40 (skanda.2.93.40)
तदासुराणामधिपः स्वयंभूरुवाच वाक्यं स्मितशोभिताननः । रूपं तवात्युग्रमशेषदेहिनां भयावहं संहर नारसिंह ।
tadāsurāṇāmadhipaḥ svayaṁbhūruvāca vākyaṁ smitaśobhitānanaḥ rūpaṁ tavātyugramaśeṣadehināṁ bhayāvahaṁ saṁhara nārasiṁha
तब असुरों के अधिपति स्वयंभू (ब्रह्मा) ने मुस्कुराते हुए मुखमंडल से कहा — 'हे नरसिंह, आपका यह अत्यंत उग्र रूप समस्त प्राणियों के लिए भयावह है; इसे शांत कीजिए।'
श्लोक 41 (skanda.2.93.41)
अनेकधैतद्विधिवद्विधाय निधाय शैलादिषु दिव्यमूर्तिम् । उवाच किं वः प्रकरोमि कृत्यमहं प्रसन्नस्त्रिदशाः परंतपाः ।
anekadhaitadvidhivadvidhāya nidhāya śailādiṣu divyamūrtim uvāca kiṁ vaḥ prakaromi kṛtyamahaṁ prasannastridaśāḥ paraṁtapāḥ
तब उस दिव्य मूर्ति को विधिपूर्वक अनेक रूपों में विभाजित करके, पर्वतों आदि पर स्थापित करके, प्रसन्न होकर बोले — 'हे त्रिदशों, मैं आपके लिए क्या करूँ? कहो, हे शत्रु-संतापको।'
श्लोक 42 (skanda.2.93.42)
ततोमरा ऊचुरनेन चैव रूपेण संक्षोभितविश्वमूर्ते । प्रशांतमंतःसुखहेतुबंधि चतुर्भुजत्वं वरमीप्सितं नः ।
tato'marā ūcuranena caiva rūpeṇa saṁkṣobhitaviśvamūrte praśāṁtamaṁtaḥsukhahetubaṁdhi caturbhujatvaṁ varamīpsitaṁ naḥ
तब अमरगण बोले — 'हे विश्वमूर्ते, इस रूप से तो सारा विश्व क्षुब्ध हो गया है। हमारी अभिलषित वर तो शांत, अंतःसुख का कारण और मित्रतापूर्ण चतुर्भुज रूप है।'
श्लोक 43 (skanda.2.93.43)
ततो हरिर्वीक्ष्य निरीक्षणेन दिव्येन विश्वं प्रययौ विशालाम् । गंगाजले क्रीडति विष्टचेताः सुरासुरेभ्यो भगवानुवाच ।
tato harirvīkṣya nirīkṣaṇena divyena viśvaṁ prayayau viśālām gaṁgājale krīḍati viṣṭacetāḥ surāsurebhyo bhagavānuvāca
तब हरि ने अपनी दिव्य दृष्टि से विश्व का अवलोकन करके विशाला की ओर प्रस्थान किया; गंगाजल में क्रीड़ा करते हुए, मन को वहीं स्थिर करके, भगवान् ने सुर-असुरों से कहा—
श्लोक 44 (skanda.2.93.44)
ततोऽमराः शांतभया अथैनं निरीक्ष्य देवं जलमध्यसंस्थम् । नत्वा परिक्रम्य तदा समाययुर्निरूढभावाः स्वपुरं ततः क्रमात् ।
tato'marāḥ śāntabhayā athainaṁ nirīkṣya devaṁ jalamadhyasaṁstham natvā parikramya tadā samāyayurnirūḍhabhāvāḥ svapuraṁ tataḥ kramāt
तब भयरहित होकर वे अमरगण उस देव को जल के मध्य स्थित देखकर, प्रणाम करके, परिक्रमा करके, संतुष्ट भाव से क्रमशः अपने-अपने नगरों को लौट गए।
श्लोक 45 (skanda.2.93.45)
ततः समस्ता ऋषयस्तपोधनाः समाययुर्भक्तिभरावनम्राः । नृसिंहमत्यद्भुतविकमं हरिं समीडिरे बद्धकरा वचोभिः ।
tataḥ samastā ṛṣayastapodhanāḥ samāyayurbhaktibharāvanamrāḥ nṛsiṁhamatyadbhutavikamaṁ hariṁ samīḍire baddhakarā vacobhiḥ
तब समस्त तपोधन ऋषिगण भक्ति-भार से नत होकर आए, और अत्यंत अद्भुत पराक्रम वाले नृसिंह हरि की हाथ जोड़कर वचनों से स्तुति करने लगे।
श्लोक 46 (skanda.2.93.46)
ऋषय ऊचुः । नमोनमस्ते जगतामधीश विश्वेश विश्वाभय विश्वमूर्ते । कृपांबुराशे भजनीयतीर्थ पादांबुज श्रीश दयां विधेहि ।
ṛṣaya ūcuḥ namonamaste jagatāmadhīśa viśveśa viśvābhaya viśvamūrte kṛpāṁburāśe bhajanīyatīrtha pādāṁbuja śrīśa dayāṁ vidhehi
ऋषियों ने कहा — हे जगत के अधीश्वर, विश्वेश, विश्व को अभय देने वाले, विश्वमूर्ते, आपको बार-बार नमस्कार है। हे करुणासागर, हे भजनीय तीर्थ, हे श्रीश, अपने चरण-कमलों से हम पर दया कीजिए।
श्लोक 47 (skanda.2.93.47)
एकोऽसि नाना निजमायया स्वया घटे पयो यद्वदुपाधिभिन्नम् । भक्तेच्छयोपात्तविचित्रविग्रह प्रसीद विश्वानन विश्वभावन ।
eko'si nānā nijamāyayā svayā ghaṭe payo yadvadupādhibhinnam bhaktecchayopāttavicitravigraha prasīda viśvānana viśvabhāvana
आप एक होते हुए भी अपनी माया से नाना रूप धारण करते हैं, जैसे जल विभिन्न पात्रों के अनुसार भिन्न-भिन्न दिखता है। हे भक्तों की इच्छा से विचित्र रूप धारण करने वाले, हे विश्व-मुख, हे विश्व-भावन, हम पर प्रसन्न हों।
श्लोक 48 (skanda.2.93.48)
ततः प्रसन्नो भगवान्नृसिंहः सिंहविक्रमः । उवाच वचनं चारु वरं मे व्रियतामिति ।
tataḥ prasanno bhagavānnṛsiṁhaḥ siṁhavikramaḥ uvāca vacanaṁ cāru varaṁ me vriyatāmiti
तब सिंह के समान पराक्रमी भगवान् नृसिंह प्रसन्न होकर मधुर वचन बोले — 'मुझसे वर माँगो।'
श्लोक 49 (skanda.2.93.49)
ऋषय ऊचुः । यदि प्रसन्नो भगवन्कृपया जगतां पते । विशाला न परित्याज्या वरोऽस्माकमभीप्सितः ।
ṛṣaya ūcuḥ yadi prasanno bhagavankṛpayā jagatāṁ pate viśālā na parityājyā varo'smākamabhīpsitaḥ
ऋषियों ने कहा — हे भगवन्, हे जगत के स्वामी, यदि आप कृपापूर्वक प्रसन्न हैं, तो हमारा अभिलषित वर यही है कि विशाला को कभी न त्यागें।
श्लोक 50 (skanda.2.93.50)
एवमस्तु ततः सर्वे स्वाश्रमं ह्यृषयो ययुः । नृसिंहोऽपि शिलारूपी जलक्रीडापरोऽभवत् ।
evamastu tataḥ sarve svāśramaṁ hyṛṣayo yayuḥ nṛsiṁho'pi śilārūpī jalakrīḍāparo'bhavat
'ऐसा ही हो' — यह कहकर सभी ऋषि अपने-अपने आश्रमों को चले गए। नृसिंह भी शिला के रूप में जल-क्रीड़ा में लीन हो गए।
श्लोक 51 (skanda.2.93.51)
उपवासत्रयं कृत्वा जपध्यानपरायणः । नृसिंहरूपिणं साक्षात्पश्यत्येव न संशयः ।
upavāsatrayaṁ kṛtvā japadhyānaparāyaṇaḥ nṛsiṁharūpiṇaṁ sākṣātpaśyatyeva na saṁśayaḥ
जो तीन दिन उपवास करके जप-ध्यान में तत्पर रहता है, वह निःसंदेह साक्षात् नृसिंह-रूप का दर्शन करता है।
श्लोक 52 (skanda.2.93.52)
य एतच्छ्रद्धया मर्त्यः शृणोति श्रावयञ्छुचिः । सर्वपापविनिर्मुक्तो वैकुंठे वसतिं लभेत् ।
ya etacchraddhayā martyaḥ śṛṇoti śrāvayañchuciḥ sarvapāpavinirmukto vaikuṁṭhe vasatiṁ labhet
जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है या शुद्ध होकर दूसरों को सुनाता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ में निवास प्राप्त करता है।