वैष्णव खण्ड · अध्याय 92
अग्नितीर्थ, नारदशिला और मार्कण्डेयशिला की महिमा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.92.1)
स्कन्द उवाच । भगवन्सर्वभूतेषु सर्वधर्मविशारद । अग्नितीर्थस्य माहात्म्यं कृपया वद मे पितः ।
skanda uvāca bhagavansarvabhūteṣu sarvadharmaviśārada agnitīrthasya māhātmyaṁ kṛpayā vada me pitaḥ
स्कन्द ने कहा — हे भगवन्, समस्त प्राणियों में स्थित, सम्पूर्ण धर्मों में निपुण! हे पिता, अग्नितीर्थ का माहात्म्य कृपापूर्वक मुझे बताइए।
श्लोक 2 (skanda.2.92.2)
शिव उवाच । अतिगुह्यतमं तीर्थं सर्वतीर्थनिषेवितम् । संक्षेपात्कथयाम्येतत्तवादरवशादहम् ।
śiva uvāca atiguhyatamaṁ tīrthaṁ sarvatīrthaniṣevitam saṁkṣepātkathayāmyetattavādaravaśādaham
शिव ने कहा — यह तीर्थ अत्यंत गुह्य है, और समस्त तीर्थों द्वारा सेवित है। तुम्हारे आदर के वशीभूत होकर मैं इसे संक्षेप में कहता हूँ।
श्लोक 3 (skanda.2.92.3)
महापातकिनो ये च अतिपातकिनस्तथा । स्नानमात्रेण शुद्ध्यंति विनायासेन पुत्रक ।
mahāpātakino ye ca atipātakinastathā snānamātreṇa śuddhyanti vināyāsena putraka
हे पुत्र, जो महापातकी हैं तथा जो अतिपातकी हैं, वे भी बिना किसी कठिनाई के केवल स्नान मात्र से ही शुद्ध हो जाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.2.92.4)
प्रायश्चित्तेन यत्पापं न गच्छेन्मरणांतिकम् । स्नानमात्रेण तीर्थस्य पावकस्य विशुद्ध्यति ।
prāyaścittena yatpāpaṁ na gacchenmaraṇāntikam snānamātreṇa tīrthasya pāvakasya viśuddhyati
जो पाप प्रायश्चित्त से भी अंतिम सांस तक नहीं छूटता, वह इस पावक-तीर्थ में स्नान मात्र से ही पूर्णतः शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.2.92.5)
अत्यंतमलसंबद्धं यथा शुद्ध्यति हाटकम् । तथाग्नितीर्थमासाद्य देही पापैर्विशुद्ध्यति ।
atyantamalasaṁbaddhaṁ yathā śuddhyati hāṭakam tathāgnitīrthamāsādya dehī pāpairviśuddhyati
जैसे अत्यंत मैल से लिपटा हुआ सोना भी शुद्ध हो जाता है, वैसे ही अग्नितीर्थ को प्राप्त करके देहधारी अपने पापों से पूर्णतः शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 6 (skanda.2.92.6)
कुशाग्रेणोदबिंदुं च पीत्वा वर्षत्रयं नरः । अन्यक्षेत्रे तपः कृत्वा तदत्र स्नानमात्रतः ।
kuśāgreṇodabinduṁ ca pītvā varṣatrayaṁ naraḥ anyakṣetre tapaḥ kṛtvā tadatra snānamātrataḥ
कुश की नोक से जल की बूँद पीकर तीन वर्षों तक किसी अन्य क्षेत्र में जो तप किया जाता है, उसका फल यहाँ केवल स्नान मात्र से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 7 (skanda.2.92.7)
ब्राह्मणान्भोजयित्वास्मिन्यथाविभवसंभवैः । दरिद्रता कुले तेषां न कदाचित्प्रजायते ।
brāhmaṇānbhojayitvāsminyathāvibhavasaṁbhavaiḥ daridratā kule teṣāṁ na kadācitprajāyate
जो यहाँ अपने ऐश्वर्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, उनके कुल में दरिद्रता कभी उत्पन्न नहीं होती।
श्लोक 8 (skanda.2.92.8)
उपवासेन यः प्राणान्वह्नितीर्थे त्यजेन्नरः । स भित्त्वा सूर्यलोकादीन्विष्णुलोकं प्रपद्यते ।
upavāsena yaḥ prāṇānvahnitīrthe tyajennaraḥ sa bhitvā sūryalokādīnviṣṇulokaṁ prapadyate
जो मनुष्य उपवास करते हुए वह्नितीर्थ में अपने प्राण त्यागता है, वह सूर्यलोक आदि को भेदकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 9 (skanda.2.92.9)
चांद्रायणसहस्रैस्तु कृच्छ्रैः कोटिभिरेव च । यत्फलं लभते मर्त्यस्तत्स्नानाद्वह्नितीर्थतः ।
cāndrāyaṇasahasraistu kṛcchraiḥ koṭibhireva ca yatphalaṁ labhate martyastatsnānādvahnitīrthataḥ
हजारों चान्द्रायण व्रतों और करोड़ों कृच्छ्र व्रतों से जो फल मनुष्य को मिलता है, वही फल वह्नितीर्थ में स्नान करने से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 10 (skanda.2.92.10)
पंचधा ये प्रकुर्वंति पापमस्मिन्षडानन । जपेन पवनायामैर्विशुद्धिरिति मे मतिः ।
pañcadhā ye prakurvanti pāpamasminṣaḍānana japena pavanāyāmairviśuddhiriti me matiḥ
हे षडानन, यहाँ जो पाँच प्रकार के पाप करते हैं, उनकी भी जप और प्राणायाम के द्वारा ही शुद्धि होती है, ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 11 (skanda.2.92.11)
ज्ञानेन मोहवशतः पापं कुर्वन्ति येऽधमाः । पैशाचीं योनिमायामति यावदिंद्राश्चतुर्दश ।
jñānena mohavaśataḥ pāpaṁ kurvanti ye'dhamāḥ paiśācīṁ yonimāyāmati yāvadindrāścaturdaśa
जो अधम पुरुष जानते हुए भी मोहवश यहाँ पाप करते हैं, वे चौदह इन्द्रों के काल-पर्यंत पिशाच-योनि को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 12 (skanda.2.92.12)
अनाश्रमी चाश्रमी वा यावद्देहस्यधारणम् । न तीर्थे पावके कुर्यात्पातकं बुद्धिपूर्वकम् ।
anāśramī cāśramī vā yāvaddehasyadhāraṇam na tīrthe pāvake kuryātpātakaṁ buddhipūrvakam
चाहे कोई किसी आश्रम में हो या न हो, जब तक देह धारण किए है, उसे इस पावक-तीर्थ में जान-बूझकर पाप नहीं करना चाहिए।
श्लोक 13 (skanda.2.92.13)
स्नानं दानं जपो होमः संध्या देवार्चनं तथा । अत्रानंतगुणं प्रोक्तमन्यतीर्थात्षडानन ।
snānaṁ dānaṁ japo homaḥ saṁdhyā devārcanaṁ tathā atrānantaguṇaṁ proktamanyatīrthātṣaḍānana
हे षडानन, यहाँ स्नान, दान, जप, हवन, संध्या और देव-पूजन का फल अन्य तीर्थों की अपेक्षा अनंत गुना अधिक कहा गया है।
श्लोक 14 (skanda.2.92.14)
बहूनि संति तीर्थानि पावनानि महांत्यपि । वह्नितीर्थसमं तीर्थं न भूतं न भविष्यति ।
bahūni santi tīrthāni pāvanāni mahāntyapi vahnitīrthasamaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati
यद्यपि पवित्र करने वाले बहुत से महान् तीर्थ हैं, तथापि वह्नितीर्थ के समान तीर्थ न कभी हुआ है, न कभी होगा।
श्लोक 15 (skanda.2.92.15)
न ब्रह्मा न शिवः शेषो न देवा न च तापसाः । शक्नुवंति फलं नालं वक्तुं पावकतीर्थजम् ।
na brahmā na śivaḥ śeṣo na devā na ca tāpasāḥ śaknuvanti phalaṁ nālaṁ vaktuṁ pāvakatīrthajam
न ब्रह्मा, न शिव, न शेष, न देवगण, न तपस्वी — कोई भी पावकतीर्थ से उत्पन्न फल को पूर्णतः वर्णन करने में समर्थ नहीं है।
श्लोक 16 (skanda.2.92.16)
किं तेषां बहुभिर्यज्ञैः किं दानैर्नियमैर्यमैः । येषां पावकतीर्थेऽस्मिन्स्नानं दशदिनं भवेत् ।
kiṁ teṣāṁ bahubhiryajñaiḥ kiṁ dānairniyamairyamaiḥ yeṣāṁ pāvakatīrthe'sminsnānaṁ daśadinaṁ bhavet
जिन्होंने इस पावकतीर्थ में दस दिनों तक स्नान किया है, उनके लिए अनेक यज्ञों, दानों, नियमों और यमों से क्या प्रयोजन?
श्लोक 17 (skanda.2.92.17)
उपवासेन यः प्राणान्वह्नितीर्थे जयेन्नरः । उपवासत्रयं कृत्वा पूजयित्वा जनार्द्दनम् । नरः पावकतीर्थेऽस्मिन्स भवेत्पावकोपमः ।
upavāsena yaḥ prāṇānvahnitīrthe jayennaraḥ upavāsatrayaṁ kṛtvā pūjayitvā janārddanam naraḥ pāvakatīrthe'sminsa bhavetpāvakopamaḥ
जो मनुष्य उपवास करते हुए वह्नितीर्थ में अपने प्राणों को साध लेता है, तीन दिन उपवास करके जनार्दन की पूजा करता है, वह मनुष्य इस पावकतीर्थ में स्वयं अग्नि के समान हो जाता है।
श्लोक 18 (skanda.2.92.18)
शिलापंचकमध्यस्थं सान्निध्यं नित्यदा हरेः । तत्रैव पावकं तीर्थं सर्वपापप्रणाशनम् ।
śilāpañcakamadhyasthaṁ sānnidhyaṁ nityadā hareḥ tatraiva pāvakaṁ tīrthaṁ sarvapāpapraṇāśanam
पाँच शिलाओं के मध्य में हरि की सन्निधि सदैव विद्यमान है; वहीं यह पावक-तीर्थ है, जो समस्त पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 19 (skanda.2.92.19)
स्कंद उवाच । कथं तत्र शिलाः पंच केन वा तत्र निर्मिताः । किं पुण्यं किं फलं तासां वक्तुमर्हस्यशेषतः ।
skanda uvāca kathaṁ tatra śilāḥ pañca kena vā tatra nirmitāḥ kiṁ puṇyaṁ kiṁ phalaṁ tāsāṁ vaktumarhasyaśeṣataḥ
स्कन्द ने कहा — वहाँ वे पाँच शिलाएँ कैसे और किसके द्वारा निर्मित हुईं? उनका क्या पुण्य और क्या फल है, यह सब मुझे पूर्ण रूप से बताने योग्य हैं आप।
श्लोक 20 (skanda.2.92.20)
शिव उवाच । नारदी नारसिंही च वाराही गारुडी तथा । मार्कंडेयीति विख्याताः शिलाः सर्वार्थसिद्धिदाः ।
śiva uvāca nāradī nārasiṁhī ca vārāhī gāruḍī tathā mārkaṇḍeyīti vikhyātāḥ śilāḥ sarvārthasiddhidāḥ
शिव ने कहा — नारदी, नारसिंही, वाराही, गारुडी तथा मार्कण्डेयी नाम से विख्यात ये शिलाएँ सम्पूर्ण अर्थों को सिद्ध करने वाली हैं।
श्लोक 21 (skanda.2.92.21)
नारदो भगवांस्तेपे तपः परमदारुणम् । दर्शनार्थं महाविष्णोः शिलायां वायुभोजनः ।
nārado bhagavāṁstepe tapaḥ paramadāruṇam darśanārthaṁ mahāviṣṇoḥ śilāyāṁ vāyubhojanaḥ
भगवान् नारद ने महाविष्णु के दर्शन के लिए उस शिला पर केवल वायु का आहार करते हुए अत्यंत घोर तप किया।
श्लोक 22 (skanda.2.92.22)
षष्टिवर्षसहस्राणि शिलायां वृक्षवृत्तिमान् । तदासौ भगवान्विष्णुस्तत्र ब्राह्मणरूपधृक् ।
ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi śilāyāṁ vṛkṣavṛttimān tadāsau bhagavānviṣṇustatra brāhmaṇarūpadhṛk
साठ हजार वर्षों तक वह वृक्ष के समान (एक ही स्थान पर स्थिर) उस शिला पर रहा; तब भगवान् विष्णु ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पधारे।
श्लोक 23 (skanda.2.92.23)
जगाम पुरतस्तस्य कृपया मुनिसत्तमम् । उवाच वचनं चारु किमिति क्लिश्यते ह्यृषे । किं वा तवेप्सितं ब्रूहि तपसा क्षीणकल्मष ।
jagāma purataстasya kṛpayā munisattamam uvāca vacanaṁ cāru kimiti kliśyate hyṛṣe kiṁ vā tavepsitaṁ brūhi tapasā kṣīṇakalmaṣa
वह करुणावश उस श्रेष्ठ मुनि के समक्ष गए और सुंदर वचन कहा — हे ऋषि, क्यों इतना कष्ट उठा रहे हो? हे तप से पापरहित हुए मुनि, अपनी अभिलाषा बताओ।
श्लोक 24 (skanda.2.92.24)
नारद उवाच । को भवान्विजनेऽरण्ये ममानुग्रहतत्परः । मनः प्रसन्नतामेति दर्शनात्ते द्विजोत्तम ।
nārada uvāca ko bhavānvijane'raṇye mamānugrahatatparaḥ manaḥ prasannatāmeti darśanātte dvijottama
नारद ने कहा — इस निर्जन वन में, मुझ पर अनुग्रह करने के लिए तत्पर आप कौन हैं? हे उत्तम द्विज, आपके दर्शन से ही मेरा मन प्रसन्न हो रहा है।
श्लोक 25 (skanda.2.92.25)
इत्युक्तो नारदेनासौ शंखचक्रगदाधरः । पीतांबरलसत्पद्मवनमालाविभूषणः ।
ityukto nāradenāsau śaṅkhacakragadādharaḥ pītāṁbaralasatpadmavanamālāvibhūṣaṇaḥ
नारद द्वारा ऐसा कहे जाने पर, शंख, चक्र और गदा धारण किए हुए, पीताम्बर और सुशोभित पद्म तथा वनमाला से विभूषित वे भगवान—
श्लोक 26 (skanda.2.92.26)
श्रीवत्सकौस्तुभभ्राजत्कमलाविमलालयः । सुनंदनप्रमुख्यैः स स्तूयमानो जनार्द्दनः ।
śrīvatsakaustubhabhrājatkamalāvimalālayaḥ sunandanapramukhyaiḥ sa stūyamāno janārddanaḥ
श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि से देदीप्यमान, लक्ष्मी के निर्मल आवास-स्वरूप, सुनन्द आदि पार्षदों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, वे जनार्दन—
श्लोक 27 (skanda.2.92.27)
दर्शयामास रूपं स्वं नारदाय कृपार्दितः । तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय तनुं प्राण इवागतः ।
darśayāmāsa rūpaṁ svaṁ nāradāya kṛpārditaḥ taṁ dṛṣṭvā sahasotthāya tanuṁ prāṇa ivāgataḥ
करुणा से द्रवित होकर उन्होंने नारद को अपना स्वरूप दिखा दिया। उसे देखते ही नारद तुरंत उठ खड़े हुए, मानो उनके शरीर में प्राण लौट आया हो।
श्लोक 28 (skanda.2.92.28)
कृतांजलिपुटो भूत्वा नमस्कृत्य पुनः पुनः । तुष्टाव प्रणतो भूत्वा जगतामीश्वरेश्वरम् ।
kṛtāñjaliputo bhūtvā namaskṛtya punaḥ punaḥ tuṣṭāva praṇato bhūtvā jagatāmīśvareśvaram
हाथ जोड़कर, बार-बार प्रणाम करते हुए, नारद ने विनम्र होकर जगतों के भी ईश्वरों के ईश्वर की स्तुति की।
श्लोक 29 (skanda.2.92.29)
नारद उवाच । यः सर्वसाक्षी जगतामधीश्वरो भक्तेच्छया जातशरीरसंपदः । कृपामहांभोनिधिराश्रितानां प्रसीदतां पावनदिव्यमूर्तिः ।
nārada uvāca yaḥ sarvasākṣī jagatāmadhīśvaro bhaktecchayā jātaśarīrasaṁpadaḥ kṛpāmahāṁbhonidhirāśritānāṁ prasīdatāṁ pāvanadivyamūrtiḥ
नारद ने कहा — जो सबके साक्षी, जगतों के अधीश्वर हैं, जिन्होंने भक्तों की इच्छा से शरीर-रूपी संपत्ति धारण की है, जो अपने आश्रितों के लिए करुणा के महासागर हैं — वह पावन दिव्य स्वरूप मुझ पर प्रसन्न हों।
श्लोक 30 (skanda.2.92.30)
हिताय लोकस्य सतां पुनर्मनः सुतोषणायाचिरमुत्कलादिभिः । प्रसन्नलीलाहसितावलोकनः प्रसीदतां सत्त्वनिकायमूर्तिमान् ।
hitāya lokasya satāṁ punarmanaḥ sutoṣaṇāyāciramutkalādibhiḥ prasannalīlāhasitāvalokanaḥ prasīdatāṁ sattvanikāyamūrtimān
जो लोक के हित के लिए, तथा सत्पुरुषों के मन को शीघ्र ही उत्कर्ष आदि से संतुष्ट करने के लिए, प्रसन्न लीला और मुस्कान भरी दृष्टि रखते हैं — वह सत्त्व-समूह की मूर्ति मुझ पर प्रसन्न हों।
श्लोक 31 (skanda.2.92.31)
कंदर्प्पलावण्यविलाससुंदरः प्रसन्नगंभीरगिरेंदिरोत्सवः । स्वमाश्रितानां वरकल्पपादपः प्रसीदतां दीनदयार्द्रमानसः ।
kandarpalāvaṇyavilāsasundaraḥ prasannagaṁbhīragirendirotsavaḥ svamāśritānāṁ varakalpapādapaḥ prasīdatāṁ dīnadayārdramānasaḥ
जो कामदेव के सौंदर्य और लावण्य से भी सुंदर हैं, जिनकी प्रसन्न और गंभीर वाणी इन्दिरा (लक्ष्मी) के लिए उत्सव-स्वरूप है, जो अपने आश्रितों के लिए श्रेष्ठ कल्पवृक्ष के समान हैं — दीनों के प्रति दया से द्रवित मन वाले वे प्रभु मुझ पर प्रसन्न हों।
श्लोक 32 (skanda.2.92.32)
यदंघ्रिपद्मार्चननिर्मलांतरा ज्ञानासिना शातितबंधहेतवः । विदंति यद्ब्रह्मसुखं गतक्लमाः प्रसीदतां दीनदयार्द्रमानसः ।
yadaṁghripadmārcananirmalāntarā jñānāsinā śātitabandhahetavaḥ vidanti yadbrahmasukhaṁ gataklamāḥ prasīdatāṁ dīnadayārdramānasaḥ
जिनके चरण-कमलों की पूजा से अंतःकरण निर्मल हो जाता है, जो ज्ञान-खड्ग से बंधन के कारणों को काट देते हैं, जिनकी कृपा से क्लांतिरहित होकर लोग ब्रह्म-सुख को जान पाते हैं — दीनों पर दया से द्रवित मन वाले वे प्रभु प्रसन्न हों।
श्लोक 33 (skanda.2.92.33)
संसारवारांनिधिबद्धसेतुर्यः सृष्टिपालांतविधानहेतुः । उपांतनामा गुणलब्धमूर्तिः प्रसीदतां ब्रह्मसुखानुभूतिः ।
saṁsāravārāṁnidhibaddhaseturyaḥ sṛṣṭipālāntavidhānahetuḥ upāntanāmā guṇalabdhamūrtiḥ prasīdatāṁ brahmasukhānubhūtiḥ
जो संसार-सागर पर बंधे हुए सेतु के समान हैं, जो सृष्टि, पालन और संहार के विधान के कारण हैं, जो गुणों से प्राप्त मूर्ति धारण करते हुए भी अंततः उनसे परे हैं — वह ब्रह्म-सुख की साक्षात् अनुभूति मुझ पर प्रसन्न हों।
श्लोक 34 (skanda.2.92.34)
य इंद्रियाधिष्ठितभूतसूक्ष्माद्विकासहेतुर्द्युतिमद्वरिष्ठः । जीवात्मतां गच्छति मायया स्वया स एक ईशो भगवान्प्रसीदताम् ।
ya indriyādhiṣṭhitabhūtasūkṣmādvikāsaheturdyutimadvariṣṭhaḥ jīvātmatāṁ gacchati māyayā svayā sa eka īśo bhagavānprasīdatām
जो इन्द्रियों में अधिष्ठित सूक्ष्म भूतों के प्रकाश-रूप विकास के कारण हैं, जो तेजस्वियों में भी श्रेष्ठ हैं, तथा जो अपनी ही माया से जीवात्मा के रूप में प्रतीत होते हैं — वह एकमात्र ईश्वर भगवान् मुझ पर प्रसन्न हों।
श्लोक 35 (skanda.2.92.35)
स्वदृग्गुणैर्येन विलिप्यते महान्गुणाश्रयं येन च पाञ्चभौतिकम् । एकोऽपि नानागुणसंप्रयुक्तः प्रसीदतां दीनदयालुवर्यः ।
svadṛggguṇairyena vilipyate mahānguṇāśrayaṁ yena ca pāñcabhautikam eko'pi nānāguṇasaṁprayuktaḥ prasīdatāṁ dīnadayāluvaryaḥ
जिसकी अपनी ही दृष्टि के गुणों से यह विराट, गुणों का आश्रय-स्वरूप पंचभौतिक जगत रचा हुआ प्रतीत होता है, जो एक होते हुए भी नाना गुणों से युक्त प्रतीत होते हैं — दीनों पर दया करने वालों में श्रेष्ठ वे प्रभु मुझ पर प्रसन्न हों।
श्लोक 36 (skanda.2.92.36)
यस्यानुवर्तिनो देवा विपदां पदमंबुधिम् । कृत्वा वत्सपदं स्वर्गे निरातंका वसंति हि ।
yasyānuvartino devā vipadāṁ padamaṁbudhim kṛtvā vatsapadaṁ svarge nirātaṅkā vasanti hi
जिनके अनुसरण से देवगण विपत्तियों के सागर को गाय के खुर के गड्ढे के जल के समान (तुच्छ) बनाकर, स्वर्ग में निर्भय होकर निवास करते हैं।
श्लोक 37 (skanda.2.92.37)
नमस्ते वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सर्वभूतात्मने नमः ।
namaste vāsudevāya namaḥ saṁkarṣaṇāya ca pradyumnāyāniruddhāya sarvabhūtātmane namaḥ
वासुदेव को नमस्कार, संकर्षण को नमस्कार, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध को नमस्कार, तथा सर्वभूतों की आत्मा-स्वरूप आपको नमस्कार।
श्लोक 38 (skanda.2.92.38)
अद्य मे जीवितं धन्यमद्य मे सफलं तपः । अद्य मे सफलं ज्ञानं दर्शनात्ते जनार्दन ।
adya me jīvitaṁ dhanyamadya me saphalaṁ tapaḥ adya me saphalaṁ jñānaṁ darśanātte janārdana
हे जनार्दन, आज मेरा जीवन धन्य हो गया, आज मेरा तप सफल हो गया, आज मेरा ज्ञान भी आपके दर्शन से सफल हो गया।
श्लोक 39 (skanda.2.92.39)
श्रीभगवानुवाच । तुष्टोऽहं तपसानेन स्तोत्रेण तव नारद । त्वत्तो भक्तो न मे कश्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
śrībhagavānuvāca tuṣṭo'haṁ tapasānena stotreṇa tava nārada tvatto bhakto na me kaścittriṣu lokeṣu vidyate
श्री भगवान् ने कहा — हे नारद, तुम्हारे इस तप से और इस स्तोत्र से मैं संतुष्ट हूँ; तीनों लोकों में तुमसे बढ़कर मेरा कोई भक्त नहीं है।
श्लोक 40 (skanda.2.92.40)
वरं वरय भद्रं ते वरदोऽहं तवाग्रतः । मद्दर्शनात्ते कामः स्यात्संसिद्धो विद्धि नारद ।
varaṁ varaya bhadraṁ te varado'haṁ tavāgrataḥ maddarśanātte kāmaḥ syātsaṁsiddho viddhi nārada
वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो; मैं वरदाता होकर तुम्हारे सामने खड़ा हूँ। हे नारद, जान लो कि मेरे दर्शन से ही तुम्हारी कामना सिद्ध हो चुकी है।
श्लोक 41 (skanda.2.92.41)
नारद उवाच । वरदो यदि मे देव वरार्हो यदि वाप्यहम् । भक्तिं तव पदांभोजे निश्चलां देहि मे विभो ।
nārada uvāca varado yadi me deva varārho yadi vāpyaham bhaktiṁ tava padāṁbhoje niścalāṁ dehi me vibho
नारद ने कहा — हे देव, यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, और यदि मैं वर पाने के योग्य हूँ, तो हे विभो, मुझे अपने चरण-कमलों में अटल भक्ति प्रदान कीजिए।
श्लोक 42 (skanda.2.92.42)
पच्छिलासन्निधानं च न त्याज्यं ते कदाचन । मत्तीर्थदर्शनात्स्पर्शात्स्नानादाचमनात्तथा । देहैर्न युज्यते देयस्ततीयस्तु वरो मम ।
pacchilāsannidhānaṁ ca na tyājyaṁ te kadācana mattīrthadarśanātsparśātsnānādācamanāttathā dehairna yujyate deyastatīyastu varo mama
इस शिला की सन्निधि को आप कभी न त्यागें। मेरे इस तीर्थ के दर्शन, स्पर्श, स्नान और आचमन से मनुष्य फिर देह धारण न करे — यह मेरा तीसरा वर हो।
श्लोक 43 (skanda.2.92.43)
श्रीभगवानुवाच । एवमस्तु तव स्नेहात्तव तीर्थे वसाम्यहम् । चराचराणां जंतूनां विदेहाय न संशयः ।
śrībhagavānuvāca evamastu tava snehāttava tīrthe vasāmyaham carācarāṇāṁ jantūnāṁ videhāya na saṁśayaḥ
श्री भगवान् ने कहा — ऐसा ही हो। तुम्हारे स्नेह के कारण मैं तुम्हारे इस तीर्थ में निवास करूँगा, और यह निःसंदेह चराचर प्राणियों के देह-बंधन से मुक्ति के लिए होगा।
श्लोक 44 (skanda.2.92.44)
एवमुक्त्वा हरिः साक्षात्तत्रैवांतरधीयत । नारदोऽपि महातेजा दिनानि कतिचित्सह । बदरीमावसन्हृष्टो ययौ मधुपुरीं ततः ।
evamuktvā hariḥ sākṣāttatraivāntaradhīyata nārado'pi mahātejā dināni katicitsaha badarīmāvasanhṛṣṭo yayau madhupurīṁ tataḥ
ऐसा कहकर हरि साक्षात् वहीं अंतर्धान हो गए। महातेजस्वी नारद भी कुछ दिनों तक प्रसन्न होकर बदरी में निवास करने के पश्चात् मधुपुरी (मथुरा) की ओर चले गए।
श्लोक 45 (skanda.2.92.45)
स्कंद उवाच । मार्कंडेयशिलायास्तु महिमानं वदस्व मे । किं पुण्यं किं फलं तस्याः संज्ञा च तादृशी कथम् ।
skanda uvāca mārkaṇḍeyaśilāyāstu mahimānaṁ vadasva me kiṁ puṇyaṁ kiṁ phalaṁ tasyāḥ saṁjñā ca tādṛśī katham
स्कन्द ने कहा — अब मार्कण्डेय-शिला की महिमा मुझे बताइए। उसका क्या पुण्य है, क्या फल है, और उसका ऐसा नाम कैसे पड़ा?
श्लोक 46 (skanda.2.92.46)
शिव उवाच । पुरा त्रेतायुगस्यांते मृकंडुतनयो महान् । स्वल्पायुषं निजं ज्ञात्वा जजाप परमं जपम् ।
śiva uvāca purā tretāyugasyānte mṛkaṇḍutanayo mahān svalpāyuṣaṁ nijaṁ jñātvā jajāpa paramaṁ japam
शिव ने कहा — पूर्वकाल में त्रेतायुग के अंत में, मृकण्डु के महान पुत्र (मार्कण्डेय) ने अपनी अल्प आयु को जानकर परम जप किया।
श्लोक 47 (skanda.2.92.47)
द्वादशाक्षरमंत्रेण पूजितो हरिरव्ययः । सप्तकल्पायुषं ज्ञात्वा तत्रैवांतरतो ययौ ।
dvādaśākṣaramantreṇa pūjito harirvyayaḥ saptakalpāyuṣaṁ jñātvā tatraivāntarato yayau
द्वादशाक्षर मंत्र से पूजित होकर अविनाशी हरि ने प्रसन्न होकर उसे सात कल्पों की आयु प्रदान की, और वहीं से अंतर्धान हो गए।
श्लोक 48 (skanda.2.92.48)
मार्कंडेयस्ततः श्रुत्वा तीर्थाटनपरिश्रमम् । दर्शनं नारदस्यासीन्मथुरायां षडानन ।
mārkaṇḍeyastataḥ śrutvā tīrthāṭanapariśramam darśanaṁ nāradasyāsīnmathurāyāṁ ṣaḍānana
हे षडानन, तब मार्कण्डेय ने तीर्थाटन के परिश्रम के विषय में सुनकर मथुरा में नारद का दर्शन किया।
श्लोक 49 (skanda.2.92.49)
पूजितो वंदितस्तेन नारदो मुनिसत्तमः । कथयामास माहात्म्यं बदर्या यत्र केशवः ।
pūjito vanditastena nārado munisattamaḥ kathayāmāsa māhātmyaṁ badaryā yatra keśavaḥ
उसके द्वारा पूजित और वंदित होकर मुनिश्रेष्ठ नारद ने बदरी का माहात्म्य कहा, जहाँ स्वयं केशव विराजमान हैं।
श्लोक 50 (skanda.2.92.50)
नारद उवाच । किमिति क्लिश्यते साधो तीर्थाटनपरिश्रमैः । बदर्याख्यं महाक्षेत्रं सान्निध्यं नित्यदा हरेः ।
nārada uvāca kimiti kliśyate sādho tīrthāṭanapariśramaiḥ badaryākhyaṁ mahākṣetraṁ sānnidhyaṁ nityadā hareḥ
नारद ने कहा — हे साधो, तीर्थाटन के परिश्रमों से क्यों कष्ट उठाते हो? बदरी नामक महाक्षेत्र में तो हरि की सन्निधि सदा ही विद्यमान रहती है।
श्लोक 51 (skanda.2.92.51)
तत्र याहि यत्र साक्षाद्धरिं पश्यसि चक्षुषा । तच्छ्रुत्वा विस्मयोपेतो विशालामाययावृषिः ।
tatra yāhi yatra sākṣāddhariṁ paśyasi cakṣuṣā tacchrutvā vismayopeto viśālāmāyayāvṛṣiḥ
वहाँ जाओ, जहाँ तुम अपनी आँखों से साक्षात् हरि को देख सकोगे। यह सुनकर विस्मित हुए ऋषि विशाला की ओर चल पड़े।
श्लोक 52 (skanda.2.92.52)
स्नात्वा शिलामुपविशञ्जजापाष्टाक्षरं परम् । ततःप्रसन्नो भगवाँस्त्रिरात्र्यंते जनार्दनः ।
snātvā śilāmupaviśañjajāpāṣṭākṣaraṁ param tataḥprasanno bhagavāṁstrirātryante janārdanaḥ
स्नान करके शिला पर बैठकर उन्होंने परम अष्टाक्षर मंत्र का जप किया। तब तीन रात्रियों के अंत में भगवान् जनार्दन प्रसन्न हुए।
श्लोक 53 (skanda.2.92.53)
शंखचक्रगदापद्मवनमालाविभूषणम् । तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय प्रेमगद्गदया गिरा । तुष्टाव प्रणतो भूत्वा मार्कंडेयो जनार्दनम् ।
śaṅkhacakragadāpadmavanamālāvibhūṣaṇam taṁ dṛṣṭvā sahasotthāya premagadgadayā girā tuṣṭāva praṇato bhūtvā mārkaṇḍeyo janārdanam
शंख, चक्र, गदा, पद्म और वनमाला से विभूषित उन्हें देखकर, मार्कण्डेय तुरंत उठ खड़े हुए और प्रेम से गद्गद वाणी में, प्रणत होकर, जनार्दन की स्तुति करने लगे।
श्लोक 54 (skanda.2.92.54)
मार्कंडेय उवाच । अशाश्वते च संसारे सारे ते चरणांबुजे । समुद्धारः कथं नृणां त्राहि मां परमेश्वर ।
mārkaṇḍeya uvāca aśāśvate ca saṁsāre sāre te caraṇāṁbuje samuddhāraḥ kathaṁ nṛṇāṁ trāhi māṁ parameśvara
मार्कण्डेय ने कहा — इस अनित्य संसार में, आपके चरण-कमल ही सार-तत्त्व हैं; मनुष्यों का उद्धार कैसे हो, हे परमेश्वर, मेरी रक्षा कीजिए।
श्लोक 55 (skanda.2.92.55)
तापत्रयपरिश्रांतमनेकाज्ञानजृंभितम् । संसारकुहरे भ्रांतं त्राहि मां कृपयाऽच्युत ।
tāpatrayapariśrāntamanekājñānajṛmbhitam saṁsārakuhare bhrāntaṁ trāhi māṁ kṛpayā'cyuta
तीनों तापों से थके हुए, अनेक अज्ञान से फैले हुए, संसार की गुफा में भटकते हुए मुझे, हे अच्युत, कृपापूर्वक बचाइए।
श्लोक 56 (skanda.2.92.56)
अनेकयोनियंत्रेषु निःसृतेस्तनुवेदनाम् । गर्भवासकृतां प्राप्तं त्राहि मां करुणांबुधे ।
anekayoniyantreṣu niḥsṛtestanuvedanām garbhavāsakṛtāṁ prāptaṁ trāhi māṁ karuṇāṁbudhe
अनेक योनियों के यंत्र-यातना से बाहर निकलने की शारीरिक पीड़ा, गर्भवास से उत्पन्न कष्ट को प्राप्त मुझे, हे करुणासागर, बचाइए।
श्लोक 57 (skanda.2.92.57)
कृमिभक्षितसर्वांगं क्षुत्पिपासाकुलं च हि । आंत्रमालाकुलेगर्भे त्राहि मां मधुसूदन ।
kṛmibhakṣitasarvāṅgaṁ kṣutpipāsākulaṁ ca hi āṁtramālākulegarbhe trāhi māṁ madhusūdana
जिसके समस्त अंगों को कीड़ों ने खा डाला है, जो भूख-प्यास से व्याकुल है, तथा आँतों की माला में उलझे हुए गर्भ में पड़ा है — हे मधुसूदन, ऐसे मुझे बचाइए।
श्लोक 58 (skanda.2.92.58)
अमेध्यादिभिरालिप्तं निश्चेष्टश्रममाकुलम् । स्मरंतं निजकर्मोत्थं त्राहि मां मधुसूदन ।
amedhyādibhirāliptaṁ niśceṣṭaśramamākulam smarantaṁ nijakarmotthaṁ trāhi māṁ madhusūdana
अशुद्ध पदार्थों से लिप्त, निश्चेष्ट होकर थकान से व्याकुल, अपने ही कर्मों से उत्पन्न (दुःख) को स्मरण करते हुए मुझे, हे मधुसूदन, बचाइए।
श्लोक 59 (skanda.2.92.59)
वचनादाननिःश्वासाशक्तं भयमुपागतम् । गर्भवासमहादुःखं त्राहि मां मधुसूदन ।
vacanādānaniḥśvāsāśaktaṁ bhayamupāgatam garbhavāsamahāduḥkhaṁ trāhi māṁ madhusūdana
जो बोलने, कुछ ग्रहण करने और श्वास लेने में भी असमर्थ है, जो भय को प्राप्त है, तथा गर्भवास के महादुःख में पड़ा है — हे मधुसूदन, ऐसे मुझे बचाइए।
श्लोक 60 (skanda.2.92.60)
जरामरणबाल्यादिदुःखसंसारपीडितम् । दुःखाब्धौ सुखबुद्धिं मां कृपासिंधो प्रपालय ।
jarāmaraṇabālyādiduḥkhasaṁsārapīḍitam duḥkhābdhau sukhabuddhiṁ māṁ kṛpāsindho prapālaya
बुढ़ापे, मृत्यु, बाल्यावस्था आदि के दुःखों से भरे संसार से पीड़ित, दुःख के सागर में भी सुख की बुद्धि रखने वाले मुझ जैसे को, हे कृपासागर, पूर्णतः रक्षा कीजिए।
श्लोक 61 (skanda.2.92.61)
कदाचित्कृमितां प्राप्तं कदाचित्स्वेदजन्मिताम् । कदाचिदुद्भिज्जत्वं च कदाचिन्नरतां गतम् ।
kadācitkṛmitāṁ prāptaṁ kadācitsvedajanmitām kadāciduddhijjatvaṁ ca kadācinnaratāṁ gatam
कभी कीट-योनि को प्राप्त हुआ, कभी स्वेद (पसीने) से उत्पन्न योनि को, कभी उद्भिज्ज (अंकुरित) योनि को, और कभी मनुष्य-योनि को प्राप्त हुआ (जीव) —
श्लोक 62 (skanda.2.92.62)
सर्वयोनिसमापन्नं विपन्नं विगतप्रभम् । अनाथं त्वां समापन्नं त्राहि मां कृपयाऽच्युत ।
sarvayonisamāpannaṁ vipannaṁ vigataprabham anāthaṁ tvāṁ samāpannaṁ trāhi māṁ kṛpayā'cyuta
इस प्रकार सम्पूर्ण योनियों को प्राप्त, विपत्तिग्रस्त, तेजरहित तथा अनाथ इस जीव को अपनी शरण में प्राप्त हुआ जानकर, हे अच्युत, कृपापूर्वक मेरी रक्षा कीजिए।
श्लोक 63 (skanda.2.92.63)
एवं स्तुतस्ततः कृष्णो मार्कण्डेयेन धीमता । प्रीतस्तमाह विप्रर्षे वरं मे व्रियतामिति ।
evaṁ stutastataḥ kṛṣṇo mārkaṇḍeyena dhīmatā prītastamāha viprarṣe varaṁ me vriyatāmiti
इस प्रकार बुद्धिमान मार्कण्डेय द्वारा स्तुत होकर कृष्ण प्रसन्न हुए और उनसे कहा — हे विप्रर्षि, मुझसे वर माँगो।
श्लोक 64 (skanda.2.92.64)
श्रीमार्कंडेय उवाच । यदि तुष्टो भवान्मह्यं भगवन्दीनवत्सल । निश्चलां देहि मे भक्तिं पूजायां दर्शने तव । शिलायां तव सान्निध्यमेष एव वरो मम ।
śrīmārkaṇḍeya uvāca yadi tuṣṭo bhavānmahyaṁ bhagavandīnavatsala niścalāṁ dehi me bhaktiṁ pūjāyāṁ darśane tava śilāyāṁ tava sānnidhyameṣa eva varo mama
श्री मार्कण्डेय ने कहा — हे दीनवत्सल भगवन्, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मुझे आपकी पूजा और दर्शन में अटल भक्ति प्रदान कीजिए; तथा इस शिला पर आपकी सन्निधि सदा बनी रहे — यही मेरा वर है।
श्लोक 65 (skanda.2.92.65)
सूत उवाच । तथेत्युक्त्वा महाविष्णुर्ययावंतर्हितं द्विज । मार्कंडेयस्ततस्तुष्टो जगाम पितुराश्रमम् ।
sūta uvāca tathetyuktvā mahāviṣṇuryayāvantarhitaṁ dvija mārkaṇḍeyastatastuṣṭo jagāma pitrāśramam
सूत ने कहा — हे द्विज, 'ऐसा ही हो' कहकर महाविष्णु अंतर्धान हो गए। मार्कण्डेय भी तब संतुष्ट होकर अपने पिता के आश्रम को चले गए।
श्लोक 66 (skanda.2.92.66)
उपस्थानमिदं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् । शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यो गोविन्दे लभते गतिम् ।
upasthānamidaṁ puṇyaṁ sarvapāpapraṇāśanam śṛṇuyācchrāvayenmartyo govinde labhate gatim
यह स्तवन पुण्यमय और समस्त पापों का नाश करने वाला है। जो मनुष्य इसे सुनता या दूसरों को सुनाता है, वह गोविंद के परम पद को प्राप्त करता है।