वैष्णव खण्ड · अध्याय 91
अग्निकृत भगवत्स्तुति का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.91.1)
स्कंद उवाच । कथमेतत्समुत्पन्नं कैर्वा क्षेत्रं निषेवितम् । को वा तस्याप्यधीशः स्यादेतद्विस्तरतो वद ।
skanda uvāca kathametatsamutpannaṁ kairvā kṣetraṁ niṣevitam ko vā tasyāpyadhīśaḥ syādetadvistarato vada
स्कन्द ने कहा — यह क्षेत्र कैसे उत्पन्न हुआ, और किनके द्वारा यह सेवित है? इसका अधीश्वर कौन है? यह सब मुझे विस्तार से बताइए।
श्लोक 2 (skanda.2.91.2)
शिव उवाच । अनादिसिद्धमेतत्तु यथा वेदा हरेस्तनूः । अधिष्ठाता हरिः साक्षान्नारदाद्यैर्निषेवितम् ।
śiva uvāca anādisiddhametattu yathā vedā harestanūḥ adhiṣṭhātā hariḥ sākṣānnāradādyairniṣevitam
शिव ने कहा — यह क्षेत्र अनादिकाल से सिद्ध है, ठीक वैसे ही जैसे वेद हरि के शरीर-स्वरूप हैं। इसके अधिष्ठाता साक्षात् हरि हैं, और नारद आदि मुनियों द्वारा यह सेवित है।
श्लोक 3 (skanda.2.91.3)
पुरा कृतयुगस्यादौ स्वीयां दुहितरं विधिः । रूपयौवनसंपन्नां स तां यभितुमुद्यतः ।
purā kṛtayugasyādau svīyāṁ duhitaraṁ vidhiḥ rūpayauvanasaṁpannāṁ sa tāṁ yabhitumudyataḥ
पूर्वकाल में कृतयुग के आरंभ में, विधाता (ब्रह्मा) अपनी ही रूप और यौवन से संपन्न पुत्री के साथ संभोग करने को उद्यत हुए।
श्लोक 4 (skanda.2.91.4)
तं दृष्ट्वा तादृशं रोषाच्छिरः खड्गेन पञ्चधा । चिच्छेदाऽहं कपालं तद्ब्रह्महत्यासमुद्यते ।
taṁ dṛṣṭvā tādṛśaṁ roṣācchiraḥ khaḍgena pañcadhā cicchedā'haṁ kapālaṁ tadbrahmahatyāsamudyate
उसे उस अवस्था में देखकर, क्रोधवश मैंने खड्ग से उसके पाँच मस्तकों में से एक को काट डाला; वह कपाल तब से मेरे हाथ में ब्रह्महत्या के रूप में चिपक गया।
श्लोक 5 (skanda.2.91.5)
हस्ते कृत्वा जगामाशु तत्र तीर्थानि सेवितुम् । दिवि भूमौ च पाताले तपश्चरणपूर्वकम् ।
haste kṛtvā jagāmāśu tatra tīrthāni sevitum divi bhūmau ca pātāle tapaścaraṇapūrvakam
उस कपाल को हाथ में लेकर मैं शीघ्र ही तीर्थों का सेवन करने के लिए, तप करते हुए, स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में गया।
श्लोक 6 (skanda.2.91.6)
न गता ब्रह्महत्या मे कपालं तादृशं करे । तदा वैकुण्ठमगमं द्रष्टुं लक्ष्मीपतिं हरिम् ।
na gatā brahmahatyā me kapālaṁ tādṛśaṁ kare tadā vaikuṇṭhamagamaṁ draṣṭuṁ lakṣmīpatiṁ harim
फिर भी मेरे हाथ से वह ब्रह्महत्या का कपाल दूर नहीं हुआ; तब मैं लक्ष्मीपति हरि का दर्शन करने वैकुण्ठ गया।
श्लोक 7 (skanda.2.91.7)
विनयावनतो भूत्वा नमस्कृत्य पुनः पुनः । सर्वमाख्यातवांस्तस्मै व्यसनं करुणात्मने ।
vinayāvanato bhūtvā namaskṛtya punaḥ punaḥ sarvamākhyātavāṁstasmai vyasanaṁ karuṇātmane
विनयपूर्वक झुककर, बार-बार प्रणाम करते हुए, मैंने अपने संकट को उस करुणामूर्ति भगवान को पूर्ण रूप से बता दिया।
श्लोक 8 (skanda.2.91.8)
तस्योपदिष्टमादाय बदरीं समुपागतः । तत्क्षणाद्ब्रह्महत्या मे वेपमाना मुहुर्मुहुः ।
tasyopadiṣṭamādāya badarīṁ samupāgataḥ tatkṣaṇādbrahmahatyā me vepamānā muhurmuhuḥ
उनके उपदेश को ग्रहण करके मैं बदरी में आ पहुँचा; उसी क्षण मेरी ब्रह्महत्या बार-बार काँपने लगी।
श्लोक 9 (skanda.2.91.9)
अंतर्हितं कपालं तत्कराद्विगलितं मम । ततःप्रभृति तत्क्षेत्रं पार्वत्या सह सादरम् ।
antarhitaṁ kapālaṁ tatkarādvigalitaṁ mama tataḥprabhṛti tatkṣetraṁ pārvatyā saha sādaram
वह कपाल अंतर्धान हो गया और मेरे हाथ से गिर गया। तब से मैं उस क्षेत्र में पार्वती के साथ आदरपूर्वक—
श्लोक 10 (skanda.2.91.10)
तिष्ठामि तप आस्थाय ऋषीणां प्रीतिमावहन् । वाराणस्यां यथा प्रीतिः श्रीशैलशिखरे तथा ।
tiṣṭhāmi tapa āsthāya ṛṣīṇāṁ prītimāvahan vārāṇasyāṁ yathā prītiḥ śrīśailaśikhare tathā
—तप में स्थित होकर वहाँ निवास करता हूँ, ऋषियों को प्रसन्नता प्रदान करते हुए। जैसी मेरी प्रीति वाराणसी में है, वैसी ही श्रीशैल शिखर पर भी है।
श्लोक 11 (skanda.2.91.11)
कैलासे शिवया सार्द्धं ततोनंतगुणाधिका । अन्यत्र भरणान्मुक्तिः स्वधर्मविधिपूर्वकात् ।
kailāse śivayā sārddhaṁ tato'nantaguṇādhikā anyatra bharaṇānmuktiḥ svadharmavidhipūrvakāt
कैलास पर शिवा (पार्वती) के साथ मेरी जो प्रीति है, उससे भी अनंत गुना अधिक प्रीति यहाँ है। अन्यत्र तो स्वधर्म-विधि का पालन करने से ही मुक्ति मिलती है,
श्लोक 12 (skanda.2.91.12)
बदरी दर्शनादेव मुक्तिः पुंसां करे स्थिता । हरेश्चरणसान्निध्यं यत्र वैश्वानरः स्वयम् ।
badarī darśanādeva muktiḥ puṁsāṁ kare sthitā hareścaraṇasānnidhyaṁ yatra vaiśvānaraḥ svayam
किन्तु बदरी के दर्शन मात्र से ही मनुष्यों की मुक्ति हाथ की हथेली में स्थित हो जाती है, क्योंकि यहाँ हरि के चरणों की सन्निधि में स्वयं वैश्वानर (अग्नि) भी विराजमान हैं।
श्लोक 13 (skanda.2.91.13)
तत्र केदाररूपेण मम लिंगं प्रतिष्ठितम् । केदारदर्शनात्स्पर्शादर्च्चनाद्भक्तिभावतः ।
tatra kedārarūpeṇa mama liṅgaṁ pratiṣṭhitam kedāradarśanātsparśādarccanādbhaktibhāvataḥ
वहाँ केदार के रूप में मेरा लिंग प्रतिष्ठित है। केदार के दर्शन, स्पर्श और भक्तिभाव से पूजा करने से,
श्लोक 14 (skanda.2.91.14)
कोटिजन्मकृतं पापं भस्मीभवति तत्क्षणात् । कलामात्रेण तिष्ठामि तत्र क्षेत्रे विशेषतः ।
koṭijanmakṛtaṁ pāpaṁ bhasmībhavati tatkṣaṇāt kalāmātreṇa tiṣṭhāmi tatra kṣetre viśeṣataḥ
करोड़ों जन्मों में किया गया पाप उसी क्षण भस्म हो जाता है। मैं उस क्षेत्र में विशेष रूप से केवल अपनी एक कला मात्र से ही निवास करता हूँ।
श्लोक 15 (skanda.2.91.15)
कला पंचदशैवात्र मूर्तिमध्ये ह्यवस्थितम् ।
kalā pañcadaśaivātra mūrtimadhye hyavasthitam
यहाँ मूर्ति के मध्य में मेरी पंद्रह कलाएँ ही अवस्थित हैं।
श्लोक 16 (skanda.2.91.16)
जितकृतांतभयाः शिवयोगिनः कृतमृगाजिनकृत्तिसुवाससः । वरविभूतिजटान्वितभूषणाः स्वयमुपासत एव जटाधरम् ।
jitakṛtāntabhayāḥ śivayoginaḥ kṛtamṛgājinakṛttisuvāsasaḥ varavibhūtijaṭānvitabhūṣaṇāḥ svayamupāsata eva jaṭādharam
मृत्यु के भय को जीत चुके शिव-योगी, मृगचर्म को वस्त्र के रूप में धारण किए हुए, उत्तम विभूति और जटाओं से विभूषित होकर, स्वयं उस जटाधारी (शिव) की उपासना करते हैं।
श्लोक 17 (skanda.2.91.17)
फलदलांबुसमीरणतोषिताः शिवमनोजितमृत्युपरिश्रमाः । गिरिवरस्थितनिर्जितमानसाः प्रसरनिर्म्मलबुद्धिमहोदयाः ।
phaladalāmbusamīraṇatoṣitāḥ śivamanojitamṛtyupariśramāḥ girivarasthitanirjitamānasāḥ prasaranirmmalabuddhimahodayāḥ
फल, पत्ते, जल और वायु से ही संतुष्ट रहने वाले, शिव-ध्यान से मृत्यु के परिश्रम को जीत लेने वाले, पर्वत-श्रेष्ठ पर स्थित होकर मन को वश में कर चुके, तथा निर्मल बुद्धि के महान उदय से युक्त वे मुनि—
श्लोक 18 (skanda.2.91.18)
कमलकोमलकांतिमुखांबुजाः शिवकृपाजितनिर्भरवैरिणः । करधृतांजलिमौलिशिवेक्षणाः शिवमुपासत एव निशामुखे ।
kamalakomalakāntimukhāmbujāḥ śivakṛpājitanirbharavairiṇaḥ karadhṛtāñjalimauliśivekṣaṇāḥ śivamupāsata eva niśāmukhe
कमल के समान कोमल और कांतिमय मुखकमल वाले, शिव की कृपा से अपने प्रबल शत्रुओं को जीत लेने वाले, हाथों में अंजलि बाँधकर शिव की ओर मस्तक झुकाए हुए, वे रात्रि के प्रारंभ में ही शिव की उपासना करते हैं।
श्लोक 19 (skanda.2.91.19)
करधृतजपमालाः शांतिसंतोषभाजः कृतनतिपरनित्यप्रार्थनाश्चन्द्रमौलौ । हरचरणसरोजध्यानविज्ञानमूर्तिव्यथितजनमनोजाः सर्वभावान्नितांतम् ।
karadhṛtajapamālāḥ śāntisaṁtoṣabhājaḥ kṛtanatiparanityaprārthanāścandramaulau haracaraṇasarojadhyānavijñānamūrtivyathitajanamanojāḥ sarvabhāvānnitāntam
हाथों में जपमाला धारण करने वाले, शांति और संतोष से युक्त, चन्द्रमौलि (शिव) के प्रति नित्य नमन और प्रार्थना में रत, तथा हर के चरणकमलों के ध्यान से प्राप्त विज्ञान की मूर्ति बनकर, पीड़ित जनों के मन को समस्त भावों से पूर्णतः शांत करने वाले वे मुनि—
श्लोक 20 (skanda.2.91.20)
वाराणस्यां मृतानां च तारकं ब्रह्मसंज्ञकम् । जनानां पूजनात्तत्र मम लिंगस्य जायते ।
vārāṇasyāṁ mṛtānāṁ ca tārakaṁ brahmasaṁjñakam janānāṁ pūjanāttatra mama liṅgasya jāyate
वाराणसी में मरने वालों को जो तारक-मंत्र (ब्रह्म-संज्ञक) मुक्ति देता है, वही फल यहाँ मेरे लिंग की पूजा करने वाले जनों को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 21 (skanda.2.91.21)
वह्नितीर्थं परिभ्राजद्भगवच्चरणांतिके । केदाराख्यं महालिंगं दृष्ट्वा नो जन्मभाग्भवेत् ।
vahnitīrthaṁ paribhrājadbhagavaccaraṇāntike kedārākhyaṁ mahāliṅgaṁ dṛṣṭvā no janmabhāgbhavet
भगवान् के चरणों के समीप देदीप्यमान वह्नितीर्थ है। वहाँ केदार नामक महालिंग का दर्शन करके मनुष्य पुनः जन्म का भागी नहीं होता।
श्लोक 22 (skanda.2.91.22)
स्कन्द उवाच । कथं वैश्वानरः श्रीमान्सर्वलोकैककारणम् । बदरीमनुसंतस्थौ तन्मे वद महामते ।
skanda uvāca kathaṁ vaiśvānaraḥ śrīmānsarvalokaikakāraṇam badarīmanusaṁtasthau tanme vada mahāmate
स्कन्द ने कहा — हे महामते, वह श्रीमान् वैश्वानर (अग्नि), जो समस्त लोकों का एकमात्र कारण है, बदरी में कैसे स्थित हुए, यह मुझे बताइए।
श्लोक 23 (skanda.2.91.23)
शिव उवाच । पुरा समाजः समभूदृषीणामूर्ध्वरेतसाम् । गंगा भगवती यत्र कालिंद्या सह संगता ।
śiva uvāca purā samājaḥ samabhūdṛṣīṇāmūrdhvaretasām gaṅgā bhagavatī yatra kālindyā saha saṅgatā
शिव ने कहा — पूर्वकाल में ऊर्ध्वरेता ऋषियों की एक सभा हुई, वहाँ जहाँ भगवती गंगा कालिन्दी (यमुना) से मिलती हैं।
श्लोक 24 (skanda.2.91.24)
दशाश्वमेधिकं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । बभूव तत्र भगवान्हुतभुक्प्रश्रयानतः । ऋषीणामग्रतः स्थित्वा प्रष्टुं समुपचक्रमे ।
daśāśvamedhikaṁ nāma tīrthaṁ trailokyaviśrutam babhūva tatra bhagavānhutabhukpraśrayānataḥ ṛṣīṇāmagrataḥ sthitvā praṣṭuṁ samupacakrame
वहाँ दशाश्वमेधिक नामक तीर्थ है, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। वहाँ भगवान् अग्निदेव विनयपूर्वक झुककर, ऋषियों के समक्ष खड़े होकर प्रश्न करने लगे।
श्लोक 25 (skanda.2.91.25)
वैश्वानर उवाच । दृष्ट्वा इहैकदृग्ज्ञाना भवन्तो ब्रह्मवित्तमाः । दीनार्थे करुणापूर्णा हृदयार्द्रा दयालवः ।
vaiśvānara uvāca dṛṣṭvā ihaikadṛgjñānā bhavanto brahmavittamāḥ dīnārthe karuṇāpūrṇā hṛdayārdrā dayāluvaḥ
वैश्वानर ने कहा — यहाँ आप सभी एक ही ज्ञान-दृष्टि वाले, ब्रह्मविद्या में श्रेष्ठ, दीनों के प्रति करुणा से पूर्ण, कोमल-हृदय तथा दयालु हैं, ऐसा देखकर—
श्लोक 26 (skanda.2.91.26)
सर्वदुर्लक्षणोद्भूतपातकालिप्तचेतसः । कथं स्यान्निरयान्मुक्तिर्मम ब्रह्मविदुत्तमाः ।
sarvadurlakṣaṇodbhūtapātakāliptacetasaḥ kathaṁ syānnirayānmuktirmama brahmaviduttamāḥ
मेरा चित्त तो समस्त दुर्लक्षणों से उत्पन्न पापों से लिप्त है — हे उत्तम ब्रह्मज्ञानियो, मुझे नरक से मुक्ति किस प्रकार प्राप्त हो सकती है?
श्लोक 27 (skanda.2.91.27)
सर्वेषामृषिवर्य्याणामाजगाम मुनीश्वरः । गंगांभसि समाप्लुत्य वाक्यं चेदमुवाच ह ।
sarveṣāmṛṣivaryyāṇāmājagāma munīśvaraḥ gaṅgāṁbhasi samāplutya vākyaṁ cedamuvāca ha
तब उन सभी श्रेष्ठ ऋषियों के पास एक मुनीश्वर (व्यास) आए, गंगाजल में स्नान करके उन्होंने यह वचन कहा—
श्लोक 28 (skanda.2.91.28)
व्यास उवाच । अस्त्येकः परमोपायो भवतः पापनिष्कृतौ । सर्वभक्षाख्यदोषस्य बदरीं शरणं श्रय ।
vyāsa uvāca astyekaḥ paramopāyo bhavataḥ pāpaniṣkṛtau sarvabhakṣākhyadoṣasya badarīṁ śaraṇaṁ śraya
व्यास ने कहा — तुम्हारे 'सर्वभक्ष' नामक दोष के पाप के प्रायश्चित्त का एक ही सर्वोत्तम उपाय है — बदरी की शरण ग्रहण करो।
श्लोक 29 (skanda.2.91.29)
यत्रास्ते भगवान्साक्षाद्देवदेवो जनार्द्दनः । भक्तानामप्यभक्तानामघहा मधुसूदनः ।
yatrāste bhagavānsākṣāddevadevo janārddanaḥ bhaktānāmapyabhaktānāmaghahā madhusūdanaḥ
जहाँ साक्षात् देवों के देव भगवान् जनार्दन विराजमान हैं, जो भक्तों और अभक्तों दोनों के पापों को हरने वाले मधुसूदन हैं।
श्लोक 30 (skanda.2.91.30)
तत्र गंगांभसि स्नात्वा कृत्वा प्रदक्षिणां हरेः । दंडवत्प्रणिपातेन सर्वपापक्षयो भवेत् ।
tatra gaṅgāṁbhasi snātvā kṛtvā pradakṣiṇāṁ hareḥ daṇḍavatpraṇipātena sarvapāpakṣayo bhavet
वहाँ गंगाजल में स्नान करके, हरि की प्रदक्षिणा करके, तथा दण्डवत् प्रणाम करके, समस्त पापों का क्षय हो जाता है।
श्लोक 31 (skanda.2.91.31)
ततो व्यासमुखाच्छ्रुत्वा ऋषीणामनुवादतः । उत्तराभिमुखो वह्निर्गंधमादनमाययौ ।
tato vyāsamukhācchrutvā ṛṣīṇāmanuvādataḥ uttarābhimukho vahnirgandhamādanamāyayau
तब व्यास के मुख से यह सुनकर, तथा ऋषियों के भी उसी वचन को दोहराने पर, अग्नि उत्तर दिशा की ओर मुख करके गंधमादन पर्वत की ओर चल पड़े।
श्लोक 32 (skanda.2.91.32)
ततो बदरिकां प्राप्य स्नात्वा गंगांभसि स्वयम् । नारायणाश्रमं गत्वा नत्वा प्रोवाच भक्तिमान् ।
tato badarikāṁ prāpya snātvā gaṅgāṁbhasi svayam nārāyaṇāśramaṁ gatvā natvā provāca bhaktimān
फिर बदरिका में पहुँचकर, स्वयं गंगाजल में स्नान करके, नारायण आश्रम में जाकर, प्रणाम करके, वह भक्तिमान अग्नि बोले—
श्लोक 33 (skanda.2.91.33)
अग्निरुवाच । विशुदविज्ञानघनं पुराणं सनातनं विश्वसृजां पतिं गुरुम् । अनेकमेकं जगदेकनाथं नमाम्यनंताश्रितशुद्धबुद्धिम् ।
agniruvāca viśudavijñānaghanaṁ purāṇaṁ sanātanaṁ viśvasṛjāṁ patiṁ gurum anekamekaṁ jagadekanāthaṁ namāmyanantāśritaśuddhabuddhim
अग्नि ने कहा — जो शुद्ध विज्ञान की घनराशि हैं, पुरातन और सनातन हैं, समस्त सृष्टिकर्ताओं के भी स्वामी और गुरु हैं, जो अनेक होते हुए भी एक हैं, जगत के एकमात्र स्वामी हैं, तथा जिनकी शुद्ध बुद्धि अनंत आश्रितों को प्राप्त है, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 34 (skanda.2.91.34)
मायामयीं शक्तिमुपेत्य विश्वकर्त्तारमुद्दिश्य रजोपयुक्तम् । सत्त्वेन चास्य स्थितिहेतुमुग्रमथो तमोभिग्रसितारमीडे ।
māyāmayīṁ śaktimupetya viśvakarttāramuddiśya rajopayuktam sattvena cāsya sthitihetumugramatho tamobhigrasitāramīḍe
मायामयी शक्ति को धारण कर, रजोगुण से युक्त होकर विश्व के कर्ता के रूप में, सत्त्वगुण से इस जगत की स्थिति के भयंकर कारण के रूप में, तथा तमोगुण से इसे ग्रसित करने वाले संहारक के रूप में — मैं उन्हीं की स्तुति करता हूँ।
श्लोक 35 (skanda.2.91.35)
अविद्यया विश्वविमोहितात्मा विद्यैकरूपं विततं त्रिलोक्याम् । विद्याश्रितत्वात्सकलज्ञमीशं त्वविद्यया जीवमहं प्रपद्ये ।
avidyayā viśvavimohitātmā vidyaikarūpaṁ vitataṁ trilokyām vidyāśritatvātsakalajñamīśaṁ tvavidyayā jīvamahaṁ prapadye
अविद्या के द्वारा जिसका आत्मा विश्व से मोहित प्रतीत होता है, किन्तु जो विद्या के एकमात्र रूप में तीनों लोकों में व्याप्त है, जो विद्या के आश्रित होने से सर्वज्ञ ईश्वर है — उसी को मैं अविद्या के द्वारा जीव-रूप में प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 36 (skanda.2.91.36)
भक्तेच्छयाविष्कृतदेहयोगमाभोगभोगार्पितयोगयोगम् । कौशेयपीताम्बरजुष्टशक्तिं विचित्रशक्त्यष्टमयेष्टमीडे ।
bhaktecchayāviṣkṛtadehayogamābhogabhogārpitayogayogam kauśeyapītāmbarajuṣṭaśaktiṁ vicitraśaktyaṣṭamayeṣṭamīḍe
जो भक्तों की इच्छा से देह धारण करते हैं, जो भोग को भी योग के साथ जोड़ देते हैं, जिनकी शक्ति रेशमी पीताम्बर से सुशोभित है, तथा जो विचित्र आठ शक्तियों से युक्त वांछित रूप धारण करते हैं — मैं उनकी स्तुति करता हूँ।
श्लोक 37 (skanda.2.91.37)
अथ प्रसन्नो भगवान्स्तुतः सर्वैर्हृदि स्थितः । प्रोवाच मधुरं वाक्यं पावकं पावनार्थिनम् ।
atha prasanno bhagavānstutaḥ sarvairhṛdi sthitaḥ provāca madhuraṁ vākyaṁ pāvakaṁ pāvanārthinam
तब सबके हृदय में स्थित तथा सबके द्वारा स्तुत भगवान् प्रसन्न होकर, पवित्रता चाहने वाले पावक (अग्नि) से मधुर वचन बोले।
श्लोक 38 (skanda.2.91.38)
श्रीनारायण उवाच । वरं वरय भद्रं ते वरदोऽहमुपागतः । स्तवेनानेन तुष्टोऽस्मि विनयेन तवानध ।
śrīnārāyaṇa uvāca varaṁ varaya bhadraṁ te varado'hamupāgataḥ stavenānena tuṣṭo'smi vinayena tavānagha
श्री नारायण ने कहा — वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो; मैं वर देने के लिए ही आया हूँ। हे निष्पाप, इस स्तवन और तुम्हारी विनम्रता से मैं संतुष्ट हूँ।
श्लोक 39 (skanda.2.91.39)
अग्निरुवाच । ज्ञातं भगवता सर्वं यदर्थमहमागतः । तथापि कथयाम्येतदीश्वराज्ञानुपालनम् ।
agniruvāca jñātaṁ bhagavatā sarvaṁ yadarthamahamāgataḥ tathāpi kathayāmyetadīśvarājñānupālanam
अग्नि ने कहा — भगवन्, आप तो पहले से ही जानते हैं कि मैं किस प्रयोजन से आया हूँ; फिर भी ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए मैं यह कहता हूँ।
श्लोक 40 (skanda.2.91.40)
सर्वभक्षो भवाम्येव निष्कृतिस्तु कथं भवेत् । अत्यन्तभयसंपत्तिरेतस्माज्जायते मम ।
sarvabhakṣo bhavāmyeva niṣkṛtistu kathaṁ bhavet atyantabhayasaṁpattiretasmājjāyate mama
मैं सब कुछ भक्षण करने वाला हो गया हूँ; इसका प्रायश्चित्त कैसे हो सकता है? इसी दोष से मुझे अत्यंत भय की प्राप्ति हो रही है।
श्लोक 41 (skanda.2.91.41)
श्रीनारायण उवाच । क्षेत्रदर्शनमात्रेण प्राणिनां नास्ति पातकम् । मत्प्रसादात्पातकं तु त्वयि मास्तु कदाचन ।
śrīnārāyaṇa uvāca kṣetradarśanamātreṇa prāṇināṁ nāsti pātakam matprasādātpātakaṁ tu tvayi māstu kadācana
श्री नारायण ने कहा — इस क्षेत्र के दर्शन मात्र से प्राणियों का पाप नष्ट हो जाता है। मेरी कृपा से तुझ पर पाप कभी भी न रहे।
श्लोक 42 (skanda.2.91.42)
ततः प्रभृति भूतात्मा पावकः सर्वतो भृशम् । कलयावस्थितश्चात्र सर्वदोषविवर्जितः ।
tataḥ prabhṛti bhūtātmā pāvakaḥ sarvato bhṛśam kalayāvasthitaścātra sarvadoṣavivarjitaḥ
तब से लेकर वह पावक (अग्नि), जो सभी भूतों की आत्मा है, अपनी एक कला से पूर्णतः यहाँ स्थित है, समस्त दोषों से रहित होकर।
श्लोक 43 (skanda.2.91.43)
य एतत्प्रातरुत्थाय शृणोति श्रावयेच्छुचिः । अग्नितीर्थकृतस्नानं फलं प्राप्नोत्यसंशयम् ।
ya etatprātarutthāya śṛṇoti śrāvayecchuciḥ agnitīrthakṛtasnānaṁ phalaṁ prāpnotyasaṁśayam
जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर शुद्ध होकर इसे सुनता या दूसरों को सुनाता है, वह निःसंदेह अग्नितीर्थ में किए गए स्नान का फल प्राप्त करता है।