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वैष्णव खण्ड · अध्याय 90

बदरिकाश्रम की सर्वतीर्थाधिकता का वर्णन

अध्याय 89अध्याय-सूचीअध्याय 91

श्लोक 1 (skanda.2.90.1)

शौनक उवाच । सूतसूत महाभाग सर्वधर्मविदां वर । सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ पुराणे परिनिष्ठित ।

śaunaka uvāca sūtasūta mahābhāga sarvadharmavidāṁ vara sarvaśāstrārthatattvajña purāṇe pariniṣṭhita

शौनक ने कहा — हे सूतों में श्रेष्ठ सूत, हे महाभाग्यशाली, समस्त धर्मों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ, समस्त शास्त्रों के अर्थ-तत्त्व के ज्ञाता तथा पुराणों में सुप्रतिष्ठित!

श्लोक 2 (skanda.2.90.2)

व्यासः सत्यवतीपुत्रो भगवान्विष्णुरव्ययः । तस्य यत्प्रियशिष्यस्त्वं त्वत्तो वेत्ता न कश्चन ।

vyāsaḥ satyavatīputro bhagavānviṣṇuravyayaḥ tasya yatpriyaśiṣyastvaṁ tvatto vettā na kaścana

व्यास, जो सत्यवती के पुत्र और स्वयं अविनाशी भगवान् विष्णु हैं, उनके आप प्रिय शिष्य हैं; आपसे बढ़कर कोई ज्ञाता नहीं है।

श्लोक 3 (skanda.2.90.3)

प्राप्ते कलियुगे घोरे सर्वधर्मबहिष्कृते । जना वै दुष्टकर्माणः सर्वधर्मविवर्जिताः ।

prāpte kaliyuge ghore sarvadharmabahiṣkṛte janā vai duṣṭakarmāṇaḥ sarvadharmavivarjitāḥ

इस भयंकर कलियुग के आ जाने पर, जहाँ समस्त धर्म तिरस्कृत हो गया है, लोग दुष्कर्मी और सम्पूर्ण धर्म से रहित हो गए हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.90.4)

क्षुद्रायुषः क्षुद्रप्राणबलवीर्यतपःक्रियाः । अधर्मनिरताः सर्वे वेदशास्त्रविवर्जिताः ।

kṣudrāyuṣaḥ kṣudraprāṇabalavīryatapaḥkriyāḥ adharmaniratāḥ sarve vedaśāstravivarjitāḥ

उनकी आयु अल्प है, उनका प्राण-बल, वीर्य और तप की क्रियाएँ भी क्षीण हैं; सभी अधर्म में रत तथा वेद-शास्त्र से रहित हैं।

श्लोक 5 (skanda.2.90.5)

तीर्थाटनतपोदानहरिभक्तिविवर्जिताः । कथमेषामल्पकानामुद्धारोऽल्पप्रयत्नतः ।

tīrthāṭanatapodānaharibhaktivivarjitāḥ kathameṣāmalpakānāmuddhāro'lpaprayatnataḥ

वे तीर्थयात्रा, तप, दान और हरि-भक्ति से रहित हैं। इन अल्पशक्ति वालों का उद्धार अल्प प्रयत्न से कैसे हो सकता है?

श्लोक 6 (skanda.2.90.6)

तीर्थानामुत्तमं तीर्थं क्षेत्राणामुत्तमं तथा । मुमुक्षूणां कुतः सिद्धिः कुत्र वा ऋषिसंचयः ।

tīrthānāmuttamaṁ tīrthaṁ kṣetrāṇāmuttamaṁ tathā mumukṣūṇāṁ kutaḥ siddhiḥ kutra vā ṛṣisaṁcayaḥ

तीर्थों में सबसे उत्तम तीर्थ कौन-सा है, और क्षेत्रों में सबसे उत्तम क्षेत्र कौन-सा है? मुमुक्षुओं की सिद्धि कहाँ होती है, और ऋषियों का समागम कहाँ है?

श्लोक 7 (skanda.2.90.7)

कुत्र वाल्पप्रयत्नेन तपो मन्त्राश्च सिद्धिदाः । कुत्र वा वसति श्रीमाञ्जगतामीश्वरेश्वरः । भक्तानामनुरक्तानामनुग्रहकृपालयः ।

kutra vālpaprayatnena tapo mantrāśca siddhidāḥ kutra vā vasati śrīmāñjagatāmīśvareśvaraḥ bhaktānāmanuraktānāmanugrahakṛpālayaḥ

कहाँ अल्प प्रयत्न से भी तप और मन्त्र सिद्धि देने वाले होते हैं? और कहाँ वह लक्ष्मीपति, जगतों के भी ईश्वरों के ईश्वर, अपने अनुरक्त भक्तों पर अनुग्रह और कृपा का आश्रय, निवास करते हैं?

श्लोक 8 (skanda.2.90.8)

एतदन्यच्च सर्वं मे परार्थैकप्रयोजनम् । ब्रूहि भद्राय लोकानामनुग्रहविचक्षण ।

etadanyacca sarvaṁ me parārthaikaprayojanam brūhi bhadrāya lokānāmanugrahavicakṣaṇa

यह सब तथा इसके अतिरिक्त जो कुछ भी केवल दूसरों के हित के लिए है, वह सब मुझे बताइए — हे लोगों पर अनुग्रह करने में निपुण, यह सब लोकों के कल्याण के लिए कहिए।

श्लोक 9 (skanda.2.90.9)

सूत उवाच । साधु साधु महाभाग भवान्परहिते रतः । हरिभक्तिकृतासक्तिप्रक्षालितमनोमलः ।

sūta uvāca sādhu sādhu mahābhāga bhavānparahite rataḥ haribhaktikṛtāsaktiprakṣālitamanomalaḥ

सूत ने कहा — साधु, साधु! हे महाभाग्यशाली, आप दूसरों के हित में रत हैं; हरि-भक्ति में उत्पन्न आसक्ति से आपके मन का मल धुल गया है।

श्लोक 10 (skanda.2.90.10)

अथ मे देवकीपुत्रो हृत्पद्ममधिरोहति । प्रसंगात्तव विप्रर्षे दुर्ल्लभः साधुसंगमः ।

atha me devakīputro hṛtpadmamadhirohati prasaṅgāttava viprarṣe durllabhaḥ sādhusaṅgamaḥ

अब तुम्हारे प्रसंग से देवकी-पुत्र मेरे हृदय-कमल में विराजमान हो रहे हैं; हे विप्रर्षि, साधुओं का संग वस्तुतः दुर्लभ है।

श्लोक 11 (skanda.2.90.11)

हरति दुष्कृतसंचयमुत्तमां गतिमलं तनुते तनुमानिनाम् । अधिकपुण्यवशादवशात्मनां जगति दुर्लभः साधुसमागमः ।

harati duṣkṛtasaṁcayamuttamāṁ gatimalaṁ tanute tanumāninām adhikapuṇyavaśādavaśātmanāṁ jagati durlabhaḥ sādhusamāgamaḥ

यह साधु-समागम शरीरधारियों के संचित पाप-समूह को हर लेता है और उन्हें उत्तम गति प्रदान करने में समर्थ है; यह केवल अत्यधिक पुण्य के प्रभाव से ही असंयत मन वालों को प्राप्त होता है — संसार में साधु-समागम अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 12 (skanda.2.90.12)

हरति हृदयबन्धं कर्मपाशार्दितानां वितरति पदमुच्चैरल्पजल्पैकभाजाम् । जननमरणकर्मश्रांतविश्रांतिहेतुस्त्रिजगति मनुजानां दुर्ल्लभः सत्प्रसंगः ।

harati hṛdayabandhaṁ karmapāśārditānāṁ vitarati padamuccairalpajalpaikabhājām jananamaraṇakarmaśrāntaviśrāntihetustrijagati manujānāṁ durllabhaḥ satprasaṅgaḥ

यह उन लोगों के हृदय-बंधन को हरता है जो कर्म-पाश से पीड़ित हैं, और थोड़े ही सत्संग-वार्तालाप में भाग लेने वालों को भी उच्च पद प्रदान करता है; जन्म-मरण के कर्म से थके हुओं के विश्राम का यह एकमात्र कारण है — तीनों लोकों में मनुष्यों के लिए सत्संग अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 13 (skanda.2.90.13)

सूत उवाच । अयं प्रश्नः पुरा साधो स्कन्देनाकारि सर्वतः । कैलासशिखरे रम्य ऋषीणां परिशृण्वताम् । पुरतो गिरिजाभर्तुः कर्तुं निःश्रेयसं सताम् ।

sūta uvāca ayaṁ praśnaḥ purā sādho skandenākāri sarvataḥ kailāsaśikhare ramya ṛṣīṇāṁ pariśṛṇvatām purato girijābhartuḥ kartuṁ niḥśreyasaṁ satām

सूत ने कहा — हे साधो, यही प्रश्न पूर्वकाल में स्कन्द ने भी पूर्णरूप से किया था, रमणीय कैलास शिखर पर, ऋषियों के सुनते हुए, गिरिजापति (शिव) के समक्ष, सत्पुरुषों के परम कल्याण के लिए।

श्लोक 14 (skanda.2.90.14)

स्कंद उवाच । भगवन्सर्वलोकानां कर्त्ता हर्त्ता पिता गुरुः । क्षेमाय सर्वजंतूनां तपसे कृतनिश्चयः ।

skanda uvāca bhagavansarvalokānāṁ karttā harttā pitā guruḥ kṣemāya sarvajantūnāṁ tapase kṛtaniścayaḥ

स्कन्द ने कहा — हे भगवन्, आप समस्त लोकों के कर्ता, हर्ता, पिता और गुरु हैं; सम्पूर्ण प्राणियों के कल्याण के लिए ही आपने तप का निश्चय किया है।

श्लोक 15 (skanda.2.90.15)

कलिकाले ह्यनुप्राप्ते वेदशास्त्रविवर्जिते । कुत्र वा वसति श्रीमान्भगवान्सात्वतां पतिः ।

kalikāle hyanuprāpte vedaśāstravivarjite kutra vā vasati śrīmānbhagavānsātvatāṁ patiḥ

इस कलिकाल के आ जाने पर, जो वेद-शास्त्र से रहित है, वह श्रीमान् भगवान्, सात्वतों के स्वामी, कहाँ निवास करते हैं?

श्लोक 16 (skanda.2.90.16)

क्षेत्राणि कानि पुण्यानि तीर्थानि सरितस्तथा । केन वा प्राप्यते साक्षाद्भगवान्मधुसूदनः । श्रद्दधानाय भगवन्कृपया वद मे पितः ।

kṣetrāṇi kāni puṇyāni tīrthāni saritastathā kena vā prāpyate sākṣādbhagavānmadhusūdanaḥ śraddadhānāya bhagavankṛpayā vada me pitaḥ

कौन-से क्षेत्र पुण्य हैं, कौन-से तीर्थ और नदियाँ पुण्य हैं? किस उपाय से साक्षात् भगवान् मधुसूदन प्राप्त होते हैं? हे पिता भगवन्, श्रद्धावान् मुझको कृपापूर्वक बताइए।

श्लोक 17 (skanda.2.90.17)

श्रीमहादेव उवाच । बहूनि संति तीर्थानि क्षेत्राणि च षडानन । हरिवासनिवासैकपराणि परमार्थिनाम् ।

śrīmahādeva uvāca bahūni santi tīrthāni kṣetrāṇi ca ṣaḍānana harivāsanivāsaikaparāṇi paramārthinām

श्री महादेव ने कहा — हे षडानन, बहुत से तीर्थ और क्षेत्र हैं, जो हरि के निवास-स्थान होने से परमार्थियों के लिए एकमात्र आश्रय हैं।

श्लोक 18 (skanda.2.90.18)

काम्यानि कानिचित्संति कानिचिन्मुक्तिदान्यपि । इहामुत्रार्थदान्येव बहुपुण्यप्रदानि वै ।

kāmyāni kānicitsanti kānicinmuktidānyapi ihāmutrārthadānyeva bahupuṇyapradāni vai

उनमें से कुछ काम्य (इच्छित फल देने वाले) हैं, कुछ मुक्ति देने वाले भी हैं, और कुछ इस लोक तथा परलोक दोनों में अर्थ देने वाले, अत्यंत पुण्यप्रद हैं।

श्लोक 19 (skanda.2.90.19)

गंगा गोदावरी रेवा तपती यमुना सरित् । क्षिप्रा सरस्वती पुण्या गौतमी कौशिकी तथा ।

gaṅgā godāvarī revā tapatī yamunā sarit kṣiprā sarasvatī puṇyā gautamī kauśikī tathā

गंगा, गोदावरी, रेवा, तपती, यमुना नदी, क्षिप्रा, पुण्यमयी सरस्वती, गौतमी और कौशिकी —

श्लोक 20 (skanda.2.90.20)

कावेरी ताम्रपर्णी च चंद्रभागा महेंद्रजा । चित्रोत्पला वेत्रवती सरयूः पुण्यवाहिनी ।

kāverī tāmraparṇī ca candrabhāgā mahendrajā citrotpalā vetravatī sarayūḥ puṇyavāhinī

कावेरी, ताम्रपर्णी, चन्द्रभागा, महेन्द्रजा, चित्रोत्पला, वेत्रवती और पुण्यसलिला सरयू —

श्लोक 21 (skanda.2.90.21)

चर्मण्वती शतद्रूश्च पयस्विन्यत्रिसंभवा । गंडिका बाहुदा सर्वाः पुण्याः सिंधुः सरस्वती ।

carmaṇvatī śatadrūśca payasvinyatrisaṁbhavā gaṇḍikā bāhudā sarvāḥ puṇyāḥ sindhuḥ sarasvatī

चर्मण्वती, शतद्रू, अत्रि से उत्पन्न पयस्विनी, गण्डकी, बाहुदा — ये सब तथा सिन्धु और सरस्वती भी पुण्यदायिनी हैं।

श्लोक 22 (skanda.2.90.22)

भुक्तिमुक्तिप्रदाश्चैताः सेव्यमाना मुहुर्मुहुः । अयोध्या द्वारका काशी मधुरावंतिका तथा ।

bhuktimuktipradāścaitāḥ sevyamānā muhurmuhuḥ ayodhyā dvārakā kāśī madhurāvantikā tathā

बार-बार सेवित होने पर ये सभी नदियाँ भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं। तथा अयोध्या, द्वारका, काशी, मथुरा और अवन्तिका (उज्जैन) —

श्लोक 23 (skanda.2.90.23)

कुरुक्षेत्रं रामतीर्थं कांची च पुरुषोत्तमम् । पुष्करं दर्दुरं क्षेत्रं वाराहं विधिनिर्मितम् । बदर्य्याख्यं महापुण्यं क्षेत्रं सर्वार्थसाधनम् ।

kurukṣetraṁ rāmatīrthaṁ kāñcī ca puruṣottamam puṣkaraṁ dardura kṣetraṁ vārāhaṁ vidhinirmitam badaryākhyaṁ mahāpuṇyaṁ kṣetraṁ sarvārthasādhanam

कुरुक्षेत्र, रामतीर्थ, काञ्ची, पुरुषोत्तम (जगन्नाथ), पुष्कर, दर्दुर क्षेत्र, ब्रह्मा द्वारा निर्मित वाराह क्षेत्र, तथा बदरी नामक अत्यंत पुण्यदायी क्षेत्र, जो सम्पूर्ण अर्थों को सिद्ध करने वाला है।

श्लोक 24 (skanda.2.90.24)

अयोध्यां विधिवद्दृष्ट्वा पुरीं मुक्त्येकसाधनीम् । सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्रयांति हरिमंदिरम् ।

ayodhyāṁ vidhivaddṛṣṭvā purīṁ muktyekasādhanīm sarvapāpavinirmuktāḥ prayānti harimandiram

मुक्ति के एकमात्र साधन-स्वरूप अयोध्या पुरी का विधिवत् दर्शन करके, मनुष्य सर्वपापों से मुक्त होकर हरि के मन्दिर (परमधाम) को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 25 (skanda.2.90.25)

विविधविष्णुनिषेवणपूर्वकाचरितपूजननर्तनकीर्तनाः । गृहमपास्य हरेरनुचिंतनाज्जितगृहार्जितमृत्युपराक्रमाः ।

vividhaviṣṇuniṣevaṇapūrvakācaritapūjananartanakīrtanāḥ gṛhamapāsya hareranucintanājjitagṛhārjitamṛtyuparākramāḥ

जो विविध प्रकार से विष्णु की सेवा करते हुए पूजन, नर्तन और कीर्तन का आचरण करते हैं, तथा घर को त्यागकर हरि के निरंतर चिंतन से गृहस्थी में अर्जित मृत्यु के पराक्रम को भी जीत लेते हैं।

श्लोक 26 (skanda.2.90.26)

स्वर्गद्वारे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा रामालयं शुचिः । न तस्य कृत्यं पश्यामि कृतकृत्यो भवेद्यतः ।

svargadvāre naraḥ snātvā dṛṣṭvā rāmālayaṁ śuciḥ na tasya kṛtyaṁ paśyāmi kṛtakṛtyo bhavedyataḥ

जो मनुष्य स्वर्गद्वार में स्नान करके, पवित्र होकर राम के मन्दिर का दर्शन करता है, उसके लिए मुझे कोई और कर्तव्य दिखाई नहीं देता, क्योंकि वह कृतकृत्य हो जाता है।

श्लोक 27 (skanda.2.90.27)

द्वारिकायां हरिः साक्षात्स्वालयं नैव मुंचति । अद्यापि भवनं कैश्चित्पुण्यवद्भिः प्रदृश्यते ।

dvārikāyāṁ hariḥ sākṣātsvālayaṁ naiva muñcati adyāpi bhavanaṁ kaiścitpuṇyavadbhiḥ pradṛśyate

द्वारका में हरि साक्षात् अपने भवन को कभी नहीं छोड़ते; आज भी वह भवन कुछ पुण्यात्माओं को दिखाई देता है।

श्लोक 28 (skanda.2.90.28)

गोमत्यां तु नरः स्नात्वा दृष्ट्वा कृष्णमुखांबुजम् । मुक्तिः प्रजायते शेषो विना सांख्यं षडानन ।

gomatyāṁ tu naraḥ snātvā dṛṣṭvā kṛṣṇamukhāmbujam muktiḥ prajāyate śeṣo vinā sāṅkhyaṁ ṣaḍānana

हे षडानन, गोमती में स्नान करके तथा कृष्ण के मुख-कमल का दर्शन करके, मनुष्य को सांख्य-योग के बिना ही शेष रूप में मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 29 (skanda.2.90.29)

असीवरुणयोर्मध्ये पंचक्रोश्यां महाफलम् । अमरा मृत्युमिच्छंति का कथा इतरे जनाः ।

asīvaruṇayormadhye pañcakrośyāṁ mahāphalam amarā mṛtyumicchanti kā kathā itare janāḥ

असी और वरुणा नदियों के मध्य पञ्चक्रोशी में मृत्यु का महान फल है, जिसे स्वयं देवता भी चाहते हैं — फिर अन्य साधारण जनों की तो बात ही क्या है!

श्लोक 30 (skanda.2.90.30)

मणिकर्ण्यां ज्ञानवाप्यां विष्णुपादोदके तथा । ह्रदे पंचनदे स्नात्वा न मातुः स्तनपो भवेत् ।

maṇikarṇyāṁ jñānavāpyāṁ viṣṇupādodake tathā hrade pañcanade snātvā na mātuḥ stanapo bhavet

मणिकर्णिका, ज्ञानवापी, विष्णुपादोदक तथा पञ्चनद ह्रद में स्नान करके, मनुष्य पुनः माता का स्तनपान करने वाला (अर्थात् पुनर्जन्म लेने वाला) नहीं होता।

श्लोक 31 (skanda.2.90.31)

प्रसंगेनापि विश्वेशं दृष्ट्वा काश्यां षडानन । मुक्तिः प्रजायते पुंसां जन्ममृत्युविवर्जिता ।

prasaṅgenāpi viśveśaṁ dṛṣṭvā kāśyāṁ ṣaḍānana muktiḥ prajāyate puṁsāṁ janmamṛtyuvivarjitā

हे षडानन, काशी में केवल प्रसंगवश ही विश्वेश (विश्वनाथ) का दर्शन करने से भी मनुष्यों को जन्म-मृत्यु से रहित मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 32 (skanda.2.90.32)

बहुना किमिहोक्तेन नैतत्क्षेत्रसमं क्वचित् । तपोपवासनिरतो मथुरायां षडानन । जन्मस्थानं समासाद्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ।

bahunā kimihoktena naitatkṣetrasamaṁ kvacit tapopavāsanirato mathurāyāṁ ṣaḍānana janmasthānaṁ samāsādya sarvapāpaiḥ pramucyate

यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? इस क्षेत्र के समान कोई क्षेत्र कहीं नहीं है। हे षडानन, मथुरा में तप और उपवास में लगा हुआ मनुष्य, उस जन्मस्थान को प्राप्त करके, समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 33 (skanda.2.90.33)

विश्रांतितीर्थे विधिवत्स्नात्वा कृत्वा तिलोदकम् । पितॄनुद्धृत्य नरकाद्विष्णुलोकं प्रगच्छति ।

viśrāntitīrthe vidhivatsnātvā kṛtvā tilodakam pitṝnuddhṛtya narakādviṣṇulokaṁ pragacchati

विश्रांति तीर्थ में विधिपूर्वक स्नान करके और तिल-जल का तर्पण करके, मनुष्य अपने पितरों को नरक से उद्धार करके विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 34 (skanda.2.90.34)

यदि कुर्यात्प्रमादेन पातकं तत्र मानवः । विश्रांते स्नानमासाद्य भस्मीभवति तत्क्षणात् ।

yadi kuryātpramādena pātakaṁ tatra mānavaḥ viśrānte snānamāsādya bhasmībhavati tatkṣaṇāt

यदि कोई मनुष्य वहाँ प्रमादवश कोई पाप कर बैठे, तो विश्रांति तीर्थ में स्नान प्राप्त करते ही वह पाप उसी क्षण भस्म हो जाता है।

श्लोक 35 (skanda.2.90.35)

अवंत्यां विधिवत्स्नात्वा शिप्रायां माधवे नराः । पिशाचत्वं न पश्यंति जन्मांतरशतैरपि ।

avantyāṁ vidhivatsnātvā śiprāyāṁ mādhave narāḥ piśācatvaṁ na paśyanti janmāntaraśatairapi

अवन्ती में क्षिप्रा नदी में माधव मास में विधिपूर्वक स्नान करके, मनुष्य सैकड़ों जन्मों में भी पिशाच-योनि को नहीं देखते।

श्लोक 36 (skanda.2.90.36)

कोटितीर्थे नरः स्नात्वा भोजयित्वा द्विजोत्तमान् । महाकालं हरं दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ।

koṭitīrthe naraḥ snātvā bhojayitvā dvijottamān mahākālaṁ haraṁ dṛṣṭvā sarvapāpaiḥ pramucyate

कोटितीर्थ में स्नान करके, उत्तम ब्राह्मणों को भोजन कराकर, तथा महाकाल शिव का दर्शन करके, मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 37 (skanda.2.90.37)

मुक्तिक्षेत्रमिदं साक्षान्मम लोकैकसाधनम् । दानाद्दरिद्रताहानिरिह लोके परत्र च ।

muktikṣetramidaṁ sākṣānmama lokaikasādhanam dānāddaridratāhāniriha loke paratra ca

यह साक्षात् मुक्तिक्षेत्र मेरे ही लोक की एकमात्र प्राप्ति का साधन है; यहाँ दान करने से इस लोक और परलोक दोनों में दरिद्रता का नाश होता है।

श्लोक 38 (skanda.2.90.38)

कुरुक्षेत्रे रामतीर्थे स्वर्णं दत्त्वा स्वशक्तितः । सूर्योपरागे विधिवत्स नरो मुक्तिभाग्भवेत् ।

kurukṣetre rāmatīrthe svarṇaṁ dattvā svaśaktitaḥ sūryoparāge vidhivatsa naro muktibhāgbhavet

कुरुक्षेत्र में रामतीर्थ पर सूर्यग्रहण के समय अपनी शक्ति के अनुसार विधिपूर्वक स्वर्ण दान करके, वह मनुष्य मुक्ति का भागी होता है।

श्लोक 39 (skanda.2.90.39)

ये तत्र प्रतिगृह्णंति नरा लोभवशंगताः । पुरुषत्वं न तेषां वै कल्पकोटिशतैरपि ।

ye tatra pratigṛhṇanti narā lobhavaśaṅgatāḥ puruṣatvaṁ na teṣāṁ vai kalpakoṭiśatairapi

किंतु जो लोभवश उस दान को वहाँ ग्रहण करते हैं, उन्हें सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी पुनः मनुष्यत्व प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 40 (skanda.2.90.40)

हरिक्षेत्रे हरिं दृष्ट्वा स्नात्वा पादोदके जनः । सर्वपापविनिर्मुक्तो हरिणा सह मोदते ।

harikṣetre hariṁ dṛṣṭvā snātvā pādodake janaḥ sarvapāpavinirmukto hariṇā saha modate

हरिक्षेत्र में हरि का दर्शन करके तथा उनके चरणोदक में स्नान करके, मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर हरि के साथ आनंदित होता है।

श्लोक 41 (skanda.2.90.41)

खगगणा विविधा निवसंत्यहो ऋषिगणाः फलमूलदलाशनाः । पवनसंयमनक्रमनिर्जितेंद्रियपराक्रमणा मुनयस्त्विह ।

khagagaṇā vividhā nivasantyaho ṛṣigaṇāḥ phalamūladalāśanāḥ pavanasaṁyamanakramanirjitendriyaparākramaṇā munayastviha

अहो! यहाँ नाना प्रकार के पक्षिगण निवास करते हैं, तथा फल-मूल-पत्तों का आहार करने वाले ऋषिगण भी; और प्राणायाम के क्रम से इन्द्रियों के पराक्रम को जीत लेने वाले मुनि भी यहीं निवास करते हैं।

श्लोक 42 (skanda.2.90.42)

विष्णुकांच्यां हरिः साक्षाच्छिवकांच्यां शिवः स्वयम् । अभेदादुभयोर्भक्त्या मुक्तिः करतले स्थिता । विभेदजननात्पुंसां जायते कुत्सिता गतिः ।

viṣṇukāñcyāṁ hariḥ sākṣācchivakāñcyāṁ śivaḥ svayam abhedādubhayorbhaktyā muktiḥ karatale sthitā vibhedajananātpuṁsāṁ jāyate kutsitā gatiḥ

विष्णुकांची में साक्षात् हरि और शिवकांची में स्वयं शिव विराजमान हैं; दोनों में अभेद जानकर भक्ति करने से मुक्ति हाथ की हथेली पर स्थित हो जाती है; परंतु उनमें भेद मानने से मनुष्यों की गति निकृष्ट हो जाती है।

श्लोक 43 (skanda.2.90.43)

सकृद्दृष्ट्वा जगन्नाथं मार्कंडेयह्रदे प्लुतः । विना ज्ञानेन योगेन न मातुः स्तनपो भवेत् ।

sakṛddṛṣṭvā jagannāthaṁ mārkaṇḍeyahrade plutaḥ vinā jñānena yogena na mātuḥ stanapo bhavet

मार्कण्डेय ह्रद में स्नान करके जगन्नाथ का एक बार दर्शन करने मात्र से, बिना ज्ञान और योग के भी, मनुष्य पुनः माता का स्तनपान करने वाला नहीं होता।

श्लोक 44 (skanda.2.90.44)

रोहिण्यामुदधौ स्नात्वा इंद्रद्युम्नह्रदे तथा । भुक्त्वा निवेदितं विष्णोर्वैकुंठे वसतिं लभेत् ।

rohiṇyāmudadhau snātvā indradyumnahrade tathā bhuktvā niveditaṁ viṣṇorvaikuṇṭhe vasatiṁ labhet

रोहिणी कुण्ड में तथा समुद्र में स्नान करके, और इन्द्रद्युम्न ह्रद में भी स्नान करके, विष्णु को अर्पित नैवेद्य का भोजन करने से, मनुष्य वैकुण्ठ में निवास प्राप्त करता है।

श्लोक 45 (skanda.2.90.45)

दशयोजनविस्तीर्णं क्षेत्रं शंखोपरि स्थितम् । चतुर्भुजत्वमायांति कीटा अपि न संशयः ।

daśayojanavistīrṇaṁ kṣetraṁ śaṅkhopari sthitam caturbhujatvamāyānti kīṭā api na saṁśayaḥ

दस योजन विस्तार वाला यह क्षेत्र शंख के ऊपर स्थित है; इसमें कीट भी चतुर्भुज रूप को प्राप्त हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 46 (skanda.2.90.46)

कार्त्तिक्यां पुष्करे स्नात्वा श्राद्धं कृत्वा सदक्षिणम् । भोजयित्वा द्विजान्भक्त्या ब्रह्मलोके महीयते ।

kārttikyāṁ puṣkare snātvā śrāddhaṁ kṛtvā sadakṣiṇam bhojayitvā dvijānbhaktyā brahmaloke mahīyate

कार्तिकी पूर्णिमा में पुष्कर में स्नान करके, दक्षिणा सहित श्राद्ध करके, भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराकर, मनुष्य ब्रह्मलोक में महिमामंडित होता है।

श्लोक 47 (skanda.2.90.47)

सकृत्स्नात्वा ह्रदे तस्मिन्यूपं दृष्ट्वा समाहितः । सर्वपापविनिर्मुक्तो जायते द्विजसत्तमः ।

sakṛtsnātvā hrade tasminyūpaṁ dṛṣṭvā samāhitaḥ sarvapāpavinirmukto jāyate dvijasattamaḥ

उस ह्रद में एक बार स्नान करके और एकाग्रचित्त होकर यूप-स्तंभ का दर्शन करके, मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर उत्तम ब्राह्मण के रूप में जन्म लेता है।

श्लोक 48 (skanda.2.90.48)

षष्टिवर्षसहस्राणि योगाभ्यासेन यत्फलम् । सौकरे विधिवत्स्नात्वा पूजयित्वा हरिं शुचिः ।

ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi yogābhyāsena yatphalam saukare vidhivatsnātvā pūjayitvā hariṁ śuciḥ

योग के साठ हजार वर्षों के अभ्यास से जो फल मिलता है, वही फल सौकर (वाराह) क्षेत्र में विधिपूर्वक स्नान करके और शुद्ध होकर हरि की पूजा करने से प्राप्त होता है।

श्लोक 49 (skanda.2.90.49)

सप्तजन्मकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति । तीर्थराजं महापुण्यं सर्वतीर्थनिषेवितम् ।

saptajanmakṛtaṁ pāpaṁ tatkṣaṇādeva naśyati tīrtharājaṁ mahāpuṇyaṁ sarvatīrthaniṣevitam

सात जन्मों में किया गया पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है। यह तीर्थराज अत्यंत पुण्यमय है, और समस्त तीर्थों द्वारा सेवित है।

श्लोक 50 (skanda.2.90.50)

कामिनां सर्वजंतूनामीप्सितं कर्मभिर्भवेत् । वेण्यां स्नात्वा शुचिर्भूत्वा कृत्वा माधवदर्शनम् । भुक्त्वा पुण्यवतां भोगानन्ते माधवतां व्रजेत् ।

kāmināṁ sarvajantūnāmīpsitaṁ karmabhirbhavet veṇyāṁ snātvā śucirbhūtvā kṛtvā mādhavadarśanam bhuktvā puṇyavatāṁ bhogānante mādhavatāṁ vrajet

इच्छा रखने वाले सम्पूर्ण प्राणियों की अभिलषित वस्तु कर्मों द्वारा सिद्ध हो जाती है। वेणी नदी में स्नान करके, शुद्ध होकर, माधव का दर्शन करके, तथा पुण्यवानों के भोगों को भोगकर, मनुष्य अंत में माधव-पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 51 (skanda.2.90.51)

माघे मासि नरः स्नात्वा त्रिवेण्यां भक्तिभावितः । बदरीकीर्तनात्पुण्यं तत्समाप्नोति मानवः ।

māghe māsi naraḥ snātvā triveṇyāṁ bhaktibhāvitaḥ badarīkīrtanātpuṇyaṁ tatsamāpnoti mānavaḥ

माघ मास में त्रिवेणी में भक्तिभाव से स्नान करने वाला मनुष्य वही पुण्य प्राप्त करता है जो केवल 'बदरी' नाम के कीर्तन-मात्र से प्राप्त होता है।

श्लोक 52 (skanda.2.90.52)

दशाश्वमेधिकं तीर्थं दशयज्ञफलप्रदम् । संक्षेपात्कथितं पुत्र किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।

daśāśvamedhikaṁ tīrthaṁ daśayajñaphalapradam saṁkṣepātkathitaṁ putra kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi

दशाश्वमेध तीर्थ दस अश्वमेध यज्ञों का फल देने वाला है। हे पुत्र, यह सब मैंने संक्षेप में कहा है; अब और क्या सुनना चाहते हो?

श्लोक 53 (skanda.2.90.53)

स्कंद उवाच । बदर्य्याख्यं हरेः क्षेत्रं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् । क्षेत्रस्य स्मरणादेव महापातकिनो नराः । विमुक्तकिल्विषाः सद्यो मरणान्मुक्तिभागिनः ।

skanda uvāca badaryākhyaṁ hareḥ kṣetraṁ triṣu lokeṣu durlabham kṣetrasya smaraṇādeva mahāpātakino narāḥ vimuktakilviṣāḥ sadyo maraṇānmuktibhāginaḥ

स्कन्द ने कहा — हरि का बदरी नामक क्षेत्र तीनों लोकों में दुर्लभ है। इस क्षेत्र के स्मरण मात्र से ही महापातकी मनुष्य भी तत्काल पाप-मुक्त होकर, मृत्यु के पश्चात् मुक्ति के भागी बनते हैं।

श्लोक 54 (skanda.2.90.54)

अन्यतीर्थे कृतं येन तपः परमदारुणम् । तत्समा बदरीयात्रा मनसापि प्रजायते ।

anyatīrthe kṛtaṁ yena tapaḥ paramadāruṇam tatsamā badarīyātrā manasāpi prajāyate

किसी अन्य तीर्थ में जो घोर तप किया गया हो, उसके समान फल केवल मन से की गई बदरी की यात्रा से भी प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 55 (skanda.2.90.55)

बहूनि संति तीर्थानि दिवि भूमौ रसातले । बदरीसदृशं तीर्थं न भूतं न भविष्यति ।

bahūni santi tīrthāni divi bhūmau rasātale badarīsadṛśaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati

स्वर्ग में, पृथ्वी पर और पाताल में बहुत से तीर्थ हैं, किन्तु बदरी के समान तीर्थ न कभी हुआ है, न कभी होगा।

श्लोक 56 (skanda.2.90.56)

अश्वमेध सहस्राणि वायुभोज्ये च यत्फलम् । क्षेत्रांतरे विशालायां तत्फलं क्षणमात्रतः ।

aśvamedha sahasrāṇi vāyubhojye ca yatphalam kṣetrāntare viśālāyāṁ tatphalaṁ kṣaṇamātrataḥ

हजारों अश्वमेध यज्ञों का, तथा केवल वायु का भक्षण करते हुए किए गए तप का जो फल है, वही फल विशाला नामक इस क्षेत्र में केवल एक क्षण में प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 57 (skanda.2.90.57)

कृते मुक्तिप्रदा प्रोक्ता त्रेतायां योगसिद्धिदा । विशाला द्वापरे प्रोक्ता कलौ बदरिकाश्रमः ।

kṛte muktipradā proktā tretāyāṁ yogasiddhidā viśālā dvāpare proktā kalau badarikāśramaḥ

कृतयुग में यह मुक्ति देने वाली कही गई है, त्रेता में योग-सिद्धि देने वाली, द्वापर में विशाला के नाम से कही गई है, और कलियुग में इसे बदरिकाश्रम कहा जाता है।

श्लोक 58 (skanda.2.90.58)

स्थूलसूक्ष्मशरीरं तु जीवस्य वसतिस्थलम् । तद्विनाशयति ज्ञानाद्विशाला तेन कथ्यते ।

sthūlasūkṣmaśarīraṁ tu jīvasya vasatisthalam tadvināśayati jñānādviśālā tena kathyate

जीव के स्थूल और सूक्ष्म शरीर ही उसके निवास-स्थान हैं; ज्ञान के द्वारा यह क्षेत्र उनका विनाश कर देता है, इसीलिए इसे 'विशाला' कहा जाता है।

श्लोक 59 (skanda.2.90.59)

अमृतं स्रवते या हि बदरीतरुयोगतः । बदरी कथ्यते प्राज्ञैर्ऋषीणां यत्र संचयः ।

amṛtaṁ sravate yā hi badarītaruyogataḥ badarī kathyate prājñairṛṣīṇāṁ yatra saṁcayaḥ

बदरी वृक्ष के संयोग से जहाँ अमृत झरता है, तथा जहाँ ऋषियों का समागम होता है, विद्वानों द्वारा उसे 'बदरी' कहा जाता है।

श्लोक 60 (skanda.2.90.60)

त्यजेत्सर्वाणि तीर्थानि कालेकाले युगेयुगे । बदरीं भगवान्विष्णुर्न मुञ्चति कदाचन ।

tyajetsarvāṇi tīrthāni kālekāle yugeyuge badarīṁ bhagavānviṣṇurna muñcati kadācana

काल-काल में, युग-युग में, भगवान् विष्णु अन्य समस्त तीर्थों को त्याग सकते हैं, किन्तु बदरी को वे कभी नहीं त्यागते।

श्लोक 61 (skanda.2.90.61)

सर्वतीर्थावगाहेन तपोयोगसमाधितः । तत्फलं प्राप्यते सम्यग्बदरीदर्शनाद्गुह ।

sarvatīrthāvagāhena tapoyogasamādhitaḥ tatphalaṁ prāpyate samyagbadarīdarśanādguha

हे गुह, समस्त तीर्थों में स्नान करने से, तथा तप-योग-समाधि के अभ्यास से जो फल प्राप्त होता है, वही फल पूर्णतः बदरी के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 62 (skanda.2.90.62)

षष्टिवर्षसहस्राणि योगाभ्यासेन यत्फलम् । वाराणस्यां दिनैकेन तत्फलं बदरीं गतौ ।

ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi yogābhyāsena yatphalam vārāṇasyāṁ dinaikena tatphalaṁ badarīṁ gatau

योग के साठ हजार वर्षों के अभ्यास से जो फल मिलता है, और वाराणसी में एक दिन के निवास से जो फल मिलता है, वही फल बदरी की यात्रा-मात्र से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 63 (skanda.2.90.63)

तीर्थानां वसतिर्यत्र देवानां वसतिस्तथा । ऋषीणां वसतिर्यत्र विशाला तेनकथ्यते ।

tīrthānāṁ vasatiryatra devānāṁ vasatistathā ṛṣīṇāṁ vasatiryatra viśālā tenakathyate

जहाँ समस्त तीर्थों का निवास है, जहाँ देवताओं का निवास है, और जहाँ ऋषियों का निवास है, उसी कारण उसे 'विशाला' कहा जाता है।

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