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वैष्णव खण्ड · अध्याय 182

चन्द्रसहस्रव्रतोद्यापनविधिवर्णनम् — चन्द्रसहस्र व्रत के उद्यापन की विधि का वर्णन

अध्याय 181अध्याय-सूचीअध्याय 183

श्लोक 1 (skanda.2.182.1)

सूत उवाच इति श्रुत्वा वचो धीमानादरात्कुंभजन्मनः प्रोवाच मधुरं वाक्यं कृष्णद्वैपायनो मुनिः

sūta uvāca iti śrutvā vaco dhīmānādarātkuṁbhajanmanaḥ provāca madhuraṁ vākyaṁ kṛṣṇadvaipāyano muniḥ

सूत ने कहा — कुम्भयोनि अगस्त्य के इस वचन को आदरपूर्वक सुनकर बुद्धिमान् कृष्णद्वैपायन मुनि ने मधुर वचन कहा।

श्लोक 2 (skanda.2.182.2)

व्यास उवाच भगवन्नद्भुतमिदं तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् श्रुत्वा त्वत्तो मम मनः परमानंदमाययौ

vyāsa uvāca bhagavannadbhutamidaṁ tīrthamāhātmyamuttamam śrutvā tvatto mama manaḥ paramānaṁdamāyayau

व्यास ने कहा — हे भगवन्, यह तीर्थ की उत्तम महिमा अद्भुत है; आपसे इसे सुनकर मेरे मन को परम आनन्द प्राप्त हुआ।

श्लोक 3 (skanda.2.182.3)

अन्यत्तीर्थवरं ब्रूहि तत्त्वेन मम शृण्वतः न तृप्तिरस्ति मनसः शृण्वतो मम सुव्रत

anyattīrthavaraṁ brūhi tattvena mama śṛṇvataḥ na tṛptirasti manasaḥ śṛṇvato mama suvrata

हे सुव्रत, तत्त्व से मुझे सुनते हुए किसी अन्य श्रेष्ठ तीर्थ के विषय में कहिए; सुनते हुए भी मेरे मन को तृप्ति नहीं होती।

श्लोक 4 (skanda.2.182.4)

अगस्त्य उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि तीर्थमन्यदनुत्तमम् स्वर्गद्वारमिति ख्यातं सर्वपापहरं सदा

agastya uvāca śṛṇu vipra pravakṣyāmi tīrthamanyadanuttamam svargadvāramiti khyātaṁ sarvapāpaharaṁ sadā

अगस्त्य ने कहा — हे विप्र, सुनो, मैं एक और अनुत्तम तीर्थ के विषय में कहूँगा, जो 'स्वर्गद्वार' नाम से विख्यात है, जो सदा समस्त पापों का हरण करने वाला है।

श्लोक 5 (skanda.2.182.5)

स्वर्गद्वारस्य माहात्म्यं विस्तराद्वक्तुमीश्वरः नहि कश्चिदतो वत्स संक्षेपाच्छृणु सुव्रत

svargadvārasya māhātmyaṁ vistarādvaktumīśvaraḥ nahi kaścidato vatsa saṁkṣepācchṛṇu suvrata

स्वर्गद्वार की महिमा विस्तार से कहने में कोई भी समर्थ नहीं है, हे वत्स; इसलिए, हे सुव्रत, इसे संक्षेप में सुनो।

श्लोक 6 (skanda.2.182.6)

सहस्रधारामारभ्य पूर्वतः सरयूजले षट्त्रिंशदधिका प्रोक्ता धनुषां षट्शती मितिः

sahasradhārāmārabhya pūrvataḥ sarayūjale ṣaṭtriṁśadadhikā proktā dhanuṣāṁ ṣaṭśatī mitiḥ

सहस्रधारा से आरम्भ करके पूर्व दिशा में सरयू के जल में इसकी दूरी छह सौ छत्तीस धनुष कही गई है।

श्लोक 7 (skanda.2.182.7)

स्वर्गद्वारस्य विस्तारः पुराणज्ञैर्विशारदैः स्वर्गद्वारसमं तीर्थं न भूतं न भविष्यति

svargadvārasya vistāraḥ purāṇajñairviśāradaiḥ svargadvārasamaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati

पुराणों के ज्ञाता विद्वानों ने स्वर्गद्वार का यह विस्तार बताया है; स्वर्गद्वार के समान तीर्थ न कभी हुआ है और न होगा।

श्लोक 8 (skanda.2.182.8)

सत्यंसत्यं पुनः सत्यं नासत्यं मम भाषितम् स्वर्गद्वारसमं तीर्थं नास्ति ब्रह्माण्डगोलके

satyaṁsatyaṁ punaḥ satyaṁ nāsatyaṁ mama bhāṣitam svargadvārasamaṁ tīrthaṁ nāsti brahmāṇḍagolake

सत्य है, सत्य है, पुनः सत्य है, मेरा कथन असत्य नहीं है — इस ब्रह्माण्डगोलक में स्वर्गद्वार के समान कोई तीर्थ नहीं है।

श्लोक 9 (skanda.2.182.9)

हित्वा दिव्यानि भौमानि तीर्थानि सकलान्यपि प्रातरागत्य तिष्ठन्ति तत्र संश्रित्य सुव्रत

hitvā divyāni bhaumāni tīrthāni sakalānyapi prātarāgatya tiṣṭhanti tatra saṁśritya suvrata

हे सुव्रत, दिव्य तथा भौम सभी तीर्थ अपने-अपने स्थान त्यागकर प्रातःकाल आकर वहाँ आश्रय लेकर स्थित होते हैं।

श्लोक 10 (skanda.2.182.10)

तस्मादत्र प्रकर्तव्यं प्रातः स्नानं विशेषतः सर्वतीर्थावगाहस्य फलमात्मन ईप्सता

tasmādatra prakartavyaṁ prātaḥ snānaṁ viśeṣataḥ sarvatīrthāvagāhasya phalamātmana īpsatā

इसलिए जो व्यक्ति सभी तीर्थों में स्नान का फल चाहता है, उसे यहाँ विशेष रूप से प्रातःकाल स्नान करना चाहिए।

श्लोक 11 (skanda.2.182.11)

त्यजंति प्राणिनः प्राणान्स्वर्गद्वारांतरे द्विज प्रयांति परमं स्थानं विष्णोस्ते नात्र संशयः

tyajaṁti prāṇinaḥ prāṇānsvargadvārāṁtare dvija prayāṁti paramaṁ sthānaṁ viṣṇoste nātra saṁśayaḥ

हे द्विज, जो प्राणी स्वर्गद्वार के भीतर प्राण त्यागते हैं, वे विष्णु के परम स्थान को प्राप्त होते हैं — इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 12 (skanda.2.182.12)

मुक्तिद्वारमिदं पश्य स्वर्गप्राप्तिकरं नृणाम् स्वर्गद्वारमिति ख्यातं तस्मात्तीर्थमनुत्तमम्

muktidvāramidaṁ paśya svargaprāptikaraṁ nṛṇām svargadvāramiti khyātaṁ tasmāttīrthamanuttamam

देखो, यह मनुष्यों को स्वर्ग प्रदान करने वाला मुक्ति-द्वार है; इसलिए यह अनुत्तम तीर्थ 'स्वर्गद्वार' नाम से विख्यात है।

श्लोक 13 (skanda.2.182.13)

स्वर्गद्वारं सुदुष्प्राप्यं देवैरपि न संशयः यद्यत्कामयते तत्र तत्तदाप्नोति मानवः

svargadvāraṁ suduṣprāpyaṁ devairapi na saṁśayaḥ yadyatkāmayate tatra tattadāpnoti mānavaḥ

स्वर्गद्वार देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुष्प्राप्य है, इसमें सन्देह नहीं; जो-जो मनुष्य वहाँ जो-जो कामना करता है, वह वही प्राप्त करता है।

श्लोक 14 (skanda.2.182.14)

स्वर्गद्वारे परा सिद्धिः स्वर्गद्वारे परा गतिः जप्तं दत्तं हुतं दृष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत् ध्यानमध्ययनं सर्वं दानं भवति चाक्षयम्

svargadvāre parā siddhiḥ svargadvāre parā gatiḥ japtaṁ dattaṁ hutaṁ dṛṣṭaṁ tapastaptaṁ kṛtaṁ ca yat dhyānamadhyayanaṁ sarvaṁ dānaṁ bhavati cākṣayam

स्वर्गद्वार में परम सिद्धि है, स्वर्गद्वार में परम गति है; वहाँ किया गया जप, दान, हवन, दर्शन, तपस्या तथा कर्म, तथा सम्पूर्ण ध्यान, अध्ययन और दान — सब अक्षय हो जाता है।

श्लोक 15 (skanda.2.182.15)

जन्मांतरसहस्रेण यत्पापं पूर्वसंचितम् स्वर्गद्वारप्रविष्टस्य तत्सर्वं व्रजति क्षयम्

janmāṁtarasahasreṇa yatpāpaṁ pūrvasaṁcitam svargadvārapraviṣṭasya tatsarvaṁ vrajati kṣayam

स्वर्गद्वार में प्रविष्ट हुए व्यक्ति के हजार पूर्वजन्मों में संचित पाप भी सब नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 16 (skanda.2.182.16)

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वै वर्णसंकराः कृमिम्लेच्छाश्च ये चान्ये संकीर्णाः पापयोनयः

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrā vai varṇasaṁkarāḥ kṛmimlecchāśca ye cānye saṁkīrṇāḥ pāpayonayaḥ

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, कृमि-म्लेच्छ तथा अन्य जो भी संकीर्ण, पापयोनि वाले प्राणी हैं,

श्लोक 17 (skanda.2.182.17)

कीटाः पिपीलिकाश्चैव ये चान्ये मृगपक्षिणः कालेन निधनं प्राप्ताः स्वर्गद्वारे शृणु द्विज

kīṭāḥ pipīlikāścaiva ye cānye mṛgapakṣiṇaḥ kālena nidhanaṁ prāptāḥ svargadvāre śṛṇu dvija

कीट, चींटियाँ तथा अन्य पशु-पक्षी जो काल के वशीभूत होकर स्वर्गद्वार में मृत्यु को प्राप्त होते हैं, हे द्विज, सुनो —

श्लोक 18 (skanda.2.182.18)

कौमोदकीकराः सर्वे पक्षिणो गरुडध्वजाः शुभे विष्णुपुरे विष्णुर्जायते तत्र मानवाः

kaumodakīkarāḥ sarve pakṣiṇo garuḍadhvajāḥ śubhe viṣṇupure viṣṇurjāyate tatra mānavāḥ

वे सभी कौमोदकी-धारी तथा गरुड़ध्वज-पक्षी हो जाते हैं; मनुष्य वहाँ शुभ विष्णुपुर में जन्म लेते हैं।

श्लोक 19 (skanda.2.182.19)

अकामो वा सकामो वा अपि तीर्थगतोपि वा स्वर्गद्वारे त्यजन्प्राणान्विष्णुलोके महीयते

akāmo vā sakāmo vā api tīrthagatopi vā svargadvāre tyajanprāṇānviṣṇuloke mahīyate

चाहे निष्काम हो या सकाम, अथवा केवल तीर्थयात्री ही क्यों न हो, स्वर्गद्वार में प्राण त्यागने वाला विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 20 (skanda.2.182.20)

मुनयो देवताः सिद्धाः साध्या यक्षा मरुद्गणाः यज्ञोपवीतमात्रेण विभागं चक्रिरे तु ये

munayo devatāḥ siddhāḥ sādhyā yakṣā marudgaṇāḥ yajñopavītamātreṇa vibhāgaṁ cakrire tu ye

मुनि, देवता, सिद्ध, साध्य, यक्ष तथा मरुद्गण, जिन्होंने यज्ञोपवीत मात्र से इसका विभाजन किया,

श्लोक 21 (skanda.2.182.21)

मध्याह्नेऽत्र प्रकुर्वंति सान्निध्यं देवतागणाः तस्मात्तत्र प्रकुर्वंति मध्याह्ने स्नानमादरात्

madhyāhne’tra prakurvaṁti sānnidhyaṁ devatāgaṇāḥ tasmāttatra prakurvaṁti madhyāhne snānamādarāt

वे देवगण यहाँ मध्याह्न में सांनिध्य करते हैं; इसलिए वहाँ मध्याह्न में आदरपूर्वक स्नान करना चाहिए।

श्लोक 22 (skanda.2.182.22)

कुर्वंत्यनशनं ये तु स्वर्गद्वारे जितेंद्रियाः प्रयांति परमं स्थानं ये च मासोपवासिनः

kurvaṁtyanaśanaṁ ye tu svargadvāre jiteṁdriyāḥ prayāṁti paramaṁ sthānaṁ ye ca māsopavāsinaḥ

जो जितेन्द्रिय स्वर्गद्वार में अनशन (आमरण उपवास) करते हैं तथा जो मासोपवासी होते हैं, वे परम स्थान को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 23 (skanda.2.182.23)

अन्नदानरता ते च रत्नदा भूमिदा नराः गोवस्त्रदाश्च विप्रेभ्यो यांति ते भवनं हरेः

annadānaratā te ca ratnadā bhūmidā narāḥ govastradāśca viprebhyo yāṁti te bhavanaṁ hareḥ

जो अन्नदान में रत हैं, जो रत्न तथा भूमि दान करते हैं, तथा जो द्विजों को गौ और वस्त्र दान करते हैं, वे हरि के धाम को जाते हैं।

श्लोक 24 (skanda.2.182.24)

यत्र सिद्धा महात्मानो मुनयः पितरस्तथा स्वर्गं प्रयांति ते सर्वे स्वर्गद्वारं ततः स्मृतम्

yatra siddhā mahātmāno munayaḥ pitarastathā svargaṁ prayāṁti te sarve svargadvāraṁ tataḥ smṛtam

जहाँ महात्मा सिद्ध, मुनि तथा पितर सभी स्वर्ग को जाते हैं, इसीलिए वह 'स्वर्गद्वार' कहा गया है।

श्लोक 25 (skanda.2.182.25)

चतुर्द्धा च तनुं कृत्वा देवदेवो हरिः स्वयम् अत्र वै रमते नित्यं भ्रातृभिः सह राघवः

caturddhā ca tanuṁ kṛtvā devadevo hariḥ svayam atra vai ramate nityaṁ bhrātṛbhiḥ saha rāghavaḥ

देवदेव हरि स्वयं अपनी देह को चतुर्विध करके, राघव रूप में अपने भाइयों सहित यहाँ सदा क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 26 (skanda.2.182.26)

ब्रह्मलोकं परित्यज्य चतुर्वक्त्रः सनातनः अत्रैव रमते नित्यं देवैः सह पितामहः

brahmalokaṁ parityajya caturvaktraḥ sanātanaḥ atraiva ramate nityaṁ devaiḥ saha pitāmahaḥ

सनातन चतुर्मुख पितामह ब्रह्मलोक को त्यागकर देवताओं सहित यहीं सदा क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 27 (skanda.2.182.27)

कैलासनिलयावासी शिवस्तत्रैव संस्थितः

kailāsanilayāvāsī śivastatraiva saṁsthitaḥ

कैलासवासी शिव भी वहीं स्थित हैं।

श्लोक 28 (skanda.2.182.28)

मेरुमन्दरमात्रोऽपि राशिः पापस्य कर्मणः स्वर्गद्वारं समासाद्य स सर्वो व्रजति क्षयम्

merumandaramātro’pi rāśiḥ pāpasya karmaṇaḥ svargadvāraṁ samāsādya sa sarvo vrajati kṣayam

मेरु तथा मन्दर पर्वत के बराबर भी पापकर्मों की राशि स्वर्गद्वार को प्राप्त होकर पूर्णतः नष्ट हो जाती है।

श्लोक 29 (skanda.2.182.29)

या गतिर्ज्ञानतपसां या गतिर्यज्ञयाजिनाम् स्वर्गद्वारे मृतानां तु सा गतिर्विहिता शुभा

yā gatirjñānatapasāṁ yā gatiryajñayājinām svargadvāre mṛtānāṁ tu sā gatirvihitā śubhā

ज्ञान-तपस्या करने वालों की जो गति है, यज्ञ करने वालों की जो गति है, स्वर्गद्वार में मरने वालों की भी वही शुभ गति विहित है।

श्लोक 30 (skanda.2.182.30)

ऋषिदेवासुरगणैर्जपहोमपरायणैः यतिभिर्मोक्षकामैश्च स्वर्गद्वारो निषेव्यते

ṛṣidevāsuragaṇairjapahomaparāyaṇaiḥ yatibhirmokṣakāmaiśca svargadvāro niṣevyate

जप-होम में रत ऋषि, देव तथा असुरगण, तथा मोक्ष चाहने वाले यति, स्वर्गद्वार का सेवन करते हैं।

श्लोक 31 (skanda.2.182.31)

षष्टिवर्षसहस्राणि काशीवासेषु यत्फलम् तत्फलं निमिषार्द्धेन कलौ दाशरथीं पुरीम्

ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi kāśīvāseṣu yatphalam tatphalaṁ nimiṣārddhena kalau dāśarathīṁ purīm

काशी में साठ हजार वर्षों तक निवास करने से जो फल मिलता है, वही फल कलियुग में दाशरथी पुरी (अयोध्या) में आधे निमिष में मिल जाता है।

श्लोक 32 (skanda.2.182.32)

या गतिर्योगयुक्तानां वाराणस्यां तनुत्यजाम् सा गतिः स्नानमात्रेण सरय्वां हरिवासरे

yā gatiryogayuktānāṁ vārāṇasyāṁ tanutyajām sā gatiḥ snānamātreṇa sarayvāṁ harivāsare

वाराणसी में देह त्यागने वाले योगियों की जो गति होती है, वही गति हरिवासर (एकादशी) को सरयू में स्नान मात्र से प्राप्त होती है।

श्लोक 33 (skanda.2.182.33)

स्वर्गद्वारे मृतः कश्चिन्नरकं नैव पश्यति केशवानुगृहीता हि सर्वे यांति परां गतिम्

svargadvāre mṛtaḥ kaścinnarakaṁ naiva paśyati keśavānugṛhītā hi sarve yāṁti parāṁ gatim

स्वर्गद्वार में मरने वाला कोई भी नरक नहीं देखता; केशव द्वारा अनुगृहीत सभी परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 34 (skanda.2.182.34)

भूलोके चांतरिक्षे च दिवि तीर्थानि यानि वै अतीत्य वर्तते तानि तीर्थान्येतद्द्विजोत्तम

bhūloke cāṁtarikṣe ca divi tīrthāni yāni vai atītya vartate tāni tīrthānyetaddvijottama

हे द्विजोत्तम, भूलोक, अन्तरिक्ष तथा स्वर्ग में जितने भी तीर्थ हैं, यह तीर्थ उन सबसे बढ़कर स्थित है।

श्लोक 35 (skanda.2.182.35)

विष्णुभक्तिं समासाद्य रमन्ते तु सुनिश्चिताः संहृत्य शक्तितः कामं विषयेषु हि संस्थितम्

viṣṇubhaktiṁ samāsādya ramante tu suniścitāḥ saṁhṛtya śaktitaḥ kāmaṁ viṣayeṣu hi saṁsthitam

जो विष्णुभक्ति को प्राप्त करके सुनिश्चित होकर, इन्द्रियों के विषयों में स्थित कामना को यथाशक्ति संयत करके रमण करते हैं,

श्लोक 36 (skanda.2.182.36)

शक्तितः सर्वतो युक्त्वा शक्तिस्तपसि संस्थिता न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि

śaktitaḥ sarvato yuktvā śaktistapasi saṁsthitā na teṣāṁ punarāvṛttiḥ kalpakoṭiśatairapi

तथा अपनी शक्ति के अनुसार सर्वतोभाव से संयुक्त होकर शक्ति को तपस्या में लगाते हैं, उनका सैकड़ों करोड़ कल्पों तक भी पुनरागमन नहीं होता।

श्लोक 37 (skanda.2.182.37)

हन्यमानोऽपि यो विद्वान्वसेच्छस्त्रशतैरपि स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति

hanyamāno’pi yo vidvānvasecchastraśatairapi sa yāti paramaṁ sthānaṁ yatra gatvā na śocati

सैकड़ों शस्त्रों से मारा जाने वाला भी विद्वान् मनुष्य, यदि वहाँ निवास करता हो, उस परम स्थान को प्राप्त होता है, जहाँ जाकर वह फिर शोक नहीं करता।

श्लोक 38 (skanda.2.182.38)

स्वर्गद्वारे वियुज्येत स याति परमां गतिम् उत्तरं दक्षिणं वापि अयनं न विकल्पयेत्

svargadvāre viyujyeta sa yāti paramāṁ gatim uttaraṁ dakṣiṇaṁ vāpi ayanaṁ na vikalpayet

स्वर्गद्वार में देहत्याग करने वाला परम गति को प्राप्त होता है; उत्तरायण हो या दक्षिणायन, इसमें कोई विकल्प नहीं करना चाहिए।

श्लोक 39 (skanda.2.182.39)

सर्वस्तेषां शुभः कालः स्वर्गद्वारं श्रयंति ये स्नानमात्रेण पापानि विलयं यांति देहिनाम्

sarvasteṣāṁ śubhaḥ kālaḥ svargadvāraṁ śrayaṁti ye snānamātreṇa pāpāni vilayaṁ yāṁti dehinām

जो स्वर्गद्वार का आश्रय लेते हैं, उनके लिए सभी काल शुभ होते हैं; स्नान मात्र से प्राणियों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 40 (skanda.2.182.40)

यावत्पापानि देहेन ये कुर्वंति जनाः क्षितौ अयोध्या परमं स्थानं तेषामीरितमादरात्

yāvatpāpāni dehena ye kurvaṁti janāḥ kṣitau ayodhyā paramaṁ sthānaṁ teṣāmīritamādarāt

मनुष्य पृथ्वी पर देह द्वारा जो भी पाप करते हैं, उनके लिए अयोध्या को आदरपूर्वक परम स्थान (उपाय) कहा गया है।

श्लोक 41 (skanda.2.182.41)

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे पंचदश्यां विशेषतः तस्य सांवत्सरी यात्रा देवैश्चन्द्रहरेः स्मृता

jyeṣṭhe māsi site pakṣe paṁcadaśyāṁ viśeṣataḥ tasya sāṁvatsarī yātrā devaiścandrahareḥ smṛtā

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को विशेष रूप से चन्द्रहरि की वार्षिक यात्रा देवताओं द्वारा स्मृत है।

श्लोक 42 (skanda.2.182.42)

तस्मिन्नुद्यापनं चन्द्रसहस्रं व्रतयोगिभिः कार्यं प्रयत्नतो विप्र सर्वयज्ञफलाधिकम्

tasminnudyāpanaṁ candrasahasraṁ vratayogibhiḥ kāryaṁ prayatnato vipra sarvayajñaphalādhikam

हे विप्र, उस दिन व्रतयोगियों द्वारा 'चन्द्रसहस्र' व्रत का उद्यापन यत्नपूर्वक करना चाहिए, जो सभी यज्ञों के फल से अधिक फलदायी है।

श्लोक 43 (skanda.2.182.43)

तस्मिन्कृते महापापक्षयात्स्वर्गो भवेन्नृणाम्

tasminkṛte mahāpāpakṣayātsvargo bhavennṛṇām

उसके किए जाने से मनुष्यों को महापापों के क्षय से स्वर्ग प्राप्त होता है।

श्लोक 44 (skanda.2.182.44)

श्रीव्यास उवाच भगवन्ब्रूहि तत्त्वेन तस्य चन्द्रहरेः शुभाम् उत्पत्तिं च तथा चंद्रव्रतस्योद्यापने विधिम्

śrīvyāsa uvāca bhagavanbrūhi tattvena tasya candrahareḥ śubhām utpattiṁ ca tathā caṁdravratasyodyāpane vidhim

श्री व्यास ने कहा — हे भगवन्, उस शुभ चन्द्रहरि की उत्पत्ति तथा चन्द्रव्रत के उद्यापन की विधि यथार्थ रूप से कहिए।

श्लोक 45 (skanda.2.182.45)

अगस्त्य उवाच अयोध्यानिलयं विष्णुं नत्वा शीतांशुरुत्सुकः आगच्छत्तीर्थमाहात्म्यं साक्षात्कर्तुं सुधानिधिः अत्रागत्य च चन्द्रोऽथ तीर्थयात्रां चकार सः

agastya uvāca ayodhyānilayaṁ viṣṇuṁ natvā śītāṁśurutsukaḥ āgacchattīrthamāhātmyaṁ sākṣātkartuṁ sudhānidhiḥ atrāgatya ca candro’tha tīrthayātrāṁ cakāra saḥ

अगस्त्य ने कहा — शीतांशु (चन्द्रमा), उत्सुक तथा सुधानिधि, अयोध्यावासी विष्णु को नमस्कार करके तीर्थ की महिमा साक्षात् देखने के लिए आए; यहाँ आकर चन्द्रमा ने तीर्थयात्रा की।

श्लोक 46 (skanda.2.182.46)

क्रमेण विधिपूर्वं च नानाश्चर्यसमन्वितः समाराध्य ततो विष्णुं तपसा दुश्चरेण वै

krameṇa vidhipūrvaṁ ca nānāścaryasamanvitaḥ samārādhya tato viṣṇuṁ tapasā duścareṇa vai

क्रमशः विधिपूर्वक, नाना आश्चर्यों से युक्त होकर, फिर उन्होंने दुष्कर तपस्या द्वारा विष्णु की आराधना की,

श्लोक 47 (skanda.2.182.47)

तत्प्रसादं समासाद्य स्वाभिधानपुरस्सरम् हरिं संस्थापयामास तेन चंद्रहरिः स्मृतः

tatprasādaṁ samāsādya svābhidhānapurassaram hariṁ saṁsthāpayāmāsa tena caṁdrahariḥ smṛtaḥ

उनकी कृपा प्राप्त करके अपने नाम को आगे रखकर हरि की स्थापना की, इसलिए वे 'चन्द्रहरि' नाम से स्मृत हुए।

श्लोक 48 (skanda.2.182.48)

वासुदेवप्रसादेन तत्स्थानं जातमद्भुतम् तद्धि गुह्यतमं स्थानं वासुदेवस्य सुव्रत

vāsudevaprasādena tatsthānaṁ jātamadbhutam taddhi guhyatamaṁ sthānaṁ vāsudevasya suvrata

वासुदेव की कृपा से वह स्थान अद्भुत हो गया; हे सुव्रत, वह वासुदेव का अत्यन्त गुह्य स्थान है,

श्लोक 49 (skanda.2.182.49)

सर्वेषामिव भूतानां भर्तुर्मोक्षस्य सर्वदा अस्मिन्सिद्धाः सदा विप्र गोविंदव्रतमास्थिताः

sarveṣāmiva bhūtānāṁ bharturmokṣasya sarvadā asminsiddhāḥ sadā vipra goviṁdavratamāsthitāḥ

जो सभी प्राणियों के स्वामी तथा सदा मोक्ष का हेतु है; हे विप्र, यहाँ सिद्ध सदा गोविन्द-व्रत में स्थित रहते हैं,

श्लोक 50 (skanda.2.182.50)

नानालिंगधरा नित्यं विष्णुलोकाभिकांक्षिणः अभ्यस्यंति परं योगं मुक्तात्मानो जितेंद्रियाः

nānāliṁgadharā nityaṁ viṣṇulokābhikāṁkṣiṇaḥ abhyasyaṁti paraṁ yogaṁ muktātmāno jiteṁdriyāḥ

नाना लिंगों को धारण करने वाले, नित्य विष्णुलोक की कामना करने वाले, मुक्तात्मा तथा जितेन्द्रिय, वे परम योग का अभ्यास करते हैं।

श्लोक 51 (skanda.2.182.51)

यथा धर्ममवाप्नोति अन्यत्र न तथा क्वचित् दानं व्रतं तथा होमः सर्वमक्षयतां व्रजेत

yathā dharmamavāpnoti anyatra na tathā kvacit dānaṁ vrataṁ tathā homaḥ sarvamakṣayatāṁ vrajeta

जैसा धर्म यहाँ प्राप्त होता है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं; दान, व्रत तथा होम — सब यहाँ अक्षय हो जाते हैं।

श्लोक 52 (skanda.2.182.52)

सर्वकामफलप्राप्तिर्जायते प्राणिनां सदा तस्मादत्र विधातव्यं प्राणिभिर्यत्नतः क्रमात् दानादिकं विप्रपूजा दंपत्योश्च विशेषतः

sarvakāmaphalaprāptirjāyate prāṇināṁ sadā tasmādatra vidhātavyaṁ prāṇibhiryatnataḥ kramāt dānādikaṁ viprapūjā daṁpatyośca viśeṣataḥ

प्राणियों को सदा सभी कामनाओं के फल की प्राप्ति होती है; इसलिए यहाँ प्राणियों को यत्नपूर्वक क्रमशः दानादि तथा विशेष रूप से द्विज-दम्पती की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 53 (skanda.2.182.53)

सर्वयज्ञाधिकफलं सर्वतीर्थावगाहनम् सर्वदेवावलोकस्य यत्पुण्यं जायते नृणाम्

sarvayajñādhikaphalaṁ sarvatīrthāvagāhanam sarvadevāvalokasya yatpuṇyaṁ jāyate nṛṇām

सभी यज्ञों से अधिक फल, सभी तीर्थों में स्नान का फल, तथा समस्त देवताओं के दर्शन से जो पुण्य मनुष्यों को प्राप्त होता है,

श्लोक 54 (skanda.2.182.54)

तत्सर्वं जायते पुण्यं प्राणिनामस्य दर्शनात् तस्मादेतन्महाक्षेत्रं पुराणादिषु गीयते

tatsarvaṁ jāyate puṇyaṁ prāṇināmasya darśanāt tasmādetanmahākṣetraṁ purāṇādiṣu gīyate

वह सब पुण्य प्राणियों को इसके दर्शन मात्र से प्राप्त होता है; इसीलिए यह महाक्षेत्र पुराणों आदि में गाया जाता है।

श्लोक 55 (skanda.2.182.55)

उद्यापनविधिश्चात्र नृभिर्द्विजपुरस्सरम् अग्रे चंद्रहरेश्चन्द्र सहस्रव्रतसंज्ञकः

udyāpanavidhiścātra nṛbhirdvijapurassaram agre caṁdrahareścandra sahasravratasaṁjñakaḥ

यहाँ द्विजों को आगे करके मनुष्यों द्वारा किया जाने वाला उद्यापन-विधि चन्द्रहरि के समक्ष 'चन्द्रसहस्र-व्रत' नाम से जाना जाता है।

श्लोक 56 (skanda.2.182.56)

गते वर्षद्वये सार्द्धे पंचपक्षे दिनद्वये दिवसस्याऽष्टमे भागे पतत्येकोऽधिमासकः

gate varṣadvaye sārddhe paṁcapakṣe dinadvaye divasasyā’ṣṭame bhāge patatyeko’dhimāsakaḥ

ढाई वर्ष, पाँच पक्ष, दो दिन तथा एक दिन के आठवें भाग के बीतने पर एक अधिमास पड़ता है।

श्लोक 57 (skanda.2.182.57)

त्र्यधिके वा अशीत्यब्दे चतुर्मासयुते ततः भवेच्चन्द्रसहस्रं तु तावज्जीवति यो नरः उद्यापनं प्रकर्त्तव्यं तेन यात्रा प्रयत्नतः

tryadhike vā aśītyabde caturmāsayute tataḥ bhaveccandrasahasraṁ tu tāvajjīvati yo naraḥ udyāpanaṁ prakarttavyaṁ tena yātrā prayatnataḥ

अथवा तिरासी वर्ष चार मास सहित बीतने पर चन्द्रसहस्र (हजार चन्द्रमास) पूर्ण होता है; जो मनुष्य तब तक जीवित रहे, उसे यत्नपूर्वक उद्यापन तथा यात्रा करनी चाहिए।

श्लोक 58 (skanda.2.182.58)

यत्पुण्यं परमं प्रोक्तं सततं यज्ञयाजिनाम् सत्यवादिषु यत्पुण्यं यत्पुण्यं हेमदायिनि तत्पुण्यं लभते विप्र सहस्राब्दस्य जीविभिः

yatpuṇyaṁ paramaṁ proktaṁ satataṁ yajñayājinām satyavādiṣu yatpuṇyaṁ yatpuṇyaṁ hemadāyini tatpuṇyaṁ labhate vipra sahasrābdasya jīvibhiḥ

निरन्तर यज्ञ करने वालों का जो परम पुण्य कहा गया है, सत्यवादियों का जो पुण्य है, तथा स्वर्णदान करने वाले का जो पुण्य है, हे विप्र, वही पुण्य इस सहस्र वर्ष (चन्द्रमास) तक जीने वालों को प्राप्त होता है।

श्लोक 59 (skanda.2.182.59)

सर्वसौख्यप्रदं तादृक्पुण्यव्रतमिहोच्यते

sarvasaukhyapradaṁ tādṛkpuṇyavratamihocyate

यहाँ ऐसा सर्वसुखप्रद पुण्य-व्रत कहा गया है।

श्लोक 60 (skanda.2.182.60)

चतुर्दश्यां शुचिः स्नात्वा दन्तधावनपूर्वकम् चरितब्रह्मचर्य्यश्च जितवाक्कायमानसः पौर्णमास्यां तथा कृत्वा चंद्रपूजां च कारयेत्

caturdaśyāṁ śuciḥ snātvā dantadhāvanapūrvakam caritabrahmacaryyaśca jitavākkāyamānasaḥ paurṇamāsyāṁ tathā kṛtvā caṁdrapūjāṁ ca kārayet

चतुर्दशी को दन्तधावनपूर्वक शुचि होकर स्नान करके, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, वाणी, शरीर तथा मन को संयत करके, फिर पूर्णिमा को चन्द्र-पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 61 (skanda.2.182.61)

पूर्वं च मातरः पूज्या गौर्यादिकक्रमेण च ऋत्विजः पूजयेद्भक्त्या वृद्धिश्राद्धपुरस्सरम्

pūrvaṁ ca mātaraḥ pūjyā gauryādikakrameṇa ca ṛtvijaḥ pūjayedbhaktyā vṛddhiśrāddhapurassaram

पहले गौरी आदि क्रम से मातृकाओं की पूजा करनी चाहिए; वृद्धि-श्राद्ध पूर्वक भक्तिपूर्वक ऋत्विजों की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 62 (skanda.2.182.62)

प्रयतैः प्रतिमा कार्या चंद्रमंडलसन्निभा सहस्रसंख्या ह्यथवा तदर्द्धं वा तदर्द्धकम् निजवित्तानुमानेन तदर्धेन तदर्द्धिकम्

prayataiḥ pratimā kāryā caṁdramaṁḍalasannibhā sahasrasaṁkhyā hyathavā tadarddhaṁ vā tadarddhakam nijavittānumānena tadardhena tadarddhikam

संयमी पुरुषों द्वारा चन्द्रमण्डल के सदृश हजार, अथवा उसकी आधी, अथवा उसकी भी आधी संख्या में प्रतिमाएँ अपनी सामर्थ्य के अनुसार आधी-आधी घटाकर बनानी चाहिए।

श्लोक 63 (skanda.2.182.63)

ततः श्रद्धानुमानाद्वा कार्या वित्तानुमानतः अथवा षोडश शुभा विधातव्याः प्रयत्नतः

tataḥ śraddhānumānādvā kāryā vittānumānataḥ athavā ṣoḍaśa śubhā vidhātavyāḥ prayatnataḥ

अथवा श्रद्धा तथा धन के अनुमान से, अथवा सोलह शुभ प्रतिमाएँ यत्नपूर्वक बनानी चाहिए।

श्लोक 64 (skanda.2.182.64)

चंद्रपूजां ततः कुर्यादागमोक्तविधानतः माषैः षोडशभिः कार्या प्रत्येकं प्रतिमा शुभा

caṁdrapūjāṁ tataḥ kuryādāgamoktavidhānataḥ māṣaiḥ ṣoḍaśabhiḥ kāryā pratyekaṁ pratimā śubhā

फिर आगमोक्त विधि से चन्द्र-पूजा करनी चाहिए; प्रत्येक शुभ प्रतिमा सोलह माषा की बनानी चाहिए।

श्लोक 65 (skanda.2.182.65)

सोममंत्रेण होमस्तु कार्यो वित्तानुमानतः प्रतिमास्थापनं कुर्यात्सोममंत्रमुदीरयेत्

somamaṁtreṇa homastu kāryo vittānumānataḥ pratimāsthāpanaṁ kuryātsomamaṁtramudīrayet

अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोम-मन्त्र से होम करना चाहिए; सोम-मन्त्र का उच्चारण करते हुए प्रतिमा की स्थापना करनी चाहिए।

श्लोक 66 (skanda.2.182.66)

सोमोत्पत्तिं सोमसूक्तं पाठयेच्च प्रयत्नतः चंद्रपूजां ततः कुर्यादागमोक्तविधानतः

somotpattiṁ somasūktaṁ pāṭhayecca prayatnataḥ caṁdrapūjāṁ tataḥ kuryādāgamoktavidhānataḥ

यत्नपूर्वक सोम की उत्पत्ति तथा सोमसूक्त का पाठ कराना चाहिए; फिर आगमोक्त विधि से चन्द्र-पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 67 (skanda.2.182.67)

चंद्रन्यासं कलान्यासं कारयेन्मंडले जलम् एकादशेंद्रियन्यासं तथैव विधिपूर्वकम्

caṁdranyāsaṁ kalānyāsaṁ kārayenmaṁḍale jalam ekādaśeṁdriyanyāsaṁ tathaiva vidhipūrvakam

मण्डल में जल से चन्द्र-न्यास तथा कला-न्यास करना चाहिए, तथा उसी प्रकार विधिपूर्वक एकादश इन्द्रियों का न्यास करना चाहिए।

श्लोक 68 (skanda.2.182.68)

चंद्रबिंबनिभं कार्य्यं मंडलं शुभतंडुलैः मध्ये च कलशः स्थाप्यो गव्येन पयसाप्लुतः

caṁdrabiṁbanibhaṁ kāryyaṁ maṁḍalaṁ śubhataṁḍulaiḥ madhye ca kalaśaḥ sthāpyo gavyena payasāplutaḥ

शुभ चावलों से चन्द्रबिम्ब के समान मण्डल बनाना चाहिए; उसके मध्य में गाय के दूध से भरा कलश स्थापित करना चाहिए।

श्लोक 69 (skanda.2.182.69)

चतुरस्रेषु संपूर्णान्कलशान्स्थापयेद्बहिः मंडले चंद्रपूजा च कर्तव्या नामभिः क्रमात्

caturasreṣu saṁpūrṇānkalaśānsthāpayedbahiḥ maṁḍale caṁdrapūjā ca kartavyā nāmabhiḥ kramāt

चारों कोनों पर पूर्ण कलश बाहर स्थापित करने चाहिए; मण्डल में क्रमशः नामों से चन्द्र-पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 70 (skanda.2.182.70)

हिमांशवे नमश्चैव सोमचंद्राय वै नमः

himāṁśave namaścaiva somacaṁdrāya vai namaḥ

हिमांशु को नमस्कार, तथा सोमचन्द्र को नमस्कार।

श्लोक 71 (skanda.2.182.71)

चंद्राय विधवे नित्यं नमः कुमुदबंधवे

caṁdrāya vidhave nityaṁ namaḥ kumudabaṁdhave

चन्द्र को, विधु को नित्य नमस्कार, कुमुद के बन्धु को नमस्कार।

श्लोक 72 (skanda.2.182.72)

सुधांशवे च सोमाय ओषधीशाय वै नमः नमोऽब्जाय मृगांकाय कलानां निधये नमः

sudhāṁśave ca somāya oṣadhīśāya vai namaḥ namo’bjāya mṛgāṁkāya kalānāṁ nidhaye namaḥ

सुधांशु को तथा सोम को, ओषधीश को नमस्कार; अब्ज को, मृगांक को नमस्कार, कलाओं के निधि को नमस्कार।

श्लोक 73 (skanda.2.182.73)

नमो नक्षत्रनाथाय शर्वरीपतये नमः जैवातृकाय सततं द्विजराजाय वै नमः

namo nakṣatranāthāya śarvarīpataye namaḥ jaivātṛkāya satataṁ dvijarājāya vai namaḥ

नक्षत्रनाथ को नमस्कार, शर्वरीपति को नमस्कार; जैवातृक को सदा, द्विजराज को नमस्कार।

श्लोक 74 (skanda.2.182.74)

एवं षोडशभिश्चंद्रः स्तोतव्यो नामभिः क्रमात्

evaṁ ṣoḍaśabhiścaṁdraḥ stotavyo nāmabhiḥ kramāt

इस प्रकार क्रमशः इन सोलह नामों से चन्द्रमा की स्तुति करनी चाहिए।

श्लोक 75 (skanda.2.182.75)

ततो वै प्रयतो दद्याद्विधिवन्मंत्रपूर्वकम् शंखतोयं समादाय सपुष्पं फलचंदनम्

tato vai prayato dadyādvidhivanmaṁtrapūrvakam śaṁkhatoyaṁ samādāya sapuṣpaṁ phalacaṁdanam

फिर संयमी होकर विधिपूर्वक मन्त्रपूर्वक शंख का जल, पुष्प, फल तथा चन्दन लेकर अर्घ्य देना चाहिए,

श्लोक 76 (skanda.2.182.76)

नमस्ते मासमासांते जायमान पुनःपुनः गृहाणार्घ्यं शशांक त्वं रोहिण्या सहितो मम

namaste māsamāsāṁte jāyamāna punaḥpunaḥ gṛhāṇārghyaṁ śaśāṁka tvaṁ rohiṇyā sahito mama

'हे शशांक, प्रत्येक मास के अन्त में बार-बार जन्म लेने वाले, तुम्हें नमस्कार है; रोहिणी सहित मेरा यह अर्घ्य ग्रहण करो।'

श्लोक 77 (skanda.2.182.77)

एवं संपूज्य विधिवच्छशिनं प्रणतो भवेत् षोडशान्ये च कलशा दुग्धपूर्णाः सरत्नकाः

evaṁ saṁpūjya vidhivacchaśinaṁ praṇato bhavet ṣoḍaśānye ca kalaśā dugdhapūrṇāḥ saratnakāḥ

इस प्रकार विधिपूर्वक चन्द्रमा की पूजा करके प्रणाम करना चाहिए; अन्य सोलह कलश दूध से भरे तथा रत्नों सहित,

श्लोक 78 (skanda.2.182.78)

सवस्त्राच्छादनाः शांत्यै दातव्यास्ते द्विजन्मने अभिषेकं ततः कुर्यात्पायसेन जलेन तु

savastrācchādanāḥ śāṁtyai dātavyāste dvijanmane abhiṣekaṁ tataḥ kuryātpāyasena jalena tu

वस्त्र से ढके हुए शान्ति के लिए ब्राह्मण को देने चाहिए; फिर पायस (खीर) तथा जल से अभिषेक करना चाहिए।

श्लोक 79 (skanda.2.182.79)

ऋत्विजां मनसस्तुष्टिः कार्या वित्तानुमानतः ब्राह्मणं भोजयेत्तत्र सकुटुंबं विशेषतः

ṛtvijāṁ manasastuṣṭiḥ kāryā vittānumānataḥ brāhmaṇaṁ bhojayettatra sakuṭuṁbaṁ viśeṣataḥ

अपनी सामर्थ्य के अनुसार ऋत्विजों के मन को सन्तुष्ट करना चाहिए; वहाँ विशेष रूप से परिवार सहित ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 80 (skanda.2.182.80)

पूजनीयौ प्रयत्नेन वस्त्रैश्च द्विजदंपती कर्तव्यं च ततो भूरिदक्षिणादानमुत्तमम्

pūjanīyau prayatnena vastraiśca dvijadaṁpatī kartavyaṁ ca tato bhūridakṣiṇādānamuttamam

यत्नपूर्वक वस्त्रों सहित द्विज-दम्पती की पूजा करनी चाहिए; फिर उत्तम, प्रचुर दक्षिणा देनी चाहिए।

श्लोक 81 (skanda.2.182.81)

प्रतिमाश्च प्रदातव्या द्विजेभ्यो धेनुपूर्विकाः सुवर्णं रजतं वस्त्रं तथान्नं च विशेषतः दातव्यं चंद्रसुप्रीत्यै हर्षादेवं द्विजन्मने

pratimāśca pradātavyā dvijebhyo dhenupūrvikāḥ suvarṇaṁ rajataṁ vastraṁ tathānnaṁ ca viśeṣataḥ dātavyaṁ caṁdrasuprītyai harṣādevaṁ dvijanmane

गौ को आगे करके द्विजों को प्रतिमाएँ देनी चाहिए; तथा विशेष रूप से सुवर्ण, रजत, वस्त्र तथा अन्न भी चन्द्रमा की प्रसन्नता के लिए हर्षपूर्वक द्विजों को देने चाहिए।

श्लोक 82 (skanda.2.182.82)

उपवासविधानेन दिनशेषं नयेत्सुधीः अनंतरे च दिवसे कुर्याद्भगवदर्चनम् बांधवैः सह भुञ्जीत नियमं च विसर्ज्जयेत्

upavāsavidhānena dinaśeṣaṁ nayetsudhīḥ anaṁtare ca divase kuryādbhagavadarcanam bāṁdhavaiḥ saha bhuñjīta niyamaṁ ca visarjjayet

बुद्धिमान् व्यक्ति उपवास-विधि से शेष दिन बिताए; अगले दिन भगवान् की पूजा करे, बान्धवों सहित भोजन करे तथा नियम का विसर्जन करे।

श्लोक 83 (skanda.2.182.83)

एवं च कुरुते चंद्रसहस्रं व्रतमुत्तमम् ब्रह्मघ्नोऽपि सुरापोऽपि स्तेयी च गुरुतल्पगः व्रतेनानेन शुद्धात्मा चंद्रलोकं व्रजेन्नरः

evaṁ ca kurute caṁdrasahasraṁ vratamuttamam brahmaghno’pi surāpo’pi steyī ca gurutalpagaḥ vratenānena śuddhātmā caṁdralokaṁ vrajennaraḥ

इस प्रकार जो यह उत्तम चन्द्रसहस्र व्रत करता है, वह ब्रह्महत्यारा, सुरापायी, चोर अथवा गुरुपत्नीगामी भी हो, इस व्रत से शुद्धात्मा होकर चन्द्रलोक को जाता है।

श्लोक 84 (skanda.2.182.84)

यादृशश्च भवेद्विप्र प्रियो नारायणस्य च एवं करोति नियतं कृतकृत्यो भवेन्नरः

yādṛśaśca bhavedvipra priyo nārāyaṇasya ca evaṁ karoti niyataṁ kṛtakṛtyo bhavennaraḥ

हे विप्र, जिस प्रकार का व्यक्ति नारायण को प्रिय होता है, उसी प्रकार जो नियमपूर्वक यह करता है, वह मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

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