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वैष्णव खण्ड · अध्याय 183

धर्महरिस्वर्णखनिमाहात्म्यवर्णनम् — धर्महरि और स्वर्णखान की महिमा का वर्णन

अध्याय 182अध्याय-सूचीअध्याय 184

श्लोक 1 (skanda.2.183.1)

अगस्त्य उवाच तस्माच्चंद्रहरिस्थानादाग्नेय्यां दिशि संस्थितः देवो धर्महरिर्न्नाम कलिकल्मषनाशकः

agastya uvāca tasmāccaṁdraharisthānādāgneyyāṁ diśi saṁsthitaḥ devo dharmaharirnnāma kalikalmaṣanāśakaḥ

अगस्त्य ने कहा — उस चन्द्रहरि के स्थान से आग्नेय दिशा में, कलियुग के पापों का नाशक धर्महरि नामक देव स्थित हैं।

श्लोक 2 (skanda.2.183.2)

वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः स्वकर्मपरिनिष्ठितः पुरा समागतो धर्मस्तीर्थयात्राचिकीर्षया

vedavedāṅgatattvajñaḥ svakarmapariniṣṭhitaḥ purā samāgato dharmastīrthayātrācikīrṣayā

वेद-वेदांगों के तत्त्वज्ञ, अपने कर्तव्य-कर्म में निष्ठावान् धर्म पूर्वकाल में तीर्थयात्रा की इच्छा से यहाँ आए।

श्लोक 3 (skanda.2.183.3)

आगत्य च चकारोच्चैर्यात्रां तत्रादरेण सः दृष्ट्वा माहात्म्यमतुलमयोध्यायाः सविस्मयः

āgatya ca cakāroccairyātrāṁ tatrādareṇa saḥ dṛṣṭvā māhātmyamatulamayodhyāyāḥ savismayaḥ

यहाँ आकर उन्होंने आदरपूर्वक बड़े उत्साह से यात्रा की, और अयोध्या की अनुपम महिमा देखकर विस्मित होकर,

श्लोक 4 (skanda.2.183.4)

विधाय स्वभुजावूर्ध्वौ विप्रोऽवोचन्मुदान्वितः अहो रम्यमिदं तीर्थमहो माहात्म्यमुत्तमम्

vidhāya svabhujāvūrdhvau vipro’vocanmudānvitaḥ aho ramyamidaṁ tīrthamaho māhātmyamuttamam

अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर वह विप्र हर्षित होकर बोले — 'अहो! यह तीर्थ कितना रमणीय है, अहो! यह महिमा कितनी उत्तम है!'

श्लोक 5 (skanda.2.183.5)

अयोध्यासदृशी कापि दृश्यते नापरा पुरी या न स्पृशति वसुधां विष्णुचक्रस्थिताऽनिशम्

ayodhyāsadṛśī kāpi dṛśyate nāparā purī yā na spṛśati vasudhāṁ viṣṇucakrasthitā’niśam

'अयोध्या के समान कोई अन्य पुरी कहीं नहीं दिखती, जो विष्णु के चक्र पर स्थित होकर निरन्तर पृथ्वी को स्पर्श नहीं करती।'

श्लोक 6 (skanda.2.183.6)

यस्यां स्थितो हरिः साक्षात्सेयं केनोपमीयते अहो तीर्थानि सर्वाणि विष्णुलोकप्रदानि वै

yasyāṁ sthito hariḥ sākṣātseyaṁ kenopamīyate aho tīrthāni sarvāṇi viṣṇulokapradāni vai

'जिसमें साक्षात् हरि निवास करते हैं, यह किसकी उपमा से तुलनीय हो सकती है? अहो! यहाँ के सभी तीर्थ विष्णुलोक प्रदान करने वाले हैं!'

श्लोक 7 (skanda.2.183.7)

अहो विष्णुरहो तीर्थमयोध्याऽहो महापुरी अहो माहात्म्यमतुलं किं न श्लाघ्यमिहास्थितम्

aho viṣṇuraho tīrthamayodhyā’ho mahāpurī aho māhātmyamatulaṁ kiṁ na ślāghyamihāsthitam

'अहो विष्णु! अहो यह तीर्थ! अहो अयोध्या महापुरी! अहो अनुपम महिमा! यहाँ क्या ऐसा है जो प्रशंसनीय न हो?'

श्लोक 8 (skanda.2.183.8)

इत्युक्त्वा तत्र बहुशो ननर्त प्रमदाकुलः धर्मो माहात्म्यमालोक्य अयोध्याया विशेषतः

ityuktvā tatra bahuśo nanarta pramadākulaḥ dharmo māhātmyamālokya ayodhyāyā viśeṣataḥ

ऐसा कहकर धर्म वहाँ अयोध्या की महिमा को विशेष रूप से देखकर हर्ष से उन्मत्त होकर बार-बार नाचने लगे।

श्लोक 9 (skanda.2.183.9)

तं तथा नर्तमानं वै धर्मं दृष्ट्वा कृपान्वितः आविर्बभूव भगवान्पीतवासा हरिः स्वयम् तं प्रणम्य च धर्मोऽथ तुष्टाव हरिमादरात्

taṁ tathā nartamānaṁ vai dharmaṁ dṛṣṭvā kṛpānvitaḥ āvirbabhūva bhagavānpītavāsā hariḥ svayam taṁ praṇamya ca dharmo’tha tuṣṭāva harimādarāt

इस प्रकार नृत्य करते हुए धर्म को देखकर कृपायुक्त, पीताम्बरधारी भगवान् हरि स्वयं वहाँ प्रकट हुए; धर्म ने उन्हें प्रणाम करके आदरपूर्वक स्तुति की।

श्लोक 10 (skanda.2.183.10)

धर्म उवाच नमः क्षीराब्धिवासाय नमः पर्यंकशायिने नमः शंकरसंस्पृष्टदिव्यपादाय विष्णवे

dharma uvāca namaḥ kṣīrābdhivāsāya namaḥ paryaṁkaśāyine namaḥ śaṁkarasaṁspṛṣṭadivyapādāya viṣṇave

धर्म ने कहा — क्षीरसागर में निवास करने वाले को नमस्कार, शय्या पर शयन करने वाले को नमस्कार; शंकर द्वारा स्पर्श किए गए दिव्य चरणों वाले विष्णु को नमस्कार।

श्लोक 11 (skanda.2.183.11)

भक्त्यार्च्चितसुपादाय नमोऽजादिप्रियाय ते शुभांगाय सुनेत्राय माधवाय नमो नमः

bhaktyārccitasupādāya namo’jādipriyāya te śubhāṁgāya sunetrāya mādhavāya namo namaḥ

भक्तिपूर्वक पूजित सुन्दर चरणों वाले, ब्रह्मा आदि के प्रिय आपको नमस्कार; शुभ अंगों वाले, सुन्दर नेत्रों वाले माधव को बारम्बार नमस्कार।

श्लोक 12 (skanda.2.183.12)

नमोऽरविन्दपादाय पद्मनाभाय वै नमः नमः क्षीराब्धिकल्लोलस्पृष्टगात्राय शार्ङ्गिणे

namo’ravindapādāya padmanābhāya vai namaḥ namaḥ kṣīrābdhikallolaspṛṣṭagātrāya śārṅgiṇe

कमल-चरण वाले को नमस्कार, पद्मनाभ को नमस्कार; क्षीरसागर की लहरों से स्पर्शित अंगों वाले शार्ङ्गधारी को नमस्कार।

श्लोक 13 (skanda.2.183.13)

ॐ नमो योगनिद्राय योगर्क्षैर्भावितात्मने तार्क्ष्यासनाय देवाय गोविन्दाय नमोनमः

oṁ namo yoganidrāya yogarkṣairbhāvitātmane tārkṣyāsanāya devāya govindāya namonamaḥ

ॐ, योगनिद्रा वाले, योगर्क्ष (नक्षत्रों) से चिन्तित आत्मा वाले को नमस्कार; गरुड़ासन देव गोविन्द को बारम्बार नमस्कार।

श्लोक 14 (skanda.2.183.14)

सुकेशाय सुनासाय सुललाटाय चक्रिणे सुवस्त्राय सुवर्णाय श्रीधराय नमोनमः

sukeśāya sunāsāya sulalāṭāya cakriṇe suvastrāya suvarṇāya śrīdharāya namonamaḥ

सुन्दर केशों वाले, सुन्दर नासिका वाले, सुन्दर ललाट वाले चक्रधारी को, सुन्दर वस्त्र, सुन्दर वर्ण वाले श्रीधर को बारम्बार नमस्कार।

श्लोक 15 (skanda.2.183.15)

सुबाहवे नमस्तुभ्यं चारुजंघाय ते नमः सुवासाय सुदिव्याय सुविद्याय गदाभृते

subāhave namastubhyaṁ cārujaṁghāya te namaḥ suvāsāya sudivyāya suvidyāya gadābhṛte

सुन्दर भुजाओं वाले को नमस्कार, सुन्दर जंघाओं वाले आपको नमस्कार; सुन्दर वस्त्र, सुन्दर दिव्य, सुन्दर विद्या वाले गदाधारी को नमस्कार।

श्लोक 16 (skanda.2.183.16)

केशवाय च शांताय वामनाय नमोनमः धर्मप्रियाय देवाय नमस्ते पीतवाससे

keśavāya ca śāṁtāya vāmanāya namonamaḥ dharmapriyāya devāya namaste pītavāsase

केशव को तथा शान्त वामन को बारम्बार नमस्कार; धर्म को प्रिय देव पीताम्बरधारी आपको नमस्कार।

श्लोक 17 (skanda.2.183.17)

अगस्त्य उवाच इति स्तुतो जगन्नाथो धर्मेण श्रीपतिर्मुदा उवाच स हृषीकेशः प्रीतो धर्ममुदारधीः

agastya uvāca iti stuto jagannātho dharmeṇa śrīpatirmudā uvāca sa hṛṣīkeśaḥ prīto dharmamudāradhīḥ

अगस्त्य ने कहा — इस प्रकार धर्म द्वारा हर्षपूर्वक स्तुत हुए जगन्नाथ श्रीपति हृषीकेश, उदार बुद्धि वाले धर्म से प्रसन्न होकर बोले।

श्लोक 18 (skanda.2.183.18)

श्रीभगवानुवाच तुष्टोऽहं भवतो धर्म स्तोत्रेणानेन सुव्रत वरं वरय धर्मज्ञ यस्ते स्यान्मनसः प्रियः

śrībhagavānuvāca tuṣṭo’haṁ bhavato dharma stotreṇānena suvrata varaṁ varaya dharmajña yaste syānmanasaḥ priyaḥ

श्रीभगवान् ने कहा — हे धर्म, हे सुव्रत, इस स्तोत्र से मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; हे धर्मज्ञ, जो तुम्हारे मन को प्रिय हो, वह वर माँगो।

श्लोक 19 (skanda.2.183.19)

स्तोत्रेणानेन यः स्तौति मानवो मामतन्द्रितः सर्वान्कामानवाप्नोति पूजितः श्रीयुतःसदा

stotreṇānena yaḥ stauti mānavo māmatandritaḥ sarvānkāmānavāpnoti pūjitaḥ śrīyutaḥsadā

जो मनुष्य अथक होकर इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्त करता है तथा सदा पूजित एवं श्रीयुक्त रहता है।

श्लोक 20 (skanda.2.183.20)

धर्म उवाच यदि तुष्टोसि भगवन्देवदेव जगत्पते त्वामहं स्थापयाम्यत्र निजनाम्ना जगद्गुरो

dharma uvāca yadi tuṣṭosi bhagavandevadeva jagatpate tvāmahaṁ sthāpayāmyatra nijanāmnā jagadguro

धर्म ने कहा — हे भगवन्, हे देवदेव जगत्पते, यदि आप प्रसन्न हैं, तो हे जगद्गुरो, मैं आपको यहाँ अपने ही नाम से स्थापित करूँगा।

श्लोक 21 (skanda.2.183.21)

अगस्त्य उवाच एवमस्त्विति संप्रोच्याभवद्धर्महरिर्विभुः स्मरणादेव मुच्येत नरो धर्महरेर्विभोः

agastya uvāca evamastviti saṁprocyābhavaddharmaharirvibhuḥ smaraṇādeva mucyeta naro dharmaharervibhoḥ

अगस्त्य ने कहा — 'ऐसा ही हो' कहकर वह विभु धर्महरि हो गए; धर्महरि विभु का स्मरण मात्र से मनुष्य मुक्त हो जाता है।

श्लोक 22 (skanda.2.183.22)

सरयूसलिले स्नात्वा सुचिंताकुलमानसः देवं धर्महरिं पश्येत्सर्वपापैः प्रमुच्यते

sarayūsalile snātvā suciṁtākulamānasaḥ devaṁ dharmahariṁ paśyetsarvapāpaiḥ pramucyate

चिन्ता से व्याकुल मन वाला मनुष्य सरयू के जल में स्नान करके देव धर्महरि का दर्शन करे, तो वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.2.183.23)

अत्र दानं तथा होमं जपो ब्राह्मणभोजनम् सर्वमक्षयतां याति विष्णुलोके निवासकृत्

atra dānaṁ tathā homaṁ japo brāhmaṇabhojanam sarvamakṣayatāṁ yāti viṣṇuloke nivāsakṛt

यहाँ दान, होम, जप तथा ब्राह्मण-भोजन — सब अक्षय हो जाते हैं तथा विष्णुलोक में निवास कराते हैं।

श्लोक 24 (skanda.2.183.24)

अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि यत्किंचिद्दुष्कृतं भवेत् प्रायश्चित्तं विधातव्यं तन्नाशाय प्रयत्नतः

ajñānājjñānato vāpi yatkiṁcidduṣkṛtaṁ bhavet prāyaścittaṁ vidhātavyaṁ tannāśāya prayatnataḥ

अज्ञान से हो या ज्ञान से, जो भी दुष्कर्म हो जाए, उसके नाश हेतु यत्नपूर्वक प्रायश्चित्त करना चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.2.183.25)

प्रायश्चित्तेन विधिना पापं तस्य प्रणश्यति तस्मादत्र प्रकर्त्तव्यं प्रायश्चित्तं विधानतः

prāyaścittena vidhinā pāpaṁ tasya praṇaśyati tasmādatra prakarttavyaṁ prāyaścittaṁ vidhānataḥ

विधिवत् प्रायश्चित्त से उसका पाप नष्ट हो जाता है; इसलिए यहाँ विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करना चाहिए।

श्लोक 26 (skanda.2.183.26)

अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि राजादेर्निग्रहात्तथा नित्यकर्मनिवृत्तिः स्याद्यस्य पुंसोऽवशात्मनः तेनाप्यत्र विधातव्यं प्रायश्चित्तं प्रयत्नतः

ajñānājjñānato vāpi rājādernigrahāttathā nityakarmanivṛttiḥ syādyasya puṁso’vaśātmanaḥ tenāpyatra vidhātavyaṁ prāyaścittaṁ prayatnataḥ

अज्ञान से हो या ज्ञान से, अथवा राजा आदि के निग्रह से भी जिस असमर्थ पुरुष के नित्य कर्म में विघ्न पड़ जाए, उसे भी यहाँ यत्नपूर्वक प्रायश्चित्त करना चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.2.183.27)

अत्र साक्षात्स्वयं देवो विष्णुर्वसति सादरः तस्माद्वर्णयितुं शक्यो महिमा न हि मानवैः

atra sākṣātsvayaṁ devo viṣṇurvasati sādaraḥ tasmādvarṇayituṁ śakyo mahimā na hi mānavaiḥ

यहाँ साक्षात् स्वयं देव विष्णु आदरपूर्वक निवास करते हैं; इसलिए इसकी महिमा मनुष्यों द्वारा वर्णित नहीं की जा सकती।

श्लोक 28 (skanda.2.183.28)

आषाढे शुक्ल पक्षस्य एकादश्यां द्विजोत्तम तस्य सांवत्सरी यात्रा कर्तव्या तु विधानतः

āṣāḍhe śukla pakṣasya ekādaśyāṁ dvijottama tasya sāṁvatsarī yātrā kartavyā tu vidhānataḥ

हे द्विजोत्तम, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को इसकी वार्षिक यात्रा विधिपूर्वक करनी चाहिए।

श्लोक 29 (skanda.2.183.29)

स्वर्गद्वारे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा धर्महरिं विभुम् सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोके वसेत्सदा

svargadvāre naraḥ snātvā dṛṣṭvā dharmahariṁ vibhum sarvapāpaviśuddhātmā viṣṇuloke vasetsadā

स्वर्गद्वार में स्नान करके तथा विभु धर्महरि का दर्शन करके मनुष्य समस्त पापों से शुद्धात्मा होकर सदा विष्णुलोक में निवास करता है।

श्लोक 30 (skanda.2.183.30)

तस्माद्दक्षिणदिग्भागे स्वर्णस्य खनिरुत्तमा यत्र चक्रे स्वर्णवृष्टिं कुबेरो रघुजाद्भयात्

tasmāddakṣiṇadigbhāge svarṇasya khaniruttamā yatra cakre svarṇavṛṣṭiṁ kubero raghujādbhayāt

उससे दक्षिण दिशा में स्वर्ण की एक उत्तम खान है, जहाँ रघुनन्दन के भय से कुबेर ने स्वर्णवृष्टि की थी।

श्लोक 31 (skanda.2.183.31)

व्यास उवाच भगवन्ब्रूहि तत्त्वज्ञ स्वर्णवृष्टिरभूत्कथम् कुबेरस्य कथं भीतिरुत्पन्ना रघुभूपतेः

vyāsa uvāca bhagavanbrūhi tattvajña svarṇavṛṣṭirabhūtkatham kuberasya kathaṁ bhītirutpannā raghubhūpateḥ

व्यास ने कहा — हे तत्त्वज्ञ भगवन्, स्वर्णवृष्टि कैसे हुई तथा राजा रघु से कुबेर को भय कैसे उत्पन्न हुआ, यह बताइए।

श्लोक 32 (skanda.2.183.32)

एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तरान्मम सुव्रत श्रुत्वा कथारहस्यानि न तृप्यति मनो मम

etatsarvaṁ samācakṣva vistarānmama suvrata śrutvā kathārahasyāni na tṛpyati mano mama

हे सुव्रत, यह सब मुझे विस्तार से कहिए; इन कथाओं के रहस्यों को सुनकर भी मेरा मन तृप्त नहीं होता।

श्लोक 33 (skanda.2.183.33)

अगस्त्य उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि स्वर्णस्योत्पत्तिमुत्तमाम् यस्य श्रवणतो नृणां जायते विस्मयो महान्

agastya uvāca śṛṇu vipra pravakṣyāmi svarṇasyotpattimuttamām yasya śravaṇato nṛṇāṁ jāyate vismayo mahān

अगस्त्य ने कहा — हे विप्र, सुनो, मैं स्वर्ण की उत्तम उत्पत्ति की कथा कहूँगा, जिसे सुनकर मनुष्यों को महान् विस्मय होता है।

श्लोक 34 (skanda.2.183.34)

आसीत्पुरा रघुपतिरिक्ष्वाकुकुलवर्द्धनः रघुर्निजभुजोदारवीर्यशासितभूतलः

āsītpurā raghupatirikṣvākukulavarddhanaḥ raghurnijabhujodāravīryaśāsitabhūtalaḥ

पूर्वकाल में इक्ष्वाकु-कुल को बढ़ाने वाला रघुपति राजा हुआ, जो अपनी भुजाओं के उदार पराक्रम से पृथ्वी पर शासन करता था,

श्लोक 35 (skanda.2.183.35)

प्रतापतापितारातिवर्गव्याख्यातसद्यशाः प्रजाः पालयता सम्यक्तेननीतिमता सता

pratāpatāpitārātivargavyākhyātasadyaśāḥ prajāḥ pālayatā samyaktenanītimatā satā

जिसका सत्य यश शत्रुओं के समूह को प्रताप से संतप्त करके प्रकट हुआ था, तथा जो नीतिमान् होकर सम्यक् रूप से प्रजा का पालन करता था।

श्लोक 36 (skanda.2.183.36)

यशःपूरेण समलिप्ता दिशो दश सितत्विषा स चक्रे प्रौढविभवसाधनां विजयक्रमात्

yaśaḥpūreṇa samaliptā diśo daśa sitatviṣā sa cakre prauḍhavibhavasādhanāṁ vijayakramāt

उसके धवल यशःसमूह से दसों दिशाएँ लिप्त हो गईं; उसने विजय के क्रम से प्रौढ़ वैभव को साधा।

श्लोक 37 (skanda.2.183.37)

नानादेशान्समाक्रम्य चतुरंगबलान्वितः भूतानि वशमानीय वसु जग्राह दण्डतः

nānādeśānsamākramya caturaṁgabalānvitaḥ bhūtāni vaśamānīya vasu jagrāha daṇḍataḥ

चतुरंगिणी सेना से युक्त होकर उसने नाना देशों पर आक्रमण करके सभी प्राणियों को वश में करके दण्ड द्वारा धन ग्रहण किया।

श्लोक 38 (skanda.2.183.38)

उत्कृष्टान्नृपतीन्वीरो दंडयित्वा बलाधिकान् रत्नानि विविधान्याशु जग्राहातिबलस्तदा

utkṛṣṭānnṛpatīnvīro daṁḍayitvā balādhikān ratnāni vividhānyāśu jagrāhātibalastadā

अत्यन्त पराक्रमी उस वीर ने बलशाली उत्कृष्ट राजाओं को दण्डित करके तुरन्त उनके नाना रत्नों को ग्रहण किया।

श्लोक 39 (skanda.2.183.39)

स विजित्य दिशः सर्वा गृहीत्वा रत्नसंचयम् अयोध्यामागतो राजा राजधानीं च तां शुभाम्

sa vijitya diśaḥ sarvā gṛhītvā ratnasaṁcayam ayodhyāmāgato rājā rājadhānīṁ ca tāṁ śubhām

सभी दिशाओं को जीतकर तथा रत्नों का संचय करके वह राजा अयोध्या नामक अपनी शुभ राजधानी को लौट आया।

श्लोक 40 (skanda.2.183.40)

तत्रागत्य च काकुत्स्थो यज्ञायोत्सुकमानसः चकार निर्मलां बुद्धिं निजवंशोचितक्रियाम

tatrāgatya ca kākutstho yajñāyotsukamānasaḥ cakāra nirmalāṁ buddhiṁ nijavaṁśocitakriyāma

वहाँ आकर काकुत्स्थ ने यज्ञ के लिए उत्सुक मन से अपने वंश के अनुरूप कर्म करने का निर्मल निश्चय किया।

श्लोक 41 (skanda.2.183.41)

वसिष्ठं मुनिमाज्ञाय वामदेवं च कश्यपम्

vasiṣṭhaṁ munimājñāya vāmadevaṁ ca kaśyapam

मुनि वसिष्ठ को, वामदेव को तथा कश्यप को आज्ञा देकर,

श्लोक 42 (skanda.2.183.42)

अन्यानपि मुनिश्रेष्ठान्नानातीर्थसमाश्रितान् समानयद्विनीतेन द्विजवर्येण भूपतिः

anyānapi muniśreṣṭhānnānātīrthasamāśritān samānayadvinītena dvijavaryeṇa bhūpatiḥ

तथा नाना तीर्थों में आश्रित अन्य श्रेष्ठ मुनियों को भी, राजा ने एक विनीत श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वारा बुलवाया।

श्लोक 43 (skanda.2.183.43)

दृष्ट्वा स्थितान्स तान्सर्वान्प्रदीप्तानिव पावकान् तानागतान्विदित्वाथ रघुः परपुरंजयः निश्चक्राम यथान्यायं स्वयमेव महायशाः

dṛṣṭvā sthitānsa tānsarvānpradīptāniva pāvakān tānāgatānviditvātha raghuḥ parapuraṁjayaḥ niścakrāma yathānyāyaṁ svayameva mahāyaśāḥ

उन सभी को अग्नि के समान प्रज्वलित बैठे देखकर, उनके आगमन को जानकर, परपुरंजयी महायशस्वी रघु स्वयं ही विधिपूर्वक बाहर निकले।

श्लोक 44 (skanda.2.183.44)

ततो विनीतवत्सर्वान्काकुत्स्थो द्विजसत्तमान् उवाच धर्मयुक्तं च वचनं यज्ञसिद्धये

tato vinītavatsarvānkākutstho dvijasattamān uvāca dharmayuktaṁ ca vacanaṁ yajñasiddhaye

तब काकुत्स्थ ने उन सभी श्रेष्ठ द्विजों को विनम्रतापूर्वक यज्ञ की सिद्धि के लिए धर्मयुक्त वचन कहा।

श्लोक 45 (skanda.2.183.45)

रविरुवाच मुनयः सर्व एवैते यूयं शृणुत मद्वचः यज्ञं विधातुमिच्छामि तत्राज्ञां दातुमर्हथ

raviruvāca munayaḥ sarva evaite yūyaṁ śṛṇuta madvacaḥ yajñaṁ vidhātumicchāmi tatrājñāṁ dātumarhatha

रघु ने कहा — हे समस्त मुनियो, आप सब मेरा वचन सुनें; मैं यज्ञ करना चाहता हूँ, आप उसकी आज्ञा देने योग्य हैं।

श्लोक 46 (skanda.2.183.46)

सांप्रतं मामको यज्ञो युक्तः स्यान्मुनिसत्तमाः एतद्विचार्य्य तत्त्वेन ब्रूत यूयं मुनीश्वराः

sāṁprataṁ māmako yajño yuktaḥ syānmunisattamāḥ etadvicāryya tattvena brūta yūyaṁ munīśvarāḥ

हे मुनिसत्तमो, अब मेरा यज्ञ उचित है या नहीं, इसे यथार्थ रूप से विचार करके, हे मुनीश्वरो, आप मुझसे कहिए।

श्लोक 47 (skanda.2.183.47)

मुनय ऊचुः राजन्विश्वजिदाख्यातो यज्ञानां यज्ञ उत्तमः सांप्रतं कुरु तं यत्नान्मा विलंबं वृथा कृथाः

munaya ūcuḥ rājanviśvajidākhyāto yajñānāṁ yajña uttamaḥ sāṁprataṁ kuru taṁ yatnānmā vilaṁbaṁ vṛthā kṛthāḥ

मुनियों ने कहा — हे राजन्, यज्ञों में विश्वजित् नामक यज्ञ सर्वश्रेष्ठ कहा गया है; अब उसे यत्नपूर्वक करो, व्यर्थ विलम्ब मत करो।

श्लोक 48 (skanda.2.183.48)

अगस्त्य उवाच नृपश्चक्रे ततो यज्ञं विश्वदिग्जयसंज्ञितम् नानासंभारमधुरं कृतसर्वस्वदक्षिणम्

agastya uvāca nṛpaścakre tato yajñaṁ viśvadigjayasaṁjñitam nānāsaṁbhāramadhuraṁ kṛtasarvasvadakṣiṇam

अगस्त्य ने कहा — तब राजा ने 'विश्वदिग्जय' नामक यज्ञ किया, जो नाना मनोहर सामग्रियों से युक्त तथा सर्वस्व-दक्षिणा वाला था।

श्लोक 49 (skanda.2.183.49)

नानाविधेन दानेन मुनिसंतोषहर्षकृत् सर्वस्वमेव प्रददौ द्विजेभ्यो बहुमानतः

nānāvidhena dānena munisaṁtoṣaharṣakṛt sarvasvameva pradadau dvijebhyo bahumānataḥ

नाना प्रकार के दानों से मुनियों को संतोष तथा हर्ष प्रदान करते हुए, उसने बड़े सम्मान के साथ अपना सर्वस्व ही द्विजों को दे दिया।

श्लोक 50 (skanda.2.183.50)

तेषु विश्वेषु यातेषु पूजितेषु गृहान्स्वकान् बन्धुष्वपि च तुष्टेषु मुनिषु प्रणतेषु च

teṣu viśveṣu yāteṣu pūjiteṣu gṛhānsvakān bandhuṣvapi ca tuṣṭeṣu muniṣu praṇateṣu ca

जब वे सब विश्व (सभी अतिथि) पूजित होकर अपने-अपने घर चले गए, बन्धुजन भी सन्तुष्ट हो गए तथा मुनियों को प्रणाम किया जा चुका,

श्लोक 51 (skanda.2.183.51)

तेन यज्ञेन विधिवद्विहितेन नरेश्वरः शुशुभे शोभनाचारः स्वर्गे देवेंद्रवत्क्षणात्

tena yajñena vidhivadvihitena nareśvaraḥ śuśubhe śobhanācāraḥ svarge deveṁdravatkṣaṇāt

तब विधिवत् सम्पन्न हुए उस यज्ञ से वह श्रेष्ठाचारी राजा क्षणभर में स्वर्ग में इन्द्र के समान सुशोभित हुआ।

श्लोक 52 (skanda.2.183.52)

तत्रांतरे समभ्यायान्मुनिर्यमवतां वरः विश्वामित्रमुनेरंतेवासी कौत्स इति स्मृतः

tatrāṁtare samabhyāyānmuniryamavatāṁ varaḥ viśvāmitramuneraṁtevāsī kautsa iti smṛtaḥ

इसी बीच विश्वामित्र मुनि के शिष्य, संयमियों में श्रेष्ठ, कौत्स नामक एक मुनि वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 53 (skanda.2.183.53)

दक्षिणार्थं गुरोर्द्धीमान्पावितुं तं नरेश्वरम् चतुर्दशसुवर्णानां कोटीराहर सत्वरम्

dakṣiṇārthaṁ gurorddhīmānpāvituṁ taṁ nareśvaram caturdaśasuvarṇānāṁ koṭīrāhara satvaram

गुरु-दक्षिणा के लिए, अपने गुरु के आग्रह से क्रोधपूर्वक 'चौदह करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ शीघ्र लाओ' — यह कहकर याचित हुए,

श्लोक 54 (skanda.2.183.54)

मद्दक्षिणेति गुरुणा निर्बन्धाद्याचितो रुषा आगतः स मुनिः कौत्सस्ततो याचितुमादरात् रघुं भूपालतिलकं दत्तसर्वस्वदक्षिणम्

maddakṣiṇeti guruṇā nirbandhādyācito ruṣā āgataḥ sa muniḥ kautsastato yācitumādarāt raghuṁ bhūpālatilakaṁ dattasarvasvadakṣiṇam

वह मुनि कौत्स तब आदरपूर्वक याचना करने के लिए उस राजाओं में श्रेष्ठ रघु के पास आए, जिन्होंने अपना सर्वस्व दक्षिणा में दे दिया था।

श्लोक 55 (skanda.2.183.55)

तमागतमभिप्रेत्य रघुरादरतस्तदा उत्थाय पूजयामास विधिवत्स परंतपः सपर्य्यासीत्तस्य सर्वा मृत्पात्रविहितक्रिया

tamāgatamabhipretya raghurādaratastadā utthāya pūjayāmāsa vidhivatsa paraṁtapaḥ saparyyāsīttasya sarvā mṛtpātravihitakriyā

उन्हें आया हुआ जानकर रघु ने आदरपूर्वक उठकर विधिवत् उनकी पूजा की; परन्तु उनका सारा आतिथ्य-कर्म मिट्टी के पात्रों से ही किया जा सका।

श्लोक 56 (skanda.2.183.56)

पूजासंभारमालोक्य तादृशं तं मुनीश्वरः विस्मितोऽभून्निरानन्दो दक्षिणाऽऽशां परित्यजन् उवाच मधुरं वाक्यं वाक्यज्ञानविशारदः

pūjāsaṁbhāramālokya tādṛśaṁ taṁ munīśvaraḥ vismito’bhūnnirānando dakṣiṇā’’śāṁ parityajan uvāca madhuraṁ vākyaṁ vākyajñānaviśāradaḥ

पूजा की ऐसी अल्प सामग्री देखकर वह मुनीश्वर विस्मित तथा निराश हो गए, और दक्षिणा की आशा त्यागकर, वाणी के ज्ञान में निपुण उन्होंने मधुर वचन कहा।

श्लोक 57 (skanda.2.183.57)

कौत्स उवाच राजन्नभ्युदयस्तेऽस्तु गच्छाम्यन्यत्र सांप्रतम्

kautsa uvāca rājannabhyudayaste’stu gacchāmyanyatra sāṁpratam

कौत्स ने कहा — हे राजन्, तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं अन्यत्र जाता हूँ।

श्लोक 58 (skanda.2.183.58)

गुर्वर्थाहरणायैव दत्तसर्वस्वदक्षिणम् त्वां न याचे धनाभावादतोऽन्यत्र व्रजाम्यहम्

gurvarthāharaṇāyaiva dattasarvasvadakṣiṇam tvāṁ na yāce dhanābhāvādato’nyatra vrajāmyaham

मैं गुरु के धन के लिए ही आया था, जिसे तुमने पहले ही सर्वस्व दक्षिणा में दे दिया है; धन के अभाव के कारण मैं तुमसे नहीं माँगता, इसलिए अन्यत्र जाता हूँ।

श्लोक 59 (skanda.2.183.59)

अगस्त्य उवाच इत्युक्तस्तेन मुनिना रघुः परपुरंजयः क्षणं ध्यात्वाऽब्रवीदेनं विनयाद्विहितांजलिः

agastya uvāca ityuktastena muninā raghuḥ parapuraṁjayaḥ kṣaṇaṁ dhyātvā’bravīdenaṁ vinayādvihitāṁjaliḥ

अगस्त्य ने कहा — उस मुनि द्वारा ऐसा कहे जाने पर परपुरंजयी रघु ने क्षणभर विचार करके विनयपूर्वक हाथ जोड़कर उनसे कहा।

श्लोक 60 (skanda.2.183.60)

रघुरुवाच भगवंस्तिष्ठ मे हर्म्ये दिनमेकं मुनिव्रत यावद्यतिष्ये भगवन्भवदर्थार्थमुच्चकैः

raghuruvāca bhagavaṁstiṣṭha me harmye dinamekaṁ munivrata yāvadyatiṣye bhagavanbhavadarthārthamuccakaiḥ

रघु ने कहा — हे भगवन्, हे मुनिव्रत, एक दिन मेरे भवन में ठहरिए, जब तक मैं आपके कार्य के लिए अत्यन्त प्रयत्न करूँ।

श्लोक 61 (skanda.2.183.61)

अगस्त्य उवाच इत्युक्त्वा परमोदारवचो मुनिमुदारधीः प्रतस्थे च रघुस्तत्र कुबेरविजिगीषया

agastya uvāca ityuktvā paramodāravaco munimudāradhīḥ pratasthe ca raghustatra kuberavijigīṣayā

उदार बुद्धि वाले रघु उस मुनि से यह परम उदार वचन कहकर कुबेर को जीतने की इच्छा से वहाँ से प्रस्थान कर गए।

श्लोक 62 (skanda.2.183.62)

तमायांतं कुबेरोऽथ विज्ञाप्य वचनोदितैः प्रसन्नमनसं चक्रे वृष्टिं स्वर्णस्य चाक्षयाम्

tamāyāṁtaṁ kubero’tha vijñāpya vacanoditaiḥ prasannamanasaṁ cakre vṛṣṭiṁ svarṇasya cākṣayām

आते हुए उन्हें जानकर कुबेर ने वचनों द्वारा सूचित होकर प्रसन्न मन से अक्षय स्वर्णवृष्टि की।

श्लोक 63 (skanda.2.183.63)

स्वर्णवृष्टिरभूद्यत्र सा स्वर्णखनिरुत्तमा स मुनिं दर्शयामास खनिं तेन निवेदिताम्

svarṇavṛṣṭirabhūdyatra sā svarṇakhaniruttamā sa muniṁ darśayāmāsa khaniṁ tena niveditām

जहाँ स्वर्णवृष्टि हुई, वह उत्तम स्वर्णखान बन गई; उन्होंने वह खान, जो कुबेर द्वारा बताई गई थी, मुनि को दिखाई।

श्लोक 64 (skanda.2.183.64)

तस्मै समर्पयामास तां रघुः खनिमुत्तमाम् मुनीन्द्रोऽपि गृहीत्वाशु ततो गुर्वर्थमादरात्

tasmai samarpayāmāsa tāṁ raghuḥ khanimuttamām munīndro’pi gṛhītvāśu tato gurvarthamādarāt

रघु ने उस उत्तम खान को उन्हें समर्पित कर दिया; मुनीन्द्र ने भी तुरन्त गुरु के धन के लिए आदरपूर्वक उसे ग्रहण किया,

श्लोक 65 (skanda.2.183.65)

राज्ञे निवेदयामास सर्वमन्यद्गुणाधिकः वरानथ ददौ तुष्टः कौत्सो मतिमतां वरः

rājñe nivedayāmāsa sarvamanyadguṇādhikaḥ varānatha dadau tuṣṭaḥ kautso matimatāṁ varaḥ

तथा शेष सारा गुणाधिक धन राजा को लौटा दिया; तब प्रसन्न होकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ कौत्स ने वर दिए।

श्लोक 66 (skanda.2.183.66)

कौत्स उवाच राजँल्लभस्व सत्पुत्रं निजवंशगुणान्वितम् इयं स्वर्णखनिस्तूर्णं मनोभीष्टफलप्रदा

kautsa uvāca rāja~llabhasva satputraṁ nijavaṁśaguṇānvitam iyaṁ svarṇakhanistūrṇaṁ manobhīṣṭaphalapradā

कौत्स ने कहा — हे राजन्, अपने वंश के गुणों से युक्त सत्पुत्र प्राप्त करो; यह स्वर्णखान शीघ्र ही मनोवांछित फल देने वाली हो।

श्लोक 67 (skanda.2.183.67)

भूयादत्र परं तीर्थं सर्वपापहरं सदा अत्र स्नानेन दानेन नृणां लक्ष्मीः प्रजायते

bhūyādatra paraṁ tīrthaṁ sarvapāpaharaṁ sadā atra snānena dānena nṛṇāṁ lakṣmīḥ prajāyate

यहाँ सदा समस्त पापों का नाश करने वाला परम तीर्थ हो; यहाँ स्नान तथा दान से मनुष्यों को लक्ष्मी की प्राप्ति हो।

श्लोक 68 (skanda.2.183.68)

वैशाखे शुक्लद्वादश्यां यात्रा सांवत्सरी स्मृता नानाभीष्टफलप्राप्तिर्भूयान्मद्वचसा नृणाम्

vaiśākhe śukladvādaśyāṁ yātrā sāṁvatsarī smṛtā nānābhīṣṭaphalaprāptirbhūyānmadvacasā nṛṇām

वैशाख शुक्ल द्वादशी को इसकी वार्षिक यात्रा स्मृत है; मेरे वचन से मनुष्यों को नाना मनोवांछित फलों की प्राप्ति हो।

श्लोक 69 (skanda.2.183.69)

अगस्त्य उवाच इति दत्त्वा वरान्राज्ञे कौत्सः संतुष्टमानसः प्रतस्थे निजकार्यार्थे गुरोराश्रममुत्सुकः

agastya uvāca iti dattvā varānrājñe kautsaḥ saṁtuṣṭamānasaḥ pratasthe nijakāryārthe gurorāśramamutsukaḥ

अगस्त्य ने कहा — इस प्रकार राजा को वर देकर सन्तुष्ट मन वाले कौत्स अपने कार्य के लिए गुरु के आश्रम की ओर उत्सुक होकर प्रस्थान कर गए।

श्लोक 70 (skanda.2.183.70)

राजा स कृतकृत्योऽथ शेषं संगृह्य तद्धनम् द्विजेभ्यो विधिवद्दत्त्वा पालयामास वै प्रजाः

rājā sa kṛtakṛtyo’tha śeṣaṁ saṁgṛhya taddhanam dvijebhyo vidhivaddattvā pālayāmāsa vai prajāḥ

वह कृतकृत्य राजा शेष धन को संगृहीत करके विधिपूर्वक द्विजों को देकर प्रजा का पालन करने लगा।

श्लोक 71 (skanda.2.183.71)

एवं स्वर्णखनेर्जातं माहात्म्यं च मुनीश्वरात्

evaṁ svarṇakhanerjātaṁ māhātmyaṁ ca munīśvarāt

इस प्रकार मुनीश्वर से स्वर्णखान की यह महिमा उत्पन्न हुई।

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