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वैष्णव खण्ड · अध्याय 184

तिलोदकीप्रभाववर्णनम् — तिलोदकी के प्रभाव का वर्णन

अध्याय 183अध्याय-सूचीअध्याय 185

श्लोक 1 (skanda.2.184.1)

व्यास उवाच भगवन्ब्रूहि तत्त्वेन कथं निर्बंधतो मुनिः विश्वामित्रो निजं शिष्यं कौत्सं क्रोधेन तादृशम्

vyāsa uvāca bhagavanbrūhi tattvena kathaṁ nirbaṁdhato muniḥ viśvāmitro nijaṁ śiṣyaṁ kautsaṁ krodhena tādṛśam

व्यास ने कहा — हे भगवन्, यह यथार्थ रूप से कहिए कि मुनि विश्वामित्र ने क्रोधवश अपने शिष्य कौत्स से इस प्रकार आग्रहपूर्वक

श्लोक 2 (skanda.2.184.2)

दुष्प्राप्यमर्थं यत्नेन बहु प्रार्थितवांस्तदा एतत्सर्वं च कथय मयि यद्यस्ति ते कृपा

duṣprāpyamarthaṁ yatnena bahu prārthitavāṁstadā etatsarvaṁ ca kathaya mayi yadyasti te kṛpā

इतनी दुष्प्राप्य राशि की माँग यत्नपूर्वक क्यों की? यदि आपको मुझ पर कृपा हो तो यह सब कहिए।

श्लोक 3 (skanda.2.184.3)

अगस्त्य उवाच शृणु द्विज कथामेतां सावधानेंद्रियः स्वयम् विश्वामित्रो मुनिश्रेष्ठः स दिव्यज्ञानलोचनः

agastya uvāca śṛṇu dvija kathāmetāṁ sāvadhāneṁdriyaḥ svayam viśvāmitro muniśreṣṭhaḥ sa divyajñānalocanaḥ

अगस्त्य ने कहा — हे द्विज, अपनी इन्द्रियों को सावधान रखते हुए यह कथा सुनो; दिव्यज्ञान-नेत्र वाले मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने,

श्लोक 4 (skanda.2.184.4)

निजाश्रमे तपो दुर्गं चकार प्रयतो व्रती एकदा तमथो द्रष्टुं दुर्वासा मुनिरागतः

nijāśrame tapo durgaṁ cakāra prayato vratī ekadā tamatho draṣṭuṁ durvāsā munirāgataḥ

अपने आश्रम में संयमी तथा व्रतधारी होकर घोर तपस्या की; एक बार उन्हें देखने के लिए मुनि दुर्वासा वहाँ आए।

श्लोक 5 (skanda.2.184.5)

आगत्य च क्षुधाक्रांत उच्चैः प्रोवाच स द्विजः भोजनं दीयतां मह्यं क्षुधापीडितचेतसे पायसं शुचि चोष्णं च शीघ्रं क्षुधार्त्तिने द्विज

āgatya ca kṣudhākrāṁta uccaiḥ provāca sa dvijaḥ bhojanaṁ dīyatāṁ mahyaṁ kṣudhāpīḍitacetase pāyasaṁ śuci coṣṇaṁ ca śīghraṁ kṣudhārttine dvija

आकर भूख से व्याकुल उस द्विज ने ऊँचे स्वर में कहा — 'मुझे भोजन दो, मेरा मन भूख से पीड़ित है; हे द्विज, शीघ्र शुद्ध, गरम पायस दो, मैं भूख से आर्त हूँ।'

श्लोक 6 (skanda.2.184.6)

इति श्रुत्वा वचः क्षिप्रं विश्वामित्रः प्रयत्नतः स्थाल्यां पायसमादाय तं समर्प्य ततः स्वयम्

iti śrutvā vacaḥ kṣipraṁ viśvāmitraḥ prayatnataḥ sthālyāṁ pāyasamādāya taṁ samarpya tataḥ svayam

यह वचन सुनकर विश्वामित्र ने तुरन्त यत्नपूर्वक स्थाली में पायस लाकर उन्हें स्वयं समर्पित किया।

श्लोक 7 (skanda.2.184.7)

तदादायोत्थितं दृष्ट्वा दुर्वासास्तं विलोकयन् उवाच मधुरं वाक्यं मुनिं लक्षणतत्परः

tadādāyotthitaṁ dṛṣṭvā durvāsāstaṁ vilokayan uvāca madhuraṁ vākyaṁ muniṁ lakṣaṇatatparaḥ

उसे लेकर उठे हुए उन्हें देखकर, संकेतों में निपुण दुर्वासा ने उनकी ओर देखते हुए मधुर वचन कहा।

श्लोक 8 (skanda.2.184.8)

क्षणं सहस्व विप्रेन्द्र यावत्स्नात्वा व्रजाम्यहम् तिष्ठतिष्ठ क्षणं तिष्ठ आगच्छाम्येष साप्रतम्

kṣaṇaṁ sahasva viprendra yāvatsnātvā vrajāmyaham tiṣṭhatiṣṭha kṣaṇaṁ tiṣṭha āgacchāmyeṣa sāpratam

'हे विप्रेन्द्र, क्षणभर सहन करो, जब तक मैं स्नान करके आता हूँ; ठहरो, ठहरो, क्षणभर ठहरो, मैं अभी आता हूँ।'

श्लोक 9 (skanda.2.184.9)

इत्युक्त्वा स जगामैव दुर्वासाः स्वाश्रमं तदा

ityuktvā sa jagāmaiva durvāsāḥ svāśramaṁ tadā

ऐसा कहकर दुर्वासा तब अपने आश्रम को चले गए।

श्लोक 10 (skanda.2.184.10)

विश्वामित्रस्तपोनिष्ठस्तदा सानुरिवाऽचलः दिव्यं वर्षसहस्रं स तस्थौ स्थिरमतिस्तदा

viśvāmitrastaponiṣṭhastadā sānurivā’calaḥ divyaṁ varṣasahasraṁ sa tasthau sthiramatistadā

तपस्या में निष्ठावान् विश्वामित्र तब पर्वत की तरह अचल होकर, स्थिरचित्त होकर एक सहस्र दिव्य वर्षों तक वहीं खड़े रहे,

श्लोक 11 (skanda.2.184.11)

तस्य शुश्रूषणपरो मुनिः कौत्सो यतव्रतः बभूव परमोदारमतिर्विगतमत्सरः

tasya śuśrūṣaṇaparo muniḥ kautso yatavrataḥ babhūva paramodāramatirvigatamatsaraḥ

उनकी सेवा में तत्पर, व्रतधारी मुनि कौत्स भी अत्यन्त उदार बुद्धि तथा ईर्ष्यारहित होकर उस समय उनके साथ रहे।

श्लोक 12 (skanda.2.184.12)

पुनरागत्य स मुनिर्दुर्वासा गतकल्मषः भुक्त्वा च पायसं सद्यः स जगाम निजाश्रमम्

punarāgatya sa munirdurvāsā gatakalmaṣaḥ bhuktvā ca pāyasaṁ sadyaḥ sa jagāma nijāśramam

पापरहित हुए वह मुनि दुर्वासा पुनः आकर उसी क्षण पायस खाकर अपने आश्रम को चले गए।

श्लोक 13 (skanda.2.184.13)

तस्मिन्गते मुनिवरे विश्वामित्रस्तपोनिधिः कौत्सं विद्यावतां श्रेष्ठं विससर्ज गृहान्प्रति

tasmingate munivare viśvāmitrastaponidhiḥ kautsaṁ vidyāvatāṁ śreṣṭhaṁ visasarja gṛhānprati

उस श्रेष्ठ मुनि के जाने पर तपोनिधि विश्वामित्र ने विद्वानों में श्रेष्ठ कौत्स को घर जाने के लिए विदा किया।

श्लोक 14 (skanda.2.184.14)

स विसृष्टो गुरुं प्राह दक्षिणा प्रार्थ्यतामिति विश्वामित्रस्तु तं प्राह किं दास्यसि दक्षिणाम् दक्षिणा तव शुश्रूषा गृहं व्रज यतव्रत

sa visṛṣṭo guruṁ prāha dakṣiṇā prārthyatāmiti viśvāmitrastu taṁ prāha kiṁ dāsyasi dakṣiṇām dakṣiṇā tava śuśrūṣā gṛhaṁ vraja yatavrata

विदा किए गए उसने गुरु से कहा — 'दक्षिणा माँगी जाए।' विश्वामित्र ने उनसे कहा — 'तुम क्या दक्षिणा दोगे? तुम्हारी सेवा ही तुम्हारी दक्षिणा है; हे व्रतधारी, घर जाओ।'

श्लोक 15 (skanda.2.184.15)

पुनःपुनर्गुरुं प्राह शिष्यो निर्बन्धवान्यदा तदा गुरुर्गुरुक्रुद्धः शिष्यं प्राह च निष्ठुरम्

punaḥpunarguruṁ prāha śiṣyo nirbandhavānyadā tadā gururgurukruddhaḥ śiṣyaṁ prāha ca niṣṭhuram

जब शिष्य ने आग्रहपूर्वक बार-बार गुरु से यही कहा, तब क्रुद्ध हुए गुरु ने शिष्य से कठोर वचन कहा —

श्लोक 16 (skanda.2.184.16)

सुवर्णस्य सुवर्णस्य चतुर्दश समाहर कोटीर्मे दक्षिणा विप्र पश्चाद्गच्छ गृहं प्रति

suvarṇasya suvarṇasya caturdaśa samāhara koṭīrme dakṣiṇā vipra paścādgaccha gṛhaṁ prati

'शुद्ध सुवर्ण के चौदह करोड़ (मुद्राएँ) लाओ, हे विप्र, यही मेरी दक्षिणा है; फिर घर जाना।'

श्लोक 17 (skanda.2.184.17)

इत्युक्तो गुरुणा कौत्सो विचार्य समुपागमत् काकुत्स्थं दिग्विजेतारं ययाचे गुरुदक्षिणाम्

ityukto guruṇā kautso vicārya samupāgamat kākutsthaṁ digvijetāraṁ yayāce gurudakṣiṇām

गुरु द्वारा ऐसा कहे जाने पर कौत्स ने विचार करके दिग्विजयी काकुत्स्थ के पास जाकर गुरु-दक्षिणा माँगी।

श्लोक 18 (skanda.2.184.18)

इत्युक्तं ते मुनिवर त्वया पृष्टं हि यत्पुनः अतोऽन्यच्छृणु ते वच्मि तीर्थकारणमुत्तमम्

ityuktaṁ te munivara tvayā pṛṣṭaṁ hi yatpunaḥ ato’nyacchṛṇu te vacmi tīrthakāraṇamuttamam

हे मुनिवर, तुमने जो पुनः पूछा था, वह इस प्रकार कहा गया; अब इसके अतिरिक्त एक उत्तम तीर्थ की उत्पत्ति सुनो, जो मैं तुम्हें कहता हूँ।

श्लोक 19 (skanda.2.184.19)

तस्माद्दक्षिणदिग्भागे संभेदः सिद्धसेवितः तिलोदकीसरय्वोश्च संगत्या भुवि संश्रुतः

tasmāddakṣiṇadigbhāge saṁbhedaḥ siddhasevitaḥ tilodakīsarayvośca saṁgatyā bhuvi saṁśrutaḥ

उससे दक्षिण दिशा में सिद्धों द्वारा सेवित एक संगम है, जो तिलोदकी तथा सरयू के मिलन से पृथ्वी पर विख्यात है।

श्लोक 20 (skanda.2.184.20)

तत्र स्नात्वा महाभाग भवन्ति विरजा नराः दशानामश्वमेधानां कृतानां यत्फलं भवेत् तदाप्नोति स धर्मात्मा तत्र स्नात्वा यतव्रतः

tatra snātvā mahābhāga bhavanti virajā narāḥ daśānāmaśvamedhānāṁ kṛtānāṁ yatphalaṁ bhavet tadāpnoti sa dharmātmā tatra snātvā yatavrataḥ

हे महाभाग, वहाँ स्नान करके मनुष्य निष्पाप हो जाते हैं; दस अश्वमेध यज्ञों के करने से जो फल होता है, वह धर्मात्मा व्रतधारी वहाँ स्नान करके प्राप्त करता है।

श्लोक 21 (skanda.2.184.21)

स्वर्णादिकं च यो दद्याद्ब्राह्मणे वेदपारगे शुभां गतिमवाप्नोति अग्निवच्चैव दीप्यते

svarṇādikaṁ ca yo dadyādbrāhmaṇe vedapārage śubhāṁ gatimavāpnoti agnivaccaiva dīpyate

जो वहाँ वेदपारगामी ब्राह्मण को स्वर्णादि दान करता है, वह शुभ गति को प्राप्त होता है तथा अग्नि के समान तेजस्वी होता है।

श्लोक 22 (skanda.2.184.22)

तिलोदकीसरय्वोश्च संगमे लोकविश्रुते दत्त्वान्नं च विधानेन न स भूयोऽभिजायते

tilodakīsarayvośca saṁgame lokaviśrute dattvānnaṁ ca vidhānena na sa bhūyo’bhijāyate

तिलोदकी और सरयू के लोकविश्रुत संगम में विधिपूर्वक अन्नदान करके मनुष्य पुनः जन्म नहीं लेता।

श्लोक 23 (skanda.2.184.23)

उपवासं च यः कृत्वा विप्रान्संतर्पयेन्नरः सौत्रामणेश्च यज्ञस्य फलमाप्नोति मानवः

upavāsaṁ ca yaḥ kṛtvā viprānsaṁtarpayennaraḥ sautrāmaṇeśca yajñasya phalamāpnoti mānavaḥ

जो मनुष्य उपवास करके वहाँ ब्राह्मणों को तृप्त करता है, वह सौत्रामणि यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 24 (skanda.2.184.24)

एकाहारस्तु यस्तिष्ठेन्मासं तत्र यतव्रतः यावज्जीवकृतं पापं सहसा तस्य नश्यति

ekāhārastu yastiṣṭhenmāsaṁ tatra yatavrataḥ yāvajjīvakṛtaṁ pāpaṁ sahasā tasya naśyati

जो व्रतधारी वहाँ एक मास तक एकाहारी रहकर निवास करता है, उसका आजीवन किया हुआ पाप तत्काल नष्ट हो जाता है।

श्लोक 25 (skanda.2.184.25)

नभस्य कृष्णामावस्यां यात्रा सांवत्सरी भवेत् रामेण निर्मिता पूर्वं नदी सिंधुरिवापरा

nabhasya kṛṣṇāmāvasyāṁ yātrā sāṁvatsarī bhavet rāmeṇa nirmitā pūrvaṁ nadī siṁdhurivāparā

नभस्य (भाद्रपद) मास की कृष्ण अमावस्या को वार्षिक यात्रा होती है; यह नदी पूर्वकाल में राम द्वारा सिन्धु के समान निर्मित की गई थी,

श्लोक 26 (skanda.2.184.26)

सिंधुजानां तुरंगाणां जलपानाय सुव्रत तिलवच्छ्याममुदकं यतस्तस्यां सदा बभौ

siṁdhujānāṁ turaṁgāṇāṁ jalapānāya suvrata tilavacchyāmamudakaṁ yatastasyāṁ sadā babhau

हे सुव्रत, सिन्धु से उत्पन्न अश्वों के जलपान के लिए, जिससे उसमें तिल के समान श्याम जल सदा शोभित होता था,

श्लोक 27 (skanda.2.184.27)

तिलोदकीति विख्याता पुण्यतोया सदा नदी संगमादन्यतो यस्यां तिलोदक्यां शुचिव्रतः स्नातो विमुच्यते पापैः सप्तजन्मार्जितैरपि

tilodakīti vikhyātā puṇyatoyā sadā nadī saṁgamādanyato yasyāṁ tilodakyāṁ śucivrataḥ snāto vimucyate pāpaiḥ saptajanmārjitairapi

इसलिए वह सदा पवित्र जल वाली नदी 'तिलोदकी' नाम से विख्यात हुई; संगम के अतिरिक्त भी जो शुद्धव्रती इस तिलोदकी में स्नान करता है, वह सात जन्मों में अर्जित पापों से भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 28 (skanda.2.184.28)

तस्मात्तिलोदकीस्नानं सर्वपापहरं मुने कर्त्तव्यं सुप्रयत्नेन प्राणिभिर्धर्मकांक्षिभिः स्नानं दानं व्रतं होमं सर्वमक्षयतां व्रजेत्

tasmāttilodakīsnānaṁ sarvapāpaharaṁ mune karttavyaṁ suprayatnena prāṇibhirdharmakāṁkṣibhiḥ snānaṁ dānaṁ vrataṁ homaṁ sarvamakṣayatāṁ vrajet

इसलिए, हे मुने, समस्त पापों का हरण करने वाला तिलोदकी-स्नान धर्म चाहने वाले प्राणियों को अत्यन्त यत्नपूर्वक करना चाहिए; स्नान, दान, व्रत तथा होम — सब अक्षय हो जाते हैं।

श्लोक 29 (skanda.2.184.29)

इति विविधविधानैस्तीर्थयात्रांक्रमेण प्रथितगुणविकासः प्राप्तपुण्योविधाय हरिमुपहृतभावः पूजयन्सर्वतीर्थं व्रजति परमधाम न्यस्तपापः कथञ्चित्

iti vividhavidhānaistīrthayātrāṁkrameṇa prathitaguṇavikāsaḥ prāptapuṇyovidhāya harimupahṛtabhāvaḥ pūjayansarvatīrthaṁ vrajati paramadhāma nyastapāpaḥ kathañcit

इस प्रकार नाना विधानों से क्रमशः तीर्थयात्रा करके, प्रकट हुए गुणों के विकास वाला, पुण्य प्राप्त करके, हरि के प्रति समर्पित भाव से पूजा करता हुआ मनुष्य, किसी प्रकार पाप को त्यागकर, समस्त तीर्थों के फल सहित परम धाम को प्राप्त होता है।

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