वैष्णव खण्ड · अध्याय 185
स्वर्गद्वारगोप्रतारतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् — स्वर्गद्वार और गोप्रतार तीर्थ की महिमा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.185.1)
अगस्त्य उवाच तस्मात्संगमतो विप्र पश्चिमे दिक्तटे स्थितम् सीताकुण्डमितिख्यातं सर्वकामफलप्रदम्
agastya uvāca tasmātsaṁgamato vipra paścime diktaṭe sthitam sītākuṇḍamitikhyātaṁ sarvakāmaphalapradam
अगस्त्य ने कहा — हे विप्र, उस संगम से पश्चिम दिशा के तट पर स्थित, सभी कामनाओं का फल देने वाला सीताकुण्ड नाम से विख्यात है,
श्लोक 2 (skanda.2.185.2)
यत्र स्नात्वा नरो विप्र सर्वपापैः प्रमुच्यते सीतया किल तत्कुण्डं स्वयमेव विनिर्मितम् रामेण वरदानाच्च महाफलनिधीकृतम्
yatra snātvā naro vipra sarvapāpaiḥ pramucyate sītayā kila tatkuṇḍaṁ svayameva vinirmitam rāmeṇa varadānācca mahāphalanidhīkṛtam
जहाँ स्नान करके, हे विप्र, मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है; वह कुण्ड सीता द्वारा स्वयं ही निर्मित किया गया था, तथा राम के वरदान से महाफल का निधान बना।
श्लोक 3 (skanda.2.185.3)
श्रीराम उवाच शृणु सीते प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं भुवि यादृशम् त्वत्कुण्डस्यास्य सुभगे त्वत्प्रीत्या कथयाम्यहम्
śrīrāma uvāca śṛṇu sīte pravakṣyāmi māhātmyaṁ bhuvi yādṛśam tvatkuṇḍasyāsya subhage tvatprītyā kathayāmyaham
श्रीराम ने कहा — हे सीते, सुनो, हे सुभगे, मैं तुम्हारी प्रीति के लिए तुम्हारे इस कुण्ड की पृथ्वी पर जैसी महिमा होगी, वह कहता हूँ।
श्लोक 4 (skanda.2.185.4)
अत्र स्नानं च दानं च जपो होमस्तपोऽथवा सर्वमक्षयतां याति विधानेन शुचिस्मिते
atra snānaṁ ca dānaṁ ca japo homastapo’thavā sarvamakṣayatāṁ yāti vidhānena śucismite
हे शुचिस्मिते, यहाँ विधिपूर्वक किया गया स्नान, दान, जप, होम अथवा तप — सब अक्षय हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.2.185.5)
मार्गकृष्णचतुर्दश्यां तत्र स्नानं विशेषतः सर्वपापहरं देवि सर्वदा स्नायिनां नृणाम्
mārgakṛṣṇacaturdaśyāṁ tatra snānaṁ viśeṣataḥ sarvapāpaharaṁ devi sarvadā snāyināṁ nṛṇām
मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी को वहाँ विशेष रूप से स्नान करना, हे देवि, स्नान करने वाले मनुष्यों के सभी पापों का सदा हरण करने वाला है।
श्लोक 6 (skanda.2.185.6)
इति रामो वरं प्रादात्सीतायै च प्रजाप्रियः तदाप्रभृति सर्वत्र तत्तीर्थं भुवि वर्त्तते
iti rāmo varaṁ prādātsītāyai ca prajāpriyaḥ tadāprabhṛti sarvatra tattīrthaṁ bhuvi varttate
इस प्रकार प्रजाप्रिय राम ने सीता को वर दिया; तभी से वह तीर्थ सर्वत्र पृथ्वी पर विद्यमान है।
श्लोक 7 (skanda.2.185.7)
सीताकुण्डमिति ख्यातं जनानां परमाद्भुतम् तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा नूनं राममवाप्नुयात्
sītākuṇḍamiti khyātaṁ janānāṁ paramādbhutam tasmiṁstīrthe naraḥ snātvā nūnaṁ rāmamavāpnuyāt
वह लोगों के लिए परम अद्भुत सीताकुण्ड नाम से विख्यात है; उस तीर्थ में स्नान करके मनुष्य निश्चय ही राम को प्राप्त करता है।
श्लोक 8 (skanda.2.185.8)
तत्र स्नानेन दानेन तपसा च विशेषतः गन्धैर्माल्यैर्धूपदीपैर्न्नानाविभवविस्तरैः रामं संपूज्य सीतां च मुक्तः स्यान्नात्र संशयः
tatra snānena dānena tapasā ca viśeṣataḥ gandhairmālyairdhūpadīpairnnānāvibhavavistaraiḥ rāmaṁ saṁpūjya sītāṁ ca muktaḥ syānnātra saṁśayaḥ
वहाँ स्नान, दान तथा विशेष रूप से तप के द्वारा, तथा गन्ध, माला, धूप, दीप तथा नाना वैभव-विस्तार से राम-सीता का पूजन करके मनुष्य मुक्त हो जाता है — इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 9 (skanda.2.185.9)
मार्गे मासि च स्नातव्यं गर्भवासो न जायते अन्यदापि नरः स्नात्वा विष्णुलोकं स गच्छति
mārge māsi ca snātavyaṁ garbhavāso na jāyate anyadāpi naraḥ snātvā viṣṇulokaṁ sa gacchati
मार्गशीर्ष मास में स्नान करना चाहिए, जिससे गर्भवास नहीं होता; अन्य समय में भी स्नान करके मनुष्य विष्णुलोक को जाता है।
श्लोक 10 (skanda.2.185.10)
विभोर्विष्णुहरेर्विप्र रम्ये पश्चिमदिक्तटे देवश्चक्रहरिर्नाम सर्वाभीष्टफलप्रदः
vibhorviṣṇuharervipra ramye paścimadiktaṭe devaścakraharirnāma sarvābhīṣṭaphalapradaḥ
हे विप्र, विभु विष्णुहरि के रमणीय पश्चिम तट पर सभी अभीष्ट फल देने वाला चक्रहरि नामक देव स्थित है।
श्लोक 11 (skanda.2.185.11)
तस्य चक्रहरेर्विप्र महिमा न हि मानवैः शक्यो वर्णयितुं धीरैरपि बुद्धिमतां वरैः
tasya cakraharervipra mahimā na hi mānavaiḥ śakyo varṇayituṁ dhīrairapi buddhimatāṁ varaiḥ
हे विप्र, उस चक्रहरि की महिमा धीर तथा बुद्धिमानों में श्रेष्ठ मनुष्यों द्वारा भी वर्णित नहीं की जा सकती।
श्लोक 12 (skanda.2.185.12)
ततः पश्चिमदिग्भागे नाम्ना पुण्यं हरिस्मृति विष्णोरायतनं ख्यातं परमार्थफलप्रदम् यस्य दर्शनमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते
tataḥ paścimadigbhāge nāmnā puṇyaṁ harismṛti viṣṇorāyatanaṁ khyātaṁ paramārthaphalapradam yasya darśanamātreṇa sarvapāpaiḥ pramucyate
फिर पश्चिम दिशा में हरिस्मृति नामक पवित्र स्थान है, जो विष्णु का प्रसिद्ध मन्दिर है, परमार्थ फल देने वाला, जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 13 (skanda.2.185.13)
तयोर्दर्शनतो यांति तेषां पापानि देहिनाम् तानि पापानि यावंति कुर्वते भुवि ये नराः
tayordarśanato yāṁti teṣāṁ pāpāni dehinām tāni pāpāni yāvaṁti kurvate bhuvi ye narāḥ
इन दोनों के दर्शन से प्राणियों के वे पाप दूर हो जाते हैं, जो पृथ्वी पर मनुष्य जितने भी करते हैं।
श्लोक 14 (skanda.2.185.14)
पुरा देवासुरे जाते संग्रामे भृशदारुणे दैत्यैर्वरमदोत्सिक्तैर्देवा युधि पराजिताः
purā devāsure jāte saṁgrāme bhṛśadāruṇe daityairvaramadotsiktairdevā yudhi parājitāḥ
पूर्वकाल में जब देवासुरों का अत्यन्त भीषण संग्राम हुआ, तब वरदान के मद से उन्मत्त दैत्यों द्वारा देवता युद्ध में पराजित हो गए।
श्लोक 15 (skanda.2.185.15)
तेषां पलायमानानां देवानामग्रणीर्हरः संस्तभ्य चैव तान्सर्वान्पुरस्कृत्यांबुजासनम्
teṣāṁ palāyamānānāṁ devānāmagraṇīrharaḥ saṁstabhya caiva tānsarvānpuraskṛtyāṁbujāsanam
भाग रहे उन देवताओं में अग्रणी हर ने उन सबको संभालकर, कमलासन ब्रह्मा को आगे करके,
श्लोक 16 (skanda.2.185.16)
क्षीरोदशायिनं विष्णुं शेषपर्य्यंकशायिनम् लक्ष्म्योपविष्टं पार्श्वे च चरणांबुजहस्तया
kṣīrodaśāyinaṁ viṣṇuṁ śeṣaparyyaṁkaśāyinam lakṣmyopaviṣṭaṁ pārśve ca caraṇāṁbujahastayā
क्षीरसागर में शयन करने वाले, शेष-शय्या पर सोए हुए, तथा जिनके चरणकमल को हाथ में लिए लक्ष्मी पार्श्व में विराजमान हैं, ऐसे विष्णु के पास गए,
श्लोक 17 (skanda.2.185.17)
नारदाद्यैर्मुनिवरैरुद्गीतगुणगौरवम् गरुडेन पुरःस्थेनानिशमंजलिना स्तुतम्
nāradādyairmunivarairudgītaguṇagauravam garuḍena puraḥsthenāniśamañjalinā stutam
जिनकी महिमा नारद आदि श्रेष्ठ मुनियों द्वारा गाई जा रही थी, तथा जो सामने खड़े गरुड़ द्वारा निरन्तर अंजलिबद्ध होकर स्तुत हो रहे थे,
श्लोक 18 (skanda.2.185.18)
क्षीराब्धिजलकल्लोलमदबिन्द्वंकिताम्बरम् तारकोत्करविस्फारतारहारविराजितम्
kṣīrābdhijalakallolamadabindvaṁkitāmbaram tārakotkaravisphāratārahāravirājitam
क्षीरसागर की लहरों की झाग की बूंदों से चिह्नित वस्त्र वाले, तारों के समूह के समान चमकते हार से सुशोभित,
श्लोक 19 (skanda.2.185.19)
पीतांबरमतिस्मेरविकाशद्भावभावितम् बिभ्रतं कुण्डलं स्थूलं कर्णाभ्यां मौक्तिकोज्ज्वलम्
pītāṁbaramatismeravikāśadbhāvabhāvitam bibhrataṁ kuṇḍalaṁ sthūlaṁ karṇābhyāṁ mauktikojjvalam
पीताम्बरधारी, मन्द मुस्कान से विकसित भाव से युक्त, दोनों कानों में स्थूल, मोतियों से उज्ज्वल कुण्डल धारण करने वाले,
श्लोक 20 (skanda.2.185.20)
रत्नवल्लीमिव स्वच्छां श्वेतद्वीपनिवासिनीम् किरीटं पद्मरागाणां वलयं दधतं परम्
ratnavallīmiva svacchāṁ śvetadvīpanivāsinīm kirīṭaṁ padmarāgāṇāṁ valayaṁ dadhataṁ param
स्वच्छ रत्नलता के समान, श्वेतद्वीपवासिनी लक्ष्मी को मानो कंकण के रूप में धारण करने वाले, पद्मराग-मणियों के परम मुकुट को धारण करने वाले,
श्लोक 21 (skanda.2.185.21)
मित्रस्य राहुवित्रासनिवर्त्तनमिवापरम् सकौस्तुभप्रभाचक्रं बिभ्राणं प्रवलारुणम्
mitrasya rāhuvitrāsanivarttanamivāparam sakaustubhaprabhācakraṁ bibhrāṇaṁ pravalāruṇam
सूर्य के राहु-भय के निवारण के समान, कौस्तुभ की प्रभा वाले, अत्यन्त अरुण चक्र को धारण करने वाले,
श्लोक 22 (skanda.2.185.22)
परां चतुर्मुखोत्पत्तिकल्पसंकल्पनामिव शरणं स जगामाशु विनीतात्मा स्तुवन्निति
parāṁ caturmukhotpattikalpasaṁkalpanāmiva śaraṇaṁ sa jagāmāśu vinītātmā stuvanniti
मानो चतुर्मुख ब्रह्मा की उत्पत्ति के आदि संकल्प के समान — विनम्र होकर इस प्रकार स्तुति करते हुए वे शीघ्र ही उनकी शरण में गए।
श्लोक 23 (skanda.2.185.23)
तस्मिन्नवसरे शंभुः सर्वदेवगणैः सह तुष्टाव प्रयतो भूत्वा विष्णुं जिष्णुं सुरद्विषाम्
tasminnavasare śaṁbhuḥ sarvadevagaṇaiḥ saha tuṣṭāva prayato bhūtvā viṣṇuṁ jiṣṇuṁ suradviṣām
उसी अवसर पर शंभु ने समस्त देवगणों सहित संयमी होकर देवताओं के शत्रुओं के विजेता विष्णु की स्तुति की।
श्लोक 24 (skanda.2.185.24)
ईश्वर उवाच संसारार्णवसंतारसुपर्णसुखदायिने मोह तीव्रतमो हारि चन्द्राय हरये नमः
īśvara uvāca saṁsārārṇavasaṁtārasuparṇasukhadāyine moha tīvratamo hāri candrāya haraye namaḥ
ईश्वर ने कहा — संसार-सागर से पार उतारने वाले गरुड़ के समान सुखदाता, मोह के अत्यन्त घोर अन्धकार को हरने वाले चन्द्रमा-समान हरि को नमस्कार।
श्लोक 25 (skanda.2.185.25)
स्फुरत्संविन्मणिशिखां चित्तसंगतिचंद्रिकाम् प्रपद्ये भगवद्भक्तिमानसोद्यानवाहिनीम्
sphuratsaṁvinmaṇiśikhāṁ cittasaṁgaticaṁdrikām prapadye bhagavadbhaktimānasodyānavāhinīm
स्फुरित चेतना-मणि की शिखा, चित्त की संगति रूपी चन्द्रिका, भगवद्भक्ति की मानस-उद्यान में बहने वाली धारा की मैं शरण लेता हूँ,
श्लोक 26 (skanda.2.185.26)
हेलोल्लसत्समुत्साहशक्तिं व्याप्तजगत्त्रयाम् या पूर्वकोटिर्भावानां सत्त्वानां वैष्णवीति वा
helollasatsamutsāhaśaktiṁ vyāptajagattrayām yā pūrvakoṭirbhāvānāṁ sattvānāṁ vaiṣṇavīti vā
जो क्रीड़ापूर्वक उल्लसित उत्साह-शक्ति तीनों लोकों में व्याप्त है, जो सत्त्वों के समस्त भावों की पूर्व कोटि है, जिसे वैष्णवी शक्ति कहते हैं,
श्लोक 27 (skanda.2.185.27)
पवनांदोलितांभोजदलपर्वांतवर्त्तिनाम् पततामिव जन्तूनां स्थैर्यमेका हरिस्मृतिः
pavanāṁdolitāṁbhojadalaparvāṁtavarttinām patatāmiva jantūnāṁ sthairyamekā harismṛtiḥ
वायु से हिलते कमलदल के छोर पर स्थित, गिरते हुए प्राणियों के समान जीवों की एकमात्र स्थिरता हरि-स्मृति ही है।
श्लोक 28 (skanda.2.185.28)
नमः सूर्य्यात्मने तुभ्यं संवित्किरणमालिने हृत्कुशेशयकोषश्रीसमुन्मेषविधायिने
namaḥ sūryyātmane tubhyaṁ saṁvitkiraṇamāline hṛtkuśeśayakoṣaśrīsamunmeṣavidhāyine
सूर्यस्वरूप, चेतना की किरणों की माला धारण करने वाले, हृदय-कमल-कोष की श्री को विकसित करने वाले आपको नमस्कार,
श्लोक 29 (skanda.2.185.29)
नमस्तस्मै यमवते योगिनां गतये सदा परमेशाय वै पारे महसां तमसां तथा
namastasmai yamavate yogināṁ gataye sadā parameśāya vai pāre mahasāṁ tamasāṁ tathā
संयमी, योगियों की सदा गति, परमेश तथा तेज और अन्धकार दोनों से परे उनको नमस्कार,
श्लोक 30 (skanda.2.185.30)
यज्ञाय भुक्तहविष ऋग्यजुःसामरूपिणे नमः सरस्वतीगीतदिव्यसद्गणशालिने
yajñāya bhuktahaviṣa ṛgyajuḥsāmarūpiṇe namaḥ sarasvatīgītadivyasadgaṇaśāline
जिनका हविष्य ग्रहण किया जाता है ऐसे यज्ञस्वरूप, ऋक्-यजुः-साम रूप को, सरस्वती द्वारा गाए गए दिव्य सद्गणों से युक्त उनको नमस्कार,
श्लोक 31 (skanda.2.185.31)
शांताय धर्मनिधये क्षेत्रज्ञायामृतात्मने शिष्ययोगप्रतिष्ठाय नमो जीवैकहेतवे घोराय मायाविधये सहस्रशिरसे नमः
śāṁtāya dharmanidhaye kṣetrajñāyāmṛtātmane śiṣyayogapratiṣṭhāya namo jīvaikahetave ghorāya māyāvidhaye sahasraśirase namaḥ
शान्त, धर्म के निधान, क्षेत्रज्ञ, अमृतस्वरूप, शिष्य-योग की प्रतिष्ठा वाले, जीव के एकमात्र हेतु को नमस्कार; घोर, माया की विधि करने वाले, सहस्र मस्तक वाले को नमस्कार,
श्लोक 32 (skanda.2.185.32)
योगनिद्रात्मने नाभिपद्मोद्भूतजगत्सृजे नमः सलिलरूपाय कारणाय जगत्स्थितेः
yoganidrātmane nābhipadmodbhūtajagatsṛje namaḥ salilarūpāya kāraṇāya jagatsthiteḥ
योगनिद्रा-स्वरूप, नाभि-कमल से उत्पन्न जगत् के सृष्टिकर्ता को; जल-स्वरूप, जगत् की स्थिति के कारण को नमस्कार,
श्लोक 33 (skanda.2.185.33)
कार्यमेयाय बलिने जीवाय परमात्मने गोप्त्रे प्राणाय भूतानां नमो विश्वाय वेधसे
kāryameyāya baline jīvāya paramātmane goptre prāṇāya bhūtānāṁ namo viśvāya vedhase
कार्यों से जाने जाने योग्य, बलवान्, जीव, परमात्मा को; प्राणियों के रक्षक, प्राण-स्वरूप, विश्व के विधाता को नमस्कार,
श्लोक 34 (skanda.2.185.34)
दृप्ताय सिंहवपुषे दैत्यसंहारकारिणे वीर्यायानंतमनसे जगद्भावभृते नमः
dṛptāya siṁhavapuṣe daityasaṁhārakāriṇe vīryāyānaṁtamanase jagadbhāvabhṛte namaḥ
दर्पयुक्त सिंहरूप, दैत्यों के संहारकर्ता को; अनन्त मन वाले पराक्रम को, जगत् के भाव को धारण करने वाले को नमस्कार,
श्लोक 35 (skanda.2.185.35)
संसारकारणाज्ञानमहासंतमसच्छिदे अचिन्त्यधाम्ने गुह्याय रुद्रायात्युद्विजे नमः
saṁsārakāraṇājñānamahāsaṁtamasacchide acintyadhāmne guhyāya rudrāyātyudvije namaḥ
संसार के कारणभूत अज्ञान के महान् अन्धकार को काटने वाले, अचिन्त्य धाम, गुह्य, अत्यन्त उद्वेगकारी रुद्र को नमस्कार,
श्लोक 36 (skanda.2.185.36)
शान्ताय शान्तकल्लोलकैवल्यपददायिने सर्वभावातिरिक्ताय नमः सर्वमयात्मने
śāntāya śāntakallolakaivalyapadadāyine sarvabhāvātiriktāya namaḥ sarvamayātmane
शान्त, शान्त तरंगों वाली कैवल्य-पद के दाता को; समस्त भावों से परे, सर्वमय आत्मा को नमस्कार,
श्लोक 37 (skanda.2.185.37)
इन्दीवरदलश्यामं स्फूर्जत्किंजल्कविभ्रमम् बिभ्राणं कौस्तुभं विष्णुं नौमि नेत्ररसायनम्
indīvaradalaśyāmaṁ sphūrjatkiṁjalkavibhramam bibhrāṇaṁ kaustubhaṁ viṣṇuṁ naumi netrarasāyanam
नीलकमल-दल के समान श्याम, चमकते केसर की शोभा वाले, कौस्तुभ धारण करने वाले, नेत्रों के लिए रसायन-स्वरूप विष्णु की मैं स्तुति करता हूँ।
श्लोक 38 (skanda.2.185.38)
अगस्त्य उवाच इति स्तुतः प्रसन्नात्मा वरदो गरुडध्वजः ववर्ष दृष्टिसुधया सर्वान्देवान्कृपान्वितः उवाच मधुरं वाक्यं प्रश्रयावनतान्सुरान्
agastya uvāca iti stutaḥ prasannātmā varado garuḍadhvajaḥ vavarṣa dṛṣṭisudhayā sarvāndevānkṛpānvitaḥ uvāca madhuraṁ vākyaṁ praśrayāvanatānsurān
अगस्त्य ने कहा — इस प्रकार स्तुत होकर प्रसन्नचित्त, वरदाता, गरुड़ध्वज ने कृपापूर्वक अपनी दृष्टि की सुधा से समस्त देवताओं को सींचा तथा विनयपूर्वक झुके हुए देवताओं से मधुर वचन कहा।
श्लोक 39 (skanda.2.185.39)
श्रीभगवानुवाच जानामि विबुधाः सर्वमभिप्रायं समाधितः दैतेयैर्विक्रमाक्रान्तं पदं समरदर्पितैः
śrībhagavānuvāca jānāmi vibudhāḥ sarvamabhiprāyaṁ samādhitaḥ daiteyairvikramākrāntaṁ padaṁ samaradarpitaiḥ
श्रीभगवान् ने कहा — हे देवगण, मैं समाधि से तुम्हारा सम्पूर्ण अभिप्राय जानता हूँ — कि युद्ध के दर्प से भरे दैत्यों द्वारा तुम्हारा पद पराक्रम से आक्रान्त कर लिया गया है।
श्लोक 40 (skanda.2.185.40)
सबलैर्बलहीनानां प्रतापो विजितः परैः सांप्रतं तु विधास्यामि तपो युष्मद्बलाय वै
sabalairbalahīnānāṁ pratāpo vijitaḥ paraiḥ sāṁprataṁ tu vidhāsyāmi tapo yuṣmadbalāya vai
शक्तिहीन तुम्हारा प्रताप उन बलशाली शत्रुओं द्वारा विजित हो गया है; अतः अब मैं तुम्हारे बल के लिए तप करूँगा।
श्लोक 41 (skanda.2.185.41)
अयोध्यानगरे गत्वा करिष्ये तप उत्तमम् गुप्तो भूत्वा भवत्तेजोविवृद्ध्यै दैत्यशान्तये
ayodhyānagare gatvā kariṣye tapa uttamam gupto bhūtvā bhavattejovivṛddhyai daityaśāntaye
अयोध्या नगर में जाकर, गुप्त रहकर, तुम्हारे तेज की वृद्धि तथा दैत्यों की शान्ति के लिए मैं उत्तम तप करूँगा।
श्लोक 42 (skanda.2.185.42)
भवन्तोऽपि तपस्तीव्रं कुर्वंत्वमलमानसाः अयोध्यां प्राप्यतां देवा दैत्यनाशाय सत्वरम्
bhavanto’pi tapastīvraṁ kurvaṁtvamalamānasāḥ ayodhyāṁ prāpyatāṁ devā daityanāśāya satvaram
हे देवो, तुम भी निर्मल मन से तीव्र तप करो; दैत्यों के नाश के लिए शीघ्र अयोध्या पहुँचो।
श्लोक 43 (skanda.2.185.43)
अगस्त्य उवाच इत्युक्त्वांतर्दधे देवान्देवो गरुडवाहनः अयोध्यामागतः क्षिप्रं चकार तप उत्तमम्
agastya uvāca ityuktvāṁtardadhe devāndevo garuḍavāhanaḥ ayodhyāmāgataḥ kṣipraṁ cakāra tapa uttamam
अगस्त्य ने कहा — ऐसा कहकर गरुड़वाहन देव देवताओं से अन्तर्धान हो गए; अयोध्या आकर उन्होंने शीघ्र उत्तम तप किया।
श्लोक 44 (skanda.2.185.44)
गुप्तो भूत्वा यदा विद्वन्सुरतेजोभिवृद्धये तेन गुप्तहरिर्नाम देवो विख्यातिमागतः
gupto bhūtvā yadā vidvansuratejobhivṛddhaye tena guptaharirnāma devo vikhyātimāgataḥ
हे विद्वन्, जब वे देवताओं के तेज की वृद्धि के लिए गुप्त हो गए, तब उससे वह देव 'गुप्तहरि' नाम से विख्यात हुए।
श्लोक 45 (skanda.2.185.45)
आगतस्य हरेः पूर्वं यत्र हस्ततलाच्च्युतम् सुदर्शनाख्यं तच्चक्रं तेन चक्रहरिः स्मृतः
āgatasya hareḥ pūrvaṁ yatra hastatalāccyutam sudarśanākhyaṁ taccakraṁ tena cakrahariḥ smṛtaḥ
जब हरि आए, तब पहले जहाँ उनके हाथ से 'सुदर्शन' नामक वह चक्र गिरा, उससे वे 'चक्रहरि' कहलाए।
श्लोक 46 (skanda.2.185.46)
तयोर्दर्शनमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते हरस्तेन प्रभावेण देवाः प्रबलतेजसः
tayordarśanamātreṇa sarvapāpaiḥ pramucyate harastena prabhāveṇa devāḥ prabalatejasaḥ
इन दोनों के दर्शन मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है; उस प्रभाव से हर तथा प्रबल तेजस्वी देवगण,
श्लोक 47 (skanda.2.185.47)
जित्वा दैत्यान्रणैः सर्वान्संप्राप्य स्वपदान्यथ रेजिरे विपुलानंदैरसुरानार्दयंस्ततः
jitvā daityānraṇaiḥ sarvānsaṁprāpya svapadānyatha rejire vipulānaṁdairasurānārdayaṁstataḥ
युद्धों में सभी दैत्यों को जीतकर, अपने-अपने पद पुनः प्राप्त करके, विपुल आनन्द से शोभित होकर असुरों को पीड़ित करने लगे।
श्लोक 48 (skanda.2.185.48)
ततः सर्वे समेत्याशु बृहस्पतिपुरस्सराः देवाः सर्वेऽनमन्मौलिमालार्च्चित पदाम्बुजम् हरिं द्रष्टुमथागच्छन्नयोध्यायां समुत्सुकाः
tataḥ sarve sametyāśu bṛhaspatipurassarāḥ devāḥ sarve’namanmaulimālārccita padāmbujam hariṁ draṣṭumathāgacchannayodhyāyāṁ samutsukāḥ
तब बृहस्पति को आगे करके सभी देवता शीघ्र एकत्र होकर, जिनके चरणकमल को अपने मुकुट-मालाओं से पूजते हुए प्रणाम करके, हरि को देखने के लिए उत्सुक होकर अयोध्या आए।
श्लोक 49 (skanda.2.185.49)
आगत्य च ततः श्रुत्वा नानाविधगुणादरम् भावैः पुण्यैः समभ्यर्च्य नत्वा प्रांजलयस्तदा हरिमेकाग्रमनसा ध्यायन्तो ध्याननिष्ठिताः
āgatya ca tataḥ śrutvā nānāvidhaguṇādaram bhāvaiḥ puṇyaiḥ samabhyarcya natvā prāṁjalayastadā harimekāgramanasā dhyāyanto dhyānaniṣṭhitāḥ
वहाँ आकर तथा उनके नाना गुणों को आदरपूर्वक सुनकर, पुण्य भावों से पूजा करके, हाथ जोड़कर प्रणाम करके, तब एकाग्रचित्त होकर हरि का ध्यान करते हुए, ध्यान में स्थित होकर,
श्लोक 50 (skanda.2.185.50)
तानागतान्समालोक्य पदभक्त्या कृतानतीन् प्रसन्नः प्राह विश्वात्मा पीतवासा जनार्दनः
tānāgatānsamālokya padabhaktyā kṛtānatīn prasannaḥ prāha viśvātmā pītavāsā janārdanaḥ
उन्हें आया हुआ तथा चरणों में भक्तिपूर्वक झुका हुआ देखकर, प्रसन्न होकर विश्वात्मा पीताम्बरधारी जनार्दन ने कहा।
श्लोक 51 (skanda.2.185.51)
श्रीभगवानुवाच भोभो देवा भवन्तश्च चिराद्दिष्टयाद्यसंगताः अधुना भवतामिच्छां कां करोमि सुरा अहम् तद्ब्रूत त्वरिता मह्यं किं विलंबेन निर्भयाः
śrībhagavānuvāca bhobho devā bhavantaśca cirāddiṣṭayādyasaṁgatāḥ adhunā bhavatāmicchāṁ kāṁ karomi surā aham tadbrūta tvaritā mahyaṁ kiṁ vilaṁbena nirbhayāḥ
श्रीभगवान् ने कहा — हे देवगण, तुम सब भाग्यवश आज दीर्घकाल बाद मिले हो; अब मैं तुम्हारी कौन-सी इच्छा पूरी करूँ? निर्भय होकर शीघ्र मुझसे कहो, विलम्ब क्यों?
श्लोक 52 (skanda.2.185.52)
देवा ऊचुः भगवन्देवदेवेश त्वया संप्रति सर्वशः सर्वं समभवत्कार्यं निष्पन्नं वै जगत्पते
devā ūcuḥ bhagavandevadeveśa tvayā saṁprati sarvaśaḥ sarvaṁ samabhavatkāryaṁ niṣpannaṁ vai jagatpate
देवताओं ने कहा — हे भगवन्, देवदेवेश, हे जगत्पते, अब आपके द्वारा हमारा समस्त कार्य पूर्णतः सम्पन्न हो चुका है।
श्लोक 53 (skanda.2.185.53)
तथापि सर्वदा भाव्यं नित्यं देव त्वया विभो अस्मद्रक्षार्थमत्रैव विजितेन्द्रियवर्त्मना
tathāpi sarvadā bhāvyaṁ nityaṁ deva tvayā vibho asmadrakṣārthamatraiva vijitendriyavartmanā
फिर भी, हे विभु देव, आपको जितेन्द्रिय मार्ग से यहीं सदा हमारी रक्षा के लिए स्थित रहना चाहिए,
श्लोक 54 (skanda.2.185.54)
एवमेव सदा कार्यं शत्रुपक्षविनाशनम्
evameva sadā kāryaṁ śatrupakṣavināśanam
तथा इसी प्रकार सदा शत्रु-पक्ष का विनाश करते रहना चाहिए।
श्लोक 55 (skanda.2.185.55)
श्रीभगवानुवाच एवमेतत्करिष्यामि भवतामरिसंजयम् श्रीमतां तेजसो वृद्धिं करिष्यामि सदासुराः कथेयं च सदा ख्यातिं लोके यास्यति चोत्तमाम्
śrībhagavānuvāca evametatkariṣyāmi bhavatāmarisaṁjayam śrīmatāṁ tejaso vṛddhiṁ kariṣyāmi sadāsurāḥ katheyaṁ ca sadā khyātiṁ loke yāsyati cottamām
श्रीभगवान् ने कहा — मैं ऐसा ही करूँगा — तुम्हारे शत्रुओं पर विजय; हे देवगण, मैं श्रीमानों के तेज की सदा वृद्धि करूँगा; और यह कथा सदा लोक में उत्तम प्रसिद्धि को प्राप्त होगी।
श्लोक 56 (skanda.2.185.56)
अयं नाम्ना गुप्तहरिर्देवो भुवनविश्रुतः मदीयं परमं गुह्यं स्थानं ख्यातिं समेष्यति
ayaṁ nāmnā guptaharirdevo bhuvanaviśrutaḥ madīyaṁ paramaṁ guhyaṁ sthānaṁ khyātiṁ sameṣyati
यह देव भुवन में 'गुप्तहरि' नाम से विख्यात होगा; मेरा यह परम गुह्य स्थान ख्याति को प्राप्त होगा।
श्लोक 57 (skanda.2.185.57)
अत्र यः प्राणिनां श्रेष्ठः पूजायज्ञजपादिकम् करोति परया भक्त्या स याति परमां गतिम्
atra yaḥ prāṇināṁ śreṣṭhaḥ pūjāyajñajapādikam karoti parayā bhaktyā sa yāti paramāṁ gatim
यहाँ जो श्रेष्ठ प्राणी परम भक्ति से पूजा, यज्ञ, जप आदि करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 58 (skanda.2.185.58)
अत्र यः कुरुते दानं यथाशक्त्या जितेन्द्रियः स स्वर्गमतुलं प्राप्य न शोचति कदाचन
atra yaḥ kurute dānaṁ yathāśaktyā jitendriyaḥ sa svargamatulaṁ prāpya na śocati kadācana
यहाँ जो जितेन्द्रिय यथाशक्ति दान करता है, वह अनुपम स्वर्ग पाकर कभी शोक नहीं करता।
श्लोक 59 (skanda.2.185.59)
अत्र मत्प्रीतये देवाः प्राणिभिर्धर्मकांक्षिभिः दातव्या गौः प्रयत्नेन सवत्सा विधिपूर्वकम्
atra matprītaye devāḥ prāṇibhirdharmakāṁkṣibhiḥ dātavyā gauḥ prayatnena savatsā vidhipūrvakam
हे देवो, यहाँ मेरी प्रसन्नता के लिए धर्म चाहने वाले प्राणियों को यत्नपूर्वक विधिपूर्वक बछड़े सहित गौ देनी चाहिए,
श्लोक 60 (skanda.2.185.60)
स्वर्णशृंगी रौप्यखुरी वस्त्रद्वयसमावृता कांस्योपदोहना ताम्रपृष्ठी बहुगुणान्विता
svarṇaśṛṁgī raupyakhurī vastradvayasamāvṛtā kāṁsyopadohanā tāmrapṛṣṭhī bahuguṇānvitā
जो स्वर्णसींगी, रजतखुरी, दो वस्त्रों से ढकी, काँसे के पात्र में दुही जाने वाली, ताम्रवर्ण पीठ वाली, बहुत गुणों से युक्त,
श्लोक 61 (skanda.2.185.61)
रत्नपुच्छा दुग्धवती घंटाभरणभूषिता अर्चिता गंधपुष्पाद्यैः सुप्रसन्नाऽमृतप्रजा
ratnapucchā dugdhavatī ghaṁṭābharaṇabhūṣitā arcitā gaṁdhapuṣpādyaiḥ suprasannā’mṛtaprajā
रत्नयुक्त पूँछ वाली, दुग्धवती, घण्टा-आभूषण से भूषित, गन्ध-पुष्प आदि से पूजित, प्रसन्न स्वभाव वाली, अमृततुल्य सन्तान वाली हो,
श्लोक 62 (skanda.2.185.62)
द्विजाय वेदविज्ञाय गुणिने निर्मलात्मने विष्णुभक्ताय विदुषे आनृशंस्यरताय च
dvijāya vedavijñāya guṇine nirmalātmane viṣṇubhaktāya viduṣe ānṛśaṁsyaratāya ca
तथा वेदज्ञ, गुणी, निर्मल आत्मा वाले, विष्णुभक्त, विद्वान् तथा दया में रत ऐसे द्विज को,
श्लोक 63 (skanda.2.185.63)
ब्राह्मणाय च गौर्देया सर्वत्रसुखमश्नुते न देया द्विजमात्राय दातारं सोऽवपातयेत्
brāhmaṇāya ca gaurdeyā sarvatrasukhamaśnute na deyā dvijamātrāya dātāraṁ so’vapātayet
उसी ब्राह्मण को गौ देनी चाहिए — इससे सर्वत्र सुख मिलता है; केवल किसी भी द्विज को नहीं देनी चाहिए, क्योंकि वह दाता को गिरा सकता है।
श्लोक 64 (skanda.2.185.64)
मत्प्रीतयेऽत्र दातव्या निर्मलेनांतरात्मना
matprītaye’tra dātavyā nirmalenāṁtarātmanā
यहाँ निर्मल अन्तरात्मा से मेरी प्रसन्नता के लिए वह देनी चाहिए।
श्लोक 65 (skanda.2.185.65)
स्नातं यैश्च विशुद्ध्यर्थमत्र मद्भक्तितत्परैः तेषां स्वर्गतयो नित्यं मुक्तिः करतले स्थिता
snātaṁ yaiśca viśuddhyarthamatra madbhaktitatparaiḥ teṣāṁ svargatayo nityaṁ muktiḥ karatale sthitā
मेरी भक्ति में तत्पर होकर जो यहाँ शुद्धि के लिए स्नान करते हैं, उनके लिए स्वर्ग-प्राप्ति तथा मुक्ति सदा हथेली में रखी हुई है।
श्लोक 66 (skanda.2.185.66)
तथा चक्रहरेः पीठे मत्प्रीत्यै दानमुत्तमम् जपहोमादिकं चापि कर्त्तव्यं यत्नतो नरैः
tathā cakrahareḥ pīṭhe matprītyai dānamuttamam japahomādikaṁ cāpi karttavyaṁ yatnato naraiḥ
इसी प्रकार चक्रहरि के पीठ पर भी मेरी प्रसन्नता के लिए उत्तम दान, जप, होम आदि यत्नपूर्वक मनुष्यों को करना चाहिए।
श्लोक 67 (skanda.2.185.67)
भवन्तोऽपि विधानेन यात्रां कुर्वंतु सत्तमाः अस्माद्गुप्तहरेः स्थानान्निकटे संगमे शुभे
bhavanto’pi vidhānena yātrāṁ kurvaṁtu sattamāḥ asmādguptahareḥ sthānānnikaṭe saṁgame śubhe
हे श्रेष्ठो, तुम भी इस गुप्तहरि के स्थान के निकट, शुभ संगम पर विधिपूर्वक यात्रा करो,
श्लोक 68 (skanda.2.185.68)
प्रत्यग्भागे गोप्रताराद्योजनत्रयसंमिते घर्घरांबुतरंगिण्या सरयूः संगता यतः
pratyagbhāge gopratārādyojanatrayasaṁmite ghargharāṁbutaraṁgiṇyā sarayūḥ saṁgatā yataḥ
गोप्रतार से पश्चिम भाग में तीन योजन की दूरी पर, जहाँ घर्घरा की तरंगिणी सरयू से मिलती है।
श्लोक 69 (skanda.2.185.69)
अत्र स्नात्वा विधानेन द्रष्टव्योऽत्र प्रयत्नतः देवो गुप्तहरिर्नाम सर्वकामार्थसिद्धिदः
atra snātvā vidhānena draṣṭavyo’tra prayatnataḥ devo guptaharirnāma sarvakāmārthasiddhidaḥ
यहाँ विधिपूर्वक स्नान करके यत्नपूर्वक यहाँ सभी कामनाओं की सिद्धि देने वाले गुप्तहरि नामक देव के दर्शन करने चाहिए।
श्लोक 70 (skanda.2.185.70)
अगस्त्य उवाच इत्युक्त्वांतर्दधे देवः पीताम्बरधरोऽच्युतः देवा अपि विधानेन कृत्वा यात्रां प्रयत्नतः अयोध्यायां स्थिता नित्यं हरेर्गुणविमोहिताः
agastya uvāca ityuktvāṁtardadhe devaḥ pītāmbaradharo’cyutaḥ devā api vidhānena kṛtvā yātrāṁ prayatnataḥ ayodhyāyāṁ sthitā nityaṁ harerguṇavimohitāḥ
अगस्त्य ने कहा — ऐसा कहकर पीताम्बरधारी अच्युत देव अन्तर्धान हो गए; देवता भी विधिपूर्वक यत्नपूर्वक यात्रा करके अयोध्या में हरि के गुणों से विमोहित होकर सदा स्थित रहे।
श्लोक 71 (skanda.2.185.71)
तदाप्रभृति विप्रेंद्र तत्स्थानं भुवि पप्रथे कार्तिक्यां तु विशेषेण यात्रा सांवत्सरी भवेत्
tadāprabhṛti vipreṁdra tatsthānaṁ bhuvi paprathe kārtikyāṁ tu viśeṣeṇa yātrā sāṁvatsarī bhavet
हे विप्रेन्द्र, तभी से वह स्थान पृथ्वी पर विख्यात हुआ; विशेष रूप से कार्तिक में वार्षिक यात्रा होती है।
श्लोक 72 (skanda.2.185.72)
विभोर्गुप्तहरेस्तत्र संगमस्नानपूर्विका गोप्रतारे च तीर्थेऽस्मिन्सरयूघर्घराश्रिते स्नात्वा देवोऽर्चनीयोऽयं सर्वकामफलप्रदः
vibhorguptaharestatra saṁgamasnānapūrvikā gopratāre ca tīrthe’sminsarayūghargharāśrite snātvā devo’rcanīyo’yaṁ sarvakāmaphalapradaḥ
वहाँ विभु गुप्तहरि के पास संगम-स्नान पूर्वक, तथा सरयू-घर्घरा से आश्रित इस गोप्रतार तीर्थ में स्नान करके, सभी कामनाओं का फल देने वाले इस देव की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 73 (skanda.2.185.73)
तथा चक्रहरेर्यात्रा कर्त्तव्या सुप्रयत्नतः मार्गशार्षस्य विशदे पक्षे हरितिथौ नरैः
tathā cakrahareryātrā karttavyā suprayatnataḥ mārgaśārṣasya viśade pakṣe haritithau naraiḥ
इसी प्रकार चक्रहरि की यात्रा भी मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की हरि-तिथि (एकादशी) को मनुष्यों द्वारा अत्यन्त यत्नपूर्वक करनी चाहिए।
श्लोक 74 (skanda.2.185.74)
एवं यः कुरुते यात्रां विष्णुलोके स मोदते
evaṁ yaḥ kurute yātrāṁ viṣṇuloke sa modate
इस प्रकार जो यात्रा करता है, वह विष्णुलोक में आनन्दित होता है।
श्लोक 75 (skanda.2.185.75)
श्रीसूत उवाच एवमुक्त्वा तु विरते मुनौ कलशजन्मनि कृष्णद्वैपायनो व्यासः पुनराह सविस्मयः
śrīsūta uvāca evamuktvā tu virate munau kalaśajanmani kṛṣṇadvaipāyano vyāsaḥ punarāha savismayaḥ
श्री सूत ने कहा — इस प्रकार कहकर जब कलशयोनि मुनि चुप हो गए, तब कृष्णद्वैपायन व्यास ने विस्मित होकर पुनः कहा।
श्लोक 76 (skanda.2.185.76)
व्यास उवाच अत्याश्चर्य्यमयीं ब्रह्मन्कथामेतां तपोधन उक्तवानसि येनैतत्साश्चर्य्यं मम मानसम्
vyāsa uvāca atyāścaryyamayīṁ brahmankathāmetāṁ tapodhana uktavānasi yenaitatsāścaryyaṁ mama mānasam
व्यास ने कहा — हे ब्रह्मन्, हे तपोधन, आपने यह अत्यन्त आश्चर्यमयी कथा कही है, जिससे मेरा मन विस्मित हो गया है।
श्लोक 77 (skanda.2.185.77)
विस्तरेण मम ब्रूहि माहात्म्यं परमाद्भुतम्
vistareṇa mama brūhi māhātmyaṁ paramādbhutam
हे परम अद्भुत, इस महिमा को मुझे विस्तार से कहिए।
श्लोक 78 (skanda.2.185.78)
शृणु संगममाहात्म्यं विप्रेंद्र परमाद्भुतम् स्कन्ददेवाच्छ्रुतं सम्यक्कथयामि तथा तव
śṛṇu saṁgamamāhātmyaṁ vipreṁdra paramādbhutam skandadevācchrutaṁ samyakkathayāmi tathā tava
हे विप्रेन्द्र, संगम की परम अद्भुत महिमा सुनो; स्कन्ददेव से सुनी हुई कथा को मैं भलीभाँति तुम्हें कहता हूँ।
श्लोक 79 (skanda.2.185.79)
दशकोटिसहस्राणि दशकोटिशतानि च तीर्थानि सरयूनद्या घर्घरोदकसंगमे निवसंति सदा विप्र स्कन्दादवगतं मया
daśakoṭisahasrāṇi daśakoṭiśatāni ca tīrthāni sarayūnadyā ghargharodakasaṁgame nivasaṁti sadā vipra skandādavagataṁ mayā
हे विप्र, दस हजार करोड़ तथा दस सौ करोड़ तीर्थ सरयू नदी के घर्घरा-जल संगम में सदा निवास करते हैं — यह मैंने स्कन्द से जाना है।
श्लोक 80 (skanda.2.185.80)
देवतानां सुराणां च सिद्धानां योगिनां तथा ब्रह्मविष्णुशिवानां च सान्निध्यं सर्वदा स्थितम्
devatānāṁ surāṇāṁ ca siddhānāṁ yogināṁ tathā brahmaviṣṇuśivānāṁ ca sānnidhyaṁ sarvadā sthitam
देवताओं, सुरों, सिद्धों तथा योगियों का, तथा ब्रह्मा-विष्णु-शिव का सांनिध्य वहाँ सदा स्थित है।
श्लोक 81 (skanda.2.185.81)
तस्मिन्संगमसलिले नरः स्नात्वा समाहितः संतर्प्य पितृदेवांश्च दत्त्वा दानं स्वशक्तितः
tasminsaṁgamasalile naraḥ snātvā samāhitaḥ saṁtarpya pitṛdevāṁśca dattvā dānaṁ svaśaktitaḥ
उस संगम-जल में स्थिरचित्त मनुष्य स्नान करके, पितरों तथा देवताओं का तर्पण करके, अपनी शक्ति के अनुसार दान देकर,
श्लोक 82 (skanda.2.185.82)
हुत्वा वैष्णवमंत्रेण शुचिर्यत्फलमाप्नुयात् तदिहैकमना विप्र शृणु यत्कथयामि ते
hutvā vaiṣṇavamaṁtreṇa śuciryatphalamāpnuyāt tadihaikamanā vipra śṛṇu yatkathayāmi te
वैष्णव मन्त्र से हवन करके, शुद्ध होकर जो फल पाता है, वह, हे विप्र, एकाग्रचित्त होकर सुनो, जो मैं तुम्हें कहता हूँ।
श्लोक 83 (skanda.2.185.83)
अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च कुरुक्षेत्रे महाक्षेत्रे राहुग्रस्ते दिवाकरे
aśvamedhasahasrasya vājapeyaśatasya ca kurukṣetre mahākṣetre rāhugraste divākare
कुरुक्षेत्र नामक महाक्षेत्र में, सूर्यग्रहण के समय, सहस्र अश्वमेध तथा सौ वाजपेय यज्ञों तथा,
श्लोक 84 (skanda.2.185.84)
सुवर्णदाने यत्पुण्यमहन्यहनि तद्भवेत्
suvarṇadāne yatpuṇyamahanyahani tadbhavet
स्वर्णदान से जो पुण्य होता है, वह यहाँ प्रतिदिन प्राप्त होता है।
श्लोक 85 (skanda.2.185.85)
अमावास्यां पौर्णमास्यां द्वादश्योरुभयोरपि अयने च व्यतीपाते स्नानं वैष्णवलोकदम्
amāvāsyāṁ paurṇamāsyāṁ dvādaśyorubhayorapi ayane ca vyatīpāte snānaṁ vaiṣṇavalokadam
अमावस्या, पूर्णिमा, दोनों द्वादशियों, अयन तथा व्यतीपात के समय स्नान वैष्णवलोक देने वाला है।
श्लोक 86 (skanda.2.185.86)
तिष्ठेद्युगसहस्रं तु पादेनैकेन यः पुमान् विधिवत्संगमे स्नायात्पौष्यां तदविशेषतः
tiṣṭhedyugasahasraṁ tu pādenaikena yaḥ pumān vidhivatsaṁgame snāyātpauṣyāṁ tadaviśeṣataḥ
जो पुरुष एक पैर पर सहस्र युगों तक खड़ा रहे, उसके बराबर पुण्य पौष पूर्णिमा को विधिपूर्वक संगम में स्नान करने से बिना किसी भेद के प्राप्त होता है।
श्लोक 87 (skanda.2.185.87)
लंबतेऽवाक्छिरा यस्तु युगानामयुतं पुमान् स्नातानां शुचिभिस्तोयैः संगमे प्रयतात्मनाम्
laṁbate’vākchirā yastu yugānāmayutaṁ pumān snātānāṁ śucibhistoyaiḥ saṁgame prayatātmanām
जो पुरुष दस हजार युगों तक सिर नीचे करके लटका रहे, उसका फल संयमी मनुष्यों के संगम में पवित्र जल से स्नान करने के बराबर है।
श्लोक 88 (skanda.2.185.88)
व्युष्टिर्भवति या पुंसां न सा क्रतुशतैरपि
vyuṣṭirbhavati yā puṁsāṁ na sā kratuśatairapi
मनुष्यों को जो कल्याण प्राप्त होता है, वह सैकड़ों यज्ञों से भी प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 89 (skanda.2.185.89)
पौषे मासि विशेषेण स्नानं बहुफलप्रदम्
pauṣe māsi viśeṣeṇa snānaṁ bahuphalapradam
पौष मास में विशेष रूप से स्नान बहुत फल देने वाला है।
श्लोक 90 (skanda.2.185.90)
पौषे मासि विशेषेण यः कुर्यात्स्नानमादृतः ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा वर्णसंकरः स याति ब्रह्मणः स्थानं पुनरावृत्तिवर्जितम्
pauṣe māsi viśeṣeṇa yaḥ kuryātsnānamādṛtaḥ brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdro vā varṇasaṁkaraḥ sa yāti brahmaṇaḥ sthānaṁ punarāvṛttivarjitam
पौष मास में विशेष रूप से जो आदरपूर्वक स्नान करता है — चाहे वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा वर्णसंकर हो — वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है, जहाँ से पुनरागमन नहीं होता।
श्लोक 91 (skanda.2.185.91)
पौषे मासे तु यो दद्याद्घृताढ्यं दीपमुत्तमम् विधिवच्छ्रद्धया विप्र शृणु तस्यापि यत्फलम्
pauṣe māse tu yo dadyādghṛtāḍhyaṁ dīpamuttamam vidhivacchraddhayā vipra śṛṇu tasyāpi yatphalam
पौष मास में जो घृतयुक्त उत्तम दीप विधिपूर्वक श्रद्धा से देता है, हे विप्र, उसका भी फल सुनो।
श्लोक 92 (skanda.2.185.92)
नानाजन्मार्जितं पापं स्वल्पं बह्वपि वा भवेत् तत्सर्वं नश्यति क्षिप्रं तोयस्थं लवणं यथा
nānājanmārjitaṁ pāpaṁ svalpaṁ bahvapi vā bhavet tatsarvaṁ naśyati kṣipraṁ toyasthaṁ lavaṇaṁ yathā
नाना जन्मों में अर्जित पाप चाहे थोड़ा हो या अधिक, वह सब जल में मिले नमक की तरह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
श्लोक 93 (skanda.2.185.93)
आयुरारोग्यमैश्वर्यं संततीः सौख्यमुत्तमम् प्राप्नोति फलदं नित्यं दीपदः पुण्यभाङ्नरः
āyurārogyamaiśvaryaṁ saṁtatīḥ saukhyamuttamam prāpnoti phaladaṁ nityaṁ dīpadaḥ puṇyabhāṅnaraḥ
दीपदाता मनुष्य सदा फल देने वाली आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, सन्तति तथा उत्तम सुख प्राप्त करता है।
श्लोक 94 (skanda.2.185.94)
यस्तु शुक्लत्रयोदश्यां पौषेऽत्र प्रयतो व्रती जागरं कुरुते धीरः स गच्छेद्भवनं हरेः
yastu śuklatrayodaśyāṁ pauṣe’tra prayato vratī jāgaraṁ kurute dhīraḥ sa gacchedbhavanaṁ hareḥ
जो व्रतधारी पौष शुक्ल त्रयोदशी को यहाँ संयमी होकर जागरण करता है, वह धीर पुरुष हरि के भवन को जाता है।
श्लोक 95 (skanda.2.185.95)
जागरं विदधद्रात्रौ दीपं दत्त्वा तु सर्वशः होमं च कारयेद्विप्रो नियतात्मा शुचिव्रतः
jāgaraṁ vidadhadrātrau dīpaṁ dattvā tu sarvaśaḥ homaṁ ca kārayedvipro niyatātmā śucivrataḥ
रात्रि में जागरण करते हुए, सर्वत्र दीप देकर, नियमपूर्वक पवित्रव्रती विप्र को होम भी कराना चाहिए।
श्लोक 96 (skanda.2.185.96)
वैष्णवो विष्णुपूजां च कुर्वञ्छृण्वन्हरेः कथाम् गीतवादित्रनृत्यैश्च विष्णुतोषणकारकैः कथाभिः पुण्ययुक्ताभिर्जागृयाच्छर्वरीं नरः
vaiṣṇavo viṣṇupūjāṁ ca kurvañchṛṇvanhareḥ kathām gītavāditranṛtyaiśca viṣṇutoṣaṇakārakaiḥ kathābhiḥ puṇyayuktābhirjāgṛyāccharvarīṁ naraḥ
वैष्णव मनुष्य विष्णु-पूजा करते हुए तथा हरि-कथा सुनते हुए, गीत-वाद्य-नृत्य से तथा विष्णु को सन्तुष्ट करने वाली पुण्ययुक्त कथाओं से रात्रि जागरण करे।
श्लोक 97 (skanda.2.185.97)
ततः प्रभाते विमले स्नात्वा विधिवदादरात् विष्णुं संपूज्य विप्रांश्च देयं स्वर्णादि शक्तितः
tataḥ prabhāte vimale snātvā vidhivadādarāt viṣṇuṁ saṁpūjya viprāṁśca deyaṁ svarṇādi śaktitaḥ
फिर स्वच्छ प्रभात में विधिपूर्वक आदरपूर्वक स्नान करके, विष्णु तथा ब्राह्मणों की पूजा करके, अपनी शक्ति के अनुसार स्वर्णादि देना चाहिए।
श्लोक 98 (skanda.2.185.98)
स्वर्णं चान्नं च वासांसि यो दद्याच्छ्रद्धयाऽन्वितः संगमे विधिवद्विद्वान्स याति परमां गतिम्
svarṇaṁ cānnaṁ ca vāsāṁsi yo dadyācchraddhayā’nvitaḥ saṁgame vidhivadvidvānsa yāti paramāṁ gatim
जो श्रद्धायुक्त होकर संगम में विधिपूर्वक स्वर्ण, अन्न तथा वस्त्र देता है, वह विद्वान् परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 99 (skanda.2.185.99)
वर्षेवर्षे तु कर्तव्यो जागरः पुण्यतत्परैः
varṣevarṣe tu kartavyo jāgaraḥ puṇyatatparaiḥ
यह जागरण पुण्य चाहने वालों द्वारा प्रतिवर्ष करना चाहिए।
श्लोक 100 (skanda.2.185.100)
हरिः पूज्यो द्विजाः सम्यक्संतोष्याः शक्तितो नरैः तेन विष्णोः परा तुष्टिः पापानि विफलानि च भवंति निर्विषाः सर्पा यथा तार्क्ष्यस्य दर्शनात्
hariḥ pūjyo dvijāḥ samyaksaṁtoṣyāḥ śaktito naraiḥ tena viṣṇoḥ parā tuṣṭiḥ pāpāni viphalāni ca bhavaṁti nirviṣāḥ sarpā yathā tārkṣyasya darśanāt
हरि की पूजा तथा द्विजों की यथाशक्ति भलीभाँति सन्तुष्टि मनुष्यों द्वारा करनी चाहिए; इससे विष्णु की परम प्रसन्नता होती है, तथा पाप निष्फल हो जाते हैं, जैसे गरुड़ के दर्शन से सर्प विषरहित हो जाते हैं।
श्लोक 101 (skanda.2.185.101)
तत्र स्नातो दिवं याति अत्र स्नातः सुखी भवेत
tatra snāto divaṁ yāti atra snātaḥ sukhī bhaveta
वहाँ स्नान करने वाला स्वर्ग को जाता है, यहाँ स्नान करने वाला सुखी होता है।
श्लोक 102 (skanda.2.185.102)
त्रिषु लोकेषु ये केचित्प्राणिनः सर्व एव ते तर्प्यमाणाः परां तृप्तिं यांति संगमजैर्जलैः
triṣu lokeṣu ye kecitprāṇinaḥ sarva eva te tarpyamāṇāḥ parāṁ tṛptiṁ yāṁti saṁgamajairjalaiḥ
तीनों लोकों में जितने भी प्राणी हैं, वे सभी तर्पण किए जाने पर संगम से उत्पन्न जल द्वारा परम तृप्ति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 103 (skanda.2.185.103)
भूतानामिह सर्वेषां दुःखोपहतचेतसाम् गतिमन्वेषमाणानां न संगमसमा गतिः
bhūtānāmiha sarveṣāṁ duḥkhopahatacetasām gatimanveṣamāṇānāṁ na saṁgamasamā gatiḥ
दुःख से पीड़ित मन वाले, गति की खोज करने वाले समस्त प्राणियों के लिए यहाँ संगम के समान कोई गति नहीं है।
श्लोक 104 (skanda.2.185.104)
सप्तावरान्सप्तपरान्पुरुषश्चात्मनासह पुंसस्तारयते सर्वान्संगमे स्नानमाचरन्
saptāvarānsaptaparānpuruṣaścātmanāsaha puṁsastārayate sarvānsaṁgame snānamācaran
संगम में स्नान करने वाला पुरुष अपने सहित सात पूर्वजों तथा सात उत्तरजों — सभी को तार देता है।
श्लोक 105 (skanda.2.185.105)
जात्यंधैरिह ते तुल्यास्तथा पंगुभिरेव च समेत्यात्र च न स्नान्ति सरयूघर्घरसंगमे
jātyaṁdhairiha te tulyāstathā paṁgubhireva ca sametyātra ca na snānti sarayūghargharasaṁgame
जो यहाँ आकर सरयू-घर्घरा के संगम में स्नान नहीं करते, वे जन्मान्ध तथा पंगु के समान हैं।
श्लोक 106 (skanda.2.185.106)
वर्णानां ब्राह्मणो यद्वत्तथा तीर्थेषु संगमः सरयूघर्घरायोगे वैष्णवस्थो नरः सदा
varṇānāṁ brāhmaṇo yadvattathā tīrtheṣu saṁgamaḥ sarayūghargharāyoge vaiṣṇavastho naraḥ sadā
जैसे वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, वैसे ही तीर्थों में यह संगम श्रेष्ठ है; सरयू-घर्घरा के मिलन-स्थल पर वैष्णवस्थ मनुष्य सदा [परम गति पाता है]।
श्लोक 107 (skanda.2.185.107)
अत्र स्नानेन दानेन यथा शक्त्या जितेंद्रियः होमेन विधिपुक्तेन नरः स्वर्गमवाप्नुयात्
atra snānena dānena yathā śaktyā jiteṁdriyaḥ homena vidhipuktena naraḥ svargamavāpnuyāt
यहाँ यथाशक्ति स्नान, दान तथा विधिपूर्वक होम से जितेन्द्रिय मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करता है।
श्लोक 108 (skanda.2.185.108)
नरो वा यदि वा नारी विधिवत्स्नानमाचरेत् स्वर्गलोकनिवासो हि भवेत्तस्य न संशयः
naro vā yadi vā nārī vidhivatsnānamācaret svargalokanivāso hi bhavettasya na saṁśayaḥ
पुरुष हो या स्त्री, जो भी विधिपूर्वक स्नान करता है, उसका स्वर्गलोक में निवास निश्चय ही होगा — इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 109 (skanda.2.185.109)
यथा वह्निर्दहेत्सर्वं शुष्कमार्द्रमथापि वा भस्मीभवंति पापानि तत्समागममज्जनात्
yathā vahnirdahetsarvaṁ śuṣkamārdramathāpi vā bhasmībhavaṁti pāpāni tatsamāgamamajjanāt
जैसे अग्नि सूखे या गीले सभी को जला देती है, वैसे ही उस संगम में डुबकी लगाने से पाप भस्म हो जाते हैं।
श्लोक 110 (skanda.2.185.110)
एकतः सर्वतीर्थानि नानाविधिफलानि वै सरयूघर्घरोत्पन्नसंगमस्त्वधिको भवेत्
ekataḥ sarvatīrthāni nānāvidhiphalāni vai sarayūghargharotpannasaṁgamastvadhiko bhavet
एक ओर नाना विधानों वाले फल देने वाले सभी तीर्थ, दूसरी ओर सरयू-घर्घरा से उत्पन्न यह संगम — यह अधिक है।
श्लोक 111 (skanda.2.185.111)
सर्वतीर्थावगाहस्य फलं यादृक्स्मृतं श्रुतौ तादृक्फलं नृणां सम्यग्भवेत्संगममज्जनात्
sarvatīrthāvagāhasya phalaṁ yādṛksmṛtaṁ śrutau tādṛkphalaṁ nṛṇāṁ samyagbhavetsaṁgamamajjanāt
श्रुति में समस्त तीर्थों में स्नान का जैसा फल कहा गया है, मनुष्यों को वैसा ही फल भलीभाँति संगम में डुबकी लगाने से मिलता है।
श्लोक 112 (skanda.2.185.112)
गोप्रताराभिधं तीर्थमपरं वर्ततेऽनघ सन्निधौ संगमस्यैव महापातकनाशनम्
gopratārābhidhaṁ tīrthamaparaṁ vartate’nagha sannidhau saṁgamasyaiva mahāpātakanāśanam
हे अनघ, उसी संगम के निकट गोप्रतार नामक एक और तीर्थ है, जो महापातकों का नाशक है।
श्लोक 113 (skanda.2.185.113)
यत्र स्नानेन दानेन न शोचति नरः क्वचित् गोप्रतारसमं तीर्थं न भूतं न भविष्यति
yatra snānena dānena na śocati naraḥ kvacit gopratārasamaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati
जहाँ स्नान तथा दान से मनुष्य कभी शोक नहीं करता; गोप्रतार के समान तीर्थ न हुआ है और न होगा।
श्लोक 114 (skanda.2.185.114)
वाराणस्यां यथा विद्वन्वर्त्तते मणिकर्णिका उज्जयिन्यां यथा विप्र महाकालनिकेतनम्
vārāṇasyāṁ yathā vidvanvarttate maṇikarṇikā ujjayinyāṁ yathā vipra mahākālaniketanam
हे विद्वन्, जैसे वाराणसी में मणिकर्णिका है, हे विप्र, जैसे उज्जयिनी में महाकाल का निकेतन है,
श्लोक 115 (skanda.2.185.115)
नैमिषे चक्रवापी तु यथा तीर्थतमा स्मृता अयोध्यायां तथा विप्र गोप्रताराभिधं महत्
naimiṣe cakravāpī tu yathā tīrthatamā smṛtā ayodhyāyāṁ tathā vipra gopratārābhidhaṁ mahat
जैसे नैमिष में चक्रवापी श्रेष्ठतम तीर्थ स्मृत है, वैसे ही, हे विप्र, अयोध्या में गोप्रतार नामक महान् तीर्थ है,
श्लोक 116 (skanda.2.185.116)
यत्र रामाज्ञया विद्वन्साकेतनगरीजनाः अवापुः स्वर्गमतुलं निमज्ज्य परमांभसि
yatra rāmājñayā vidvansāketanagarījanāḥ avāpuḥ svargamatulaṁ nimajjya paramāṁbhasi
जहाँ, हे विद्वन्, राम की आज्ञा से साकेतनगरी के लोग परम जल में डूबकर अनुपम स्वर्ग को प्राप्त हुए।
श्लोक 117 (skanda.2.185.117)
व्यास उवाच अवापुस्ते कथं स्वर्गं साकेतनगरीजनाः कथं च राघवो विद्वन्नेतत्कथय सुव्रत
vyāsa uvāca avāpuste kathaṁ svargaṁ sāketanagarījanāḥ kathaṁ ca rāghavo vidvannetatkathaya suvrata
व्यास ने कहा — साकेतनगरी के लोग स्वर्ग को कैसे प्राप्त हुए, तथा राघव भी कैसे, हे विद्वन् सुव्रत, यह कहिए।
श्लोक 118 (skanda.2.185.118)
अगस्त्य उवाच सावधानः शृणु मुने कथामेतां सुविस्तरात् यथाजगाम रामोऽसौ स्वर्गं स च पुरीजनः
agastya uvāca sāvadhānaḥ śṛṇu mune kathāmetāṁ suvistarāt yathājagāma rāmo’sau svargaṁ sa ca purījanaḥ
अगस्त्य ने कहा — हे मुने, सावधान होकर यह कथा विस्तार से सुनो — कि किस प्रकार वह राम तथा पुरीवासी स्वर्ग को गए।
श्लोक 119 (skanda.2.185.119)
पुरा रामो विधायैव देवकार्य्यमतंद्रितः स्वर्गं गंतुं मनश्चक्रे भ्रातृभ्यां सह वीरधीः
purā rāmo vidhāyaiva devakāryyamataṁdritaḥ svargaṁ gaṁtuṁ manaścakre bhrātṛbhyāṁ saha vīradhīḥ
पूर्वकाल में राम ने देवताओं का कार्य अथकभाव से सम्पन्न करके, वीर बुद्धि से भाइयों सहित स्वर्ग जाने का मन बना लिया।
श्लोक 120 (skanda.2.185.120)
ततो निशम्य चारेण वानराः कामरूपिणः ऋक्षगोपुच्छरक्षांसि समुत्पेतुरनेकशः
tato niśamya cāreṇa vānarāḥ kāmarūpiṇaḥ ṛkṣagopuccharakṣāṁsi samutpeturanekaśaḥ
तब गुप्तचर से यह सुनकर कामरूपी वानर, ऋक्ष, गोपुच्छ (जाम्बवान्) तथा राक्षस अनेक प्रकार से उठ खड़े हुए,
श्लोक 121 (skanda.2.185.121)
देवगंधर्वपुत्राश्च ऋषिपुत्राश्च वानराः रामक्षयं विदित्वा तु सर्व एव समागताः
devagaṁdharvaputrāśca ṛṣiputrāśca vānarāḥ rāmakṣayaṁ viditvā tu sarva eva samāgatāḥ
तथा देव-गन्धर्वों के पुत्र और वानर बने ऋषि-पुत्र भी, राम के प्रस्थान को जानकर सभी एकत्र हो गए।
श्लोक 122 (skanda.2.185.122)
ते राममनुगत्योचुः सर्वे वानरयूथपाः तवानुगमने राजन्संप्राप्ताः स्म इहानघ
te rāmamanugatyocuḥ sarve vānarayūthapāḥ tavānugamane rājansaṁprāptāḥ sma ihānagha
वे सभी वानर-सेनापति राम के पीछे जाकर बोले — 'हे राजन्, हे अनघ, हम आपके अनुगमन के लिए यहाँ आए हैं।'
श्लोक 123 (skanda.2.185.123)
यदि राम विनास्माभिर्गच्छेस्त्वं पुरुषर्षभ सर्वे खलु हताः स्याम दण्डेन महता नृप
yadi rāma vināsmābhirgacchestvaṁ puruṣarṣabha sarve khalu hatāḥ syāma daṇḍena mahatā nṛpa
'हे राम, हे पुरुषर्षभ, यदि आप हमारे बिना जाएँ, तो हे नृप, हम सब उस महान् दण्ड से मानो मारे हुए ही होंगे।'
श्लोक 124 (skanda.2.185.124)
श्रुत्वा तु वचनं तेषामृक्षवानररक्षसाम् विभीषणमुवाचाथ राघवस्तत्क्षणं गिरा
śrutvā tu vacanaṁ teṣāmṛkṣavānararakṣasām vibhīṣaṇamuvācātha rāghavastatkṣaṇaṁ girā
उन ऋक्ष-वानर-राक्षसों का यह वचन सुनकर राघव ने तत्क्षण वाणी से विभीषण से कहा।
श्लोक 125 (skanda.2.185.125)
यावत्प्रजा धरिष्यंति तावदेव विभीषण कारयस्व महद्राज्यं लंकां त्वं पालयिष्यसि
yāvatprajā dhariṣyaṁti tāvadeva vibhīṣaṇa kārayasva mahadrājyaṁ laṁkāṁ tvaṁ pālayiṣyasi
'हे विभीषण, जब तक प्रजा रहेगी, तब तक तुम इस महान् राज्य को चलाना, तुम लंका का पालन करोगे।'
श्लोक 126 (skanda.2.185.126)
शाधि राज्यं च खल्वेतन्नान्यथा मे वचः कुरु प्रजास्त्वं रक्ष धर्मेण नोत्तरं वक्तुमर्हसि
śādhi rājyaṁ ca khalvetannānyathā me vacaḥ kuru prajāstvaṁ rakṣa dharmeṇa nottaraṁ vaktumarhasi
'इस राज्य का शासन करो, मेरे वचन को अन्यथा मत करो; धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करो, तुम्हें उत्तर देने का अधिकार नहीं है।'
श्लोक 127 (skanda.2.185.127)
एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थो हनुमंतमथाब्रवीत् वायुपुत्र चिरं जीव मा प्रतिज्ञां वृथा कृथाः
evamuktvā tu kākutstho hanumaṁtamathābravīt vāyuputra ciraṁ jīva mā pratijñāṁ vṛthā kṛthāḥ
ऐसा कहकर काकुत्स्थ ने फिर हनुमान् से कहा — 'हे वायुपुत्र, चिरंजीवी रहो, अपनी प्रतिज्ञा को व्यर्थ मत करना।'
श्लोक 128 (skanda.2.185.128)
यावल्लोका वदिष्यंति मत्कथां वानरर्षभ तावत्त्वं धारय प्राणान्प्रतिज्ञां प्रतिपालयन्
yāvallokā vadiṣyaṁti matkathāṁ vānararṣabha tāvattvaṁ dhāraya prāṇānpratijñāṁ pratipālayan
'हे वानरश्रेष्ठ, जब तक लोग मेरी कथा कहते रहेंगे, तब तक तुम अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए प्राण धारण करना।'
श्लोक 129 (skanda.2.185.129)
मैन्दश्च द्विविदश्चैव अमृतप्राशनावुभौ यावल्लोका धरिष्यंति तावदेतौ धरिष्यतः
maindaśca dvividaścaiva amṛtaprāśanāvubhau yāvallokā dhariṣyaṁti tāvadetau dhariṣyataḥ
अमृतपान करने वाले मैन्द तथा द्विविद दोनों भी जब तक लोक रहेंगे, तब तक रहेंगे।
श्लोक 130 (skanda.2.185.130)
पुत्रपौत्राश्च येऽस्माकं तान्रक्षन्त्विह वानराः एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थः सर्वानथ च वानरान् मया सार्धं प्रयातेति तदा तान्राघवोऽब्रवीत्
putrapautrāśca ye’smākaṁ tānrakṣantviha vānarāḥ evamuktvā tu kākutsthaḥ sarvānatha ca vānarān mayā sārdhaṁ prayāteti tadā tānrāghavo’bravīt
हमारे जो पुत्र-पौत्र हैं, उनकी रक्षा यहाँ वानर करें — ऐसा कहकर काकुत्स्थ ने फिर सभी वानरों से कहा, 'मेरे साथ चलो' — तब राघव ने उनसे यह कहा।
श्लोक 131 (skanda.2.185.131)
प्रभातायां तु शर्वर्य्यां पृथुवक्षा महाभुजः रामः कमलपत्राक्षः पुरोधसमथाब्रवीत्
prabhātāyāṁ tu śarvaryyāṁ pṛthuvakṣā mahābhujaḥ rāmaḥ kamalapatrākṣaḥ purodhasamathābravīt
रात्रि के प्रभात होने पर विशाल वक्षस्थल वाले, महाबाहु, कमलपत्राक्ष राम ने पुरोहित से कहा,
श्लोक 132 (skanda.2.185.132)
अग्निहोत्राणि यांत्वग्रे दीप्यमानानि सर्वशः वाजपेयातिरात्राणि निर्यातु च ममाग्रतः
agnihotrāṇi yāṁtvagre dīpyamānāni sarvaśaḥ vājapeyātirātrāṇi niryātu ca mamāgrataḥ
'सभी दिशाओं में प्रज्वलित अग्निहोत्र आगे चलें, तथा वाजपेय और अतिरात्र यज्ञ भी मेरे आगे निकलें।'
श्लोक 133 (skanda.2.185.133)
ततो वसिष्ठस्तेजस्वी सर्वं निश्चित्य चेतसा चकार विधिवत्कर्म महाप्रास्थानिकं विधिम्
tato vasiṣṭhastejasvī sarvaṁ niścitya cetasā cakāra vidhivatkarma mahāprāsthānikaṁ vidhim
तब तेजस्वी वसिष्ठ ने मन में सब कुछ निश्चय करके विधिपूर्वक महाप्रास्थानिक कर्म का विधान किया।
श्लोक 134 (skanda.2.185.134)
ततः क्षौमाम्बरधरो ब्रह्मचर्यसमन्वितः कुशानादाय पाणिभ्यां महाप्रस्थानमुद्यतः
tataḥ kṣaumāmbaradharo brahmacaryasamanvitaḥ kuśānādāya pāṇibhyāṁ mahāprasthānamudyataḥ
फिर रेशमी वस्त्र धारण किए, ब्रह्मचर्य से युक्त, दोनों हाथों में कुश लेकर वे महाप्रस्थान के लिए उद्यत हुए।
श्लोक 135 (skanda.2.185.135)
न व्याहरच्छुभं किंचिदशुभं वा नरेश्वरः निष्क्रम्य नगरात्तस्मात्सागरादिव चंद्रमाः
na vyāharacchubhaṁ kiṁcidaśubhaṁ vā nareśvaraḥ niṣkramya nagarāttasmātsāgarādiva caṁdramāḥ
वह नरेश्वर, नगर से निकलते हुए, न कुछ शुभ बोला और न अशुभ, जैसे सागर से चन्द्रमा निकलता है।
श्लोक 136 (skanda.2.185.136)
रामस्य सव्यपार्श्वे तु सपद्मा श्रीः समाश्रिता दक्षिणे ह्रीर्विशालाक्षी व्यवसायस्तथाग्रतः
rāmasya savyapārśve tu sapadmā śrīḥ samāśritā dakṣiṇe hrīrviśālākṣī vyavasāyastathāgrataḥ
राम के बाईं ओर कमलधारिणी श्री आश्रित हुईं, दाईं ओर विशाललोचना ह्री, तथा आगे व्यवसाय (संकल्प)।
श्लोक 137 (skanda.2.185.137)
नानाविधायुधान्यत्र धनुर्ज्याप्रभृतीनि च अनुव्रजंति काकुत्स्थं सर्वे पुरुष विग्रहाः
nānāvidhāyudhānyatra dhanurjyāprabhṛtīni ca anuvrajaṁti kākutsthaṁ sarve puruṣa vigrahāḥ
वहाँ धनुष-ज्या आदि नाना प्रकार के आयुध, सभी पुरुष-रूप धारण किए हुए, काकुत्स्थ के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 138 (skanda.2.185.138)
वेदो ब्राह्मणरूपेण सावित्री सव्यदक्षिणे ॐकारोऽथ वषङ्कारः सर्वे रामं तदाऽव्रजन्
vedo brāhmaṇarūpeṇa sāvitrī savyadakṣiṇe oṁkāro’tha vaṣaṅkāraḥ sarve rāmaṁ tadā’vrajan
ब्राह्मण-रूप में वेद, दोनों ओर सावित्री, तथा ॐकार और वषट्कार — ये सब उस समय राम के पीछे चले।
श्लोक 139 (skanda.2.185.139)
ऋषयश्च महात्मानः सर्वे चैव महीधराः अनुगच्छन्ति काकुत्स्थं स्वर्गद्वारमुपस्थितम्
ṛṣayaśca mahātmānaḥ sarve caiva mahīdharāḥ anugacchanti kākutsthaṁ svargadvāramupasthitam
महात्मा ऋषिगण तथा सभी राजा भी स्वर्गद्वार की ओर बढ़ते काकुत्स्थ के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 140 (skanda.2.185.140)
तथानुयांति काकुत्स्थमंतःपुरगताः स्त्रियः सवृद्धाबालदासीकाः सपर्षद्द्वाररक्षकाः
tathānuyāṁti kākutsthamaṁtaḥpuragatāḥ striyaḥ savṛddhābāladāsīkāḥ saparṣaddvārarakṣakāḥ
इसी प्रकार अन्तःपुर की स्त्रियाँ, वृद्ध, बालक, दासियाँ, परिषद्जन तथा द्वाररक्षक भी काकुत्स्थ के पीछे चले।
श्लोक 141 (skanda.2.185.141)
सान्तःपुरश्च भरतः शत्रुघ्नसहितो ययौ रामं व्रजंतमागम्य रघुवंशमनुव्रताः
sāntaḥpuraśca bharataḥ śatrughnasahito yayau rāmaṁ vrajaṁtamāgamya raghuvaṁśamanuvratāḥ
अन्तःपुर सहित भरत तथा शत्रुघ्न भी रघुवंश के अनुव्रती होकर जाते हुए राम के पास आकर चले।
श्लोक 142 (skanda.2.185.142)
ततो विप्रा महात्मानः साग्निहोत्राः समंततः सपुत्रदाराः काकुत्स्थमनुगच्छति सर्वशः
tato viprā mahātmānaḥ sāgnihotrāḥ samaṁtataḥ saputradārāḥ kākutsthamanugacchati sarvaśaḥ
तब अग्निहोत्रधारी महात्मा विप्रगण भी अपने पुत्र-पत्नियों सहित सब ओर से काकुत्स्थ के पीछे चले।
श्लोक 143 (skanda.2.185.143)
मंत्रिणो भृत्ययुक्ताश्च सपुत्राः सहबांधवाः सर्वे ते सानुगाश्चैव ह्यनु गच्छंति राघवम्
maṁtriṇo bhṛtyayuktāśca saputrāḥ sahabāṁdhavāḥ sarve te sānugāścaiva hyanu gacchaṁti rāghavam
अनुचरों सहित मन्त्रीगण, पुत्र तथा बन्धुओं सहित — वे सभी अपने-अपने अनुयायियों के साथ राघव के पीछे चले।
श्लोक 144 (skanda.2.185.144)
ततः सर्वाः प्रकृतयो हृष्टपुष्टजनावृताः गच्छंतमनुगच्छंतिराघवं गुणरंजिताः
tataḥ sarvāḥ prakṛtayo hṛṣṭapuṣṭajanāvṛtāḥ gacchaṁtamanugacchaṁtirāghavaṁ guṇaraṁjitāḥ
तब प्रसन्न, समृद्ध जनों से घिरी सभी प्रजाएँ, उनके गुणों से रंजित होकर जाते हुए राघव के पीछे चलीं।
श्लोक 145 (skanda.2.185.145)
तथा प्रजाश्च सकलाः सपुत्राश्च सवबांधवाः राघवस्यानुगाश्चासन्दृष्ट्वा विगतकल्मषम्
tathā prajāśca sakalāḥ saputrāśca savabāṁdhavāḥ rāghavasyānugāścāsandṛṣṭvā vigatakalmaṣam
इसी प्रकार पुत्रों तथा सभी बन्धुओं सहित समस्त प्रजा भी, उन्हें निष्पाप देखकर राघव की अनुयायी बन गई,
श्लोक 146 (skanda.2.185.146)
स्नाताः शुक्लाम्बरधराः सर्वे प्रयतमानसाः कृत्वा किलकिलाशब्दमनुयाताश्च राघवम्
snātāḥ śuklāmbaradharāḥ sarve prayatamānasāḥ kṛtvā kilakilāśabdamanuyātāśca rāghavam
स्नान करके श्वेत वस्त्र धारण किए, सभी संयमित मन वाले, किलकिला-ध्वनि करते हुए राघव के पीछे चले।
श्लोक 147 (skanda.2.185.147)
न कश्चित्तत्र दीनोऽभून्न भीतो नातिदुःखितः प्रहृष्टा मुदिताः सर्वे वभूवुः परमाद्भुताः
na kaścittatra dīno’bhūnna bhīto nātiduḥkhitaḥ prahṛṣṭā muditāḥ sarve vabhūvuḥ paramādbhutāḥ
वहाँ कोई दीन नहीं था, कोई भयभीत नहीं था, कोई अत्यन्त दुःखी नहीं था; सभी परम अद्भुत रूप से प्रसन्न तथा हर्षित हो गए।
श्लोक 148 (skanda.2.185.148)
द्रष्टुकामाश्च निर्वाणं राज्ञो जनपदास्तथा संप्राप्तास्तेऽपि दृष्ट्वैव नभोमार्गेण चक्रिणम्
draṣṭukāmāśca nirvāṇaṁ rājño janapadāstathā saṁprāptāste’pi dṛṣṭvaiva nabhomārgeṇa cakriṇam
राजा के निर्वाण को देखने की इच्छा वाले जनपद के लोग भी वहाँ पहुँचे और आकाश-मार्ग से जाते चक्रधारी को देखा।
श्लोक 149 (skanda.2.185.149)
ऋक्षवानररक्षांसि जनाश्च पुरवासिनः आगत्य परया भक्त्या पृष्ठतः समुपाययुः
ṛkṣavānararakṣāṁsi janāśca puravāsinaḥ āgatya parayā bhaktyā pṛṣṭhataḥ samupāyayuḥ
ऋक्ष, वानर, राक्षस तथा नगरवासी लोग परम भक्ति से आकर पीछे-पीछे चलने लगे।
श्लोक 150 (skanda.2.185.150)
तानि भूतानि नगरे ह्यन्तर्धानगतान्यपि राघवं तेऽप्यनुययुः स्वर्गद्वारमुपस्थितम्
tāni bhūtāni nagare hyantardhānagatānyapi rāghavaṁ te’pyanuyayuḥ svargadvāramupasthitam
नगर में जो प्राणी अदृश्य हो चुके थे, वे भी स्वर्गद्वार की ओर बढ़ते राघव के पीछे चले।
श्लोक 151 (skanda.2.185.151)
यानि पश्यंति काकुत्स्थं स्थावराणि चराणि च सत्त्वानि स्वर्गगमने मतिं कुर्वंति तान्यपि
yāni paśyaṁti kākutsthaṁ sthāvarāṇi carāṇi ca sattvāni svargagamane matiṁ kurvaṁti tānyapi
जो भी चर-अचर प्राणी काकुत्स्थ को देखते, वे भी स्वर्ग जाने का निश्चय कर लेते।
श्लोक 152 (skanda.2.185.152)
नासीत्सत्त्वमयोध्यायां सुसूक्ष्ममपि किंचन यद्राघवं नानुयाति स्वर्गद्वारमुपस्थितम्
nāsītsattvamayodhyāyāṁ susūkṣmamapi kiṁcana yadrāghavaṁ nānuyāti svargadvāramupasthitam
अयोध्या में कोई भी प्राणी, चाहे कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो, ऐसा नहीं था जो स्वर्गद्वार की ओर बढ़ते राघव के पीछे न चला हो।
श्लोक 153 (skanda.2.185.153)
अथार्द्धयोजनं गत्वा नदीं पश्चान्मुखो ययौ सरयूं पुण्यसलिलां ददर्श रघुनंदनः
athārddhayojanaṁ gatvā nadīṁ paścānmukho yayau sarayūṁ puṇyasalilāṁ dadarśa raghunaṁdanaḥ
तब आधा योजन जाकर, पश्चिममुख होकर, रघुनन्दन ने पवित्र जल वाली सरयू नदी को देखा।
श्लोक 154 (skanda.2.185.154)
अथ तस्मिन्मुहूर्ते तु ब्रह्मा लोकपितामहः सर्वैः परिवृतो देवैर्ऋषिभिश्च महात्मभिः आययौ तत्र काकुत्स्थं स्वर्गद्वारमुपस्थितम्
atha tasminmuhūrte tu brahmā lokapitāmahaḥ sarvaiḥ parivṛto devairṛṣibhiśca mahātmabhiḥ āyayau tatra kākutsthaṁ svargadvāramupasthitam
तभी उसी क्षण लोकपितामह ब्रह्मा, समस्त देवताओं तथा महात्मा ऋषियों से घिरे हुए, स्वर्गद्वार पहुँचे काकुत्स्थ के पास वहाँ आए,
श्लोक 155 (skanda.2.185.155)
विमानशतकोटीभिर्दिव्याभिः सर्वतो वृतः दीपयन्सर्वतो व्योम ज्योतिर्भूतमनुत्तमम्
vimānaśatakoṭībhirdivyābhiḥ sarvato vṛtaḥ dīpayansarvato vyoma jyotirbhūtamanuttamam
सैकड़ों करोड़ दिव्य विमानों से चारों ओर घिरे हुए, समस्त आकाश को अनुपम ज्योतिर्मय रूप से आलोकित करते हुए।
श्लोक 156 (skanda.2.185.156)
स्वयंप्रभैश्च तेजोभिर्महद्भिः पुण्यकर्मभिः पुण्या वाता ववुस्तत्र गन्धवंतः सुखप्रदाः
svayaṁprabhaiśca tejobhirmahadbhiḥ puṇyakarmabhiḥ puṇyā vātā vavustatra gandhavaṁtaḥ sukhapradāḥ
पुण्यकर्मियों के स्वयंप्रभ महान् तेज से वहाँ पवित्र, सुगन्धित, सुखदायी वायु बहने लगी,
श्लोक 157 (skanda.2.185.157)
सपुण्यपुष्पवर्षं च वायुयुक्तं महाजवम् गन्धर्वैरप्सरोभिश्च तस्मिन्सूर्यउपस्थितः
sapuṇyapuṣpavarṣaṁ ca vāyuyuktaṁ mahājavam gandharvairapsarobhiśca tasminsūryaupasthitaḥ
वेगयुक्त वायु के साथ पुण्य पुष्पों की वर्षा हुई; वहाँ गन्धर्वों तथा अप्सराओं सहित सूर्य भी उपस्थित थे।
श्लोक 158 (skanda.2.185.158)
शरयूसलिलं रामः पद्भ्यां स समुपास्पृशत् ततो ब्रह्मा सुरैर्युक्तः स्तोतुं समुपचक्रमे
śarayūsalilaṁ rāmaḥ padbhyāṁ sa samupāspṛśat tato brahmā surairyuktaḥ stotuṁ samupacakrame
राम ने सरयू के जल का चरणों से स्पर्श किया; तब ब्रह्मा ने देवताओं सहित स्तुति करना आरम्भ किया।
श्लोक 159 (skanda.2.185.159)
त्वं हि लोकपतिर्देव न त्वां जानाति कश्चन अहं ते वै विशालाक्ष भूतपूर्वपरिग्रहः
tvaṁ hi lokapatirdeva na tvāṁ jānāti kaścana ahaṁ te vai viśālākṣa bhūtapūrvaparigrahaḥ
'आप ही लोकपति हैं, हे देव; कोई आपको [पूर्णतः] नहीं जानता; हे विशालाक्ष, मैं भी पहले आपकी ही सृष्टि हूँ।'
श्लोक 160 (skanda.2.185.160)
त्वमचिंत्यं महद्भूतमक्षयं लोकसंग्रहे यामिच्छसि महावीर्य तां तनुं प्रविश स्वकाम्
tvamaciṁtyaṁ mahadbhūtamakṣayaṁ lokasaṁgrahe yāmicchasi mahāvīrya tāṁ tanuṁ praviśa svakām
'आप अचिन्त्य, महाभूत, अक्षय हैं, जगत् की रक्षा के लिए [शरीर धारण किया है]; हे महावीर्य, अब आप अपने अभीष्ट स्वरूप में प्रवेश करें।'
श्लोक 161 (skanda.2.185.161)
पितामहस्य वचनादिदमेवाविशत्स्वयम् सुदिव्यं वैष्णवं तेजः संसारं स सहानुजः ततो विष्णुतनुन्देवाः पूजयन्तः सुरोत्तमम्
pitāmahasya vacanādidamevāviśatsvayam sudivyaṁ vaiṣṇavaṁ tejaḥ saṁsāraṁ sa sahānujaḥ tato viṣṇutanundevāḥ pūjayantaḥ surottamam
पितामह के इस वचन से वे स्वयं अपने छोटे भाइयों सहित उस परम दिव्य वैष्णव तेज में प्रविष्ट हो गए; तब देवता उस सर्वश्रेष्ठ विष्णु-देह की पूजा करने लगे।
श्लोक 162 (skanda.2.185.162)
साध्या मरुद्गणाश्चैव सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ये च दिव्या ऋषिगणा गन्धर्वाप्सरसस्तथा सुपर्णा नागयक्षाश्च दैत्यदानवराक्षसाः
sādhyā marudgaṇāścaiva sendrāḥ sāgnipurogamāḥ ye ca divyā ṛṣigaṇā gandharvāpsarasastathā suparṇā nāgayakṣāśca daityadānavarākṣasāḥ
साध्य, मरुद्गण, इन्द्र सहित अग्नि आदि, दिव्य ऋषिगण, गन्धर्व, अप्सराएँ, गरुड़, नाग, यक्ष तथा दैत्य-दानव-राक्षस —
श्लोक 163 (skanda.2.185.163)
देवाः प्रहृष्टा मुदिताः सर्वे पूर्णमनोरथाः साधुसाध्विति ते सर्वे त्रिदिवस्था बभाषिरे
devāḥ prahṛṣṭā muditāḥ sarve pūrṇamanorathāḥ sādhusādhviti te sarve tridivasthā babhāṣire
सभी देवता प्रसन्न, हर्षित तथा मनोरथ पूर्ण होकर, स्वर्ग में स्थित सभी ने 'साधु साधु' कहा।
श्लोक 164 (skanda.2.185.164)
अथ विष्णुर्महातेजाः पितामहमुवाच ह एषां लोकं जनौघानां दातुमर्हसि सुव्रत
atha viṣṇurmahātejāḥ pitāmahamuvāca ha eṣāṁ lokaṁ janaughānāṁ dātumarhasi suvrata
तब महातेजस्वी विष्णु ने पितामह से कहा — 'हे सुव्रत, इन लोगों के समूह को एक लोक प्रदान करना उचित है।'
श्लोक 165 (skanda.2.185.165)
इमे तु सर्वे मत्स्नेहादायाताः सर्वमानवाः भक्ताश्च भक्तिमन्तश्च त्यक्तात्मानोऽपि सर्वशः
ime tu sarve matsnehādāyātāḥ sarvamānavāḥ bhaktāśca bhaktimantaśca tyaktātmāno’pi sarvaśaḥ
'ये सभी मनुष्य मेरे स्नेह से आए हैं, भक्त तथा भक्तिमान् हैं, और सभी ने पूर्णतः अपने आपको त्याग दिया है।'
श्लोक 166 (skanda.2.185.166)
तच्छ्रुत्वा विष्णुकथितं सर्वलोकेश्वरोऽब्रवीत् लोकं सन्तानिकं नाम संस्थास्यंति हि मानवाः
tacchrutvā viṣṇukathitaṁ sarvalokeśvaro’bravīt lokaṁ santānikaṁ nāma saṁsthāsyaṁti hi mānavāḥ
विष्णु के इस वचन को सुनकर सर्वलोकेश्वर [ब्रह्मा] ने कहा — 'ये मनुष्य 'सन्तानिक' नामक लोक में निवास करेंगे।'
श्लोक 167 (skanda.2.185.167)
स्वर्गद्वारेऽत्र वै तीर्थे राममेवानुचिन्तयन् प्राणांस्त्यजति भक्त्या वै स संतानं परं लभेत्
svargadvāre’tra vai tīrthe rāmamevānucintayan prāṇāṁstyajati bhaktyā vai sa saṁtānaṁ paraṁ labhet
'इसी स्वर्गद्वार तीर्थ में राम का ही चिन्तन करते हुए जो भक्तिपूर्वक प्राण त्यागता है, वह उस परम सन्तान-लोक को प्राप्त करेगा।'
श्लोक 168 (skanda.2.185.168)
सर्वे संतानिकंनाम ब्रह्मलोकादनन्तरम् वानराश्च स्वकां योनिं राक्षसाश्चापि राक्षसीम्
sarve saṁtānikaṁnāma brahmalokādanantaram vānarāśca svakāṁ yoniṁ rākṣasāścāpi rākṣasīm
'ये सब ब्रह्मलोक के अनन्तर सन्तानिक नामक लोक को जाएँगे; तथा वानर अपनी वानर-योनि को, राक्षस भी अपनी राक्षस-योनि को [प्राप्त होंगे]।'
श्लोक 169 (skanda.2.185.169)
यस्या विनिःसृता ये वै सुरासुरतनूद्भवाः आदित्यतनयश्चैव सुग्रीवः सूर्यमण्डलम्
yasyā viniḥsṛtā ye vai surāsuratanūdbhavāḥ ādityatanayaścaiva sugrīvaḥ sūryamaṇḍalam
'जो देवों तथा असुरों के शरीर से उत्पन्न थे, वे [अपने मूल में जाएँगे]; तथा आदित्यपुत्र सुग्रीव सूर्यमण्डल को,'
श्लोक 170 (skanda.2.185.170)
ऋषयो नागयक्षाश्च प्रयास्यन्ति स्वकारणम् तथा ब्रुवति देवेशे गोप्रतारमुपस्थितम्
ṛṣayo nāgayakṣāśca prayāsyanti svakāraṇam tathā bruvati deveśe gopratāramupasthitam
'ऋषि, नाग तथा यक्ष अपने-अपने मूल कारण को जाएँगे' — देवेश के ऐसा कहते हुए वे गोप्रतार पहुँचे।
श्लोक 171 (skanda.2.185.171)
तज्जलं सरयूं भेजे परिपूर्णं ततो जलम् अवगाह्य जलं सर्वे प्राणांस्त्यक्त्वा प्रहृष्टवत्
tajjalaṁ sarayūṁ bheje paripūrṇaṁ tato jalam avagāhya jalaṁ sarve prāṇāṁstyaktvā prahṛṣṭavat
वह जल सरयू में मिल गया, तब जल पूर्णतया भर गया; उस जल में डुबकी लगाकर सभी ने प्रसन्नतापूर्वक प्राण त्याग दिए,
श्लोक 172 (skanda.2.185.172)
मानुषं देहमुत्सृज्य ते विमानान्यथारुहन् तिर्यग्योनिगता ये च प्रविश्य सरयूं तदा
mānuṣaṁ dehamutsṛjya te vimānānyathāruhan tiryagyonigatā ye ca praviśya sarayūṁ tadā
मानव देह त्यागकर वे विमानों पर आरूढ़ हुए; तथा जो तिर्यक् योनि में थे, वे भी उसी समय सरयू में प्रवेश करके,
श्लोक 173 (skanda.2.185.173)
देहत्यागं च ते तत्र कृत्वा दिव्यवपुर्द्धराः तथान्यान्यपि सत्त्वानि स्थावराणि चराणि च
dehatyāgaṁ ca te tatra kṛtvā divyavapurddharāḥ tathānyānyapi sattvāni sthāvarāṇi carāṇi ca
वहीं देहत्याग करके दिव्य शरीर धारण करने वाले हो गए; इसी प्रकार अन्य भी चर-अचर प्राणी,
श्लोक 174 (skanda.2.185.174)
प्राप्य चोत्तमदेहं वै देवलोकमुपागमन् तस्मिंस्तत्र समापन्ने वानरा ऋक्षराक्षसाः तेऽपि प्रविविशुः सर्वे देहान्निक्षिप्य वै तदा
prāpya cottamadehaṁ vai devalokamupāgaman tasmiṁstatra samāpanne vānarā ṛkṣarākṣasāḥ te’pi praviviśuḥ sarve dehānnikṣipya vai tadā
उत्तम देह पाकर देवलोक को गए; जब वह [रीति] पूर्ण हुई, तब वानर, ऋक्ष तथा राक्षस भी अपने शरीर त्यागकर सभी उसमें प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 175 (skanda.2.185.175)
तदा स्वर्गं गताः सर्वे स्मृत्वा लोकगुरुं विभुम् जगाम त्रिदशैः सार्द्धं रामो हृष्टो महामतिः
tadā svargaṁ gatāḥ sarve smṛtvā lokaguruṁ vibhum jagāma tridaśaiḥ sārddhaṁ rāmo hṛṣṭo mahāmatiḥ
तब सभी के स्वर्ग जाने पर, लोकगुरु विभु का स्मरण करके, हर्षित महामति राम देवताओं सहित चले गए।
श्लोक 176 (skanda.2.185.176)
अतस्तद्गोप्रताराख्यं तीर्थं विख्यातिमागतम् गोप्रतारे परो मोक्षो नान्यतीर्थेषु विद्यते
atastadgopratārākhyaṁ tīrthaṁ vikhyātimāgatam gopratāre paro mokṣo nānyatīrtheṣu vidyate
इसीलिए वह गोप्रतार नामक तीर्थ विख्यात हुआ; गोप्रतार में जो परम मोक्ष है, वह अन्य किसी तीर्थ में नहीं है।
श्लोक 177 (skanda.2.185.177)
जन्मान्तरशतैर्विप्र योगोऽयं यदि लभ्यते मुक्तिर्भवति तत्त्वेकजन्मना लभ्यते न वा
janmāntaraśatairvipra yogo’yaṁ yadi labhyate muktirbhavati tattvekajanmanā labhyate na vā
हे विप्र, यह योग सैकड़ों जन्मान्तरों से प्राप्त होता हो तो हो — अन्यत्र एक ही जन्म से यथार्थतः मुक्ति मिलती है या नहीं, यह सन्दिग्ध है।
श्लोक 178 (skanda.2.185.178)
गोप्रतारे न सन्देहो हरिर्भक्त्या सुनिष्ठितः एकेन जन्मनान्योऽपि योगमोक्षं च विन्दति
gopratāre na sandeho harirbhaktyā suniṣṭhitaḥ ekena janmanānyo’pi yogamokṣaṁ ca vindati
गोप्रतार में सन्देह नहीं — भक्ति में सुप्रतिष्ठित मनुष्य एक ही जन्म में योग तथा मोक्ष दोनों पा लेता है।
श्लोक 179 (skanda.2.185.179)
गोप्रतारे नरो विद्वान्योऽपि स्नाति सुनिश्चितः विशत्यसौ परं स्थानं योगिनामपि दुर्लभम्
gopratāre naro vidvānyo’pi snāti suniścitaḥ viśatyasau paraṁ sthānaṁ yogināmapi durlabham
गोप्रतार में जो भी विद्वान् दृढ़ निश्चय से स्नान करता है, वह योगियों के लिए भी दुर्लभ परम स्थान में प्रवेश करता है।
श्लोक 180 (skanda.2.185.180)
कार्तिक्यां च विशेषेण स्नातव्यं विजितेन्द्रियैः कार्तिके मासि विप्रर्षे सर्वे देवाः सवासवाः स्नातुमायान्त्ययोध्यायां गोप्रतारे विशेषतः
kārtikyāṁ ca viśeṣeṇa snātavyaṁ vijitendriyaiḥ kārtike māsi viprarṣe sarve devāḥ savāsavāḥ snātumāyāntyayodhyāyāṁ gopratāre viśeṣataḥ
कार्तिक की पूर्णिमा को विशेष रूप से जितेन्द्रिय मनुष्यों को स्नान करना चाहिए; हे विप्रर्षे, कार्तिक मास में इन्द्र सहित सभी देवता विशेष रूप से गोप्रतार में स्नान करने अयोध्या आते हैं।
श्लोक 181 (skanda.2.185.181)
गोप्रतारसमं तीर्थं न भूतं न भविष्यति यत्र प्रयागराजोऽपि स्नातुमायाति कार्तिके
gopratārasamaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati yatra prayāgarājo’pi snātumāyāti kārtike
गोप्रतार के समान तीर्थ न हुआ है और न होगा, जहाँ कार्तिक में स्वयं तीर्थराज प्रयाग भी स्नान करने आता है,
श्लोक 182 (skanda.2.185.182)
निष्पापः कलुषं त्यक्त्वा शुक्लांगः सितकंचुकः शुद्ध्यर्थं साधुकामोऽसौ प्रयागे मुनिसत्तमः
niṣpāpaḥ kaluṣaṁ tyaktvā śuklāṁgaḥ sitakaṁcukaḥ śuddhyarthaṁ sādhukāmo’sau prayāge munisattamaḥ
निष्पाप होकर, मलिनता त्यागकर, श्वेतांग, श्वेतवस्त्रधारी वह श्रेष्ठ मुनि-रूप प्रयाग शुद्धि तथा साधुत्व की कामना से आता है।
श्लोक 183 (skanda.2.185.183)
यानि कानि च तीर्थानि भूमौ दिव्यानि सुव्रत कार्तिक्यां तानि सर्वाणि गोप्रतारे वसन्ति वै
yāni kāni ca tīrthāni bhūmau divyāni suvrata kārtikyāṁ tāni sarvāṇi gopratāre vasanti vai
हे सुव्रत, पृथ्वी पर जितने भी दिव्य तीर्थ हैं, वे सभी कार्तिक में गोप्रतार में निवास करते हैं।
श्लोक 184 (skanda.2.185.184)
गोप्रतारे जपो होमः स्नानं दानं च शक्तितः सर्वमक्षयतां याति श्रद्धया नियमव्रतम्
gopratāre japo homaḥ snānaṁ dānaṁ ca śaktitaḥ sarvamakṣayatāṁ yāti śraddhayā niyamavratam
गोप्रतार में यथाशक्ति जप, होम, स्नान तथा दान श्रद्धा तथा नियम-व्रत सहित करने से सब अक्षय हो जाता है।
श्लोक 185 (skanda.2.185.185)
कार्तिके प्राप्य तद्यन्ति तीर्थानि सकलान्यपि गोप्रतारं गमिष्यामः पापं त्यक्तुमितीच्छया
kārtike prāpya tadyanti tīrthāni sakalānyapi gopratāraṁ gamiṣyāmaḥ pāpaṁ tyaktumitīcchayā
कार्तिक में पहुँचकर सभी तीर्थ भी वहाँ जाते हैं, [यह कहते हुए] 'हम पाप त्यागने की इच्छा से गोप्रतार जाएँगे।'
श्लोक 186 (skanda.2.185.186)
गोप्रतारे कृतं स्नानं सर्वपापप्रणाशनम् गोप्रतारे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा गुप्तहरिं विभुम् सर्वपापैः प्रमुच्येत नात्र कार्या विचारणा
gopratāre kṛtaṁ snānaṁ sarvapāpapraṇāśanam gopratāre naraḥ snātvā dṛṣṭvā guptahariṁ vibhum sarvapāpaiḥ pramucyeta nātra kāryā vicāraṇā
गोप्रतार में किया गया स्नान समस्त पापों का नाशक है; गोप्रतार में स्नान करके तथा विभु गुप्तहरि का दर्शन करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है — इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 187 (skanda.2.185.187)
विष्णुमुद्दिश्य विप्राणां पूजनं च विशेषतः कर्त्तव्यं श्रद्धया युक्तैः स्नानपूर्वं यतव्रतैः
viṣṇumuddiśya viprāṇāṁ pūjanaṁ ca viśeṣataḥ karttavyaṁ śraddhayā yuktaiḥ snānapūrvaṁ yatavrataiḥ
विष्णु के उद्देश्य से विशेष रूप से ब्राह्मणों का पूजन, स्नानपूर्वक, नियमव्रती श्रद्धालु जनों को करना चाहिए।
श्लोक 188 (skanda.2.185.188)
पयस्विनी च गौर्देया सालंकारा च शक्तितः विप्राय वेदविदुषे नियमव्रतशालिने ब्राह्मणायातिशुचये विष्णुप्रीत्यै यतात्मना
payasvinī ca gaurdeyā sālaṁkārā ca śaktitaḥ viprāya vedaviduṣe niyamavrataśāline brāhmaṇāyātiśucaye viṣṇuprītyai yatātmanā
वेदज्ञ, नियम-व्रत में शोभित, अत्यन्त पवित्र ब्राह्मण को विष्णु की प्रसन्नता के लिए संयमपूर्वक अपनी शक्ति के अनुसार आभूषण-सज्जित दुधारू गौ देनी चाहिए।
श्लोक 189 (skanda.2.185.189)
अन्नं बहुविधं हेम वासांसि विविधानि च दातव्यानि हरेः प्राप्त्यै भक्त्या परमया युतैः
annaṁ bahuvidhaṁ hema vāsāṁsi vividhāni ca dātavyāni hareḥ prāptyai bhaktyā paramayā yutaiḥ
नाना प्रकार का अन्न, सुवर्ण तथा विविध वस्त्र, परम भक्ति से युक्त जनों द्वारा हरि की प्राप्ति के लिए दिए जाने चाहिए।
श्लोक 190 (skanda.2.185.190)
सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे नर्मदायां शशिग्रहे तुलादानस्य यत्पुण्यं तदत्र दीपदानतः
sūryagrahe kurukṣetre narmadāyāṁ śaśigrahe tulādānasya yatpuṇyaṁ tadatra dīpadānataḥ
कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय अथवा नर्मदा में चन्द्रग्रहण के समय तुलादान से जो पुण्य होता है, वही यहाँ दीपदान से प्राप्त होता है।
श्लोक 191 (skanda.2.185.191)
घृतेन दीपको यस्य तिलतैले न वा पुनः ज्वलते मुनिशार्दूल हयमेधेन तस्य किम्
ghṛtena dīpako yasya tilataile na vā punaḥ jvalate muniśārdūla hayamedhena tasya kim
हे मुनिशार्दूल, जिसका दीपक घी से अथवा तिल के तेल से जलता है, उसे अश्वमेध यज्ञ से क्या प्रयोजन?
श्लोक 192 (skanda.2.185.192)
तेनेष्टं क्रतुभिः सर्वैः कृतं तीर्थावगाहनम् दीपदानं कृतं येन कार्त्तिके केशवाग्रतः
teneṣṭaṁ kratubhiḥ sarvaiḥ kṛtaṁ tīrthāvagāhanam dīpadānaṁ kṛtaṁ yena kārttike keśavāgrataḥ
जिसने कार्तिक में केशव के समक्ष दीपदान किया है, उसने सभी यज्ञों से प्राप्त फल तथा सभी तीर्थों में स्नान का फल प्राप्त कर लिया है।
श्लोक 193 (skanda.2.185.193)
नानाविधानि तीर्थानि भुक्तिमुक्तिप्रदानि च गोप्रतारस्य तान्यत्र कलां नार्हंति षोडशीम्
nānāvidhāni tīrthāni bhuktimuktipradāni ca gopratārasya tānyatra kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm
भोग तथा मोक्ष देने वाले नाना तीर्थ यहाँ गोप्रतार के सोलहवें अंश के भी योग्य नहीं हैं।
श्लोक 194 (skanda.2.185.194)
स्वर्णमल्पं च यो दद्याद्ब्राह्मणे वेदपारगे शुभां गतिमवाप्नोति ह्यग्निवच्चैव दीप्यते
svarṇamalpaṁ ca yo dadyādbrāhmaṇe vedapārage śubhāṁ gatimavāpnoti hyagnivaccaiva dīpyate
जो वेदपारगामी ब्राह्मण को थोड़ा भी स्वर्ण देता है, वह शुभ गति को प्राप्त होता है तथा अग्नि के समान तेजस्वी होता है।
श्लोक 195 (skanda.2.185.195)
गोप्रताराभिधे तीर्थे त्रिलोकीविश्रुते द्विज दत्त्वान्नं च विधानेन न स भूयोऽभिजायते
gopratārābhidhe tīrthe trilokīviśrute dvija dattvānnaṁ ca vidhānena na sa bhūyo’bhijāyate
हे द्विज, त्रिलोकीविख्यात गोप्रतार नामक तीर्थ में विधिपूर्वक अन्नदान करके मनुष्य पुनः जन्म नहीं लेता।
श्लोक 196 (skanda.2.185.196)
तत्र स्नानं तु यः कुर्याद्विप्रान्संतर्पयेन्नरः सौत्रामणेश्च यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः
tatra snānaṁ tu yaḥ kuryādviprānsaṁtarpayennaraḥ sautrāmaṇeśca yajñasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ
जो वहाँ स्नान करके ब्राह्मणों को तृप्त करता है, वह मनुष्य सौत्रामणि यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 197 (skanda.2.185.197)
एकाहारस्तु यस्तिष्ठेन्मासं तत्र यतव्रतः यावज्जीवकृतं पापं सहसा तस्य नश्यति
ekāhārastu yastiṣṭhenmāsaṁ tatra yatavrataḥ yāvajjīvakṛtaṁ pāpaṁ sahasā tasya naśyati
जो व्रतधारी वहाँ एक मास तक एकाहारी रहकर निवास करता है, उसका आजीवन किया पाप तत्काल नष्ट हो जाता है।
श्लोक 198 (skanda.2.185.198)
अग्निप्रवेशं ये कुर्युर्गोप्रतारे विधानतः ते विशंति पदं विष्णोर्निःसंदग्धं तपोधन
agnipraveśaṁ ye kuryurgopratāre vidhānataḥ te viśaṁti padaṁ viṣṇorniḥsaṁdagdhaṁ tapodhana
हे तपोधन, जो विधिपूर्वक गोप्रतार में अग्नि-प्रवेश करते हैं, वे बिना जले विष्णु के पद में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 199 (skanda.2.185.199)
कुर्वंत्यनशनं येऽत्र विष्णुभक्त्या सुनिश्चिताः न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि
kurvaṁtyanaśanaṁ ye’tra viṣṇubhaktyā suniścitāḥ na teṣāṁ punarāvṛttiḥ kalpakoṭiśatairapi
जो विष्णुभक्ति में दृढ़निश्चय होकर यहाँ अनशन करते हैं, उनका सैकड़ों करोड़ कल्पों तक भी पुनरागमन नहीं होता।
श्लोक 200 (skanda.2.185.200)
अर्चयेद्यस्तु गोविंदं गोप्रतारे हि मानवः दशसौवर्णिकं पुण्यं गोप्रतारे प्रकथ्यते
arcayedyastu goviṁdaṁ gopratāre hi mānavaḥ daśasauvarṇikaṁ puṇyaṁ gopratāre prakathyate
जो मनुष्य गोप्रतार में गोविन्द की अर्चना करता है, गोप्रतार में उसके लिए दस स्वर्ण-दान के बराबर पुण्य कहा गया है।
श्लोक 201 (skanda.2.185.201)
अग्निहोत्रफलो धूपो गोविंदस्य समर्पितः भूमिदानेन सदृशं गंधदानफलं स्मृतम्
agnihotraphalo dhūpo goviṁdasya samarpitaḥ bhūmidānena sadṛśaṁ gaṁdhadānaphalaṁ smṛtam
गोविन्द को समर्पित धूप का फल अग्निहोत्र के समान है; गन्धदान का फल भूमिदान के समान स्मृत है।
श्लोक 202 (skanda.2.185.202)
अत्यद्भुतमिदं विद्वन्स्थानमेतत्प्रकीर्तितम् कार्त्तिक्यां तु विशेषेण अत्र स्नात्वा शुचिव्रतः
atyadbhutamidaṁ vidvansthānametatprakīrtitam kārttikyāṁ tu viśeṣeṇa atra snātvā śucivrataḥ
हे विद्वन्, यह स्थान अत्यन्त अद्भुत कहा गया है; विशेष रूप से कार्तिक में यहाँ स्नान करके शुद्धव्रती मनुष्य,
श्लोक 203 (skanda.2.185.203)
स्वर्गद्वारे नरः स्नात्वा दशस्वर्णफलं लभेत् स्वर्णदः स्वर्गवासी च यो दद्याच्छ्रद्धयान्वितः
svargadvāre naraḥ snātvā daśasvarṇaphalaṁ labhet svarṇadaḥ svargavāsī ca yo dadyācchraddhayānvitaḥ
स्वर्गद्वार में स्नान करके मनुष्य दस स्वर्ण-दान का फल पाता है; तथा जो श्रद्धायुक्त होकर स्वर्ण देता है, वह स्वर्गवासी होता है।
श्लोक 204 (skanda.2.185.204)
सुतीर्थे पर्वणि श्रेष्ठे दशस्वर्णफलप्रदे ज्येष्ठशुक्लचतुर्दश्यां रात्रौ जागरणं चरेत्
sutīrthe parvaṇi śreṣṭhe daśasvarṇaphalaprade jyeṣṭhaśuklacaturdaśyāṁ rātrau jāgaraṇaṁ caret
दस स्वर्ण-दान का फल देने वाले इस श्रेष्ठ तीर्थ में, श्रेष्ठ पर्व पर, ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी की रात्रि में जागरण करना चाहिए।
श्लोक 205 (skanda.2.185.205)
उपोषितः शुचिः स्नातो विष्णुपूजनतत्परः दीपं दद्यात्प्रयत्नेन नानाफलविधायिनम्
upoṣitaḥ śuciḥ snāto viṣṇupūjanatatparaḥ dīpaṁ dadyātprayatnena nānāphalavidhāyinam
उपवास करके, पवित्र होकर, स्नान करके, विष्णु-पूजन में तत्पर होकर, नाना फल देने वाला दीप यत्नपूर्वक देना चाहिए।
श्लोक 206 (skanda.2.185.206)
तावद्गर्जंति पुण्यानि स्वर्गे मर्त्ये रसातले यावद्दद्याज्जले दीपं कार्त्तिके केशवाग्रतः
tāvadgarjaṁti puṇyāni svarge martye rasātale yāvaddadyājjale dīpaṁ kārttike keśavāgrataḥ
जब तक कार्तिक में केशव के समक्ष जल में दीप दिया जाता है, तब तक स्वर्ग, मृत्युलोक तथा रसातल में पुण्य गूंजते रहते हैं।
श्लोक 207 (skanda.2.185.207)
पौर्णमास्यां प्रभाते तु स्नात्वा निर्मलमानसः हरिं संपूज्य विधिवद्विधाय श्राद्धमादरात्
paurṇamāsyāṁ prabhāte tu snātvā nirmalamānasaḥ hariṁ saṁpūjya vidhivadvidhāya śrāddhamādarāt
पूर्णिमा के प्रभात में निर्मल मन से स्नान करके, विधिपूर्वक हरि की पूजा करके तथा आदरपूर्वक श्राद्ध करके,
श्लोक 208 (skanda.2.185.208)
दत्त्वान्नं च यथाशक्त्या संतोष्य ब्राह्मणांस्ततः वस्त्रादिभिरलंकारैः संपूज्य द्विजदंपती
dattvānnaṁ ca yathāśaktyā saṁtoṣya brāhmaṇāṁstataḥ vastrādibhiralaṁkāraiḥ saṁpūjya dvijadaṁpatī
यथाशक्ति अन्न देकर ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करके, तथा वस्त्र आदि आभूषणों से द्विज-दम्पती की पूजा करके,
श्लोक 209 (skanda.2.185.209)
विभुं गुप्तहरिं दृष्ट्वा संपूज्य तु विशेषतः नमस्कृत्यानु तत्तीर्थं शुचिस्तद्गतमानसः
vibhuṁ guptahariṁ dṛṣṭvā saṁpūjya tu viśeṣataḥ namaskṛtyānu tattīrthaṁ śucistadgatamānasaḥ
विभु गुप्तहरि का दर्शन तथा विशेष रूप से पूजन करके, फिर उस तीर्थ को नमस्कार करके, पवित्र होकर, मन को वहीं लगाकर,
श्लोक 210 (skanda.2.185.210)
स्वर्गद्वारे च विधिवन्मध्याह्ने स्नानमाचरेत् सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोके महीयते
svargadvāre ca vidhivanmadhyāhne snānamācaret sarvapāpaviśuddhātmā viṣṇuloke mahīyate
स्वर्गद्वार में विधिपूर्वक मध्याह्न में स्नान करना चाहिए; इससे मनुष्य समस्त पापों से शुद्धात्मा होकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।
श्लोक 211 (skanda.2.185.211)
इति परमविधानैर्गोप्रतारे विधाय प्रथितसुकृतमूर्त्तिः स्नानमुच्चैः प्रयत्नात् कलितनिखिलपापः पूजयित्वादरेणाच्युतममलविकाशो विष्णुसायुज्यमेति
iti paramavidhānairgopratāre vidhāya prathitasukṛtamūrttiḥ snānamuccaiḥ prayatnāt kalitanikhilapāpaḥ pūjayitvādareṇācyutamamalavikāśo viṣṇusāyujyameti
इस प्रकार परम विधानों से गोप्रतार में अत्यन्त यत्नपूर्वक स्नान करके, प्रसिद्ध पुण्यमूर्ति बना हुआ, समस्त पापों को समेटकर आदरपूर्वक अच्युत की पूजा करके, निर्मल विकास वाला मनुष्य विष्णु के साथ सायुज्य को प्राप्त होता है।