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वैष्णव खण्ड · अध्याय 188

गयाकूप-पिशाचमोचन-मानसतीर्थ-तमसानदी-माण्डव्याद्याश्रम-सीताकुण्ड-दुग्धेश्वर-भैरव-भरतकुण्ड-जटाकुण्ड-माहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 187अध्याय-सूचीअध्याय 189

श्लोक 1 (skanda.2.188.1)

अगस्त्य उवाच जटाकुण्डत आग्नेयदिग्दल संश्रितं महत् गयाकूपमिति ख्यातं सर्वाभीष्टफलप्रदम्

agastya uvāca jaṭākuṇḍata āgneyadigdala saṁśritaṁ mahat gayākūpamiti khyātaṁ sarvābhīṣṭaphalapradam

अगस्त्य ने कहा — जटाकुण्ड से आग्नेय दिशा में आश्रित, सभी अभीष्ट फल देने वाला महान् तीर्थ 'गयाकूप' नाम से विख्यात है,

श्लोक 2 (skanda.2.188.2)

यत्र स्नात्वा च दत्त्वा च यथाशक्त्या जितेंद्रियः सर्वकाममवाप्नोति श्राद्धं कृत्वा द्विजोत्तमः

yatra snātvā ca dattvā ca yathāśaktyā jiteṁdriyaḥ sarvakāmamavāpnoti śrāddhaṁ kṛtvā dvijottamaḥ

जहाँ स्नान करके, अपनी शक्ति के अनुसार दान देकर, जितेन्द्रिय होकर श्राद्ध करके श्रेष्ठ द्विज सभी कामनाओं को प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (skanda.2.188.3)

नरकस्थाश्च ये केचित्पितरश्च पितामहाः विष्णुलोके तु गच्छन्ति तस्मिञ्च्छ्राद्धे कृते तु वै

narakasthāśca ye kecitpitaraśca pitāmahāḥ viṣṇuloke tu gacchanti tasmiñcchrāddhe kṛte tu vai

नरक में स्थित जो भी पितर तथा पितामह हों, वे उस तीर्थ में श्राद्ध किए जाने पर विष्णुलोक को जाते हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.188.4)

तस्मिञ्छ्राद्धे कृते विप्र पितॄणामनृणो भवेत् शक्तिभिः पिंडदानं तु सयवैः पायसेन च

tasmiñchrāddhe kṛte vipra pitṝṇāmanṛṇo bhavet śaktibhiḥ piṁḍadānaṁ tu sayavaiḥ pāyasena ca

हे विप्र, वहाँ श्राद्ध करने से मनुष्य पितरों से ऋणमुक्त हो जाता है; अपनी सामर्थ्य के अनुसार यव तथा पायस सहित पिण्डदान,

श्लोक 5 (skanda.2.188.5)

कर्त्तव्यमृषिनिर्दिष्टं पिण्याकेन गुडेन वा श्राद्धं तत्तीर्थके प्रोक्तं पितॄणां तुष्टिकारकम्

karttavyamṛṣinirdiṣṭaṁ piṇyākena guḍena vā śrāddhaṁ tattīrthake proktaṁ pitṝṇāṁ tuṣṭikārakam

ऋषियों द्वारा निर्दिष्ट विधि से पिन्याक (खली) अथवा गुड़ से करना चाहिए; उस तीर्थ में यह श्राद्ध पितरों को सन्तुष्ट करने वाला कहा गया है।

श्लोक 6 (skanda.2.188.6)

तत्र श्राद्धं प्रकर्त्तव्यं नरैः श्रद्धासमन्वितैः तुष्यंति पितरस्तेषां तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः

tatra śrāddhaṁ prakarttavyaṁ naraiḥ śraddhāsamanvitaiḥ tuṣyaṁti pitarasteṣāṁ tuṣṭāḥ syuḥ sarvadevatāḥ

वहाँ श्रद्धायुक्त मनुष्यों द्वारा श्राद्ध करना चाहिए; इससे उनके पितर सन्तुष्ट होते हैं तथा सभी देवता सन्तुष्ट होते हैं।

श्लोक 7 (skanda.2.188.7)

तुष्टेषु पितृषु श्रीमाञ्जायतेपुत्रवाँस्तथा श्राद्धेन पितरस्तुष्टाः प्रयच्छंति सुतान्बहून्

tuṣṭeṣu pitṛṣu śrīmāñjāyateputravā~stathā śrāddhena pitarastuṣṭāḥ prayacchaṁti sutānbahūn

पितरों के सन्तुष्ट होने पर मनुष्य श्रीमान् तथा पुत्रवान् होता है; श्राद्ध से सन्तुष्ट हुए पितर बहुत पुत्र देते हैं,

श्लोक 8 (skanda.2.188.8)

श्रियं च विपुलान्भोगाञ्छ्राद्धकृद्भयो न संशयः तस्मादत्र विधानेन विधातव्यं प्रयत्नतः

śriyaṁ ca vipulānbhogāñchrāddhakṛdbhayo na saṁśayaḥ tasmādatra vidhānena vidhātavyaṁ prayatnataḥ

तथा श्राद्धकर्ता को श्री तथा विपुल भोग भी देते हैं — इसमें सन्देह नहीं; इसलिए यहाँ विधिपूर्वक यत्नपूर्वक यह करना चाहिए।

श्लोक 9 (skanda.2.188.9)

श्राद्धं श्रद्धायुतैः सम्यगभीष्टफलकांक्षिभिः गयाकूपे विशेषेण पितॄणां दत्तमक्षयम्

śrāddhaṁ śraddhāyutaiḥ samyagabhīṣṭaphalakāṁkṣibhiḥ gayākūpe viśeṣeṇa pitṝṇāṁ dattamakṣayam

श्रद्धायुक्त, अभीष्ट फल चाहने वालों द्वारा भलीभाँति किया गया श्राद्ध गयाकूप में विशेष रूप से पितरों को अक्षय रूप से प्राप्त होता है।

श्लोक 10 (skanda.2.188.10)

सोमवारेण संयुक्ता अमावास्या यदा भवेत् तत्रानंतफलं श्राद्धं पितॄणां दत्तमक्षयम्

somavāreṇa saṁyuktā amāvāsyā yadā bhavet tatrānaṁtaphalaṁ śrāddhaṁ pitṝṇāṁ dattamakṣayam

जब सोमवार से युक्त अमावस्या हो, तब वहाँ पितरों को दिया गया श्राद्ध अनन्त तथा अक्षय फल देने वाला होता है।

श्लोक 11 (skanda.2.188.11)

अन्यदा सोमवारेण तत्र श्राद्धं विधानतः पितृसंतोषदं नित्यं तत्र दत्ताक्षयो भवेत्

anyadā somavāreṇa tatra śrāddhaṁ vidhānataḥ pitṛsaṁtoṣadaṁ nityaṁ tatra dattākṣayo bhavet

अन्य समय में भी सोमवार को वहाँ विधिपूर्वक श्राद्ध, जो पितरों को सदा सन्तोष देने वाला है, वहाँ दिया गया अक्षय होता है।

श्लोक 12 (skanda.2.188.12)

तत्र पूर्वदिशाभागे तीर्थं सर्वोत्तमोत्तमम् पिशाचमोचनंनाम विद्यते च फलप्रदम्

tatra pūrvadiśābhāge tīrthaṁ sarvottamottamam piśācamocanaṁnāma vidyate ca phalapradam

वहाँ पूर्व दिशा में समस्त तीर्थों में सर्वोत्तम, फलदायी 'पिशाचमोचन' नामक तीर्थ विद्यमान है,

श्लोक 13 (skanda.2.188.13)

तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च पिशाचो नैव जायते तत्र स्नानं तथा दानं श्राद्धं चैव विशेषतः कर्त्तव्यं च प्रयत्नेन नरैः श्रद्धासमन्वितैः

tatra snātvā ca dattvā ca piśāco naiva jāyate tatra snānaṁ tathā dānaṁ śrāddhaṁ caiva viśeṣataḥ karttavyaṁ ca prayatnena naraiḥ śraddhāsamanvitaiḥ

जहाँ स्नान तथा दान करने से मनुष्य पिशाच योनि को प्राप्त नहीं होता; वहाँ श्रद्धायुक्त मनुष्यों को विशेष रूप से स्नान, दान तथा श्राद्ध यत्नपूर्वक करना चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.2.188.14)

मार्गशीर्षे शुक्लपक्षे चतुर्दश्यां विशेषतः स्नानं तत्र प्रकर्त्तव्यं पिशाचत्वविमुक्तये

mārgaśīrṣe śuklapakṣe caturdaśyāṁ viśeṣataḥ snānaṁ tatra prakarttavyaṁ piśācatvavimuktaye

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को विशेष रूप से वहाँ पिशाचत्व से मुक्ति के लिए स्नान करना चाहिए।

श्लोक 15 (skanda.2.188.15)

तत्संनिधौ पूर्वभागे मानसंनाम नामतः तीर्थं पुण्यनिवासाग्र्यं स्नातव्यं च विशेषतः तत्र स्नानेन दानेन सर्वान्कामानवाप्नुयात्

tatsaṁnidhau pūrvabhāge mānasaṁnāma nāmataḥ tīrthaṁ puṇyanivāsāgryaṁ snātavyaṁ ca viśeṣataḥ tatra snānena dānena sarvānkāmānavāpnuyāt

उसके समीप पूर्व भाग में 'मानस' नामक, पुण्य के निवास में अग्रणी तीर्थ है; वहाँ विशेष रूप से स्नान करना चाहिए; वहाँ स्नान तथा दान से मनुष्य सभी कामनाओं को प्राप्त करता है।

श्लोक 16 (skanda.2.188.16)

नानाविधानि पापानि मेरुतुल्यानि वै पुनः तत्र स्नानात्क्षयं यांति नात्र कार्या विचारणा

nānāvidhāni pāpāni merutulyāni vai punaḥ tatra snānātkṣayaṁ yāṁti nātra kāryā vicāraṇā

मेरु पर्वत के समान विशाल नाना पाप भी वहाँ स्नान से क्षय को प्राप्त हो जाते हैं — इसमें विचार नहीं करना चाहिए।

श्लोक 17 (skanda.2.188.17)

यत्किञ्चिद्विद्यते पापं मानसं कायिकं तथा वाचिकं च तथा पापं स्नानतो विलयं व्रजेत्

yatkiñcidvidyate pāpaṁ mānasaṁ kāyikaṁ tathā vācikaṁ ca tathā pāpaṁ snānato vilayaṁ vrajet

जो भी पाप विद्यमान हो — मानसिक, शारीरिक अथवा वाचिक — वह स्नान से विलीन हो जाता है।

श्लोक 18 (skanda.2.188.18)

प्रौष्ठपद्यां सदा कार्य्या पौर्णमास्यां विशेषतः यात्रा तस्य नृभिर्विप्र पुण्यवद्भिः क्रियापरैः

prauṣṭhapadyāṁ sadā kāryyā paurṇamāsyāṁ viśeṣataḥ yātrā tasya nṛbhirvipra puṇyavadbhiḥ kriyāparaiḥ

प्रौष्ठपदी (भाद्रपद) पूर्णिमा को विशेष रूप से उसकी यात्रा पुण्यशील, क्रियापरायण मनुष्यों द्वारा सदा करनी चाहिए।

श्लोक 19 (skanda.2.188.19)

तस्माद्दक्षिणदिग्भागे वर्त्तते सुकृतैकभूः तमसानाम तटिनी महापातकनाशिनी

tasmāddakṣiṇadigbhāge varttate sukṛtaikabhūḥ tamasānāma taṭinī mahāpātakanāśinī

उससे दक्षिण दिशा में महापातकों की नाशक, पुण्य की एकमात्र भूमि तमसा नामक नदी है,

श्लोक 20 (skanda.2.188.20)

यत्र स्नानं तथा दानं सर्वपापहरं सदा यस्यास्तटे तथा रम्ये सर्वदा फलदायके

yatra snānaṁ tathā dānaṁ sarvapāpaharaṁ sadā yasyāstaṭe tathā ramye sarvadā phaladāyake

जहाँ स्नान तथा दान सदा समस्त पापों का हरण करने वाले हैं, तथा जिसके रमणीय तट पर सदा फल देने वाले,

श्लोक 21 (skanda.2.188.21)

नानाविधानि स्थानानि मुनीनां भावितात्मनाम् माण्डव्यस्य मुनेः स्थानं वर्त्तते पापनाशनम्

nānāvidhāni sthānāni munīnāṁ bhāvitātmanām māṇḍavyasya muneḥ sthānaṁ varttate pāpanāśanam

भावितात्मा मुनियों के नाना स्थान हैं; वहाँ पाप का नाश करने वाला मुनि माण्डव्य का स्थान है,

श्लोक 22 (skanda.2.188.22)

यस्यास्तीरे मुनिश्रेष्ठ सर्वत्र सुमनोहरम् तस्याश्रमपदं रम्यं नानावृक्षमनोहरम्

yasyāstīre muniśreṣṭha sarvatra sumanoharam tasyāśramapadaṁ ramyaṁ nānāvṛkṣamanoharam

जिसके तट पर, हे मुनिश्रेष्ठ, सर्वत्र अत्यन्त मनोहर, नाना वृक्षों से मनोहर उनका रमणीय आश्रमपद है,

श्लोक 23 (skanda.2.188.23)

यस्मात्स्थानात्समुद्भूता तमसा सुतरंगिणी तद्वनं पुण्यमधिकं पावनं पदमुत्तमम्

yasmātsthānātsamudbhūtā tamasā sutaraṁgiṇī tadvanaṁ puṇyamadhikaṁ pāvanaṁ padamuttamam

जिस स्थान से सुन्दर तरंगों वाली तमसा उत्पन्न हुई, वह अत्यन्त पुण्यमय, पावन, उत्तम पद वाला वन है,

श्लोक 24 (skanda.2.188.24)

यस्य दर्शनतो नॄणां सर्वपापक्षयो भवेत्

yasya darśanato nṝṇāṁ sarvapāpakṣayo bhavet

जिसके दर्शन से मनुष्यों के समस्त पापों का क्षय हो जाता है।

श्लोक 25 (skanda.2.188.25)

प्रफुल्लनानाविधगुल्मशोभितं लताप्रतानावनतं मनोहरम् विरूढपुष्पैः परितः प्रियंगुभिः सुषुष्पितैः कण्टकितैश्च केतकैः

praphullanānāvidhagulmaśobhitaṁ latāpratānāvanataṁ manoharam virūḍhapuṣpaiḥ paritaḥ priyaṁgubhiḥ suṣuṣpitaiḥ kaṇṭakitaiśca ketakaiḥ

नाना प्रकार के खिले हुए झाड़ियों से सुशोभित, लताओं के विस्तार से झुका हुआ, मनोहर, चारों ओर खिले प्रियंगु पुष्पों से, तथा खिले हुए कण्टकीय केतकियों से युक्त,

श्लोक 26 (skanda.2.188.26)

तमालगुल्मैर्निचितं सुगंधिभिः सकर्णिकारैर्बकुलैश्च सर्वतः अशोकपुन्नागवरैः सुपुष्पितैर्द्विरेफमालाकुल पुष्पसंचयैः

tamālagulmairnicitaṁ sugaṁdhibhiḥ sakarṇikārairbakulaiśca sarvataḥ aśokapunnāgavaraiḥ supuṣpitairdvirephamālākula puṣpasaṁcayaiḥ

सुगन्धित तमाल की झाड़ियों से भरा, सर्वत्र कर्णिकार तथा बकुल से युक्त, अशोक तथा उत्तम पुन्नाग के सुपुष्पित वृक्षों से, भ्रमरों की मालाओं से व्याकुल पुष्प-समूहों से युक्त,

श्लोक 27 (skanda.2.188.27)

क्वचित्प्रफुल्लांबुजरेणुभूषितैर्विहंगमैश्चारुफलप्रचारिभिः विनादितं सारसमुत्कुलादिभिः प्रमत्तदात्यूहकुलैश्च वल्गुभिः

kvacitpraphullāṁbujareṇubhūṣitairvihaṁgamaiścāruphalapracāribhiḥ vināditaṁ sārasamutkulādibhiḥ pramattadātyūhakulaiśca valgubhiḥ

कहीं खिले कमलों के पराग से विभूषित, सुन्दर फलों में विचरण करते पक्षियों से, सारस तथा उनके समूहों से, तथा उन्मत्त दात्यूह-पक्षियों के मधुर समूहों से गुंजित,

श्लोक 28 (skanda.2.188.28)

क्वचिच्च चक्राह्वरवोपनादितं क्वचिच्च कादम्बकदम्बकैर्युतम् क्वचिच्च कारण्डवनादनादितं क्वचिच्च मत्तालिकुलाकुलीकृतम्

kvacicca cakrāhvaravopanāditaṁ kvacicca kādambakadambakairyutam kvacicca kāraṇḍavanādanāditaṁ kvacicca mattālikulākulīkṛtam

कहीं चक्रवाक की ध्वनि से गुंजित, कहीं कादम्ब हंसों के समूहों से युक्त, कहीं कारण्डव पक्षियों के शब्द से ध्वनित, कहीं उन्मत्त भ्रमर-समूहों से व्याकुल,

श्लोक 29 (skanda.2.188.29)

मदाकुलाभिर्भ्रमरीभिरारान्निषेवितं चारुसुगंधिपुष्पवत् क्वचिच्च पुष्पैः सहकारवृक्षैर्लतोपगूढैस्तिलकद्रुमैश्च

madākulābhirbhramarībhirārānniṣevitaṁ cārusugaṁdhipuṣpavat kvacicca puṣpaiḥ sahakāravṛkṣairlatopagūḍhaistilakadrumaiśca

मद से व्याकुल भ्रमरियों से सर्वत्र सेवित, सुन्दर सुगन्धित पुष्पों वाला, कहीं आम्रवृक्षों के पुष्पों से, लताओं से आलिंगित तिलक वृक्षों से युक्त,

श्लोक 30 (skanda.2.188.30)

प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवितं प्रमत्तहारीतकुलोपनादितम् समंततः सुन्दरदर्शनीयतां समुद्वहत्तद्वनमुल्लसन्महत्

prahṛṣṭanānāvidhapakṣisevitaṁ pramattahārītakulopanāditam samaṁtataḥ sundaradarśanīyatāṁ samudvahattadvanamullasanmahat

प्रसन्न नाना पक्षियों से सेवित, उन्मत्त हारीत-कुलों की ध्वनि से गुंजित, वह विशाल, उल्लसित वन चारों ओर सुन्दर दर्शनीयता को धारण करता था।

श्लोक 31 (skanda.2.188.31)

निबिडनिचुलनीलं नीलकण्ठाभिरामं मदमुदितविहंगीवृन्दनादाभिरामम् कुसुमिततरुशाखालीनमत्तद्विरेफंनवकिसलयशोभाशोभितं सत्फलाढ्यम्

nibiḍaniculanīlaṁ nīlakaṇṭhābhirāmaṁ madamuditavihaṁgīvṛndanādābhirāmam kusumitataruśākhālīnamattadvirephaṁnavakisalayaśobhāśobhitaṁ satphalāḍhyam

घने निचुल वृक्षों से नीलवर्ण, मोरों से रमणीय, मद से आनन्दित पक्षिणी-समूहों की ध्वनि से रमणीय, पुष्पित वृक्षों की शाखाओं में लीन उन्मत्त भ्रमरों से युक्त, नई कोंपलों की शोभा से सुशोभित, उत्तम फलों से समृद्ध,

श्लोक 32 (skanda.2.188.32)

इत्यादिबहुशोभाढ्यं सर्वदिक्षु मनोहरम् यत्र मांडव्यमुनिना तपस्तप्तं महत्किल यत्प्रभावादभूत्तीर्थं पावनं तत्सदा महत्

ityādibahuśobhāḍhyaṁ sarvadikṣu manoharam yatra māṁḍavyamuninā tapastaptaṁ mahatkila yatprabhāvādabhūttīrthaṁ pāvanaṁ tatsadā mahat

इत्यादि अनेक शोभाओं से समृद्ध, सभी दिशाओं में मनोहर वह स्थान, जहाँ माण्डव्य मुनि ने महान् तपस्या की, जिसके प्रभाव से वह तीर्थ सदा पावन तथा महान् हुआ।

श्लोक 33 (skanda.2.188.33)

तत्पूर्वं गौतमस्यर्षेराश्रमं पावनं महत् तत्पूर्वं च्यवनस्यर्षेः पराशरमुनेरिदम् प्रथमं ते मुनिश्रेष्ठ पितुः किल तपोनिधेः

tatpūrvaṁ gautamasyarṣerāśramaṁ pāvanaṁ mahat tatpūrvaṁ cyavanasyarṣeḥ parāśaramuneridam prathamaṁ te muniśreṣṭha pituḥ kila taponidheḥ

उसके पूर्व में गौतम ऋषि का महान् पावन आश्रम है; उसके पूर्व में च्यवन ऋषि का, तथा पराशर मुनि का यह — हे मुनिश्रेष्ठ, वह पहले तुम्हारे पिता, उस तपोनिधि का है।

श्लोक 34 (skanda.2.188.34)

नानाविधानि तीर्थानि चाश्रमाश्चैव सर्वशः वर्तंते तापसानां च यस्यास्तीरे समंततः

nānāvidhāni tīrthāni cāśramāścaiva sarvaśaḥ vartaṁte tāpasānāṁ ca yasyāstīre samaṁtataḥ

नाना प्रकार के तीर्थ तथा तपस्वियों के आश्रम भी सर्वत्र उसके तट पर सब ओर विद्यमान हैं।

श्लोक 35 (skanda.2.188.35)

तमसानाम सा ज्ञेया वर्तते तटिनी शुभा यज्ञयूपान्समुत्खाय शोभिता बहुशोऽभितः

tamasānāma sā jñeyā vartate taṭinī śubhā yajñayūpānsamutkhāya śobhitā bahuśo’bhitaḥ

वह शुभ नदी 'तमसा' नाम से जानी जाती है; यज्ञ-यूपों को उखाड़कर वह सब ओर बहुत शोभित हुई है।

श्लोक 36 (skanda.2.188.36)

तत्र स्नानेन दानेन श्राद्धेन च विशेषतः सर्वकामार्थसिद्धिः स्यान्नात्र कार्या विचारणा

tatra snānena dānena śrāddhena ca viśeṣataḥ sarvakāmārthasiddhiḥ syānnātra kāryā vicāraṇā

वहाँ स्नान, दान तथा विशेष रूप से श्राद्ध से समस्त कामनाओं तथा अर्थों की सिद्धि होती है — इसमें विचार नहीं करना चाहिए।

श्लोक 37 (skanda.2.188.37)

मार्गशीर्षे शुक्लपक्षे पञ्चदश्यां विशेषतः स्नानं तस्य फलप्राप्तिदायकं सर्वदा नृणाम्

mārgaśīrṣe śuklapakṣe pañcadaśyāṁ viśeṣataḥ snānaṁ tasya phalaprāptidāyakaṁ sarvadā nṛṇām

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पंचदशी को विशेष रूप से वहाँ स्नान सदा मनुष्यों को फल-प्राप्ति देने वाला है।

श्लोक 38 (skanda.2.188.38)

तस्मादत्र प्रकर्तव्यं स्नानं निर्मलमानसैः प्रयत्नतो मुनिश्रेष्ठ सर्वकामार्थसिद्धिदम्

tasmādatra prakartavyaṁ snānaṁ nirmalamānasaiḥ prayatnato muniśreṣṭha sarvakāmārthasiddhidam

इसलिए, हे मुनिश्रेष्ठ, यहाँ निर्मल मन वाले मनुष्यों को यत्नपूर्वक स्नान करना चाहिए, जो सभी कामनाओं तथा अर्थों की सिद्धि देने वाला है।

श्लोक 39 (skanda.2.188.39)

अतः परं प्रवक्ष्यामि तमसापरमं शुभम् सीताकुंडमितिख्यातं श्रीदुग्धेश्वरसन्निधौ

ataḥ paraṁ pravakṣyāmi tamasāparamaṁ śubham sītākuṁḍamitikhyātaṁ śrīdugdheśvarasannidhau

अब इसके आगे मैं तमसा से परे एक और शुभ तीर्थ के विषय में कहूँगा, जो श्री दुग्धेश्वर के सांनिध्य में 'सीताकुण्ड' नाम से विख्यात है।

श्लोक 40 (skanda.2.188.40)

भाद्रे शुक्लचतुर्थ्यां तु तस्य यात्रा शुभावहा सर्वकामार्थसिद्ध्यर्थं पूज्यो विप्रेश्वरस्तथा तस्य स्मरणमात्रेण सर्वविघ्नविनाशनम्

bhādre śuklacaturthyāṁ tu tasya yātrā śubhāvahā sarvakāmārthasiddhyarthaṁ pūjyo vipreśvarastathā tasya smaraṇamātreṇa sarvavighnavināśanam

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को उसकी यात्रा शुभावह है; सभी कामनाओं तथा अर्थों की सिद्धि के लिए विप्रेश्वर की भी पूजा करनी चाहिए; उनके स्मरण मात्र से समस्त विघ्नों का नाश होता है।

श्लोक 41 (skanda.2.188.41)

तस्माद्दक्षिणदिग्भागे भैरवो नाम नामतः यं दृष्ट्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः

tasmāddakṣiṇadigbhāge bhairavo nāma nāmataḥ yaṁ dṛṣṭvā sarvapāpebhyo mucyate nātra saṁśayaḥ

उससे दक्षिण दिशा में 'भैरव' नामक देव हैं, जिनका दर्शन करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है — इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 42 (skanda.2.188.42)

रक्षितो वासुदेवेन क्षेत्ररक्षार्थमादरात् तस्य पूजा विधातव्या प्रयत्नेन यथाविधि मनोभीष्टफलप्राप्तिर्भैरवस्य सदाऽऽदरात्

rakṣito vāsudevena kṣetrarakṣārthamādarāt tasya pūjā vidhātavyā prayatnena yathāvidhi manobhīṣṭaphalaprāptirbhairavasya sadā’’darāt

क्षेत्र की रक्षा के लिए वासुदेव द्वारा आदरपूर्वक स्थापित, उनकी पूजा यत्नपूर्वक विधिवत् करनी चाहिए; भैरव की सदा आदरपूर्वक [पूजा से] मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

श्लोक 43 (skanda.2.188.43)

मार्गशीर्षस्य कृष्णायामष्टम्यां तस्य निर्मिता यात्रा सांवत्सरी तत्र सर्वकामार्थसिद्धये

mārgaśīrṣasya kṛṣṇāyāmaṣṭamyāṁ tasya nirmitā yātrā sāṁvatsarī tatra sarvakāmārthasiddhaye

मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को उनकी वार्षिक यात्रा निर्मित है, जो वहाँ सभी कामनाओं तथा अर्थों की सिद्धि के लिए है।

श्लोक 44 (skanda.2.188.44)

पशूपहारसंभूति कर्तव्यं पूजनं जनैः सर्वकामफलप्राप्तिर्जायते नात्र संशयः

paśūpahārasaṁbhūti kartavyaṁ pūjanaṁ janaiḥ sarvakāmaphalaprāptirjāyate nātra saṁśayaḥ

लोगों द्वारा पशु-उपहार सहित पूजन करना चाहिए; इससे सभी कामनाओं के फल की प्राप्ति होती है — इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 45 (skanda.2.188.45)

निर्विघ्नं तीर्थवसतिर्भैरवस्य प्रसादतः जायते तेन कर्तव्या पूजा तस्य प्रयत्नतः

nirvighnaṁ tīrthavasatirbhairavasya prasādataḥ jāyate tena kartavyā pūjā tasya prayatnataḥ

भैरव की कृपा से तीर्थ में निवास निर्विघ्न हो जाता है; इसलिए उनकी पूजा यत्नपूर्वक करनी चाहिए।

श्लोक 46 (skanda.2.188.46)

एतस्मिन्नुत्तरे भागे रम्यं भरतकुण्डकम् यत्र स्नात्वा नरः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः

etasminnuttare bhāge ramyaṁ bharatakuṇḍakam yatra snātvā naraḥ pāpairmucyate nātra saṁśayaḥ

इसके उत्तर भाग में रमणीय भरतकुण्ड है, जहाँ स्नान करके मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है — इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 47 (skanda.2.188.47)

तत्र स्नानं तथा दानं सर्वमक्षयतां व्रजेत् अन्नं बहुविधं देयं वासांसि विविधान्यपि

tatra snānaṁ tathā dānaṁ sarvamakṣayatāṁ vrajet annaṁ bahuvidhaṁ deyaṁ vāsāṁsi vividhānyapi

वहाँ स्नान तथा दान सब अक्षय हो जाते हैं; नाना प्रकार का अन्न तथा विविध वस्त्र देने चाहिए,

श्लोक 48 (skanda.2.188.48)

यत्नतो देवताः पूज्या वस्त्रादिभिरलंकृतैः नंदिग्रामे वसन्पूर्वं भरतो रघुवंशजः

yatnato devatāḥ pūjyā vastrādibhiralaṁkṛtaiḥ naṁdigrāme vasanpūrvaṁ bharato raghuvaṁśajaḥ

तथा यत्नपूर्वक वस्त्रादि से सुसज्जित देवताओं की पूजा करनी चाहिए। पूर्वकाल में रघुवंशी भरत नन्दिग्राम में निवास करते हुए,

श्लोक 49 (skanda.2.188.49)

रामचन्द्रं हृदि ध्यायन्निर्मलात्मा जितेन्द्रियः ततः स्थित्वा प्रजाः सर्वा ररक्ष क्षितिवल्लभः

rāmacandraṁ hṛdi dhyāyannirmalātmā jitendriyaḥ tataḥ sthitvā prajāḥ sarvā rarakṣa kṣitivallabhaḥ

हृदय में रामचन्द्र का ध्यान करते हुए, निर्मल आत्मा, जितेन्द्रिय होकर वहाँ स्थित रहकर, पृथ्वी के उस प्रिय ने समस्त प्रजा का पालन किया।

श्लोक 50 (skanda.2.188.50)

तत्र चक्रे महत्कुण्डं भरतो नाम भूपतिः राममूर्तिं च संस्थाप्य चचार विजितेन्द्रियः

tatra cakre mahatkuṇḍaṁ bharato nāma bhūpatiḥ rāmamūrtiṁ ca saṁsthāpya cacāra vijitendriyaḥ

वहाँ भरत नामक राजा ने महान् कुण्ड बनवाया, तथा रामचन्द्र की मूर्ति स्थापित करके जितेन्द्रिय होकर आचरण किया।

श्लोक 51 (skanda.2.188.51)

तत्कुंडे सुमहत्पुण्यं नानापुण्यसमन्वितम् कुमुदोत्पलकह्लारपुण्डरीकसमन्वितम्

tatkuṁḍe sumahatpuṇyaṁ nānāpuṇyasamanvitam kumudotpalakahlārapuṇḍarīkasamanvitam

उस कुण्ड में अत्यन्त महान् पुण्य, नाना पुण्यों से युक्त, कुमुद, उत्पल, कह्लार तथा पुण्डरीक कमलों से युक्त,

श्लोक 52 (skanda.2.188.52)

हंससारसचक्राह्व विहंगमविराजितम् उद्यानपादपच्छायासच्छायममलं सदा

haṁsasārasacakrāhva vihaṁgamavirājitam udyānapādapacchāyāsacchāyamamalaṁ sadā

हंस, सारस तथा चक्रवाक पक्षियों से सुशोभित, उद्यान के वृक्षों की सुखद छाया वाला, सदा निर्मल जल है।

श्लोक 53 (skanda.2.188.53)

तत्र स्नानं महापुण्यं प्रमोदानन्दनिर्मलम् तत्र स्नानं तथा श्राद्धं पितॄनुद्दिश्य कुर्वतः पितरस्तस्य तुष्यंति तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः

tatra snānaṁ mahāpuṇyaṁ pramodānandanirmalam tatra snānaṁ tathā śrāddhaṁ pitṝnuddiśya kurvataḥ pitarastasya tuṣyaṁti tuṣṭāḥ syuḥ sarvadevatāḥ

वहाँ स्नान अत्यन्त पुण्यकारी तथा आनन्द से निर्मल है; वहाँ स्नान करके तथा पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध करने वाले के पितर सन्तुष्ट होते हैं तथा सभी देवता सन्तुष्ट होते हैं।

श्लोक 54 (skanda.2.188.54)

स्वर्णं चान्नं विधानेन दातव्यं च द्विजन्मने श्रद्धापूर्वकमेतत्तु कर्तव्यं प्रयतैर्नरैः

svarṇaṁ cānnaṁ vidhānena dātavyaṁ ca dvijanmane śraddhāpūrvakametattu kartavyaṁ prayatairnaraiḥ

विधिपूर्वक स्वर्ण तथा अन्न द्विज को देने चाहिए; यह श्रद्धापूर्वक संयमी मनुष्यों द्वारा करना चाहिए।

श्लोक 55 (skanda.2.188.55)

तत्पश्चिमदिशाभागे जटाकुण्डमनुत्तमम् यत्र रामादिभिः सर्वैर्जटाः परिहृता निजाः

tatpaścimadiśābhāge jaṭākuṇḍamanuttamam yatra rāmādibhiḥ sarvairjaṭāḥ parihṛtā nijāḥ

उससे पश्चिम दिशा में अनुत्तम जटाकुण्ड है, जहाँ राम आदि सभी ने अपनी जटाओं का परित्याग किया।

श्लोक 56 (skanda.2.188.56)

जटाकुण्डमिति ख्यातं सर्वतीर्थोत्तमोत्तमम् यत्र स्नानेन दानेन सर्वान्कामानवाप्नुयात्

jaṭākuṇḍamiti khyātaṁ sarvatīrthottamottamam yatra snānena dānena sarvānkāmānavāpnuyāt

यह 'जटाकुण्ड' नाम से विख्यात, समस्त तीर्थों में सर्वोत्तम है, जहाँ स्नान तथा दान से मनुष्य सभी कामनाओं को प्राप्त करता है।

श्लोक 57 (skanda.2.188.57)

पूर्वकुण्डेषु संपूज्यो भरतः श्रीसमन्वितः जटाकुण्डेषु संपूज्यौ ससीतौ रामलक्ष्मणौ चैत्रकृष्णचतुर्दश्यां यात्रा सांवत्सरी भवेत्

pūrvakuṇḍeṣu saṁpūjyo bharataḥ śrīsamanvitaḥ jaṭākuṇḍeṣu saṁpūjyau sasītau rāmalakṣmaṇau caitrakṛṣṇacaturdaśyāṁ yātrā sāṁvatsarī bhavet

पूर्व के कुण्डों में श्रीसम्पन्न भरत की पूजा करनी चाहिए; जटाकुण्ड में सीता सहित राम-लक्ष्मण की पूजा करनी चाहिए; चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को वार्षिक यात्रा होती है।

श्लोक 58 (skanda.2.188.58)

इति परमविधानैः पूजयेद्रामसीते तदनु भरतकुण्डे लक्ष्मणं च प्रपूज्य विधिवदमृतकुण्डे द्वंद्वंसमज्जनेन वसति सुकृतिमूर्तिर्वैष्णवे तत्र लोके

iti paramavidhānaiḥ pūjayedrāmasīte tadanu bharatakuṇḍe lakṣmaṇaṁ ca prapūjya vidhivadamṛtakuṇḍe dvaṁdvaṁsamajjanena vasati sukṛtimūrtirvaiṣṇave tatra loke

इस प्रकार परम विधानों से राम-सीता की पूजा करके, फिर भरतकुण्ड में लक्ष्मण की भी पूजा करके, विधिपूर्वक अमृतकुण्ड में दम्पतीरूप में स्नान करने से, पुण्यात्मा वहाँ वैष्णव लोक में निवास करता है।

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