वैष्णव खण्ड · अध्याय 189
अयोध्यायात्राविधिक्रमवर्णनम् — अयोध्या-यात्रा की विधि और क्रम का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.189.1)
अगस्त्य उवाच निराहारो नरो भूत्वा क्षीराहारोऽपि वा पुनः अजितं पूजयेद्विप्र तस्य सिद्धिः करे स्थिता
agastya uvāca nirāhāro naro bhūtvā kṣīrāhāro’pi vā punaḥ ajitaṁ pūjayedvipra tasya siddhiḥ kare sthitā
अगस्त्य ने कहा — निराहार होकर अथवा केवल दूध पर रहकर, हे विप्र, अजित (विष्णु) की पूजा करनी चाहिए; उसके हाथ में सिद्धि स्थित रहती है।
श्लोक 2 (skanda.2.189.2)
महोत्सवस्तु कर्तव्यो गीतवादित्रसंयुतः एवं यः कुरुते धीमान्सर्वान्कामानवाप्नुयात्
mahotsavastu kartavyo gītavāditrasaṁyutaḥ evaṁ yaḥ kurute dhīmānsarvānkāmānavāpnuyāt
गीत-वाद्य से युक्त महोत्सव करना चाहिए; इस प्रकार जो बुद्धिमान् करता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्त करता है।
श्लोक 3 (skanda.2.189.3)
एतस्मादुत्तरे विद्वन्वीरस्य शुभसूचकम् स्थानं मत्तगजेन्द्रस्य वर्तते नियतव्रत
etasmāduttare vidvanvīrasya śubhasūcakam sthānaṁ mattagajendrasya vartate niyatavrata
हे विद्वन्, इससे उत्तर में वीर का शुभसूचक स्थान है — मत्तगजेन्द्र का स्थान, हे नियतव्रत।
श्लोक 4 (skanda.2.189.4)
तदग्रे सरसि स्नात्वा वसेत्तत्र सुनिश्चितम् पूर्णा सिद्धिमवाप्नोति यामवाप्य न शोचति
tadagre sarasi snātvā vasettatra suniścitam pūrṇā siddhimavāpnoti yāmavāpya na śocati
उसके आगे सरोवर में स्नान करके वहीं निश्चयपूर्वक निवास करना चाहिए; जिसे पाकर मनुष्य शोक नहीं करता, वह पूर्ण सिद्धि प्राप्त करता है।
श्लोक 5 (skanda.2.189.5)
अयोध्यारक्षको वीरः सर्वकामार्थसिद्धिदः नवरात्रिषु पंचम्यां यात्रा सांवत्सरी भवेत्
ayodhyārakṣako vīraḥ sarvakāmārthasiddhidaḥ navarātriṣu paṁcamyāṁ yātrā sāṁvatsarī bhavet
अयोध्या का रक्षक यह वीर सभी कामनाओं और अर्थों की सिद्धि देने वाला है; नवरात्रि की पंचमी को इसकी वार्षिक यात्रा होती है।
श्लोक 6 (skanda.2.189.6)
गंधपुष्पादिधूपादि नैवेद्यादिविधानतः पूजनीयः प्रयत्नेन सर्वकामार्थसिद्धिदः यंयं काममिहेच्छेत तंतं काममवाप्नुयात्
gaṁdhapuṣpādidhūpādi naivedyādividhānataḥ pūjanīyaḥ prayatnena sarvakāmārthasiddhidaḥ yaṁyaṁ kāmamihecchet taṁtaṁ kāmamavāpnuyāt
गन्ध, पुष्प, धूप तथा नैवेद्य आदि विधान से, सर्वकामार्थसिद्धिदायक उसकी प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए; यहाँ मनुष्य जिस-जिस कामना की इच्छा करे, उस-उस कामना को प्राप्त करता है।
श्लोक 7 (skanda.2.189.7)
एतस्माद्दक्षिणेभागे सुरसा नाम राक्षसी विष्णुभक्ता सदा विप्र वर्तते सिद्धिदायिका
etasmāddakṣiṇebhāge surasā nāma rākṣasī viṣṇubhaktā sadā vipra vartate siddhidāyikā
इससे दक्षिण दिशा में सुरसा नामक राक्षसी है, जो सदा विष्णुभक्त तथा सिद्धिदायिनी है, हे विप्र।
श्लोक 8 (skanda.2.189.8)
तां संपूज्य नरो भक्त्या सर्वान्कामानवाप्नुयात्
tāṁ saṁpūjya naro bhaktyā sarvānkāmānavāpnuyāt
उसकी भक्तिपूर्वक पूजा करके मनुष्य सभी कामनाओं को प्राप्त करता है।
श्लोक 9 (skanda.2.189.9)
लंकास्थानादिहानीता रामेणोत्कृष्टकर्मणा अयोध्यायां स्थापिता सा रक्षार्थं नियतव्रतैः
laṁkāsthānādihānītā rāmeṇotkṛṣṭakarmaṇā ayodhyāyāṁ sthāpitā sā rakṣārthaṁ niyatavrataiḥ
उत्कृष्ट कर्म करने वाले राम द्वारा लंका से यहाँ लाई गई वह अयोध्या में रक्षा के लिए नियतव्रती पुरुषों द्वारा स्थापित की गई।
श्लोक 10 (skanda.2.189.10)
संपूज्य विधिवत्तस्या दर्शनं कार्यमादरात् सर्वकामार्थसिद्ध्यर्थमुत्सवोऽपि शुभप्रदः कर्त्तव्यः सुप्रयत्नेन गीतवादित्रसंयुतैः
saṁpūjya vidhivattasyā darśanaṁ kāryamādarāt sarvakāmārthasiddhyarthamutsavo’pi śubhapradaḥ karttavyaḥ suprayatnena gītavāditrasaṁyutaiḥ
विधिपूर्वक उसकी पूजा करके आदरपूर्वक उसके दर्शन करने चाहिए; सर्वकामार्थसिद्धि के लिए शुभप्रद उत्सव भी गीत-वाद्य के साथ सुप्रयत्नपूर्वक करना चाहिए।
श्लोक 11 (skanda.2.189.11)
नवरात्रे तृतीयायां यात्रा सांवत्सरी भवेत् सर्वदा सुखसंतानसिद्धये परमार्थदा नानासंगीतवादित्रनृत्योत्सवमनोहरा
navarātre tṛtīyāyāṁ yātrā sāṁvatsarī bhavet sarvadā sukhasaṁtānasiddhaye paramārthadā nānāsaṁgītavāditranṛtyotsavamanoharā
नवरात्र की तृतीया को वार्षिक यात्रा होती है, जो सदा सुख और सन्तान की सिद्धि के लिए परम अर्थ देने वाली तथा नाना संगीत, वाद्य और नृत्य के उत्सवों से मनोहर है।
श्लोक 12 (skanda.2.189.12)
एवं कृते न संदेहः सर्वदा रक्षितो भवेत्
evaṁ kṛte na saṁdehaḥ sarvadā rakṣito bhavet
ऐसा करने पर, निःसंदेह, सदा रक्षा प्राप्त होती है।
श्लोक 13 (skanda.2.189.13)
एतत्पश्चिमदिग्भागे वर्तते परमो मुने पिंडारक इति ख्यातो वीरः परमपौरुषः पूजनीयः प्रयत्नेन गंधपुष्पाक्षतादिभिः
etatpaścimadigbhāge vartate paramo mune piṁḍāraka iti khyāto vīraḥ paramapauruṣaḥ pūjanīyaḥ prayatnena gaṁdhapuṣpākṣatādibhiḥ
हे मुने, इससे पश्चिम दिशा में परम पुरुषार्थी 'पिण्डारक' नामक विख्यात वीर है, जिसकी गन्ध-पुष्प-अक्षत आदि से प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 14 (skanda.2.189.14)
यस्य पूजावशान्नॄणां सिद्धयः करसंश्रिताः तस्य पूजाविधानेन कर्तव्यं पूजनं नरैः
yasya pūjāvaśānnṝṇāṁ siddhayaḥ karasaṁśritāḥ tasya pūjāvidhānena kartavyaṁ pūjanaṁ naraiḥ
जिसकी पूजा के प्रभाव से मनुष्यों की सिद्धियाँ हाथ में आ जाती हैं, उसकी पूजा-विधि के अनुसार मनुष्यों द्वारा पूजन करना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.2.189.15)
सरयूसलिले स्नात्वा पिंडारकं च पूजयेत् पापिनां मोहकर्त्तारं मतिदं कृतिनां सदा
sarayūsalile snātvā piṁḍārakaṁ ca pūjayet pāpināṁ mohakarttāraṁ matidaṁ kṛtināṁ sadā
सरयू के जल में स्नान करके पिण्डारक की पूजा करनी चाहिए, जो पापियों को मोहित करने वाला तथा पुण्यात्माओं को सदा बुद्धि देने वाला है।
श्लोक 16 (skanda.2.189.16)
तस्य यात्रा विधातव्या सपुष्या नवरात्रिषु तत्पश्चिमदिशाभागे विघ्नेशं किल पूजयेत्
tasya yātrā vidhātavyā sapuṣyā navarātriṣu tatpaścimadiśābhāge vighneśaṁ kila pūjayet
उसकी यात्रा पुष्य नक्षत्र के साथ नवरात्रि में करनी चाहिए; उससे पश्चिम दिशा में विघ्नेश की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 17 (skanda.2.189.17)
यस्य दर्शनतो नॄणां विघ्नलेशो न विद्यते तस्माद्विघ्नेश्वरः पूज्यः सर्वकामफलप्रदः
yasya darśanato nṝṇāṁ vighnaleśo na vidyate tasmādvighneśvaraḥ pūjyaḥ sarvakāmaphalapradaḥ
जिनके दर्शन से मनुष्यों को विघ्न का लेशमात्र भी नहीं रहता, अतः सर्वकामफलप्रद विघ्नेश्वर की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 18 (skanda.2.189.18)
तस्मात्स्थानत ऐशाने रामजन्म प्रवर्त्तते जन्मस्थानमिदं प्रोक्तं मोक्षादिफलसाधनम्
tasmātsthānata aiśāne rāmajanma pravarttate janmasthānamidaṁ proktaṁ mokṣādiphalasādhanam
उस स्थान से ऐशान दिशा में राम का जन्मस्थान है; यह जन्मस्थान मोक्ष आदि फलों का साधन कहा गया है।
श्लोक 19 (skanda.2.189.19)
विघ्नेश्वरात्पूर्वभागे वासिष्ठादुत्तरे तथा लौमशात्पश्चिमे भागे जन्मस्थानं ततः स्मृतम्
vighneśvarātpūrvabhāge vāsiṣṭhāduttare tathā laumaśātpaścime bhāge janmasthānaṁ tataḥ smṛtam
विघ्नेश्वर से पूर्व, वासिष्ठ से उत्तर तथा लौमश से पश्चिम भाग में जन्मस्थान स्मृत है।
श्लोक 20 (skanda.2.189.20)
यद्दृष्ट्वा च मनुष्यस्य गर्भवासजयो भवेत् विना दानेन तपसा विना तीर्थैर्विना मखैः
yaddṛṣṭvā ca manuṣyasya garbhavāsajayo bhavet vinā dānena tapasā vinā tīrthairvinā makhaiḥ
जिसे देखकर मनुष्य का गर्भवास पर विजय हो जाता है — बिना दान, बिना तप, बिना तीर्थ और बिना यज्ञ के ही।
श्लोक 21 (skanda.2.189.21)
नवमीदिवसे प्राप्ते व्रतधारी हि मानवः स्नानदानप्रभावेण मुच्यते जन्मबन्धनात्
navamīdivase prāpte vratadhārī hi mānavaḥ snānadānaprabhāveṇa mucyate janmabandhanāt
नवमी का दिन आने पर व्रतधारी मनुष्य स्नान और दान के प्रभाव से जन्म के बन्धन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 22 (skanda.2.189.22)
कपिलागोसहस्राणि यो ददाति दिनेदिने तत्फलं समवाप्नोति जन्मभूमेः प्रदर्शनात्
kapilāgosahasrāṇi yo dadāti dinedine tatphalaṁ samavāpnoti janmabhūmeḥ pradarśanāt
जो प्रतिदिन सहस्र कपिला गौएँ दान करता है, वही फल जन्मभूमि के दर्शनमात्र से प्राप्त होता है।
श्लोक 23 (skanda.2.189.23)
आश्रमे वसतां पुंसां तापसानां च यत्फलम् राजसूयसहस्राणि प्रतिवर्षाग्निहोत्रतः
āśrame vasatāṁ puṁsāṁ tāpasānāṁ ca yatphalam rājasūyasahasrāṇi prativarṣāgnihotrataḥ
आश्रम में रहने वाले तथा तापस पुरुषों का जो फल है, तथा प्रतिवर्ष अग्निहोत्र से सहस्र राजसूयों का जो फल है —
श्लोक 24 (skanda.2.189.24)
नियमस्थं नरं दृष्ट्वा जन्मस्थाने विशेषतः मातापित्रोर्गुरूणां च भक्तिमुद्वहतां सताम्
niyamasthaṁ naraṁ dṛṣṭvā janmasthāne viśeṣataḥ mātāpitrorgurūṇāṁ ca bhaktimudvahatāṁ satām
जन्मस्थान में विशेषरूप से नियमस्थ मनुष्य को देखकर, माता-पिता तथा गुरुजनों में भक्ति रखने वाले सज्जनों का —
श्लोक 25 (skanda.2.189.25)
तत्फलं समवाप्नोति जन्मभूमेः प्रदर्शनात्
tatphalaṁ samavāpnoti janmabhūmeḥ pradarśanāt
वही फल जन्मभूमि के दर्शनमात्र से प्राप्त होता है।
श्लोक 26 (skanda.2.189.26)
अथ सरयूवर्णनम् पितॄणामक्षया तृप्तिर्गयाश्राद्धाधिकं फलम्
atha sarayūvarṇanam pitṝṇāmakṣayā tṛptirgayāśrāddhādhikaṁ phalam
अब सरयू का वर्णन। पितरों की अक्षय तृप्ति होती है, जो गया-श्राद्ध से भी अधिक फलदायी है।
श्लोक 27 (skanda.2.189.27)
मन्वंतरसहस्रैस्तु काशीवासेषु यत्फलम् तत्फलं समवाप्नोति सरयूदर्शने कृते
manvaṁtarasahasraistu kāśīvāseṣu yatphalam tatphalaṁ samavāpnoti sarayūdarśane kṛte
सहस्र मन्वन्तरों तक काशी में वास करने से जो फल मिलता है, वही फल सरयू के दर्शन से प्राप्त होता है।
श्लोक 28 (skanda.2.189.28)
गयाश्राद्धं च ये कृत्वा पुरुषोत्तम दर्शनम् कुर्वंति तत्फलं प्रोक्तं कलौ दाशरथीं पुरीम्
gayāśrāddhaṁ ca ye kṛtvā puruṣottama darśanam kurvaṁti tatphalaṁ proktaṁ kalau dāśarathīṁ purīm
गया-श्राद्ध करके जो पुरुषोत्तम का दर्शन करते हैं, उसका जो फल कहा गया है, वही फल कलियुग में दाशरथीपुरी (अयोध्या) का है।
श्लोक 29 (skanda.2.189.29)
मथुरायां कल्पमेकं वसते मानवो यदि तत्फलं समवाप्नोति सरयूदर्शने कृते
mathurāyāṁ kalpamekaṁ vasate mānavo yadi tatphalaṁ samavāpnoti sarayūdarśane kṛte
यदि मनुष्य मथुरा में एक कल्प तक निवास करे, तो भी वही फल सरयू के दर्शन से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 30 (skanda.2.189.30)
पुष्करेषु प्रयागेषु माघे वा कार्त्तिके तथा तत्फलं समवाप्नोति सरयूदर्शने कृते
puṣkareṣu prayāgeṣu māghe vā kārttike tathā tatphalaṁ samavāpnoti sarayūdarśane kṛte
पुष्कर, प्रयाग, माघ अथवा कार्तिक में जो फल मिलता है, वही फल सरयू के दर्शन से प्राप्त होता है।
श्लोक 31 (skanda.2.189.31)
कल्पकोटिसहस्राणि ह्यवन्तीवासतो हि यत् तत्फलं समवाप्नोति सरयूदर्शने कृते
kalpakoṭisahasrāṇi hyavantīvāsato hi yat tatphalaṁ samavāpnoti sarayūdarśane kṛte
अवन्ती में सहस्र करोड़ कल्पों तक वास करने से जो फल मिलता है, वही फल सरयू के दर्शन से प्राप्त होता है।
श्लोक 32 (skanda.2.189.32)
षष्टिवर्षसहस्राणि भागीरथ्यवगाहजम् तत्फलं निमिषार्द्धेन कलौ दाशरथीं पुरीम्
ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi bhāgīrathyavagāhajam tatphalaṁ nimiṣārddhena kalau dāśarathīṁ purīm
साठ हजार वर्षों तक भागीरथी में अवगाहन करने से जो फल होता है, वही फल कलियुग में दाशरथीपुरी में आधे निमेष में प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 33 (skanda.2.189.33)
निमिषं निमिषार्द्धं वा प्राणिनां रामचिन्तनम् संसारकारणाज्ञाननाशकं जायते ध्रुवम्
nimiṣaṁ nimiṣārddhaṁ vā prāṇināṁ rāmacintanam saṁsārakāraṇājñānanāśakaṁ jāyate dhruvam
प्राणियों का राम-चिन्तन, चाहे एक निमेष या आधे निमेष के लिए भी हो, संसार के कारणभूत अज्ञान का निश्चय ही नाशक बन जाता है।
श्लोक 34 (skanda.2.189.34)
यत्र कुत्र स्थितो यस्तु ह्ययोध्यां मनसा स्मरेत् न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पांतरशतैरपि
yatra kutra sthito yastu hyayodhyāṁ manasā smaret na tasya punarāvṛttiḥ kalpāṁtaraśatairapi
जो कहीं भी स्थित होकर मन से अयोध्या का स्मरण करता है, उसकी सैकड़ों कल्पान्तरों में भी पुनरावृत्ति नहीं होती।
श्लोक 35 (skanda.2.189.35)
जलरूपेण ब्रह्मैव सरयूर्मोक्षदा सदा नैवात्र कर्मणो भोगो रामरूपो भवेन्नरः
jalarūpeṇa brahmaiva sarayūrmokṣadā sadā naivātra karmaṇo bhogo rāmarūpo bhavennaraḥ
जलरूप में सरयू स्वयं ब्रह्म है, सदा मोक्ष देने वाली; यहाँ कर्मों के भोग की आवश्यकता नहीं रहती — मनुष्य रामरूप हो जाता है।
श्लोक 36 (skanda.2.189.36)
पशुपक्षिमृगाश्चैव ये चान्ये पापयोनयः तेऽपि मुक्ता दिवं यांति श्रीरामवचनं यथा
paśupakṣimṛgāścaiva ye cānye pāpayonayaḥ te’pi muktā divaṁ yāṁti śrīrāmavacanaṁ yathā
पशु, पक्षी, मृग तथा अन्य पापयोनि प्राणी भी, श्रीराम के वचनानुसार, मुक्त होकर स्वर्ग जाते हैं।
श्लोक 37 (skanda.2.189.37)
इत्युक्त्वा विरते तस्मिन्मुनौ कलशजन्मनि कृष्णद्वैपायनव्यासः पुनरूचे तपोधनः
ityuktvā virate tasminmunau kalaśajanmani kṛṣṇadvaipāyanavyāsaḥ punarūce tapodhanaḥ
कुम्भसम्भव मुनि (अगस्त्य) के ऐसा कहकर मौन होने पर, तपोधन कृष्णद्वैपायन व्यास ने पुनः कहा।
श्लोक 38 (skanda.2.189.38)
दुर्लभा सर्वजन्तूनां कथा विस्तरतः क्रमात् यात्राक्रमोऽपि च मया श्रुत आगच्छतां नृणाम्
durlabhā sarvajantūnāṁ kathā vistarataḥ kramāt yātrākramo’pi ca mayā śruta āgacchatāṁ nṛṇām
समस्त प्राणियों के लिए दुर्लभ यह कथा मैंने क्रमशः विस्तार से सुनी, तथा आने वाले मनुष्यों की यात्राक्रम भी मैंने सुना।
श्लोक 39 (skanda.2.189.39)
इदानीं श्रोतुमिच्छामि क्षेत्रस्थानं यथाविधि यात्राक्रमं मुनिश्रेष्ठ सम्यक्त्वस्तपोधन
idānīṁ śrotumicchāmi kṣetrasthānaṁ yathāvidhi yātrākramaṁ muniśreṣṭha samyaktvastapodhana
अब मैं क्षेत्रस्थान को यथाविधि तथा यात्राक्रम को भलीभाँति सुनना चाहता हूँ, हे मुनिश्रेष्ठ, हे तपोधन।
श्लोक 40 (skanda.2.189.40)
फलं ब्रूहि क्रमेणैव विस्तरात्पृच्छतो मम यद्यस्ति मयि ते विद्वन्कृपा कारुणिकोत्तम
phalaṁ brūhi krameṇaiva vistarātpṛcchato mama yadyasti mayi te vidvankṛpā kāruṇikottama
हे विद्वन्, हे करुणिकोत्तम, यदि मुझ पर आपकी कृपा है, तो मेरे विस्तारपूर्वक पूछने पर क्रमशः फल कहिए।
श्लोक 41 (skanda.2.189.41)
यथा श्रुत्वा क्रमेणैव यात्रां विश्वविदां वर करोमि त्वत्प्रसादेन तथा कुरु यतव्रत
yathā śrutvā krameṇaiva yātrāṁ viśvavidāṁ vara karomi tvatprasādena tathā kuru yatavrata
हे विश्वविदां वर, जिस प्रकार क्रमशः सुनकर मैं आपकी कृपा से यात्रा कर सकूँ, वैसा कीजिए, हे यतव्रत।
श्लोक 42 (skanda.2.189.42)
अगस्त्य उवाच शृणु वक्ष्यामि तत्त्वेन यात्राक्रममथादितः अयोध्यां सप्ततीर्थानां यथावदनुपूर्वशः
agastya uvāca śṛṇu vakṣyāmi tattvena yātrākramamathāditaḥ ayodhyāṁ saptatīrthānāṁ yathāvadanupūrvaśaḥ
अगस्त्य ने कहा — हे विद्वन्, सुनिए, मैं आदि से यथावत् अयोध्या के सप्त तीर्थों की यात्राक्रम को सत्यरूप से क्रमशः कहूँगा।
श्लोक 43 (skanda.2.189.43)
मनोवाक्कायशुद्धेन निर्दोषेणांतरात्मना मानसेषु सुतीर्थेषु स्नात्वा किल जितेंद्रियः यः करोति विधिं सम्यक्स तीर्थफलमश्नुते
manovākkāyaśuddhena nirdoṣeṇāṁtarātmanā mānaseṣu sutīrtheṣu snātvā kila jiteṁdriyaḥ yaḥ karoti vidhiṁ samyaksa tīrthaphalamaśnute
मन, वाणी और शरीर से शुद्ध, निर्दोष अन्तरात्मा से, मानस सुतीर्थों में स्नान करके इन्द्रियों को जीतने वाला जो भलीभाँति विधि करता है, वह तीर्थ का फल पाता है।
श्लोक 44 (skanda.2.189.44)
व्यास उवाच मानसान्येव तीर्थानि कथयस्व तपोधन येषु स्नातवतां नॄणां विशुद्धिर्मनसो भवेत्
vyāsa uvāca mānasānyeva tīrthāni kathayasva tapodhana yeṣu snātavatāṁ nṝṇāṁ viśuddhirmanaso bhavet
व्यास ने कहा — हे तपोधन, वे मानस तीर्थ बताइए, जिनमें स्नान करने वाले मनुष्यों के मन की विशुद्धि होती है।
श्लोक 45 (skanda.2.189.45)
अगस्त्य उवाच शृणु तीर्थानि गदतो मानसानि ममानघ येषु सम्यङ्नरः स्नात्वा प्रयाति परमां गतिम्
agastya uvāca śṛṇu tīrthāni gadato mānasāni mamānagha yeṣu samyaṅnaraḥ snātvā prayāti paramāṁ gatim
अगस्त्य ने कहा — हे अनघ, मुझसे कहे जाते हुए मानस तीर्थों को सुनिए, जिनमें भलीभाँति स्नान करके मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 46 (skanda.2.189.46)
सत्यतीर्थं क्षमातीर्थं तीर्थमिंद्रियनिग्रहः सर्वभूतदयातीर्थं तीर्थानां सत्यवादिता
satyatīrthaṁ kṣamātīrthaṁ tīrthamiṁdriyanigrahaḥ sarvabhūtadayātīrthaṁ tīrthānāṁ satyavāditā
सत्य तीर्थ है, क्षमा तीर्थ है, इन्द्रियनिग्रह तीर्थ है, सर्वभूतदया तीर्थ है, तथा तीर्थों में सत्यवादिता है।
श्लोक 47 (skanda.2.189.47)
ज्ञानतीर्थं तपस्तीर्थं कथितं तीर्थसप्तकम् सर्वभूतदयातीर्थे विशुद्धिर्मनसो भवेत्
jñānatīrthaṁ tapastīrthaṁ kathitaṁ tīrthasaptakam sarvabhūtadayātīrthe viśuddhirmanaso bhavet
ज्ञान तीर्थ है, तप तीर्थ है — इस प्रकार सात तीर्थ कहे गए हैं; सर्वभूतदया तीर्थ में मन की विशुद्धि होती है।
श्लोक 48 (skanda.2.189.48)
न तोयपूतदेहस्य स्नानमित्यभिधीयते स स्नातो यस्य वै पुंसः सुविशुद्धं मनो मतम् भौमानामपि तीर्थानां पुण्यत्वे कारणं शृणु
na toyapūtadehasya snānamityabhidhīyate sa snāto yasya vai puṁsaḥ suviśuddhaṁ mano matam bhaumānāmapi tīrthānāṁ puṇyatve kāraṇaṁ śṛṇu
जल से शुद्ध देह वाले का स्नान 'स्नान' नहीं कहलाता; वही स्नात है जिस पुरुष का मन भलीभाँति विशुद्ध माना जाता है। अब सुनिए, भौम तीर्थों की पवित्रता का भी कारण।
श्लोक 49 (skanda.2.189.49)
यथा शरीरस्योद्देशाः केचिन्मध्योत्तमाः स्मृताः तथा पृथिव्यामुद्देशाः केचित्पुण्यतमाः स्मृताः
yathā śarīrasyoddeśāḥ kecinmadhyottamāḥ smṛtāḥ tathā pṛthivyāmuddeśāḥ kecitpuṇyatamāḥ smṛtāḥ
जैसे शरीर के कुछ स्थान मध्यम तथा कुछ उत्तम स्मृत हैं, वैसे ही पृथ्वी पर भी कुछ स्थान परम पुण्यतम स्मृत हैं।
श्लोक 50 (skanda.2.189.50)
तस्माद्भौमेषु तीर्थेषु मानसेषु च संवसेत् उभयेषु च यः स्नाति स याति परमां गतिम्
tasmādbhaumeṣu tīrtheṣu mānaseṣu ca saṁvaset ubhayeṣu ca yaḥ snāti sa yāti paramāṁ gatim
अतः भौम तीर्थों में तथा मानस तीर्थों में निवास करना चाहिए; जो दोनों में स्नान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 51 (skanda.2.189.51)
तस्मात्त्वमपि विप्रेंद्र विशुद्धेनांतरात्मना यात्रां कुरु प्रयत्नेन यात्रा वै नोदिता मया तं तु वक्ष्यामि विप्रेंद्र तीर्थयात्राविधिं क्रमात्
tasmāttvamapi vipreṁdra viśuddhenāṁtarātmanā yātrāṁ kuru prayatnena yātrā vai noditā mayā taṁ tu vakṣyāmi vipreṁdra tīrthayātrāvidhiṁ kramāt
अतः हे विप्रेन्द्र, आप भी विशुद्ध अन्तरात्मा से प्रयत्नपूर्वक यात्रा कीजिए — यात्रा तो मेरे द्वारा प्रेरित है ही; अब मैं क्रमशः तीर्थयात्रा की विधि आपको बताऊँगा, हे विप्रेन्द्र।
श्लोक 52 (skanda.2.189.52)
जायन्ते च जलेष्वेव म्रियंते च जलौकसः न च गच्छंति ते स्वर्गमशुद्धमनसो मलाः
jāyaṁte ca jaleṣveva mriyaṁte ca jalaukasaḥ na ca gacchaṁti te svargamaśuddhamanaso malāḥ
जलचर जीव जल में ही जन्म लेते और जल में ही मरते हैं, परन्तु अशुद्धमन वे मलरूप प्राणी स्वर्ग को नहीं जाते।
श्लोक 53 (skanda.2.189.53)
विषयेष्वनिशं रागो मनसो मल उच्यते तेष्वेव हि न संगम्य नैर्मल्यं समुदाहृतम्
viṣayeṣvaniśaṁ rāgo manaso mala ucyate teṣveva hi na saṁgamya nairmalyaṁ samudāhṛtam
विषयों में निरन्तर आसक्ति ही मन का मल कहलाता है; उन्हीं से संग न करने में निर्मलता कही गई है।
श्लोक 54 (skanda.2.189.54)
चित्तमन्तर्गतं दुष्टं तीर्थस्नानं न शुध्यति शतशोऽपि जलैर्धौते सुराभाण्डमपावनम्
cittamantargataṁ duṣṭaṁ tīrthasnānaṁ na śudhyati śataśo’pi jalairdhaute surābhāṇḍamapāvanam
यदि चित्त भीतर से दुष्ट है, तो तीर्थस्नान से शुद्धि नहीं होती — जैसे सैकड़ों बार जल से धोए जाने पर भी मदिरा का पात्र अपवित्र ही रहता है।
श्लोक 55 (skanda.2.189.55)
दानमिज्या तपः शौचं तीर्थसेवा श्रुतिस्तथा सर्वाण्येतानि तीर्थानि यदि भावेन निर्मलः
dānamijyā tapaḥ śaucaṁ tīrthasevā śrutistathā sarvāṇyetāni tīrthāni yadi bhāvena nirmalaḥ
दान, यज्ञ, तप, शौच, तीर्थसेवा तथा श्रुति — ये सभी तभी तीर्थ हैं, यदि भावपूर्वक निर्मल मनुष्य द्वारा किए जाएँ।
श्लोक 56 (skanda.2.189.56)
निगृहीतेंद्रियग्रामो यत्रैव वसते नरः तत्र तस्य कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्करं तथा
nigṛhīteṁdriyagrāmo yatraiva vasate naraḥ tatra tasya kurukṣetraṁ naimiṣaṁ puṣkaraṁ tathā
जहाँ भी इन्द्रियों के समूह को वश में किए हुए मनुष्य निवास करता है, वहीं उसके लिए कुरुक्षेत्र, नैमिष तथा पुष्कर हैं।
श्लोक 57 (skanda.2.189.57)
एतत्ते कथितं विप्र मानसं तीर्थलक्षणम् स्नाते यस्मिन्क्रियाः सर्वाः सफलाः स्युः क्रियावताम्
etatte kathitaṁ vipra mānasaṁ tīrthalakṣaṇam snāte yasminkriyāḥ sarvāḥ saphalāḥ syuḥ kriyāvatām
हे विप्र, यह आपको मानस तीर्थ का लक्षण बताया गया; जिसमें स्नान करने पर क्रियावानों की सभी क्रियाएँ सफल होती हैं।
श्लोक 58 (skanda.2.189.58)
प्रातरुत्थाय मतिमान्संगमे स्नानमाचरेत् विभुं विष्णुहरिं दृष्ट्वा स्नायाद्वै ब्रह्मकुण्डके
prātarutthāya matimānsaṁgame snānamācaret vibhuṁ viṣṇuhariṁ dṛṣṭvā snāyādvai brahmakuṇḍake
प्रातःकाल उठकर बुद्धिमान् संगम में स्नान करे; विभु विष्णुहरि का दर्शन करके ब्रह्मकुण्ड में स्नान करे।
श्लोक 59 (skanda.2.189.59)
चक्रतीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चक्रहरिं विभुम् ततो धर्महरिं दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते
cakratīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā cakrahariṁ vibhum tato dharmahariṁ dṛṣṭvā sarvapāpaiḥ pramucyate
चक्रतीर्थ में स्नान करके विभु चक्रहरि का दर्शन करने वाला मनुष्य, फिर धर्महरि का दर्शन करके सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 60 (skanda.2.189.60)
एकादश्यामेकादश्यामियं यात्रा शुभावहा प्रातरुत्थाय मतिमान्स्वर्गद्वारजलप्लुतः
ekādaśyāmekādaśyāmiyaṁ yātrā śubhāvahā prātarutthāya matimānsvargadvārajalaplutaḥ
प्रत्येक एकादशी को यह यात्रा शुभावह है; प्रातःकाल उठकर बुद्धिमान् स्वर्गद्वार के जल में स्नान करके —
श्लोक 61 (skanda.2.189.61)
विधाय नित्यजं कर्म अयोध्यां च विलोकयेत् सरयूं तु ततो दृष्ट्वा पश्येन्मत्तगजं ततः
vidhāya nityajaṁ karma ayodhyāṁ ca vilokayet sarayūṁ tu tato dṛṣṭvā paśyenmattagajaṁ tataḥ
नित्यकर्म करके अयोध्या का दर्शन करे; फिर सरयू का दर्शन करके मत्तगज को देखे।
श्लोक 62 (skanda.2.189.62)
बंदीं च शीतलां चैव वटुकं च विलोकयेत् तदग्रसरसि स्नात्वा महाविद्यां विलोकयेत्
baṁdīṁ ca śītalāṁ caiva vaṭukaṁ ca vilokayet tadagrasarasi snātvā mahāvidyāṁ vilokayet
बंदी, शीतला तथा वटुक का दर्शन करे; उसके आगे के सरोवर में स्नान करके महाविद्या का दर्शन करे।
श्लोक 63 (skanda.2.189.63)
पिण्डारकं ततो दृष्ट्वा ततो भैरवदर्शनम् अष्टम्यां च चतुर्दश्यामेषा यात्रा फलप्रदा
piṇḍārakaṁ tato dṛṣṭvā tato bhairavadarśanam aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāmeṣā yātrā phalapradā
फिर पिण्डारक का दर्शन करके भैरव का दर्शन करे; अष्टमी और चतुर्दशी को यह यात्रा फलप्रद है।
श्लोक 64 (skanda.2.189.64)
अंगारकचतुर्थ्यां तु पूर्वोक्ता देवता अपि विघ्नेशं च ततः पश्येत्सर्वकामार्थसिद्धये
aṁgārakacaturthyāṁ tu pūrvoktā devatā api vighneśaṁ ca tataḥ paśyetsarvakāmārthasiddhaye
अंगारक-चतुर्थी को भी पूर्वोक्त देवताओं का, तथा फिर सर्वकामार्थसिद्धि के लिए विघ्नेश का दर्शन करना चाहिए।
श्लोक 65 (skanda.2.189.65)
प्रातरुत्थाय मतिमान्ब्रह्मकुण्डजले प्लुतः विष्णुं विष्णुहरिं दृष्ट्वा मनोवाक्कायशुद्धिमान्
prātarutthāya matimānbrahmakuṇḍajale plutaḥ viṣṇuṁ viṣṇuhariṁ dṛṣṭvā manovākkāyaśuddhimān
प्रातःकाल उठकर बुद्धिमान् ब्रह्मकुण्ड के जल में स्नान करके, मन-वाणी-शरीर से शुद्ध होकर विष्णु विष्णुहरि का दर्शन करे।
श्लोक 66 (skanda.2.189.66)
मंत्रेश्वरं ततो दृष्ट्वा महाविद्यां विलोकयेत् अयोध्यां च ततो दृष्ट्वा सर्वकामार्थसिद्धये
maṁtreśvaraṁ tato dṛṣṭvā mahāvidyāṁ vilokayet ayodhyāṁ ca tato dṛṣṭvā sarvakāmārthasiddhaye
फिर मन्त्रेश्वर का दर्शन करके महाविद्या को देखे; फिर अयोध्या का दर्शन करके सर्वकामार्थसिद्धि प्राप्त करे।
श्लोक 67 (skanda.2.189.67)
स्वर्गद्वारे नरः स्नात्वा सचैलो विजितेंद्रियः नानाविधानि पापानि बहुजन्मकृतानि च सचैलस्नानतो यांति तस्मात्सचैलमाचरेत्
svargadvāre naraḥ snātvā sacailo vijiteṁdriyaḥ nānāvidhāni pāpāni bahujanmakṛtāni ca sacailasnānato yāṁti tasmātsacailamācaret
स्वर्गद्वार में इन्द्रियों को जीतने वाला मनुष्य वस्त्रसहित स्नान करे; अनेक जन्मों में किए गए नाना प्रकार के पाप वस्त्रसहित स्नान से नष्ट हो जाते हैं, अतः वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए।
श्लोक 68 (skanda.2.189.68)
एषा वै गदिता यात्रा सर्वपापहरा शुभा
eṣā vai gaditā yātrā sarvapāpaharā śubhā
यह कही गई यात्रा निःसंदेह शुभ और सर्वपापहारिणी है।
श्लोक 69 (skanda.2.189.69)
य एवं कुरुते यात्रां नित्यं शुभफलप्रदाम् न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि
ya evaṁ kurute yātrāṁ nityaṁ śubhaphalapradām na tasya punarāvṛttiḥ kalpakoṭiśatairapi
जो इस प्रकार नित्य शुभफलप्रद यात्रा करता है, उसकी सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी पुनरावृत्ति नहीं होती।
श्लोक 70 (skanda.2.189.70)
तस्मात्त्वमपि विप्रेंद्रः अयोध्यां व्रज मा चिरम् तत्र गत्वा क्रमेणैव यात्रां कुरु यतेंद्रियः
tasmāttvamapi vipreṁdraḥ ayodhyāṁ vraja mā ciram tatra gatvā krameṇaiva yātrāṁ kuru yateṁdriyaḥ
अतः हे विप्रेन्द्र, आप भी बिना विलम्ब किए अयोध्या जाइए; वहाँ जाकर इन्द्रियों को वश में रखते हुए क्रमशः यात्रा कीजिए।
श्लोक 71 (skanda.2.189.71)
अयोध्या परमं स्थानमयोध्या परमं महत् अयोध्यायाः समा काचित्पुरी नैव प्रदृश्यते
ayodhyā paramaṁ sthānamayodhyā paramaṁ mahat ayodhyāyāḥ samā kācitpurī naiva pradṛśyate
अयोध्या परम स्थान है, अयोध्या परम महान् है; अयोध्या के समान कोई भी नगरी दिखाई नहीं देती।
श्लोक 72 (skanda.2.189.72)
अयोध्या परमं स्थानं विष्णुचक्रे प्रतिष्ठितम्
ayodhyā paramaṁ sthānaṁ viṣṇucakre pratiṣṭhitam
अयोध्या विष्णु के चक्र पर प्रतिष्ठित परम स्थान है।
श्लोक 73 (skanda.2.189.73)
इत्येतत्कथितं विप्र मया पृष्टं हि यत्त्वया समाश्रय मुने तां त्वमनुजानीहि मामतः
ityetatkathitaṁ vipra mayā pṛṣṭaṁ hi yattvayā samāśraya mune tāṁ tvamanujānīhi māmataḥ
हे विप्र, इस प्रकार आपने जो पूछा, वह मैंने कह दिया; हे मुने, उसका आश्रय लीजिए, और अब आप मुझे अनुमति दीजिए।
श्लोक 74 (skanda.2.189.74)
सूत उवाच इत्येतदुक्त्वा विरते मुनौ कलशजन्मनि उवाच मधुरं वाक्यं व्यासः स तपसां निधिः
sūta uvāca ityetaduktvā virate munau kalaśajanmani uvāca madhuraṁ vākyaṁ vyāsaḥ sa tapasāṁ nidhiḥ
सूत ने कहा — कुम्भसम्भव मुनि के ऐसा कहकर मौन होने पर, तपस्या के निधि व्यास ने मधुर वचन कहा।
श्लोक 75 (skanda.2.189.75)
व्यास उवाच धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि कृतकृत्योऽस्म्यहं मुने सत्यं शौचं श्रुतं विप्र सुशीलं च क्षमार्जवम् सर्वं च निष्फलं तस्य अयोध्यां नागतो यदि
vyāsa uvāca dhanyo’smyanugṛhīto’smi kṛtakṛtyo’smyahaṁ mune satyaṁ śaucaṁ śrutaṁ vipra suśīlaṁ ca kṣamārjavam sarvaṁ ca niṣphalaṁ tasya ayodhyāṁ nāgato yadi
व्यास ने कहा — हे मुने, मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ, कृतकृत्य हूँ; सत्य, शौच, श्रुति, हे विप्र, सुशीलता, क्षमा और सरलता — यदि मनुष्य अयोध्या नहीं गया, तो यह सब निष्फल है।
श्लोक 76 (skanda.2.189.76)
यस्मिन्मयि प्रसन्नेन त्वयोक्तो धर्मनिर्णयः इदानीमपि गच्छामि ह्ययोध्यां निर्मलां पुरीम् त्वमपि व्रज विप्रेंद्र स्वमाश्रमपदं निजम्
yasminmayi prasannena tvayokto dharmanirṇayaḥ idānīmapi gacchāmi hyayodhyāṁ nirmalāṁ purīm tvamapi vraja vipreṁdra svamāśramapadaṁ nijam
जिस मुझ पर प्रसन्न होकर आपने धर्मनिर्णय कहा, अब मैं भी निर्मल पुरी अयोध्या को जाता हूँ; आप भी, हे विप्रेन्द्र, अपने आश्रमपद को जाइए।
श्लोक 77 (skanda.2.189.77)
सूत उवाच इत्यैवमुक्त्वा क्रमशो यात्राविधिमनुत्तमम् जगाम तपसां राशिरगस्त्यः कुंभसंभवः
sūta uvāca ityaivamuktvā kramaśo yātrāvidhimanuttamam jagāma tapasāṁ rāśiragastyaḥ kuṁbhasaṁbhavaḥ
सूत ने कहा — इस प्रकार क्रमशः अनुत्तम यात्राविधि कहकर, तपों की राशि कुम्भसम्भव अगस्त्य चले गए।
श्लोक 78 (skanda.2.189.78)
स्वमाश्रमपदं धीरो विस्मयोत्फुल्ललोचनः व्यासोऽपि महसां राशिर्जगाम विजितेन्द्रियः
svamāśramapadaṁ dhīro vismayotphullalocanaḥ vyāso’pi mahasāṁ rāśirjagāma vijitendriyaḥ
आश्चर्य से खिली हुई आँखों वाले धीर मुनि व्यास भी, तेजों की राशि, इन्द्रियों को जीतकर अपने आश्रमपद को गए।
श्लोक 79 (skanda.2.189.79)
अयोध्यामागतो विप्रः सर्वकामार्थसिद्धये आगत्यैतद्विधानेन कृत्वा यात्रां यथाक्रमम्
ayodhyāmāgato vipraḥ sarvakāmārthasiddhaye āgatyaitadvidhānena kṛtvā yātrāṁ yathākramam
वह विप्र सर्वकामार्थसिद्धि के लिए अयोध्या आया; आकर इस विधान के अनुसार यथाक्रम यात्रा करके —
श्लोक 80 (skanda.2.189.80)
दृष्ट्वा महाश्चर्यकरं कारणं तीर्थमुत्तमम् आनंदतुंदिलस्तत्र सम्यगाचम्य बुद्धिमान्
dṛṣṭvā mahāścaryakaraṁ kāraṇaṁ tīrthamuttamam ānaṁdatuṁdilastatra samyagācamya buddhimān
महान् आश्चर्यकारी कारणरूप उत्तम तीर्थ का दर्शन करके, वहाँ आनन्द से पुलकित बुद्धिमान् मुनि ने भलीभाँति आचमन किया।
श्लोक 81 (skanda.2.189.81)
ततो जगाम विप्रेंद्रः स्वमाश्रमपदं मुनिः व्यासेन कथितं मह्यं माहात्म्यं क्रमशस्तदा
tato jagāma vipreṁdraḥ svamāśramapadaṁ muniḥ vyāsena kathitaṁ mahyaṁ māhātmyaṁ kramaśastadā
फिर वह विप्रेन्द्र मुनि अपने आश्रमपद को गए। इस प्रकार यह माहात्म्य व्यास ने मुझे क्रमशः कहा था।
श्लोक 82 (skanda.2.189.82)
मया श्रुत्वा च माहात्म्यं यात्रां कृत्वा विधानतः कुरुक्षेत्रे समागत्य भवदग्रे निरूपितम्
mayā śrutvā ca māhātmyaṁ yātrāṁ kṛtvā vidhānataḥ kurukṣetre samāgatya bhavadagre nirūpitam
मैंने यह माहात्म्य सुनकर, विधिपूर्वक यात्रा करके, कुरुक्षेत्र में आकर आपके समक्ष निरूपित किया है।
श्लोक 83 (skanda.2.189.83)
इदं माहात्म्यमतुलं यः पठेत्प्रयतो नरः श्रद्धया यश्च शृणुयात्स याति परमां गतिम्
idaṁ māhātmyamatulaṁ yaḥ paṭhetprayato naraḥ śraddhayā yaśca śṛṇuyātsa yāti paramāṁ gatim
जो मनुष्य संयमित होकर इस अनुपम माहात्म्य को पढ़ता है, तथा जो श्रद्धापूर्वक सुनता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 84 (skanda.2.189.84)
तस्मादेतत्प्रयत्नेन श्रोतव्यं च जनैः सदा द्विजपूजा विष्णुपूजा विधातव्या प्रयत्नतः
tasmādetatprayatnena śrotavyaṁ ca janaiḥ sadā dvijapūjā viṣṇupūjā vidhātavyā prayatnataḥ
अतः यह सदा लोगों द्वारा प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिए; द्विजपूजा तथा विष्णुपूजा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिए।
श्लोक 85 (skanda.2.189.85)
दातव्यं च सुवर्णादि यथाशक्त्या द्विजन्मने पुत्रार्थी लभते पुत्रान्धर्म्मार्थी धर्ममाप्नुयात्
dātavyaṁ ca suvarṇādi yathāśaktyā dvijanmane putrārthī labhate putrāndharmmārthī dharmamāpnuyāt
द्विज को यथाशक्ति स्वर्ण आदि देना चाहिए; पुत्रार्थी पुत्रों को प्राप्त करता है, धर्मार्थी धर्म को प्राप्त करता है।
श्लोक 86 (skanda.2.189.86)
अतिविपुलविधानैर्वर्णितं धर्म्यमाद्यं कलयति परभक्त्या क्षेत्रमाहात्म्यमेतत् य इह मनुजवर्यः श्रीसनाथः स सम्यग्व्रजति हरिनिवासं सर्वभोगांश्च भुक्त्वा
ativipulavidhānairvarṇitaṁ dharmyamādyaṁ kalayati parabhaktyā kṣetramāhātmyametat ya iha manujavaryaḥ śrīsanāthaḥ sa samyagvrajati harinivāsaṁ sarvabhogāṁśca bhuktvā
अत्यन्त विपुल विधानों से वर्णित इस आद्य धर्ममय क्षेत्रमाहात्म्य को जो परम भक्ति से हृदयंगम करता है, वह श्रेष्ठ मनुष्य, श्रीसनाथ होकर, सभी भोगों को भोगकर भलीभाँति हरिनिवास को जाता है।
श्लोक 87 (skanda.2.189.87)
यः पाठकस्यापि कदाचिदेव ददाति वित्तं च यथात्मशक्त्या पात्राणि वस्त्राणि मनोहराणि रौप्यं सुवर्णं च गवीः स मुच्येत्
yaḥ pāṭhakasyāpi kadācideva dadāti vittaṁ ca yathātmaśaktyā pātrāṇi vastrāṇi manoharāṇi raupyaṁ suvarṇaṁ ca gavīḥ sa mucyet
जो पाठक को भी कभी एक बार भी यथाशक्ति धन देता है — मनोहर पात्र, वस्त्र, रौप्य, स्वर्ण तथा गौएँ — वह मुक्त हो जाता है।