वैष्णव खण्ड · अध्याय 190
सावर्णि का प्रश्न
श्लोक 1 (skanda.2.190.1)
श्रीकृष्णाय नमोनमः । अथ श्रीवासुदेवमाहात्म्यं प्रारभ्यते । शौनक उवाच । जीवानां श्रेयसे सौते बहुधा साधनानि ते । धर्मो ज्ञानं च वैराग्यं योगादीन्युदितानि नः
śrīkṛṣṇāya namonamaḥ atha śrīvāsudevamāhātmyaṁ prārabhyate śaunaka uvāca jīvānāṁ śreyase saute bahudhā sādhanāni te dharmo jñānaṁ ca vairāgyaṁ yogādīnyuditāni naḥ
श्रीकृष्ण को बारंबार नमस्कार। अब श्री वासुदेव माहात्म्य आरम्भ होता है। शौनक ने कहा — हे सूत! प्राणियों के कल्याण के लिए तुमने अनेक प्रकार के साधन बताए हैं — धर्म, ज्ञान, वैराग्य और योग आदि जो कहे गए हैं।
श्लोक 2 (skanda.2.190.2)
इतिहासैर्बहुविधैर्विस्पष्टार्थानि तानि च । सर्वाण्यपि महाबुद्धे श्रुतान्यस्माभिरादरात्
itihāsairbahuvidhairvispaṣṭārthāni tāni ca sarvāṇyapi mahābuddhe śrutānyasmābhirādarāt
हे महाबुद्धे! वे सभी साधन अनेक प्रकार के इतिहासों द्वारा जिनके अर्थ स्पष्ट किए गए हैं, हमने आदरपूर्वक तुमसे सुने हैं।
श्लोक 3 (skanda.2.190.3)
सर्वेषां मनुजानां तु दुष्कराण्येव तानि तु । बाहुल्याच्चान्तरायाणां तत्सिद्धिरपि दुर्ल्लभा
sarveṣāṁ manujānāṁ tu duṣkarāṇyeva tāni tu bāhulyāccāntarāyāṇāṁ tatsiddhirapi durllabhā
किन्तु समस्त मनुष्यों के लिए वे साधन कठिन ही हैं, तथा विघ्नों की अधिकता के कारण उनकी सिद्धि भी दुर्लभ है।
श्लोक 4 (skanda.2.190.4)
प्रयत्नेनाति महता पुरुषैद्धेंर्य्यशालिभिः । साधितान्यपि सिध्यन्ति तानि कालेन भूयसा
prayatnenāti mahatā puruṣaiddheṁryyaśālibhiḥ sādhitānyapi sidhyanti tāni kālena bhūyasā
अत्यन्त बड़े प्रयत्न से, धैर्यशाली पुरुषों द्वारा साधे जाने पर भी, वे साधन बहुत लंबे काल के बाद ही सिद्ध होते हैं।
श्लोक 5 (skanda.2.190.5)
अतो भवान्द्विजातीनामाश्रमाणां च सर्वशः । ब्रवीतु सुकरोपायं स्त्रीशूद्रादेरपीह नः
ato bhavāndvijātīnāmāśramāṇāṁ ca sarvaśaḥ bravītu sukaropāyaṁ strīśūdrāderapīha naḥ
अतः आप द्विजातियों के लिए, सभी आश्रमों के लिए, तथा स्त्री-शूद्र आदि के लिए भी यहाँ हमें कोई सुगम उपाय बताइए।
श्लोक 6 (skanda.2.190.6)
कृतेन येनाप्यल्पेन येन केनापि देहिना । अन्तरायैरविहतं महदेव फलं भवेत्
kṛtena yenāpyalpena yena kenāpi dehinā antarāyairavihataṁ mahadeva phalaṁ bhavet
जिस साधन को थोड़ा सा भी करने से, किसी भी देहधारी को, विघ्नों से अबाधित होकर महान फल प्राप्त हो सके।
श्लोक 7 (skanda.2.190.7)
मोक्षस्य साधनं तादृक्सुविचार्य्य महामते । हिताय सर्वजीवानां कृपया वक्तुमर्हसि
mokṣasya sādhanaṁ tādṛksuvicāryya mahāmate hitāya sarvajīvānāṁ kṛpayā vaktumarhasi
हे महामते! मोक्ष के उस प्रकार के साधन को भली भाँति विचार कर, सब जीवों के हित के लिए कृपापूर्वक कहने योग्य हैं आप।
श्लोक 8 (skanda.2.190.8)
प्रसादाद्बलदेवस्य व्यासस्य जनकस्य च । जानासि सर्वमेव त्वं तन्नो ब्रूहि बुभुत्सतः
prasādādbaladevasya vyāsasya janakasya ca jānāsi sarvameva tvaṁ tanno brūhi bubhutsataḥ
बलदेव जी की तथा अपने पिता व्यास जी की कृपा से तुम सब कुछ जानते हो; अतः जानने के इच्छुक हम लोगों से वह कहो।
श्लोक 9 (skanda.2.190.9)
सौतिरुवाच । महर्षिरपि सावर्णिरेवमेव हि शौनक । विनीतः स्कन्दमप्राक्षीत्पुनः शङ्करनन्दनम्
sautiruvāca maharṣirapi sāvarṇirevameva hi śaunaka vinītaḥ skandamaprākṣītpunaḥ śaṅkaranandanam
सूत ने कहा — हे शौनक! इसी प्रकार महर्षि सावर्णि ने भी विनम्र होकर शंकर-नन्दन स्कन्द से पुनः प्रश्न किया था।
श्लोक 10 (skanda.2.190.10)
सावर्णिरुवाच । श्रुता नानाविधा धर्म्माः साङ्ख्यज्ञानं च नैकधा । योगादीनि त्वदुक्तानि साधनानि मया गुह
sāvarṇiruvāca śrutā nānāvidhā dharmmāḥ sāṅkhyajñānaṁ ca naikadhā yogādīni tvaduktāni sādhanāni mayā guha
सावर्णि ने कहा — हे गुह! मैंने अनेक प्रकार के धर्म, नाना प्रकार का साङ्ख्य-ज्ञान, तथा योग आदि साधन जो तुमने कहे, सुन लिए हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.190.11)
सुदुष्कराणि मन्येऽहं तानि त्वस्मादृशां किल । महतामपि चान्येषां कृच्छ्रसाध्यानि वै चिरात्
suduṣkarāṇi manye'haṁ tāni tvasmādṛśāṁ kila mahatāmapi cānyeṣāṁ kṛcchrasādhyāni vai cirāt
मैं समझता हूँ कि वे हम जैसों के लिए तो अत्यन्त दुष्कर हैं ही, और अन्य महापुरुषों के लिए भी वे बड़े कष्ट से, दीर्घकाल में ही साध्य हैं।
श्लोक 12 (skanda.2.190.12)
अतो वर्णाश्रमवतां श्रेयस्कृत्सुकरं च यत् । साधनं तच्छ्रेष्ठतमं वक्तुमर्हसि मेऽधुना
ato varṇāśramavatāṁ śreyaskṛtsukaraṁ ca yat sādhanaṁ tacchreṣṭhatamaṁ vaktumarhasi me'dhunā
अतः वर्णाश्रमवालों के लिए जो कल्याणकारी और सुगम भी हो, वह सर्वश्रेष्ठ साधन अब मुझे कहने योग्य हैं आप।
श्लोक 13 (skanda.2.190.13)
सौतिरुवाच । इति पृष्टो मुनीन्द्रेण तेन जिज्ञासुना गुहः । वासुदेवं हृदि ध्यायन्कार्त्तिकेयः स ऊचिवान्
sautiruvāca iti pṛṣṭo munīndreṇa tena jijñāsunā guhaḥ vāsudevaṁ hṛdi dhyāyankārttikeyaḥ sa ūcivān
सूत ने कहा — इस प्रकार उस जिज्ञासु मुनिश्रेष्ठ द्वारा पूछे जाने पर, हृदय में वासुदेव का ध्यान करते हुए कार्तिकेय गुह ने कहा।
श्लोक 14 (skanda.2.190.14)
स्कन्द उवाच । शृणु ब्रह्मन्प्रवक्ष्येऽहं श्रुतं पितृमुखान्मया । सर्वेषामपि जीवानां सुकरं मोक्षसाधनम्
skanda uvāca śṛṇu brahmanpravakṣye'haṁ śrutaṁ pitṛmukhānmayā sarveṣāmapi jīvānāṁ sukaraṁ mokṣasādhanam
स्कन्द ने कहा — हे ब्राह्मण! सुनो, मैं अपने पिता के मुख से जो सुना है वह कहूँगा — समस्त जीवों के लिए सुगम मोक्ष-साधन।
श्लोक 15 (skanda.2.190.15)
देवताप्रीणनसमं स्वेष्टसिद्धिमभीप्सताम् । नास्त्यन्यसाधनं किञ्चिद्वर्णाश्रमवतामिह
devatāprīṇanasamaṁ sveṣṭasiddhimabhīpsatām nāstyanyasādhanaṁ kiñcidvarṇāśramavatāmiha
अपने अभीष्ट की सिद्धि चाहने वालों के लिए, वर्णाश्रमवालों के लिए यहाँ देवता को प्रसन्न करने के समान अन्य कोई साधन नहीं है।
श्लोक 16 (skanda.2.190.16)
अप्यल्पं सुकृतं कर्म्म देवसंबन्धतः कृतम् । फलं ददाति निर्विघ्नं महदेव हि तन्नृणाम्
apyalpaṁ sukṛtaṁ karmma devasaṁbandhataḥ kṛtam phalaṁ dadāti nirvighnaṁ mahadeva hi tannṛṇām
देवता से सम्बन्ध रखकर किया गया थोड़ा सा भी शुभ कर्म मनुष्यों को निर्विघ्न महान फल देता है।
श्लोक 17 (skanda.2.190.17)
दैवं पित्र्यं स्वधर्म्मश्च काम्यं कर्म्मापि यच्च तत् । देवतायास्तु संबन्धात्सद्यः स्यादिष्टसिद्धिदम्
daivaṁ pitryaṁ svadharmmaśca kāmyaṁ karmmāpi yacca tat devatāyāstu saṁbandhātsadyaḥ syādiṣṭasiddhidam
देव-कर्म, पितृ-कर्म, स्वधर्म तथा जो भी काम्य कर्म हो, वह सब देवता से सम्बन्ध होने पर तुरन्त ही इष्ट-सिद्धि देने वाला हो जाता है।
श्लोक 18 (skanda.2.190.18)
साङ्ख्ययोग विरागादि प्रागुक्तं यच्च दुष्करम् । तदपि स्याद्धि सुकरमनेनैवाशु सिद्धिदम्
sāṅkhyayoga virāgādi prāguktaṁ yacca duṣkaram tadapi syāddhi sukaramanenaivāśu siddhidam
साङ्ख्य, योग, वैराग्य आदि जो पहले दुष्कर कहे गए हैं, वे भी इसी साधन से सुगम और शीघ्र सिद्धि देने वाले हो जाते हैं।
श्लोक 19 (skanda.2.190.19)
देवस्याराधनेनैव यतः सिद्ध्यति वाञ्छितम् । अतः सर्वैर्य्यथाशक्ति प्रीत्याराध्यः स मानवैः
devasyārādhanenaiva yataḥ siddhyati vāñchitam ataḥ sarvairyyathāśakti prītyārādhyaḥ sa mānavaiḥ
क्योंकि देवता की आराधना से ही वांछित फल सिद्ध होता है, अतः सब मनुष्यों को अपनी शक्ति के अनुसार प्रेमपूर्वक उनकी आराधना करनी चाहिए।
श्लोक 20 (skanda.2.190.20)
सावर्णिरुवाच । देवा वहुविधा प्रोक्तास्त्वया षण्मुख मे पुरा । नानाविधा वर्णिताश्च तदाराधनरीतयः
sāvarṇiruvāca devā vahuvidhā proktāstvayā ṣaṇmukha me purā nānāvidhā varṇitāśca tadārādhanarītayaḥ
सावर्णि ने कहा — हे षण्मुख! तुमने पहले मुझसे अनेक प्रकार के देवताओं का वर्णन किया, तथा उनकी आराधना की नाना विधियाँ भी बताई हैं।
श्लोक 21 (skanda.2.190.21)
तत्फलानि च सर्वाणि त्वयोक्तानि पृथक्पृथक् । स्वर्गादिप्राप्तिमुख्यानि कालग्रस्तानि तानि तु
tatphalāni ca sarvāṇi tvayoktāni pṛthakpṛthak svargādiprāptimukhyāni kālagrastāni tāni tu
और उनके सभी फल भी तुमने अलग-अलग बताए हैं, जिनमें मुख्य स्वर्ग आदि की प्राप्ति है — किन्तु वे सब काल द्वारा ग्रस्त होने वाले ही हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.190.22)
निवृत्तिधर्म्मिणां ब्रह्मा ह्युपास्तेर्य्योगिनां गुह । जनादिलोकाप्तिफलं द्विपरार्द्धान्तनश्वरम्
nivṛttidharmmiṇāṁ brahmā hyupāsteryyogināṁ guha janādilokāptiphalaṁ dviparārddhāntanaśvaram
हे गुह! निवृत्ति-धर्म वालों तथा योगियों के लिए ब्रह्मा की उपासना का फल जनलोक आदि की प्राप्ति है, जो दो परार्ध के अन्त में नष्ट हो जाने वाला है।
श्लोक 23 (skanda.2.190.23)
दुष्कराणीह संसाध्य कर्म्माणि पुरुकृच्छ्रतः । क्षयिष्णुफललाभश्चेत्तर्हि किं तदुपार्जनैः
duṣkarāṇīha saṁsādhya karmmāṇi purukṛcchrataḥ kṣayiṣṇuphalalābhaścettarhi kiṁ tadupārjanaiḥ
यदि बड़े कष्ट से दुष्कर कर्मों को सिद्ध करके भी क्षय होने वाला फल ही प्राप्त हो, तो फिर उन्हें अर्जित करने से क्या लाभ?
श्लोक 24 (skanda.2.190.24)
कालेन नाश्यते येषां वपुः स्थानबलादिकम् । तेषां न रोचते मह्यमुपासाऽत्र दिवौकसाम्
kālena nāśyate yeṣāṁ vapuḥ sthānabalādikam teṣāṁ na rocate mahyamupāsā'tra divaukasām
जिनके शरीर, स्थान, बल आदि काल द्वारा नष्ट हो जाते हैं, ऐसे देवताओं की उपासना मुझे यहाँ रुचिकर नहीं लगती।
श्लोक 25 (skanda.2.190.25)
यः स्वयं निर्भयोऽन्येषां भयहर्त्ता सनातनः । नित्यधामाऽक्षयफलप्रदाता भक्तवत्सलः
yaḥ svayaṁ nirbhayo'nyeṣāṁ bhayaharttā sanātanaḥ nityadhāmā'kṣayaphalapradātā bhaktavatsalaḥ
जो स्वयं निर्भय है, दूसरों के भय का हरण करने वाला है, सनातन है, नित्य धाम वाला है, अक्षय फल देने वाला है, तथा भक्तों पर वत्सल है —
श्लोक 26 (skanda.2.190.26)
यस्य प्रसादात्सर्वेषां सर्व एव मनोरथाः । सिद्ध्येयुश्चाञ्जसैवाऽत्र तं देवं वद मे गुह
yasya prasādātsarveṣāṁ sarva eva manorathāḥ siddhyeyuścāñjasaivā'tra taṁ devaṁ vada me guha
जिसकी कृपा से सब प्राणियों के सारे मनोरथ सहज ही और तुरन्त सिद्ध हो जाएँ, हे गुह! मुझे उस देवता के विषय में बताओ।
श्लोक 27 (skanda.2.190.27)
तदाराधनरीतिं च सुकरां शिष्टसंमताम् । ब्रूहि सर्वां विशेषेण जिज्ञासामीदमञ्जसा
tadārādhanarītiṁ ca sukarāṁ śiṣṭasaṁmatām brūhi sarvāṁ viśeṣeṇa jijñāsāmīdamañjasā
और शिष्टजनों द्वारा स्वीकृत उसकी सुगम आराधना-विधि भी विशेष रूप से पूर्णतः बताओ, यही मेरी सच्ची जिज्ञासा है।
श्लोक 28 (skanda.2.190.28)
सौतिरुवाच । इत्थं महर्षिणा तेन संपृष्टो भगवान्गुहः । सुप्रसन्न उवाचेदं मानयंस्तमुदारधीः
sautiruvāca itthaṁ maharṣiṇā tena saṁpṛṣṭo bhagavānguhaḥ suprasanna uvācedaṁ mānayaṁstamudāradhīḥ
सूत ने कहा — इस प्रकार उस महर्षि द्वारा पूछे जाने पर, उदारबुद्धि भगवान गुह उनका सम्मान करते हुए अत्यन्त प्रसन्न होकर यह बोले।