वैष्णव खण्ड · अध्याय 191
नारायण-नारद समागम
श्लोक 1 (skanda.2.191.1)
स्कन्द उवाच । महान्तं प्रश्नवित्प्रश्नं पृच्छसि त्वमि हाऽनघ । नास्योत्तरं वर्षशतैर्वक्तुं शक्यं स्वतर्कतः । ऋते देवप्रसादाद्वै ब्रह्मञ्ज्ञानिवरैरपि
skanda uvāca mahāntaṁ praśnavitpraśnaṁ pṛcchasi tvami hā'nagha nāsyottaraṁ varṣaśatairvaktuṁ śakyaṁ svatarkataḥ ṛte devaprasādādvai brahmañjñānivarairapi
स्कन्द ने कहा — हे निष्पाप! तुम प्रश्न करना जानते हुए एक महान प्रश्न पूछ रहे हो। हे ब्राह्मण! देवता की कृपा के बिना इसका उत्तर श्रेष्ठ ज्ञानियों द्वारा भी सैकड़ों वर्षों में स्वयं के तर्क से नहीं कहा जा सकता।
श्लोक 2 (skanda.2.191.2)
वासुदेवप्रसादात्तु मया ज्ञातं वदामि ते । अनाख्येयं न ते किञ्चिद्धर्मनिष्ठाय सन्मते
vāsudevaprasādāttu mayā jñātaṁ vadāmi te anākhyeyaṁ na te kiñciddharmaniṣṭhāya sanmate
किन्तु वासुदेव की कृपा से जो मैंने जाना है वह तुम्हें कहता हूँ; हे धर्मनिष्ठ सज्जन! तुम्हारे लिए कुछ भी अकथनीय नहीं है।
श्लोक 3 (skanda.2.191.3)
एवमेव हि पप्रच्छ निवृत्ते भारते रणे । अजातशत्रुर्नृपतिर्भीष्मं धर्म्मविदांवरम्
evameva hi papraccha nivṛtte bhārate raṇe ajātaśatrurnṛpatirbhīṣmaṁ dharmmavidāṁvaram
इसी प्रकार, भारत-युद्ध समाप्त हो जाने पर, राजा अजातशत्रु (युधिष्ठिर) ने धर्मज्ञों में श्रेष्ठ भीष्म से यही प्रश्न पूछा था।
श्लोक 4 (skanda.2.191.4)
शयितं शरशय्यायां ध्यानप्राप्ताच्युतेन च । प्राप्तमैकात्म्यमव्यग्रं निगमागमपारगम्
śayitaṁ śaraśayyāyāṁ dhyānaprāptācyutena ca prāptamaikātmyamavyagraṁ nigamāgamapāragam
जो बाणों की शय्या पर लेटे हुए थे, ध्यान द्वारा अच्युत के साथ एकत्व को अविचल भाव से प्राप्त कर चुके थे, तथा वेद-आगम के पारगामी थे।
श्लोक 5 (skanda.2.191.5)
युधिष्ठिर उवाच । चतुर्षु तात वर्णेषु चतुर्ष्वप्याश्रमेषु यः । इच्छेच्चतुर्वर्गसिद्धिं देवतां कां यजेत सः
yudhiṣṭhira uvāca caturṣu tāta varṇeṣu caturṣvapyāśrameṣu yaḥ iccheccaturvargasiddhiṁ devatāṁ kāṁ yajeta saḥ
युधिष्ठिर ने कहा — हे तात! चारों वर्णों में तथा चारों आश्रमों में जो भी चारों पुरुषार्थों की सिद्धि चाहे, उसे किस देवता का यजन करना चाहिए?
श्लोक 6 (skanda.2.191.6)
निर्विघ्रेन च का सिद्धिः कथं स्यादल्पकालतः । कथं चाप्यल्पसुकृती पदवीं महतीमियात् । एतं मे संशयं छिन्धि सर्वज्ञस्त्वं पितामह
nirvighrena ca kā siddhiḥ kathaṁ syādalpakālataḥ kathaṁ cāpyalpasukṛtī padavīṁ mahatīmiyāt etaṁ me saṁśayaṁ chindhi sarvajñastvaṁ pitāmaha
निर्विघ्न सिद्धि किस उपाय से और अल्प समय में कैसे हो सकती है? और अल्प पुण्यवाला भी महान पद को कैसे पा सकता है? हे पितामह! आप सर्वज्ञ हैं, मेरे इस संशय को दूर कीजिए।
श्लोक 7 (skanda.2.191.7)
स्कन्द उवाच । एवं धर्म्मात्मना तेन पृष्टः शान्तनवो मुने । किञ्चिज्जहास वीक्ष्यैव श्रीकृष्ण मुखपङ्कजम्
skanda uvāca evaṁ dharmmātmanā tena pṛṣṭaḥ śāntanavo mune kiñcijjahāsa vīkṣyaiva śrīkṛṣṇa mukhapaṅkajam
स्कन्द ने कहा — हे मुने! उस धर्मात्मा युधिष्ठिर द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, शान्तनु-पुत्र भीष्म श्रीकृष्ण के मुखकमल को देखकर कुछ मुस्कराए।
श्लोक 8 (skanda.2.191.8)
दृशा स प्रेरितस्तेन नरनारायणोदितम् । श्रीवासुदेवमाहात्म्यं पितुः श्रुतमुवाच तम्
dṛśā sa preritastena naranārāyaṇoditam śrīvāsudevamāhātmyaṁ pituḥ śrutamuvāca tam
उस दृष्टि से प्रेरित होकर, उन्होंने नर-नारायण द्वारा कहे गए तथा पिता से सुने हुए उस श्रीवासुदेव-माहात्म्य को कहा।
श्लोक 9 (skanda.2.191.9)
ततः श्रुत्वा नारदोपि कुरुक्षेत्रं गतः पुनः । कैलास एत्य तत्प्राह पितरं मे स चापि माम्
tataḥ śrutvā nāradopi kurukṣetraṁ gataḥ punaḥ kailāsa etya tatprāha pitaraṁ me sa cāpi mām
फिर उसे सुनकर नारद भी पुनः कुरुक्षेत्र गए; कैलास आकर उन्होंने वह मेरे पिता से कहा, और उन्होंने वह मुझे भी कहा।
श्लोक 10 (skanda.2.191.10)
तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि निश्छद्म परिपृच्छते । महासदसि निर्णीतं मुनिवर्याऽपसंशयम्
tatte'haṁ saṁpravakṣyāmi niśchadma paripṛcchate mahāsadasi nirṇītaṁ munivaryā'pasaṁśayam
हे मुनिश्रेष्ठ! निष्कपट भाव से पूछने वाले तुम्हें मैं वही बताऊँगा, जो महासभा में निश्चित हुआ और सर्वथा संशयरहित है।
श्लोक 11 (skanda.2.191.11)
वासुदेवः परं ब्रह्म श्रीकृष्णः पुरुषोत्तमः । देवोऽकामैः सकामैश्च पूज्यो मुक्तैर्नरैरपि
vāsudevaḥ paraṁ brahma śrīkṛṣṇaḥ puruṣottamaḥ devo'kāmaiḥ sakāmaiśca pūjyo muktairnarairapi
वासुदेव परब्रह्म हैं, श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम हैं — वे देव कामनारहित तथा सकाम पुरुषों द्वारा, और मुक्त मनुष्यों द्वारा भी पूज्य हैं।
श्लोक 12 (skanda.2.191.12)
द्विजातीनां चाश्रमाणां स्त्रीशूद्रादेश्च सर्वथा । स्वस्वधर्मैरेष एव तोषणीयोस्ति भक्तितः
dvijātīnāṁ cāśramāṇāṁ strīśūdrādeśca sarvathā svasvadharmaireṣa eva toṣaṇīyosti bhaktitaḥ
द्विजातियों के, आश्रमों के, तथा स्त्री-शूद्र आदि के लिए भी सर्वथा अपने-अपने धर्मों द्वारा भक्तिपूर्वक यही एक संतोषणीय हैं।
श्लोक 13 (skanda.2.191.13)
तस्मात्कर्माखिलमपि दैवं पित्र्यं च सर्वदा । तत्प्रीत्या एव कर्त्तव्यं वेदोक्तं च यथोचितम्
tasmātkarmākhilamapi daivaṁ pitryaṁ ca sarvadā tatprītyā eva karttavyaṁ vedoktaṁ ca yathocitam
इसलिए देव-कर्म और पितृ-कर्म सहित समस्त कर्म सदा वेदोक्त एवं यथोचित विधि से, केवल उन्हीं की प्रसन्नता के लिए करना चाहिए।
श्लोक 14 (skanda.2.191.14)
सुखाप्तये नृभियद्यत्कर्माऽत्र क्रियते शुभम् । अपि स्वनुष्ठितं तच्चेत्कृष्णसंबन्धवर्जितम् । तदा क्षयिष्ण्वल्पफलं ज्ञेयं तच्च गुणात्मकम्
sukhāptaye nṛbhiyadyatkarmā'tra kriyate śubham api svanuṣṭhitaṁ taccetkṛṣṇasaṁbandhavarjitam tadā kṣayiṣṇvalpaphalaṁ jñeyaṁ tacca guṇātmakam
सुख पाने के लिए मनुष्यों द्वारा जो भी शुभ कर्म यहाँ किया जाता है, यदि वह भली भाँति किया गया हो तो भी कृष्ण से सम्बन्धरहित हो, तो वह क्षीण होने वाला अल्प फल देने वाला तथा गुणात्मक ही जानना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.2.191.15)
फलवैगुण्यकृत्तच्चाऽशुभदेशादियोगतः । बहुविघ्नं च तन्नॄणां नैव वाञ्छितसिद्धिदम्
phalavaiguṇyakṛttaccā'śubhadeśādiyogataḥ bahuvighnaṁ ca tannṝṇāṁ naiva vāñchitasiddhidam
अशुभ देश आदि के योग से वह फल में दोष उत्पन्न करने वाला, मनुष्यों के लिए बहुत विघ्नकारी, तथा कदापि वांछित सिद्धि न देने वाला होता है।
श्लोक 16 (skanda.2.191.16)
कर्मैतदेव श्रीकृष्णप्रीणनाय क्रियेत चेत् । तत्संबन्धेन तर्ह्येतद्भवेत्सर्वं हि निर्गुणम्
karmaitadeva śrīkṛṣṇaprīṇanāya kriyeta cet tatsaṁbandhena tarhyetadbhavetsarvaṁ hi nirguṇam
यदि यही कर्म श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए किया जाए, तो उनके सम्बन्ध से यह सब गुणातीत ही हो जाता है।
श्लोक 17 (skanda.2.191.17)
स्ववाञ्छितादप्यधिकं ददाति फलमक्षयम् । असद्देशादिसंबन्धात्तद्वैगुण्यभवेन्न च
svavāñchitādapyadhikaṁ dadāti phalamakṣayam asaddeśādisaṁbandhāttadvaiguṇyabhavenna ca
वह अपनी इच्छा से भी अधिक अक्षय फल देता है, और अशुभ देश आदि के सम्बन्ध से उसमें कोई दोष नहीं होता।
श्लोक 18 (skanda.2.191.18)
विघ्नस्तु कोपि ब्रह्मर्षे प्रतापाच्चक्रपाणिनः । तस्मिन्न प्रभवेत्क्वापि तत्स्यादीप्सितसिद्धिदम्
vighnastu kopi brahmarṣe pratāpāccakrapāṇinaḥ tasminna prabhavetkvāpi tatsyādīpsitasiddhidam
हे ब्रह्मर्षे! चक्रपाणि के प्रताप से उस पर कहीं भी कोई विघ्न प्रभाव नहीं डाल सकता, और वह अभीष्ट सिद्धि देने वाला होता है।
श्लोक 19 (skanda.2.191.19)
यद्यप्यल्पं स्वसुकृतं तथापि परमात्मनः । साक्षात्संबन्धतो ब्रह्मन्भवत्येव महत्तरम्
yadyapyalpaṁ svasukṛtaṁ tathāpi paramātmanaḥ sākṣātsaṁbandhato brahmanbhavatyeva mahattaram
हे ब्रह्मन्! यद्यपि अपना पुण्य अल्प हो, फिर भी परमात्मा से साक्षात् सम्बन्ध होने से वह अवश्य ही महान हो जाता है।
श्लोक 20 (skanda.2.191.20)
यथा स्फुलिङ्गमात्रोपि वन्यकाष्ठौघयोगतः । अनिवार्यो भवेद्दावस्तथैतद्धरियोगतः
yathā sphuliṅgamātropi vanyakāṣṭhaughayogataḥ anivāryo bhaveddāvastathaitaddhariyogataḥ
जैसे एक चिनगारी मात्र भी वन-काष्ठ के समूह से मिलकर अनिवार्य दावाग्नि बन जाती है, वैसे ही यह हरि के योग से हो जाता है।
श्लोक 21 (skanda.2.191.21)
प्रवृत्ते वा निवृत्ते वा तस्माद्धर्मे स्थितैर्न्नरैः । उपास्तव्यो वासुदेवस्तत्सम्यक्सिद्धिमीप्सुभिः
pravṛtte vā nivṛtte vā tasmāddharme sthitairnnaraiḥ upāstavyo vāsudevastatsamyaksiddhimīpsubhiḥ
इसलिए प्रवृत्ति-धर्म में या निवृत्ति-धर्म में स्थित मनुष्यों को, जो उसकी सम्यक् सिद्धि चाहते हैं, वासुदेव की उपासना करनी चाहिए।
श्लोक 22 (skanda.2.191.22)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदस्य च संवादमृषेर्नारायणस्य च
atrāpyudāharantīmamitihāsaṁ purātanam nāradasya ca saṁvādamṛṣernārāyaṇasya ca
इस विषय में भी यह प्राचीन इतिहास तथा ऋषि नारद और नारायण का संवाद उदाहरण के रूप में कहा जाता है।
श्लोक 23 (skanda.2.191.23)
यो वासुदेवो भगवान्नित्यं ब्रह्मपुरे स्थितः । दाक्षायण्यामाविरासीद्धर्माल्लोकहिताय सः
yo vāsudevo bhagavānnityaṁ brahmapure sthitaḥ dākṣāyaṇyāmāvirāsīddharmāllokahitāya saḥ
वे भगवान वासुदेव, जो नित्य ब्रह्मपुर में स्थित हैं, लोक-कल्याण के लिए धर्म से दक्ष-पुत्री में प्रकट हुए।
श्लोक 24 (skanda.2.191.24)
कृते युगे द्विजवर पुरा स्वायम्भुवान्तरे । नरो नारायणश्चेति द्विरूपः प्रादुरास सः
kṛte yuge dvijavara purā svāyambhuvāntare naro nārāyaṇaśceti dvirūpaḥ prādurāsa saḥ
हे द्विजवर! सत्ययुग में, पूर्वकाल में स्वायम्भुव मन्वन्तर में, वे नर और नारायण नामक दो रूपों में प्रकट हुए।
श्लोक 25 (skanda.2.191.25)
धर्माश्रमात्तपस्तप्तुं क्षेमायैव नृणां भुवि । नरनारायणौ तौ च बदर्याश्रममीयतुः
dharmāśramāttapastaptuṁ kṣemāyaiva nṛṇāṁ bhuvi naranārāyaṇau tau ca badaryāśramamīyatuḥ
पृथ्वी पर मनुष्यों के कल्याण के लिए तप करने हेतु, वे नर-नारायण धर्म के आश्रम से बदरिकाश्रम को गए।
श्लोक 26 (skanda.2.191.26)
तत्राद्यौ लोकनाथौ तौ कृशौ धमनिसंततौ । तेपाते तेजसा स्वेन दुर्निरीक्ष्यौ सुरैरपि
tatrādyau lokanāthau tau kṛśau dhamanisaṁtatau tepāte tejasā svena durnirīkṣyau surairapi
वहाँ वे दोनों आदि लोकनाथ, कृश शरीर वाले तथा शिराओं से युक्त, अपने तेज से देवताओं के लिए भी दुर्निरीक्ष्य होते हुए तप करने लगे।
श्लोक 27 (skanda.2.191.27)
यस्य प्रसादं कुर्वाते स वै तौ द्रष्टुमर्हति । शक्यते नान्यथा द्रष्टुमपि तद्धामवासिभिः
yasya prasādaṁ kurvāte sa vai tau draṣṭumarhati śakyate nānyathā draṣṭumapi taddhāmavāsibhiḥ
जिस पर वे दोनों कृपा करते हैं, वही उन्हें देखने योग्य होता है; अन्यथा उनके धाम में रहने वालों द्वारा भी उन्हें देखा नहीं जा सकता।
श्लोक 28 (skanda.2.191.28)
एकदा नारदो योगी ताभ्यामेव दिदृक्षितः । अन्तरात्मतया चान्तर्हृदयेपि प्रचोदितः
ekadā nārado yogī tābhyāmeva didṛkṣitaḥ antarātmatayā cāntarhṛdayepi pracoditaḥ
एक बार योगी नारद को उन दोनों ने ही देखने की इच्छा उत्पन्न कराई, तथा अन्तरात्मा रूप से उनके हृदय के भीतर से भी प्रेरित किया।
श्लोक 29 (skanda.2.191.29)
मेरोर्महागिरेः शृङ्गात्सद्यो गगनवर्त्मना । तं देशमागमद्ब्रह्मन्बदर्याश्रमसंज्ञितम्
merormahāgireḥ śṛṅgātsadyo gaganavartmanā taṁ deśamāgamadbrahmanbadaryāśramasaṁjñitam
हे ब्रह्मन्! महागिरि मेरु के शिखर से तत्काल आकाशमार्ग द्वारा वे बदरिकाश्रम नामक उस स्थान पर आए।
श्लोक 30 (skanda.2.191.30)
तयोराह्निकवेलायामागतस्तत्र स द्रुतम् । आद्याश्रमक्रियासक्तौ तौ ददर्श च दूरतः
tayorāhnikavelāyāmāgatastatra sa drutam ādyāśramakriyāsaktau tau dadarśa ca dūrataḥ
उनके नित्य-कर्म के समय वहाँ शीघ्रता से पहुँचकर, उन्होंने उन दोनों आद्य पुरुषों को आश्रम की क्रियाओं में लगे हुए दूर से देखा।
श्लोक 31 (skanda.2.191.31)
दृष्ट्वैवेश्वरचर्यां ता तस्य कौतूहलं त्वभूत् । अहो एतौ जगत्पूज्यावीश्वरौ सर्वदेहिनाम् । एतौ हि परमं ब्रह्म काऽनयोराह्निकी क्रिया
dṛṣṭvaiveśvaracaryāṁ tā tasya kautūhalaṁ tvabhūt aho etau jagatpūjyāvīśvarau sarvadehinām etau hi paramaṁ brahma kā'nayorāhnikī kriyā
उन ईश्वरों की चर्या देखकर उसे कौतूहल हुआ — अहो! ये दोनों समस्त प्राणियों द्वारा पूज्य जगदीश्वर हैं, ये ही परब्रह्म हैं, फिर इनकी यह नित्य-क्रिया क्या है?
श्लोक 32 (skanda.2.191.32)
पितरौ सर्वभूतानां देवतानां च दैवतम् । कां देवतां तु यजतः पितॄन्वैतौ महामती
pitarau sarvabhūtānāṁ devatānāṁ ca daivatam kāṁ devatāṁ tu yajataḥ pitṝnvaitau mahāmatī
जो समस्त प्राणियों के पिता तथा देवताओं के भी देवता हैं, वे दोनों महामति किस देवता का तथा किन पितरों का यजन करते हैं?
श्लोक 33 (skanda.2.191.33)
इति संचिन्त्य मनसा भक्तो नारायणस्य सः । तत्समीपमुपेत्याऽथ तस्थौ नत्वा कृताञ्जलिः
iti saṁcintya manasā bhakto nārāyaṇasya saḥ tatsamīpamupetyā'tha tasthau natvā kṛtāñjaliḥ
इस प्रकार मन में विचार कर, नारायण के वे भक्त नारद उनके समीप जाकर हाथ जोड़कर नमन करते हुए खड़े हो गए।
श्लोक 34 (skanda.2.191.34)
कृते दैवे च पित्र्ये च ततस्ताभ्यां निरीक्षितः । पूजितश्चैव विधिना शास्त्रदृष्टेन सोऽनघ
kṛte daive ca pitrye ca tatastābhyāṁ nirīkṣitaḥ pūjitaścaiva vidhinā śāstradṛṣṭena so'nagha
देव-कर्म और पितृ-कर्म पूर्ण होने पर, उन दोनों ने उसे देखा, और हे निष्पाप! शास्त्रोक्त विधि से उसका सम्मान भी किया।
श्लोक 35 (skanda.2.191.35)
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्य्यमपूर्वं विधिविस्तरम् । उपोपविष्टः सुप्रीतो नारदोभूच्च विस्मितः
taddṛṣṭvā mahadāścaryyamapūrvaṁ vidhivistaram upopaviṣṭaḥ suprīto nāradobhūcca vismitaḥ
उस महान, अपूर्व एवं विस्तृत विधि को देखकर, समीप बैठे हुए नारद अत्यन्त प्रसन्न तथा विस्मित हो गए।
श्लोक 36 (skanda.2.191.36)
नारायणं संनिरीक्ष्य प्रयतेनान्तरात्मना । नमस्कृत्य च तं देवमिदं वचनमब्रवीत्
nārāyaṇaṁ saṁnirīkṣya prayatenāntarātmanā namaskṛtya ca taṁ devamidaṁ vacanamabravīt
शुद्ध अन्तःकरण से नारायण की ओर देखकर तथा उन देव को नमस्कार करके, नारद ने यह वचन कहा।