वैष्णव खण्ड · अध्याय 192
श्रीवासुदेव-सर्वोपास्यत्व-निरूपण
श्लोक 1 (skanda.2.192.1)
नारद उवाच । वेदेषु सपुराणेषु सांगोपांगेषु गीयसे । त्वमेव शाश्वतो धाता नियन्तामृतमच्युत । त्वं विधाता च सततं त्वयि सर्वमिदं जगत्
nārada uvāca vedeṣu sapurāṇeṣu sāṁgopāṁgeṣu gīyase tvameva śāśvato dhātā niyantāmṛtamacyuta tvaṁ vidhātā ca satataṁ tvayi sarvamidaṁ jagat
नारद ने कहा — हे अच्युत! अंगों-उपांगों सहित वेदों तथा पुराणों में आप ही शाश्वत धाता, नियन्ता और अमृतस्वरूप गाए जाते हैं। आप ही सदा विधाता हैं, और आप में ही यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है।
श्लोक 2 (skanda.2.192.2)
चत्वारो ह्याश्रमा देव सर्वे वर्णाश्च कर्मभिः । यजन्ते त्वामहरहर्न्नानामूर्त्तिसमास्थितम्
catvāro hyāśramā deva sarve varṇāśca karmabhiḥ yajante tvāmaharaharnnānāmūrttisamāsthitam
हे देव! चारों आश्रम तथा सभी वर्ण अपने-अपने कर्मों द्वारा नाना रूपों में स्थित आपका प्रतिदिन यजन करते हैं।
श्लोक 3 (skanda.2.192.3)
पिता माता च सर्वस्य दैवतं त्वं हि शाश्वतम् । कं त्वं च यजसे देवं पितरं वा न विद्महे
pitā mātā ca sarvasya daivataṁ tvaṁ hi śāśvatam kaṁ tvaṁ ca yajase devaṁ pitaraṁ vā na vidmahe
आप सबके शाश्वत पिता, माता और देवता हैं; किन्तु आप स्वयं किस देवता का अथवा किस पितर का यजन करते हैं, यह हम नहीं जानते।
श्लोक 4 (skanda.2.192.4)
श्रीनारायण उवाच । नैतद्रहस्यं वक्तव्यमात्मगुह्यमथापि ते । मयि भक्तिमते ब्रह्मन्प्रवक्ष्यामि यथातथम्
śrīnārāyaṇa uvāca naitadrahasyaṁ vaktavyamātmaguhyamathāpi te mayi bhaktimate brahmanpravakṣyāmi yathātatham
श्रीनारायण ने कहा — यह गुह्य रहस्य साधारणतः कहने योग्य नहीं है, फिर भी हे ब्राह्मण! मुझ पर भक्ति रखने वाले तुम्हें मैं यथार्थ रूप से कहूँगा।
श्लोक 5 (skanda.2.192.5)
सत्यं ज्ञानमनन्तं यो ब्रह्मेति श्रुतिवर्णितः । त्रिगुणव्यतिरिक्तश्च पुरुषो दिव्यविग्रहः
satyaṁ jñānamanantaṁ yo brahmeti śrutivarṇitaḥ triguṇavyatiriktaśca puruṣo divyavigrahaḥ
जो श्रुति द्वारा सत्य, ज्ञान और अनन्त — ब्रह्म — कहकर वर्णित है, जो तीनों गुणों से परे तथा दिव्य विग्रह वाला पुरुष है —
श्लोक 6 (skanda.2.192.6)
महापुरुष इत्युक्तो वासुदेवश्च यः प्रभुः । नारायण ऋषिर्विष्णुः कृष्णश्च भगवानिति
mahāpuruṣa ityukto vāsudevaśca yaḥ prabhuḥ nārāyaṇa ṛṣirviṣṇuḥ kṛṣṇaśca bhagavāniti
जो महापुरुष कहा गया है, जो प्रभु वासुदेव हैं, जो ऋषि नारायण, विष्णु तथा भगवान कृष्ण कहलाते हैं —
श्लोक 7 (skanda.2.192.7)
एकः स एव देवो नौ पितरौ चेति विद्धि भोः । आवाभ्यां पूज्यतेऽसौ हि दैवे पित्र्ये च कल्पिते
ekaḥ sa eva devo nau pitarau ceti viddhi bhoḥ āvābhyāṁ pūjyate'sau hi daive pitrye ca kalpite
हे नारद! जानो कि वही एक देव हम दोनों का पिता है; उसी की हम दोनों देव-कर्म और पितृ-कर्म के रूप में पूजा करते हैं।
श्लोक 8 (skanda.2.192.8)
नास्ति तस्मात्परतरः पिता देवोऽथ वा द्विज । आत्मा हि नौ स विज्ञेयः कृष्णो ब्रह्मपुरेश्वरः
nāsti tasmātparataraḥ pitā devo'tha vā dvija ātmā hi nau sa vijñeyaḥ kṛṣṇo brahmapureśvaraḥ
हे द्विज! उससे बढ़कर कोई पिता या देवता नहीं है; ब्रह्मपुर के ईश्वर वे कृष्ण ही हम दोनों की आत्मा जानने योग्य हैं।
श्लोक 9 (skanda.2.192.9)
तेनैषा प्रथिता ब्रह्मन्मर्यादा लोकभावनी । दैवं पित्र्यं च कर्तव्यमिति लोकहितैषिणा
tenaiṣā prathitā brahmanmaryādā lokabhāvanī daivaṁ pitryaṁ ca kartavyamiti lokahitaiṣiṇā
हे ब्राह्मण! लोक-कल्याण चाहने वाले उन्हीं के द्वारा यह लोक-हितकारी मर्यादा स्थापित की गई है कि देव-कर्म तथा पितृ-कर्म करने चाहिए।
श्लोक 10 (skanda.2.192.10)
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्वेधा कर्मास्ति वैदिकम् । यथाधिकारं विहितं पुरुषार्थोपलब्धये
pravṛttaṁ ca nivṛttaṁ ca dvedhā karmāsti vaidikam yathādhikāraṁ vihitaṁ puruṣārthopalabdhaye
वैदिक कर्म प्रवृत्ति और निवृत्ति के भेद से दो प्रकार का है, जो पुरुषार्थ की प्राप्ति के लिए अधिकार के अनुसार विहित है।
श्लोक 11 (skanda.2.192.11)
तन्त्रवेदोक्तविधिना स्वोचितस्त्रीपरिग्रहः । वित्तार्जनं च न्यायेन द्रव्ययज्ञाः सकामनाः
tantravedoktavidhinā svocitastrīparigrahaḥ vittārjanaṁ ca nyāyena dravyayajñāḥ sakāmanāḥ
तन्त्र और वेद में कही गई विधि से उचित स्त्री का ग्रहण करना, न्यायपूर्वक धन कमाना, तथा सकाम भाव से द्रव्य-यज्ञ करना —
श्लोक 12 (skanda.2.192.12)
वासो ग्रामे च नगरे पूर्तमिष्टं च कर्म यत् । प्रवृत्तं तत्तु सकलमशान्तिकृदुदीरितम्
vāso grāme ca nagare pūrtamiṣṭaṁ ca karma yat pravṛttaṁ tattu sakalamaśāntikṛdudīritam
गाँव या नगर में निवास करना, तथा जो पूर्त और इष्ट कर्म हैं — यह सब प्रवृत्ति कर्म कहा गया है, जो अशान्ति उत्पन्न करने वाला बताया गया है।
श्लोक 13 (skanda.2.192.13)
स्त्रीद्रव्ययोः परित्यागः कामलोभक्रुधां तथा । वनवासश्च वैराग्यं तपः क्षान्तिः शमो दमः
strīdravyayoḥ parityāgaḥ kāmalobhakrudhāṁ tathā vanavāsaśca vairāgyaṁ tapaḥ kṣāntiḥ śamo damaḥ
स्त्री और धन का त्याग, तथा काम, लोभ और क्रोध का त्याग; वनवास, वैराग्य, तप, क्षमा, शम और दम —
श्लोक 14 (skanda.2.192.14)
ब्रह्मयज्ञा योगयज्ञा ज्ञानयज्ञाश्च सर्वशः । जपयज्ञाश्चेति मुने निवृत्तं कर्म कीर्तितम्
brahmayajñā yogayajñā jñānayajñāśca sarvaśaḥ japayajñāśceti mune nivṛttaṁ karma kīrtitam
हे मुने! ब्रह्म-यज्ञ, योग-यज्ञ, सब प्रकार के ज्ञान-यज्ञ तथा जप-यज्ञ — इस प्रकार निवृत्ति कर्म कहा गया है।
श्लोक 15 (skanda.2.192.15)
त्रिलोक्यां गतयो धर्मं प्रवृत्तमनुतिष्ठताम् । स्वर्गलोकावधि मुने मनुष्याणां भवन्ति वै
trilokyāṁ gatayo dharmaṁ pravṛttamanutiṣṭhatām svargalokāvadhi mune manuṣyāṇāṁ bhavanti vai
हे मुने! प्रवृत्ति धर्म का पालन करने वाले मनुष्यों की गतियाँ त्रिलोकी में स्वर्गलोक तक ही सीमित होती हैं।
श्लोक 16 (skanda.2.192.16)
इन्द्रचन्द्राग्निलोकादौ स्वस्वपुण्यफलं च ते । भोगैश्वर्यं वहुविधमभीष्टं भुञ्जते खलु
indracandrāgnilokādau svasvapuṇyaphalaṁ ca te bhogaiśvaryaṁ vahuvidhamabhīṣṭaṁ bhuñjate khalu
इन्द्र, चन्द्र, अग्नि आदि के लोकों में वे अपने-अपने पुण्य के फलस्वरूप अनेक प्रकार के अभीष्ट भोग-ऐश्वर्य का उपभोग करते हैं।
श्लोक 17 (skanda.2.192.17)
यावत्पुण्यं तावदेव भुक्त्वा तत्ते सुराऽस्ततः । क्षीणे तु सुकृते भूयः पतन्ति विवशा भुवि
yāvatpuṇyaṁ tāvadeva bhuktvā tatte surā'stataḥ kṣīṇe tu sukṛte bhūyaḥ patanti vivaśā bhuvi
जब तक पुण्य रहता है तब तक ही देवत्व का भोग करके, पुण्य क्षीण होने पर वे फिर से विवश होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं।
श्लोक 18 (skanda.2.192.18)
भोगैश्वर्यादिनाशो हि कालवेगेन जायते । अनिच्छतामपि मुने तेषां पुण्यक्षये सति
bhogaiśvaryādināśo hi kālavegena jāyate anicchatāmapi mune teṣāṁ puṇyakṣaye sati
हे मुने! उनके पुण्य के क्षीण होने पर, उनकी इच्छा न होते हुए भी, काल के वेग से उनके भोग-ऐश्वर्य आदि का नाश हो जाता है।
श्लोक 19 (skanda.2.192.19)
आधिकारिकदेवानामपि ब्रह्मदिने मुहुः । इष्टभोगैश्वर्यनाशो जायते कालरंहसा
ādhikārikadevānāmapi brahmadine muhuḥ iṣṭabhogaiśvaryanāśo jāyate kālaraṁhasā
अधिकार प्राप्त देवताओं का भी ब्रह्मा के एक दिन में बार-बार, काल की गति से उनके अभीष्ट भोग-ऐश्वर्य का नाश हो जाता है।
श्लोक 20 (skanda.2.192.20)
निवृत्तधर्मनिष्ठा ये योगिनश्च तपस्विनः । जनादीन्यान्ति लोकांस्त्रींस्ते तु त्रैलोक्यतो बहिः
nivṛttadharmaniṣṭhā ye yoginaśca tapasvinaḥ janādīnyānti lokāṁstrīṁste tu trailokyato bahiḥ
परन्तु जो निवृत्ति-धर्म में निष्ठ योगी और तपस्वी हैं, वे त्रैलोक्य से परे स्थित जनलोक आदि तीन लोकों को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 21 (skanda.2.192.21)
तत्तल्लोकैश्वर्यभोगान्भुञ्जते ते निजेप्सितान् । दैनन्दिनेपि प्रलये वर्त्तन्ते ते यथासुखम्
tattallokaiśvaryabhogānbhuñjate te nijepsitān dainandinepi pralaye varttante te yathāsukham
वे उन-उन लोकों के अपने इच्छित ऐश्वर्य-भोगों का उपभोग करते हैं, और नित्य होने वाले प्रलय में भी सुखपूर्वक बने रहते हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.192.22)
ब्रह्मणो द्विपरार्द्धान्ते तद्भोगैश्वर्यसंपदः । नश्यन्ति कालशक्त्यैव लोकास्तेषां च नारद
brahmaṇo dviparārddhānte tadbhogaiśvaryasaṁpadaḥ naśyanti kālaśaktyaiva lokāsteṣāṁ ca nārada
हे नारद! ब्रह्मा के दो परार्ध पूर्ण होने पर, काल की शक्ति से ही उनकी वे भोग-ऐश्वर्य सम्पदाएँ तथा वे लोक भी नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 23 (skanda.2.192.23)
अथैतद्विविधं कर्म गुणात्मकमपि द्विज । कृतं चेद्विष्णुसंबद्धं निर्गुणं स्यात्तदा तु तत्
athaitadvividhaṁ karma guṇātmakamapi dvija kṛtaṁ cedviṣṇusaṁbaddhaṁ nirguṇaṁ syāttadā tu tat
हे द्विज! अब यह दोनों प्रकार का कर्म, गुणात्मक होते हुए भी, यदि विष्णु से सम्बद्ध होकर किया जाए, तो वह निर्गुण हो जाता है।
श्लोक 24 (skanda.2.192.24)
तत्फलं चाक्षयं स्याद्धि स्वेष्टादप्यधिकं नृणाम् । भक्तास्ते भगवद्धाम यान्त्यष्टावृत्तितः परम्
tatphalaṁ cākṣayaṁ syāddhi sveṣṭādapyadhikaṁ nṛṇām bhaktāste bhagavaddhāma yāntyaṣṭāvṛttitaḥ param
उसका फल मनुष्यों के लिए अपनी इच्छा से भी अधिक और अक्षय होता है; ऐसे भक्त अष्टधा प्रकृति से परे भगवद्धाम को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 25 (skanda.2.192.25)
अतो विवेकिनो नित्यं विष्णुभक्त्यन्विताः क्रियाः । प्रवृत्ता वा निवृत्ता वा कुर्वते सकला अपि
ato vivekino nityaṁ viṣṇubhaktyanvitāḥ kriyāḥ pravṛttā vā nivṛttā vā kurvate sakalā api
इसलिए विवेकी पुरुष प्रवृत्ति हो या निवृत्ति, अपने सभी कर्मों को सदा विष्णु-भक्ति से युक्त होकर ही करते हैं।
श्लोक 26 (skanda.2.192.26)
ब्रह्मा स्थाणुर्मनुर्द्दक्षो भृगुर्द्धर्मस्तथा यमः । मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः
brahmā sthāṇurmanurddakṣo bhṛgurddharmastathā yamaḥ marīciraṅgirāścātriḥ pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ
ब्रह्मा, स्थाणु (शिव), मनु, दक्ष, भृगु तथा धर्म और यम; मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु —
श्लोक 27 (skanda.2.192.27)
वैभ्राजश्च वसिष्ठश्च विवस्वान्सोम एव च । कश्यपः कर्द्दमाद्याश्च प्रजानां पतयो मुने
vaibhrājaśca vasiṣṭhaśca vivasvānsoma eva ca kaśyapaḥ karddamādyāśca prajānāṁ patayo mune
हे मुने! वैभ्राज, वसिष्ठ, विवस्वान्, सोम, कश्यप, कर्दम आदि प्रजापति —
श्लोक 28 (skanda.2.192.28)
देवाश्च ऋषयः सर्वे सर्वे वर्णास्तथाश्रमाः । पूजयन्ति तमेवेशं प्रवृत्तं धर्ममास्थिताः
devāśca ṛṣayaḥ sarve sarve varṇāstathāśramāḥ pūjayanti tameveśaṁ pravṛttaṁ dharmamāsthitāḥ
और सब देवता, सब ऋषि, तथा सभी वर्ण एवं आश्रम, प्रवृत्ति-धर्म में स्थित रहकर उसी ईश्वर की पूजा करते हैं।
श्लोक 29 (skanda.2.192.29)
सनः सनत्सुजातश्च सनकः स सनन्दनः । सनत्कुमारः कपिल आरुणिश्च सनातनः
sanaḥ sanatsujātaśca sanakaḥ sa sanandanaḥ sanatkumāraḥ kapila āruṇiśca sanātanaḥ
सन, सनत्सुजात, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, कपिल, तथा सनातन अरुणि —
श्लोक 30 (skanda.2.192.30)
ऋभुर्यतिश्च हंसाद्या मुनयो नैष्ठिकव्रताः । तमेव पूजयन्तीशं निवृत्तं धर्ममास्थिताः
ṛbhuryatiśca haṁsādyā munayo naiṣṭhikavratāḥ tameva pūjayantīśaṁ nivṛttaṁ dharmamāsthitāḥ
ऋभु, यति तथा हंस आदि आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रत वाले मुनि, निवृत्ति-धर्म में स्थित रहकर उसी ईश्वर की पूजा करते हैं।
श्लोक 31 (skanda.2.192.31)
वासुदेवस्याङ्गतया भावयित्वा सुरान्पितॄन् । अहिंसपूजाविधिना यजन्ते चान्वहं हि ते
vāsudevasyāṅgatayā bhāvayitvā surānpitṝn ahiṁsapūjāvidhinā yajante cānvahaṁ hi te
वे देवताओं और पितरों को वासुदेव के अंगरूप मानकर, अहिंसापूर्ण पूजा-विधि से नित्यप्रति उनका यजन करते हैं।
श्लोक 32 (skanda.2.192.32)
यथाधिकारमेते हि तेन यत्र नियोजिताः । प्रवृत्ते वा निवृत्ते वा धर्मे ते पालयन्ति तम् । तस्य देवस्य मर्यादां न क्रामन्त्युभयेपि ते
yathādhikāramete hi tena yatra niyojitāḥ pravṛtte vā nivṛtte vā dharme te pālayanti tam tasya devasya maryādāṁ na krāmantyubhayepi te
ये सभी जिस अधिकार में उसके द्वारा नियुक्त हैं, प्रवृत्ति हो या निवृत्ति, उसी धर्म का पालन करते हैं; दोनों ही उस देवता की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते।
श्लोक 33 (skanda.2.192.33)
चतुर्वर्गे तेषु यस्य यद्यदिष्टतमं भवेत् । तत्तत्संपूरयत्येव सर्व शक्तिपतिः प्रभुः
caturvarge teṣu yasya yadyadiṣṭatamaṁ bhavet tattatsaṁpūrayatyeva sarva śaktipatiḥ prabhuḥ
उनमें से जिसे चारों पुरुषार्थों में जो जो सबसे अभीष्ट है, समस्त शक्तियों के स्वामी वे प्रभु उसे उसे पूर्ण कर देते हैं।
श्लोक 34 (skanda.2.192.34)
भक्त्या कृतस्याप्यल्पस्य भगवान्पुण्यकर्मणः । प्रीतो ददात्येव फलं महदक्षयमीप्सितम्
bhaktyā kṛtasyāpyalpasya bhagavānpuṇyakarmaṇaḥ prīto dadātyeva phalaṁ mahadakṣayamīpsitam
भक्तिपूर्वक किए गए अल्प पुण्य-कर्म का भी भगवान प्रसन्न होकर महान एवं अक्षय अभीष्ट फल दे देते हैं।
श्लोक 35 (skanda.2.192.35)
तेषु तद्भक्तितो लोके ये त्वेकान्तित्वमास्थिताः । वासुदेवं विनान्यत्र संक्षीणाशेषवासनाः
teṣu tadbhaktito loke ye tvekāntitvamāsthitāḥ vāsudevaṁ vinānyatra saṁkṣīṇāśeṣavāsanāḥ
उनमें भी जो लोक में उसकी भक्ति से एकान्तिक भाव में स्थित हैं, जिनकी वासुदेव के अतिरिक्त अन्यत्र सभी वासनाएँ क्षीण हो चुकी हैं —
श्लोक 36 (skanda.2.192.36)
देहान्ते ते तु संप्राप्य तस्य धाम तमःपरम् । देहैरप्राकृतैरेव प्रेम्णा परिचरन्ति तम्
dehānte te tu saṁprāpya tasya dhāma tamaḥparam dehairaprākṛtaireva premṇā paricaranti tam
वे शरीर के अन्त में उसके अन्धकार से परे धाम को प्राप्त कर, अप्राकृत शरीरों द्वारा ही प्रेमपूर्वक उसकी सेवा करते हैं।
श्लोक 37 (skanda.2.192.37)
अन्ये तु भक्ताः कालेन तदुपासनदार्ढ्यतः । वासनानां क्षये जाते यान्त्येकान्तिकवद्धि तम्
anye tu bhaktāḥ kālena tadupāsanadārḍhyataḥ vāsanānāṁ kṣaye jāte yāntyekāntikavaddhi tam
अन्य भक्त भी काल के साथ उसकी उपासना की दृढ़ता से, वासनाओं का क्षय हो जाने पर, एकान्तिक भक्तों की भाँति ही उसे प्राप्त होते हैं।
श्लोक 38 (skanda.2.192.38)
येन केनापि भावेन तेन संबध्यते तु यः । संसृतिं न प्रयात्येव स तु क्वाप्यन्यजीववत्
yena kenāpi bhāvena tena saṁbadhyate tu yaḥ saṁsṛtiṁ na prayātyeva sa tu kvāpyanyajīvavat
जो भी किसी भी भाव से उससे सम्बद्ध हो जाता है, वह फिर किसी भी अन्य साधारण जीव की भाँति संसार को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 39 (skanda.2.192.39)
कर्मयोगस्य संसिद्धिर्ज्ञानयोगस्य चेप्सिता । तस्याश्रयादेव नृणां निर्विघ्नं भवति द्रुतम्
karmayogasya saṁsiddhirjñānayogasya cepsitā tasyāśrayādeva nṛṇāṁ nirvighnaṁ bhavati drutam
कर्मयोग की और ज्ञानयोग की अभीष्ट सिद्धि, उसी की शरण से मनुष्यों को शीघ्र तथा निर्विघ्न प्राप्त होती है।
श्लोक 40 (skanda.2.192.40)
तस्मात्स एव भगवान्सवर्रैपि जनैरिह । स्वाभीष्टफलसिद्ध्यर्थं प्रीत्योपास्यो यथाविधि
tasmātsa eva bhagavānsavarraipi janairiha svābhīṣṭaphalasiddhyarthaṁ prītyopāsyo yathāvidhi
इसलिए वे भगवान ही यहाँ सभी मनुष्यों द्वारा अपने अभीष्ट फल की सिद्धि हेतु विधिपूर्वक, प्रेमपूर्वक उपासनीय हैं।
श्लोक 41 (skanda.2.192.41)
ब्रह्मैक्यमाप्ता निर्विघ्ना अपि ब्रह्मशिवादयः । श्रीविष्णोः कुर्वते भक्तिं सन्तीत्थं तन्महागुणाः
brahmaikyamāptā nirvighnā api brahmaśivādayaḥ śrīviṣṇoḥ kurvate bhaktiṁ santītthaṁ tanmahāguṇāḥ
ब्रह्म के साथ एकत्व को प्राप्त तथा निर्विघ्न होते हुए भी ब्रह्मा-शिव आदि श्रीविष्णु की भक्ति करते हैं; ऐसे ही उनके महान गुण हैं।
श्लोक 42 (skanda.2.192.42)
इति गुह्यसमुद्देशस्तव नारद कीर्त्तितः । अतिप्रेम्णा हि सततं मयि भक्तिमतोऽखिलः
iti guhyasamuddeśastava nārada kīrttitaḥ atipremṇā hi satataṁ mayi bhaktimato'khilaḥ
हे नारद! इस प्रकार यह सम्पूर्ण गुह्य उपदेश तुम्हें कहा गया, क्योंकि तुम सदा अत्यन्त प्रेमपूर्वक मुझमें भक्ति रखते हो।